मुक्तिबोध के बहाने रचना और आलोचना के अंतर्संबंधों की पड़ताल: प्रो.राजकुमार

मुक्तिबोध के बहाने प्रो. राजकुमार एक बहस की धारावाहिकता में गहरे विश्वास के साथ उतरे हैं. इस सीरिज का पहला  और दूसरा लेख  आप पढ़ चुके हैं, तीसरा यहाँ प्रस्तुत है.

दूसरा लेख इस मायने में विशेष रहा कि सोशल साइट्स पर  इससे संदर्भित  विषद  प्रतिक्रियाएं  देखने  को  मिलीं. लेकिन ज्यादातर प्रतिक्रयाएं  अवांतर प्रसंगों  में उलझी  रहीं. और लेख की  मूल  आत्मा से बहस को भटकाने की कोशिश की  गयी. प्रो.राजकुमार  की यह विशेषता  है कि  अवांतर प्रसंगों में उलझने  के बजाय  अपनी  निरंतरता / धारावाहिकता कायम रखते हैं.  उम्मीद  है कि  यह सीरिज लम्बी चलेगी. #तिरछीस्पेल्लिंग 

Muktibodh By Haripal Tyagi

Muktibodh By Haripal Tyagi

आलोचना और रचना

By प्रो.राजकुमार

हिन्दी में आलोचना को परजीवी कहने का चलन रहा है। इधर कुछ ‘सर्जनात्मक‘ किस्म के ‘आलोचकों’ ने आलोचना को परजीवी के कहने के बजाय प्राध्यापकीय कहना शुरू कर दिया है। आलोचना अच्छी या बुरी तो हो सकती है और होती भी है; जैसे रचना अच्छी या बुरी हो सकती है, होती है, लेकिन प्राध्यापकीय आलोचना किस बला का नाम है? ‘जिसे प्राध्यापक लिखे वह प्राध्यापकीय आलोचना’!

रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह- हिन्दी के चार बड़े आलोचक और चारों के चारों प्राध्यापक! हिन्दी आलोचना के इतिहास की इनके बिना कल्पना ही नहीं की जा सकती। हिन्दी ही नहीं, समूची दुनिया में आलोचना, समाज विज्ञान और विज्ञान के इतिहास की कल्पना विश्वविद्यालय के बिना असंभव है। लेकिन ये सारा ज्ञान-विज्ञान और साहित्य-सिद्धान्त इन सर्जनात्मक आलोचकों की दृष्टि में प्राध्यापकीय होने के कारण त्याज्य है।

हिन्दी में यह धारणा बद्धमूल रही है कि आलोचना दोयम दर्जे का काम है। अस्ल चीज है रचना। रचना मौलिक सृजन है और आलोचना उस पर आश्रित परजीवी, जिसकी हैसियत लाल बुझक्कड़ से अधिक नहीं।

