निकानोर पार्रा- मक्खियों का देवता : सोलेदाद मरामबियो

चिली के कवि निकानोर पार्रा, जिनकी मृत्यु 23 जनवरी 2018 में हुई, को याद करते हुए सोलेदाद मरामबियो जो कि स्वयं एक लेखिका एवं अनुवादक हैं, ने यह लेख लिखा है. पार्रा दक्षिण चिली में 103 साल पहले पैदा हुए और स्पैनिश भाषा और साहित्य के सबसे सशक्त स्वर बने. वह अकविता के जनक के रूप में जाने जाते हैं, अकविता अपनी बात कहने का वह तरीका है जो स्थापित साहित्यिक मानकों को तोड़ता है साथ ही कविता को रोजमर्रा की जिंदगी, आम बोलचाल की भाषा ओर पॉप कल्चर से जोड़कर नए तरीके से परिभाषित भी करता है. पार्रा एक गणितज्ञ और भौतिकविज्ञानी भी थे.

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Nicanor Parra. Photo by Javier Ignacio Acuña Ditze, 2014. Courtesy of Wikimedia Commons.

निकानोर पार्रा: मक्खियों का देवता

By सोलेदाद मरामबियो 

पार्रा की रचनाओं में अपने समय की सड़ांध और मृत्यबोध को उकेरा गया है, लेकिन यह बाद की बात है. निकानोर पार्रा की पहली किताब बेनाम गाने की किताब (Cancionero sin nombre,1937), फेडरिको गार्सिया लोर्का की शैली से प्रभावित थी. पार्रा की शुरूआती कविताओं में इस स्पैनिश कवि का लय और ताल, साथ ही ग्रामीण परिवेश और दृश्यों की छाप दिखाई पड़ती है. लेकिन जिस ग्रामीण परिवेश का चित्रण लोर्का करता था वह पार्रा के परिवेश से कई मायनों में अलग था. लोर्का का संगीत भले ही उसकी रचनाओं में मौजूद था लेकिन पार्रा की रचनाएँ नितांत ‘चिली’ (चिलियन) थीं, संगीत में तैरने वाले उसके शब्द अलग थे. यह अंतर आप तभी समझ सकते हैं जब आपके पास पार्रा जैसी ही संवेदनशीलता हो, आप उसके ही जूते पहनकर, उसके जाने पहचाने रास्तों पर चहलकदमी किये हों. जल्द ही पार्रा को लोर्कायी लय और ताल से घुटन महसूस होने लगी और उसने इसे त्याग दिया. अतियथार्थवाद, व्हिटमैनियन छंदमुक्ति और काफ्का की अंतर्दृष्टियों को लेकर पार्रा ने अपने लेखन में प्रयोग जारी रखा. ये सारे प्रयोग 1954 में लिखी उसकी किताब कवितायें और अकवितायें (Poemas y Antipoemas)  में एक दूसरे से टकराते हुए दिखते हैं. इसी किताब में मृत्युबोध का संत्रास और सड़ांध उसके विषय बनते हैं.

पार्रा की कवितायें और अकवितायें के प्रकाशित होने के चार साल पहले, पाब्लो नेरुदा की कैंटो जनरल (Canto General) प्रकाशित हुई थी. दरअसल यह किताब अमेरिकी इतिहास का महाकाव्यीय गायन थी. चिली और लातिन-अमरीकी पाठकों के लिए यह महत्वपूर्ण क्षण था. इस समय तक पाब्लो नेरुदा का कद स्पैनिश साहित्यिक समाज में पितातुल्य हो चुका था. कैंटो जनरल में नेरुदा पारंपरिक कविता के छंद को तोड़ कर गद्य की भाषा के करीब आने और सरल भाषा का प्रयोग करने की कोशिश कर रहे थे. पार्रा की विरासत को आसानी से समझने के लिए, ज़रूरी है कि हम पहले नेरुदा को समझें. यह व्यक्तिगत प्रतिद्वंदिता की बात नहीं है क्योंकि नेरुदा पार्रा के अकविता के शुरूआती समर्थकों में से थे. बल्कि बात यह है कि कविता और उसके अवयवों के बारे में हम क्या समझते हैं. इन बिन्दुओं पर नेरुदा और पार्रा एक दूसरे की विपरीत दिशाओं में चलते हैं. यह कहा जा सकता है कि पार्रा इन विषयों पर ज्यादा स्पष्ट था.

नेरुदा ने सरल भाषा में लिखने की कोशिश की, लेकिन उसकी कैंटो जनरल  स्वयं आडम्बरपूर्ण थी. यह किताब लगभग पैगंबरी अंदाज़ में अमरीकी इतिहास (उत्तरी एवं दक्षिणी अमरीका) के पांच सौ सालों का ब्यौरा देती है, जहाँ वह लिखता है कि, “मैं यहाँ कहानी सुनाने आया हूँ|’’ नेरुदा की आवाज़ पैगंबरी भी थी और काव्यात्मक भी. उसके अनुसार उसकी आवाज, सबकी आवाज थी. पार्रा केवल पार्रा रहना चाहता था और आम लोगों से बात करना चाहता था. नेरुदा के कैंटो जनरल  में महाकाव्यात्मक दृश्यों की भरमार है जहाँ वह महाद्वीप के लोगों और उनके भीषण दुखों का वर्णन करता है. वहीं पार्रा अपनी बॉक्सर जैसी चपटी नाक, झड़ते बाल और उन कबूतरों के बारे में लिखता है जो मक्खियों को खा रहे हैं, इसके पहले कबूतरों का चित्रण कविताओं में अनंत की तरफ़ उड़ते हुए पक्षी के रूप में किया जाता रहा है. अपने लेखन द्वारा पार्रा ने कविता में भद्देपन, गंदगी, मटमैले जूतों को चित्रित किया. वह गरीबों की, भीड़ की अभिव्यक्ति नहीं बनना चाहता था बल्कि वह उनमें से ही एक बनना चाहता था. इसलिए उसके शब्द आम थे, उसके परिदृश्य और कथानक ऐसे थे जो आपको किसी भी रास्ते के चौराहे पर, पार्कों में, गंदी चादरों के बीच, रोजमर्रा की जिंदगी के तहों में मिल जायेंगे|

