आत्महंता की डायरी और बेकशिंस्कि का घर: मग्दालेना जेबाउकोव्स्का

बीसवीं-इक्कीसवीं सदी के विश्वस्तरीय, चर्चित, पोलिश चित्रकार ज़्जिसुअव बेकशिंस्कि का जीवन उनकी कृतियों की तरह ही सर्रियलिस्ट-स्पर्श लिए हुए अविश्वसनीय जान पड़ता है. उन्नीस सौ अंठानवे में उनकी पत्नी की मृत्यु की होती है. उन्नीस सौ निन्यानवे के क्रिसमस की पूर्वसंध्या के अवसर पर उनका इकलौता पुत्र तोमष, जो कि बहुत ही लोकप्रिय रेडियो उद्घोषक, संगीत-पत्रकार और अनुवादक था, आत्महत्या कर लेता है. सत्रह बार चाक़ू से गोदा गया बेक्शिन्स्कि का मृत शरीर इक्कीस फ़रवरी, दो हजार पाँच को उनके ही फ्लैट में पाया जाता है. यह धत् कर्म उनके ही केयरटेकर के नाबालिग पुत्र द्वारा किया गया था. मग्दालेना जेबाउकोव्स्का ने अपनी पुस्तक बेक्शिन्स्कि: एक दोहरी तस्वीर‘ (The Beksinskis: Double Portrait[i]) में बखूबी इन दृश्यों को जगह दी है. पोलिश इंडोलॉजिस्ट तत्याना षुर्लेई ने इसी किताब के शुरूआती हिस्से को यहाँ अनुदित की है.

dsc03496

बेकशिंस्कि के परिवार के चित्र

By मग्दालेना जेबाउकोव्स्का 

आत्महंता की डायरी और बेकशिंस्कि का घर

एक चिट्ठी 

प्रिय एवा! एक बुरी खबर है। तोमेक[ii] मर गया। क्रिसमस की पूर्व संध्या पर उसने आत्महत्या कर ली और क्रिसमस के दोपहर, करीब तीन बजे मुझे उसकी लाश मिली। मैं पहले ही तुमको इस संबंध में लिख चुका हूँ कि अगस्त या इससे पहले से ही रेड अलर्ट था, और अब इस तरह इसकी समाप्ति हुयी।

अभियोजन पक्ष के कार्यालय के समक्ष जाने से पहले ही मैंने सारे भौतिक सबूतों को छुपा दिया है। क्योंकि, कागज़ के एक टुकड़े पर तोमेक ने लिखा कि मेरे लिए कंप्यूटर में एक चिट्ठी और डिक्टाफोन में एक मैसेज है।  डॉक्टर के आने से पहले ही मैंने कॉपी को सुरक्षित रख कंप्यूटर से चिट्ठी को हटाया, फिर कागज़ के टुकड़े और डिक्टाफोन को जेब में छुपाया। क्योंकि, मुझे डर था कि पुलिस सब कुछ अपने कब्जे में ले लेगा और बाद में अलग-अलग अंजान लोग इसे सुनेंगे, पढ़ेंगे और इसके बारे में पीएचडी लिखेंगे। मुझे लगता है कि मैंने जो किया अच्छा किया। हालांकि, पुलिस और अभियोजन पक्ष वाली औरत यह समझ नहीं सकती थी कि उसने क्यों कोई चिट्ठी नहीं छोड़ा। उन लोगों के बीच सब से बड़ा शक इसी एक बात से पैदा हुआ।

वास्तव में, इस चिट्ठी से मुझे अधिक वस्तुगत जानकारी मिली। जैसे कि, किसको क्या देना चाहिए और कौन-से काम पुरे करने हैं। मैं यह चिट्ठी उनको दिखा सकता था, लेकिन इसे पढ़ने के लिए मेरे पास समय नहीं था। और, टेप इतना व्यक्तिगत था कि इसे सिर्फ मैंने सुना, शायद एक और बार सुनकर इसको नष्ट करूंगा, जैसी उसकी इच्छा थी। उसकी यह भी प्रार्थना थी कि उसकी टेप वाली डायरी को (सुनने या न सुनने के बाद), जिसमें बहुत सारे टेप हैं, भी नष्ट करूँ।