आधुनिक आलोचना की जिस ढब पर शुरुआत हुई, उससे इस धारणा को बल भी मिला। परजीवी की छवि से मुक्ति पाने की छटपटाहट में आलोचक का नया रूप सामने आया जिसे अंग्रेजी में ‘स्कॉलर क्रिटिक’ कहा गया है। स्कॉलर क्रिटिक की छवि अपने यहाँ हजारी प्रसाद द्विवेदी पर बहुत सटीक बैठती है। मध्यकालीन संस्कृति और बौद्धिक परम्परा के गम्भीर अध्येता जिन्होंने आधुनिक रचनात्मकता पर बहुत कम लिखा। स्कॉलर क्रिटिक की परम्परा का विकास आगे चलकर संस्कृति के आलोचक के रूप में हुआ। सांस्कृतिक आलोचक के अध्ययन का दायरा साहित्य तक सीमित नहीं रह गया। वह समूची संस्कृति का आलोचक बन गया। साहित्य संस्कृति का पर्याय नहीं है, संस्कृति का एक हिस्सा है। सांस्कृतिक आलोचना समग्र सांस्कृतिक गतिविधि के परिप्रेक्ष्य में ही संस्कृति के इस साहित्य वाले हिस्से का अध्ययन करती है। सांस्कृतिक आलोचना की सार्थकता का विश्लेषण करते हुए टेरी इगल्टन ने तो साहित्य के विभागों का नाम ही सांस्कृतिक-अध्ययन विभाग रख देने की सलाह दी थी। सांस्कृतिक आलोचना उस दौर की उपज थी, जब सिद्धान्त-निर्माण का बोलबाला था, हर छोटा-बड़ा आलोचक थियरी बनाने में लगा था। थियरी ज्ञान मीमांसा और सत्तामीमांसा के एक अंग के रूप में साहित्य और संस्कृति का अध्ययन करती थी। थियरी की बाढ़ अब उतर चुकी है और साहित्य की सापेक्ष स्वायत्तता और स्वकीयता को नये सिरे से समझने की कोशिश चल पड़ी है, किन्तु इस समूचे घटनाक्रम से यह अभिज्ञान तो हो ही गया कि साहित्य को ज्ञानमीमांसा और सत्तामीमांसा के परिप्रेक्ष्य में ही ठीक से समझा जा सकता है। मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो साहित्य-समीक्षा सभ्यता-समीक्षा भी है। सभ्यता-समीक्षा के दायित्व से सम्पृक्त होकर ही साहित्य-समीक्षा सार्थक हो सकती है। यह कहना ठीक नहीं होगा कि मुक्तिबोध से पहले साहित्य-समीक्षा के इस गुरुतर दायित्व का एहसास हिन्दी में किसी को था ही नहीं। किन्तु मुक्तिबोध को इस बात का श्रेय अवश्य दिया जाना चाहिए कि उन्होनें साहित्य-समीक्षा को सही मायने में सभ्यता-समीक्षा के रूप में विकसित और स्थापित किया। यह काम उन्होंने उस समय किया जब साहित्य में आधुनिकतावाद का बोलबाला था और उसकी स्वायत्तता का बढ़ चढ़कर बखान किया जा रहा था। यह वही समय था जब पुराने ढंग की ‘मार्क्सवादी आलोचना’ साहित्य की स्वायत्तता के तर्क का ठीक-ठीक जवाब नहीं दे पा रही थी। लेकिन मुक्तिबोध के आलोचनात्मक लेखन पर बात आगे बढ़ाने से पहले रचना और आलोचना के सम्बन्ध को लेकर जो चर्चा शुरू हुई थी, उस पर दोबारा लौटें।

उल्लेखनीय है कि सॉस्यूर के भाषा-विषयक चिन्तन से प्रेरित संरचनावाद ने साहित्यिक आलोचना को एक मुकम्मल शास्त्र में तब्दील करने की कोशिश की और इस प्रक्रिया में साहित्य के मूलभूत नियमों को खोज निकालने का दावा किया। आलोचना को परजीवीपन से ऊपर उठाकर विज्ञान के समकक्ष खड़ा कर देने की मुहिम से पहले नॉर्थाप फ्राई अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एनॉटमी ऑफ़ क्रिटिसिज्म’ में ऐसा उद्यम कर चुके थे। फ्राई के विचार रचना और आलोचना के अंतर्संबंधों को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, इसलिए उनकी संक्षेप में चर्चा अप्रासंगिक न होगी।

