भाषा बहता नीर: प्रो. राजकुमार

औपनिवेशिक दौर में निर्मित ज्ञान के विभिन्न अनुषंगों का विगत वर्षों में गम्भीर अध्ययन तो किया गया और उसकी कमियों का भी यथोचित उल्लेख हुआ। लेकिन भाषाविज्ञान एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ औपनिवेशिक दौर में रचे गए ज्ञान का दबदबा अभी भी बहुत कुछ कायम है। औपनिवेशिक दौर में निर्मित भाषायी मानचित्र मुख्यतः इस तथ्य पर आधारित है कि आर्य भारत में बाहर से आए। इसलिए भारत में मुख्य रूप से दो भाषा परिवार बने जिन्हें ‘आर्य-भाषा’ परिवार और ‘द्रविड़-भाषा’ परिवार नाम दिया गया। आर्यों की दो शाखाओं की परिकल्पना की गई जिनमें से एक यूरोप की ओर चली गई और दूसरी भारत की ओर आ गई। यह माना गया कि दो शाखाओं में विभाजित होने से पहले ये एक ही तरह की भाषा का इस्तेमाल करते रहे होंगे। इसलिए उत्तर भारत की आर्य भाषाओं और यूरोप की भाषाओं में खोजने पर कुछ न कुछ सामान्य तत्व मिल जाएंगे। यद्यपि ‘इंडो-यूरोपियन’ भाषा परिवार के प्रणेता विलियम जोन्स ने माना कि भाषा के उस आदि रूप को खोज पाना मुश्किल है, जिससे इस परिवार की भाषाओं की उत्पत्ति हुई। लेकिन उत्पत्ति के किसी आदि स्रोत की कल्पना के सहारे हम उसके मूल रूप के समीप पहुँच सकते हैं। इस हेतु हमें सम्बद्ध भाषाओं के बाहरी प्रभावों को हटाकर उस भाषा के मूल रूप की खोज धातु और व्याकरणिक संरचना के आधार पर करनी होगी। इस तरह भाषा की एक आत्मपूर्ण संरचना की कल्पना की गई और ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान के सहारे उसके विकास के विभिन्न चरणों को रेखांकित किया गया। यह सही है कि उस दौर में भाषाओं के पारस्परिक मिश्रण के सहारे भाषाओं के विकास को व्याख्यायित करने वाले विद्वान भी थे। लेकिन तुलनात्मक भाषाशास्त्र का विकास इस तरह हुआ कि भाषायी मिश्रण को परवर्ती परिघटना समझ कर हाशिये पर धकेल दिया गया। कहा गया कि भाषाओं का ‘जेनेटिक संबंध’ प्रारम्भिक अवस्था का सूचक है और इसके जरिये भाषा के बुनियादी तत्वों को चिह्नित किया जा सकता है। भाषा की परिकल्पना उसके अमिश्रित बुनियादी तत्वों के सहारे व्याकरण की बुनियाद पर की गई। इस तर्क की निष्पत्ति यह है कि भाषा का मूलभूत आन्तरिक तत्व ही महत्वपूर्ण है और बाकी चीजें बहुत मायने नहीं रखती हैं। भाषायी वंशवृक्ष में एक ही परिवार की भाषाओं के मध्य इन्हीं मूलभूत तत्वों के आधार पर उनके सम्बंधों को समझा जा सकता है। इस हेतु दूसरे स्रोतों से आए शब्दों को पहचानना और उन्हें बाहर करना जरूरी माना गया। इस तरह भाषायी मिश्रण के औचित्य का ही निषेध कर दिया गया। स्पष्ट है कि भाषायी वंशवृक्ष के मध्य संबंध व्यवहार में आने वाली भाषा के आधार पर नहीं बल्कि उसके अमूर्तन के सहारे स्थापित किया गया। #लेखक 

The Saragossa Manuscript: Snapshots:

The Saragossa Manuscript: Snapshot

आरम्भिक आधुनिक भारत में भाषा और समाज

BY प्रो. राजकुमार

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उपनिवेशवाद ने दक्षिण एशिया को कैसे बदला, यह हम तब तक नहीं जान सकते, जब तक हमें ये न मालूम हो कि यहाँ क्या था, जिसे उसने बदला। #शेल्डन पोलक (2011: 19)

विलियम जोन्स के एक समान भाषा से लैटिन, ग्रीक और संस्कृत की उत्पत्ति के सिद्धान्त के पीछे ईसाई चिन्तन परम्परा की भूमिका हो सकती है। अम्बर्तो इको ने अपनी पुस्तक ‘सर्च फार परफेक्ट लैंग्वेज’ में इस परम्परा का उल्लेख किया है। उनके अनुसार यह कहानी बाइबल से शुरू होती है। विप्लव के बाद समूची पृथ्वी पर सिर्फ एक ही भाषा थी और सर्वत्र वही बोली जाती थी।

लेकिन इंसान ने अपने दम्भ में ईश्वर से होड़ लेने की ठानी और स्वर्ग तक पहुँचने के लिए मीनार बनानी शुरू की। मनुष्य के घमण्ड को चूर करने के लिए और इस तरह के मीनार के निर्माण की प्रक्रिया रोकने के लिए ईश्वर ने सोचा कि मुझे नीचे उतरना चाहिए और वहाँ पहुँकर उसने भाषा को इस तरह उलझा दिया कि वे एक दूसरे कि बात न समझ पाएँ……. इसीलिए इस मीनार का नाम ‘बेबेल’ पड़ा। ईश्वर ने समूची धरती की भाषा को तोड़ दिया और फिर उसे पूरी धरती की सतह पर बिखरा दिया।

विलियम जोन्स की परिकल्पना के अनुसार ग्रीक, लैटिन ग्रीक, फारसी और संस्कृत एक भाषा परिवार की भाषाएँ हैं और इस समूह की मूल भाषा संभवतः संस्कृत थी। फिर इसी के साथ यह बात भी चल निकली की चार-पाँच हजार वर्षों के अलगाव के बाद यूरोप के आर्यों का अपने बिछड़े हुए भारतीय आर्यों से मिलन हुआ है। अब यह जिम्मेदारी यूरोप के आर्यों की है कि वे अपने बिछड़े और पिछड़े हुए भारतीय आर्यों को उन्नत सभ्यता का पाठ पढ़ा कर सभ्य बनाएँ और समान उत्पत्ति के मूल स्रोतों को खोज निकालें। विडम्बना यह है कि इस समूची कहानी को उन्नीसवीं सदी की पढी़-लिखी जातियों ने हाथों-हाथ लिया। केशवचन्द्र सेन जैसे लोगों के कथन से इस तथ्य की पुष्टि होती है। अपनी हीनता ग्रंथि से मुक्ति पाने के लिए उन्हें यह सिद्धान्त बहुत आकर्षक लगा कि पश्चिमी सभ्यता के मूल स्रोत भारतीय हैं। इसी के साथ यह बात जोड़ दी गई कि भारतीय आर्य सभ्यता में कालान्तर में जो गिरावट आईं, उसका मूल कारण इस्लामी आक्रमण है। कहने का आशय यह है कि यह परिकल्पना औपनिवेशिक हितों के अनुकूल तो थी ही, तत्कालीन प्रबुद्ध भारतीयों को भी रास आ रही थी। (2006: 212-230) कहा जाता है कि हम जो चाहते हैं, वही खोज भी लेते हैं। इस प्रसंग में भी यही हुआ। उत्तर भारत की भाषाओं और यूरोप की भाषाओं में कुछ सामान्य तत्व खोज निकाले गए और उनकी बुनियाद पर ‘इंडोयूरोपीयन’ भाषा परिवार का महल खड़ा कर दिया गया। विडंबना यह है कि आज की तारीख में आर्यों के बाहर से आने और यहाँ आक्रमण कर अपना वर्चस्व स्थापित करने की सैद्धान्तिकी को निर्विवाद तथ्यों और तर्कों के आधार पर सिद्ध कर पाना मुश्किल है। यहाँ तक कि रोमिला थापर ने अपनी पुस्तक ‘द पास्ट बिफोर अस’ में इतिहास लेखन के एक विशेष दौर में निर्मित एक आख्यान के तौर पर इस समूची परिघटना का उल्लेख किया है। लेकिन इसे एक निर्विवाद तथ्य के रूप में नहीं रखा है। ‘इंडोयूरोपीयन’ भाषा परिवार की परिकल्पना को स्वीकार कर लेने पर हुआ यह कि भारत की कथित आर्य भाषाओं और यूरोप की भाषाओं के बीच तुलनात्मक अध्ययन के द्वारा सामान्य तत्वों को सामने लाने का प्रयास तो खूब हुआ, लेकिन भारतीय भाषाओं के बीच समानता और निरंतरता के तत्वों को देखने और उनके निहितार्थों को समझने की कोशिश लम्बे समय तक कम ही की गई।

टॉमस आर. ट्राटमान के शब्दों में

सबसे बुरी बात यह हुई कि भाषा-परिवार की इस सैद्धान्तिकी ने भारत के इतिहास को दो प्रजातियों के इतिहास के रूप में देखने की बुनियाद रख दी। इतिहास की बुनियादी शर्त के रूप में नस्ल की इस नई यूरोपीय परिकल्पना का भारतीय इतिहास की व्याख्या पर बहुत गहरा असर पड़ा। इसे ही मैंने भारतीय सभ्यता की नस्लीय सैद्धान्तिकी कहा है। इस सैद्धान्तिकी के अनुसार भारतीय सभ्यता की निर्मिति दो प्रजातियों के संघर्ष और उनके आंशिक मिश्रण से हुई। ये प्रजातियाँ थीं; गोरे और संस्कृत बोलने वाले आक्रांता आर्य और द्रविड भाषा बोलने वाले काले बर्बर मूल निवासी। इस शुरुआती संघर्ष से जाति-व्यवस्था की उत्पत्ति होती है। इस संघर्ष के परिणामस्वरूप पैदा होने वाली नई सभ्यता की केन्द्रीय संस्था जाति-व्यवस्था बनती है। यह दृष्टिकोण लम्बे समय तक भारतीय सभ्यता के इतिहास के महाख्यान के रूप में कायम रहा। अब जरूर इस महाख्यान की सच्चाई पर संदेह किए जाने और उसकी जाँच पड़ताल की शुरुआत हुई है। मैंने अन्यत्र दिखाया है कि इंडोयूरोपियन यानी भारोपीय और द्रविड़ भाषाओं के बीच मुठभेड़ को दो नस्लों की मुठभेड़ के रूप में व्याख्यायित करने के लिए उपलब्ध साक्ष्यों को कितना ज्यादा तोड़-मरोड़ कर पेश करना होगा! यही नहीं, सभ्यता को गोरी प्रजाति से और बर्बरता को काले लोगों के साथ तात्विक रूप से संबंद्ध करना बिल्कुल गलत है। (2006: 225)

