एक और जिंदगी ‘सिर्फ तुम’ की प्रिया गिल जैसी: अविनाश मिश्र

आभासी पटल (सोशल साइट्स) के बाहर ‘कुंठित मन’ की ‘निर्लज्ज अभिव्यक्तियाँ’ कितनी अमानवीय होती हैं, वह जानी-पहचानी है. अविनाश के पास ‘कूटनीति’ की भाषा नहीं है, जिसका सबसे सजग इस्तेमाल आभासी लोक-वृत्त के दायरे में किया जाता है. जिस दिन उसके पास यह आ जायेगी, वह ख़त्म हो जाएगा.  यह आभासी-व्यवहार और कुछ नहीं, बल्कि हाल-चाल, दुआ-सलाम की भाषा को पाने का ही करतब है. यह भाषा आदमी को दलाल, अवसरवादी, व्यवसायी बना सकती है लेकिन रचनाकार नहीं. यह ‘सर्वधर्म-समभाव’ की सबसे उपजाऊ जमीन है. जहाँ भाषा गूगल-ट्रांसलेट हो जाती है.

अविनाश मिश्र इस समय का रचनात्मक, खतरनाक और ‘आत्मघाती’ स्फुटन है. तमाम आपत्तियों और बदनामियों के बावजूद उसे पसंद किया जाता है. तिरछीस्पेल्लिंग पर अविनाश की  ‘नए शेखर की जीवनी’ की  पहली  प्रस्तुति  और दूसरी  प्रस्तुति  आप पढ़ चुके हैं, यह तीसरी प्रस्तुति है. 

the-king-of-habana-2015

स्नैपशॉट- द किंग ऑफ़  हवाना  (2015)

By अविनाश मिश्र

नए शेखर की जीवनी

घर मैंने छोड़ दिया

कोई मूल्यवान चीज

मैंने नहीं छोड़ी

@धूमिल

 

एक नए नगर में बहुत सारी जगहों का कोई इतिहास नहीं है.वे धीरे-धीरे अपना इतिहास अर्जित कर रही हैं. नई जिंदगियों के लिए इतिहास को झेलना बहुत मुश्किल है, क्योंकि इतिहास में सब कुछ हो सकता है —सच्चाई भी—लेकिन जिंदगी नहीं.

शेखर इतिहास गंवा चुका है. अब वह चाहता है केवल इतनी अस्मिता कि एक नए नगर में बस सके.

नए नगर बेहद संभावनाशील प्रतीत होते हैं. उनकी सरहदों में घुसते ही उम्मीद और यकीन की नई इबारतें खुलती हैं. वहां भाषा की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. वहां सजगता की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. वहां जागरूकता की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. वहां लोगों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. वहां सबसे कम जरूरत उस चीज की होती है जिसे शेखर गंवा चुका है. फिर भी वह वहां अर्जित करेगा, वह सब कुछ जो वह गंवा चुका है.

*

शेखर अब एक नए नगर में है. इस नए नगर में एक कमरा है. एक झाड़ू है. एक बिस्तर है. एक स्त्री है. इस एकवचन में बहुवचन हैं इस स्त्री की आंखें.

ये आंखें शेखर को बहुत उम्मीद से देखती हैं. वह नहीं चाहता कि यह उम्मीद कोई शक्ल ले. लेकिन लापरवाहियां शेखर के शिल्प में हैं. इसलिए ही ये आंखें उम्मीद से हो गईं.

शेखर के बाबा तब मरे जब मुल्क में आपातकाल था और शेखर के जनक तब, जब मुल्क में यह जांचा जा रहा था कि कौन कितनी देर खड़ा रह सकता है.

 शेखर के बाबा नारे लगाते हुए मरे और जनक पुराने बंद हो चुके चंद नोट किनारे लगाते हुए.

 लेकिन शेखर अभी मरना नहीं चाहता—न अपने बाबा की तरह, न अपने बाप की तरह.

अभी तो एक और जिंदगी उसकी प्रतीक्षा में है. अभी तो आस-पास का सब कुछ इस जिंदगी का स्वप्न है. इस इंतजार को वह खोना नहीं चाहता. इस इंतजार में सुख है.

शेखर उत्सुकता को अपराध की सीमा तक बुरा मानताहै.

बीत चुकी स्थानीयताओं में यानी अपने बचपन के नगर में जब भी वह किसी ऑटो में बैठा, उसे यही गीत सुनने को मिला :

मेरी आंखों में जले तेरे ख्वाबों के दिए 

कितनी बेचैन हूं मैं यार से मिलने के लिए’

एक और जिंदगी ‘सिर्फ तुम’ की प्रिया गिल जैसी होगी. जब भी कोई उससे पूछेगा कि क्या चाहती हो? वह कहेगी : ‘सिर्फ शेखर.’

अभी तो जो जिंदगी है उसमें प्रशंसा का पहला वाक्य आत्मीय लगता है, लेकिन प्रशंसा के तीसरे वाक्य में प्रशंसा का तर्क भी हो तब भी उससे बचने का मन करता है, क्योंकि प्रशंसा के दूसरे वाक्य से ही ऊब होने लगती है.

अभी तो जो जिंदगी है वह शेखर से कहती है कि वह उसके भाई जैसा है और यह सुनते ही वह समझ जाता है कि इस जिंदगी के फायदे दूसरे हैं. ये जिंदगी भी पुरुषों की तरह क्रूर, कुटिल, अवसरवादी, धूर्त और धोखेबाज है.

शेखर चाहता है कि जिन जिंदगियों से उसके रक्त के रिश्ते नहीं, वे उसे उसके सही नाम से पुकारें—शेखर…

इतनी जिंदगियों पर इतने अत्याचार देखे हैं और इतनी अत्याचारी जिंदगियां देखी हैं कि अपने जीवित होने से घृणा हो गई है शेखर को. लेकिन फिर भी जब कोई जिंदगी शेखर को शेखर पुकारती है, उसे लगता है कि वह क्रूरता से कोमलता की ओर, कुटिलता से सहृदयता की ओर, अवसरवादिता से ईमानदारी की ओर, धूर्तता से समझदारी की ओर और धोखेबाजी से विश्वसनीयता की ओर एक जरूरी कदम बढ़ा चुकी है.

इस जिंदगी से शेखर पूछता है कि कहां जाऊं जो बर्बरता के स्रोत पीछा न करें?

जिंदगी : जनपथ से राइट लो.

 शेखर : अगर दिल्ली विश्वविद्यालय से केंद्रीय सचिवालय जाऊं तो मेट्रो बदलनी तो नहीं पड़ेगी न?

 जिंदगी : बहुत विद्वतापूर्ण बातों का वक्त बीत गया.

 शेखर : मुझे लगता नहीं कि मैं दूर तक जा पाऊंगा. 

इस जिंदगी में जिसे देखो वही पूछता है कि कहां क्या मिल रहा है?

कोई नहीं पूछता :

‘कहां जाऊं

और दे दूं

खुद को.’

इस जिंदगी में खुद को दे देने के लिए शेखर बहुत जल्दी में रहता है. वह जल्दी-जल्दी चलता है, खाता है, पीता है. उसे लगता है कि कहीं कुछ छूट रहा है जो पीछे नहीं आगे है. वह उसे पकड़ने के लिए जल्दी में रहता है.

वह जानता है कि एक दिन लोग कहेंगे :‘अगर शेखर ने जल्दी न की होती, तब वह पहुंच गया होता.’

*

यह जिंदगी तब की पैदाइश है, जब लोग अपना जन्मदिन इतना नहीं मनाते थे. जब अंग्रेजी इतनी नहीं बोली जाती थी. जब लोगों की आंखें भरी और कान खाली रहते थे और उन्हें धीरे से भी पुकारो तो वे सुन लेते थे. तब तकनीक थोड़ी कम थी और निरर्थकता भी.