यह धारणा, कि रचनाकार ही रचना के साथ ‘न्याय‘ कर सकता है, मानकर चलती है कि आलोचक परजीवी है, जबकि सच्चाई यह है कि आलोचना एक स्वतंत्र विद्या है जो साहित्य का अध्ययन करती है, जैसे विज्ञान वस्तु जगत अध्ययन करता है। आलोचना के अपने नियम कायदे और सिद्धान्त हैं। फ्राई के अनुसार रचनाकर-आलोचक के लिए अपनी रचनात्मक अभिरूचि से ऊपर उठ पाना प्रायः असंभव होता है। छोटे-मोटे लोगों की तो बात ही क्या टी.एस. इलियट जैसे प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का भी आलोचनात्मक विवेक काफी कुछ उनकी रचनात्मक अभिरूचि से निर्धारित दिखता है। रचनाकार का अपने और दूसरों के बारे में लेखन दिलचस्प तो हो सकता है लेकिन उसे अन्तिम और आधिकारिक लेखन नहीं कहा जा सकता। अक्सर रचनाकार अपने लेखन के भी ख़राब आलोचक साबित हुए हैं। प्रमाण स्वरूप अनेकों उदाहरण दिये जा सकते हैं। फ्राई के मुताबिक ‘जब रचनाकार आलोचक की तरह बोलने लगता है तब वह आलोचना नहीं, दस्तावेज़ निर्मित करता है। इस दस्तावेज़ का आलोचक द्वारा परीक्षण अपेक्षित होता है। सामान्य रूप से यह माना जाता है कि रचयिता के मुक़ाबले आलोचक रचना के महत्व का बेहतर निर्णायक होता है। यह धारणा चली आ रही है कि आलोचक को रचना का अन्तिम निर्णायक मानना हास्यास्पद है, जबकि व्यवहार में यह स्पष्ट है कि वही (आलोचक) रचना का अन्तिम निर्णायक होता है। इसका कारण निश्चयात्मक (Assertive) लेखन और साहित्यिक लेखन में विभेद न कर पाने की असमर्थता है। वर्णानात्मक-निश्चयात्मक लेखन की उत्पत्ति सक्रिय इच्छा-शक्ति और सचेत मस्तिष्क से होती है और ऐसा लेखन मुख्य रूप से कुछ ‘कहने‘ से ताल्लुक़ रखता है।

जैसा कि पहले कहा गया, फ्राई के बाद संरचनावाद आया। संरचनावाद ने साहित्य के मूलभूत सिद्धान्तों, रूढ़ियों, और परम्पराओं को खोज निकालने का दावा किया। आलोचना शास्त्र बन गई, बल्कि जोनाथन कूलर के शब्दों में कहें तो काव्यशास्त्र, संरचनावादी काव्यशास्त्र। और फिर आया उत्तर संरचनावाद, उसने इस तरह के शास्त्र-सिद्धान्त निर्माण की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया, लेखन की परम्परागत कसौटियों और श्रेणी विभाजन को तोड़ दिया, और विधाओं की मर्यादा और स्वायत्तता को मानने से इन्कार कर दिया। साहित्य की साहित्यकता का बखान जिन गुणों के आधार पर किया जाता था, वे सभी गुण, विश्लेषण करने पर पता चला, गैर साहित्यिक लेखन में भी मौजूद हैं। निष्कर्ष यह निकला कि साहित्यिक लेखन में ऐसा कोई आभ्यन्तिरक गुण नहीं जो गैर साहित्यिक लेखन में मौजूद न हो। दोनों में फर्क सिर्फ प्रकार्य (Function) और रूढ़ि से पैदा होता है। तात्विक और आधारभूत भिन्नता वस्तुतः सांस्कृतिक निर्मिती है और उसे विखण्डित करने की ज़रूरत है। फिर क्या था स्त्री-पुरूष (प्रकृति-संस्कृति) की तरह रचना और आलोचना की द्विआधारी अवधारणा को भी खण्डित करने की आवश्यकता महसूस हुई। इहाब हसन ने अपनी पुस्तक ‘पैराक्रिट्सिज्म’ में इस जरूरत को पूरा कर दिया। हसन ने दिखाया कि रचना और आलोचना में कोई तात्विक और आधारभूत अन्तर नहीं है। जो अन्तर है वह सांस्कृतिक निर्मित है और उसे तोड़ देने में ही दोनों का भला है।

