ब्रिटिश पुलिस के सेवार्थ थी, टैगोर की बुद्धिमत्ता: जॉर्ज लूकाच

किसी देश या भाषा की वैचारिक क्षमता और ऊर्जा इस बात पर निर्भर है कि उसमें वैचारिक संवाद-विवाद-विरोध की जनतांत्रिक क्षमता किस हद तक है । हमारे यहां जिस तरह बात-बेबात मामूली सी असहमतियों से मारकाट की नौबत आ जाती है उससे यही सिद्ध होता है कि हम अभी जनतांत्रिक संवाद से बहुत दूर हैं – अधिकांश में तो जूतों से ही सोचते हैं और उन्हीं से संवाद करते हैं । जूते प्रतीकात्मक ही हैं क्योंकि औजारों का अत्याधुनिक इस्तेमाल भी हो ही रहा है । ऐसे में टैगोर जैसे भारतीय आइकन के उपन्यास “घरे-बाइरे” के बहाने उनका विश्व-प्रसिद्ध समीक्षक जॉर्ज लूकाच द्वारा किया मूल्यांकन बहुत प्रासंगिक है । सहमति-असहमति का सवाल नहीं, सवाल बहस के जनतांत्रिक अधिकार का है ।….

बंगाल में यूरोप के उदारपंथ समर्थित तथाकथित नवजागरणवादियों और राधाकांत देव जैसे तथाकथित राष्ट्रवादी प्रतिक्रियावादियों के बीच लंबी बहस और संघर्ष चला था जिसमें अंग्रेजों का पक्ष साफ था। स्वयं टैगोर के पूर्वज इसमें थे। अंग्रेज स्वाधीनता आंदोलन का दमन करते हुए उदारवादियों के खुलकर पक्ष में ऐसे ही नहीं खड़े थे।

नोबल का पूरा प्रसंग इससे जुड़ा है कि कैसे 1912 में टैगोर 100 कविताएँ लेकर लंदन गए जो ट्यूब में खो गईं और बाद में सामान में मिलीं। कैसे फटाफट येट्स ने उनका अनुवाद किया /कराया और जबर्दस्त भूमिका लिखी। कैसे साहित्य और सत्ता सर्कल में प्रचार हुआ और 1913 में नोबल मिला। स्वयं येट्स को भी तब तक यह सम्मान नहीं मिला था। …नोबल के बाद प्रकाशन और पाठकों में क्या क्रांतिकारी बदलाव आता है, यह अलग से बताने की बात नहीं है।
तो यह सब पूर्व-निर्धारित ही था।

1915 में ही घरे-बाइरे बंगला में उसी साल प्रकाशित हुआ जिस साल उन्हें किंग जार्ज पंचम का नाइट बनाया गया। उपन्यास का तुरत-फुरत अनुवाद किया-कराया गया। इसका यूरोप में उन बुद्धिजीवियों ने जमकर स्वागत किया जो भारत के यथार्थ को टैगोर के रोमांटिक नजरिए से देखना चाहते थे या उससे अनजान थे। आज भी बाहर के अधिकांश भारत-प्रेमी भारत को अधकचरे अध्यात्म, योग, जादू-टोनों, वैज्ञानिक चमत्कारों के दिलफरेब किस्सों के माध्यम से समझना-समझाना चाहते हैं।

लेकिन यूरोप के प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों ने अब जाकर सारे संदर्भ को पहचान कर इसकी भर्त्स्ना की।

लूकाच जर्मन बुद्धिजीवियों का इसी संदर्भ में हवाला दे रहे हैं और इसीलिए उनके तेवर इतने उग्र हैं। उन जैसे तमाम लोगों को इस घटनाक्रम और रचनाक्रम पर दुखद आश्चर्य हुआ था।  @अनुवादक-  करण सिंह चौहान 

Tagore with Victoria  (1924)

Tagore with Victoria (1924)

 