कविताएं और अकविताएं की कविता पाठकों को चेतावनी (Warning to the Reader) को पढ़कर हम पार्रा के रचनाकर्म को समग्रता में समझ सकते हैं. इस कविता में पार्रा पाठकों को सचेत करता है कि वह अपने लेखन से पैदा हुए असहजता का उत्तर नहीं देगा. वह यह भी बताता है कि उसकी कविता में पाठक ‘इन्द्रधनुष’ या ‘दर्द’ जैसे शब्द नहीं पायेंगे. ये शब्द अनुपस्थित हो सकते हैं, हालाँकि मैंने तथ्यात्मक जांच तो नहीं की, लेकिन उसकी रचनाओं में दर्द मौजूद है. ये दर्द उसके चुटकलों के बीच, आम बातचीत में तैरता रहता है. पार्रा का ‘दर्द’ रोजमर्रा की जिंदगी से उपजा हुआ दर्द है- थकान, ग़रीबी, इर्ष्या, अधूरा प्यार, सतही प्यार, मृत्यु और इन सब की विसंगति और असहजता. पार्रा को उन लोगों से उबासी महसूस होती है जो यह सोचते हैं कि कविता दरअसल बड़े-बड़े विषयों और बड़ी-बड़ी बातों के लिए होती है. उसने स्पैनिश भाषा की कविता को आधुनिक बनाने के साथ ही इसकी दुरुहता को दूर करते हुए अधिक व्यापक बनाया. वह लेखन में क्रांति लाना चाहता था, वह साहित्यिक समाज के पवित्र गायों (sacred cows) द्वारा पैदा किये गए मक्खन-काव्य (fat poetry) के खिलाफ़ था. विडंबना यह है कि आज पार्रा खुद एक पवित्र गाय (sacred cow) बन गया है, लेकिन हम उसे एक ऐसे गाय के रूप में देख सकते हैं जो अपने तबेले को छोड़कर पोलिश जंगलों में एक जंगली बाइसन के साथ रहने के लिए आ गया है. पार्रानुमा गाय जंगली रास्तों पर दूर निकल गया है, जिसका बहुतों ने अनुगमन किया.

संतियागो के प्रधान गिरिजाघर (कैथ्रेडल) में अंतिम संस्कार के समय पादरी (प्रिस्टस) उसकी आखिरी इच्छा पूरी नहीं करना चाहता था. पार्रा चाहता था कि चिली की शानदार लोक गायिका विओलेता, जो कि उसकी अपनी बहन थी, के गीतों के साथ उसकी विदाई की जाय. पादरी का कहना था कि वियोलेटा के गीत ऐसे पवित्र स्थल पर नहीं गाये जा सकते. उसी वक्त पार्रा की एक बेटी ने पादरी से माइक्रोफ़ोन को छीनते हुए वहां पर उपस्थित लोगों को यह बात बताई और कहा कि वियोलेता का गीत यदि नहीं होगा तो उनका परिवार पार्रा के पार्थिव शरीर को वहां से लेकर चला जायेगा. थोड़ी देर में ही चर्च के स्पीकरों से शुक्रिया जिन्दगी! (Gracias a la vida) का स्वर गूंजने लगा. इस गीत के बजने के साथ ही वहां का परिवेश कविता, नृत्य और आम जिंदगी के दृश्यों के साथ भर गया. पार्रा ने अपने लेखन द्वारा इस भनभनाहट को अंदर आने दिया, जिसके लिए हम उसके शुक्रगुजार हैं.

सोलेदाद मरामबियो चिली (संतियागो) की लेखिका एवं अनुवादक हैं. अगली डक्लिंग प्रेस से उनकी दो किताबें अभी हाल में ही दो भाषाओं में प्रकाशित हुई हैं. इनका काम समय-समय पर ग्रांटा, जम्प्स्टर जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहा है. 2016 तक ब्रूतस एवितोरस  (Brutas Editoras) की संपादक रह चुकी हैं. पिछले साल उनको अपने पहले उपन्यास को पूरा करने के लिए चिली के नेशनल कौंसिल फॉर द आर्ट्स एंड कल्चर की तरफ से अनुदान प्राप्त हुआ है.

इसके हिंदी अनुवाद के लिए तिरछीस्पेल्लिंग जेएनयू के शोधार्थी रविरंजन सिंह का आभारी है. रविरंजन मूलतः हिंदी नाटक और भक्ति काव्य संसार के दरम्यान सक्रीय रहते हैं.  raviranjansingh.pbh@gmail.com  के माध्यम से आप इन्हें संपर्क कर सकते हैं.

इस लेख का मूल वर्ड्स विदाउट बॉर्डर्स पर देख सकते हैं. वहीं से इसे साभार लिया गया है.

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