‘आलोचना भी रचना है कहने में रचना की श्रेष्ठता कायम रहती है, जैसे झाँसी की रानी को मर्दानी कहने में मर्द की श्रेष्ठता कायम रहती है। उत्तर संरचनावाद में श्रेष्ठता के इस तात्विक और बुनियादी आधार को विखण्डित कर अस्मिता और विधा की स्वायत्तता को ही समस्याग्रस्त बना देता है। यहाँ भिन्नता का महत्व है लेकिन यह भिन्नता तात्विक और बुनियादी किस्म की नहीं है। इस भिन्नता के आधार पर किसी को हीन या श्रेष्ठ नहीं ठहराया जा सकता है।

अब न तो व्यक्ति की स्वायत्तता का कोई पैरोकार बचा है और न ही कला और साहित्य का। ये सभी पाठ (Text) हैं और ये पाठ परस्पर सम्बद्ध (Intertextual) हैं। परस्पर सम्बद्धता का मतलब है कि कोई भी पाठ पूर्णतः मौलिक नहीं है, दूसरे पाठ से जुड़ा हुआ उस पर निर्भर है। इसका निहितार्थ यह भी है कि सभी पाठ बराबर हैं। लब्बोलुआब यह कि रचना और आलोचना के बीच खड़ी दीवार ढह चुकी है। रचना आलोचनात्मक हो गई है और आलोचना रचनात्मक।

यह एहसास भले ही नया हो किन्तु सच्चाई यही है कि श्रेष्ठ आलोचना और रचना में ऐसा आत्यान्तिक भेद कभी था ही नहीं। मुक्तिबोध एक ऐसे लेखक हैं जिनका लेखन रचना और आलोचना के बीच की पारस्परिक सीमाबद्धता को लगातार समस्याग्रस्त बनाता है। उनकी कविताएँ, कहानियाँ और लेख विधाओं के पारम्परिक चौखटे में फिट नहीं बैठते। कविता में वे थीसिस लिखते हैं और उनके लेखों में ऐसे टुकड़े ख़ूब मिल जायेंगे जिन्हे मज़े से कविता में खपाया जा सकता हैं। उनकी कहानियाँ ऐसी हैं जिनमें रेखाचित्र, लोक-नीति-कथा और निबन्ध के गुण घुले-मिले हैं। ‘एक साहित्यिक की डायरी’ को क्या कहेंगे? रचना या आलोचना? मुक्तिबोध पारम्परिक किस्म के आलोचक नहीं हैं। वस्तुतः आलोचना उनके सम्पूर्ण लेखन का अभिन्न हिस्सा है, कोई आपदधर्म नहीं। कुछ लोग सोचते हैं कि अपने विरोधियों और साहित्य के दरोगा अर्थात् आलोचकों को जवाब देने के लिए उन्होंने आलोचना को आपद् धर्म के रूप में चुना। इस बात में आंशिक सच्चाई हो सकती है किन्तु उन्हें ध्यान से पढे़ं तो यह बात समझ में आ जाती है कि उनका लगभग समूचा लेखन ही बहस मुबाहिसे से बना है। यह बहस विरोधियों से ही नहीं होती, विरोधियों से भी ज्यादा स्वयं से होती है। इसलिए आलोचना उनके लेखन का आपदधर्म नहीं स्वधर्म है। उनका रचनात्मक लेखन भी एक प्रकार की आलोचना है, सभ्यता-समीक्षा है। कविता में थीसिस लिखने की उनकी प्रतिश्रुति का मतलब हैः कविता में सभ्यता-समीक्षा लिखना।

इसलिए मेरा खयाल है कि मुक्तिबोध के आलोचनात्मक लेखन की चर्चा करते समय हमें सिर्फ उनके ‘आलोचनात्मक लेखन’ पर ध्यान नहीं देना चाहिए क्योंकि उनके ‘आलोचनात्मक चिन्तन’ के कई मोती उनकी रचनाओं में डूबे हुए हैं। मैं उनके आलोचनात्मक चिन्तन के कुछ ऐसे ही पक्षों का यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा। मैं जानता हूँ कि यह काम आसान नहीं है फिर भी कुछेक प्रसंग आपके समक्ष रखता हूँ।