जोशा की मौत के बाद, पहली बार मुझे एक अजीब-सी खुशी का अहसास हुआ कि यह सब होने के पहले ही वह मर गई, क्योंकि यह उसके लिए असहनीय होता। मैं ज़्यादा सहनशील हूँ, वैसे भी अंत में यहाँ किसी का रहना जरुरी है।

सिर्फ़ मुझे मालूम था कि तोमेक के लिए जीवन मुश्किल था। अहंवादी और अहंकारी होने के बावजूद, कोई अपनी नियति खुद नहीं चुनता। लेकिन, मुझे लगता है कि यह जो कुछ भी हुआ, अच्छा हुआ।

टेप पर दर्ज उसका अंतिम संदेश यही था कि जिस दुनिया में उसको जीना पड़ता है इससे वह कितना निराश है। उसे हमेशा एक अलग दुनिया चाहिए थी, जहां के नियम सीधे होते हैं, दोस्ती हमेशा सही होती है या ऐसा कुछ…।

इस मैसेज का अंत लगभग इस तरह था, “मैं जानता हूँ कि मेरी दुनिया कल्पना की दुनिया है, लेकिन उन इकतालीस सालों में मैं भी शायद एक कल्पना था। मैं कल्पना की दुनिया में जा रहा हूँ, क्योंकि मैं सिर्फ़ वहाँ ही खुश रह सकता हूँ। हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ कि मुझे जगाना मत।”

उसने याकूब की सीढ़ी वाला टीशर्ट पहना था, और मुझे नहीं मालूम कि इसका कोई प्रतीकात्मक अर्थ था या नहीं!

उसे डर था कि नींद की गोलियां जब तक उसे मारेगी, उससे पहले मैं आ जाऊंगा! इसलिए, उसने टेप के संदेश में कहा कि तेईस दिसम्बर से उसने कुछ नहीं खाया है ताकि गोलियां जल्दी से अपना काम करें, और गोलियों के डिब्बे को बाहर के कूड़ेदान में फेंका ताकि डॉक्टर को पता न चल सके  कि उसने क्या खाया है!

वह तेईस तारीख की शाम को ही यह करना चाहता था। लेकिन, उसे याद आया कि वह हर शुक्रवार को घर आकर अखबार में छपे टीवी-कार्यक्रम के विवरणों में से पसंदीदा फिल्मों को चिन्हित करता है। ताकि, बाद में उसे देख सके और इसके लिए प्रसारण के समय उन्हें रिकॉर्ड करना चाहिए। वह जानता था कि इस दिन अगर वह नहीं आएगा तो मैं परेशान होकर चेक करूंगा कि क्या हुआ। इसलिए चौबीस दिसम्बर को दोपहर दो बजे मेरे पास आ गया और ऐसी फिल्मों को मार्क किया जो सिर्फ उसके लिए दिलचस्प हो सकती थीं, क्योंकि मुझे वेस्टर्न पसंद नहीं हैं। यह सब कुछ मुझे दिलासा देने के लिए था ताकि मैं कुछ अनुमान न करने लगूँ, और सच में उसका यह प्रयास सफल हुआ।

गोलियाँ खाने के बाद रिकॉर्ड हुए टेप से पता चला कि उसने गोलियों को चौबीस तारीख को दोपहर के तीन बजकर पाँच मिनट पर खाया। मैं चौबीस घंटे बाद वहाँ पहुँचा। वहाँ पहुँचने से पहले मैं कुछ परेशान था क्योंकि उसकी अच्छी दोस्त, अनया ओर्तोदोक्स[iii] ने फोन की और बतायी कि जब वह मेरे घर से अपने घर वापस गया था तभी अनया ने तोमेक से बात की थी और उसे लगा कि तोमेक की तबियत ठीक नहीं है। इसलिए वह बोली कि मैं उसके पास जाऊँ या उसको अपने यहाँ बुलाऊँ।