भारोपीय भाषा-परिवार और आर्यों के आक्रमण से संबंधित विवाद के विस्तार में जाए बिना मैं इस चर्चा को डॉ. कोएनराड के उद्धरण से समाप्त करना चाहता हूँ:

यह कहना तो जल्दबाजी होगी कि भाषा वैज्ञानिकों ने भारोपीय भाषा परिवार की भारतीय उत्पत्ति के सिद्धान्त को साबित कर दिया है। लेकिन हम इतना जरूर विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि यूरोपीय उत्पत्ति और आर्यों के भारत पर आक्रमण के बहुउद्धृत भाषायी साक्ष्य पूरी तरह अपर्याप्त हैं। यूरोपीय उत्पत्ति के सिद्धान्त एक-एक करके उन विद्वानों द्वारा गलत साबित किए जा चुके हैं जिनका भारतीय उत्पत्ति सिद्धान्त और उससे संबंधित ज्ञान से कुछ लेना-देना नहीं है।’(लिंग्विस्टिक एस्पेक्ट ऑव द इंडो-यूरोपीयन अरहिमट क्वेश्चन, डॉ. कोएनराड एल्स्ट, द कोएनराड एल्स्ट साईट)

2

शेल्डन पोलक के अनुसार यूरोप में ‘ओरिजिन पैराडाइम’ की शुरुआत आधुनिकता के आगमन से पहले ही हो चुकी थी। ‘ओरिजिन पैराडाइम’ का मतलब यह है कि उत्पत्ति, वंश की शुद्धता और मिश्रण के निषेध को लेकर पश्चिम में बड़े पैमाने पर चिन्तन किया जा रहा था। इसके साथ ही ऐतिहासिक आवश्यकता के रूप में राष्ट्र के महत्व का एहसास बढ़ रहा था और इतिहास के कर्ता के रूप में आम आदमी की भूमिका पर विचार हो रहा था। अठारहवीं सदी की ‘राष्ट्र और भाषा परियोजना’  इसी प्रक्रिया की तार्किक परिणति थी। इस परियोजना के बारे में ट्राटमान ने लिखा है कि ‘राष्ट्र और भाषा परियोजना’ का, जैसा कि हमने देखा, शुद्ध विज्ञान से संबंध नहीं था, भले ही ऐसा प्रायः कहा जाता रहा हो; लेकिन ये ऐसा शुद्ध विज्ञान नहीं, जिसने धर्म की जंजीरों से स्वयं को मुक्त कर लिया हो। इसके विपरीत इस परियोजना की गहरी जडें बाइबिल में हैं- उन राष्ट्रों की वंशावली में हैं जो नोह और उनके तीन पुत्रों से अवतरित हुए। (2006: 213) ट्राटमान के इस खुलासे पर सेक्युलर और धार्मिक राष्ट्रवादियों को जरूर गौर करना चाहिए। यही नहीं, अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी में निर्मित भाषा परिवारों की परिकल्पना और तुलनात्मक भाषाशास्त्र पर अगाध श्रद्धा रखने वाले विद्वानों को ट्राटमन की इन बातों पर भी गौर फरमाना चाहिए:

अठारहवीं सदी में शुरू हुई भाषाओं की तुलना का एक वृहत्तर इथनोलाजिकल चरित्र था और इसका मकसद भाषाओं का वंशवृक्ष तैयार करना था। भाषाओं का वंशवृक्ष तैयार करना स्वयं में उद्देश्य नहीं, साधन था- राष्ट्रों के वंशवृक्ष तक पहुँचने का साधन। इसका उद्देश्य राष्ट्रों की पारस्परिक संबंधों की विलुप्त हो चुकी स्मृतियों को दोबारा हासिल करना था। इस परियोजना और इसकी खोजों को भाषा-वैज्ञानिक फ्रेम में देखा जाना था। ऐसी भाषा-वैज्ञानिक समझ जो भाषा को एक आत्मपूर्ण इकाई मानती हो, समूची तस्वीर को भले ही न पकड़ती हो, लेकिन भारत में उसे प्रायः इसी रूप में लागू कर भाषा-परिवारों की परिकल्पना की गई।’ (2006: XIX,XX)

प्रश्न यह है कि क्या किसी भाषा की उत्पत्ति को किसी एक भाषा-परिवार के साथ जोड़कर व्याख्यायित किया जा सकता है? उत्पत्ति का मिथ किसी भाषा के बनने की प्रक्रिया को किस सीमा तक व्याख्यायित कर सकता है? ये प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बाहरी प्रभावों को हटाकर भाषा के किसी मूलभूत अमिश्रित रूप की परिकल्पना का प्रभाव आधुनिक भाषाओं की स्वतंत्र अस्मिता-निर्माण-प्रक्रिया पर भी पड़ा।

असल में औपनिवेशिक अध्येता जिस समय भारत के भाषायी मानचित्र का अध्ययन कर रहे थे, उस दौर में ज्ञान-विज्ञान के सभी अनुशासनों पर प्रत्यक्षवादी (Positivist) पद्धति का वर्चस्व था। प्रत्यक्षवादी पद्धति किसी परिघटना का अध्ययन करने के दौरान भिन्नता और समानता के आधार पर पहले उसका वर्गीकरण करती है, फिर तुलना करती है, और अन्ततः उसको एक नाम दे देती है। इस प्रक्रिया में किसी भी परिघटना के उन तत्वों का निषेध हो जाता है, जो इस पद्धति में फिट नहीं बैठते। नामकरण और वर्गीकरण की यह प्रक्रिया प्रायः विरोधी युग्मों के सहारे खड़ी की जाती है और इसमें स्व और अन्य के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींचना आवश्यक होता है। सफेद और स्याह अथवा स्व और अन्य की बुनियाद पर निर्मित इस ज्ञान-व्यवस्था में ऐसे तत्वों का प्रायः निषेध हो जाता है जो किसी एक कोटि में पूरी तरह फिट नहीं बैठते। इस तरह दरम्यानी रूपों और अन्तःसंबंधों के लिए कोई जगह नहीं छूटती। ऐसी परिघटना जिसका स्वरूप स्पेक्ट्रम या कंटिनम जैसा हो, उसका बोध तो इस पद्धति से हो ही नहीं सकता। कहने कि जरूरत नहीं होनी चाहिए कि भारत में भाषाओं और बोलियों और भाषा-परिवारों के अध्ययन में इसी पद्धति का इस्तेमाल किया गया। विडम्बना यह है कि, जैसे दूसरे अनुशासनों में वैसे ही भारत की भाषाओं के अध्ययन के प्रसंग में भी, इस पद्धति से निर्मित ज्ञान को वैज्ञानिक ज्ञान की तरह निर्विवाद और अकाट्य सत्य मान लिया गया। यही नहीं, इस ज्ञान के आलोक में भारत के यथार्थ को समझने और परिवर्तित करने का प्रयास किया गया। यथार्थ के अनुरूप सैद्धान्तिकी विकसित करने के बजाय सैद्धान्तिकी के आधार पर यथार्थ को देखने और बदलने कि इस उलटबाँसी की शुरुआत भले ही उन्नीसवीं सदी में हुई हो, लेकिन यह सिलसिला आज भी खत्म नहीं हुआ है। चाहे राष्ट्र की अस्मिता हो या विभिन्न भाषाओं की अस्मिता हो या धार्मिक-सामाजिक अस्मिताएँ ही क्यों न हो, इन सभी का निर्माण इसी पद्धति के सहारे उन्नीसवीं सदी में हुआ। क्योंकि यह लेख मूलतः भाषायी अस्मिताओं के निर्माण प्रक्रिया पर केन्द्रित है, इसलिए अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए हम विभिन्न भाषाओं की स्वतंत्र अस्मिता निर्माण प्रक्रिया से जुड़ा हुआ फिलहाल यहाँ सिर्फ दो उदाहरण देना चाहेंगे।

उड़ीसा में जब उड़िया को बांग्ला से स्वतंत्र भाषा बनाने का आंदोलन चला तो फकीर मोहन सेनापति भी इससे जुड़ गए। लेकिन मुसीबत यह हुई कि उड़िया को बांग्ला से स्वतंत्र भाषा मानने के बावजूद वे जो कुछ लिखते उसमें और बांग्ला में कोई खास फर्क न दिखाई पड़ता। उल्लेखनीय है कि फकीर मोहन सेनापति के पथप्रदर्शक गुरु जॉन बीम्स नामक महानुभाव थे। जॉन बीम्स की वजह से ही उड़ीसा के स्कूलों में शिक्षा के माध्यम के रूप में उड़िया की शुरुआत हुई। जॉन बीम्स आम आदमी (अनपढ़) के द्वारा बोली जाने वाली भाषा को ही सच्ची भाषा मानते थे और तत्सम शब्दों के प्रयोग को उचित नहीं समझते थे। बीम्स के इस तरह के विचारों से फकीर मोहन सेनापति को ऐसी उड़िया भाषा खड़ी करने में मदद मिली जो बंगला से भिन्न दिखाई पड़े। गगनेन्द्रनाथ दास ने लिखा है कि सामान्यतः यह माना जाता है कि कोई उपन्यासकार पहले अपने विषय-वस्तु का चुनाव करता है और फिर ऐसा प्लाट और चरित्र खड़ा करता है जो उसके विषय-वस्तु को बेहतर ढंग से प्रस्तुत कर सके। अन्ततः विषय-वस्तु और चरित्र उपन्यास की भाषा और शैली को निर्धारित करते हैं। लेकिन ऊपर की चर्चा से ऐसा लगता है कि ‘छः मन और आठ गुण्ठ’ के प्रसंग में इसका उल्टा हुआ। क्योंकि विशेष ऐतिहासिक परिस्थिति में निम्नवर्गीय जनों के बीच बोली जाने वाली भाषा के आधार पर चरित्र और विषय-वस्तु का निर्धारण हुआ। (2006)।

लम्बे समय तक पंजाब में ब्रजभाषा और हिन्दी-उर्दू का साहित्यिक और सांस्कृतिक भाषा के रूप में इस्तेमाल होता रहा था। विभाजन के पश्चात पंजाबी को पंजाब की भाषा बनाने की मांग की जाने लगी। भाषावार राज्य गठन की प्रक्रिया के अमल में आने के साथ पंजाब का एक और विभाजन हुआ। हिन्दी भाषी क्षेत्र को पंजाब से अलग कर  हरियाणा राज्य बनाया गया। इस तरह पंजाब की भाषा पंजाबी बनी और हरियाणा की हिन्दी हुई। लेकिन पाकिस्तान के कब्जे वाले पश्चिमी पंजाब की सांस्कृतिक और प्रशासनिक भाषा आज भी उर्दू है। इन उदाहरणों से यह बात स्पष्ट होती है कि स्थानीय बोली को एक स्वतंत्र भाषा के रूप में स्थापित करने के पीछे ‘भाषा’ की बोधगम्यता से कहीं ज्यादा सामाजिक-राजनीतिक कारणों की भूमिका होती है।

फकीर मोहन सेनापति के उदाहरण से यह बात स्पष्ट होती है कि क्षेत्रीय भाषाओं की स्वतंत्र अस्मिता-निर्माण-प्रक्रिया एक सचेत राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा थी और इस प्रक्रिया में उस क्षेत्र के पढे़-लिखे लोगों के साथ ही औपनिवेशिक अध्येताओं की नियामक भूमिका थी। वास्तव में यह प्रक्रिया इन दोनों के सचेत और साझा उद्यम का परिणाम थी। असल में भारत की ज्यादातर भाषाओं के निर्माण की आधारभूत सैद्धान्तिकी औपनिवेशिक अध्येताओं ने तैयार की थी और इसे ही थोड़ा बहुत परिवर्तित कर क्षेत्रीय बुद्धिजीवियों ने अंजाम तक पहुँचाया। सुसी थारू (1994) ने अपने एक लेख ‘अरेंजमेन्ट ऑव एलायन्स’ में इस प्रक्रिया पर विस्तार से प्रकाश डाला है। जिस क्षेत्र में स्थानीय भाषा/बोली को एक स्वतंत्र भाषा के रूप में स्थापित करने का आंदोलन नहीं खड़ा हो पाया वहाँ विभाजन के दूसरे तरीके निकाले गए। उल्लेखनीय है कि पश्चिमी भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार हिन्दी क्षेत्र की सभी बोलियाँ स्वतंत्र भाषाएँ हैं। इस मान्यता का किशोरीदास बाजपेयी जैसे विद्वान पर भी ऐसा प्रभाव पड़ा कि कालान्तर में वे भी हिन्दी क्षेत्र की इन बोलियों को स्वतंत्र भाषाएँ मानने लगे। इसके बावजूद हिन्दी क्षेत्र में इन बोलियों को स्वतंत्र भाषा में रूपांतरित करने का कोई आंदोलन नहीं खड़ा हो पाया। पहले ब्रजभाषा को और फिर खड़ी बोली पर आधारित हिन्दी-उर्दू को हिन्दी क्षेत्र के उन अंचलों के लोगों ने भी सहज स्वीकार कर लिया जहाँ यह ‘बोली’ बोली ही नहीं जाती थी। इसलिए हिन्दी क्षेत्र में हिन्दी और उर्दू का विवाद खड़ा किया गया। जैसाकि ऊपर उल्लेख हो चुका है, क्षेत्रीय बोलियों को स्वतंत्र भाषा के रूप में स्थापित करने के मूल में भाषायी कारणों से ज्यादा राजनीतिक कारणों की भूमिका रही। क्षेत्रीय बोलियों की अस्मिता को स्वतंत्र भाषा में रूपांतरित करने के दौरान सचेत रूप से ऐसे तत्वों का निषेध किया गया, जो दूसरी बोली या भाषा में भी मौजूद थे। ऐसे तत्वों को ऊपर लाने की कोशिश की गई जिनसे उस बोली की स्वतंत्र और आत्मपूर्ण पहचान कायम की जा सके। इस प्रक्रिया में क्रियाओं और कारक चिह्नों को उनकी पहचान की बुनियाद के रूप में रखा गया। भाषा के क्षेत्रीय रूपों के अन्तःसंबंध को समझने का एक वैकल्पिक आधार शब्द-सम्पदा की समानता भी हो सकता है। हिन्दी क्षेत्र में ब्रजभाषा या हिन्दी-उर्दू को दूसरे अंचलों में इसीलिए बिना किसी दबाव के स्वीकार कर लिया गया, क्योंकि इस क्षेत्र के स्थानीय भाषा रूपों में शब्द-सम्पदा की दृष्टि से समानता बहुत अधिक दिखाई पड़ती है।

भारत में भाषाओं/बोलियों का वर्गीकरण, नामकरण और उनकी स्पष्ट सीमाएँ निर्धारित करना कभी भी आसान नहीं था। लेकिन पश्चिम से आई आधुनिकता की सैद्धान्तिकी में भाषाओं के पारस्परिक संबंध को समझने का इसके सिवा और कोई दूसरा तरीका नहीं था। सच तो यह है कि ‘स्पेक्ट्रम या कन्टिनम’ की तरह धीरे-धीरे बदलने वाले भारतीय भाषायी मानचित्र को इस सैद्धन्तिकी के जरिये समझ पाना ही मुश्किल था। आधुनिकता की सैद्धान्तिकी में किसी परिघटना को समझने से ज्यादा मनोवांछित रूप में परिवर्तित कर देने पर जोर रहा है। कम से कम गैर-पश्चिमी संस्कृति और सभ्यताओं के अध्ययन के संदर्भ में तो यह बात सोलहो आने सच लगती है। एवर्ड सइद ने ‘ओरियन्टलिज्म’ नामक अपने ग्रंथ में इस समूची प्रक्रिया का विस्तार से विश्लेषण कर रखा है। इसलिए उस तफ्सील में जाने की जरूरत फिलहाल नहीं लगती। किन्तु यहाँ यह उल्लेख करना उचित होगा कि अंग्रेज अध्येताओं के लिए मानचित्र का निर्माण और भाषायी वर्गीकरण सुशासन के लिए निहायत जरूरी थे। इसकी पुष्टि 1881 की जनगणना के दस्तावेज से भी होती है। ज्युडित्थ टी. इरविन ने अपने लेख ‘लेंग्वेजफील्ड’ में उस दौर के अध्येताओं में व्याप्त इस प्रवृत्ति का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि इन अध्येताओं की दृष्टि में ऐसे मानचित्र से उस क्षेत्र में रहने वाले लोगों और उनकी भाषाओं का इस तरह प्रतिनिधित्व हो जाता है जैसे वास्तव में उनका कोई वजूद ही न हो। कम से कम उनको सीधे प्रस्तुत करने की जरूरत खत्म हो जाती है। क्योंकि नक्शे में उनकी उपस्थिति पहले ही दर्ज की जा चुकी है। ज्युडित्थ टी. इरविन ने इस तरह का भाषायी मानचित्र तैयार करने के मार्ग में आने वाली दिक्कतों के बारे में 1853 में लिखे गए सर इरिक्सन पेरी के एक लेख का जिक्र किया है। भारत में बिल्कुल सही भाषायी मानचित्र बना पाना क्यों मुश्किल है, इस बात का उल्लेख करते हुए पेरी ने लिखा है

सर्वप्रथम समस्या तो यही है कि दो पड़ोसी भाषाओं की सीमाएँ प्रायः जंगल या ऐसे अनजान निर्जन इलाकों से होकर गुजरती हैं कि उनकी स्पष्ट सीमा-रेखा खींच पाना मुश्किल हो जाता है। जुडित्थ इरविन ने इस समझ पर व्यंग्य करते हुए लिखा है, ‘यदि ये मान लिया जाए कि भाषा की सीमा-रेखाएँ निर्जन इलाकों से होकर गुजरती हैं तो फिर यह भी मानना पड़ेगा कि भाषाओं के वजूद के लिए उन भाषाओं को बोलने वाले लोगों की भी जरूरत नहीं! (2011: 46)

इस ढब पर भारतीय भाषाओं का नामकरण/वर्गीकरण करने और उनकी स्पष्ट सीमा-रेखाएँ निर्धारित करने की चेष्टा करने वाले औपनिवेशिक दौर के पश्चिमी अध्येता ही नहीं, भारतीय अध्येता भी इस उलझन को सुलझा नहीं पाए। इस पद्धति पर किए गए अध्ययनों से उत्पन्न होने वाली समस्याओं का एहसास तो यत्र-तत्र दिखई पड़ता है, किन्तु यह एहसास किसी वैकल्पिक सैद्धान्तिकी की जरूरत के एहसास में प्रायः रूपांतरित नहीं होता।

3

काल की ही तरह देश-भेद से भी भाषा  बदलती है, बहुत धीरे-धीरे। आप प्रयाग से पश्चिम चलें, पैदल यात्रा करें, चार-पाँच मील नित्य आगे बढ़ें, तो चलते-चलते आप पेशावर या काबुल तक पहुँच जाएँगें; पर यह न समझ पाएँगे कि हिन्दी कहाँ किस गाँव में छूट गई–पंजाबी कहाँ से प्रारम्भ हुई–पश्तो ने पंजाबी को कहाँ रोक दिया! ऐसा जान पड़ेगा कि प्रयाग से काबुल तक एक ही भाषा है। परन्तु यह यात्रा यदि वायुयान से करें और प्रयाग से उड़कर पेशावर या काबुल उतरें, तो भाषा-भेद से आप चक्कर में पड़ जाएँगे। प्रयाग की भाषा कहाँ और काबुल की भाषा कहाँ! इसी तरह पूर्व की यात्रा पैदल करने पर आप हिन्दी की विभिन्न ‘बोलियों’ में तथा मैथिली-उड़िया-बँगला आदि में अन्तर वैसा न लख पाएँगे। यही क्यों, दक्षिण की ओर चलें, तो ठेठ मदरास तक पहुँच जाएँगे, भाषा संबंधी कोई भी अड़चन सामने न आएगी। किन्तु वायुयान से उड़ कर मदरास पहुँचिए, जान पड़ेगा भाषा में महान् अन्तर! आप कुछ समझ ही न सकेंगे। (1998: 4पूर्वपीठिका)

किशोरीदास बाजपेयी के ऊपर दिये गये उद्धरण से ये बात स्पष्ट हो जाती है कि हमारे यहाँ भाषाएं इस तरह परस्पर जुड़ी हुई हैं कि उन्हे जबरदस्ती करके ही एक दूसरे से अलगाया जा सकता है। भाषा के स्थानीय रूप में परिवर्तन इतना धीरे-धीरे और क्रमशः होता है कि पता ही नहीं चलता कि कब और कहाँ एक रूप समाप्त हुआ और दूसरे रूप की शुरुआत हो गई। लेकिन किशोरीदास बाजपेयी जैसे प्रकांड विद्वान को भी जब पश्चिमी भाषा-विज्ञान का ज्ञान हो गया तो उनके विचार बदल गए और अगली पुस्तक ‘भारतीय भाषा-विज्ञान’ में अवधी आदि को वे हिन्दी की बोलियाँ नहीं, स्वतंत्र भाषा मानने लगे। यही नहीं, हिन्दी शब्दानुशासन के परिवर्द्धित संस्करण के परिशिष्ट-1 में भी उन्होंने ये बातें जोड़ दीं। वे लिखते हैं

अवधी आदि हिन्दी की ‘बोलियाँ’ नहीं, स्वतन्त्र भाषाएँ हैं हिन्दी-संघ की। ‘हिन्दी की बोलियाँ’ एक रूढि़ है। यह सब भारतीय भाषा-विज्ञान में स्पष्ट है।

