1850-51 के फ्रांस में हिंदुस्तानी की कक्षाएं:गार्सां द तासी

गार्सां द तासी हिंदी-उर्दू में परिचय के मोहताज नहीं हैं. वे हिंदी साहित्य के पहले इतिहासकार के रूप में जाने जाते हैं. इसके अलावा उनके बारे हम बहुत कुछ नहीं जानते हैं. उनके अधिकांश लेख हिंदी और इंग्लिश में अनुदित नहीं हुए हैं. बावजूद इसके उनके सैकड़ों लेख मूल फ़्रांसिसी में उपलब्ध हैं. गार्सां द तासी के  हिंदुस्तान -संदर्भित भाषणों की कड़ी  में से  1857 के  विद्रोह  से संबंधित  एक  भाषण हम पहले भी छाप चुके हैं, इस बार प्रस्तुत  है हिंदुस्तानी  भाषा-साहित्य  के अध्ययन -अध्यापन से  सम्बंधित उनके दो  भाषण . इसके अनुवादक  हैं  किशोर  गौरव .   

औपनिवेशिक हिन्दुस्तानी बौद्धिक-परिवेश के निर्माण पर मैकाले की शिक्षा-नीतियों के प्रभाव के ‘दोष’ मढ़ने वालों के लिए गार्सां द तासी द्वारा उपलब्ध कराये डिटेल्स सिरदर्द का कारण बन सकता है. इधर के भारत-विद्यों ने इस बात को प्रमुखता से रेखांकित करना शुरू कर दिया है कि अंग्रेजों के आने कारण हिन्दुस्तानी बौद्धिक अभ्यास का नैरन्तर्य बाधित ही हुआ. सत्रहंवी शताब्दी के उतर्रार्ध में, बनारस के एक संस्कृत-फ़ारसी विद्वान से प्रसिद्ध फ़्रांसिसी दार्शनिक और चिकित्सक फ्रांस्वा बर्नियर की मुलाकात होती है. बर्नियर उस बनारसी पंडित से संस्कृत के ग्रन्थ फ़ारसी में अनुवाद करवाता है और इसके बदले वह पंडित के लिए देकार्त जैसे दार्शनिकों की रचनाओं का फ्रेंच से फारसी में अनुवाद करता है, जबकि उस समय तक देकार्त के अंग्रेजी अनुवाद भी बमुश्किल मिलते होंगे और खुद देकार्त के मरे मात्र दस साल हुए थे. कहने का तात्पर्य यह कि अंग्रेजों के आने पहले कि जो यह बौद्धिक गतिविधि थी, वह छीजते-छीजते जाने के बावजूद गार्सा द तासी तक उसके वजूद देखने को मिल जाते हैं.

उम्मीद है कि किशोर गौरव, जो कि फ़्रांसिसी अध्ययन केंद्र जेएनयू, नई दिल्ली में पीएचडी के शोध छात्र हैं, आगे भी इसी तरह के अनुवाद उपलब्ध करवाते रहेंगे. तिरछीस्पेल्लिंग उनका आभारी है.

अनुवाद – किशोर गौरव

 By गार्सां द तासी

हिन्दुस्तानी की कक्षा का प्रारम्भिक व्याख्यान

पहला व्याख्यान, ३ दिसंबर १८५०

महोदय,

हमारे सामने मौजूद टेक्स्ट की व्याख्या करने से पहले मैं हिन्दुस्तानी की व्यावहारिक उपयोगिता और इसके मौजूदा साहित्यिक आकर्षणों के बारे में कुछ शब्द कहना चाहूँगा.

इस बात से लोग पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं कि हिन्दुस्तानी भारत के सभी प्रान्तों में बोली जाती है – या तो अन्य प्रांतीय ज़बानों के साथ-साथ: जैसे की बंगाल में और मद्रास और बम्बई प्रेसिडेंसी में, या फिर किसी भी अन्य ज़बान के बिना, जैसे की हिन्दुस्तान के उत्तर पश्चिम के प्रान्तों में: बहार (शायद यहाँ इशारा बिहार की तरफ है, हांलाकि भौगौलिक स्तिथि के हिसाब से यह गलत होगा : अनुवादक), इलाहबाद, मालवा, अवध, अजमेर, आगरा, दिल्ली – जिनमे लाहौर और नेपाल को भी जोड़ देना चाहिए, जिस निष्कर्ष पर हम हाल में पेरिस मे पहुंचे हैं. अतः इन प्रदेशों में रहने के लिए और यहाँ तक की उनकी यात्रा करने के लिए भी, जो की हम वर्तमान में काफी सुविधा से और बिना पासपोर्ट की आवश्यकता के कर सकते हैं, मैं यह कहता हूँ की हिन्दुस्तानी जानने की ज़रुरत है. इसीलिए माननीय ईस्ट इण्डिया कंपनी अपने नागरिक और सैनिक सेवाओं मे सिर्फ उन व्यक्तियों को लेती है जो यह भाषा सीख चुके हैं और जिन्होंने इसकी परीक्षा संतोषप्रद तरीके से पास कर ली है.

मगर यह मान लेना गलत होगा कि मात्र अंग्रेज़ ही हिंदुस्तान में रोज़गार पा सकतें हैं. कई अन्य योरोपीय वहाँ सम्मानजनक पदों पर हैं. इसके अलावा अगर हमें हिन्दुस्तानी का ज्ञान हो तो हम वहां आसानी से स्वतंत्र कार्य पा सकतें हैं. व्यापार, जो कि कई योरोपियों के लिए सम्पन्नता का स्रोत है, की बात न भी करें तो वहाँ चिकित्सा में काम किया जा सकता है, चित्रकला में सफलतापूर्वक हाथ आज़माया जा सकता हैं, और सबसे बेहतर, अगर भारतीय, मुस्लिम और अंग्रेज़ी कानूनों की जानकारी के अलावा हमारे पास हिन्दुस्तानी में ज़िरह करने की काबिलियत है तो वकालत के पेशे में सफलता पाया जा सकता है.

एक पादरी बेगम समरू द्वारा सिरधना में बनाये गए खूबसूरत गिरिजाघर में, आगरा और अन्य जगहों के धर्मप्रदेश (Diocese) के कैथोलिक चैपल में हिन्दुस्तानी में भी प्रवचन दे सकता है. यहाँ तक की कलकत्ते में, अंग्रेज़ी चर्च में मतान्तरित भारतीयों के लिए, ‘हिन्दुस्तानी गिरिजाघर’ नामक एक गिरिजा है जिसमे धार्मिक कार्यवाही केवल हिन्दुस्तानी में ही होती है.

यह बात आम जानकारी में नहीं है कि भारतीयों के पास वहाँ के मुख्य शहरों में लिथोग्रफिक छापाखाने हैं और वे वहाँ प्रतिदिन हिन्दुस्तानी रचनाएँ, मौलिक या अनूदित, प्रकाशित करते रहते हैं. अगर हम सिर्फ उत्तर-पश्चिम के प्रान्तों, जिनका हम ज़िक्र कर चुकें हैं, की बात करें तो वहाँ इस साल की पहली जनवरी तक २३ छापखानें मौजूद थें, जहां, केवल १८४९ में ही १४१ विभिन्न रचनाएं प्रकाशित हुई थी. इसी काल में २६ अलग-अलग अखबार प्रकाशित हो रहे थे, जिसमे से २३ हिन्दुस्तानी में, २ फ़ारसी में और एक बांग्ला में थे. अगर हम इन अखबारों में उन अन्य को भी जोड़ दें जो भारत के अन्य प्रान्तों में प्रकाशित होते हैं तो हमें आसानी से कम से कम ५० भिन्न हिन्दुस्तानी अखबारों कि संख्या मिलेगी जो वर्तमान में प्रकाशित हो रहे हैं.

हिन्दुस्तानी ज़ाहिर तौर पर तरक्की कर रही है. इसकी वजह यह है कि पहले की तरह, मात्र आम भाषा व लोकप्रिय काव्य की भाषा होने के बजाये, साथ-साथ, हिन्दुस्तानी शासन की अधिकृत भाषा, राजनयिक पत्रव्यवहार की भाषा, कचहरी और प्रशासन की भाषा भी बन गयी है, जैसा की पहले फ़ारसी हुआ करती थी. यहाँ तक की हिन्दुस्तानी में वैज्ञानिक निबंध भी लिखे जाने लगे हैं, जो की पिछले कुछ सालों तक फ़ारसी में लिखे जाते थे. हिन्दुस्तानी के समकालीन साहित्य की महत्ता को कम कर के नहीं आँका जा सकता और इसके अपने आकर्षण हैं जिससे पूर्व के साहित्यों में उसकी अपनी विशिष्ट जगह है. उदाहरण के लिए हम भारत के उत्तर के पहाड़ों में स्थित शिमला के हिन्दुस्तानी अखबार की सदस्यता ले सकते हैं और पेरिस में डाक के जरिये नियमित तौर पर प्राप्त कर सकते हैं.

हम दिल्ली के एक साहित्यिक सभा के कार्य विवरण (minutes) प्राप्त कर सकते हैं और भारत की पुरानी राजधानी में चल रही अकादमिक गतिविधियों का मासिक ब्योरा ले सकते हैं.

हाल फिलहाल में प्रकाशित होने वाले हिन्दुस्तानी रचनाओं में, काफी सारे विज्ञान की हैं, कुछ कला, कुछ भूगोल, कुछ विधि इत्यादि से सम्बंधित हैं- कुछ मौलिक और कुछ अंग्रेज़ी से अनूदित; कुछ अध्यात्मिक और कुछ विवादित रचनाएँ हैं, जिसमे से एक आगरा से छपा कैथोलिक धार्मिक-पत्र है; कुछ प्राचीन और आधुनिक इतिहास हैं; कुछ धार्मिक और नैतिक रचनाओं के अनुवाद हैं, जैसे कि बुन्यान (Bunyan) की ‘पिल्ग्रिम्स प्रोग्रेस’ (Pilgrim’s Progress), और मेसन (Mason) की ‘सेल्फ नॉलेज’ (Self Knowledge); कुछ उपन्यास, जैसे की ‘रसेलास’ (Rasselas) और ‘कुज़िल बाश’ (Kuzzil Bash) और कुछ काव्य भी, जैसे की गे (Gay) की नीतिकथाएं.

यह ज्ञात है की संस्कृत से बहुत से अनुवाद हिन्दुस्तानी मे उपलब्ध हैं; हालांकि हाल-फिलहाल में उनका प्रकाशन नही हो पाया है; लेकिन अरबी और फ़ारसी से बड़ी संख्या में अनुवादों का प्रकाशन हुआ है जिनमे मुझे कुरआन की हिन्दुस्तानी में टीकासहित अनुवादों की बड़ी संख्या का ज़िक्र करना होगा; एक अरबी शब्दकोष जिसकी  व्याख्याएं हिन्दुस्तानी में हैं; अरबी और फारसी व्याकरण, गुलिस्तान के कई अनुवाद, अलिफ़ लैला (Mille et Une Nuits/ Thousand and One Nights), अखलाक़-ए-जलादी, अखलाक़-ए-मुहचिनी, शाहनामा का संक्षिप्त संस्करण, इब्न खल्लिकां (Ibn Khallican) का जीवनी-शब्दकोष, अबुल्फेदा – बोरदा, आदि.

अंत में, जहाँ तक बात है वास्तव में मौलिक रचनाओं की, मैं ज़िक्र करना चाहूँगा प्रचलित दंतकथाओं – जैसे शकुंतला, लैला और मजनू, इब्राहिम अधम, कला-ओ-कामरूप, हुस्न-ओ-इश्क – पर आधारित कई सुन्दर कविताओं का; यात्रा-वृत्तान्त, इतिहास – जैसे की टीपू के पिता हैदर अली का, जिसे मैसूर के राजा के एक पुत्र ने लिखा है; अनेक गद्यात्मक कथा-कहानियाँ; अंग्रेज़ी भाषा की कोषरचना (Lexicography) और व्याकरण पर हिन्दुस्तानी में कई उपयोगी रचनाएं; अंततः प्रचलित कवियों की रचनाएँ: मोमिन, नासिर, जौक, नासिख और अताश – वे लेखक जिनका समकालीन हिन्दुस्तानी साहित्य पर इस वक़्त काफी प्रभाव है.

     दूसरा व्याख्यान, ४ दिसंबर, १८५१

महोदय,

इस शैक्षिक वर्ष की कक्षा के शुरुआत में अपने नए और पुराने श्रोताओं के बीच खुद को पा कर मैं प्रसन्न महसूस कर रहा हूँ. हिन्दुस्तानी भाषा सीखने का आपका निर्णय उचित है. विश्व में सबसे अधिक व्यापक भाषाओं में से एक – चूँकि हमारे हिसाब से ८ करोड़ से अधिक लोगों द्वारा यह बोली जाती है – यह भाषा राजनैतिक और व्यावसायिक रूप से काफी आकर्षक है; लेकिन साथ ही साथ इसका एक वास्तविक साहित्यिक आकर्षण है, और मुख्यतः इसी नज़रिए से यूरोपीय महाद्वीप में इसका अध्ययन उपयोगी है. इसकी हिन्दू शाखा एक किस्म की सरलीकृत संस्कृत है, कुछ-कुछ जैसे की आधुनिक ग्रीक प्राचीन ग्रीक से और जैसे इतालवी लातिन से सम्बद्ध है. इसकी जानकारी इसलिए एक भारतविद के लिए बहुत काम की है क्योंकि यह अपने आधुनिक रूपों में कभी तो अपने प्राचीन रूपों से विसंगति में है और कभी तो उन्ही का विकसित रूप है. इसकी मुस्लिम शाखा उनके लिए काफी काम की है जिनका वास्ता फ़ारसी से हैं. फ़ारसी और हिन्दुस्तानी का एक ही स्रोत है; लेकिन हिन्दुस्तानी की शब्दावली अधिक सरल है. विश्लेषण करने में, हिन्दुस्तानी पद रचना को लम्बे फ़ारसी पीरियडस (Périodes/Period Sentences: अनु.) पर लागू करके उनका मतलब ज्यादा आसानी से समझा जा सकता है. आप स्वयं ही इन कथनों के कायल हो जायेंगे, चूँकि आप इन सुन्दर भाषाओं से सम्बद्ध हैं: संस्कृत, यूरोप की हमारी सभी भाषाओं की स्रोत और जिसे हम अब यहूदी (Semitic) भाषाओं से भी जोड़ के देख रहे हैं, क्योंकि हमें पता है की ‘Trilitère’ roots की अरबी व्यवस्था गलत है और इनमे से roots की एक बड़ी संख्या वास्तव में monosyllabic (एकाक्षरीय) है जिससे उनका निर्माण संस्कृत में शामिल हो जाता है और  कुछ अरबी और संस्कृत roots की एकरूपता दिखाता है; फ़ारसी, जो कि ऐतिहासिक रचनाओं में समृद्ध है और मुस्लिम थेओसोफों ( Théosophes : ब्रह्मविद्या/ अध्यात्मविद्या से सम्बंधित: अनु.) के अध्यात्म से पुष्ट एक ख़ास साहित्य जिसकी विशिष्टता है.

हिन्दुस्तानी की यह दो शाखाएं : हिन्दू शाखा और मुस्लिम शाखा, एक समृद्ध और भिन्न्तापूर्ण साहित्य प्रस्तुत करती हैं. साथ ही, हिन्दुई में संस्कृत की श्रेष्ठ कृतियों के अनुवाद, या कम से कम नक़ल, उपलब्ध हैं, जबकि उर्दू और दक्खनी में फ़ारसी साहित्य की श्रेष्ठ रचनाओं के पुनरुत्पादन मौजूद हैं.

इस शैक्षिक वर्ष में इन विभिन्न स्कूलों से सम्बद्ध साहित्यिक कृतियों की व्याख्या करने का मुझे अवसर प्राप्त होगा. संस्कृत स्कूल में हम शकुंतला की आकर्षक कहानी, जो की यूरोप में लगभग लोकप्रिय है, और उषा की कहानी, जो कि कम प्रचलित है लेकिन आकर्षण में कमतर नही, पढ़ पाएँगे.

फ़ारसी स्कूल हमें उपलब्ध कराएगा वली, भारत का हफीज, जिसके ग़ज़ल हालांकि थोड़े आडम्बरयुक्त हैं लेकिन वास्तव में फ़ारसी गीतों के सामान सुन्दर हैं. गद्य में हम शेर शाह के इतिहास का एक खंड पढ़ेंगे, जिसमे, अन्य चीज़ों के अलावा हम भारत के पुराने मुस्लिम शासकों के प्रशासन पर अद्भुत जानकारी पाएंगे.

विशुद्ध भारतीय स्कूल में, हिन्दुई, हिंदी और हिन्दुस्तानी, आपको समझाने के लिए मैं “मीर-ओ-माह” नामक कल्पित कथा चुनूंगा, जहां आप ज्ञानप्रद एथ्नोग्रफिक (मानवजाति-विज्ञान संबंधी) विवरण अद्भुत मौलिकता वाले उपमाओं (metaphors) के जरिये पाएंगे. उदहारण के लिए यह रहा एक विवाह का विवरण जो हम इस कथा में पाते हैं:

“विवाह की तैयारियां तुरंत समाप्त कर दी गयीं. जल्दी ही सभी काम निपटा लिए गए. जलसा अविलम्ब शुरू हो गया और संगीत ने इसका एलान कर दिया. सचमुच, दूर से वाद्य यंत्रों की आवाज़ सुनाई दी: आकाश में जैसे वो मिल गया हो. हर्षोल्लास का माहौल था; हर तरफ से हंसी की गूँज संगीत से एकाकार हो गयी. उल्लास का वृक्ष फलित हुआ; वसंत का गुलाब खिल उठा. हिना का पौधा बुरी आत्माओं और बुरे प्रभावों को भगाने के लिए जलाया गया और उसका धुंआ आकाश तक उठा. हृदयों को पुलकित करने वाले उस आनंद में पूरी प्रकृति हिस्सा ले रही थी. पौधों में कलियाँ नहीं फूल खिले हुए थे. मधुरतम संगीत सुनाई पड़ता था. बांसुरी, वीणा, खंजरी  की आवाज़ मजीरों के साथ सुनाई पड़ती थी. यह माहौल इंसान और आत्माओं को मदहोश कर गिरा दे सकता था. नृत्य का आनंद लेने के लिए नर्तकियों को भी बुलाया गया था. सनौवर के वृक्ष की उंचाई वाली ये महिलाएं मनोहारी सुन्दरता के साथ अपने कदम चला रही थी और काफी सराहनीय फुर्ती से घूम रही थी. साथ साथ वह सरसरी निगाह फेकती थी जो बिजली चमकने सी प्रभावी थी.

“इसी समय मीर अपनी मंगेतर तक जाने के लिए अपने घोड़े पर चढ़ा; उसका घोड़ा भागते हुए इतना शोर करता था जैसे यह क़यामत के दिन का शोर हो. वह घोड़ा अपनी गति में सुबह की हवा की बराबरी करता था. राजकुमार अपने युवा मित्रों से घिरा था जो की उसका मंडली के सदस्य थे. किसि को उनके स्वर्ग के साक़ी होने का गुमान भी हो सकता था. शाम में सभी, सोने-जड़े कपड़ों से सजे, जलसे के लिए तैयार थे. अनेकों मशालें अँधेरे को दूर कर रहीं थी और दरवाज़े तथा दीवारें दर्पणों की तरह उनकी चमक को प्रतिबिंबित कर रहे थें. ये मशालें अनार के फूलों कि, या यूँ कहना बेहतर होगा, चमकते हुए तारों कि तरह दिखते थे. रात को दिन में बदल देने वाली आतिशबाजी जलाई गयी; योरोपियों की तरह कागज़ के फूल हवा में लहरा दिए गए जो हर तरफ बिखर गए.

“जब रात का पहला पहर गुज़र गया, माह शिरीन के जैसी एक घोड़े की पीठ पर बैठी. एक नक़ाब के पीछे वो अपना चेहरा छुपाती थी, जैसे पानी की सतह के नीचे चाँद अपनी किरणें छुपाता है. और शहजादा अपनी मंगेतर के घर की तरफ, रास्ते पर सोने बिखेरता बढ़ रहा था. ढोल की आवाज़ सुनाई दी और बिजली खुद ही कडकने लगी, जबकि बिगुल को बेधती हुई ध्वनि फरिश्तों और हूरों के कानों तक पहुंच गयी. अंततः दोनों बारातें जब मिलें  तो माह के महल तक पहुंचे और प्रविष्ट हुए. वहाँ लाजवाब दावत तैयार थी: फिर से नाच शुरू हुए; शराब हाथों-हाथ चल रही थी: ऐस लगता था जैसे आप योरोप के किसी शहर में हो. प्याले में चमकते शराब की रौशनी से सूरज को जलन होती थी. सूर्योदय तक जलसा जारी रहा. जब रात की जगह सुबह का उदय हुआ तब प्रतिज्ञा  और अन्य संस्कार हुए. दुल्हन ने पीले और लाल रंग का नया कपडा पहना. अपने कानो के ऊपर और नीचे के हिस्से पर उसने बालियाँ और झुमके पहन रखे थे, और उसकी नाक पर एक सुन्दर बाली थी. अपने गले में उसने एक मोतियों की माला डाली जो आकाशगंगा के सामान दिखती थी और अपने हाथों में धातु के गहने डाले  जिनका वर्णन नही किया जा सकता, उसकी कलाइओं में कीमती पत्थर के कंगन थे जिनकी चमक दूर-दूर तक आलोकित होती थी, उसके पैरों में खनकते हुए पायल थे. वह पान चबाती थी जो उसके होठों को और सुर्ख कर देता था. कोई दुल्हन इतनी सुन्दर कभी न दिखी होगी. वो चिराग थी और उसके साथी और सहचर उसे रौशनी  की तरह घेरे हुए थे.”

अंत में हम “कलयुग” यानि की अन्धकार-युग – जैसे ग्रीक माइथोलॉजी का लौह युग – का एक काव्यात्मक वर्णन पढेंग; वह वर्णन जो कुछ-कुछ Dryden द्वारा इसी विषय पर लिखी इन पंक्तियों के सामान है:

Mankind is broken loose moral bands;

Nor rights of hospitality remain;

The guest, by him who harbour’d him, is slain:

The son-in-law pursues the father’s life.

The wife the husband murders; he, the wife.

इनमे से कई रचनाएं पद्य में हैं. मगर महोदय, आप यह मत मान बैठिएगा की इस वजह से यह गद्य रचनाओं से बहुत ज्यादा कठिन हैं. अगर पद्य में रचना के सामान्य नियम नहीं माने जाते, अगर हम वहां असामान्य उलट फेर पाते हैं और गद्य से ज्यादा बढ़ा चढ़ा कर पेश किये गए अलंकर पातें हैं, तो भी हमें कमस्कम यह जानने का लाभ होता है की अर्थ (sens) कहाँ ख़त्म होता है क्योंकि enjambements (पद्य की एक पंक्ति से दूसरी पंक्ति तक जारी रहने वाला शब्द या शब्द-समूह:अनु.) वहां स्वीकृत नही होते. सामान्यतः पद्य-पंक्ति के साथ अर्थ (sens) भी खत्म हो जाता है, और, हर हाल में यह दो या तीन पंक्तियों के आगे नही फैला होता.

हिन्दुस्तानी में हम दो लिखावट का इस्तेमाल करते हैं: फ़ारसी लिखावट मुस्लमान-हिन्दुस्तानी के लिए और देवनागरी हिन्दू-हिन्दुस्तानी के लिए, ऐसे ही हम मीटर (Métrique) के लिए दो रीतियों का प्रयोग करते हैं. हिन्दुस्तानी-उर्दू और दक्खनी के लिए हम अरबी मीटर इस्तेमाल करते हैं, सिर्फ उन परिवर्तनों के साथ जो भाषांतर की वज़ह से करने पड़ते हैं; और हिंदी तथा हिन्दुई के लिए संस्कृत का सरलीकृत तरीका प्रयोग करते हैं.

महोदय, जैसा की आप जानते हैं, अरबी लोग पद्य-पंक्ति को एक तम्बू की तरह देखते हैं, और वे उसे इसलिए ‘बैत’ नाम से बुलाते हैं, जिसका अर्थ तम्बू होता है, जिसका आशय है ‘घर’. तम्बू के ‘मिसरा’ नामक दो दरवाज़े होते हैं: यह दो दरवाज़े पद्य-पंक्तियों के दो hemistiches (एक पद्य-पंक्ति का आधा भाग:अनु.) होते हैं, उनको भी मिसरा ही कहते हैं. तम्बू खूंटे (‘rukn’) के द्वारा समर्थित होता है: यह पद्य-पंक्ति के अलग ‘पैर’ (pieds) होते हैं, जिसमे दस प्राथमिक (primitives) और बहत्तर सहायक (secondaires) होते हैं. तम्बू का अंदरूनी हिस्सा विभाजन (फासिला) के द्वारा अलग किया जाता है, और यह मेख (वतद) के द्वारा जोड़ा जाता है, और रस्सी (सबब) के द्वारा. ये वो नाम है जो ‘पैर’ pied के छः बड़े और छोटे उपविभाजनों को दिए जाते हैं.

प्राथमिक और सहायक ‘पैर’ के संयोग से असंख्य मीटर बन जाते है; मगर मुश्किल से २० हैं जो उर्दू और दक्खनी में इस्तेमाल होते हैं. गद्य पंक्तियाँ हमेशा तुकांत में होती हैं. अगर वे hemistiche से तुक में होती हैं, तो हर गद्य-पंक्ति पर तुक बदल जाता है; अगर तुक सिर्फ गद्य-पंक्ति को समाप्त करता है तो यह पूरी कविता के लिए समान ही होता है.

हिन्दू प्रणाली काफी अधिक सरल है. हम वहां सिर्फ सिलेबल (syllabes/syllables) पर ध्यान देते हैं, अंग्रेज़ी की तरह बिना दीर्घता और लघुता का ख्याल किये हुए; और इस भाषा में रिदम की वजह से कई सिलेबल्स को   समेटकर एक कर दिया जाता है और कभी-कभी इसका उल्टा भी करना पड़ता है. इस सिलेबिक ‘पैर’ को ‘मात्रा’ कहते हैं, संस्कृत की तरह.

हिन्दू बोली में, जैसे की मुस्लमान बोली में, गद्य-पंक्तियाँ तुकबंद होती हैं, और, साथ ही, hemistiches हमेशा साथ-साथ तुक में होते हैं. ‘चौपाई’, जो की हिन्दुई में सबसे अधिक इस्तेमाल होनी वाली कविता है, संस्कृत के ‘श्लोक’ के समान है; इसके हर hemistiche में आठ सिलेबल्स होतें हैं. जहाँ तक ‘दोहा’ की बात है, जो अरबी के अलग हुए ‘फर्द’ या ‘बैत’ के सामान है, इसमें १२ या १४ सिलेबल हर hemistiche में होते हैं.

महोदय, जो पद्य हम पढेंगे उनका माप बताने के लिए और जो नियम हमने अभी पढ़े हैं उसी हिसाब से उनका पाठ करने का मैं ख्याल रखूँगा,.

जो भाषा हम पढ़ रहे हैं वो मुख्यतः एक जीवित भाषा है; चूँकि इस वक़्त जब हम पेरिस में वो रचनायें पढ़ रहें है जिनके बारे में मैंने अभी ज़िक्र किया है, तभी भारत में ऐसे सैकड़ों प्रकाशित हो जायेंगे. वास्तव में हिंदुस्तान में जो पम्फलेट, किताबें और पत्र-पत्रिकाएँ छपती हैं उनकी संख्या का अनुमान योरोप में हम नहीं लगा सकते.

पिछले साल मैं आपको बता रहा था की उत्तर पश्चिम के प्रान्तों में, जहाँ भारत की अँगरेज़ सरकार एक बड़ी प्रेसिडेंसी बनाने वाली है, जिसकी राजधानी लाहौर है, और जिसकी एकमात्र भाषा हिन्दुस्तानी है, वहाँ, जनवरी १८५० में भारतीय रचनाएँ प्रकाशित करने वाली २३ लिथोग्रफिक छापाखाने हैं. पिछले वर्ष के दौरान लाहौर में एक नया छापाखाना स्थापित हुआ है जिससे इस साल के 1 जनवरी तक इनकी संख्या २४ तक पहुँच गयी है, जो की निम्न हैं: आगरा में ७, दिल्ली में ५, मेरठ में २, लाहौर में २, बनारस में ४, बरेली में एक, कानपुर में 1, शिमला में 1 और इंदौर में 1. लेकिन भारत का यही एकमात्र हिस्सा नहीं जहाँ हिन्दुस्तानी किताबें और अखबारें छपती हैं. इसी किस्म के अन्य छापाखाने ना सिर्फ वर्तमान के तीन प्रेसिडेनसियों के मुख्य शहरों बल्कि कई अन्य शहरों में भी हैं; और सिर्फ लखनऊ में ही १३ छापाखाने कार्यरत हैं.

मुझे कुछ दिनों पहले भिन्न प्रकार के अनेकों भारतीय रचनाओं – मौलिक और अनूदित- की वृहद सूची प्राप्त हुई है जो की १८५० में उत्तर पश्चिम के प्रान्तों में छपी हैं. महोदय, मैं उनमे से कुछ का, जिनका हमारे लिए, दार्शनिक या साहित्यिक महत्व है, ज़िक्र करना चाहूँगा. इनमे से हैं, अन्य के अलावा, कुरआन के अरबी और उर्दू में कई संस्करण, जिनमे से एक in-18 फॉर्मेट में है; एक मुस्लिम शहादत-ग्रन्थ ; मोहम्मद साहब के चमत्कारों के ऊपर एक कविता; वहाबी संप्रदाय का एक खंडन; हिन्दुओं के अशास्त्रीय (heterodox) संप्रदाय जैनियों के हिंदी में लिखित निबंध; आगरा के नज़ीर, जिसका हाल में देहान्त में हुआ और जिनका शायर के रूप में भारत में काफी रुतबा है, की कविताओं का संकलन; मशहूर अध्यात्मवादी अली हाजी, जिन्होंने, बाकी चीज़ों के अलावा दिलचस्प संस्मरण लिखे थे, जो की अंग्रेज़ी में अनूदित हुयी है, की जीवनी; देबीप्रसाद के द्वारा बनारस से छपा पंजाब का इतिहास, इंदौर के धर्म नारायण के द्वारा सिन्ध्य (sindhya) राजवंश का इतिहास; पद्य में ‘लख्त-ए-जिगर’ यानी की ‘प्रिय पुत्र’ नामक एक नावेल सिकंदराबाद के बाल मुकुंद के द्वारा, जो की, हिन्दू होते हुए भी, जैसा कि इनके नाम से ज़ाहिर है, उर्दू – उत्तर की मुस्लिम-हिन्दुस्तानी – में लिखते हैं.

काव्य सबसे सफलता से विकसित हो रहा है. इसका चिराग, ख़ास साहित्यिक गोष्ठियों, जिनको मुशायरा के नाम से जानते हैं, में रोशन होता है. भारतीयों को ऐसी अकादमिक गोष्ठियों का काफी शौक है; और काव्य के शौक़ीन निश्चित समय पर इनका आयोजन करते हैं, आमतौर पर हर पंद्रह दिन पर और शाम में. जिसके घर पर मुशायरे का आयोजन होता है वो आमतौर पर उसका सभापतित्व करता हैं. अपनी काव्यात्मक प्रतिभा के लिए प्रसिद्ध लोगों को वह बुलाता है, और मुशायरे के लिए, आमतौर पर एक ख़ास मीटर पर एक नज़्म लिखने के लिए आमंत्रित करता है.

मौजूदा सबसे जाने-माने शायरों में दो शासकों का नाम शुमार है: दिल्ली का सुल्तान और अवध का नवाब. किसी समय हिंदुस्तान के मुसलमान शासक सिर्फ फ़ारसी में ही बोलते और लिखते थे; आम भाषा को वह हिकारत की नज़र से देखते थे. मगर, वर्तमान में, अपने प्रजा की तरह, इन्होने अपने खयालात का इज़हार करने के लिए, या बोलकर या लिखकर, हिन्दुस्तानी का प्रयोग करना शुरू कर दिया है. इन दो शाही शायरों में, जिनके बारे में मैं आपको बता रहा हूँ, पहला, बहादुर शाह द्वितीय, जो पोता है शाह आलम का, जो की खुद हिन्दुस्तानी शायरों में गिने जाते हैं और जो पिता है शहजादा दारा का, जो खुद भी अच्छी शायरी करते हैं. इसने शायरी में अपना तखल्लुस ‘ज़फर’ (विजय) रखा है, और जब शायर के तौर पर इनका ज़िक्र होता है तो इसी नाम का इस्तेमाल करते हैं. दूसरे, वाजिद अली शाह, का तखल्लुस है ‘अख्तर’ (सितारा). वो न सिर्फ शायर हैं, बल्कि संगीतकार भी और अपने ग़ज़लों को खुद ही संगीत में ढालतें हैं. इन दो शायरों की नज्मों का हिंदुस्तान में काफी रुतबा है, और चूँकि मैंने उनकी ग़ज़लें पढ़ी हैं मैं यह दावे से कह सकता हूँ की वे इस शोहरत के काबिल हैं. इसलिए, बिना अतिश्योक्ति के हम उनके लिए अरबी की यह जानी-मानी उक्ति कह सकते हैं: “बादशाहों के कथन, कथनों के बादशाह होते हैं.”

325500_321105231234677_1160023941_oकिशोर गौरव, फ़्रांसिसी अध्ययन केंद्र, जेएनयू, दिल्ली में  पीएचडी के शोधार्थी हैं और सामाजिक-राजनीतिक मोर्चों पर भी चिंतनशील रहते हैं. उनसे मोबाइल-8800788583 और ईमेल- kgkishoregaurav@gmail.com पर संपर्क संभव है.

आभार- हंस, अप्रैल, 2016

 

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