चूँकि, तोमेक ने मुझसे कहा था कि बीमार होने की वजह से वह दो दिनों के लिए फोन को स्विच ऑफ करेगा, ताकि उसकी तबीयत में सुधार हो। शुरू में मुझे लगा कि सच में उसने यह किया। अनया से बातचीत करने के बाद मैंने तोमेक को फोन किया लेकिन सिर्फ ऑटोमेटिक और रिकॉर्ड स्वर ही सुनाई देते थे, उसका मोबाइल फोन बंद था। मैं वहाँ गया और बार-बार दरवाजे की घंटी बजाता रहा। अब मुझे याद नहीं है, लेकिन यह शायद दोपहर चार बजकर पचास मिनट या पाँच बजकर दस मिनट था। उसने दरवाजा नहीं खोला और मेरे पास चाभी नहीं थी (अगले दिन मुझे पता चला कि उसने मेरे घर में अपनी चाभियों को दिनुव[iv] से खरीदी गयी एक चीनी मिट्टी के गमले में रखा है, अन्य दूसरी चीजों के नीचे) तो मैंने सोचा कि उसने नींद की गोली खाकर और कानों में इअरफ़ोन लगा सो रहा है। दरवाजे तोड़ना मैंने ज़रूरी नहीं समझा। दूसरे दिन मुझे उसकी चाभियाँ मिली और जब मैं तोमेक के पास पहुंचा तो वह बहुत समय से मरा हुआ था। हाँ, ऐसा ही था। ठीक है, अगर तुमको कुछ और जानना चाहिए तो लिखो! सभी को नमस्कार।

ज़्जिसुअव।

वारसा: रविवार, 26 दिसम्बर, 1999, दोपहर 4:07।

***

घर

हर किसी को यह घर धोखा देता था, जो उसे पूरी तरह जानने और समझने की कोशिश करता था। उसने किसी को भी घर की पूरी तस्वीर उतारने की अनुमति नहीं दी। सिर्फ अहाते की ओर से अंदर प्रवेश पाने वाली टूटी हुई सीढ़ियों की, या बगीचे की ओर से झाड़ियों के बीच से ऊँचे उठे हुए सड़े बरामदे की, या एक दीवार पर लकड़ी के हिले हुए रेलिंग की और उपेक्षित अहाते की ही, जहाँ ऊँची छत वाला एक छोटा कुआँ था, तस्वीर खींचना संभव था। एसेनबह की दवाई की दुकान के पीछे छुपा यह घर सड़क से दिखाई नहीं देता था और पेड़ों के पीछे होने के कारण पुओव्येत्स्कि नदी की ओर से भी दिखाई नहीं देता था। शुरू-शुरू में यह घर बॉयलर के वर्कशॉप होने के रहस्य की रक्षा करता था।

हेनरिक वनिएक, ज़्जिसुअव बेकशिंस्कि का दोस्त, को यकीन है कि यह घर, बीच में एक छोटे अहाते के साथ, एक वर्ग की संकल्पना पर आधृत है; जिसमें बाहर से कोई सीधा प्रवेश-द्वार नहीं था। इसे देखकर उसे एन्फ़िलैड की याद आती है जिसमें एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाने का रास्ता घुमावदार होता है।

लेकिन यह असम्भव है क्योंकि लकड़ी का यह घर, जिसके छत धातु के प्लेटों से बने थे, अन्य इमारतों के बगल में U आकार में खड़ा था। जो, सामने या अन्दर से एक मंजिली हवेली जैसा था और ऊपर-ऊपर से देखने पर किसी ग्रामीण घर जैसा आभासित होता था।

अतिथियों को यह घर अव्यवस्थित लगता था। मेहमान अंधेरे गलियारे में पहुँचते ही जगह और समय के बारे में भूल जाते थे। लोग स्टूडियो से बाथरूम जाना चाहते थे तो बरामदे में पहुँचते थे। बच्चे के कमरे में जाना चाहते थे और ज़ोफ़िया के कमरे में पहुँच जाते थे। रसोईघर से कोठार जाने या तोमष के कमरे से स्तनिसुआवा दादी के कमरे जाने की प्रक्रिया अक्सर घर के सभी सदस्यों को परेशान करती थी। स्टूडियो के दरवाजे को ढूँढने की प्रक्रिया में अचानक एक आलमारी सामने आ जाती थी, जिसमें प्लास्टर की ढेर सारी खोपड़ियाँ होती थीं।