टैगोर का गांधी उपन्यास:  “घरे बाइरे” की समीक्षा

By जॉर्ज लूकाच

जर्मनी के “बौद्धिक भद्रलोक” के बीच टैगोर  की बेहद प्रतिष्ठा एक ऐसा सांस्कृतिक कलंक है जो बार-बार और अधिक वेग से घटित हो रहा है । यह इस “बौद्धिक भद्रलोक” के पूर्ण सांस्कृतिक पराभव का प्रमाण है । यह प्रतिष्ठा इस बात का भी संकेत है कि इस वर्ग ने वास्तविक और फर्जी के बीच भेद करने वाली अपनी पुरानी क्षमता पूरी तरह खो दी है ।

जहाँ तक टैगोर का सवाल है, वह एक लेखक और विचारक के रूप में एकदम महत्वहीन व्यक्ति है । उसके पास न तो कोई रचनात्मक क्षमता है, उसके चरित्र भी एकदम इकहरे हैं, उसकी कथाएं सपाट और अनाकर्षक हैं और उसकी संवेदनात्मकता मामूली और निस्सार है । वह अपनी रचनाओं की निस्तेजता और नीरसता को उपनिषदों और भगवद्‍गीता की जूठन को उसमें ठूंसकर प्रासंगिक बने रहने की कोशिश करता है ।  समकालीन जर्मन पाठक का विवेक इतना भोथरा हो चुका है कि वह पाठ और उद्धरण तक में अंतर करने में असमर्थ है । यही कारण है कि भारतीय दर्शन की यह तुच्छ जूठन उसके रचयिता के प्रति हिकारत जगाने की जगह उसे दूरांत से आए गहन और गूढ़ ज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित करती है । जब जर्मनी की शिक्षित जनता ज्ञान के सस्ते विकल्पों को स्वीकार कर रही है, जब वह स्पेंगलर और क्लासिकल दर्शन के बीच, ईवर्स और हॉफमान या पो के बीच फर्क करने में अक्षम हो गई है तो भला वह भारत जैसे सुदूर के देश में वह फर्क कैसे कर सकती    है ? टैगोर भारतीय फ्रेनसन है जिसे वह अपनी विनीत निस्सारता में याद करता है – हालांकि उसकी रचनात्मकता फ्रेनसन से भी नीचले स्तर की है । फिर भी यह कहना होगा कि उसकी महान सफलता आज की जर्मन मानसिकता के लक्षण को समझने में सहायक अवश्य हो सकती है ।

टैगोर की इस तीखी अस्वीकृति के जवाब में उसकी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति ( जो केवल ब्रिटेन तक सीमित है) का हवाला दिया जा सकता है । अंग्रेज बूर्जुआजी के पास टैगोर को धन और प्रसिद्धि (नोबल पुरस्कार) देने के अपने कारण हैं – वह भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में अपने बौद्धिक कारिंदे को इनाम बख्श रहे हैं । ब्रिटेन के लिए प्राचीन भारत के  ज्ञान की जूठन, संपूर्ण समर्पण का सिद्धांत और हिंसा की भर्त्सना (वह भी स्वाधीनता आंदोलन के संदर्भ में ) का ठोस और स्पष्ट अर्थ है । जितना अधिक टैगोर की प्रसिद्धि होगी उतना ही कारगर तरीके से उसके देश के स्वाधीनता आंदोलन के विरोध में उसकी प्रचार पुस्तिकाओं का असरदार इस्तेमाल   होगा ।

टैगोर का यह उपन्यास कोई रचना नहीं प्रचार पुस्तिका ही है जिसमें निंदा के बहुत ही फूहड़ साधनों का उपयोग किया गया है । जितना ही टैगोर इस निंदा को  घिनौनी “बुद्धिमत्ता” से ढक प्रस्तुत करता है , एक पूर्वाग्रह-मुक्त पाठक के लिए वह और भी घॄणास्पद प्रतीत होता है । टैगोर भारतीय स्वाधीनता संग्राम के प्रति अपनी नपुंसक घृणा को “विश्वमानवतावाद” के दर्शन में छुपाकर पेश करता है ।

उपन्यास का बौद्धिक टकराव हिंसा के सवाल से जुड़ा है । लेखक राष्ट्रीय आंदोलन की शुरूआत का चित्रण करता है – ब्रिटिश उत्पादों का बहिष्कार, उन्हें भारतीय बाजार से खदेड़ने और उनकी जगह भारतीय वस्तुओं को लाने के प्रयास । और टैगोर महाशय असली मुद्दे पर आ जाते हैं – क्या इस आंदोलन में हिंसा का प्रयोग नैतिक रूप से जायज है ? वास्तविकता यह है कि भारत एक शोषित और गुलाम देश है । लेकिन टैगोर की इस सवाल में कोई दिलचस्पी नहीं है । वह आखीरकार एक दार्शनिक, एक नैतिकतावादी है जिसका सरोकार “नैतिक सत्य” हैं । यानी ब्रिटिश को अपनी तरह से होश में आने दो क्योंकि उनके द्वारा की गई हिंसा उनकी आत्मा को बेचैन कर देगी । टैगोर का काम भारतीयों को आध्यात्मिक रूप से बचाना है, उनकी आत्माओं को हिंसा के खतरों आदि से बचाना है । वह लिखता है –“ जो सत्य के लिए मरता है वही अमर होता है, और अगर सारे लोग भी सत्य के लिए मारे जाएं तो मानवता के इतिहास में अमर हो जाएंगे ।“

यह और कुछ नहीं भारत की अनंतकाल  तक गुलामी का मार्ग है । इससे भी अधिक बेशर्मी से टैगोर का यह दृष्टिकोण उन तरीकों में व्यक्त होता है जिसमें वह अपने पात्रों को गढ़ता है । जिस आंदोलन को वह दिखाता है वह बौद्धिकों के लिए एक रोमांटिक आंदोलन है । बिना इस तुलना को हद से आगे ले जाए हुए हमें भिन्न परिस्थितियों में पैदा हुए इटली के कार्बोनारी आंदोलन और रूस के नरोदनिकों की याद दिलाता है । रोमांटिक स्वप्नदर्शिता, विचारधारात्मक बड़बोलापन और जिहादी भाव इनकी खूबी थी । लेकिन यह टैगोर की असत्य प्रचार पुस्तिका का प्रारंभ-बिंदु है । वह इन साहसी रोमांटिकों, पवित्र आदर्शवाद और बलिदान की भावना से प्रेरित आंदोलनकारियों को मात्र दुस्साहसिकों और अपराधियों में बदल देता है । उसका नायक, जो एक मामूली भारतीय भद्रलोक से है इस सिद्धांत को प्रतिपादित करता है  जब वह इन “देशभक्त” अपराधी गिरोहों की अतिशय ज्यादतियों से अंदर-बाहर से नष्ट हो जाता है । वह स्वयं भी इन “देशभक्तों” की हैवानियत से शुरू हुई लड़ाई में मारा जाता है । टैगोर के अनुसार वह राष्ट्रीय आंदोलन का विरोधी नहीं था बल्कि वह तो देश के उद्योग को बढ़ावा देना चाहता था । वह देशी आविष्कारों के प्रयोग करता रहता है । वह देशभक्तों के नेता ( जो गांधी का विरूप प्रतीत होता है ) को शरण देता है । लेकिन जब ये मामले उसकी बर्दाश्त से बाहर चले जाते हैं  तो वह “देशभक्तों” की हिंसा के शिकार लोगों के पक्ष में हो जाता है और इसके लिए अपने साधनों और ब्रिटिश पुलिस की शक्ति का इस्तेमाल करता है ।

यह प्रचारात्मक, खोखली लफ्फाजी भरा पूर्वाग्रहयुक्त लेखन उपन्यास को कलात्मक दृष्टि से भी दरिद्र बनाता है । उपन्यास में नायक का विरोधी कोई वास्तविक विरोधी नहीं है बल्कि घटिया किस्म का दुस्साहसिक है । उदाहरण के लिए वह राष्ट्रीय हित के बहाने नायक की पत्नी से बड़ी धनराशि ऐंठ लेता है और उसे चोरी करने पर भी मजबूर कर देता है, लेकिन उस पैसे को राष्ट्रीय आंदोलन को न देकर अपने भोग-विलास में बर्बाद करता है । यह स्वाभाविक है कि ऐसे आदमी की असलियत को देखकर उसके अनुयायी उससे अलग हो जाते हैं ।

लेकिन टैगोर की रचनात्मक क्षमता एक ढंग की प्रचार-पुस्तिका भी तैयार नहीं कर सकी । उसके पास बातों को विश्वसनीय और प्रभावशाली बनाने की कल्पनाशक्ति तक नहीं है जैसी कि उदाहरण के लिए एक हद तक दास्तोवस्की के पास थी कि उसने अपने प्रतिक्रांतिकारी उपन्यास “पॉजैस्ड” को भी पठनीय बना दिया । टैगोर की कहानी के “आध्यात्मिक” पक्ष को यदि भारतीय ज्ञान के अधकचरे टुकड़ों से अलगा दिया जाय तो वह एक बेहद अनगढ़ पैटी बुर्जुआ गूदड़ बनेगा । अंततः मामला “घर के स्वामी” की प्रतिष्ठा की “समस्या” पर आ टिकता है – कि कैसे एक “अच्छे और ईमानदार” आदमी की पत्नी को एक रोमांटिक दुस्साहसी ने बहका लिया और कि कैसे वह असलियत समझ पश्चाताप में अपने पति से आन मिली ।

यह छोटी सी बानगी “महान आदमी” की छवि बनाने के लिए काफी है जिसे जर्मन बुद्धिजीवियों ने भगवान ही बना दिया । इस तरह की ध्वंसात्मक आलोचना के विरुद्ध उसके भक्तगण उसके “अधिक व्यापक” अन्य लेखन का उल्लेख करेंगे । हमारी दृष्टि में, किसी बौद्धिक प्रवृत्ति का महत्व इस बात से तय होता है कि वह अपने समकालीन ज्वलंत सवालों पर क्या रवैय्या अपनाती है । किसी भी सिद्धांत या दृष्टिकोण की मूल्यवत्ता या निस्सारता ( और उसे अपनाने वाले लोगों की भी) इस बात से तय होती है कि वह अपने जमाने के लोगों के दुख-तकलीफों और आशा-आकांक्षाओं के बारे में क्या कहते हैं । कोरे हवाई सिद्धांत के आधार पर “स्वयं में” ज्ञान का निर्णय नहीं हो सकता ( न हाथीदांत की मीनारों में) । जब वह मनुष्य को राह दिखाने का दावा करता है तो असलियत उजागर हो जाती है । टैगोर महोदय अपने उपन्यास में यही करते दिखाई पड़ते हैं । जैसा कि हम पहले कह आए हैं, उसकी तमाम “बुद्धिमत्ता” ब्रिटिश पुलिस की सेवार्थ लगी है । इसलिए, क्या यह जरूरी है कि हम इस “बुद्धिमत्ता” के अवशिष्ट पर अधिक ध्यान दें ?

स्रोतः  *  जॉर्ज लूकाच के निबंध और समीक्षाएं, मर्लिन प्रैस, लंदन, १९८३

** बर्लिन की पत्रिका “ Die rote Fahne” में १९२२ में पहली बार छपी ।

*** अंग्रेजी में हसन और हिन्दी में करण सिंह चौहान (http://straythoughts-karan.blogspot.com/) द्वारा  अनूदित।

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