अक्सर कहा जाता है कि रचना का मर्म तो रचनाकार ही जानता है। इसलिए यदि रचना का ‘असली’ अर्थ जानना है तो रचनाकार से पूछो। आलोचक तो बाहरी व्यक्ति है वह रचना के साथ न्याय नहीं कर सकता। यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि लेखक अपनी रचना (कहानी, कविता, उपन्यास, आलोचना…) का अन्तिम और अधिकारिक व्याख्याकार नहीं हो सकता। क्योंकि, रचना केवल वही नहीं कहती जो लेखक कहलाना चाहता है, बहुत कुछ ऐसा भी कहती है जो वह नहीं कहलाना चाहता। यही नहीं, रचना का अर्थ पाठक और संदर्भ बदलने के साथ बदल जाता है। वस्तुतः रचना जन्म लेने के बाद रचनाकार से स्वतंत्र हो जाती है और सामाजिक जीवन का हिस्सा बन जाती है। सामाजिक जीवन को प्रभावित करती है और सामाजिक जीवन से प्रभावित होती है। कालजयी रचनाओं की जीवन-यात्रा लम्बी होती है। मामूली रचनाएं अपने रचयिता से विलग होने के बाद शीघ्र ही कालकवलित हो जाती हैं क्योंकि उनमें बदलते हुए संदर्भ में पुनर्नवता की संभावना नहीं होती। जिसे अपनी सामर्थ्य पर भरोसा नहीं होता वह रचना को सीने से चिपकाए ‘असली’ अर्थ न समझ पाने के लिए पाठकों-आलोचकों को कोसता रहता है। आलोचना को प्राध्यापकीय कहकर गरियाने वाले ज्यादातर स्वनामधन्य रचनाकार इसी कोटि में आते हैं। मुक्तिबोध को अपनी रचनात्मक सामर्थ्य पर भरोसा था। इसीलिए वे मानते हैं कि कविता पूर्ण हो जाने के बाद कवि से स्वतंत्र जीवन जीने लगती हैः

नहीं होती, कहीं भी ख़त्म कविता नही होती

कि वह आवेग त्वरित काल यात्री है।

व मैं उसका नहीं कर्ता,

पिता-धाता

कि वह कभी दुहिता नहीं होती,

परम स्वाधीन है वह विश्वशास्त्री है।

गहन-गम्भीर छाया आगमिष्यत् की

लिए, वह जनचरित्री है।

नये अनुभव व संवेदन

नये अध्याय-प्रकरण जुड़

तुम्हारे कारणों से जगमगाती है

व मेरे कारणों से सकुच जाती है।

कहने की आवश्यकता नहीं कि कविता (रचना) रचयिता से मुक्त होकर अपना भावी जीवन प्रारम्भ करती है और फिर उसमें नये अनुभव एवं संवेदन जुड़ते चले जाते हैं। जिस रचना में ऐसी सामर्थ्य होती है वही कालजयी कहलाती है; बाकी रचनाएं रचनाकार के साथ ही कालकवलित हो जाती है।

रचना जन्म के बाद रचनाकार से स्वाधीन हो जाती है, यह बात समझाने के लिए शायद ज़्यादा मशक्कत की जरूरत नही; लेकिन इसी से जुड़ा हुआ सवाल है, रचनाकार और रचना के सम्बन्ध का। यह सवाल ज़्यादा उलझा हुआ है और इसका संतोषजनक समाधान खोज निकालना आसान नहीं। उल्लेखनीय है कि मुक्तिबोध के समय में भी इस सवाल पर बहस हुई थी। अज्ञेय ने इलियट के वज़न पर भोक्तामन और सृष्टा-मन तथा जीवनाभूति और सौंदर्यानुभूति में विभेद किया था। मुक्तिबोध ने इस अवधारणा का ज़ोरदार खण्डन करते हुए भोक्ता-मन एवं स्रष्टा-मन के ऐक्य पर ज़ोर दिया था। ऐक्य का विशद विश्लेषण करते हुए उन्होंने सौन्दर्यानुभूति को जीवनानुभूति से गुणात्मक रूप से भिन्न माना। इस बात का निहितार्थ यह है कि रचना को जीवन का ‘बाइप्रोडक्ट’ नहीं कहा जा सकता। रचना और रचनाकार के बीच कोई प्रत्यक्ष, पारदर्शी और निष्क्रिय सम्बन्ध नहीं होता। रचना प्रक्रिया के मुक्तिबोध द्वारा किये गये विश्लेषण से इस बात की पुष्टि होती है। वस्तुतः रचना एक सचेत कर्म है और रचना के दौरान रचनाकार अपनी सोच के मुताबिक अनुभव को काटने-छाँटने एवं सम्पादित करने के लिए ‘स्वतंत्र’ होता है। किंतु यह स्वतंत्रता भी सापेक्षिक ही है। क्योंकि रचनाकार की स्वतंत्रता को सामाजिक स्थिति, अवचेतन, जड़ीभूत सौंदर्याभिरूचि जैसे कई कारण जाने-अनजाने प्रभावित करते हैं। फिलहाल इस तफ़सील में न जाकर सिर्फ़ भाषा चरित्र के बारे में बात करते हैं। औसत समझ के विपरीत भाषा आइने की तरह कोई पारदर्शी और निष्क्रिय माध्यम नहीं है जिसके आर-पार देखा जा सके। भाषा एक स्वायत्त संकेतप्रणाली है, जिसके अपने नियम-कायदे हैं। जीवन-जगत् का बोध भाषा में ही संभव होता है। इसका मतलब यह है कि भाषा सिर्फ़ साधन नही है, उसके बिना बाहर जीवन-जगत् का बोध संभव ही नही। जीवन-जगत् का बोध भाषा के रास्ते से गुज़रता है। और चूँकि भाषा दर्पण की तरह कोई निष्क्रिय पारदर्शी माध्यम नही है, भाषा अपना खेल दिखाती है। फ़ैज के शब्दों में कहें तो ‘बात बदल-बदल जाती है।’ कहना चाहते हैं कुछ और कह जाते हैं कुछ और।

भाषा का यह खेल जीवन-जगत् के बोध के समय ही नहीं, रचना-प्रक्रिया के दौरान भी चलता रहता है। यही नहीं जब रचना पूर्ण हो जाने पर पाठक से रूबरू होती है तब भी भाषा का यह खेल जारी रहता है। यही कारण है कि अलग-अलग देशकाल के पाठक/आलोचक एक ही रचना का अर्थ अलग-अलग ढंग से करते हैं। यदि ऊपर कही गयी बातें सही हैं तो फिर यह मानना पड़ेगा कि रचना रचनाकार के जीवन की प्रत्यक्ष और पारदर्शी अभिव्यक्ति नहीं है। मुक्तिबोध के शब्दों में सौन्दर्यानुभूति जीवनानुभूमति से गुणात्मक रूप से भिन्न चीज है; पूर्णतया पृथक न सही, किन्तु प्रतिरूप भी नहीं। सौन्दर्यानुभूति को जीवनानुभूति से गुणात्मक रूप से भिन्न बताने के बाद मुक्तिबोध को लगा कि कई दफा रचनाकार सिर्फ स्वाँग भरता है, वास्तव में वैसी अनुभूति उसके जीवन में होती नहीं। जैसे अभिनेता पात्रों का अभिनय करता है वैसे वह सिर्फ अभिनय कर रहा होता है। नयी कविता में ऐसा स्वाँग खूब दिखायी पड़ता है। मुक्तिबोध ने लिखा है कि महादेवी वर्मा की कविताओं में दुख की भरमार है लेकिन महादेवी ने स्वयं स्वीकार किया है कि उनका जीवन वैसा दुखमय नहीं था जैसा कि उनकी कविताएं पढ़ने पर प्रतीत होता है।

उल्लेखनीय है कि रोलां बार्थ भी लेखन को स्वांग ही मानते हैं, भले ही इस शब्द का इस्तेमाल न करते हों। उन्होंने ब्रेख्त के नाट्य-सिद्धान्त का उल्लेख करते हुए लिखा है कि जैसे ब्रेख्त के यहाँ अभिनेता, जिस पात्र का अभिनय करता है, उससे तादात्म्य स्थापित नहीं करता, वैसे ही ब्रेख्तियन अंदाज में अपने बारे में बोलता हूँ। यहाँ बोलने (लिखने वाले) ‘मैं’ और वास्तविक ‘मैं’ में दूरी बनी रहती है; ‘उसे जीने के बजाय दिखाता हूँ।’ लेखन इमेज सिस्टम का प्रदर्शन है। अपने काल्पनिक आत्म से दूरी बनाए रखते हुए और साथ ही अन्य के परिपे्रक्ष्य से उसका निरीक्षण करते हुए उसकी विभिन्न भूमिकाओं का डिमान्स्ट्रेशन या रिहर्सल है। जरूरत के मुताबिक लगाया गया मुखौटा है। जाहिर है कि मुक्तिबोध लेखन को स्वांग मानने के हिमायती नहीं, बल्कि लेखन और जीवन में एकता के पक्षधर थे। फिर भी वे किसी स्थायी, स्वायत्त, आत्मपूर्ण और सुसमन्वित व्यक्ति-अस्मिता की अवधारणा को भी स्वीकार नहीं करते। जबकि अज्ञेय ‘नदी का द्वीप’ में इसके ठीक विपरीत, एक स्वायत्त, आत्मपूर्ण एवं स्थायी व्यक्ति-अस्मिता की अवधारणा पेश करते हैं। उत्तर आधुनिक सिद्धान्तकार व्यक्ति-अस्मिता की ऐसी अवधारणा को तो मिथ या फिक्शन मानते ही हैं, फ्रेडरिक जेम्सन जैसा वामपंथी विचारक भी उनकी इस बात के लिए तारीफ़ करता है कि उन्होंने आत्म-पूर्ण समन्वित आत्म की अवधारणा को छिन्न-भिन्न कर दिया। मुक्तिबोध के यहाँ आत्म की अस्मिता स्वयं-सम्पूर्ण और स्थिर नहीं है, बल्कि बाहरी दबाव और भीतरी (परस्पर विरोधी) आग्रहों से लगातार संशय-ग्रस्त, अनिर्णीत, विरोधाभासी और परिवर्तनशील है। परम अभियक्ति या अरूण कमल की तलाश तो निरन्तर है, लेकिन झूठे समन्वय या शिलीभूत सामंजस्य के मर्म को भी वे बख़ूबी समझते हैं। मुक्तिबोध की कविता लगातार यह दिखाती है कि व्यक्ति की अस्मिता ‘नदी के द्वीप’ की तरह स्थिर नहीं होती। जैसे विचारधारा के भीतर से एक प्रच्छन्न विचारधारा झाँकती दिखाई पड़ती है, वैसे ही एक व्यक्ति के भीतर एक और व्यक्ति की मौजूदगी का एहसास होता रहता है। इन दोनों के बीच अनवरत संवाद चलता रहता है। यह संवाद अस्मिता के किसी स्वायत्त-आत्मपूर्ण (नदी का द्वीप जैसी) अवधारणा को नकारता है। मुक्तिबोध के यहाँ अस्मिता की अवधारणा जिस रूप में आती है, कई मायनों में वह जूलिया क्रिस्तेवा की ‘threshold’ की अवधारणा से मिलती जुलती है। उल्लेखनीय है कि क्रिस्तेवा के यहाँ चेतन और अवचेतन के बीच चौहद्दी लगातार बदलती रहती है, क्योंकि इनके बीच निरन्तर संवाद चलता रहता है। अस्मिता का कोई भी रूप अन्तिम और पूर्ण नहीं होता। पूर्णता स्वप्न में तो संभव है लेकिन यथार्थ में नहीं, मुक्तिबोध यह समझते थे।

यदि अस्मिता का कोई भी रूप पूर्ण और अन्तिम नहीं है तो उसमें सकारात्मक और नकारात्मक परिवर्तन भी संभव हैं। यही कारण है कि कल तक आग उगलने वाले मृत ज्वालामुखी बन जाते हैं और रावण के घर पानी भरने लगते हैं। कोई ज़रूरी नहीं कि रचनाकार अपने इस रूप को रचना में प्रस्तुत करे ही। अनुभव, संवेदना और कल्पना का सहारा लेकर वह स्वांग भी भर सकता है। मार्सेल प्रूस्त ने लिखा है कि पुस्तक में सामने आने वाला व्यक्तित्व और सामाजिक जीवन में दिखाई पड़ने वाला व्यक्तित्व अलग-अलग होते हैं। इलियट के कथन से हम वाकिफ़ ही हैं, उसे दोहराने की ज़रूरत नहीं। अब जबकि आत्मकथा को भी लेखक के जीवन की सीधी पुनर्प्रस्तुति मानने के बजाय लेखक के जीवन का सृजित गल्प माना जा रहा है, रचना को लेखक के जीवन का पर्याय मानने का कोई तुक नहीं। यह ठीक है कि कुछ रचनाकारों के जीवन और रचना में पर्याप्त समानता दिख सकती है, किंतु सर्वत्र ऐसा हो, यह ज़रूरी नहीं। लेखन एक विशिष्ट लीला कर्म हैं, रचनाकार के सम्पूर्ण व्यक्तिगत सामाजिक जीवन का लेखा-जोखा नहीं। लेखन और रचनाकार के जीवन में संगति की अपेक्षा एक आदर्श के रूप में ठीक है, लेकिन अक्सर ऐसी संगति होती नहीं है। आलोक धन्वा या वी.एस. नयपाल अपवाद नहीं है; बात सिर्फ़ यह है कि उनके जीवन की कुछ बातें सामने आ गयीं, और हम छाती पीटने लगे। चोरी तो ज़्यादातर लोग करते हैं लेकिन चोर वही कहलाता है जो चोरी करते पकड़ा जाय और जिसे सज़ा मिले। इसलिए बेहतर यही होगा कि रचनाकार की रचना और जीवन दोनों को देखा जाय। लेकिन मुसीबत यह है कि रचनाकार का जीवन, विशेष रूप से व्यक्तिगत जीवन, पाठक की पहुँच से बाहर है। वह तो उतना ही देख सकता है जितना दिखाने के लिए लेखक तैयार हो। वैसे इस मामले में वी.एस.नयपाल की दाद देनी पड़ेगी। उन्होंने माना है कि लेखक के जीवन की पड़ताल करने की चाहत बिल्कुल वैध है। उन्होंने कहा है कि लेखक के जीवन का व्योरा अन्ततः लेखक की पुस्तक से बेहतर साहित्यिक कृति साबित हो सकता और अपने समय के सांस्कृतिक ऐतिहासिक पक्ष को ज्यादा गहराई से आलोकित कर सकता है। इसलिए यदि मुक्तिबोध दिमागी गुहांधकार में झाँकने की कोशिश करते थे और बाह्य संघर्ष के साथ-साथ आत्म संघर्ष पर इतना जोर देते थे, तो क्या ग़लत करते थे, अब तक के अनुभव ने हमें यही सिखाया है कि मानव-मस्तिष्क बहुत जटिल है और तर्क-विवेक को अक्सर चकमा दे जाता है। वह सामाजिक-आर्थिक स्थितियों से निरपेक्ष नही है, लेकिन उसे सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में निःशेष (Reduce) भी नहीं किया जा सकता।

देखिये बात कहाँ से कहाँ पहुँच गई। क्या लिखने चला था और क्या लिख गया! अभी तो लगता है कि सिर्फ़ भूमिका ही बनी है। जो बातें लिखना चाहता था वे तो रह ही गईं।

राजकुमार जी

प्रो॰राजकुमार

शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन। किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, बी॰एच॰यू॰ के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव।

 

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