शेखर बहुत पहले का नहीं है, लेकिन न जाने क्यों उसे लगता है कि पहले सब कुछ ठीक था और आगे सब कुछ ठीक हो जाएगा.

शेखर पागल थोड़ा नहीं है, अर्थात् बहुत है.

लेकिन शेखर केवल ताली बजाने के लिए नहीं बना है, उसने रची है अपने ही हाथों से यह दुनिया भी और इस दुनिया में एकसौगजकाप्लॉटभी—दिल्लीसेकुछहटकर.

इस प्लॉट को एक आवास की शक्ल देने के सिलसिले में वह बेचैन रहता है. लेकिन आर्थिक आपातकाल ने एक आवास के स्वप्न को खुले आवासीय यथार्थ में बदल दिया.

जम्बो सर्कस हो या गैंग रेप या अवैध कोकीन बरामद हो, ट्रक-मर्सिडीज भिड़ंत हो या पप्पू खंजर की गिरफ्तारी… सब कुछ अब शेखर के इस सौ गज के प्लॉट के आस-पास ही होता है.

शेखर के जनक की मृत्यु और शेखर का खुद जनक होना नवंबर’16 की उन तारीखों में हुआ जब पूरा मुल्क कतारों में खड़ा था.

सारी कतारें शेखर के सौ गज के प्लॉट पर आकर खत्म होने लगीं. सारी बातें वह घसीट कर सौ गज के दायरे में ले आने लगा.

सीमेंट, मोरम, रेत, गिट्टियां, ईंट, मार्बल, सरिया, लोहा, लकड़ी, मिट्टी… वह संवाद के सारे मुद्दों को इनमें मिक्स करने लगा.

मय्यतों और सत्संगों में भी वह इस प्लॉट का जिक्र छेड़ बैठता.उसे पुश्तैनियत में कुछ नहीं मिला पपीते के एक पेड़ और आपातकाल की कुछ बुरी यादों के सिवाय. इसलिए वह जानता था करोड़ों-करोड़ बेघरों के बीच में एक सौ गज के प्लॉट के मायने. करोड़ों-करोड़ कीड़ों-मकौड़ों को रौंदने के बाद एक इतनी बड़ी जगह पर काबिज होकर,वह थोड़ा खुश होना चाहता था.

वह अपने नवजात शिशु से इस प्लॉट से संबंधित अभूतपूर्व योजनाओं पर चर्चा किया करता. वह अपने शिशु को समझाता कि असंतुष्टियों के असीमित और अर्थवंचित आयामों से बच कर चलना मेरे बच्चे.

शेखर ने प्रवचनों में सुना था :

सब कुछ माया है…

यह वाक्य दिन-ब-दिन अब और चमकीला होता जा रहा है.

आने वाले वक्त में जब शेखर का नवजात शिशु कुछ बड़ा होगा, सब तरफ बेइंतिहा चमक होगी. लेकिन सब कुछ ठीक-ठीक देख पाना वैसे ही असंभव होगा जैसे कि आज इस अंधेरे में जहां शेखर रहता है—एक अधूरे सौ गज के प्लॉट पर, एक और जिंदगी के इंतजार में…

***

 

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5 thoughts on “एक और जिंदगी ‘सिर्फ तुम’ की प्रिया गिल जैसी: अविनाश मिश्र

  1. अविनाश जब भी आता है कुछ बढ़िया ही लाता है।

  2. Seemanchalnama सीमांचलनामा on said:

    शेखर पागल थोड़ा नहीं है, अर्थात् बहुत है.शेखर को जीवंत करता एक और शानदार लेखन।

  3. vikas dwivedi on said:

    बहुत अच्छा

  4. Asahmat on said:

    ‘कहां जाऊं

    और दे दूं

    खुद को.’

    किसकी पंक्ति है ?

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