बाथरूम जाने के रास्ते को ज़्जिसुअव ने छोटी-छोटी बल्बों से सजाया था, रात के समय यह सजावट मदद करने की बजाय परेशानी का सबब बन जाती थी। एक बार बेकशिंस्कि ने वनिएक को बताया कि गलियारे में लगे बल्ब उसके सपनों के जटिल मामले का एक हिस्सा है।

घर के लिए नवीनीकरण कोई मतलब नहीं रखता था, जैसे, दीवारों को अंदर और बाहर से रंगना, बरामदे के टूटे हुए रेलिंग को ठीक करना। घर को इसकी परवाह नहीं थी कि लिविंग रूम को स्टूडियो, और बेडरूम को तोड़कर दो नए कमरे बना दिए गए थे, दूर के कमरों में किरायेदार रहते थे। धीरे-धीरे झड़ते प्लास्टर के कारण दीवारें अपनी नंगी होती लकड़ियों को गोचर करती हुयीं घर की अगोचरता को लगभग नष्ट कर रही थीं।

सनोक शहर के इसी घर में बेकशिंस्कि परिवार की पाँच पीढ़ियाँ रहती थीं। सिर्फ सड़क के नाम अलग-अलग थे। गलिसिया (ऑस्ट्रियन-हंगरियन कब्जे के समय) के ज़माने में  सड़क का नाम ‘ल्वोव्सका’ था, दूसरे गणतन्त्र में ‘यागिएलोनियन’ हो गया, इसी तरह जर्मनी के कब्जे के समय इसका नाम ‘एडोल्फ हिटलर मार्ग’ और साम्यवादी ज़माने में ‘श्वियेरचेव्स्कि[v] मार्ग’।

बेकशिंस्कि परिवार का घर अब नहीं है। बीसवीं शताब्दी के सत्तर के दशक के अंत में उसे नष्ट कर दिया गया।

बेकशिंस्कि परिवार भी अब नहीं है। परिवार के अंतिम सदस्य ज़्जिसुअव की 2005 में हत्या कर दी गयी।

12981_10201397147278301_238211796_n

Tatiana Szurlej

अनुवादक तत्याना षुर्लेई ,  एक  Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। हंस, पाखी, पहल, अकार आदि हिंदी-पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University से  ‘The Courtesan Figure in Indian Popular Cinema : Tradition, Stereotype, Manipulation’ विषय पर पीएचडी की हैं। इनसे  tatiana.szurlej@gmail.com पर संपर्क संभव है.

 

[i] Magdalena Grzebałkowska, Beksińscy. Portret podwójny, Wydawnictwo Znak, Kraków 2014

[ii] पोलिश भाषा में लोगों के मूल नाम के अलग-अलग प्रकार हो सकते हैं जिनका इस्तेमाल परिवार या दोस्तों से किया जाता है। इसलिए मूल नाम तोमष (Tomasz) से तोमेक (Tomek) या तोमेचेक (Tomeczek) के प्रकार होते हैं, ज़ोफ़िया (Zofia) से ज़ोशा (Zosia), ज़्जिसउअव (Zdzisław) से ज़्जिसेक (Zdzisek), आदि।

[iii] अनया ओर्तोदोक्स (Anja Orthodox) क्लोस्तेर्केलर (Closterkeller) नाम के पोलिश बैंड की गायिका है।

[iv] दिनुव (Dynów) दक्षिण-पूर्व पोलैंड का छोटा शहर है।

[v] जनरल करोल श्वियेरचेव्स्कि (Karol Świerczewski) रेड आर्मी और पोलिश आर्मी का सैनिक, कम्युनिस्ट कार्यकर्ता।

Single Post Navigation

One thought on “आत्महंता की डायरी और बेकशिंस्कि का घर: मग्दालेना जेबाउकोव्स्का

  1. सुधांशु on said:

    टेक्स्ट और अनुवाद की भाषा बहुत पसंद आयी।पढ़कर और पढ़ने की जिज्ञासा हुई,अगले पोस्ट का इंतज़ार रहेगा

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: