कविता की अवांगार्द परंपरा: हरी चरन प्रकाश

मेकिंग इट न्यू : मॉडर्निज़्म इन मलयालम, मराठी ऐन्ड हिन्दी पोएट्री  का प्रकाशन इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ़  एड्वान्सड् स्टडी द्वारा वर्ष 1995 में किया गया है। इसके लेखक ई. वी. रामकृष्णन हैं। भारतीय साहित्य के अध्येताओं के लिए ई. वी. रामकृष्णन एक जाना पहचाना नाम है। 2005 में उनके द्वारा चुनी गई कहानियों (1900-2000) का एक संकलन, साहित्य अकादमी ने प्रकाशित किया है। ई.वी.आर. अंग्रेजी में लिखते हैं।

प्रस्तुत पुस्तक मलयालम, मराठी और हिन्दी की आधुनिकतावादी कविता की सामाजिकी के मूल्यांकन का एक प्रयास है। लेखक का यह मानना है कि भारतीय कविता में आधुनिकतावाद कोई एकनिष्ठ आन्दोलन नहीं रहा है। उन्होंने कविता के उच्च आधुनिकतावादी महानगरीय मुहावरे और अवांगार्द कवियों के आमूलचूल परिवर्तनवादी (रेडिकल) स्वरों के बीच जो वैचारिक द्वन्द है, उसकी पहचान की है। मलयालम, मराठी और हिन्दी की काव्य परम्परा में आधुनिकतावाद के गतिपथ का संधान करते हुए ई. वी. रामकृष्णन ने अय्यप्पा पणिकर, धर्मवीर भारती, दया पवार, नामदेव ढसाल, गजानन माधव मुक्तिबोध, एम. गोविन्दन, दिलीप चित्रे, अरूण कोलतकर, कदमनित्ता रामकृष्णन, के. जी. शंकर पिल्लई, केदारनाथ सिंह और के. सच्चिदानन्दन की काव्यालोचना के जरिये आधुनिक भारतीय कविता में फार्म और कन्टेन्ट की द्वन्दात्मकता पर प्रकाश डाला है। #लेखक 

आधुनिकतावाद का कवित्त विवेक

By हरी चरन प्रकाश

स्थान और मेरी स्वयं की सीमाओं के कारण प्रस्तुत आलेख सम्प्रति मुक्तिबोध पर ही समाप्त करना पड़ा है। परन्तु इसके पूर्व सही सन्दर्भ की स्थापना करने के लिए यह आवश्यक  प्रतीत होता है कि विचाराधीन पुस्तक के इंट्रोडक्शन  तथा उसके संक्षेप में ‘द ट्रजेक्टरी ऑफ़ मॉडर्निज़्म इन इंडियन पोएट्री: एन ओवरव्यू’अध्याय के अंतर्गत (I) टुवर्ड्स मटिअरिलिस्टिक व्यू ऑफ़ मॉडर्निज़्म इन  इंडियन पोएट्री (II) ऐमबिव्अलन्स् ऐज रेजिस्टंस मिथ एंड मॉडर्निज़्म (III) ‘मीनिंग्स चेंज विद चेंजिंग क्वेसचंस फ्रॉम हाइ मॉडर्निज़्म टू द अवांगार्द’ के शीर्षकों के अधीन भारतीय कविता में आधुनिकतावाद की जिन प्रवृत्तियों का परिचय दिया गया है, उसका समुचित उल्लेख किया जाए। शायद यह लिखने की जरूरत नहीं है कि यह अध्यायक्रम हमें पूर्वोक्त कवियों के रचनात्मक विमर्श के बारे में तैयार करता है।

पुस्तक का परिचय देते हुए ई.वी.आर. पहले अपने उदेश्य को स्पष्ट करते हैं। स्वयं उनके कथनानुसार उन्होंने आधुनिकतावाद के आन्दोलन के दृष्टिपथ का संधान करते हुए उसकी महत्वपूर्ण प्रवृत्तियों में जो फर्क है उसे चिह्नित करने का प्रयास किया है। मलयालम, मराठी और हिन्दी के कुछ प्रतिनिधि कवियों की कविता का अध्ययन करते हुए उनकी प्राथमिकता यह रही है कि इन भाषाओं की आधुनिकतावादी साहित्यिक प्रावस्था में इनके बीच जो समांतरता और भेद रहे हैं उन्हें जाना जाए बनिस्बत इसके कि पश्चिमी आधुनिकतावाद और उसके भारतीय प्रतिस्थानी के बीच समरूपता ढूंढ़ने की कवायद की जाय। यहां पर शब्द ‘भारतीय’ के बारे में एक टिप्पणी आवश्यक है। अगर हम ‘भारतीय साहित्य’ के नाम से कोई श्रेणी बनाते हैं तो निश्चित  रूप से उक्त श्रेणी में हम एक समजातीय भाव को अंतर्निविष्ट मानते हैं। साहित्यिक विमर्श में ‘भारतीय साहित्य’ का पद उसी समय से प्रचलित हुआ जब से भारत को एक राष्ट्र के रूप में जाना जाने लगा। उल्लेखनीय है कि औपनिवेशिक काल से ही भारत की सांस्कृतिक और राजनीतिक राष्ट्रीयता की पहचान करने का कार्य आरम्भ हुआ। भारत की सांस्कृतिक पहचान के लिए उसके अतीत को खंगालना जरूरी था, खासतौर से उसके साहित्य को जिसमें वैदिक काल भी शामिल था। आरम्भ से ही एक श्रेणी के रूप में ‘भारतीय साहित्य’ एक प्राच्यवादी अथवा भारतविद्याव्यवसायी संरचना रही है। चूंकि भारतीय साहित्य के बारे में यह दृष्टिकोण प्रधानतः एक आध्यात्मिक परम्परा के पाठीय तत्वज्ञान में गूंथा गया है इसलिए भारतीय भाषाओं की कुछ महत्वपूर्ण साहित्यिक रूपरचना इसकी परिधि से बाहर रही है।

आगे, राजनीति या साहित्य की एक कोटि के रूप में ‘भारतीयता’ की अवधारणा को ‘विदेशी’ से अलग या उसके मुकाबले में प्रस्तुत किया जाता है जबकि इसी ‘विदेशी या अन्यदेशी ’ के मुकाबले नाइजीरिया या तन्जानिया का लेखक ’अफ्रीकन’ पद का प्रयोग करता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि शब्द ‘भारतीय’ कुछ ऐसे मूल्यों की वकालत करना है जो सम्पूर्ण भारत को यूरोप या अफ्रीका की तरह और उसी वज़न पर एक अलग सांस्कृतिक इकाई मानता है। स्वभावतया, भारतीय भाषाओं के साहित्य के बारे में अंग्रेजी में जो लेखन किया जाता है वह भी इसी वैश्विक और शास्त्रीकृत दृष्टिकोण की पुष्टि करता है। प्रो. ई. वी. रामकृष्णन यहां इस बात को भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि उनके अध्ययन का उदेश्य अपेक्षतया सीमित और विनीत है। उन्होंने अपने अध्ययन के लिए जो तुलनात्मक रीति नियोजित की है उसमें भारतीय सभ्यता के एकत्व की महिमामय धारणा के तहत चीजों को नहीं देखा गया है। उन्होंने मात्र एक आंतरिक समीक्षा की है जिसमें यह मूल्यांकित करने का प्रयास किया गया है कि मलयालम, मराठी तथा हिन्दी कविता की प्रवृतियों का समकालीन भारत में, जिन्दगी की जद्दोजहद के संदर्भ में, क्या और कितनी सामाजिक प्रासंगिकता है। ध्यातव्य है कि अपने समाज और साहित्य के संदर्भ में एक कवि की विद्रोही या सिंहासनविरोधी भूमिका उसके उस रचनात्मक संघर्ष का हिस्सा है जिसके द्वारा वह अनुभवों की वैकल्पिक शब्दावली विकसित करता है। इतिहास का महाआख्यान, साहित्य की नवविद्रोही प्रवृत्यिों को तब तक आत्मसात नहीं कर सकता है जब तक कि उन प्रवृत्तियों को पालपोस कर घरेलू न बना दिया जाए। इतिहास का दुरमुट और शास्त्रीकरण में निहित पालतू उपयोगिता, कृतिकारों और कृतियों को काल की तलहटी में कुछ ऐसा जमा देती है कि उनकी वर्तमान प्रासंगिकता को ढूंढ़ना मुश्किल हो जाता है। हमें यह भी ध्यान में रखना है कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के बीच की दूरी, उत्तर औपनिवेशिक काल की अस्मिता बोधक शब्दावली के कारण कुछ और समस्याजनक हो गई है। इस अध्ययन का बृहत्तर सामाजिक संदर्भ, स्वातंत्र्योतर काल की प्रतियोगी अस्मिताओं की चढ़ा-उपरी से सम्बन्धित है जिसको वर्तमान समय के सांस्कृतिक पाठ में उत्कीर्ण राजनीतिक उपपाठ के संदर्भ में अर्थापित किया जा सकता है।

कुछ समय पूर्व के. एम. जॉर्ज द्वारा सम्पादित ‘कम्परेटिव इन्डियन लिटरेचर’ में भारत की पृथक साहित्यिक परम्पराओं को इतिहासबद्ध करने का प्रयास खास तौर पर दिखा है। किताब की दोनों जिल्दों में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय के बीच जो दूरी है उसे पाटने का प्रयास नहीं किया गया है क्योंकि भारतीय साहित्य को पृथक अस्तित्वशाली क्षेत्रीय साहित्य का समुच्यय माना गया है। परन्तु, शिशिर कुमार दास ‘अ हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन लिट्रेचर’ में इस सीमारेखा को लांघते हैं। उन्होंने भूलभुलैया जैसे जटिल फलक पर भारत की पृथक-पृथक साहित्यक परम्पराओं को जोड़ने वाले कुछ चैराहे और साथ ही कुछ समान्तर गलियारे खोजे हैं। उनके इस दृष्टिकोण से सहमत होने को दिल चाहता है कि भारतीय साहित्य का इतिहास, भारतीय जन की सम्पूर्ण साहित्यिक गतिविधि का इतिहास है। उनकी छोटी या बड़ी समस्त साहित्यिक परम्पराओं के प्रशासन और परिवर्तन, उनके ह्रास और पुनर्जीवन और उनके उत्थान और पतन का लेखा-जोखा है। किन्तु यहां एजाज अहमद की ‘इन थ्योरी: क्लास,  नेशन्स, लिट्रेचरस’ की बिना पर यह भी कहने का मन होता है कि उपरोक्त  आदर्शीकृत दृष्टिकोण में जो एकतामूलक, एककोषी रूझान है वह भूगोल  दर्शन और राष्ट्र-राज्य की विचारधारा के प्रभाव से जन्मा है। चूंकि किसी भी भारतीय भाषा का साहित्य अपने भाषिक समुदाय के संदर्भ में कुछ निश्चित  ऐतिहासिक काम करता है इसलिए उसकी अर्थवत्ता उसकी उसी  विशिष्टता में स्थित है। अगर अमुक अमुक क्षेत्रीय-भारतीय भाषाओं के महत्वपूर्ण साहित्यिक पाठों को खींच-तान कर राष्ट्रीय साहित्यिक इतिहास का हिस्सा बना भी दिया जाय तो इस बात की प्रबल सम्भावना रहेगी कि उक्त पाठ का जो सहजात सम्बन्ध उसके सामुदायिक संदर्भ के साथ है, वह या तो विस्मृत हो जाए या विरूपित हो जाए।

आधुनिकता के बारे में हमारा दृष्टिकोण अधिकतर उन आंग्ल-अमरीकी आलोचकों द्वारा निर्मित है जो राजनीति और संस्कृति के अन्तर्संबंध को तवज्जो नहीं देते हैं। उनकी साहित्यिक टीकाएं अधिकतर आधुनिकतावाद की बहुलतावादी प्रवृत्तियों को ऐसी अमूर्त संहिताओं में ढालती हैं जो बहुराष्ट्रीय संदर्भों में ही क्रियाशील होती हैं। महानगरीय संस्कृति, पश्चिम का पतन, नवाचार, निर्वासित कलाकार जो एक नई भाषा की खोज में निकला है, जैसी विषयवस्तु आधुनिकता के आंग्ल-अमरीकी विमर्श में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। विस्थापन, अलगाव और निजवाचक पाठ का आख्यान, कला की ऐसी महिमाशाली ईक्षा के इर्दगिर्द बुना जाता है जो सीमान्त से आगे, वियना, पेरिस, लन्दन और न्यूयॉर्क जैसे पारदेशीय नगरों के बीच आवाजाही करना रहता है। परन्तु इस प्रकार का पाश्चात्य आख्यान, भारतीय कविता के आधुनिकतावादी पाठ में मौजूद सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ के दृष्टिगत, कतई प्रासंगिक नहीं है। हालाकि यह भी सही है कि आंग्ल-अमरीकन नमूने से प्रेरित आधुनिकतावाद के इस क्षेत्रातीत प्रारूप को उच्च पाठीयता की उस स्वदेशी परम्परा से भी कुछ सहारा मिला है जिसका रूझान शास्त्रीय ज्ञान की सर्वभारतीय/भारतव्यापी प्रणाली में रहा है। एक अवरोपित विश्वबोध, जो लिखने की तकनीक के लिए सात समुन्दर पार से प्रेरणा ग्रहण करता है, परन्तु अपनी रचना के वैधीकरण के लिए संस्कृत काव्यात्मकता की ओर मुड़ कर देखता है, कविता में स्वच्छन्दतावाद/छायावाद के जमाने से प्रचलित है। संस्कृति के आभिजात्यवादी दृष्टिकोण में जो अमूर्त सार्वभौमिकता है वह मनुष्य के सौन्दर्य संसार को उच्चीकृत करके स्वायत्त बना देती है। भारतीय समाज की पूर्वआधुनिक स्थितियों से किसी ज्ञानमीमांसक विच्छेद के अभाव में सौन्दर्यबोध के उपरोक्त उच्चीकरण/विशेषीकरण का प्रभाव यह होता है कि साहित्य के नए मुहावरे, भिन्नता/दूसरेपन को अगली पंक्ति में बिठा देते हैं। प्रो. ई. वी. रामकृष्णन के अनुसार दूसरेपन की यह गण्यमान्यता आधुनिकतावाद के दौर में सामान्य पाठक और साहित्य के बीच बढ़ती हुई दूरी के लिए उत्तरदायी है।

वी. के. गोकाक की ‘कम्परेटिव इंडियन लिटरेचर’ में से उद्धृत करते हुए ई. वी. आर. लिखते हैं कि भारतीय भाषाओं में प्रगतिशील कविता, रूमानी कविता, आधुनिकतावादी कविता, प्रयोगवादी कविता कुछ आगे-पीछे और कुछ साथ-साथ चलती रही है लेकिन मोटे तौर पर यह कहना चाहिए कि प्रयोगवादी कविता बीसवीं शती के पांचवे छठे दशक में पली बढ़ी जबकि प्रगतिशील कविता की चेतना चौथे दशक में विकासमान हुई।

वी. के. गोकाक ने आधुनिक कविता की परम्पराओं में कोई विभेद नहीं किया है। इसके बरअक्स यू. आर. अनन्तमूर्ति, रामचंद्र शर्मा और डी. आर. नागराज द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘विभाव: माडर्निज्म इन इंडियन राइटिंग’ में कहा गया है कि भारतीय आधुनिकतावाद का सबसे रोचक पहलू यह है कि इसने रूढि़वादियों (कन्ज़रवेटिव्स) और आमूलचूल परिवर्तनवादियों (रेडिकल्स) दोनों को अपने भीतर जगह दी है और शायद यह यूरोपीय आधुनिकतावाद और भारतीय आधुनिकतावाद की सबसे महत्वपूर्ण और समान  विशिष्टता है।

पूर्वोक्त अभियुक्ति से किंचित असहमत होते हुए ई. वी. आर. उक्त सम्पादकों के इस नज़रिए पर सवाल उठाते हैं कि क्या दक्षिणपन्थी अडिगा और वामपन्थी मुक्तिबोध एक जैसी युक्तियों का उपयोग करते हुए समान मानसिक अवस्थाओं का अन्वेषण करते हैं? अगर एक क्षण के लिए यह मान भी लिया जाए कि वह समान उपकरणों का उपयोग करते हैं तो इससे भारतीय आधुनिकतावाद में किसी अन्तर्निहित एकता की उपस्थिति प्रमाणित नहीं होती है। सभी तरह के प्रयोगशील लेखन को आधुनिकतावाद की एक छतरी के नीचे लाना सही नहीं होगा। अतः यह आवश्यक है कि आधुनिकतावाद के अंतर्गत रूढि़वाद और आमूलचूल परिवर्तनवाद के बीच के फर्क को स्पष्ट किया जाए। तद्नुसार प्रो. ई. वी. रामकृष्णन ने रूढिवादी प्रवृत्तियों के लिए ‘उच्च आधुनिकतावाद’ और आमूलचूल परिवर्तनवादी को निर्दिष्ट करने के लिए ‘अवांगार्द’ शब्द का उपयोग किया है।

यहां पर यह तथ्य भी विचारणीय है कि भारतीय सन्दर्भ में ‘आधुनिकतावाद’ को यह अपयश भी मिला है कि उसका सौन्दर्यात्मक सांचा भारतीय यथार्थ के एक अच्छे-खासे हिस्से से सामंजस्य नहीं बिठा पाता है। यह भी एक तथ्य है हमारी लिखित और मुद्रित शाब्दिकता से अछूता जो दूसरा भारत है, और फिर भी जिसकी एक जोरदार/तगड़ी उपस्थिति है, की अवहेलना कोई भारतीय लेखक नहीं कर सकता है। ई. वी. आर. के इस अध्ययन में यह जताया गया है कि आधुनिकतावादी खित्ते के लेखक वंचित और दलित वर्गों की अनुचारी सामाजिक स्थिति से निर्मित प्रतिसंस्कृति को कैसे सम्बोधित करते हैं। भारतीय भाषाओं में कविता की जो अवांगार्द परम्परा है उसमें अभिव्यक्ति के देशज रूपों का इस्तेमाल करते हुए और इन रूपों के भीतर भारतीय यथार्थ के एक बडे़ हिस्से को ग्रहण कर उसे जगह देते हुए, पाश्चात्य आधुनिकतावाद को देशी आत्मिकता देने का प्रयास किया गया है। अब सवाल यह है कि अवांगार्द किस मायने में उच्च आधुनिकतावाद के मुकाबले रूढि़द्रोही और परिवर्तनकामी है। आंग्ल-अमरीकी आलोचना में अवांगार्द पर कोई चर्चा भूले-भटके ही हुई है क्योंकि आधुनिकतावाद की आमूलचूल परिवर्तनवादी प्रवृतियां (रेडिकल) कान्टीनेन्टल लेखन में ही अधिक नुमायां हैं। हालांकि रेनाल्ट पोगियोलि, आक्तेवियो पाज और ज्यार्ज नोज़लोपि ने नवप्रवर्तनशील या प्रयोगशील आधुनिकतावाद के सभी रूपों को अवांगार्द की श्रेणी में रखा है लेकिन ई. वी. आर का यह मानना है कि पीटर बर्जर की पुस्तक ‘द थ्योरी ऑफ़ द अवांगार्द’ में अवांगार्द की जो रूपरेखा दी गई है वह भारतीय भाषाओं में कविता के आधुनिकत्व पर चर्चा के लिए अधिक उपयुक्त है। बर्जर की थ्योरी रूमानियत और उच्च आधुनिकतावाद के नैरन्तर्य को और अधिक स्पष्ट करती है। यूरोप में बीसवीं शताब्दी के शुरूआती दशकों में जो अवांगार्द आन्दोलन चला उसे बर्जर ऐतिहासिक अवांगार्द कहते हैं और यह ऐतिहासिक अवांगार्द, आधुनिकतावाद के ‘उच्च’ संस्करण के आधारिक सिद्धान्तों को अमान्य करता है। बर्जर ‘उच्च आधुनिकतावाद’ के लिए ‘सौन्दर्यवाद’ शब्द का उपयोग करते हैं और इस प्रकार उच्च आधुनिकतावाद तथा रूमानियत के बीच जो नैरन्तर्य है, उसे रेखांकित करते हैं। बर्जर के अनुसार उन्नीसवीं शती के यूरोप में बुर्जुआजी की राजनीतिक स्थिति मजबूत होने के बाद कलागत संरचनाओं में रूप और अंतर्वस्तु की जो द्वन्दात्मकता थी, वह दिनोदिन रूपाभिसारी होती गई। इसका नतीजा यह हुआ कि कला के क्षेत्र में अंतर्वस्तु का स्थान गौण होता गया और रूप की सौन्दर्यशास्त्रीयता विशेषाधिकारसम्पन्न हो गई। कांट और शिलर की रचनाओं से कुछ ऐसे संकेत मिलते हैं जिनके अनुसार कला के विकासक्रम की सम्पूर्णता उस मुकाम पर होती है जहां वह जीवन के कार्यव्यापार से अलग हो जाती है। कला में सौन्दर्यपरकता के इस स्वायत्त क्षेत्र और सौन्दर्यानुभूति पर उसके असर की जो सामाजिक कीमत अदा करनी पड़ सकती है, उसे अवांगार्द ने पहचाना। इस प्रकार अवांगार्द की प्रस्थापना उस बिन्दु से होती है जहां कला आत्मसमीक्षा की प्रक्रिया से गुजरती है और जहां कला अपने संस्थागत रूप को प्रश्नों से आकुल करती है। इसे अगर उदाहरण के जरिए समझे तो मामला कुछ यूं होगा कि अगर एक  विशिष्ट धार्मिक विचार की आलोचना दूसरे धार्मिक विचार को खड़ा करके की जाए तो यह एक व्यवस्थाजन्य आलोचना होगी लेकिन अगर धर्म की संस्था की ही आलोचना की जाए तो यह आत्मसमीक्षा होगी। अतः बर्जर के अनुसार आधुनिकतावादी सौन्दर्यवाद और अवांगार्द पयार्यवाची नहीं हैं। हालांकि, रूमानियत (छायावाद) अपनी प्रवृतियों में रूपवादी थी लेकिन उसकी विषयवस्तु के जो नैतिक आग्रह थे, उन्होंने कम से कम रूमानियत के शुरूआती दौर में उसके स्वायत्ततापरक दावों का खंडन किया था। वहीं पर उच्च आधुनिकतावाद ने सम्पूर्ण स्वायत्तता के उपक्रम द्वारा अंतर्वस्तु की सारी निशानियां ही मिटा डालीं।

माधव आप्टे द्वारा संपादित पुस्तक ‘मास कल्चर, लैंग्वेज ऐन्ड आर्टस इन इन्डिया’ में संकलित वाल्टर स्पिन्क के निबन्ध में पाश्चात्य और भारतीय कला के अन्तर को विवेचित करते हुए जो बातें कहीं गई हैं यदि उन्हें एक वाक्य में कहने की कोशिश की जाए तो कहा जाएगा कि भारतीय कला स्वभावतया परिवर्धनधर्मी है न कि परिवर्तनकामी। भारतीय राज्याचार का बहुलतावाद और इसके बहुभाषीय चरित्र ने इसके साहित्य में अनेक और भिन्न प्रकार के आन्दोलनों और रीतियों को एक ही समय में परवान चढ़ाया। साहित्यिक विमर्श की यह विविधता अलगाव की मनःस्थिति में रह रहे सौन्दर्यवादी भाव के अकेलेपन का प्रतिरोध करती है। इस प्रतिरोध को समाज के दलित-वंचित वर्गों की जनचेतना के प्रतिसांस्कृतिक दबावों से बल मिलता है। भारत के क्षेत्रीय साहित्य में शास्त्रीकृत और अशास्त्रीकृत रचनात्मकता के बीच जो सम्बन्ध है वह सदा से समस्याग्रस्त रहा है। ई. वी. आर. का आग्रह है कि भारतीय भाषाओं की साहित्यिक परम्पराओं के विकास में परम्परानिष्ठ, पौराणिक विश्वदृष्टि और वास्तविक, लौकिक यथार्थ के प्रवाह तथा इतिहास द्वारा पोषित दृष्टि के बीच का टकराव, निर्णयात्मक महत्व का रहा है। आधुनिक प्रयोगशील लेखन के पूर्व भारतीय भाषाओं का साहित्य अधिकतर एक प्रगतिशील प्रावस्था से गुजरा है। इसी प्रगतिशील प्रावस्था के दौरान भारतीय लेखक ने यह वैचारिकता ग्रहण की कि सौन्दर्यचेतना को अगर जीवन से पृथक कर एक उदात्त लोक में प्रतिष्ठापित कर दिया जाता है तो उसकी एक बड़ी सामाजिक कीमत अदा करनी पड़ती है। इस समझदारी के बावजूद, प्रगतिशील वैचारिकी की रचनात्मक सम्भावना का यथेष्ट परिपोषण इस कारण नहीं हो पाया क्योंकि प्रगतिशील लेखक अन्वेषणात्मक लेखक के प्रति उत्साहित नहीं थे। इसी दरम्यान स्टालिन राज की हिंसा के उजागर होने से उत्पन्न क्षोभ और अपयश, औद्योगीकरण की ओर उन्मुख नये भारत की चिन्तन-दिशा से गांधीवादी विचारधारा की असंगति आदि ने मिलकर एक ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जो अभी तक के आदर्शवादी सोच-विचार के सांचे से बाहर जाने के लिए रास्ता ढूंढ़ रह था। यही वह आधुनिकतावादी आवेग था जो मुख्यतया सांस्कृतिक प्रतिरोध के रूप में और साथ ही साथ सामाजिक परिवर्तन के विचार के प्रति दुचित्तेपन के रूप में प्रकट हुआ। नई अकादमियों और शिक्षा संस्थानों की स्थापना तथा लिखित एवं मुद्रित शब्द के बढ़ते हुए प्रभावक्षेत्र के कारण संस्कृति, मुद्रित शब्दों के क्षीरसागर में निवास करने लगी और इस कारण संस्कृति का पारिभाषिक क्षेत्र रोजमर्रा की जिन्दगी से अलग हो गया।

शुरूआती तौर पर अवांगार्द का मुहावरा उच्च आधुनिकतावाद से इसलिए अलग नहीं लगता है क्योंकि दोनों समान रूप से उन पितृसत्तात्मक धारणाओं पर सवाल उठाते हैं जो भारतीय साहित्य में संस्थागत रूतबा प्राप्त कर चुके हैं। अवांगार्द और उच्च आधुनिकतावादी दोनों ही साहित्य धाराएं, राष्ट्रवादी-रूमानी छवि का प्रतिनिधित्व करने वाले केन्द्रीय सत्ताचरित्रों के विरूद्ध थीं। यू. आर. अनन्तमूर्ति, रामचंद्र शर्मा और डी. आर. नागराज द्वारा सम्पादित ‘विभव: मार्डनिज्म इन इंडियन राइटिंग’ का पुनः उल्लेख और उपयोग करते हुए ई. वी. आर. बताते हैं कि इस किताब में ‘टैगोर सिन्ड्रोम’ पर क्या टिप्पणी की गई है। इस टिप्पणी के अनुसार, शैली और विचारधारा दोनों ही स्तरों पर यह जाहिर होता है कि विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य के बुजुर्गवारों/पितृमूर्तियों में एक आश्चर्यजनक समानता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, रूमानी मुहब्बत, प्रकृति, रहस्यवाद, तत्ववादी रूझान और राष्ट्रनिर्माण के आदर्श ने मिलजुल कर टैगोर सिन्ड्रोम की साझी आचारिकता गढ़ी। किन्तु यह पंचामृत कुछ इतना मीठा और पुराना था कि जी भिन्नाने लगा। कालान्तर में जब इस प्रकार की पितृपूजक सत्ता की सांस्कृतिक प्रभुताई असह्य हो गयी तो नई पीढ़ी ने यह दुर्वह बोझ उतार फेंकना चाहा। नई पीढ़ी की इस अवज्ञाकारी हरकत ने ही साहित्य में आधुनिकतावादी आन्दोलन का सूत्रपात किया। ई.वी.आर. आगे बताते हैं कि मलयालम में जी. शंकर कुरूप, कन्नड़ में बेंद्रे, मराठी में रविकिरन मंडल के कविगण, गुजराती में उमाशंकर जोशी और हिन्दी में छायावादी कवियों को कुछ इस प्रकार की प्रतिगामी काव्यात्मत्कता का मूर्तरूप समझा गया जिसे उखाड़ फेंकना आवश्यक था। किन्तु इसी स्थल पर ई.वी.आर. यह भी कहते हैं कि आधुनिकतावादी कविता का घनिष्ठ पाठ यह उजागर करता है कि बहुत सी जगहों पर नई कविता के पैरोकारों/अलमबरदारों ने पितृमूर्तियो की विरासत का अच्छा-खासा पुनर्नियोजन किया है। अमियदेव के बोधक्षम विश्लेषण ‘वाज़ इट आल इन द मैनर ऑफ़ मलर्म: द बंगाली पोइटिक ऑफ़ द 1930’s विद रेफ्फेरेंस टू द पोएट्री’ में यह दिखाया गया है कि बंगाल के आधुनिकतावादी कवियों सुधीन्द्रनाथ, जीवनानन्द दास, बुद्धदेव बोस और अमिय चक्रवर्ती की कविता में कुछ पश्चिमी प्रभाव, कुछ संस्कृत साहित्य से रिश्ता और टैगोर की विरासत के अलग-अलग नकूश मिलते हैं। इससे यह तथ्य रेखांकित होता है कि कवियों का ऐसा घनिष्ठ पाठ जिसमें उनके योगदान की वृहत्तर सन्दर्भों में आंकलित करने की सावधानी बरती गई हो, भारतीय आधुनिकतावादी साहित्य की छिपी हुई रूपरेखा को सामने ला सकता है।

प्रस्तुत अध्ययन का पहला भाग उस बृहत्तर संदर्भ की चर्चा करता है जिसके सापेक्ष दूसरे भाग में विभिन्न कवियों का वर्गीय पाठ और तीसरे भाग में कवियों का व्यक्ति पाठ किया गया है।
पुस्तक के अध्याय (I) में ‘टुवर्ड्स अ मटीअर्अिलिस्टिक व्यू ऑफ़ मॉडर्निज़्म इन इन्डियन पोएट्री’ की शुरूआत करते हुए ई.वी.आर. लिखते हैं कि ‘कविता‘ नामक पत्रिका के माध्यम से बुद्धदेव बोस ने पिछली पीढ़ी के साहित्यकारों के विरूद्ध विद्रोह की अगुआई की। टैगोर उक्त पिछली पीढ़ी के प्रतिनिधि कवि थे जिन्हें ‘कविता’ का पहला अंक भेजते हुए दिनांक 30 सितम्बर 1935 के पत्र में बुद्धदेव बोस ने कहा – “आप एक चीज का संज्ञान लेने के लिए बाध्य हैं- इस अंक की अधिकांश कविताएं गद्य में हैं। मेरा मानना है कि गद्यात्मक कविताओं की जिस शैली का परिचय आपने -‘पुनश्च‘ के माध्यम से दिया है, वह विभिन्न लेखकों के हाथों से गुजरते हुए और भिन्न-भिन्न आकारों में ढलते हुए कविता का स्थाई चिह्न होने वाला है। मेरी व्यक्तिगत धारणा यह है कि भविष्य में गद्यशैली में लिखी र्गइं कविताओं की संख्या पद्य में लिखी गई कविताओं से कम नहीं होगी।”

अंतर्वस्तु को सन्दर्भित किए बिना यहां कविता की ‘गद्यात्मकता’ पर जो जोर दिया गया है उससे यह संकेत मिलता है कि नया कवि कविता के रूपात्मक गुणों को कितना अधिक महत्व देना चाहता है। जब टैगोर ने आधुनिक कवियों की तुलना अघोरपंथियों से की तब जाहिरा तौर पर उनके दिमाग में नई कविता की अंतर्वस्तु उथल-पुथल मचा रही होगी। रूमानी- राष्ट्रवादी या रूमानी- प्रगतिवादी और आधुनिकतावादी के बीच जो बेचैनी भरा सम्बन्ध रहा है उसमें रूप और अंतर्वस्तु का यह द्वन्द एक विग्रही मुद्वा बन जाता है। 1938 में जीवनानन्द दास ने उच्च आधुनिकतावादी मुद्रा, जिसकी अनुगूंज चालीस के दशक में अज्ञेय में सुनाई पड़ती है, अख्तियार करते हुए कहा कि कविता सबके लिए नहीं है और जब तक लोगों के दिल-ओ-दिमाग नए क्षितिजों को ग्रहण नहीं करते हैं तब तक सच्ची कविता को समाज के सम्पूर्ण ढांचे में प्रवेश करने का मार्ग नहीं मिलेगा- अलबत्ता बाजारों और डाकयार्ड के तीसरे दर्जे के कवियों का अनगढ़ महिमान्वयन एक दीगर बात है। लेकिन उपरोक्त समय में ही हम समर सेन के काव्यात्मक अभ्यास से गुजरते हैं जहां हम अवांगार्द की उस संवेदना का प्रथम आभास पाते हैं जो सौन्दर्यवादी आधुनिकतावाद के समानान्तर चलती है। निर्मल घोष द्वारा सम्पादित ‘स्टडीज़ इन मार्ड्न पोएट्री’ में प्रलय कुमार देव ने लिखा कि समर सेन की कविता में ‘‘आत्माभिव्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण है स्व के सामाजीकरण की कोशिश”।

1943 में तार सप्तक का प्रकाशन हिन्दी कविता के लिए एक नया मोड़ थी। तार सप्तक के संपादक अज्ञेय के पिता एक पुरातत्वविद थे जिन्हें काम के सिलसिले में उत्तर भारत में जगह-जगह जाना और रहना पड़ा। परिणामतया, यह हकीकत कि अज्ञेय ने हिन्दी अधिकतर किताबों से सीखी, उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी उनकी अंग्रेजी शिक्षा-दीक्षा है। अज्ञेय द्वारा संपादित ‘प्रतीक’ ने आधुनिकतावाद के मुहावरे को कविता के अगवाड़े पर ला बिठाया। नई कविता का नाम धारण करने वाले इस कुल ने जल्दी ही उस लेखन से किनारा कर लिया जो सामाजिक यथार्थ से गांठ जोड़ कर चल रहा था। अज्ञेय के इस समय में त्रिलोचन शास्त्री, नागार्जुन तथा केदार नाथ अग्रवाल जैसे कवि जो अपने समय के सजीव-सम्मुख यथार्थ से प्रेरक शक्ति प्राप्त कर रहे थे, को पिछवाड़े धकेलने के प्रयास हुए। इस नयी कविता के कवियों ने आंग्ल-अमरीकी और फ्रांसीसी बिम्बवादियों के नक़्शेकदम पर चलते हुए, विश्व की अनुभवातीत झलक दिखाने के लिए यह जरूरी समझा कि कविता के स्थापत्य को सर्वाधिक महत्व दिया जाए। उनकी कविताएं एक ऐसे विश्वव्यापी किन्तु प्रदेशविहीन भूदृश्य पर रची र्गइं जिन्होंने उनके काव्यात्मक अनुभव को इतिहासहीन बना दिया। लेकिन इसी समय के आसपास हिन्दी के अवांगार्द मुहावरे ने गजानन माधव मुक्तिबोध जैसा तेजस्वी प्रवक्ता पाया।

मराठी भाषा में, 1947 में आई मर्डेकर की ‘कही कविता’ को आधुनिकतावाद का शंखनाद कहा जा सकता है। तीस के दशक में मर्डेकर इंगलैण्ड में रह रहे थे और वहां वह बिम्बवाद के प्रभाव में आए। ‘ऐन अन्थोलॉजी ऑफ़ मराठी पोएट्री’ में मर्डेकर की ‘कही कविता’ पर टिप्पणी करते हुए दिलीप चित्रे ने कहा कि किताब का कवर पेज ही स्तब्ध कर देने वाला था। कवर पेज पर एक नंगी पुरूष आकृति का उपहासचित्र था। पौरूषहीन, कमजोर, बीमार, क्लीव और नायकत्व की प्रभा का विपर्यय । अन्दर के पृष्ठ अवसाद से भरे थे। एक परिचयात्मक, उदास कविता जो आत्मनिन्दा से भरी पड़ी थी और जिसमें मराठी के महान संत कवियों की तुलना में स्वयं की तुच्छता का बखान किया गया था। इसके आगे युद्ध, अनास्था, आदर्शहीनता, धर्म का आतंक और बीमारी इत्यादि जैसे अवसादकारी विषयों पर और भी उदास और उजाड़ कविताएं थीं। स्वयं मर्डेकर के लिए यह एक बड़ा परिवर्तन था। मर्डेकर के पहले कविता संग्रह ‘शिशिरागम’ से ‘कही कविता’ की तुलना करते हुए फिलिप एनब्लॉम्ब बाम्बे लिटरेरी रिव्यू में प्रकाशित लेख ‘माडर्निज्म इन बाम्बे: मराठी ऐन्ड इंग्लिश वर्जन‘ में कहते हैं कि मर्डेकर ने एक झटके में न केवल पारंपरिक मराठी सानेट को बाहर का रास्ता दिखा दिया वरन तीस के दशक की प्रबल काव्यशैली के रूप, छंद और शब्द विन्यास के उस सारे तामझाम को खारिज कर दिया जिसका उपयोग उन्होंने कभी ‘शिशिरागम’ नामक कविता में किया था। प्रख्यात आलोचक जी. आर. कामथ ‘अनिरूद्ध’ ने मर्डेकर की इस ‘कही कविता’ को आलोचकों के लिए चुनौती के रूप में पेश करते हुए इसे ‘नया काव्य‘ या ‘नवकविता‘ का नाम दिया। मर्डेकर का परवर्ती मराठी कवियों पर अच्छा-खासा प्रभाव पड़ा। हालांकि उनका विरोध भी कम नहीं हुआ, तब भी और आज भी, किन्तु मराठी कविता में उनकी हैसियत एक अकेले शिखर जैसी है। कुल मिला कर कहना चाहिए कि शैली के प्रति मर्डेकर का व्यामोह उन्हें उच्च आधुनिकतावाद के करीब ले जाता है।

अय्यप्पा पणिकर की ‘कुरूक्षेत्रम‘ का 1960 में प्रकाशन और 1968 में उनके संपादकत्व में ‘केरल कविता‘ का निकलना, मलयालम भाषा में आधुनिकता रचनात्मकता के लिए महत्वपूर्ण घटनाएं हैं। एक टूटी-फूटी दुनिया के लिए उपयुक्त मुहावरा गढ़ने के लिए पणिकर ने स्व की खोज को सबसे महत्वपूर्ण विषयवस्तु बनाया। हालांकि परवर्ती मलयालम कवियों पर पणिकर का प्रभाव बीजस्वरूप रहा लेकिन कविता की भाषा पणिकर के मन-मस्तिष्क पर इस कदर हावी थी, कि आखिरकार वह उच्च आधुनिकतावादी प्रजाति के एक रूपवादी ही माने जाएंगे। इतिहास की प्रक्रिया और सामाजिक स्व के प्रति गहरे अविश्वास ने उन्हें ऐसा उत्कट व्यक्तिवादी बना दिया कि उनका कवि एक विकासमान समाज का संगी-साथी नहीं हो पाया।

साठ के दशक में ही एम. गोविन्दन और उनकी पत्रिका ‘समीक्षा’ ने मुख्यतः मद्रास में रहने वाले लेखकों और चित्रकारों की एक बिरादरी कायम करने में रचनात्मक भूमिका निभाई जिसका भारत के अन्य राज्यों के लेखकों और कलाकारों से संपर्क हुआ। इस संपर्क से अन्य राज्यों में अवांगार्द की जो विभिन्न प्रवृतियां क्रियाशील थीं वे व्यापक रूप से सामने आयीं। इसी समय के आगे-पीछे मराठी में भी तमाम ऐसी लघु पत्रिकाएं मशाल की तरह जलती-बुझती रहीं जिन्होंने अवांगार्द के मुहावरे को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें ‘शब्द’ नाम की पत्रिका सर्वाधिक प्रभावशाली रही है।

यहां कुछ रूककर हमें काफी पीछे जाना है, ताकि हम भारत की क्षेत्रीय भाषाओं के द्वंद को समझ सकें। क्षेत्रीय भाषाओं का आर्विभाव और विकास, बौद्ध धर्म के प्रचार और प्रसार से जुड़ा नजर आता है। बौद्ध धर्म के आचार्यों और प्रचारकों ने देशी जुबानों और बोलियों को तरजीह दी। इस तरीके से वह पुरोहितों की गूढ़ गुणधर्म वाली उस भाषा का विरोध कर सकते थे जो तत्कालीन हिन्दू वैचारिकता की वाहक थी। जातक कथाओं ने लोक मानस को अभिव्यक्ति के नए आयाम दिए। इस प्रक्रिया ने भूधर्मी भाषा के विकास के साथ-साथ उस भाषा में सांस्कृतिक और साहित्यिक अभिव्यक्ति को विकसित किया। पालि ने संस्कृत का स्थान लिया क्योंकि एक तरफ तो वह बोलियों के इतनी करीब थी कि लोग उसे समझ सकें दूसरी तरफ वह किसी बोली विशेष से इतनी दूर भी थी कि उसे किसी  विशिष्ट स्थानीय मुहावरे में ही समझने की विवषता नहीं थी। मोटे तौर पर पालि के बाद प्राकृत का युग माना जाता है हालांकि पाकृत और पालि एक दूसरे को आच्छादित भी करते हैं। (यों तो 500 ई. पू. से 1000 ई. पू. तक के काल की भाषा को प्राकृत कहते हैं) किन्तु इस पूरे काल को प्रथम प्राकृत-काल, द्वितीय प्राकृत काल और तृतीय प्राकृत काल के रूप में तीन कालों में बांटा जाता है। उसमें प्रथम काल (आरम्भ से ईसवी सन् के आरम्भ तक) की भाषा पालि और शिला लेखी प्राकृत है,  दूसरे काल (ईसवी सन् से लगभग 500 ई. तक) की भाषा का नाम प्राकृत है और तीसरे काल (500 ई. से 1000 ई. तक) की भाषा का नाम अपभ्रंश है। इस अपभ्रंश की करीब सत्ताइस प्रान्तीय किस्में हुई जिनसे अधिकांश भारतीय भाषाएं पैदा हुई। इस सूचना का मन्तव्य केवल इस तथ्य को रेखांकित करना है भारत में क्षेत्रीय भाषाओं का प्रवर्तन उस मिजाज से जुड़ा है जिसके तहत समाज के बडे़ हिस्से ने पाठाधारित पौराणिक विश्वदृष्टि की गूढ़ रूढि़वादिता का सांस्कृतिक प्रतिरोध किया है। इन क्षेत्रीय भाषाओं ने अपनी अलग अस्मिता मध्यकाल के भक्त कवियों की महान रचनाओं द्वारा अर्जित की। भक्ति साहित्य पर किए गए नए अध्ययनों ने यह दिखाया है कि भक्ति आन्दोलन की अन्तरवस्तु क्रान्तिकारी थी और यह बात दीगर है कि बाद में इसकी शक्ति को पहचान कर अभिजाततंत्र ने इसको हथिया लिया। वस्तुतः भक्ति आन्दोलन ने पुराणपंथियों और सामान्य जन के बीच जो वैचारिक विग्रह था उसका समाधान जनसामान्य के पक्ष में किया। संक्षेप में भारतीय इतिहास की नाट्यशाला में जो बार-बार होने वाली परिघटना है वह यही है कि भारत का पण्डितवर्ग पहले जनसामान्य की भाषा और संस्कृति के प्रभाव में आता है फिर बाद में वह उसे अपने हित में अनुकूलित कर लेता है। इस प्रकार अभिजात्य उच्चवर्गीय और उपवर्गीय हैसियतों के बीच जो द्वन्द है उसकी तह में गृहस्वामियों द्वारा किये जाने वाले मालिकाना शोषण-पोषण और उक्त शोषण-पोषण के तले दबे हुए गृहसेवकों की आकांक्षाओं का संघर्ष छिपा है।

इतिहास की इस गली में जाने का उदेश्य केवल यह है कि हम क्षेत्रीय भाषाओं के कवि की बहुसांस्कृतिक पृष्ठभूमि को थोड़ा और समझ सकें और साथ ही साथ उसकी कविता में शास्त्रीय, क्षेत्रीय और विदेशी परम्पराओं का जो तिहरा रिश्ता दिखता है उसे भी समझ सकें। चूंकि यह तीनों परम्पराएं क्षेत्रीय भाषाओं की भाषिक संवेदना में साथ-साथ मौजूद हैं इसलिए अक्सर इनकी संयोजनात्मक प्रकृति, कविता की आधुनिकता के बारे में हमें संकेत दे देती हैं।

भारतीय भाषाओं की कविता में आधुनिकता के विकास के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान पाश्चात्य प्रभाव का रहा है। वर्ष 1835 और 1857 के बीच भारतीय साहित्य पर पश्चिमी प्रभाव के बारे में लिखते हुए शिशिर कुमार दास कहते हैं कि इस अवधि में जिन लेखकों ने भारतीय साहित्य की रूपरेखा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई वे सभी अपनी मातृभाषा, के साथ-साथ अंगे्रजी और किसी शास्त्रीय भाषा (संस्कृत या फारसी) में प्रवीण थे। इसी दरम्यान लोगों की रूचि गद्य में, खास तौर पर कहानी और उपन्यास में जागृत हुई जिसने साहित्य की दिशा को नए कोण दिए और एक नया पाठकवर्ग उत्पन्न किया जो उत्सुकतापूर्वक अनुदित साहित्य भी पढ़ना चाहता था। इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप कविता और साहित्य की अन्य विधाओं के बीच के सम्बन्ध को एक दूसरे सांचे में ढालने की आवश्यकता पड़ी। उस समय तक भारतीय भाषाओं में उपन्यास का या अन्य गद्यरूपों का जो पूर्वोतिहास था उसके दृष्टिगत इस नए पाठकवर्ग के समक्ष, आधुनिक उपन्यासों के कारण अभिरूचि का कोई गंभीर संकट नहीं खड़ा हुआ। इसके विपरीत चूंकि भारतीय भाषाओं में कविता की एक लम्बी, अविच्छिन्न और समृद्ध परम्परा रही है इसलिए कविता के पाठक के समक्ष यह समस्या खड़ी हुई कि वह कविता से क्या उम्मीद करे। एक तरफ उसकी पारम्परिक रूचिसंपन्नता थी तो दूसरी तरफ कविता के नए रूप उससे कुछ अलग अपेक्षा रखते थे। नतीजतन उन्नीसवीं शती के मध्य तक जैसाकि शिशिर कुमार दास कहते हैं, भारतीय भाषाओं में पारम्परिक और पाश्चात्य नमूने की कविताओं के बीच द्वंद की स्थिति रही। परन्तु जैसे-जैसे अभिजातवर्ग पश्चिमी/अंग्रेजी प्रभाव में आता गया, गीत और छोटी कविताओं ने महाकाव्य और खंडकाव्य के मुकाबले ज्यादा जगह बना ली। यहां यह कहना चाहिए तत्कालीन भारतीय बुद्धिजीवी चाहे वह बांग्लाभाषी रवीन्द्रनाथ टैगोर हों या मराठी के विष्णुशास्त्री चिपलुणकर हों, ने इस पश्चिमी प्रभाव को भारतीय मेधा के लिए नवजीवनदायी ही माना। किन्तु यहां यह कहना जरूरी है कि भारतीय भाषा साहित्य पर अंग्रेजी के इस प्रभाव को सर्वभारतीय, क्षेत्रीय और विदेशी परम्पराओं के तिहरे बहुसांस्कृतिक सम्बन्धों की पृष्ठभूमि में ही समझा जा सकता है। व्लादिमिर माकुर अपने निबन्ध ‘कल्चर ऐज ट्रांसलेशन’ में कहते है कि अनुवाद के स्वत्वहारी कार्यकलाप के फलस्वरूप एक मिलते-जुलते सांस्कृतिक इंद्रियबोध की अवतारणा होती है। चूंकि बहुत सी भारतीय भाषाओं में तीस और चालीस के दशक से पहले साहित्यिक समालोचना की कोई विकसित परम्परा नहीं थी इसलिए इन अनुवादों ने कविता के पठन-पाठन के प्रतिमान तय करने का भी काम किया। कहना चाहिए कि हमारे समाज में भाषाओं की विभाजनरेखा थोड़ी तरल है और द्विभाषिता का भी खूब चलन है इसलिए किसी भी भाषा के लिए यह पूरी तरह से संभव नहीं है कि वह किसी समुदायविशेष के आत्मबोध का आख्यान, एकात्मवादी संस्कृतियों की तरह एकात्म स्वरों में रचे। चूंकि हमारे आत्मजगत की संरचना, भाषा के द्वारा होती है इसलिए ‘निज भाषा‘ की यह तरलता भी उन आख्यानों में शब्दित हो जाती है जो हमारे स्व को अभिव्यक्त करने का बीड़ा उठाते हैं। उन्नीसवीं और बीसवीं शती के सन्धिकाल के कवियों में एक ऐसी बेचैनी थी, कला की स्वतंत्रता को सुनिश्चित  करने की ऐसी चाह थी कि उन्होंने रूप, छन्द और विषयवस्तु को लेकर लगातार प्रयोग किए। इन प्रयोगों के पीछे एक आवेग यह भी था कि अपनी भाषा को अंतर्नुवाद्यता के मानकों के करीब पहुंचाया जाए। इन प्रयोगों ने अभिव्यक्ति के कुछ ऐसे ढंग-ढर्रे पैदा किए जिन्होंने विदेशी परम्परा और उसमें निहित अन्यता/दूसरेपन के अनुकूल और प्रतिकूल दोनों किस्म के काव्यानुभव रचे। इस समय का कवि दो दुनियाओं के बीच जिस सुगमता के साथ जी रहा था वह उसके तरलित स्वत्व का घोतक है।

लेकिन जैसे-जैसे अंग्रजी अनुशासन की शिक्षापद्धति का प्रसार होता गया वैसे-वैसे ही पूरी भारतीय शिक्षापद्धति विहित पाठ्यक्रम के इर्द गिर्द संघटित होने लगी। साहित्यिक निदेश में इस औपनिवेशिक आधिपत्य का एक फल यह भी था कि तत्कालीन साहित्यिक विमर्श महान परम्पराओं की ओर उन्मुख हो गया और छोटी परम्पराओं का उपेक्षित ज्ञान साहित्य में प्रवेश नहीं कर सका। विनय हार्डीकर कहते हैं कि तत्समय मराठी में समस्त साहित्यिक गतिविधि उच्च वर्ग तक सीमित थी और कभी कभार जब यह उच्च वर्ग नीचे की ओर ताकता भी था तो इस अहसास के साथ वह ऊंचा है और ऊंचाई से देख रहा है। इस परिदृश्य का ज़ायजा लेते हुए कृष्ण कुमार ‘पॉलिटिकल एजेण्डा ऑफ़ एजुकेशन: ए स्टडी ऑफ़ कॉलोनियलिस्ट ऐन्ड नेशनलिस्ट आईडियाज’ में कहते हैं कि टैगोर की जागरूकता भी, एक सूचनासंपन्न चिंतित बुर्जुआ की चेतना की द्योतक थी और भारतीय गांवों की दुर्दशा को वह एक पराए व्यक्ति की भांति ही देख सकते थे। इन हालात में यह समझा जा सकता है कि उन्नीसवीं और बीसवीं शती के आरम्भ में निम्नवर्ग और स्त्रियों की लेखकीय भागीदारी क्यों इतनी कम रही, हालांकि इसी अवधि में दो नाम, मलयाली कवि कुमारन असन (1873-1924 – एझवा नामक दलित समुदाय से) और ओडि़या कवि गंगाधर महर (1862-1924 – जुलाहा समुदाय से) अपवादस्वरूप सामने आते हैं।

यहां पर थोड़े दुहराव के साथ यह कहना पड़ रहा है कि भारतीय भाषाओं में आधुनिकतावाद के कालक्रम को तब तक सार्थक रीति से नहीं समझा जा सकता जब तक कि मुद्रण के कार्यव्यापार को न समझा जाए। लिखाई के साथ छपाई के गठबंधन ने साहित्यिक रचनात्मकता को राजनीतिक आयाम दिए। बेनीडिक्ट ऐन्डरसन ‘इमेजिन्ड कम्युनिटीज: रिफ्लेक्षन्स आन द ओरीजिन ऐन्ड स्पे्रड ऑफ़ नेशनलिज़्म‘ में कहते है कि मुद्रित होने के लिए तैयार भाषाओं ने उनके बोलने वालो के लिए यह सम्भव बना दिया कि वह राष्ट्रीयता की कल्पना से सिक्त सामुदायिकता का भ्रूण बन सकें। मुद्रण का पूंजीवाद यह सुनिश्चित करता है कि देर या सबेर ऐसा समुदाय आत्मालोचना के लिए प्रस्तुत हो और अपनी प्रवृतियों और वरीयताओं को नए सिरे से निर्धारित करें। भारतीय भाषाओं में साहित्यिक समालोचना का प्रादुर्भाव मुद्रण के इसी पूंजीवाद का उपोत्पाद है। यही वह समय था जब कि भारतीय जन के जीवन के निजी और सार्वजनिक क्षेत्र पुर्नसंयोजित किए जा रहे थे। जो चीजें अनायास ही व्यक्ति के निजी जीवन का अंग मानी जाती थी उन पर राज्य की निगरानी बढ़ रही थी, जिसके फलस्वरूप नागरिक समाज में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की सायास निशानदेही तेजी से हो रही थी। ऐसे में एक व्यक्ति के लिए यह जरूरी हो गया कि वह इन दोनों क्षेत्रों के बढ़ते हुए बंटवारे को समझ कर अपनी जीवन शैली निर्धारित करे।
नागरिक समाज में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के इस बदलते हुए रिश्ते के आलोक में आधुनिकता की संवेदना के प्रकट होने की व्याख्या की जा सकती है। कहा जा सकता है कि आधुनिकता की संवेदना वह आलोचनात्मक आत्मबोध है जिसके जरिए उस समय का व्यक्ति निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के तत्कालीन रिश्तों का विश्लेषण और उनका पुर्नसंयोजन कर रहा था। वस्तुतः भारतीय भाषाओं में कविता का आधुनिकतावादी मुहावरा राजनीतिक आन्दोलनों और राज्य की समष्टियों से व्यक्ति की वियुक्ति की दावेदारी पेश कर रहा था। वह राजनीतिक समाज की समावेशी चक्की से छिटक कर अपना अस्तित्व बचाए रखना चाहता था। इन अर्थों में आधुनिकतावादी संवेदना, आधुनिकता की ही समीक्षा कर रही थी।

इस काल के साहित्यकारों के लिए आधुनिकता का मतलब था, इतिहास में जागना। इसका मतलब था स्व की ऐसी परिभाषा की खोज जिसके जरिए विस्तारित आख्यानों में स्व को स्थापित किया जा सके। चूंकि साम्राज्यवाद भौगोलिक हिंसा का एक ऐसा उपक्रम था जिसके द्वारा लगभग पूरी पृथ्वी खोजी, नापी और नियंत्रित की जा चुकी थी इसलिए इस काल के राष्ट्रीय कवियों ने इस खोई हुई भूमि को कल्पना के जरिए प्राप्त करना चाहा। हालांकि, अधिकतर राष्ट्रीय कविता इसी मानचित्रण आवेग से उपजी थी परन्तु इनके बीच मलयालम के कुमारन असन और मराठी के केशवसुत जैसे कवि भी थे जिनकी रूमानियत गहरी सामाजिक चेतना से परिष्कृत थी। वह जाति के दंश और आर्थिक असमनाताओं के प्रति सचेत थे और कोई ताज्जुब नहीं कि उनकी कविताओं में मातृभूमि की भावुक वन्दना नहीं है। बाद में प्रगतिशील साहित्यकार जिन्होंने अपने पूर्ववर्तियों की रूमानी देशभक्ति को खारिज किया, कुमार असन और केशवसुत की इस विरासत का आह्वान किया।

राष्ट्रीय रूमानी कविता के अवसान और आधुनिकतावादी कविता के आविर्भाव के बीच अधिकतर भारतीय भाषाओं में प्रगतिशील आन्दोलन का एक महत्वपूर्ण दौर आया। इस दौर पर शिकागो रिव्यू में प्रकाशित लेख “सम कॉन्टेक्स्ट ऑफ़ मॉडर्न इंग्लिश पोएट्री” में टिप्पणी करते हुए विनय धारवाड़कर कुछ ऐसा मानते हैं कि समाजवादी मूल्यों का परचम फहराने वाले प्रगतिशील लेखकों ने बाज औकात भारतीय समाज की एक उजाड़ और निराशाजनक तस्वीर प्रस्तुत की है। प्रगतिशील लेखन ने महाकाव्यात्मक गम्भीरता और प्रगीतात्मकता के बजाय व्यंग्य, विडम्बना और भर्त्सना का रास्ता चुना। इस परिप्रेक्ष्य में प्रगतिशील दौर और साहित्य की आधुनिकतावादी करवट के बीच जो सम्बन्ध है उसका गहरा अध्ययन होना चाहिए। मोटे तौर पर यह माना जाता है कि हिन्दी में प्रयोगवादी रचना प्रगतिशील आन्दोलन की प्रतिक्रिया में हुई है। परन्तु इस संबंध में अमियदेव का यह कहना है कि बंगाली में और शायद हिन्दी में भी तीसरे दशक में प्रगति-प्रयोग की युति रही है जिसमें खंडन-मडन की द्वन्दात्मकता के अलावा संवादात्मक विचार-विनिमय की गुंजाइश रही है। गुजराती, मलयालम और मराठी में 1940 के आसपास प्रगतिशीलता का एक सुपरिभाषित दौर रहा है। गुजराती में उमाशंकर जोशी और सुन्दरम् ने समाजवादी विचार की रेडिकल धारा को गांधी के सुधारवादी कार्यक्रमो के साथ संष्लेषित किया।

यहाँ यह उल्लेख करना उपयुक्त होगा कि तीसरे दशक तक समाज के मध्यवर्ग में यह बात जड़ पकड़ चुकी थी कि साहित्य एक लिखित, मुद्रित और प्रकाशित अवधारणा है। उपरोक्त गतिविधियों के संस्थानीकरण के कारण साहित्य के उत्पादन और वितरण में समाज के कुछ वर्गों का ऐसा वर्चस्व बना जिसके अनुकूल पूरे समाज के साहित्यिक मानक तय किए जाने लगे। क्षेत्रीय भाषाओं का संस्कृतीकरण और पुनरूत्थानवादी प्रवृत्तियां बढ़ीं। के. एम. मुंशी की 1935 में प्रकाशित ‘गुजरात ऐन्ड इट्स लिटरेचर’ की भूमिका लिखते समय महात्मा गांधी ने मध्यम वर्ग की साहित्यिक समझ की सीमाओं की ओर ध्यान खींचते हुए अपनी स्वभावगत साफगोई के साथ कहा ‘‘श्री मुंशी ने हमारी साहित्यिक उपलब्धियों का जो आकलन किया है वह मुझे बहुत वफादार लगता है। स्वभावतया उनका सर्वेक्षण उस भाषा तक सीमित है जो मध्यम वर्ग द्वारा बोली और समझी जाती है। व्यवसायिक मानसिकता के आत्मतृप्त लोगों की भाषा प्रकृतिशः ‘स्त्रैण और विषयासक्त’ रही है। हम लोगों (आमजन) की भाषा के बारे में कुछ नहीं जानते। हम उनकी बोली-बानी नहीं समझते। उनके (आमजन) और हम मध्यवर्गीय लोगों के बीच इतना फासला है कि हम उन्हें नहीं जानते हैं और वह तो हमारी सोच और हमारी वाणी के बारे में और भी कम जानते हैं।”

के. एम. मुंशी के गुजराती साहित्य का इतिहास और रामचन्द्र शुक्ल के हिन्दी साहित्य के इतिहास पर ऐसे पुनरूत्थानवादी आवेग की छाप है जो अतीत को स्मारकीय पदों में ढालने का कार्य करता है। गांधीजी ने ‘उनके और हमारे’ बीच जिस बढ़ती खाई का उल्लेख किया था वह इस बात की द्योतक है कि इस समय तक सामाजिक यथार्थ और राष्ट्रीय नियति के प्रति जनसामान्य और उच्चवर्ग के नजरिए में फर्क आ गया था। इसका असर भाषा पर भी पड़ा जिसके तहत साहित्यिक भाषा एक ऐसी  विशिष्ट इकाई हो गई जो अकलात्मक बोली और भाषा से अलग है। प्रगतिशील लेखकों ने इस अवस्था को इसी समय पहली बार एक विचारधारात्मक घटना के रूप में पहचाना। हालांकि अपने समय में अवांगार्द ने भी यह पहचान अपने तरीके से की। जहां प्रगतिशीलों ने समस्त पूर्वकालिक भारतीय कविता को वर्तमान के लिए महत्वहीन पाया वहीं कविता के अवांगार्द मुहावरे ने परम्परा का अन्वेषण कर के उसे एक संघर्ष-स्थल के रूप में प्रस्तुत किया।

एज़ाज अहमद ’इन थ्योरी’ में कहते हैं कि पारम्परिक सम्पत्तिशाली और नए व्यवसायिक वर्ग, दोनों के ही पेटी-बुर्जुआ अपनी शिक्षा-दीक्षा और व्यवसायिक महत्वाकांक्षाओं की गतिकी के कारण अंग्रेजी और पाठीय परम्पराओं की ओर आकर्षित हुए। उच्च आधुनिकतावाद के महानगरीय मुहावरे और उसमें ‘प्रगतिवाद’ के विरूद्ध जो विरोधाभाव है उसे उक्त संदर्भ के साथ ध्यान में रखना चाहिए। साथ ही जान फ्रो की यह टिप्पणी भी दिमाग के एक कोने में रखने लायक है कि आधुनिकतावाद, यथार्थवादी सौन्दर्य दृष्टि के इतना विरूद्ध भी नहीं है क्योंकि वह यथार्थवाद की आन्तरिक विसंगतियों का समापनकाण्ड है। वस्तुतः अमियदेव द्वारा उल्लिखित प्रगति-प्रयोग युति को उच्चारोही मध्यम वर्ग और शेष समाज के बीच होने वाले इसी व्यवहार-व्यापार के संदर्भो में देखना चाहिए। इस बात के बावजूद कि प्रगतिशील आन्दोलन ने साहित्य का जनभाषीय संस्कार किया, यह बात अपनी जगह सही है कि भाषा के भीतर अधिपति और उपवर्गीय तत्वों का जो अंतर्विरोध था उसे यह आन्दोलन पूरी तरह सुलझा नहीं पाया। आधुनिक समाज में लेखक और पाठक के बीच सम्बन्धों की जो समस्याजनक प्रकृति है उसे न समझने के कारण प्रगतिशील आन्दोलन ने इस बात की आवश्यकता नहीं समझी कि सौन्दर्यशास्त्र का नया विधान रचा जाए ताकि अनुभूति और अभिव्यक्ति के लिए नए तरीके चलन में आ सकें। इसी के साथ एज़ाज अहमद का यह कथन भी महत्वपूर्ण है कि भारतीय भाषाओं के साहित्य के लिए यथार्थ से मुठभेड़ निर्णायक सिद्ध हुई क्योंकि जहां साहित्य के बहुत से अन्य रूप आए और गए, यथार्थवाद बना रहा क्योंकि दुनिया को समझने का इसका तरीका उस ऐतिहासिक क्षण के साथ जुड़ा जब भारतीय समाज अपने पहले बुर्जुआ उथल-पुथल से गुजरते हुए खुद की वर्गसंरचना और पूंजीवादी प्रकार का गृहप्रबन्धन करते हुए अपनी वर्गचेतना की निर्मिति कर रहा था।

कुल मिलाकर, एक प्रगतिशील रचनाकार, साहित्यिक रूपाकारों में अन्तर्निहित सौन्दर्यपरक रचनान्तरणों की गतिकी को सन्दर्भित किए बिना, साहित्य को लेखक और समाज के साझे विश्वास की अभिव्यक्ति मानता था जबकि उच्च आधुनिकतावादी, सामाजिक इतिहास को इतना अस्त-व्यस्त और अव्यवस्थित मानते हैं कि उससे किसी नैतिक आध्यात्मिक या सौन्दर्यात्मक आयाम की उत्पत्ति हो ही नहीं सकती। दूसरी तरफ अवांगार्द लेखक इतिहास के प्रति नाउम्मीद नहीं है भले ही आधुनिक बुर्जुआ समाज, कला और मानवता के लिए किसी आशा का संचार न करता हो। यथार्थवाद और अवांगार्द के बीच लम्बी लम्बी बहसे हुई हैं, जिनमें ब्लाख, लुकाच, ब्रेख्त, बेजामिन और अदोर्नो ने जम कर भाग लिया है। लुकाच ने जेम्स ज्वायस के मुकाबले टॉमस मान को तरजीह दी है क्योंकि ज्वायस के अवांगार्द लेखन को उन्होंने जीवन और यथार्थ से रिक्त पाया। इसके विपरीत ब्रेख्त और अर्दोनो ने अपने-अपने तरीके से अवांगार्द लेखन का बचाव किया। ब्रेख्त ने लुकाच को जवाब देते हुए कहा कि बालजक या टाल्स्टाय की यथार्थवादी रचना पद्धति अपनी समस्त संभावनाओं को निचोड़ कर निढाल हो चुकी है इसलिए अब सर्वहारा के लिए असाधारण और जोखिम भरी रचना करने से नहीं डरना चाहिए बशर्ते कि वह यथार्थ स्थितियों से व्यवहार करती और जूझती हो। ब्रेख्त ने कला में अन्वेषण और प्रयोग की आवश्यकता पर बल दिया क्योंकि एक कलाकार को बीसवीं सदी के पूंजीवादी समाज में हो रहे सामाजिक परिवर्तनों से जूझना है।

लूकाच की ‘द मीनिंग ऑफ़ कन्टेमपरेरी रीअलिज़्म’ की समीक्षा करते हुए अदोर्नो ने रूप की प्रमुखता पर बल दिया है। जेम्स ज्वायस, काफ्का और बेकेट ने रूप के जिन नियमों का वरण किया है वे सभी उनकी सामाजिक अंतर्वस्तु से गहरे और सौन्दर्यपरक रीति से जुडे़ हुए हैं। इन बहसों का जिक्र इसलिए प्रासंगिक है कि इनके जरिए हमे उन मुद्दों को समझने में मदद मिलती है जो प्रगतिशीलता और प्रयोगवाद के द्वन्दात्मक/संवादात्मक रिश्तों की पड़ताल से जुडे़ हैं।

चूंकि हिन्दी में आधुनिकतावाद को प्रगतिशीलता के विरोध में परिभाषित किया गया है इसलिए अज्ञेय जैसे उच्च आधुनिकतावाद के हामी-हिमायती की बौद्धिक स्थापनाओं को करीब से जानना जरूरी होगा। अज्ञेय ने कला को अपूर्णता के विरूद्ध एक विद्रोह माना है। अपने विनिबिन्ध ‘संस्कृति और परिस्थिति’ में वह कहते हैं कि हमारी जीवन शैली ही नहीं हमारा जीवन ही बदल गया है। जिन्दगी न शहरी रह गई है और न ग्रामीण, इसका ढांचा ही खो गया है। इसे जोड़ने वाला कुछ नहीं बचा है। वह एक कामगार की विच्युतावस्था की बात करते हैं परन्तु साथ में यह कहते हैं कि उसकी विच्युति, उसके अलगाव की समस्या, सांस्कृतिक ज्यादा है और आर्थिक कम। जब वह यह कहते हैं कि आर्थिक दशा या जीवनस्तर में सुधार किसी राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय संस्कृति को जन्म नहीं देगी, तो वह प्रगतिवादियों को जवाब दे रहे होते हैं। जब वह कहते हैं कि संस्कृति का तत्व आलोचनात्मक आस्वाद के रोपण और पोषण से प्राप्त होता है और उसे मशीन, प्रचार, भाषण और बहसों द्वारा विकसित नहीं किया जा सकता है तब वह इलियट की अनुगूंज पैदा करते हैं। महान शास्त्रीय रचनाओं में खोने और उन्हें पाने के लिए सख्त दिमागी प्रशिक्षण की आवश्यकता है। वर्गभेद का विस्तार एक लेखक के लिए आवश्यक नहीं है, क्योंकि दुःख, अधूरेपन का त्रास और पीड़ा, सर्वव्यापी और वर्गातीत है। अज्ञेय, जोर देकर कहते हैं कि एक अधिकांशतया अनपढ़ समाज जिसमें अधिकतर शिक्षा विदेशी भाषा में दी जाती है, के लेखक से यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वह जनसामान्य के लिए या उनके बारे में लिखे।

अज्ञेय का सतत दृष्टिकोण यह रहा है कि आभिजात्य मूल्यों का एक ऐसा रूपस्वी शरण्य कायम किया जाए जिसके जरिए एक उदात्त संस्कृति लोक को सीमांकित और सुरक्षित किया जा सके। अज्ञेय के संस्कृति, भाषा और निजता सम्बन्धी सरोकार, सामान्य जीवन से उनके अलगाव को सत्यापित करते हैं। उनकी संस्कृतनिष्ठ भाषा जिसमें किसी भी हिन्दी भाषाभाषी क्षेत्र की बोलीबानी का अभाव है, उनके इस अलगाव को और पुष्ट करती है। जिस समय वह आधुनिक सामाजिक परिवेश की नुक्ताचीनी करते हैं जिसके कारण यह अजनबीयत पैदा होती है उस समय वह इस बात को नहीं मानते हैं कि सामाजिक परिवर्तन के जरिए संप्रेषण की समस्या को हल किया जा सकता है। अज्ञेय के लिए कविता एक शाब्दिक निर्मिति है जो आधुनिक समाज से त्रस्त लोगों को पनाह देती है। उनकी कविता में बारम्बार प्रयुक्त होने वाले रूपक यथा नदी, नाव, यात्री, मार्ग और द्वीप उनकी तबियत के रूमानी रूझान की ओर इशारा करते हैं। उनके आधुनिकतावाद को अस्तित्ववादी विचारों की मध्यस्थता भी प्रभावित करती है क्योंकि वह एक इतिहासेतर, आत्मनिष्ठ स्थल जिस पर अस्तित्ववादी सौन्दर्यचेतना की पदचाप है, को अधिमान्यता देते हैं। अज्ञेय के कृतित्व में आत्मनिष्ठा की रूमानी विरासत, अजनबीयत का बोध और आत्मचेतना के चरम क्षणों के प्रति अस्तित्ववादी रूचि सहयात्री बन कर सामने आती है। इसके मूल में अज्ञेय की वह दृष्टि है जिसके तहत स्व एक ऐसा एकाकी, समाजच्युत आभ्यांतर स्थल है जो सामाजिक अंतर्व्यवहार और तर्कजन्य वाक् से अलग और कटा हुआ है। लोथार लुत्से की ‘हिन्दी राइटिंग इन पोस्ट कोलोनियल इंडिया: अ स्टडी इन द अस्थेटिक्स ऑफ़ लिटरेरी प्रोडक्शन’ में छपे हुए एक इंटरव्यू में अज्ञेय कहते हैं कि उनके जैविक स्व और उनके पंडित-कवि के बीच अंतःसंघर्ष की स्थिति है। नई कविता और अस्तित्ववाद में अज्ञेय की कविता की यौक्तिक विशेषता पर प्रकाश डालते हुए राम विलास शर्मा दिखाते हैं कि कैसे अज्ञेय तमाम स्रोतों से भावना और दार्शनिक अन्तरदृष्टि बटोर कर उन्हें अपनी भावात्मक संरचना का अंग बनाते हैं। अज्ञेय छांट-छांट कर ऐसे विचार चुनते हैं जो उनके अनुकूल और प्रिय हैं। फलस्वरूप, उनकी सारग्रही प्रतिभा वेदान्त, जेन, बौद्धधर्म और अस्तित्ववाद में कोई विभेद करने का कष्ट नहीं करती है। उनकी कल्पना अमूर्तन के संदर्भमुक्त संसार में विहार करती है। उनकी पांडित्यपूर्ण और र्निवैयक्त्कि वैश्विक वाणी, विभिन्न विचार प्रणालियों को बिना उनके ऐतिहासिक सन्दर्भ और प्रत्ययात्मक सहारे के समावेशित करती है। उनकी यह आवाज सद्य और सदैव परिवर्तनशील वर्तमान के लिए प्रतिबद्ध है। दूसरी तरफ मुक्तिबोध जैसे कवि हैं जो अपनी कला को जीवन के प्रवाह से संशोधित और विशेषित होने देते हैं और इस प्रकार समय और इतिहास का अपने अंतर्विरोधो के साथ के साथ संवाद बनाते हैं। अवांगार्द का यह जो संवादात्मक स्वभाव है वह उसे उच्च आधुनिकतावाद की प्रतिपाद्य मुद्राओं से अलग करता है।

अज्ञेय के उच्च आधुनिकतावाद ने एक पूरी पीढ़ी के हिन्दी के काव्यानुरागियों की पाठकीय संवेदना के संस्कार में बीजभूमिका निभाई है। कुछ यही भूमिका मराठी में सुरेश जोशी और मलयालम में अय्यप्पा पणिकर ने निभाई है। हालांकि अज्ञेय, जोशी और पणिकर बुर्जुआ संस्कृति के आलोचक हैं परन्तु उनकी यह रूपवादी दृष्टि कि साहित्य की संरचना सामाजिक व्यवहार से बाहर और ऊपर है, अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें उस संस्कृति के पाले में खड़ी कर देती है जिसके वे घोषित रूप से आलोचक हैं। यह वह संस्थानीकृत, द्वीपीय साहित्यिक संस्कृति है जिसे अवांगार्द के मुहावरे ने अतिक्रमित किया है। मुक्तिबोध, दिलीप चित्रे और सच्चिदानन्दन जैसे कवि पूरी तरह से आश्वस्त हैं कि कोई भी सौन्दर्यपरक तथ्य ऐसा नहीं है जो सामाजिक इतिहास के बृहत्तर संदर्भों की पोटली से बाहर हो। साहित्यिक गतिविधियों के संस्थानीकरण के प्रति उपरोक्त आत्मालोचक चेतना, रूप और अंर्तवस्तु के प्रति अवांगार्द के कलाकार की दृष्टि को परिवर्तित करती है। अवांगार्द की आकांक्षाओं में साहित्यिक क्षेत्र के बढ़ते लोकतंत्रीकरण (जो सम्भव हुआ क्षेत्रीय भाषाओं में मुद्रण, पठन और पाठन की वृद्धि से) और नए रूपविधान का आवेग साफ-साफ झलकता है। औपनिवेशिक काल से पहले भी और खासकर भारतीय इतिहास के संक्रमणकालीन समयो में सनातन धर्म और साधारण धर्म के बीच जो अन्तःसंघर्ष रहा है वह भारतीय भाषाओं के साहित्यिक विमर्श का आवश्यक लक्षण रहा है। भक्तिकालीन कविता इसका अन्यतम उदाहरण हैं जिसके प्रति आधुनिकतावादी कवियो का विचित्र और कदाचित अनूठा आकर्षण रहा है।

कुमकुम सांगरी, मीराबाई पर किए गए अध्ययन में यह दर्शाती हैं कि कैसे भक्ति के उदार और विसम्मत रूपांकनों ने उच्च हिन्दूवाद के तत्वज्ञान (माया और कर्म आदि) का चुनिंदा प्रयोग करके ऐसे इंद्रियातीत मूल्य के सृजन का प्रयास किया जो लौकिक-भौतिक जीवन की दैनन्दिनी में रचे-बसे हुए हों और सबकी पहुंच के अन्दर हों। औपनिवेशिक काल में उच्चवर्ग और जनसामान्य में सामाजिक स्तर पर जो विभाजन रहा है उसने सामाजिक यथार्थ और राष्ट्रीय नियति को समझने के अलग-अलग रास्तों को जन्म दिया। पश्चिमी शिक्षा दीक्षा से लैस जिस उच्चवर्ग ने बुद्धिवादी और विकासवादी विचारों से प्रेरणा ग्रहण की वही वर्ग अपनी घरेलू जिन्दगी, परिवार और समुदाय के परम्परागत मानको के अनुसार जी रहा था। सांस्कृतिक रूप से दोहरे दबाव अपनाता और झेलता हुआ यह वर्ग एक दोहरे भाषा संसार को भी उसी तरह भोग और भुगत रहा था।

यह दोहरापन समाज की सत्तासंरचना में भी था। एक तरफ इस उच्च या मध्यमवर्गीय शिक्षित नागरिक वर्ग के जीवन के अन्तर्विरोध सरकार से निभाने वाले संबंधों के कारण पैदा हुए तो दूसरी तरफ जनता के उपवर्गों से निभाने वाले कामकाजी सम्बन्ध भी इसका एक कारक थे। इस अन्तर्विरोध से उत्पन्न सत्ता के ढांचे की अभिव्यक्ति शास्त्रीकृत परम्परा की पाठीयता और रंगकलाओं की वाचिक और मौखिक उपस्थिति के बीच विद्यमान और अनसुलझे तनाव में हुई। कोई आश्चर्य नहीं कि भक्ति साहित्य में विद्रोह और समर्पण के बीच जो तनाव है उसने उच्च आधुनिकतावादी और अवांगार्द दोनों किस्म के कवियों को बहुत आकृष्ट किया है क्योंकि तनाव, सत्ता के दो छोरों से संवाद करने में काव्य की प्रतिभा की मदद करता है।

स्वतंत्रता के बाद भाषिक आधार पर राज्यों का जिस प्रकार पुनर्गठन हुआ उसको क्षेत्रीय बुद्धिजीवियो का पूर्ण समर्थन मिला। यह समझा गया कि क्षेत्रीय भाषाओं के बौद्धिक वर्ग ने आजादी के बाद सत्ता-व्यवस्था में बढे़ केन्द्रोन्मुखी झुकाव का प्रतिकार क्षेत्रीय भाषिकता के माध्यम से प्राप्त सांस्कृतिक प्रतिरोध के द्वारा किया। इस पूरी प्रक्रिया का दिलचस्प परिणाम यह है कि राष्ट्रीय संस्कृति के बरअक्स देशी संस्कृतियों का उठान हुआ जो अपनी अनन्यता और दूसरों की अन्यता के प्रति अतिरिक्त रूप से सचेत रहने लगीं। इस सांस्कृतिक-साहित्यिक परिघटना के परिणामस्वरूप भारतीय संवेदना टुकड़ों में बंटने लगी। यह बंटवारा इस बात पर बहुत कुछ निर्भर था कि किसी लेखक की स्थानिकता क्या है। उदाहरण के लिए यदि अंग्रेजी में लिखने वाले व्यक्ति के लिए यह लगभग तय है कि उसका पाठक पश्चिमी रंग में रंगा हुआ अभिजातवादी प्रवृत्तियों का व्यक्ति होगा तो नतीजतन उसमें उस आत्मालोचन की प्रक्रिया धीमी होगी जो अवांगार्द का पारिभाषिक लक्षण है। उच्च आधुनिकतावाद और अवांगार्द का फर्क लेखन में रूपविधान की प्रस्तुति और उसके पाठक के बीच सम्बन्धों की शर्तों के अनुसार समझा जा सकता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि एक तैयार पाठक के मन-मस्तिष्क में किसी पाठ का अर्थ खुलना और बनना उस पाठ में मौजूद प्रत्यक्षीकरण की शर्तों के द्वारा संचालित होता है। उच्च आधुनिकतावादी पाठ की लाक्षणिकता एक स्थिर असांसारिकता का अनुभवात्मक क्षेत्र रचती है।

ब्रेख्त ने बुर्जुआ रंगमंच के बारे में कहा है कि उसके द्वारा चित्रित लोग कथित ‘शाश्वत मानव’ की अवधारणा से बंधे हुए हैं। इस रंगमंच की कहानियां सर्वव्यापी किस्म की स्थितियां रचती हैं जिनमे एक ‘मनु’, चाहे जिस कालखंड या युग का मनुष्य हो अपने को अभिव्यक्त कर सकता है। इसकी सारी घटनाएं एक संकेत-सूत्र हैं और इस संकेत सूत्र का एक ‘शाश्वत’ उत्तरगान है, जो अपरिहार्य है, स्वाभाविक है और बिना किसी हस्तक्षेप के शुद्ध-विशुद्ध मानवीय है। ई.वी.आर. कहते हैं कि ब्रेख्त के उपरोक्त विचार कमोबेश उच्च आधुनिकतावादी रचनाओं के नाटकीय प्रभाव पर भी लागू होते हैं।

उक्त क्षेत्रातीत दृष्टि के विपरीत एक दूसरी दृष्टि भी है जिसमें यह विचार कि मनुष्य परिवेश का कार्यक्रम है और परिवेश मनुष्य का कार्यक्रम है, उस अनुभवात्मक क्षेत्र में समावेशित है जो पाठ/रचना के शाब्दिक विन्यास में पैबस्त है। इस दृष्टि के समर्थन में ब्रेख्त के विचार प्रासंगिक हैं जब वह कहते हैं कि कला के नए सिद्धान्तों की स्थापना और चित्रण/वर्णन के नए तरीकों को प्रस्तुत करने के लिए हमें बदलते हुए युग की मांगों की पहचान से शुरूआत करनी चाहिए जबकि समाज के पुनर्निमाण की आवश्यकता और सम्भावना आँखों के सामने मंडरा रही हो। मनुष्य के कार्यव्यापार की हर घटना का संज्ञान लेना चाहिए और चीजों को देखने के लिए सामाजिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

कहना चाहिए कि कला के प्रति उपरोक्त दृष्टिकोण जिस आत्मालोचना को सम्भव बनाता है उसके जरिए हम अपने परिवेश के ऐतिहासिक सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक पहलुओं को न तो किसी बहाने से देखते हैं और न मनुष्य से अलग मानते हुए देखते हैं बल्कि हमारी दृष्टि का गठन मनुष्य के द्वारा होता है और मनुष्य का गठन हमारी दृष्टि के द्वारा होता है।

उपरोक्तानुसार ही अवांगार्द की सौन्दर्य चेतना जीवन की उस अन्तर्वस्तु से निर्धारित होती है जिसे सामाजिक परिवर्तन की गत्यात्मकता को समझ कर ही पाया जा सकता है। वस्तुतः उच्च आधुनिकतावाद और अवांगार्द आधुनिकतावाद के भीतर दो अलग सामाजिकस्थल और विरोधी राजनीतिक प्रवृत्तियो को दर्शाने वाले पद हैं। हालांकि यहां यह कहना जरूरी है कि कोई भी रचना पूरी तरह उच्च आधुनिकतावादी या अवांगार्दी नहीं हो सकती है। सच तो यह है कि आधुनिकतावादी कविता के तेवरो को केवल समाज और समाजेतर के सन्दर्भ में ही नहीं समझा जा सकता है। आधुनिकतावादी कवि ने पौराणिक आख्यानों के साथ जो गठबंधन किया है, उसे विवेचित किए बिना अवांगार्द और उसके बीच के फर्क को सूक्ष्मतः समझना मुश्किल है। कहने की आवश्यकता नहीं कि पौराणिक आख्यान भारतीय कल्पनाप्रणाली का चिरंजीवी आकर्षण है और इस हेतु उन भारतीय आधुनिक कवियों की चर्चा करनी होगी जिन्होंने आधुनिकता को पौराणिक आख्यानों के रसायन से रचा है।

‘ऐमबिव्अलन्स ऐज़ रिजिसटन्स्: मिथ ऐन्ड मॉडर्निज़्म’ के अध्याय में पुराणगर्भित आधुनिकतावाद को खोलते हुए ई.वी.आर., टेरी ईगलटन की ‘द आईडियोलाजी ऑफ़ द अस्थेटिक’ का उल्लेख करते हैं। टेरी ईगलटन का अभिमत है कि पौराणिक कथा, आधुनिकतावाद और एकाधिकारी पूंजी में पेचीदा सम्बन्ध है। जैसे ही लैस-ए-फ़ैअः अर्थव्यवस्था एक अधिक क्रमबद्ध पूंजीवादी प्रणाली में प्रवेश करती है वैसे ही व्यक्तिवादी अहं जीवन के नए अनुभवों का वाहक बनने के लिए अपर्याप्त हो जाता है। व्यक्ति से इतर और उसके विरूद्ध संसार का ऐसा स्वायत्त, स्वनियमित ढांचा खड़ा हो जाता है जो किसी आदत की तरह प्राकृतिक प्रतीत होता है। यह एक ऐसी कभी न बदलने वाली और सदैव बदलने वाली अजीब दुनिया हो जाती है जिसमें आदिम रूपों का विलय नफीस आकारों में हो जाता है। इसमें भी खास तौर से औपनिवेषीकरण की अधीनता में जी रहे व्यक्ति के स्वैरकल्पना (फन्तासी) और भ्रांति के ऐसे मायाजाल में जा गिरने की सम्भावना रहती है जहां से यथार्थवादी साहित्य के बजाय आधुनिकतावादी साहित्य प्रियतर लगता है।

यहां पर यह उल्लेख करना उपयुक्त होगा कि पश्चिमी रचनाओं/पाठ के संपर्क में आने के बहुत पहले से भारतीय कविगण काव्य रचना के लिए पौराणिक आख्यानों का उपयोग कर रहे थे किन्तु कविता के आधुनिकतावादी दौर में पौराणिक गाथाओं की व्याख्या उत्तर औपनिवेशिक सन्दर्भों और उनके विश्ववैचारिक ढांचे के अन्तर्गत की जाने लगी।

पौराणिक तौर तरीके का इस्तेमाल करके एक आधुनिकतावादी कवि, प्राचीन और समकालीन के बीच सतत तुलनीयता का आवाहन करता है और इसके जरिए उस सांस्कृतिक पुनःप्राप्ति को कायम रखना चाहता था जो स्वतंत्रता संग्राम में चलने वाले राष्ट्रवादी विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा था। परन्तु एक निस्सीम और नवीकरणीय अतीत के प्रति इस आग्रह के साथ इतिहास के प्रति दुचित्तेपन की मानसिकता भी जुड़ी थी। पुराण के उपयोग द्वारा भारतीय कवि, इतिहास की एकरेखीय, प्रगतिशील और नियामक अवधारणा के विरूद्ध अपना अविश्वास दर्शाने के साथ-साथ उस सर्वभारतीय सांस्कृतिक अनुभव का भी आवाहन कर सकता था जिसका अभी तक भारतीय राष्ट्रीय विचारधारा ने विमर्शात्मक उपयोग नहीं किया था। प्राचीन का अर्वाचीन चेतना के साथ यह संयोग जिस सीमा तक पश्चिमी नमूनो और रीतियों के अनुसार किया गया उस सीमा तक किसी प्रामाणिक भारतीय स्व की खोज स्वतः अप्रमाणित हो जाती है। इस मामले में आधुनिकतावादी कवियों का दुचित्तापन उनके काव्य में पूरी तरह से प्रकट होता है। एक तरफ तो वह इतिहास के अन्दर वैधता प्राप्त करना चाहता है दूसरी तरफ वह पौराणिक काव्यात्मकता का आवाहन करते हुए अद्भुत और अपरिमेय को साधना चाहता है। अतः कविता में आधुनिकतावादी ऐहिक मुहावरे और प्राचीन साहित्य की पवित्र परम्पराओं के बीच क्रियाशील द्वन्दात्मकता के परिपे्रक्ष्य में धर्मवीर भारती का ‘अन्धा युग’ और अय्यप्पा पणिकर की ‘कुरूक्षेत्रम’ का विवेचन आवश्यक है।

‘अन्धायुग’ एक ऐसे महायुद्धोत्तर समाज के बारे में है जो कुलहन्ता-भातृहन्ता हिंसा के प्रभाव से बाहर निकलने में असमर्थ है। अन्धता इस नाटक का केन्द्रीय रूपक है जो साफतौर पर इशारा करता है कि हमारी नैतिक कल्पना, उत्तर औपनिवेशिक सामाजिक यथार्थ से सामंजस्य बिठाने में असमर्थ है। नाटक पर टिप्पणी करते हुए नेमिचन्द जैन ने कहा है कि प्रत्येक व्यक्ति यहां तक कि कृष्ण भी मानसिक एवं नैतिक अन्धता से ग्रस्त हैं जिसके कारण न केवल जीत, हार से अधिक दुःखदायी हो जाती है बल्कि वह आगे और विघटन का रास्ता तैयार करते हुए सभ्यता और संस्कृति को विध्वंस की ओर ले जाती है। भारती के नाटक की यह भविष्यदर्शी विनाशलीलामय दृष्टि एक ऐसा उपकरण हो जाती है जिसके जरिए उत्तर औपनिवेशिक इतिहास की अवसाद रेखाओं को उन प्रश्नचिह्नों में रूपांतरित कर दिया जाता है, जो एक नवजात समाज में स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के केन्द्रीय मुद्दों को सम्बोधित करते हैं।

नाटक के पौराणिक ढांचे में विनयस्त उपरोक्त भविष्यदर्शी मनोरूप, समाज की आदर्शवादी वाग्मिता का निषेध करता है। विदुर का ज्ञान बेकार हो जाता है। युयुत्सु की आत्महत्या और अश्वत्थामा का हत्यारापन, शाश्वत घोषित किए गए मूल्यों को अपनी वेदना से बींधते हैं। सत्य के प्रति युयुत्सु की प्रतिबद्धता उसे अपने लोगों (कौरवों) से विलग कर देती है और पांडवो का साथ देने के फलस्वरूप उसके हिस्से में तिरस्कार आता है। युधिष्ठिर एक ऐसे सिंहासन पर बैठते हैं जो अन्धता का उत्तराधिकारी है। ऐसे माहौल में अपने भाइयों के विरोध में सत्य के लिए लड़ने वाला युयुत्सु का नायकत्व निरर्थक सिद्ध होता है। अन्ततोगत्वा वह कृष्ण और उनके प्रभामंडल को अस्वीकृत करता है। सत्यवादी युधिष्ठिर के अर्धसत्य का मारा हुआ अश्वत्थामा, बदले और हिंसा का ऐसा भीषण दृश्य रचता है कि पृथ्वी का अपना जीवनतत्व खतरे में पड़ जाता है। अभिशप्त अमरत्व का घाव लिए वर्तमान और भविष्य में भटकता हुआ अश्वत्थामा भी कृष्ण को अस्वीकार करता है।

ई.वी.आर. के अनुसार कृष्ण के प्रति धर्मवीर भारती की चित्तवृत्ति आरम्भ से अंत तक उभयभावी रही है। जहां एक तरफ नाटक में कोरस गाने वाले, कृष्ण की सर्वव्यापी सर्वज्ञ दैवीयता का गान करते हैं वहीं नाटक का पाठ ऐसे वृतान्तों से भरा पड़ा है जो कृष्ण को एक तिकड़मी राजनयिक और एक असफल ईश्वर के रूप में दर्शाते हैं। इस दृष्टि से कृष्ण की मृत्यु के अंतिम क्षण महत्वपूर्ण हैं जहां वह एक शिकारी के बाण से मरते हैं और इस तरह से उनके देवत्व की प्रतिमा खंडित हो जाती है। पर उनका मृत्यु पूर्व का बयान जिसमे वह मृत्यु को एक रूपान्तरण मात्र मानते हैं और सारे उत्तरदायित्वों के आदान-प्रदान की घोषणा करते हैं, उन्हे एक दैवी आभा से प्रकाशित कर देता है। कीर्तिजैन यह संकेत करती हैं कि ईश्वर की इस तस्वीर पर ईसाई धर्म दर्शन का प्रभाव है। ई.वी.आर. का कहना है कि कृष्णरूप का इस तरह ईसारूप में विकसित होना भारती के दुचित्तेपन के एक कौतूहलजनक आयाम को उद्घाटित करता है। भारती की द्विविधा यह है कि जहां वह समस्त सर्वव्यापी शक्ति संरचनाओं पर अविश्वास करते हैं वहीं दूसरी तरफ पौराणिक आख्यान का उपयोग यह दर्शाता है कि भारतीय मानस/अनुभव का एक हिस्सा ऐसा भी है जो इन सारभूत संरचनाओं का समर्थन करता है। अन्धा युग अवसाद और अविश्वास का नाटक है, परन्तु नाटक का पुराणबद्ध ढांचा राष्ट्रीय परिपे्रक्ष्य मे मोहभंग के इस केन्द्रीय अनुभव को व्यक्त भी करता है और उसका प्रतिरोध भी करता है। उसी तरह, जैसे कृष्ण के चरित्रचित्रण के माध्यम से भारती जिस बात की पैरवी करते हैं, उसका विरोध भी करते हैं।

यहां यह जान लेना उपयुक्त होगा कि चालीस के दशक के अन्त तक पश्चिम में आधुनिकतावाद की प्रेरणाशक्ति समाप्तप्राय थी। भारत में टी. एस. इलियट की अध्ययनीयता की समीक्षा करते हुए पी. पी. रवीन्द्रन ने यह कहा है कि भारत में टी. एस. इलियट की स्थिति उस समय मजबूत हुई है जब पश्चिम में उनका प्रभाव काफी कुछ क्षीण हो चला था। इलियट के अधिकतर भारतीय अनुवादक, कवि थे, जैसे हिन्दी में धर्मवीर भारती और मलयालम में अय्यप्पा पणिकर। यद्यपि आधुनिकतावादी काव्यात्मक संवेदना पर इलियट का प्रभाव विस्तृत अध्ययन का विषय है तथापि इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि भारतीय कवियों ने पहले के ऐहिक इलियट और बाद के धार्मिक इलियट के बीच फर्क किया है और साथ ही एक ही कवि में दो भिन्न और विपरीत अनुभव-वृत्तियों की उपस्थित ने इन्हें मुग्ध भी किया है। यह बेमतलब नहीं कि भारती के अन्धायुग में इहलोक और पुण्यलोक में संगति बैठाने का प्रयास किया गया है। मराठी कवि मर्डेकर पर इलियट के प्रभाव का उल्लेख करते हुए चंध्राशेखर जहांगीरदार ने अपने निबन्ध ‘मर्डेकर ऐन्ड टी. एस. इलियट’ में कहा है कि जिस तरह से मर्डेकर ने अतीत और वर्तमान, पुराण और इतिहास तथा संतकाव्य और आधुनिकतावाद के बीच संवाद और सम्बन्ध कायम किया है, उस पर इलियट की बौद्धिक छाप है।

भारतीय कवियों द्वारा इलियट का स्वागत आगे चलकर 1950 के दशक में यूरोपीय अस्तित्ववादी कवियों यथा सार्त्र, बेने, कामू और काफ्का के सत्कार से मंडित हुआ। भारती के अंधायुग में युयुत्सु की आत्महत्या और अश्वथामा का अविवेकी हत्यारापन कुछ अस्तित्ववादी सवाल उठाते हैं। परन्तु भारती इन सवालों को उनकी परिणति तक इसलिए नहीं पहुंचा पाते क्योंकि वह स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के अस्तित्ववादी दृष्टिकोण को अपने नाटक के केन्द्र में नहीं स्थापित कर पाए। वस्तुतः हताशा का जो मनोभाव, निजता के संकट से उपजता है वह पणिकर की कविता में अधिक स्पष्टता के साथ दिखाई पड़ता है।

सितम्बर 1960 में प्रकाशित कविता ‘कुरूक्षेत्रम’ में पणिकर ने भगवत गीता की आरम्भिक पंक्तियों को सुभाषित की तरह प्रयुक्त किया है। कुरूक्षेत्र का यह रूपक स्व को एक संघर्षस्थली के रूप में प्रस्तुत करता है। इसके पूर्व 1950 में टी. एस. इलियट पर प्रकाशित एक लेख में पणिकर ने जोर देकर यह कहा था कि रूप और छन्द की बजाय भावानुकूल लय और अनुनाद कविता की रचना करते हैं। पणिकर के अनुसार, एक लेखक के लिए यह जरूरी है कि वह अपने वैयक्तिक और सार्वजनिक स्व को, दिग्काल से बंधे संसार के सापेक्ष सत्यों की समग्रता के भावनात्मक बोध के साथ, समन्वित करे। आगे आधुनिक मलयाली कविता के बारे में लिखते हुए पणिकर कहते हैं कि कवि की विचारधारा कविता की वाक्यरचना में मूर्त होती है। हर कविता का अपना एक सच्चा प्रामाणिक रूप होता है जिसे अंतर्वस्तु से स्वतंत्र होकर विचरने वाले किसी छन्द के अनुरूप नहीं ढाला जा सकता है।

ई.वी.आर ने पणिकर की कुछ पंक्तियों के अंगे्रजी अनुवाद के माध्यम से उनके मानस की प्रस्तुति की है। जीवन की जटिलता के सम्मुख सारे दर्शन व्यर्थ हैं। पणिकर बिलबिलाती, झगड़ती भीड़ के आधुनिक यथार्थ के बाद शांत और सुरम्य वातावरण भी रचते हैं। रूमानी भावनाओं की शब्दावली को कुछ इस तरह पुनर्गठित करते हैं कि रूमानियत की विश्वदृष्टि को प्रश्नांकित किया जा सके। महापौरूष के आख्यानों के जरिए महापौरूष की अवधारणाओं पर सवाल उठाते हैं। स्पष्ट है कि अनुरोध और प्रतिरोध का यह द्वंद कवि और उसके संसार के बीच एक दुचित्तेपन का आभास देता है।

‘मीनिंग्स चेन्ज विद चेन्जिंग क्वेसचन्स: फ्राम हाइ मॉडर्निज़्म टू द अवांगार्द’ के अन्तर्गत ई.वी.आर. ने कई भारतीय कवियों और कविताओं के माध्यम से भारतीय साहित्य में अवांगार्द के आर्विभाव और विकास का विवेचन किया है। ई.वी.आर. के अनुसार पौराणिकता पणिकर के कुरूक्षेत्रम की संरचना को बाहरी तौर पर ही स्थापित करती है। एक रणस्थली के रूप में कुरूक्षेत्रम का केन्द्रीय रूपक उस जनसंकुल संसार से सम्बन्धित है जहां बलात गढ़ा गया संश्लेषण व्यक्ति के स्व के विरूद्ध एक संकट बन कर आता है। यह वह समय था जब सामाजिक आन्दोलनों का रूपान्तरण नौकरशाही के संस्थापन में हो रहा था। नवोदित राज्य में शक्ति का केन्द्रीकरण और लोकप्रिय आन्दोलनों के नौकरशाही का उपकरण बन कर अपभ्रष्ट हो जाने के कारण एक ऐसा वैचारिक संकट उत्पन्न हो गया, जिससे शुरूआती दौर के आधुनिकतावादी कवियों ने कला की स्वायत्तता का दावा करके निपटना चाहा।

पीटर बर्जर की किताब ‘थ्योरी ऑफ़ अवांगार्द’ में इस मत की वकालत की गई है कि आधुनिकतावाद को, परम्परागत लेखकीय तकनीकों पर हमला समझा जाए और अवांगार्द लेखन को कला के संस्थानीकरण पर किया गया प्रहार माना जाए। पीटर बर्जर की उक्त किताब की भूमिका में जोखेन शुल्टे-सास टिप्पणी करते हैं कि एक बुर्जुआ समाज में कला की स्थिति उभयभावी और डांवाडोल होती है। एक तरफ आधुनिक समाज की शास्त्रीय-रूमानी कला समाज मे व्याप्त अजनबीयत का विरोध करती है और भविष्य में कुछ आदर्शों की प्राप्ति करना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ चूंकि यह कला पृथक और स्वायत्त होने का दावा करती है इसलिए वह समाज में न्यस्त और व्याप्त अभावों का निरा मुआवजा अदा करके वास्तविक संघर्ष से किनारा कर लेती है। इस तरह से कला यथास्थिति का प्रतिरोध करती है और पोषण भी। वस्तुतः आधुनिकतावादी या सौन्दर्यवादी कला की प्राधानिक विशिष्टता यह है कि यह अपने ही साज़ सामान पर ध्यान बटोरने में लगी रहती है। भारती और पणिकर की आधुनिकतावादी रचनाएं अपनी शैलीगत  विशिष्टताओं की ओर ध्यान खींचती हैं। यहां भाषा स्वयं में एक मूल्य हो जाती है। सौंदर्य क्षेत्र को सामाजिक यथार्थ से स्वतंत्र रूप से परिभाषित करने के कारण उच्च आधुनिकतावाद उस तर्ज और अन्दाज को नहीं समझ पाया जिसके तहत कला एक बुर्जुआ समाज में क्रियाशील थी। इसका एक कारण यह भी था कि पूर्वअवांगार्द काल में कला के संस्थान को उतनी पर्याप्त ऐतिहासिकता के साथ परिभाषित नहीं किया गया था जो आधुनिकतावादी कलाकार को उसके दृष्टिपथ पर साफ-साफ दिखाई पड़ सके।

बीसवीं सदी के छठे और सातवें दशक में अवांगार्द लेखन ने भारतीय कविता में अपनी उपस्थिति का अहसास करया। महत्वपूर्ण बात यह है कि इसी अवधि में गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता की क्रांतिकारी सम्भावना का मूल्यांकन हुआ। दलित कविता की सुगबुगाहट इसी समय से हुई। इस काल में मलयालम, हिन्दी और मराठी के अनेक लेखकों ने कला के संस्थानीकरण की अवधारणात्मक समझ विकसित की। सौन्दर्यपरक आधुनिकतावाद से अवांगार्द अथवा टेरी ईगलटन के शब्दों में ‘क्रांतिकारी आधुनिकतावाद’ की ओर हुए इस बदलाव को अनेक कविताओं के नक्शे-कदम पर चलकर समझा जा सकता है।

गोकि ई. वी. रामकृष्णन ने हिन्दी, मराठी और मलयालम कविताओं के माध्यम से ही आधुनिकतावाद की पड़ताल करने की मंशा शुरू में ही जाहिर कर दी थी, तथापि इस अध्याय में उन्होंने गुजराती के सीतान्शु यशस्चंद्रा की कवितावली जो मगन नाम के एक चरित्र के बारे में है, की विस्तृत चर्चा की है। मगन की अषक्त और अनायकोचित मुद्राएं मध्यवर्गीय मूल्यों की आलोचना और उपहास करते हुए शहरीपन के बेहूदेपन और भयावहता को उजागर करती है। (ई.वी.आर. ने निसीम इज्कील और मीनाक्षी मुखर्जी द्वारा अंग्रेजी मे अनुदित ‘मगन्स इन्सोलन्स’ नामक कविता मे से कुछ उद्वरणों का प्रयोग किया है जिसका पदच्छेद मैंने हिन्दी में किया है।)

यह कविता मगन की इस घोषणा के साथ आरम्भ होती है कि

वह जीना चाहता है। इस बात से गुजराती विद्वज्जन भौचक्के रह जाते हैं क्योंकि उन्होंने सदैव साहित्य को जीवन से अलग करके देखा है। वे मगन से कहते हैं कि वह साहित्य के पवित्र मंदिर को छोड़ दें। ऐसा कहते ही एक चमत्कार हुआ। सरस्वती देवालय से निकली और बोली जहां मगन जाएगा वहीं वह जाएगीं। उनके पीछे-पीछे प्रयोग देवी, सुश्री यथार्थ सब उस देवालय को छोड़ने को आमादा हुईं। मजबूरन विद्वज्जन ने कहा अरे! विध्नक ठहर और उस कोने में सड़। लेकिन मगन तो मगन ही है, उसने कहा कि वह प्यार करना चाहता है। इस पर उसे स्टेट बैंक की तिजोरी के सामने खड़ा कर दिया जाता है और उसे प्यार के करारे ‘बंडल‘ दिखाए जाते हैं, किन्तु मगन कहता है कि यह प्यार नहीं है। तब उसे जुतियाने और गरियाने वाली भाषा में पूछा जाता है कि अबे यह प्यार नहीं है तो क्या है? सारे बडे़ लोगों ने, पुरस्कार विजेताओं और पदकधारियों ने इसी स्त्रोत से अपनी कहानियों, कविताओं और नाटकों के लिए प्यार लिया है। अन्ततोगत्वा एक दिन मगन को पुरस्कार मिलता है और मंच उससे अपेक्षा करता है कि मूर्ख मगन भी कुछ कहे तो वह कहता है, (पुरस्कार प्राप्त करने के बाद) मैं जीना चाहता हूं, मैं प्यार करना चाहता हूं, मैं एक कविता लिखना चाहता हूं।

यहां यह उल्लेखनीय है कि अवांगार्द लेखन पूर्ववर्ती लेखकीय कला को अमान्य नहीं करता है, वह तो कला की उस संस्थानकता पर सवाल उठाता है जो जिन्दगी की जद्दोजहद से अलग है। शास्त्रीय आधुनिकता का एक लक्ष्य यह है कि वह मानवता, सत्य और आनंद जैसे मूल्यों को जीवन से बाहर कर कला की कक्षा में स्थापित कर देती है। सीतांशु की आपत्ति भी यही है कि इन मूल्यों को किसी आदर्श लोक में कैद न किया जाए। वस्तुतः धर्मवीर भारती और अय्यप्पा पणिकर ने जिस प्रकार जीवन के वास्तविक व्यवहार से कला को स्वतंत्र किया, उसी से वह रास्ता निकला जिसकी वजह से अवांगार्द लेखन ने यथार्थ का आलोचनापरायण बोध कराया।

सितांशु की पूर्वोक्त कविता में सामान्य भाषा का ओज है। बीसवीं शती के छठे और सातवें दशक में दलित कवियों ने अत्याचार और शोषण के विरूद्ध कविता की सामान्य भाषा को नए आयाम दिए। दलित कवि नामदेव ढसाल के बारे में दिलीप चित्रे लिखते हैं कि ढसाल ने यह दिखाया कि भावात्मक ऊर्जा को संघटित करने और उसे व्यक्त करने के लिए आक्रोष को तर्जोअंदाज की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

प्रतिवाद को स्वर देने वाले कवियों में शायद ढसाल अकेले ऐसे कवि हैं जो अंडरवर्ल्ड (अधोलोक) के बारे में एक अंतरंग व्यक्ति की तरह बात करते हैं। वह इस नरक के बारे में किसी बुर्जुआ पर्यटक की तरह नहीं बोलते वरन इसकी तमाम ध्वनियों को व्यक्त करते हैं। यहां यह याद रखने योग्य है कि भारत में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया संदर्भयुक्त से संदर्भमुक्त की ओर गतिमान रही है, जैसा कि धर्मवीर भारती और अय्यप्पा पणिकर के पाठ से पता चलता है कि उनकी रचनाएं सार्वभौमिक और शाश्वत पर कुछ अधिक ही बल देती हैं। हिन्दू पौराणिक आख्यानों के उपयोग के फलस्वरूप उनकी रचनाओं से जो संकेत उभर कर आते हैं वह एक सर्वभारतीय राष्ट्रवादी विमर्श की पुष्टि करते हैं जबकि स्वयं उनकी अनुभवसामग्री ऐसे किसी भी वैधीकरण (अभिषेक) का विरोध करती है। दलित लेखक जन्म, जाति, लिंग और धर्म के सन्दर्भों पर बल देते हैं क्योंकि एक दलित, संस्कृति तथा उसके सामाजिक बोझ और अपने दलितपन को अलग करके नहीं रह सकता है। यह सवाल ‘मैं कौन हूं‘ एक दलित के लिए कोई तत्वज्ञानद सवाल नहीं है बल्कि आवश्यक रूप से राजनीतिक है। हिन्दू पौराणिकता में जिस तरह का  आदर्शीकृत लावलश्कर है वह वास्तविक मानवीय मानकों पर दुःख और पीड़ा की अभिव्यक्ति में बाधा पहुंचाता है। अतः यह अकारण नहीं है कि वाल्मीकि को संबोधित एक कविता में दलित कवि दया पवार उनके जन्म की विपरीत परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए यह पूछते हैं कि रामराज्य की प्रशंसा करते समय क्या उन्हें शूद्रों की चीख सुनाई नहीं दी। इस महाकवि को महाकवि कैसे माने? यदि एक भी पंक्ति वह इस उत्पीड़न के विरूद्ध लिखते तो हम उनका नाम छाती पर लिख लेते।

अम्बेडकर द्वारा 1956 में बौद्ध धर्म को ग्रहण करना दलित साहित्य के उदय के लिए एक बड़ी और महत्वपूर्ण घटना थी। एक ऐसी सामाजिक पहचान का वरण, जिसका गठन पारम्परिक और प्रचलित हिन्दू शास्त्रीयता से बाहर हुआ हो, निष्चय ही साहित्य पर अपेक्षित प्रभाव डालने वाली थी। दलित साहित्य का अवांगार्द रूप इसी घटना के बाद प्रकट हुआ। पुराण से इतिहास की ओर जाने वाले दलित साहित्य में समकालीन इतिहास की पुनर्रचना एक ऐसी भाषा में की जाती है जो उच्चआधुनिकतावाद के अभिजात्यवादी मुहावरे को स्वीकार नहीं करती है। दया पवार की कविता ‘बुद्ध’ में कवि, बुद्ध को अजन्ता और एलोरा की गुफाओं में नहीं देखता है वरन झोपड़ी से झोपड़ी तक चलते हुए और लोगों के दुःख हरते हुए देखता है।

आधुनिकतावादी कविताओं के समग्र मूल्यांकन के लिए उच्चआधुनिकतावाद और अवांगार्द लेखन के विभेद को समझना आवश्यक है। आधुनिकतावाद के शुरूआती दौर में उच्च आधुनिकतावाद अथवा सौन्दर्यात्मक आधुनिकतावाद ने मनुष्य की एक ऐसी अमूर्त अवधारणा प्रस्तुत की जिसमें एक शानदार राष्ट्रीय वितान के तले वर्ग, जाति, धर्म, क्षेत्र और लिंग के भेद ढंक जाते हैं। पौराणिकता की प्रणाली ही ऐसी है कि वह जीवन को उसकी ऐतिहासिक अंतर्वस्तु से निःशेष करते हुए, व्यक्तिगत अनुभव को राजनीतिरहित कर देती है। समाज के दलित और वंचित वर्गों के लिए स्वतंत्रता और अस्मिता की तलाश इतिहास से आरम्भ होती है। बीसवी सदी के पांचवे और छठे दशक में प्रवेश के समय भारतीय आधुनिकतावादी यूरोपीय आधुनिकतावादियों से प्रेरित थे, खास तौर से फ्रांसीसी सिम्बालिस्ट से तथा इलियट और पाउन्ड से। इसके बाद के भारतीय अवांगार्द कलाकार लोक प्रेरणा हेतु लातीनी, अमरीकी और अफ्रीकी लेखकों की ओर देखते थे। इस परिवर्तन के पीछे यह अहसास था कि वे तीसरी दुनिया के वासी हैं और यूरोपीय ढांचा उनके लिए कारगर नहीं है क्योंकि उत्तर औपनिवेशिक काल की अपेक्षाओं के तहत उन्हें अपनी सामाजिक अस्मिता को पुनर्परिभाषित करना है। अवांगार्द लेखक को राष्ट्रीय एजेन्डे की अपर्याप्तता और सीमा दिख रही थी।

छठे दशक के अन्त तक औपचारिक शिक्षा के प्रसार के कारण, शिक्षा से सुलभ हुई सामाजिक गतिविधियों में समाज के नए वर्गों का प्रवेश हुआ। चूंकि इन नवशिक्षित वर्गों का जीवनानुभव प्रचलित आभिजात्य मानदण्डों से मेल नहीं खाता था, इसलिए इस काल के लेखकों ने साहित्यिक भाषा और सामान्य भाषा के अंतर को ध्वस्त करते हुए पाठक और पाठ के रिश्ते को नए सिरे से ढाला। खासतौर से तलछट के संसार को अभिव्यक्ति देने वाली नामदेव ढसाल की भाषा। ढसाल ने एक अद्भुत जारज बोली का प्रयोग किया जिसके द्वारा उन्होंने उस  विशिष्ट और अनुभवसिद्ध स्थितियों को देखा-परखा जो उस स्थल और समय से वास्ता रखती थीं, जिनकी अच्छी तरह से शिनाख्त की जा सकती थी।

मलयालम की अवांगार्द कविता में ईसा और बुद्ध समकालीन इतिहास के दुःख-दर्द को संप्रेषित करने वाले केन्द्रीय रूपकों की शक्ल अख्तियार कर लेते हैं। चूंकि मलयालम में ईसा सम्बन्धी गद्य लेखन का अच्छा-खास इतिहास रहा है इसलिए इस परम्परा के गद्य की पद्यात्मक संभावनाओं की खोज के. आर. रामकृष्णन, के. जी. शंकर पिल्लई और के. सच्चिदानंदन की अनेक कविताओं में की गई है। जहां उच्च आधुनिकता के कवि अय्यप्पा पणिकर के ‘कुरूक्षेत्रम्’ में पद्यात्मक वाक्य-रचना का अनुनादी संगीत है वहीं छठे और सातवें दशक के अवांगार्द लेखन की रचनात्मक संरचना अधिक गद्यात्मक है। यह गद्यात्मकता उस जैविक एवं व्युत्पत्तीय दृष्टिकोण को अस्वीकृत करती है जिसके तहत कविता की एक स्वप्रयोजनपरक दुनिया को मान्यता दी जाती है। मनुष्य की दुःखद नियति की बौद्ध अवधारणा अथवा आत्मकथात्मक स्व पर बल देने वाली गद्यात्मकता का वहन करता हुआ टुकड़ा-टुकड़ा यथार्थ, स्थानीय बोलचाल की भाषा में या संकर जनभाषा के द्वारा अवांगार्दी भारतीय कविता की वाक्य-रचना में प्रवेश करता है। इस संदर्भ में के. जी. संकर पिल्लई की लम्बी मलयालम कविता ‘बंगाल’ (1972) का उल्लेख किया जा सकता है। यहां बंगाल उस वामपंथी क्रांतिकारी चेतना का द्योतक शब्द है जो इस अवधि में व्यवस्थावादी शक्तियों के विरूद्ध लामबन्द हो रही थी। यह कविता, धृतराष्ट्र का नाटकीय एकालाप है जिसमें उसकी अन्धता उस आत्म-विभाजन को रेखांकित कर रही हैं जो छठे दशक के अंतिम वर्षों में और सातवें दशक की शुरूआत में सतह पर आ गई थी। चरित्र रूपांतरण के द्वारा धृतराष्ट्र पुरानी व्यवस्था का संरक्षक बन कर प्रकट होता है और क्रांतिकारी आन्दोलन के प्रतिनिधि संजय से पूछता है बंगाल की क्या खबर है? यह कविता जोड़-जाड़ (मोंताज) की विधियों से गुजरती है जिसमें संष्लेषण के प्रयासों को नकारा गया है। यह जोड़-जाड़ विभक्तमना भारतीय समाज की अभिव्यक्ति है। अन्धा राजा धृतराष्ट्र उस विजन की असफलता का साररूप है जो एक बहुलतावादी समाज की जमीनी हकीकतों को नहीं देख पाया। इस कविता में भारती के अन्धा युग के पौराणिक रूपक को भारतीय समय की राजनीतिक अफरा-तफरी के संदर्भ में इतिहास के पन्नों पर फिर से रचा गया है।

हिन्दी के श्रीकान्त वर्मा की कविताओं में, खास तौर से उनकी मगध श्रृंखला की कविताओं में इतिहास उन रूपकों को उपलब्ध कराता है जो औपनिवेशिक संस्कृति के अवषेषों से पीडि़त आत्मबोध की जटिलता को उधेड़ने और खोलने का काम करते हैं। पराजय और पलायन के प्रतिबिम्ब इन कविताओं को कोंचते रहते हैं। विनय धारवड़कर ने वर्मा की कविता ‘खैबर‘ के बारे में कहा है कि ‘खैबर’ का जिज्ञासु-व्यक्तित्व संदेही स्वभाव का है, यहां तक कि उसमें अनास्था का भी कुछ तत्व है। वह उस इतिहास के प्रति कड़वाहट और क्रोध से भरा हुआ है जिसे वह परे ढकेलना चाहता है, वह एक स्थानीय क्रांतिकारी है जिसे प्राचीन और आधुनिक इतिहास ने जीत लिया है। ई.वी.आर कहते हैं कि ‘खैबर’ के बारे में की गई उक्त टिप्पणी ‘मगध’ श्रंखला की कविता में वर्णित खोज और तलाश की केन्द्रीय विषयवस्तु पर भी लागू होती है। खैबर में कवि पूछता है कि जब हर तरफ दुःख और द्वन्द है तो यह नए शिलान्यास क्यों किए जा रहे हैं।
मगध में कवि कहता है;

तुम भी तो मगध को ढूंढ रहे हो
बंधुओं
यह वह मगध नहीं है
तुमने जिसे पढ़ा है किताबों में,
यह वह मगध है
जिसे तुम
मेरी तरह
गंवा चुके हो

वर्मा की कविताओं में समकालीन यथार्थ से व्याकुल होने का सतत भाव है। उनकी कविताओं में अतीत की गर्त में खोए हुए राज्यों मगध, कलिंग, उज्जैन, हस्तिनापुर और कोसल में कुछ ऐसी अनोखी और पुरावृत्तीय आभा है जो किसी मुद्राशास्त्रज्ञ (न्यूमिसमैटिस्ट) के संग्रह में होती है। किन्तु वर्मा की कविता में सामाजिक दिशाभ्रम की प्रतीति के साथ कोई ऐसा आदर्शवादी आग्रह नहीं जुड़ा है जो उनकी तलाश की प्रतिगामी रूझान पर रोक लगा सके। वोले सोयिन्का के शब्दों में कहें तो ‘एक रचनात्मक सरोकार जो वास्तविकता की संकल्पना या विस्तार, शुद्ध-विशुद्ध आख्यान के परे जाकर करता है’ के अभाव में वर्मा की कविताएं उत्तर औपनिवेशिक समाज की थकान को ही केवल उजागर करती हैं। हालांकि यह बात अपनी जगह सही है कि यह थकान समकालीन भारत का एक गहरा यथार्थबोध है और इस सीमा तक वर्मा की कविताओं के स्वर प्रामाणिक रूप से भारतीय हैं। सामाजिक दिशाभ्रम की राजनीतिक अन्तर्वस्तु जिसका वह चित्रण कर रहे हैं, से वह भलीभांति अवगत हैं यह उनकी निम्न कविता की पंक्तियों में आने वाले इतिहास के बिम्बों में देखा जा सकता है।  तीसरा रास्ता नामक कविता मगध संग्रह से-

मगध में शोर है कि मगध में
शासक नहीं रहे
जो थे
वे मदिरा, प्रमाद और आलस्य के कारण इस लायक
नहीं रहे
कि उन्हें हम मगध का शासक कह सकें
लगभग यही शोर है।
अवन्ती में,
यही कोसल में,
यही
विदर्भ में
कि शासक नहीं रहे
जो थे
उन्हें मदिरा, प्रमाद और आलस्य ने
इस
लायक नहीं
रखा
कि उन्हें हम अपना शासक कह सकें
तब हम क्या करें?

इस क्षुब्ध प्रश्न के पीछे समाज की पुनर्संरचना करने की कवि की ताकत की सीमा और इससे उत्पन्न द्विविधा का भाव है। मलयालम में सच्चिदानंदन की अनेक कविताओं में सरोकार और मुठभेड़ के बीच की इस जमीन पर पैर रखने की कोशिश की गई है। उनकी कविता ‘बर्तोल्त ब्रेख्त और गौतम बुद्ध’ में कवि-नाटककार और संत के बीच एक चुनौतीपूर्ण मुलाकात दर्षाई गई है। ब्रेख्त- जानना चाहते हैं कि बुद्ध का ज्ञान भूख से मर रहे एक बच्चे के लिए क्या अहमियत रखता है? ब्रेख्त महसूस करते हैं कि पुराने उत्तर नए समय के लिए अनुपयोगी हैं क्योंकि कोई उत्तर सर्वकालिक नहीं होता। इसके प्रतिउत्तर में बुद्ध कवि को जीवक नामक भिक्षु की कहानी सुनाते हैं जो एक पागल हाथी पर चढ़ कर उसके कानों में अहिंसा का उपदेश उड़ेले दे रहा था। उस समय भला हो उस शिकारी का जिसने जीवक को रक्तरंजित निर्वाण से बचाया और साथ ही उन्हें जीवित रहने का रहस्य बताया। यहीं पर बुद्ध ब्रेख्त से कहते हैं कि ब्रेख्त जो कह रहे हैं वह अर्द्धसत्य है क्योंकि वस्तुतः बदलते सवालों के साथ उत्तरों के मायने बदल जाते हैं। अवांगार्दी लेखन के लिए बुद्ध की प्रासंगिकता स्पष्ट हो जाती है, यदि सन्दर्भनिष्ठ उत्तरों के प्रति उनके आग्रह को हम इतिहास की रेशा-रेशा  विशिष्टताओं की ओर लौटने की तरह देखें। वस्तुतः उत्तर देने वाले से उसकी व्याख्या की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। यह व्याख्या बदले हुए समय के पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष के हवाले कर देनी चाहिए।

उम्बर्टो इको के इस कथन कि विचारधारा वह विश्वास-व्यवस्था है जिसमें स्वयं का प्रतिवाद करने और वैकल्पिक विश्वास-व्यवस्था, की पहचान करने की जगह ही नहीं होती, के साथ ई. वी. रामकृष्णन, मुक्तिबोध के दरवाजे पर ‘द अनअचीव्ड अब्सोल्यूट एक्सप्रेशन‘ एन्ड द मॉर्डनिटी ऑफ़ मुक्तिबोध’ कहते हुए आवाज लगाते हैं।

संक्रमणकालीन समाजों में अक्सर एक कवि से अपेक्षित होता है कि वह एक आलोचक की भूमिका भी निभाए। इस कवि-आलोचक को विचारों के उस वातावरण को तैयार करना पड़ता है जिसके तहत उसकी रचनाओं का पाठ सम्भव होता है। गजानन माधव मुक्तिबोध एक ऐसे ही कवि-आलोचक थे। समाज के अन्तर्विरोध और सामाजिक व्यवहार के दोगलेपन के बारे में उनका आधारिक अनुभव हिन्दी कविता के प्रचलित रूपों और रूपात्मक संभावनाओं में अंटने वाला नहीं था। 1944 के ‘तारसप्तक’ में छपे उनके वक्तव्य में उनके इस असन्तोष का स्पष्ट उल्लेख है।
आक्टेवियो पाज़ ने एक जगह कहा है कि आधुनिकता की माप-तौल औद्योगिक प्रगति से नहीं वरन् आलोचना और आत्मालोचना की क्षमता से होती है। मुक्तिबोध में आलोचना और आत्मालोचना की यही क्षमता, उनकी आधुनिकता और समकालीन रचनाकारों से उनकी भिन्नता को परिभाषित करती है। इससे इस बात की भी समझ पैदा होती है कि क्यों 1960 के बाद के कवियों पर उनका उल्लेखनीय प्रभाव पड़ा। काव्यरूपों को खोलने की प्रक्रिया में उन्हें उस काव्य परम्परा के आवश्यक तत्वों को विघटित करना पड़ा जिसने काफी हद तक उनके स्व और संवेदना का गठन किया था। ‘तारसप्तक‘ (1944) के वक्तव्य में वह हमें बताते हैं कि कैसे वह समकालीन हिन्दी कविता के सौन्दर्यवादी आदर्शों और मानवीय यथार्थ जैसा कि टालस्टाय और कुछ मराठी लेखकों की कृतियों में व्यक्त हुआ, के बीच, खींचा-तानी के शिकार होते रहे। लेखक की प्रवजन प्रवृत्ति पर बल देते हुए वह कहते हैं कि लेखक को शुद्धतः निजी और व्यक्तिगत से ऊपर उठना है ताकि वह आधुनिक संसार की बहुलता और विविधता का साक्षात्कार कर सके। मुक्तिबोध यह मानते हैं कि काव्यमय जीवन हमारे दैनिक जीवन का आवश्यक हिस्सा है इसलिए कविता के मूल्य सामान्य जीवन के मूल्यों का खंडन नहीं कर सकते हैं। सौन्दर्यात्मक सवाल इसीलिए प्रासंगिक हैं क्योंकि वास्तविक जीवन में उनकी आचरणात्मक हिस्सेदारी है। मुक्तिबोध ने उस समय यह लिखा कि प्रसाद, पन्त और महादेवी का जमाना बीत चुका है, उनकी कल्पनाशक्ति  और उनकी रहस्यात्मक अनुभूतियां पुरानी पड़ चुकी हैं।

उल्लेखनीय है कि मुक्तिबोध का विद्रोह पूरी हिन्दी काव्य परम्परा के विरूद्ध नहीं था बल्कि रूमानियत के उस संस्करण के विरूद्ध था जिसके बारे में एक अच्छी खासी उदारचरित संरक्षणवादी सहमति बन गई थी। टैगोर की गीतांजलि और भारतीय दर्शन में अहंब्रह्मास्मि की तत्वज्ञानी अवधारणा से प्रेरणा प्राप्त करते हुए छायावादी कवियों ने कविता को एक नया प्रगीतात्मक स्वर दिया जिसमें स्वरूप की और विश्वरूप की एकता पर बल दिया गया था। करीने शोमेर ‘महादेवी वर्मा ऐन्ड द छायावाद, एज़ ऑफ़ माडर्न हिन्दी पोएट्री’ में टिप्पणी करती हैं कि छायावादियों के लिए प्रत्येक मनुष्य में कुछ ऐसा है जिसे घटाया या कम नहीं किया जा सकता है और यह कुछ अनन्तः महत्वपूर्ण है।

वस्तुतः छायावादी कविता का सारतत्व यह है कि वह कविता के लिए एक अमूर्त, आत्मनिष्ठ और आभ्यांतरिक लोक की रचना करती है। इस सिलसिले में अपने निबन्ध ‘आधुनिक हिन्दी कविता में यथार्थ’ में महादेवी वर्मा और हरिवंश राय ‘बच्चन’ की तुलना करते हुए मुक्तिबोध कहते हैं कि महादेवी के आंसू हमें द्रवित नहीं करते हैं, जबकि बच्चन की ‘निशानिमंत्रण’ हमें रूलाती है, क्योंकि महादेवी ने दुःखवाद का कल्ट बना लिया जो उनकी कल्पना से उत्पन्न है, इसके विपरीत बच्चन स्वयं रोया है, खुद, तब वह दूसरों को रूला सका। छायावाद की शैल्पिक शब्द-योजना में यह कूवत ही नहीं रही कि वह नई संवेदना के आधारभूत अंतर्द्वंद्वों  को संप्रेषित कर सके। मध्यकालीन भक्त कवियों पर लिखे निबन्ध में मुक्तिबोध यह दर्शाते हैं कि किस प्रकार यह कवि व्यथा और उत्पीड़न के मानवीय यथार्थ से परिचित और प्रेरित थे। यह भी कि आधुनिक भारतीय कवि को भक्ति काव्य के माध्यम से वह पूर्व औपनिवेशिक परम्परा उपलब्ध है जो वंचित वर्गों के दुःख और उत्पीड़न से पहचान कायम कर चुकी थी। अलबत्ता, जब इस भक्ति परम्परा ने जात-पात से परे अपना प्रभाव क्षेत्र बनाया तब उच्चवर्ग ने जातिभेद को बल देने के लिए इस परम्परा का हरण कर लिया। वर्तमान में भी नए साहित्यिक आन्दोलनों की क्रान्तिकारी सम्भावनाओं का यही हश्र हो रहा है कि शासकवर्ग ने उन्हें यथास्थिति के हित में अनुकूलित कर लिया है। छायावाद और आधुनिकतावाद के साथ यही हुआ और मुक्तिबोध ने इस तरह की कथनी और करनी से विद्रोह किया।

जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी‘ पर मुक्तिबोध का प्रबन्ध, भारतीय कविता की एक केन्द्रीय परम्परा से उनकी पसन्दगी और नापसन्दगी का रिश्ता सामने लाता है। वह प्रसाद के कल्पनात्मक विस्तार, प्रवाह और उनकी आह्वानक ताकत से प्रभावित हैं। वह किसी शोध-विचार को काव्यरूप में प्रस्तुत करने की प्रसाद की योग्यता के भी कायल हैं लेकिन मुक्तिबोध प्रसाद की उस विश्वदृष्टि को खारिज करते हैं जो छायावादी कविता के आभिजात्यवादी और तत्वज्ञानी मिजाज का प्रतिनिधित्व करती है। मुक्तिबोध कामायनी के मनु को उन सामंती मूल्यों का मूर्तिमान रूप मानते हैं जो समकालीन इतिहास की समस्याओं के प्रति उच्चवर्ग के रवैये का बोध कराता है। मुक्तिबोध कहते हैं कि प्रसाद का मनु उसी सामाजिक वर्ग का है जिसका अंग और अंश प्रसाद हैं। कामायनी का मनु, वेदों का मनु नहीं है।

ई.वी.आर. के अनुसार प्रसाद की कामायनी उस प्रगीतात्मक और आत्मविष्लेषक स्व की आभ्यांतरिकता की खोज का प्रयास है जो अपनी निजता की स्थापना भव्य कल्पनाप्रवण प्रश्नों के द्वारा करती है। मनुष्य के उद्गम और उसकी पूर्णता की आकांक्षा की निजी पौराणिकी रच कर प्रसाद उस पीढ़ी को स्वर दे रहे थे जो कला और कल्पना की मूल्यवत्ता का सम्मान करती है और यह विश्वास करती है कि इनके द्वारा मानवीय सीमाओं के परे जाया जा सकता है, मानव जीवन को बदला जा सकता हैं। करीने शोमेर कहती हैं कि ‘कामायनी’ महज़ पुरावृतांतवाद का अभ्यास नहीं है, वरन् इसके जरिए एक ऐसी विश्वदृष्टि बनाने-चुनने की कोशिश की गई है जो आधुनिक हिन्दू बुद्धिजीवी के अन्तर्विरोधों का समाधान कर सके, ऐसा बुद्धिजीवी जो आधुनिक पश्चिम के इहलौकिक दृष्टिकोण और उस धार्मिक (पारलौकिक) दृष्टिकोण के बीच फंसा है जिसकी अब वह साख नहीं रही।

लगभग दो दशकों तक कामायनी से मुक्तिबोध की संलग्नता इस तथ्य को सत्यापित करती है कि मुक्तिबोध उन्हीं अन्तर्विरोधों की अनुक्रिया कर रहे थे जिनके समाधान के लिए प्रसाद प्रयत्नशील थे। मुक्तिबोध ने ‘कामायनी’ को किसी ऐतिहासिक या वैदिक काव्य के परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा वरन् उन्होंने उसे एक ऐसी कविता के रूप में देखा जो स्वैरकल्पना (फन्तासी) के माध्यम से समकालीन जीवन की समस्याओं को सम्बोधित कर रही है। चूंकि मुक्तिबोध ने अपनी कविता में इसी प्रकार की कल्पना का उपयोग किया था इसलिए वह यह जानते थे कि कामायनी की विस्तृत काव्यगत संरचना, वह आवश्यक कथाबद्ध ढांचा है जो कवि और उसकी कलावस्तु के बीच में वाजिबी फासला पैदा करती है। मुक्तिबोध यह आवश्यक समझते हैं कि कामायनी की कलागत विशेषता और उसके स्थापत्यिक गुण को उस प्रतिगामी और प्रतिक्रियावादी जीवन दृष्टि से अलग किया जाए जो रचना में मूर्तित होती है। चूंकि कामायनी छायावादी काव्योत्कर्ष का अहम प्रतिनिधित्व करने वाली रचना है अतः उसके अंतर में रूपात्मक प्रवीणता और वैचारिक आकाशीयता के बीच जो विग्रह है वह समकालिक इतिहास की चुनौतियों का सामना करने में हिन्दी की मुख्यधारा की काव्यपरंपरा की गहरी खिंची सीमाओं की ओर इंगित करता है। जहां प्रसाद विभाजित स्व के पुनर्संघटन के लिए भारतीय तत्वज्ञानी परम्पराओं की ओर देखते हैं वहीं मुक्तिबोध ऐसे उपचार को बेकार समझते हैं। अतः प्रसाद की कल्पना और मुक्तिबोध की कल्पना में कोई गहरा मेलजोल नहीं है।

अज्ञेय द्वारा समर्थित आधुनिकतावादी शैली की तर्कणा आंग्ल-अमरीकी साहित्यिक प्रतिष्ठान द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों पर आधारित थी। रिल्के, वैलेरी, ज्वायस, इलियट और यीट्स वगैरह ने कल्पना की स्वायत्तता और स्वांतः सुखाय कलादृष्टि पर बल दिया है। लेकिन बीसवी सदी के पांचवे दशक तक इस प्रकार की सौन्दर्याभिरूचि या उच्च आधुनिकतावाद भारतीय साहित्यिक गृहस्थी का अंग बन चुके थे ओर छठे दशक तक बहुत से भारतीय विश्वविद्यालयों ने इन्हें अपने पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया था। इस प्रकार आधुनिकतावाद की अंतर्हित मुक्तकारी शक्तियों को वशवर्ती बनाया जा चुका था और एक प्रतिपक्षी संस्कृति के रूप में उसकी वैधता का क्षरण हो चुका था। यह अनायास नहीं कि मुक्तिबोध ने रूमानियत के छायावादी रूप और उच्च आधुनिकतावाद के शास्त्रीकृत संस्करण से दूरी बनाने की कोशिश की क्योंकि यह दोनों ही सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में यथास्थिति की पुष्टि करने लगे थे। मुक्तिबोध ने अपने निबन्ध ‘नयी कविता और आधुनिक भाव-बोध’ में इस बात पर अफसोस जताया है कि हम आधुनिकतावाद की तस्वीर केवल यूरोप और अमरीका में देखते हैं, जिसके फलस्वरूप अनेक भारतीय कवि पश्चिमी काव्य को भारतीय परिधान में प्रस्तुत करने लगे हैं। मुक्तिबोध कहते हैं कि भारतीय कवियों को अफ्रीका, एशिया और लातीनी अमरीका के नवोदित समाजों से प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए जहां सामाजिक परिवर्तन और पुनर्रचना के लिए किए जा रहे संघर्ष ने एक नई चेतना पैदा की है।

मुक्तिबोध आश्वस्त थे कि यूरो-अमरीकन उच्च आधुनिकतावाद भारतीय यथार्थ के समन्वेषण के लिए भारतीय साहित्यकार को कोई उपयोगी ढांचा उपलब्ध नहीं करा सकता है। इस बात के दृष्टिगत कि मुक्तिबोध इन विचारों को पांचवे दशक में ही अभिव्यक्ति दे रहे थे, यह सम्भव है कि वह आधुनिक हिन्दी कविता में क्रान्तिकारी प्रवृत्ति का सचेत पोषण कर रहे थे।
पेंगुइन से प्रकाशित ‘न्यू राइटिंग इन इण्डिया’ में आदिल जस्सावाला मुक्तिबोध को अंग्रेजी में अनुदित करने में आई समस्या का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि उन्हें अनुदित करने में वही दिक्कत होती है जैसे डायलन टामस को किसी विदेशी भाषा में अनुदित करने में होती हैं। हिन्दी की ध्वनि का पूर्ण उपयोग करते हुए मुक्तिबोध की कविताएं हिन्दू पौराणिकता और लोक कथाओं से भरी पड़ी हैं। इसके साथ ही वह बेबीलोनिया, असीरिया और ग्रीक सभ्यताओं से भी कुछ न कुछ ग्रहण करते हैं।

उक्त स्थिति में स्वाभाविक है कि मुक्तिबोध छोटे प्रगीतात्मक उच्वारों की तुलना में लंबे तारतम्यात्मक वर्णनविधान को अधिक पसन्द करते थे क्योंकि इस तर्जे कलाम में लगातार विकसित होते हुए स्व को धारित करने लायक आख्यानात्मक अवकाष मिल जाता था। ‘तार सप्तक’ के द्वितीय संस्करण में उन्होंने कहा भी कि उनकी समस्या यह नहीं है कि अंतर्वस्तु की कमी है और रूप की समृद्धि है बल्कि समस्या यह है कि अंतर्वस्तु की बहुतायत है और रूप अपर्याप्त है। जुस्तजू इस बात की है कि कैसे अंतर्वस्तु की विविधता को समेट कर इसकी रूप रचना की जाए। अव्यक्त स्व की मनोवेदना मुक्तिबोध को जीवनभर सालती रही। उनकी ‘अंधेरे में‘ का अन्त निम्न पंक्तियों से होता है:

खोजता हूं पठार… पहाड़… समुन्दर
जहां मिल सके मुझे
मेरी वह खोयी हुई
परम अभिव्यक्ति अनिवार
आत्म – सम्भवा

व्यक्त होने और करने की यह कठिनाई उन औपनिवेशिक जटिलताओं से उपजी थी जो अभिव्यक्ति के रास्ते में अवरोध की तरह खड़ी थीं। इसका मतलब यह था कि मुक्तिबोध अपने अनुभवों के उस राजनीतिक मर्म के लिए जगह पैदा करें जिसके लिए मुख्यधारा की हिन्दी कविता में अब तक कोई गुंजाइश नहीं थी। मुक्तिबोध ‘नयी कविता और आधुनिक भाव बोध’ में कहते हैं कि हमारी जिन्दगियों की खंड-खंड अवस्था के कारण नई कविता केवल द्रुत-क्षणिक बिम्ब बना पाती है। मुक्तिबोध देख सकते थे कि उनके यंत्रणाग्रस्त अन्तस की गहरी बेचैनी एक विभाजित समाज की आन्तरिक हिंसा को प्रतिबिम्बित करती थी। ‘चांद का मुंह टेढ़ा है‘ क्योंकि चांद का मुंह टेढ़ा होना उक्त समाज की कुटिलता, दिशाभ्रम और अधोगति का प्रतीक है।

अपनी कविता में मुक्तिबोध प्रतिरोध की एक ऐसी चाक्षुष भाषा की संरचना करते हैं जो संसार का निरूपण करने वाले तमाम सुव्यवस्थित और तार्किक तरीकों को चुनौती देती है। इस सम्बन्ध में ध्यातव्य है कि रूमानियत की छायावादी शैली और उच्च आधुनिकतावाद के शास्त्रीय संस्करण दोनों में ही, उस रूपरीति और बुद्धिवाद को वरीयता दी गई की जो प्राचीन भारतीय दर्शन और नैतिकता की विरासत का समर्थन करते प्रतीत होते थे। किन्तु जिस प्रकार भक्ति आन्दोलनों ने प्राचीन, शास्त्रीय और आभिजात्यवादी विश्वदृष्टि के विरोध में एक प्रतिव्यवस्था खड़ी की थी वैसे ही मुक्तिबोध ने एक ऐसे क्रान्तिकारी आधुनिकतावाद के पोषण का प्रयास किया जो समकालीन इतिहास की विकृतियों को पकड़ने में उनकी घेरेबंद, व्यूहित कल्पना की मदद कर सके।
मुक्तिबोध की कविता के भूदृश्य में प्राचीन खंडहर, परित्यक्त सूनी बावलियां, निर्जन उबड़-खाबड़ पठार, गैर आबाद घाटियां और अन्धेरी संकरी गलियां हैं। इस जमीन की खौफनाकी खुद मुक्तिबोध के अस्तित्व के संकट का बयान करती है। नेमिचन्द जैन को भेजे गए उनके बहुत से खतों में, इस बैरी दुनिया में सम्मान के साथ जीने की उनकी इच्छा और संघर्ष को देखा-पढ़ा जा सकता है। इन खतों में वह अन्धेरा डरावना पाताल है जिसमें वह जी रहे हैं, जहां उनकी आत्मा पर सांप रेग रहे हैं, जहां मन की सारी दुरवस्थाएं प्रेत के आकार में तब्दील होती हैं। इस भूमिगत मनोभूमि का दुःस्वप्न अतिप्रकृत यथार्थवादी (सररिअलिस्टिक) बिम्बो के द्वारा उनकी कविता ‘ब्रह्मराक्षस’ में प्रकट हुआ हे। ‘तीसरा क्षण’ नामक निबन्ध में उन्होंने रचनात्मक कर्म में स्वैर अथवा विलक्षण कल्पना (फैन्टेसी) के तत्व पर विस्तार से लिखा है। वह कहते हैं कि काव्यकर्म का सर्वोच्च क्षण अथवा तीसरा क्षण उस समय घटित होता है जब सामाजिक यथार्थ से प्रेरित पूर्वोक्त कल्पना शब्दों में मूर्तित होती है और भाषा में इंद्रियसंवेद्य रूप ग्रहण करती है। यहां यह कहना कदाचित अप्रासंगिक न होगा कि रामविलास शर्मा ने पराविद्या में मुक्तिबोध की रूचि और जासूसी कथासाहित्य में उनकी दिलचस्पी को कुछेक उन प्रभावों में से माना है जिन्होंने मुक्तिबोध की कविता के मुहावरे को गढ़ा है।

यहां यह जानना भी उपयुक्त होगा कि यद्यपि अतिप्रकृत यथार्थवाद (सररियलिज्म) प्रथम विश्वयुद्ध के बाद यूरोपीय अनुभवों से उपजा था तथापि इसने लातिनी-अमरीकी और अफ्रीकी लेखकों को भी खूब प्रभावित किया था। ‘ड्राइंग द लाइन: आर्ट ऐन्ड कल्चरल आईडेनटिटी इन लेटिन अमरीका’ में ओरियाना बड्डे और वलेरी फ्रेज़र ने यह कहा है कि अनेक लातीनी-अमरीकी देशों में खोई हुई मासूमियत के निमित्त, अतीत की ललकित याद (नॉस्टेल्जिया ), प्राचीन कलाओं के रहस्यात्मक संकेत-सूत्र और नमूनागरी की रिवाज़ी ताकत, के कुछ राजनीतिक आयाम रहे हैं। यूरोप द्वारा इन देशों को जीतने और कब्जियाने से पहले का कालखण्ड यद्यपि इन देशों के वर्तमान निवासियों के जीवन के लिए अजनबी ही था तथापि लुप्त अतीत के प्रति उनकी जो कलात्मक आसक्ति थी, वह लातीनी अमरीकी संस्कृति की यूरोप की संस्कृति से अलग पहचान कायम करने में समर्थ थी। अतीत की इस सांदर्भिकता में औपनिवेशिक विग्रह की जानकारी अतर्निहित थी। इन स्रोतों की ओर लौटना दो बातों का परिचायक है, प्रथमतः कलात्मक प्रस्तुति की प्रचलित और मान्य परम्पराओं की अस्वीकृति और द्वितीयतः देशी संस्कृति की विशेष पहचान की दावेदारी।
मुक्तिबोध द्वारा कविता में अतिप्रकृत यथार्थवादी तारतम्यात्मकता का उपयोग भारतीय अनुभूति के पूर्व औपनिवेशिक स्रोतों की ओर लौटने का एक प्रयास है। मनोवैज्ञानिक स्तर पर समझा जाए तो यह देशी संस्कृति की आद्यरूपा छवियों की ओर वापस आना है। पश्चिम के पारम्परिक साहित्य या मुख्यधारा की भारतीय कविता की खुराक पर पले दिल-ओ-दिमाग को पूर्वऔपनिवेशिक भारत की यह स्वैरकल्पना कुछ विचित्र और विचलित लग सकती है, परन्तु इस कल्पना की मूल्यवत्ता पर बल देकर मुक्बिोध एक ऐसी चाक्षुष भाषा को गढ़ते हैं जो आधुनिकतावादी विरासत से हमारा आमना-सामना कराती है। बड्डे और फ्रेज़र यह बताते है कि तीसरी दुनिया के जो देश सांस्कृतिक स्वाधीनता की छोटी-बड़ी लड़ाइयों में फंसे थे उनके विद्रोह की आंतरिक भाषा को अतिप्रकृत यथार्थवाद वैधता प्रदान करता था। कविता ‘ब्रह्मराक्षस’ हमें यह समझने में मदद कर सकती है कि कैसे मुक्तिबोध भारतीय स्थिति की  विशिष्टताओें को अतिप्रकृत यथार्थवाद में संयोजित करते हैं। अनुष्ठान और स्वप्न की जादुई दुनिया का सृजन करके कविता एक प्रागैतिहासिक वातावरण का आह्वान करती है। ब्रह्मराक्षस एक पैशाचिक, पौराणिक और प्रातिभासिक आकृति है जो मुक्ति की आशा के बिना, प्राश्चित करने के लिए अभिशप्त है। कविता शुरू होती है शहर के उस ओर खंडहर की तरफ परित्यक्त सूनी बावड़ी से, जिसे घेर रखा है खूब उलझी हुई डालों ने। उसी बावड़ी की अबूझ सिहराती-सिहराती गहराइयों में बैठा हुआ ब्रह्मराक्षस अपनी पाप-छाया को धोने के लिए लगातार देह को साफ कर रहा है। पर यह मैल छूटती नहीं है। तो वह उच्चारता है कोई अनोखा स्तोत्र, कोई क्रुद्ध मन्त्रोच्चार अथवा उमड़ता है शुद्ध संस्कृत गालियों का ज्वार। अगर किसी तिरछी होकर गिरती हुई रवि-रश्मि के उड़ते हुए परमाणु उस तक पहुंचते हैं तो वह समझता है कि सूरज ने उसे सलाम भेजा है। अगर भूली भटकी चांदनी की कोई किरण बावड़ी की दीवार से टकराती है तो वह समझता है कि चंद्रमा ने उसे गुरूपद पर अभिषिक्त कर दिया है। ब्रह्मराक्षस ने सारी विद्या पढ़ ली है; सुमेरी -बैबीलोनी जनकथाओं से मधुर वैदिक श्रृचाओं तक, सारे सूत्र, छन्द मंत्र थियोरम, सब प्रमेयों तक और मार्क्स, एंजेल्स, रसेल, ट्वायनबी, हीडेग्गर, स्पेंगलर सात्र्र और गान्धी को आत्मसात कर इनका नया व्याख्यान करता हुआ वह अहर्निष नहाते हुए खुद से जूझ रहा है। अंधेरी सीढि़यों पर चढ़ते-उतरते और चोटिल होते हुए उसे लगता है कि बुरे और अच्छे के बीच के संघर्ष से भी उग्रतर है अच्छे और उससे अधिक अच्छे के बीच का संगर। दो असंगत संसारों के उलझे हुए गणित के रण में अंततः उसका अंत हुआ। इस अतिक्रांत अंतगति के समय में कवि उसका षिष्य होने की इच्छा व्यक्त करता है ताकि वह उसके अधूरे काम को पूरा कर सके और उसकी वेदना के स्त्रोत तक पहुंच सके।

निबन्ध ‘तीसरा क्षण’ में मुक्तिबोध कहते हैं कि भाषा एक सामाजिक परिसम्पत्ति है और हर शब्द के पीछे एक अर्थपरम्परा है जो सामुदायिक जीवन से जुड़ी हुई है। मष्तिष्क को अस्थिर करने वाले वित्रास को एक काव्यपदार्थ में, उसी कला द्वारा परिणत किया जा सकता है जो कला सामाजिक वैधता को अपना प्रतिमान बनाती हो। भावोन्माद और आत्मसंशय के पाताललोक से बाहर निकलने के लिए ब्रह्मराक्षस एक ऐसे गुरू की खोज में है जो उसे उक्त सामाजिक वैधता के संधान के लिए मुक्त कर सके। मुक्तिबोध की आधुनिकता इस तथ्य में निहित है कि वह आधुनिक भारतीय की निजता के संकट को एक बृहत्तर सामाजिक-राजनीतिक और ज्ञानमीमांसक संकट के अंग के रूप में देखते हैं।

मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ इस संकट की स्पष्टतर अभिव्यक्ति है। इस प्रसंग में एक घटना उल्लेख्य है। वर्ष 1962 में मुक्तिबोध की एक पुस्तक ‘भारत: इतिहास और संस्कृति’ को मध्य प्रदेश सरकार ने माध्यमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया था लेकिन पुस्तक तुरन्त ही विवादों का शिकार हो गई है और सम्पादकों तथा लेखकों के एक वर्ग ने भी इसका खासा विरोध किया। मुक्तिबोध को सफाई का कोई मौका दिए बिना सरकार ने पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया। इस घटना ने मुक्तिबोध को बहुत विचलित किया। हरिशंकर परसाई के अनुसार मुक्तिबोध ने इस सब को फासिस्ट शक्तियों के आर्विभाव के रूप में देखा। इसके अलावा मुक्तिबोध यह देख सके कि जिस विभाजित स्व के कारण अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति बाधित होती है वह वस्तुतः समाज की अंगभंग सांस्कृतिक संवेदना की उपज है।

‘अंधेरे में’ का लम्बा सिलसिलेवार आख्यान कवि के स्व को संघर्ष और द्वंद के क्षेत्र के रूप में चिह्नित करता है। सामाजिक दशा और मनःस्थिति से उत्पन्न भय और मुठभेड़ के रूपक कविता को कोंचते-कुरेदते रहते हैं। कवि के जीवन के अंधेरे में विचरने वाली एक अदृश्य आकृति लाल-लाल कुहरे के श्वास-प्रश्वास से भरी एक तिलस्मी खोह में रहती है। गजब है यह आजानु भुज, सौम्य-सुन्दर सन्देहार्थक आकृति।

वह रहस्यमय व्यक्ति
अब तक न पायी गयी मेरी अभिव्यक्ति है
पूर्ण अवस्था वह
निज-सम्भावनाओं, निहित प्रभावों, प्रतिमाओं की,
मेरे परिपूर्ण का अविर्भाव
हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह,
आत्मा की प्रतिमा

परन्तु यह अनभिव्यक्त स्व, उसका फटेहाल रूप, उसकी रक्त रंजित काया, ये सब, भय, पश्चाताप और दुश्चिंता की खोह में फंसे हुए तड़प रहे हैं। यहां यह याद करना प्रासंगिक होगा कि सरकारी नौकरी करने के सिलसिले में उन्हें अपनी वामपंथी प्रतिबद्धता को छिपाना पड़ा था। एक आविष्ट स्व जो रूग्ण परछाइयों के भीतर चला जाता है, एक प्रताडि़त स्व जिसके पीछे सत्ता पड़ी हुई है, एक ही कलाकार का रूप हैं, जो अपने विभिन्न स्वों को उस एकात्मकता में संघटित करने में असफल है जो परम अभिव्यक्ति को सम्भव बनाती है। कविता में अनेक स्थल ऐसे हैं जिनमें सड़कों और गलियों में हो रहे जनान्दोलनों के चित्र हैं और उन आन्दोलनों को निमर्मतापूर्वक कुचले जाने के दृश्य हैं। इन्हीं सड़कों को रौंदता हुआ गुजरता है, एक भुतहा जुलूस जिसमें हमकदम हैं प्रतिष्ठित पत्रकार, आबदार वर्दीधारी, प्रकाण्ड आलोचक और विचारक, जगमगाते कविगण और मंत्री, उद्योगपति और एक कुख्यात हत्यारा। यह जुलूस उस सामाजिक परिवेश के दुःस्वप्नात्क वैरभाव को सामने लाता है जिसमें कवि सांस ले रहा है। ऐसे वातावरण में अपनी बात कहना कितना मुश्किल और खतरनाक हो जाता है। अपनी बात कहने के लिए कवि को सारे मठ और गढ़ तोड़ने होंगे, पहुंचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार… तब कहीं मिलेगा झील के सुनील जल में कांपता हुआ अरूण कमल, परम अभिव्यक्ति के क्षण का वह प्रतीक जिसे कवि सारी उम्र खोजता रहा है। कवि की यह यात्रा उन मूल्यों को अस्वीकृत करती है जो समाज के मध्यवर्ग ने उस पर थोपे हैं। कविता के चौथे हिस्से में उस अपराध-बोध का स्वीकारोद्गार है जहां कवि इस सामाजिक अस्वस्थता का उत्स अपनी आत्मपरकता में भी पाता है। मुक्तिबोध ने यहां खुद को छेद-खोद डाला है-

लो-हित-पिता को घर से निकाल दिया,
जन-मन-करूणा-सी माँ को हंकाल दिया,
स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया,
भावना के कर्तव्य-त्याग दिये,
हृदय के मन्तव्य-मार डाले!
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,
तर्कों के हाथ उखाड़ दिए,
जम गए, जाम हुए, फंस गए,
अपने ही कीचड़ में धंस गए!!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में
आदर्श खा गए!
अब तक क्या किया
जीवन क्या जिया,
ज्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम

यह आत्मसमीक्षा, आधुनिकतावाद के पालक पोषक लक्षणों के विरोध का एक प्रयास है। कविता के एक अन्य हिस्से में कवि स्वयं को इस सामाजिक दुरवस्था के लिए जिम्मेदार ठहराता है। मुक्तिबोध बल देकर कहते हैं कि एक कवि के रूप में उनकी सच्ची पहचान किसी पृथक और निजी हैसियत में नहीं है वरन् सामूहिक-सामाजिक शक्ति के एक ऐसे अंग के रूप में है जो इतिहास को फिर से सक्रिय कर सकता है।

वस्तुतः ‘अंधेरे में’ उस आत्मिक शून्य के बारे में कही गई कविता है जो उदार मानवतावादी (लिबरल हयुमनिज़्म- बहुत मोटे तौर पर एक वह साहित्यिक अवधारणा जिसमें राजनीतिक प्रतिबद्धता पर बल नहीं दिया जाता है और मानव स्वभाव को नियत तथा सतत माना जाता है जिसके फलस्वरूप किसी साहित्यिक रचना को किसी कालखंड की सामाजिक-राजनीतिक कक्षा में स्थापित करने की आवश्यकता नहीं होती है। संक्षिप्त और मार्मिक ढंग से कहें तो यह पूछने की आवश्यकता नहीं है कि बन्धु आप की लोकेशन क्या है?) विचारधारा के ह्रदय में जगह बनाए हुये थी और जिससे बहुत से भारतीय बुद्धिजीवी प्रभावित थे। इससे अलग मुक्तिबोध कहते हैं;

कविता में कहने की आदत नहीं पर कह दूं,
वर्तमान समाज में चल नहीं सकता
पूंजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता,
स्वातन्त्र्य व्यक्ति का वादी
छल नहीं सकता मुक्ति के मन को, जन को।

उदार मानवतावादी वाग्मिता की सुविधा यह है कि एक उत्तरऔपनिवेशिक समाज में जो परस्पर–विरोधी आवेग जन्म लेते और पनपते हैं उनकी अनदेखी की जा सकती है और कुछ हद तक तथा कुछ जोर-जबरदस्ती के साथ उनमें परस्पर-अनुकूलता भी दिखाई जा सकती है। राज्यसत्ता से चोट खाए हुए मुक्तिबोध देख सकते थे कि इस तरह का छद्म मेल-मिलाप आगे चल कर व्यक्ति और समाज को छिन्न-भिन्न करने का काम ही करेगा। परम अभिव्यक्ति की खोज, उनका एक ऐसा प्रयास है जिसके जरिए वह स्वयं को अपने ऐतिहासिक सन्दर्भों की भौगोलिकी में स्थापित कर रहे थे। कविता के आखिरी हिस्से में वह बताते हैं;

इसीलिए मैं हर गली में
और हर सड़क पर
झांक-झांक देखता हूं हर एक चेहरा,
प्रत्येक गतिविधि
प्रत्येक चरित्र
व हर एक आत्मा का इतिहास,
हर एक देश व राजनैतिक परिस्थिति
प्रत्येक मानवीय स्वानुभूत आदर्श
विवेक-प्रक्रिया, क्रियागत परिणति!!

मुक्तिबोध के सामने यह बिल्कुल स्पष्ट है कि अव्यक्त निजस्व का प्रत्यादान (वसूलयाबी), परिवेश की  विशिष्ट यथार्थता और जिए गए जीवन के गुणावगुण की अनुभूति से ही होता है। मुक्तिबोध की आधुनिकता में, कला के इस कौशल की पहचान है कि कला, व्यक्ति और समाज के बीच मध्यस्थीय हस्तक्षेप करके अभिव्यक्ति के ऐसे प्रवाहशील मुहावरे को प्राप्त कर सकती है जहां सौन्दर्यशास्त्र और नीतिशास्त्र की समस्याओं में परस्पर अनन्यता नहीं होगी, जहां यह दोनों कोई द्विध्रुवीय संकल्पनाएं नहीं होंगी।

मैंने यह सोचा था कि इस प्रस्तुति में मैं अपनी ओर से कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि किसी भी किताब के बारे में यह बड़ी आसानी से कहा जा सकता है कि उसमें क्या नहीं है और क्या होना चाहिए तथापि दो-एक बातें पूछने का मन होता है। पहली यह कि, जब पौराणिकी के आह्वान को आधुनिकतावाद से जोड़ा गया तो क्या धर्मवीर भारती के साथ थोड़ा उल्लेख इस संदर्भ में दिनकर की प्रासंगिकता का होना चाहिए या नहीं। दूसरा यह है कि भारतीय पौराणिकता का आह्वान करना वही नहीं है जो ग्रीक या रोमन पौराणिकता का आह्वान है क्योंकि भारतीय पौराणिक परम्परा अभी भी जीवित है और किसी मृत परम्परा का पुरातात्विक, अकादमिक अवशेष नहीं है। इस अन्तर के काव्यात्मक प्रतिफलन को स्पष्ट करने का अवकाश होना चाहिये।

उक्त के अलावा ‘अंधेरे में’ गांधी की जटिल उपस्थिति के बारे में और पणिक्कर के ‘कुरूक्षेत्रम्’ में गांधी होने के दर्द की जो झलक है अगर उसके बारे में भी ई.वी.आर. कुछ कहते तो अच्छा होता।

इस किताब में अन्य ऐसे अध्याय हैं जिन्हें मैं प्रस्तुत नहीं कर सका। ‘द डायलॉजिक इमेजिनेशन इन मोड़ें मराठी दलित राइटिंग’। ‘द सर्च फार अ द्रविड़ियन पोअटिक: नेटीविज़्म- मॉर्डनिज़्म कन्जंक्ट इन मलयालम पोएट्री। ‘रिक्लेमिंग द पेरीफरल वायसेज़: द डिसीडेन्ट सेन्सीबिलिटी इन केदारनाथ सिंह पोएट्री। ब्लैक एक्सक्लेमेशन्स एन्ड सैवेज साइलेन्सेज़: द पोएट्री ऑफ़ दिलीप चित्रे। लिविंग ऑफ़ द फाल्ट लाइन: द पोएट्री ऑफ़ सच्चिदानंदन।

ई.वी.आर. की इस कृति में ग्रंथन का प्रयास बहुत अधिक दिखता है। उद्धरणों के प्रति लेखक का अतिरिक्त रूझान और कुछ स्थलों पर भाषा की सूत्रात्मकता के कारण आलोचना की सुगमता भी प्रभावित हुई है।

उपर्युक्त दो पंक्तियों के बावजूद मैं पुनः यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि मेरे द्वारा इस पुस्तक की प्रत्यालोचना का कोई प्रयास नहीं हुआ है। मेरा यह आलेख 243 पृष्ठों की ‘मेकिंग इट न्यू’ का न केवल संक्षिप्त वरन् आंशिक प्रस्तुतीकरण है जिसके कारण कुछ जरूरी कड़ियाँ मुझसे छूट गई हैं। इसके अलावा इस बात के भी दृष्टिगत कि कदाचित हिन्दी कविता में आधुनिकतावाद के उत्तरवर्ती लक्षणों, उच्च आधुनिकतावाद और अवांगार्द पर अन्य भारतीय भाषाओं की साहित्यधारा के परिप्रेक्ष्य में तुलनात्मक अध्ययन कम ही हुआ है, प्रो. रामकृष्णन के इस कार्य का समग्र मूल्याकन हिन्दी के अधिकारी, विद्वानों द्वारा किया जाना अपेक्षित प्रतीत होता है।

हरी चरन प्रकाश हिंदी के वरिष्ठ कथाकार हैं, तीन कहानी-संग्रह और एक उपन्यास प्रकाशित। लखनऊ में रहते हैं और उनसे +919839311661  पर  संपर्क संभव है।

साभार-पाखी, दिसम्बर, 2015

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One thought on “कविता की अवांगार्द परंपरा: हरी चरन प्रकाश

  1. maneesh dwivedi on said:

    Nice critical review of indian poetry my favorite storyteller . Where are poetry critics?

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