असल में भाषा और बोली के युग्म में विचार करने की ये तार्किक परिणति थी। जबकि भारत में देश-भाषाओं का चरित्र और उनका पारस्परिक संबंध ऐसा है कि भाषा और बोली के युग्म में उसे समझा ही नहीं जा सकता। भाषा और बोली के युग्म में हमारे भाषायी मानचित्र को विभाजित करने के लिए बहुत कृत्रिम और हिंसक तरीके से उन्हें एक दूसरे से अलगाना पड़ता है। इससे जितनी समस्याएँ हल होती हैं, उससे कहीं अधिक समस्याएँ पैदा हो जाती हैं। उल्लेखनीय है कि भाषा/बोली का एक स्थानीय रूप भी अपने समूचे क्षेत्र में एक जैसा नहीं दिखाई पड़ता। यह अकारण नहीं है कि राहुल सांकृत्यायन भोजपुरी को प्रयोग-भेद के आधार पर तीन-चार खण्डों में बाँटते हैं। भोजपुरी ही नहीं, दूसरी भाषाओं/बोलियों में भी ये समस्याएं दिखाई पड़ती हैं। असल में ये बोलियाँ आधुनिक युग में तब स्वतन्त्र भाषाएँ बनती हैं जब इन्हें एक दूसरे से काट कर, समानता का निषेध कर और वैशिष्ट्य-भिन्नता पर जोर देकर उनका मानकीकरण किया जाता है। ऐसा नहीं कि किशोरीदास बाजपेयी इस समस्या से परिचित नहीं थे। पश्चिमी भाषा-विज्ञान के प्रभाव में हिन्दी क्षेत्र की बोलियों को स्वतन्त्र भाषाएँ मान लेने के बावजूद पहले की ‘अवैज्ञानिक सोच’ के पुराने निशान इस पुस्तक में बचे रह गए हैं। कुछ नमूने देखिए जैसे:

‘मानस’ पश्चिमी अवधी और पूर्वी पांचाली के साझे की चीज है। पूर्वी पांचाली और अवधी में स्पष्ट सीमा-रेखा खींचना सरल काम नहीं है। (1998: 580)।…….पश्चिमी पांचाली उधर ब्रज को प्रभावित करती है और स्वयं भी प्रभावित होती है। इधर पूर्वी पांचाली अवधी को प्रभावित करती है और स्वयं भी प्रभावित होती है। पांचाली, बैसवाड़ी तथा अवधी बोलियाँ तिङन्त-प्रधान हैं और इतनी मिलती-जुलती हैं कि इनके स्वरूप का स्पष्ट विवेचन-विभाजन बहुत सरल काम नहीं है। (1998: 540)…वस्तुतः मैथिली भाषा हिन्दी तथा बांगला के बीच की कड़ी है।

तुलसीदास के जन्मस्थान का भाषायी मानचित्र देखिए:

सच तो यह है कि गोस्वामी जी ने अपनी बोली में मानस की रचना की है। बाँदा जिला पांचाली क्षेत्र में आता है।…..यहाँ की पांचाली बोली के पड़ोस में बुंदेलखण्डी बोली है! परन्तु बुंदेलखण्डी पर ब्रजभाषा या ग्वालियरी बोली का अधिक प्रभाव है, पांचाली का कम। (1998: 580)।

उपर्युक्त उद्धरणों से ये बात समझ में आ जाती है कि किशोरीदास बाजपेयी जैसे विद्वान के लिए भी ‘रामचरितमानस’ की भाषा का स्वरूप-निर्धारण करना सुगम नहीं था। पहले वे ‘रामचरितमानस’ की भाषा को अवधी और पांचाली का मिश्रण बताते हैं और फिर पांचाली। यदि ‘रामचरितमानस’ की भाषा पांचाली है तो फिर पांचाली और अवधी में अन्तर करना कितना मुश्किल है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है! यही नहीं, तुलसीदास के लिए अवधी छोड़कर ब्रजभाषा में लिखना कितना आसान रहा होगा, इसका भी अंदाजा लग जाता है। क्योंकि तुलसीदास के जन्मस्थल के एक ओर यदि अवधी है तो दूसरी ओर पांचाली और तीसरी ओर बुंदेलखण्डी। और बुंदेलखण्डी पर ब्रजभाषा का प्रभाव जगजाहिर है। वस्तुतः तुलसीदास के लिए ब्रजभाषा परायी भाषा नहीं है, जिसमें लिखने के लिए उसे सीखने की जरूरत पड़े। बहते हुए पानी की तरह भाखा के स्पेक्ट्रम का क्रमशः बदलता हुआ रूप है ब्रजभाषा। तुलसीदास के जन्मस्थान राजापुर की तरह हिन्दी क्षेत्र में अनेक ऐसे स्थलों को चिह्नित किया जा सकता है, जहाँ भाखा के कई स्थानीय रूप एक दूसरे से परस्पर मिलते हुए और क्रमशः परिवर्तित होते हुए दिखाई पड़ेंगे।

इसी तरह बाबूराम सक्सेना ने अपनी पुस्तक ‘अवधी के विकास’ में ‘बघेली’ को अवधी की एक बोली मात्र माना है, अवधी के समकक्ष पूर्वी हिन्दी का एक और रूप नहीं। यही नहीं, अवधी की दक्षिणी सीमा में स्थित छत्तीसगढ़ी को वे पूर्वी हिन्दी का ही एक रूप मानते हैं। छत्तीसगढ़ी कुछ बातों में अवधी से भिन्न लेकिन अन्य बातों में अवधी के अधिक समीप है। छत्तीसगढ़ी के सर्वनाम भोजपुरी से मिलते-जुलते हैं। यदि इस सिलसिले को आगे बढ़ाएँ तो छत्तीसगढ़ी का संबंध उड़िया से जुड़ता हुआ दिखाई पड़ेगा और फिर उड़िया का बांग्ला और तेलगू से। बोलियों की भिन्नता रेखांकित करने के बावजूद बाबूराम सक्सेना ने हिन्दी की बोलियों के अंतःसंबंध को बखूबी समझते हुए लिखा है कि

यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि हिन्दी की विभिन्न बोलियाँ-पश्चिमी या पूर्वी, न केवल पड़ोस की बोलियों के वक्ताओं से अपितु अन्य बोलियों के वक्ताओं से भी परस्पर सम्बोध्य हैं। ब्रज का एक वक्ता अवध में अशिक्षित व्यक्तियों से भी अपनी ही बोली में अपना मन्तव्य समझा सकता है। (1972: 8)

बाबूराम सक्सेना के इस तर्क की पुष्टि शान्तनु फूकन के एक लेख ‘थ्रू थ्रोट्स व्हेअर मेनी रीवर्स मीट’से भी होती है। फूकन ने इस लेख में पछाह के रहने वाले फारसी के लेखक आनंदराम मुख्लिस का हवाला दिया है। अपने नौकर से मुल्ला दाऊद के ‘चंदायन’ को सुनकर वह पूर्वी बोली की मिठास से बहुत प्रभावित होते हैं और उन्हें ‘चंदायन’ की भाषा को समझने में कोई दिक्कत नहीं होती। इन उद्धरणों से हिन्दी की विभिन्न बोलियों और भाषाओं के आपसी संबंध और बोधगम्यता की पुष्टि होती है। इससे यह भी समझ में आता है कि किसी एक क्षेत्र का भाषायी रूप जब एक ‘कॉस्मोपॉलिटन वर्नाक्युलर’ (Cosmopolitan Vernacular) के रूप में फैलता है तो दूसरे क्षेत्र के लोग उसे बिना किसी विरोध के क्यों अपना लेते हैं। अपना ही नहीं लेते, बल्कि उसमें लिखने की दक्षता भी अर्जित कर लेते हैं।

भाषा का कोई स्थानीय रूप जैसे ही एक स्वतंत्र भाषा के रूप में अपनी पहचान बनाने लगता है वैसे ही वह अपनी आन्तरिक भिन्नताओं का एक मानक भाषा के निकष पर निषेध भी करना शुरू कर देता है। इस तरह उस भाषा का अपने पड़ोस की भाषा से पहले से चला आ रहा संबंध तोड़ दिया जाता है और दूरस्थ केन्द्र की मानक भाषा के अनुरूप उसे अपनी भाषायी पहचान गढ़ने के लिए विवश किया जाता है। जैसे, आधुनिक राष्ट्र-राज्य निर्माण प्रक्रिया के पीछे प्रायः सर्वमान्य तार्किक आधार नहीं होता और उसकी सीमा-रेखाएँ राजनीतिक-आर्थिक हैसियत से निर्धारित होती है; वैसे ही, ‘भाषायी स्पेक्ट्रम’ में से स्वतंत्र भाषाओं का निर्माण भी राजनीतिक-आर्थिक कारणों से किया जाता है। टॉमस ट्रॉटमान ने इस प्रक्रिया को यूरोप के ‘लेंग्वेज एण्ड नेशन प्रोजेक्ट’ (Language and Nation Project) के रूप में व्याख्यायित किया है। इस प्रोजेक्ट की महत्ता पश्चिमी विद्वानों की दृष्टि में सार्वभौमिक थी। जहाँ-जहाँ वे गए और जहाँ उनका वर्चस्व कायम हुआ, उन्होंने इसी प्रोजेक्ट के तहत वहाँ की भाषाओं का अध्ययन किया अठारहवीं सदी से इस तरह मिसालें मिलने लगती हैं।

‘भाखा’ के स्थानीय रूपों के नामकरण और उनकी सीमाएँ चिह्नित करने का काम भारत में उन्नीसवीं सदी में शुरू हुआ। भाखा के किसी स्थानीय रूप में भी, जैसा कि पहले कहा गया, पर्याप्त विविधता है। असल में भाषा के मानकीकरण के दौरान उसके किसी एक रूप को मानकीकृत कर दिया जाता है और बाकी रूपों को अमान्य घोषित कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया में भाषा के व्याकरण का निर्माण होता है और फिर लोगों से उसी के अनुरूप भाषा के प्रयोग की अपेक्षा की जाने लगती है। भाषा के इस मान्य और व्याकरण-सम्मत स्वरूप को स्वीकार कर लेने के बाद भाषा का एक स्थिर रूप बन जाता है। भाषा के मानक रूप के स्थिर होने के बाद परस्पर जोड़ने वाला सतत् परिर्वतनशील रूप नष्ट होने लगता है। और फिर उनकी स्वतंत्र अस्मिताओं का निर्माण होता है। आज हम प्रायः भाषा के मानकीकृत रूप के आधार पर ही उनके संबंधों को देखने के आदी हो गए हैं, जबकि आरम्भिक आधुनिक भारत में भाषाओं का अन्तःसंबंध परस्पर सम्बद्धता का रहा है। इसीलिए हमारे यहाँ लम्बे समय तक, यहाँ तक कि उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में भी, हिन्दी क्षेत्र के सभी स्थानीय रूपों को भाखा कहा जाता रहा। उन्नीसवीं सदी में शिवसिंह सेंगर ने अपनी पुस्तक ‘शिवसिंह-सरोज’ में लिखा है कि ‘इस ग्रंथ में एक हजार भाषा कवि लोगों के नाम और जीवन-चरित्र सन्-संवत् कविता समेत लिखे गये हैं।’ (1970: मुखपृष्ठ)

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धीरेन्द्र वर्मा ने लिखा है कि

प्रथम आवश्यकता अपने देश अथवा वर्तमान संयुक्त प्रान्त को उचित नाम देने की है। भारतवर्ष में केवल यह एक हिन्दी भाषा-भाषी जन-समुदाय ही ऐसा अभागा है कि न तो जिसके देश का ही कोई नाम है और न जहाँ के देशवासियों को ही किसी एक नाम से पुकारा जा सकता है।’ (1930: 76)।

कई नामों पर विचार करने के बाद धीरेन्द्र वर्मा ने इसे हिन्दी राष्ट्र या सूबा हिन्दुस्तान के नाम से पुकारे जाने की सिफारिश की। किन्तु असल सवाल ये है कि बंगाल, पंजाब की तरह हिन्दी क्षेत्र का कोई नाम क्यों नहीं बन पाया। जब तक इस सवाल का जवाब हम नहीं खोज लेते, तब तक हिन्दी क्षेत्र के भाषायी स्वरूप को भी भलीभाँति नहीं समझ पाएँगे। एक भाषा के आधार पर बने पश्चिमी राष्ट्रों के मॉडल को हिन्दी क्षेत्र और अन्ततः समूचे भारत पर लागू करने से हिन्दी क्षेत्र के भाषायी वैशिष्ट्य और प्रकारान्तर से समूचे भारत के भाषायी वैशिष्ट्य का सम्यक् बोध नहीं हो सकता। विडंबना ये रही है कि ज्यादातर भाषावैज्ञानिकों, साहित्य और समाज के अध्येताओं ने भारत के भाषायी वैशिष्ट्य को एक भाषा पर आधारित पश्चिम ढंग के राष्ट्र के मॉडल पर समझने की कोशिश की है। लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी से पहले के भारत का भाषायी मानचित्र इस मॉडल पर फिट नहीं बैठता, उसे काट-छाँटकर जबरन इस मॉडल में फिट करने की कोशिश की जाती है। भारत और विशेष रूप से भाखा क्षेत्र (जिसे सामान्य रूप से हिन्दी-क्षेत्र कहते हैं) के भाषायी स्वरूप को भाषा और बोली के द्विआधारी विरुद्धों के जरिये नहीं व्याख्यायित किया जा सकता। सम्प्रति इस लेख में हम ‘भाखा क्षेत्र’ के भाषायी स्वरूप को समझने का प्रयास करेंगे। यद्यपि हमारा विश्वास है कि इसके निहितार्थ समूचे भारतीय भाषायी मानचित्र को समझने की दृष्टि से भी, थोड़े-बहुत बदलाव के साथ, उपयोगी हैं।

‘भाखा क्षेत्र’ में स्थानीय मुहावरों/बोलियों की आत्मपूर्ण और निरपेक्ष कोटियाँ नहीं बनीं। क्योंकि भाखा-क्षेत्र के ये क्षेत्रीय रूप शब्द-सम्पदा और व्याकरण की दृष्टि से बहुत कुछ एक जैसे हैं। जो अन्तर है वह क्रियाओं और उच्चारण में है। इसलिए भाखा-क्षेत्र के ज्यादातर कवि एक से अधिक भाषायी मुहावरे/बोली/भाषा में लिखते हैं।ऐसा करना उनके लिए मुश्किल भी नहीं है, क्योंकि ये भाषायी मुहावरे मूलतः ‘भाखा’ के ही स्थानीय विशेषीकृत रूप हैं। भाखा के इन विविध स्थानीय रूपों के बनने के दौरान भी इनके बीच भाषायी, साहित्यिक और वैचारिक स्तर पर संवाद चलता रहता है। भाखा और भाखा के विविध स्थानीय रूप संस्कृत और फारसी जैसी शास्त्रीय भाषाओं से बहुत कुछ आत्मसात कर अपना ‘विकास’ करते हैं। इसलिए यह भी विचार का विषय है कि भाखा के ये विविध रूप संस्कृत और फारसी से किस प्रकार का सम्बन्ध बनाते हैं। यही नहीं, इसके निहितार्थों को विभिन्न क्षेत्रों, धर्मों, सम्प्रदायों और जातियों की संरचना और उनके अन्तर्सम्बन्ध को समझने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। असल में, भारतीय समाज की आन्तरिक गतिकी (Internal Dynamics)को समझने की कुंजी हिन्दी क्षेत्र के भाषायी अन्तःसम्बन्ध में छिपी है और यदि हम इस अन्तःसम्बन्ध को समझने में सफल हो जाएँ तो भारतीय समाज के उस ‘डायनेमिक’ को डिकोड कर सकते हैं, जिसे अभी तक प्रायः आधुनिकता द्वारा प्रदत्त कोटियों में ढालकर समझने की कोशिश की जाती रही है। असल में, अभी तक हमने क्षेत्रों, भाषाओं/बोलियों, धर्मों, सम्प्रदायों, जातियों की अस्मिताओं को जिस तरह समझने की कोशिश की है, वह वस्तुतः उन्नीसवीं सदी का औपनिवेशिक आविष्कार है और उसका उपनिवेशवाद से पहले के भारतीय समाज की नैसर्गिक गतिकी से ठीक-ठीक सम्बन्ध नहीं बनता।

धीरेन्द्र वर्मा के उद्धरण के हवाले से ये बात आयी कि हिन्दी क्षेत्र का कोई नाम ही नहीं। जब हमने इस मुद्दे पर विचार करना शुरू किया तो इस ओर ध्यान गया कि हिन्दी क्षेत्र की भाषा का लम्बे समय तक कोई नाम नहीं था। और फिर मन में ये बात कौंधी कि हिन्दी क्षेत्र का अपना नाम न होने के पीछे कहीं ये कारण तो नहीं कि इस क्षेत्र की भाषा का भी काफी समय तक कोई नाम नहीं था। चैदहवीं-पन्द्रहवीं शती में उत्तर भारत में भक्ति-आन्दोलन के प्रवर्तक कबीर की बहुचर्चित पंक्ति हैं-

संस्कीरत है कूप जल, भाखा बहता नीर

कबीर के इस कथन पर विचार करने पर समझ में आता है कि जो संस्कृत नहीं है, वह भाखा (भाषा) है। और भाखा बहते नीर की तरह है। भाखा को बहता नीर कहने का अभिप्राय यह है कि उसका कोई बँधा-बँधाया, सुपरिभाषित और इक्सक्लूसिव रूप नहीं है। इसका स्वरूप लगातार बहते पानी की तरह बहता-बदलता रहता है। एक ही समय में, अलग-अलग क्षेत्रों में इस भाखा के स्वरूप में कुछ न कुछ फर्क दिखायी पड़ता है, क्योंकि इसका अभी कोई मानकीकृत, परिनिष्ठित रूप निर्धारित नहीं किया गया है। इसीलिए इस भाषा का अभी कोई व्यक्तिवाचक नाम नहीं है।

कबीर की इन पंक्तियों को तो हम लम्बे समय से पढ़ते-सुनते आये थे, लेकिन इसका मर्म उद्घाटित हुआ तब, जब उसे धीरेन्द्र वर्मा द्वारा उठायी गई बात के प्रसंग में समझा गया। कबीर ने ये भी लिखा है कि ‘बोली हमरी पूरबी’। इस प्रसंग में ध्यातव्य है कि ‘पूर्वी बोली’ और ‘भाखा में’ कोई द्वन्द्व या टकराव नहीं है। इसलिए इस सम्बन्ध को भाषा बनाम बोली के द्विआधारी विलोम में समझने की गलती नहीं करनी चाहिए। ऐसी गलती विभिन्न विद्वानों ने अभी तक दोहरायी है। कबीर की कविताओं की उपलब्ध भाषा में पंजाबी, राजस्थानी और खड़ी बोली के नमूने तो मिलते ही हैं; भोजपुरी और अवधी से प्रभावित पंक्तियाँ भी दिखायी पड़ती हैं। (1958:131)। कहा जाता है कि कबीर की रचनाएँ लगभग डेढ़ सौ सालों तक वाचिक परम्परा में चलती रहीं, फिर उन्हें लिपिबद्ध किया गया। इसलिए कबीर की उपलब्ध रचनाओं पर उस क्षेत्र-विशेष की भाखा की छाप दिखायी पड़ती है, जिस क्षेत्र-विशेष में उसे लिपिबद्ध किया गया। इसलिए ये दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि कबीर ने भाखा के विभिन्न क्षेत्रीय मुहावरों में अपनी बानियाँ गायीं। लेकिन महत्त्वपूर्ण बात ये है और इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि इन अलग-अलग क्षेत्रीय मुहावरों में उपलब्ध रचनाएँ समूचे हिन्दी क्षेत्र में गायी, पढ़ी, सुनी और समझी जाती रही हैं। क्षेत्रविशेष के मुहावरे या भाषा के कारण उसकी व्याप्ति या संप्रेषणीयता बाधित नहीं होती, क्योंकि क्षेत्रीय भाषायी वैभिन्नय के बावजूद ये भाखा में लिखी गयी रचनाएँ हैं, इसीलिए समूचे भाखाक्षेत्र में ये समझी जाती हैं।

कबीर से भी पहले गोरखनाथ की रचनाओं को देखा जा सकता है। गोरखनाथ की उपलब्ध रचनाओं का समय, शिवप्रसाद सिंह के शब्दों में,

13वीं शताब्दी से पहले नहीं माना जा सकता, क्योंकि ये भाषा की दृष्टि से उतनी पुरानी नहीं मालूम होतीं। (1958: 135)।

शिवप्रसाद जी ने गोरखनाथ की काव्यभाषा में ‘भाखा-क्षेत्र’ के चार रूपों के प्रयोग का उल्लेख किया है, जो इस प्रकार हैं: पूर्वी, राजस्थानी, खड़ी बोली और ब्रजभाषा। (1958: 135-138)। कबीर की तरह ही गोरखनाथ की उपलब्ध कविताओं के चार या उससे भी अधिक रूप समूचे हिन्दी क्षेत्र में समझे जाते हैं।

सुदीप्तो कविराज ने अपने एक लेख में लिखा है कि भारत में भाषाओं की चैहद्दियाँ बहुत धुँधली हैं। एक भाषा कहाँ खत्म होती है और दूसरी भाषा कहाँ शुरू होती है, ये तय कर पाना प्रायः आसान नहीं। इसका कारण यह है कि एक भाषा कहीं खत्म नहीं होती, वह दूसरी भाषा में क्रमशः रूपान्तरित होने लगती है। एक भाषा के दूसरे भाषा में संक्रमण और रूपान्तरण का क्षेत्र कई बार काफी बड़ा दिखायी पड़ता है और इस क्षेत्र की भाषा को किसी भी भाषायी चौखटे में फिट कर पाना लगभग असंभव हो जाता है। इस परिप्रेक्ष्य में यदि भाखा-क्षेत्र के विभिन्न स्थानीय भाषा रूपों को समझने का प्रयास करें तो यह स्पष्ट होता है कि इन स्थानीय रूपों को स्वतंत्र भाषा के रूप में अलगाना ही असंभव है। क्योंकि कबीर के शब्दों में भाखा बहता नीर है और समतल मैदान पर बहने वाले भाखा के नीर में ऐसी ऊँचाई या गहराई नहीं दिखायी पड़ती जिसके आधार पर इसे स्वतंत्र भाषाओं में बाँटा जा सके। वैसे तो कहावत है कि चार कोस पर भाषा बदल जाती है, लेकिन इस तरह के बदलाव की बुनियाद पर स्वतंत्र भाषाओं की कल्पना नहीं की जा सकती। क्योंकि अन्ततः ये भाखा के ही क्रमशः परिवर्तित हो रहे रूप हैं। इनमें पारस्परिक साम्य इतना अधिक और परिवर्तन इतना क्रमिक है कि सुदीप्तो कविराज का दो भाषाओं के बीच धुँधली सीमा-रेखा का मॉडल यहाँ लागू नहीं होता। संभवतः इसीलिए भाखा के रचनाकार कई स्थानीय रूपों का एक साथ और कई बार उन्हें मिलाकर प्रयोग करते हैं। ऐसा करने में न तो उन्हें कोई मुश्किल होती है और न ही पाठक/श्रोता को समझने में कोई दिक्कत आती है। सम्भवतः इसीलिए भाखा-क्षेत्र के स्थानीय भाषायी रूपों को फारसी/संस्कृत या अपभ्रंश से मिलाकर रेख्ता और सधुक्कड़ी के रूप में मिलीजुली भाषाएँ विकसित करने और उनमें साहित्य लिखने का चलन दिखायी पड़ता है। स्थानीय रूपों को मिलाकर एक मिलीजुली भाषा गढ़ लेने का ऐसा प्रयास इसीलिए स्वीकार्य और लोकप्रिय हुआ, क्योंकि इन स्थानीय रूपों में स्वतंत्र भाषा का स्वरूप ग्रहण करने लायक भिन्नता न थी। यह अकारण नहीं कि इस तरह की मिलीजुली भाषा का चलन भाखाक्षेत्र के अलावा भारत के किसी और क्षेत्र में नहीं दिखायी पड़ता। रामविलास शर्मा की जाति-महाजाति की थीसिस से इस प्रक्रिया की समुचित व्याख्या नहीं होती। यही नहीं, ये थीसिस भाखा-क्षेत्र के बाहर किसी दूसरे क्षेत्र पर लागू भी नहीं की जा सकती।

कबीर सहित ज्यादातर सन्तों की बानियों की भाषा को हिन्दी में सधुक्कड़ी भाषा कहने का चलन रहा है। सधुक्कड़ी कहने का मतलब ही है कि उन्होंने किसी क्षेत्र विशेष की भाषा का प्रयोग नहीं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों की भाषाओं के मिलेजुले रूप का प्रयोग किया है। विद्वानों ने सधुक्कड़ी भाषा की बुनियाद खड़ी बोली से निर्मित मानी है और इस ओर ध्यान आकृष्ट किया है कि खड़ी बोली को मुसलमान शासकों द्वारा धार्मिक और राजनीतिक कारणों से प्रोत्साहन मिला। शिवप्रसाद सिंह के शब्दों में,

14वीं-15वीं शताब्दी का सन्त-आन्दोलन भारतीय वैधी भक्ति परम्परा का विरोधी था, उस काल के सन्तों ने इस नई भाषा को स्वीकार किया, कुछ तो अपने उपदेशों के प्रचार के लिए, लेकिन ज्यादा इसलिए कि वे शिष्ट वर्ग की साहित्यिक भाषा से वाकिफ नहीं थे। (1958: 138)।

शिवप्रसाद जी ने आगे ये भी लिखा है कि

संतो की वाणियों की भाषा का अध्ययन करने पर मालूम होता है कि ये कवि क्रान्तिकारी ओजस्वी उपदेशों, रूढि़-खण्डन, पाखण्ड-विरोधी या उसी प्रकार के परम्पराप्रथित विचारों का विच्छेदन करने के लिए जिस भाषा का प्रयोग करते थे, वह नवोदित खड़ी बोली थी, किन्तु अपने साधना के सहज विचारों, रागात्मक उपदेशों, निजी अनुभूति की बात ब्रज भाषा में करते थे। रेख्ता या खड़ी बोली शैली में बाद में कुछ पद भी लिखे गए, किन्तु पदों की मूल भाषा ब्रज ही रही। (1958: 138)।

खड़ी बोली/रेख्ता और सन्त कवियों की क्रान्तिकारी और रूढि़-भंजक सधुक्कड़ी भाषा असल में मिलीजुली भाषाएँ हैं, जिनमें भाखा-क्षेत्र के विभिन्न रूपों का प्रयोग किया गया है। इमरे बंघा रेख्ता की कविता को मिलीजुली भाषा में लिखी गई कविता कहते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि दक्खिन से वली के उत्तर उत्तर आने (1700 ई०) के बाद उत्तर भारत में मिलीजुली भाषा अर्थात् रेख्ता में कविता लिखने का सिलसिला कमजोर पड़ गया, क्योंकि उसी के बाद रेख्ता के फारसीकरण की शुरूआत हुई (2010)।

खड़ी बोली में साहित्य-लेखन का उल्लेख चैदहवीं सदी से मिलता है, लेकिन सोलहवीं सदी से पहले खड़ी बोली में लिखे गए साहित्य का कोई साक्ष्य नहीं मिलता। खड़ी बोली का साहित्य कई लिपियों में लिखा गया; जैसे फारसी, अरबी, देवनागरी, गुरुमुखी, कैथी इत्यादि। इससे ये बात भी स्पष्ट होती है कि भाषा और लिपि का कोई सीधा सम्बन्ध यहाँ नहीं दिखायी पड़ता, क्योंकि भाषा कई लिपियों में लिखी जा सकती है और लिखी गई। इसीलिए रेख्ता सिर्फ फारसी लिपि में नहीं लिखी गई, नागरी लिपि में भी लिखी गई। यही नहीं, रेख्ता में सिर्फ मुसलमानों और सूफियों ने साहित्य नहीं लिखा, बल्कि निर्गुण सन्तों और कृष्णभक्त कवियों ने भी लिखा। मुगलों और दूसरे मुसलमान शासकों के दरबारों में ही नहीं, सत्रहवीं सदी के राजस्थान के हिन्दू रजवाड़ों के दरबारों में भी रेख्ता लिखी गई। अलग-अलग समय व क्षेत्र में फारसी के अतिरिक्त अवधी, ब्रजभाषा, खड़ी बोली, पंजाबी और अपभ्रंश की मिलावट करके रेख्ता बनायी गई।

यह सही है कि शुरुआती रेख्ता मुसलमानों के बीच विकसित हुई और इसे खड़ी बोली के बजाय ब्रजभाषा का आधार बनाकर लिखा गया। खड़ी बोली का मुसलमानों से सम्बन्ध बाद में स्थापित हुआ। सोलहवीं सदी तक आते-आते नागरी लिपि और भारतीय छन्दों में खड़ी बोली को आधार बनाकर और फारसी का मिश्रण कर रेख्ता में कविताएँ लिखने का चलन काफी बढ़ गया। इस तरह की मिलीजुली भाषा में कविता लिखने का सबसे प्रमुख साक्ष्य दादू दयाल की रचनाओं में दिखायी पड़ता है। दादू की रचनाओं में आठ भाषाओं/बोलियों के नमूने आसानी से पहचाने जा सकते हैं। किन्तु सत्रहवीं सदी के ज्यादातर सन्त कवियों ने रेख्ता में कविताएँ नहीं लिखी। यहाँ तक कि दादू दयाल के शिष्यों में भी रेख्ता में कविताएँ लिखने का चलन नहीं दिखायी पड़ता है। इसका कारण ये है कि सत्रहवीं सदी के निर्गुन सन्त कवियों ने अपनी एक मिलीजुली भाषा विकसित कर ली, जिसे हिन्दी के विद्वानों ने सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी कहा है।

अठारहवीं सदी में रेख्ता उर्दू में तब्दील हो गयी। ये भी दिलचस्प तथ्य है कि अठारहवीं सदी में, शेल्डन पोलक के शब्दों में कहें तो, ब्रजभाषा का कॉस्मोपोलिटन वर्नाक्युलर के रूप में वर्चस्व स्थापित होता है। निष्कर्ष ये कि अठारहवीं सदी से पहले तक सधुक्कड़ी और रेख्ता में व्यापक स्तर पर साहित्य रचा गया। यहाँ तक कि उन पदों पर, जिनकी मूलभाषा शिवप्रसाद जी ने ब्रज बतायी है, रेख्ता की छाप दिखायी पड़ती है। इसे ही इमरे बंघा (2010) ने हिन्दी रेख्ता कहा है।

भाखा-क्षेत्र और भाखा-क्षेत्र के विभिन्न स्थानीय रूपों के अन्तर्सम्बन्ध और फिर उनके बीच से दो कॉस्मोपोलिटन वर्नाक्युलर-ब्रजभाषा और हिन्दी/उर्दू के विकास के इतिहास को समझने के लिए ये जानना जरूरी है कि रेख्ता और सधुक्कड़ी से क्या आशय है। इमरे बंघा (2010) ने लिखा है कि ‘मैं उस किसी भी कविता को रेख्ता कहूँगा, जो ‘वृहद्’ फारसी, गुरुमुखी, कैथी लिपि में लिखी गयी हो और जो वर्नाक्युलर हिन्दवी (जिसमें ब्रजभाषा शामिल है) तथा कॉस्मोपोलिटन फारसी का सचेत रूप से मिश्रण करती हो। ये रेख्ता सधुक्कड़ी से भिन्न है। सधुक्कड़ी सन्तों द्वारा प्रयुक्त स्वतःस्फूर्त ढंग से मिश्रित साहित्यिक भाषा है। इसमें उत्तर भारतीय बोलियों और भाषाओं की मिलावट है। यद्यपि सधुक्कड़ी में संस्कृत, अरबी और फारसी के शब्द भी आ जाते हैं, फिर भी ये विभिन्न वर्नाक्युलर्स के स्वतःस्फूर्त मेल से बनी भाषा है।’ बंघा (2010) के अनुसार एक साहित्यिक भाषा के रूप में रेख्ता का निर्माण सोलहवीं या पन्द्रहवीं सदी में सूफियों द्वारा किया गया। इसे मुगल दरबार से प्रोत्साहन मिला। इसका प्रयोग निर्गुण कवियों, जनमसाखी सिक्खों, कृष्ण भक्तों, राजस्थान के सत्रहवीं-अठारहवीं सदी के दरबारी कवियों और मिली-जुली संस्कृति के पुरस्कर्ता अन्य रचनाकारों द्वारा किया गया। यहाँ ये बात ध्यान में रखने की जरूरत है कि सूफी संतों ने उत्तर भारत में जिस प्रकार की हिन्दवी की हिमायत की वह कई बार खड़ी बोली या रेख्ता के बजाय ब्रजभाषा के ज्यादा नजदीक है। इमरे बंघा ने इसी लेख में विभिन्न विद्वानों द्वारा बताये गये भाषायी संकरता के कारणों का उल्लेख किया है। लेकिन हमारे इस लेख के प्रसंग में भाखा-क्षेत्र में घटित होने वाली भाषायी संकरण की प्रक्रिया की तुलना किसी और क्षेत्र में घटित भाषायी संकरण की प्रक्रिया से नहीं की जा सकती। क्योंकि भाखा-क्षेत्र के स्थानीय रूपों के बीच क्रियारूपों और उच्चारण के ढंग के अतिरिक्त साम्य इतना अधिक रहा है कि एक स्थानीय रूप को दूसरे क्षेत्रों में समझने में कोई खास दिक्कत नहीं होती थी। इसीलिए इस क्षेत्र के ज्यादातर कवि एक से अधिक स्थानीय भाषायी रूपों में कविताएँ रचते थे। यही नहीं, सधुक्कड़ी या रेख्ता के रूप में विभिन्न स्थानीय भाषायी रूपों को मिलाकर साहित्य लिखने का भी यहाँ खूब चलन रहा है। इसका निहितार्थ ये है कि भाषा के किसी स्थानीय रूप में साहित्य लिखने के साथ-साथ भाषा-क्षेत्र के विभिन्न स्थानीय रूपों को मिलाकर साहित्य लिखने की प्रवृत्ति यहाँ भक्ति-आन्दोलन के प्रारम्भ से ही अर्थात् लोकभाषाओं में साहित्य लिखने की प्रक्रिया की शुरुआत के साथ ही दिखायी पड़ती है। इसी वजह से भाखा-क्षेत्र के स्थानीय रूपों की स्वतंत्र भाषा के रूप में पहचान बनाने की कोई सचेत कोशिश यहाँ कभी नहीं की गयी। सधुक्कड़ी के रूप में विभिन्न भाषायी रूपों को मिलाने की परिणति अन्ततः ब्रजभाषा के विकास के रूप में दिखायी पड़ती है। अठारहवीं सदी के ज्यादातर निर्गुण कवियों ने ब्रजभाषा का ही इस्तेमाल किया। स्थानीय भाषा में सचेत रूप से फारसी मिलाकर लिखी जाने वाली रेख्ता की परिणति अन्ततः उर्दू के रूप में हुई। भाखा-क्षेत्र में इन दो काॅस्मोपोलिटन वर्नाक्युलर के अभ्युदय और काफी कुछ उनकी सहज स्वीकृति के कारण इस क्षेत्र के स्थानीय भाषायी रूपों को अलग भाषा के रूप में खड़ा करने का कोई सचेत प्रयास नहीं हुआ। संभवतः इसीलिए राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान राष्ट्र के लिए एक भाषा चुनने का प्रश्न आया तो इस क्षेत्र के लोगों ने बिना किसी विरोध के हिन्दी/उर्दू/हिन्दुस्तानी को राष्ट्र की भाषा के रूप में स्वीकार कर लिया और अपने क्षेत्रीय भाषायी रूपों को स्वतंत्र भाषा के रूप में मान्यता दिलाने के लिए कोई उल्लेखनीय प्रयास नहीं किया। इस प्रक्रिया की व्याख्या राष्ट्रभाषा के लिए अपनी क्षेत्रीय बोली को कुर्बान कर देने की भावना के रूप में करना पूरी तरह सही नहीं है। क्योंकि यहाँ अपनी क्षेत्रीय बोली के साथ एक मिले-जुले रूप को अपनाने की प्रवृत्ति पहले से रही है।

यह सही है कि इस दौर में क्षेत्रीय भाषायी अस्मिताओं के उभार दिखाई पड़ते हैं। लेकिन ये उभार दूसरी भाषायी अस्मिता के साथ उसके पारस्परिक संबंध का निषेध नहीं करते। अपनी इक्सक्लूसिव निरपेक्ष पहचान बनाने का प्रयास शायद ही कहीं दिखाई पड़ता हो। इसका एक कारण यह है कि जिसे हम क्षेत्रीय भाषायी अस्मिता के रूप में पहचानते हैं, उसके अपने क्षेत्र में ही क्रमशः परिवर्तित होने वाले कई रूप दिखाई पड़ते हैं। उसका कोई मानक रूप नहीं है जिसका उस क्षेत्र में प्रयोग होता हो। इसीलिए भोजपुरी और अवधी के तीन-चार उपरूपों की कल्पना करनी पड़ी। विडम्बना यह है कि ये विभाजन भी किसी ठोस भाषिक व्यवहार पर आधारित नहीं है। इन कल्पित उपरूपों को भी कई टुकड़ों में बाँटा जा सकता है। गाँव की बात तो छोडिए ही, एक ही शहर के अलग-अलग मुहल्लों में एक ही बोली बोलने के रंग-ढंग में फर्क दिखाई पड़ता है। इस तरह के सारे विभाजन और उपविभाजन अन्ततः संदिग्ध हो जाते हैं और उनका कोई ठोस तार्किक आधार नहीं बन पाता। सच तो ये है कि खास तरह की ज्ञान-मीमांसात्मक हिंसा को अंजाम दिए बिना क्षेत्रीय इक्स्क्लूसिव अस्मिताओं का निर्माण ही नहीं हो सकता था। कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि आधुनिक राष्ट्र-राज्य का निर्माण इसी प्रक्रिया के तहत हुआ, और शायद ही ऐसा कोई राष्ट्र बना हो जिसकी निर्माण-प्रक्रिया पूरी तरह शान्तिपूर्वक सम्पन्न हुई हो।

ये सही है कि 14वीं-15वीं शती में रेख्ता और सधुक्कड़ी के अतिरिक्त भाषा-क्षेत्र के कुछ स्थानीय रूपों का भी साहित्य-लेखन के लिए स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल किया गया, जैसे अवधी, मैथिली और फिर ब्रजभाषा। लेकिन अभी भी ‘भाषा-क्षेत्र’ के इन स्थानीय रूपों को सिर्फ भाखा या भाषा कहा गया। जैसे सोलहवीं सदी के अवधी के कवि तुलसीदास, अवधी में लिखने के बावजूद, अपनी भाषा को भाखा कहते हैं। सत्रहवीं सदी तक भाखा क्षेत्र की भाखा के सभी स्थानीय रूपों को भाखा ही कहा जाता था। 1676 में मिर्जा खाँ ने ‘तुहफतुलहिन्द’ में संस्कृत और प्राकृत के अतिरिक्त भाषा-क्षेत्र के सभी स्थानीय रूपों को भाखा कहा है। यद्यपि ‘ज़बाने अहले ब्रज’ का जिक्र भी उनके यहाँ आता है। फकीरुल्लाह मिर्जा खाँ के समकालीन थे और उन्होंने ब्रज मण्डल की भाषा को ‘सुदेश’ की भाषा कहा है। गोपाल नामक कवि ने अवश्य ‘रसविलास’ नामक ग्रन्थ में ब्रजभाषा शब्द का प्रयोग इससे पहले किया है। माना जाता है कि ज्ञात और उपलब्ध स्रोतों में यह ‘ब्रजभाषा’ शब्द का सबसे पुराना प्रयोग है। लेकिन ब्रजभाषा शब्द का बड़े पैमाने पर चलन अठारहवीं सदी में ही दिखायी पड़ता है। क्योंकि सत्रहवीं सदी के ही प्रसिद्ध कवि केशवदास ने कविताएँ तो ब्रजभाषा में लिखीं, लेकिन उसे ब्रजभाषा नहीं, सिर्फ भाषा कहा। इससे ये सिद्ध होता है कि गोपाल कवि के द्वारा ब्रजभाषा शब्द का प्रयोग करने के बावजूद 17वीं सदी में भी भाषा या भाखा का ही प्रयोग ब्रजभाषा  के लिए किया जाता था। केशवदास ने लिखा है:

भाषा बोलि न जानहि जिनके कुल के दास/भाषा में कविता करी, जड़मति केशवदास।।

केशवदास लिखते हैं ब्रजभाषा में, लेकिन उसे कहते हैं भाषा। केशवदास की तरह तुलसीदास ने रामचरितमानस लिखा अवधी में, लेकिन कहा कि ये भाषा में लिखा गया है। तुलसीदास की पंक्तियाँ देखिए:

(प) भाखाबद्ध करौं मैं सोई, मोरे मन प्रबोध जो होई।।

(पप) स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा

            भाषा निबद्ध मति मंजुलमातिनोति।।

बनारसीदास जैन ने अपनी आत्मकथा ‘अर्द्धकथानक’ (1641) में ब्रजभाषा को ‘मध्यदेश की बोली’ कहा है। केशवदास के तरह ही चिन्तामणि त्रिपाठी ने 1675 में लिखित ‘कविकल्पतरु’ (1875) में सुर वाणी की कविता के बजाय भाषा कवित्त की बात की है। भाषा के आगे ब्रज का इस्तेमाल उन्होंने भी नहीं किया है। हरिहर निवास द्विवेदी (1955) ने लिखा है कि बंगाली वैष्णव भक्तों के प्रभाव से ब्रजभाषा शब्द का चलन 17 वीं सदी में बढ़ा। इनके अनुसार मध्यदेश की बोली के साथ-साथ ‘मध्यदेशिया भाषा’ का भी ब्रजभाषा के लिए प्रयोग होता था। किशोरी लाल (1971) ने दिखाया है कि फारसी विद्वानों के बीच ब्रजभाषा के लिए ‘ज़बाने ग्वालियर’ पद का चलन था।

रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार ‘‘मुसलमान लोग भाषा शब्द का व्यवहार साहित्यिक हिन्दी भाषा के लिये करते थे जिसमें आवश्यकतानुसार संस्कृत के शब्द आते थे-चाहे वह ब्रज भाषा हो, चाहे खड़ी बोली। तात्पर्य  यह कि संस्कृतमिश्रित हिन्दी को ही उर्दू फारसीवाले ‘भाषा’ कहा करते थे। ‘भाखा’ से खास ब्रजभाषा का अभिप्राय उनका नहीं होता था, जैसा कुछ लोग भ्रमवश समझते हैं। जिस प्रकार वे अपनी अरबी फारसी मिली हिन्दी को ‘उर्दू’ कहते थे उसी प्रकार संस्कृत मिली हिन्दी को ‘भाखा’। भाषा का शास़्त्रीय दृष्टि से विचार न करनेवाले या उर्दू की ही तालीम खास तौर पर पाने वाले कई नए-पुराने हिन्दी लेखक इस ‘भाखा’ शब्द के चक्कर में पड़कर ब्रजभाषा को हिन्दी कहने में संकोच करते हैं। ‘खड़ीबोली पद्य’ का झंडा लेकर घूमनेवाले स्वर्गीय बाबू अयोध्याप्रसाद खत्री चारों ओर घूम घूमकर कहा करते थे कि

अभी हिन्दी में कविता हुई कहाँ, सूर, तुलसी, बिहारी आदि ने जिसमें कविता की है वह तो ‘भाखा’ है, ‘हिन्दी’ नहीं। संभव है इस सड़े गड़े खयाल को लिए अब भी कुछ लोग पड़े हों।’’ (1988: 285)

शुक्ल जी के ऊपर दिए गए उद्धरण से यह भ्रम फैलने की गुंजाइश लगती है कि भाषा शब्द का प्रयोग मुसलमान साहित्यिक हिन्दी भाषा के लिए करते थे और अरबी-फारसी मिली हिन्दी को उर्दू कहते थे। 19वीं-20वीं सदी के लिए यह बात सही हो तो हो, लेकिन इससे पहले भाषा/भाखा का प्रयोग हिन्दी क्षेत्र के रचनाकारों ने इस क्षेत्र के विभिन्न भाषायी रूपों के लिए किया है। संस्कृत-फारसी से इतर हिन्दी क्षेत्र के स्थानीय भाषायी रूपों के लिए 17वीं सदी तक भाषा/भाखा शब्द का प्रयोग किया जाता रहा। 17वीं सदी के उत्तरार्द्ध में ब्रजभाषा शब्द का चलन हुआ, इससे पहले ब्रजभाषा को भी सिर्फ भाखा कहा जाता था। असल में, हिन्दी क्षेत्र के रचनाकार जिसे भाखा कहते थे, उसे ही फारसी ग्रंथों में ‘हिन्दवी’, ‘हिन्दुई’ या ‘हिन्दी’ कहा जाता था। 19वीं सदी आते-आते यह जरूर हुआ कि हिन्दी का अर्थ  हिन्दी या उर्दू रह गया और हिन्दी क्षेत्र के बाकी भाषायी रूपों को ही भाखा कहा जाने लगा। दिलचस्प है कि ब्रजभाषा पद चलन में आ जाने के बाद भी हिन्दी प्रदेश के रचनाकारों की भाषा को भाखा ही कहा जाता था। यहाँ तक कि शिवसिंह सेंगर ने 1887 में प्रकाशित ‘शिवसिंह सरोज’ में हिन्दी क्षेत्र के कवियों को भाखा का कवि ही कहा है। (1970: भूमिका)

हिन्दीतर क्षेत्र में भी हिन्दी क्षेत्र की भाषा को भाखा/भाषा कहने के साक्ष्य मिलते हैं। ‘राधामाधवविलासचंपू’ (शक् सम्वत 1575 से 1580 के बीच, 1654 ई०) एक ऐसी रचना है जो शाहजी भोंसले के दरबार में जयरामपिंड्ये द्वारा बंगलौर में लिखी गई। इसमें बारह भाषाओं में कविताएँ लिखी गई हैं। इस ग्रंथ में भी उत्तर भारतीय भाषा के विविध रूपों में लिखी गई कविताओं को सिर्फ भाखा कहा गया है। मराठा और रेख्ता शब्द का प्रयोग तो मिलता है, लेकिन हिन्दी क्षेत्र के विभिन्न स्थानीय भाषा-रूपों का नामोल्लेख कहीं नहीं है, उन्हें सिर्फ भाखा कहा गया है। इस दौर के रचनाकार दूर-दूर तक भ्रमण करते थे और स्थानीय भाषा के विविध रूपों में या उन्हें मिलाकर रचनाएँ करते थे। काशी के कवीन्द्राचार्य सरस्वती के अभिनंदन में विभिन्न कवियों द्वारा लिखे गए ग्रंथ ‘कवीन्द्रचंद्रिका’ का उल्लेख आवश्यक है, जिसमें कुछ नाम ऐसे भी हैं, जो ‘राधामाधवविलासचम्पू’ में भी मिलते हैं। जयरामपिंड्ये का नाम भी ‘कवीन्द्रचंद्रिका’ में है। लेकिन राजमल बोरा के शब्दों में ‘यह निश्चित नहीं है कि ये चम्पू के रचयिता हैं।’(1968: 219) राजमल बोरा ने इन दोनों ग्रंथों के आधार पर जो निष्कर्ष निकाला है, वो ज्यादा महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार

कवि लोग शाहजहाँ के काल में वाराणसी से बंगलौर तक आया जाया करते थे और वे जहाँ-जहाँ जाते वहाँ के कवियों से सम्पर्क स्थापित करते और इनमें विचारों तथा भावों का आदान-प्रदान होता। ( 1968: 220 )

अन्ततः अठारहवीं सदी में न केवल ब्रजभाषा शब्द का प्रयोग बड़े पैमाने पर होने लगता है, बल्कि ये समझाने का भी प्रयास किया जाता है कि ब्रजभाषा का विकास कैसे हुआ। अठारहवीं सदी के अवध क्षेत्र के रहने वाले और काव्यशास्त्र के आचार्य भिखारीदास ने ब्रजभाषा के विकास में छः भाषाओं के योगदान की चर्चा की है:

ब्रजभाषा भाषा रुचिर, कहैं सुमति सब कोई।

मिल संस्कृत पारस्यौ, पै अति प्रगट जु होई।।

ब्रज मागधी मिलै अमर, नाग यवन भाखानि।

सहज पारसी हूँ मिलै, षट विधि कहत बखानि।।

(1957)

ब्रजभाषा के विकास में भिखारीदास ने संस्कृत, फारसी, मागधी, नाग और यवन भाषाओं का उल्लेख किया है। मिर्जा खाँ के ब्रजभाषा व्याकरण से पता चलता है कि प्राकृत को पातालबानी और नागबानी भी कहा जाता था। इसलिए नाग भाषा से आशय प्राकृत भाषा है। शुक्ल जी के अनुसार मागधी का आशय अवधी समेत पूर्वी हिन्दी की सभी बोलियों से है। इससे पहले भाखा शब्द का प्रयोग भाखा-क्षेत्र के किसी भी स्थानीय रूप के लिए किया जा सकता था और किया जाता था। भाखा का मतलब होता था- भाखा-क्षेत्र में बोली जाने वाली भाखा। कबीर ने इसी अर्थ में भाखा को बहता नीर कहा था। भाखा शब्द कबीर के यहाँ भाषा-क्षेत्र के किसी विशिष्ट स्थानीय रूप का सूचक नहीं। भाखा एक भाववाचक संज्ञा है। मिर्जा खाँ के 1676 में लिखित ब्रजभाषा व्याकरण से ये समझ में आता है कि सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध तक आते-आते भाषा शब्द का प्रयोग ब्रजभाषा और भाखा क्षेत्र के सभी स्थानीय रूपों के लिए किया जाने लगा। मिर्जा खाँ ने अपने व्याकरण में संस्कृत, प्राकृत के बाद भाखा का उल्लेख किया है। भाखा के बारे में उन्होंने लिखा है कि

इसमें प्रेमी-प्रेमिका को लेकर अलंकृत कविता लिखी जाती है। ये उस दुनिया की भाषा है, जिसमें हम रहते हैं। इसका प्रयोग संस्कृत और प्राकृत को छोड़कर बाकी सभी भाषाओं के लिए किया जाता है।  (पृ. 34 और 7)

मिर्जा खाँ के इस विवरण से स्पष्ट होता है, जैसा कि पहले कहा गया, भाखा शब्द का प्रयोग अलंकृत या शृंगार रस प्रधान ब्रजभाषा में लिखी गई कविताओं के लिए किया जाने लगा और इसमें संस्कृत और प्राकृत के अतिरिक्त सभी ‘भाषाओं’ को अन्तर्भुक्त मान लिया गया। इसका निहितार्थ ये है कि सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध तक भाखा शब्द का प्रयोग दोनों अर्थों में होता था; एक, भाखा-क्षेत्र के सभी स्थानीय रूपों के लिए और दो, ब्रजभाषा के लिए। जैसे तुलसीदास ने सोलहवीं सदी में भाखा शब्द का प्रयोग भाखा-क्षेत्र के स्थानीय रूप अवधी के लिए किया था, वैसे ही सत्रहवीं सदी में केशव ने भाखा शब्द का प्रयोग भाखा-क्षेत्र के स्थानीय रूप ब्रजभाषा के लिए किया। लेकिन अठारहवीं सदी में ब्रजभाषा में लिखी गई कविताओं को भाषा में लिखी गई कविता कहने के बजाय ब्रजभाषा में लिखी गयी कविता कहा जाने लगा। यही नहीं, जैसा कि पहले कहा गया, भाखा क्षेत्र के अन्य स्थानीय रूपों को ब्रजभाषा में अन्तर्भुक्त मान लिया गया। शेल्डन पोलक के शब्दों में, भाखा क्षेत्र में ब्रजभाषा की स्थिति काॅस्मोपोलिटन वर्नाक्युलर जैसी बन गई।(1998: 6-37)इसके बावजूद इस दौर के कुछ ऐसे कवि जो सिर्फ ब्रजभाषा में नहीं लिखते हैं, वे अपनी भाषा को नाम देने से हिचकते हैं। जैसे गिरधर कविराय ने उस दौर की भाषा को नर-भाषा कहा है। क्योंकि संस्कृत देवभाषा है, इसलिए मनुष्यों द्वारा व्यवहार में लाई जाने वाली भाषा नर-भाषा हुई। इसलिए नर-भाषा को भाषा/भाखा के पर्याय के रूप में ही लेना चाहिए।

5

‘पंजाब का विभाजन करने वाली रेखा कहाँ होनी चाहिए, इस विषय पर दोनों में बहुत चर्चा होती, परन्तु उनमें भी कोई समझौता सम्भव न होता, मिर्जा पाकिस्तान की सीमा में अम्बाला और फीरोजपुर तक सम्मिलित करने के पक्ष में था। उसका तर्क था; पंजाब एक है; उसके टुकडे़ नहीं होने चाहिए।

महेन्द्र आपत्ति करता -‘‘लायलपुर, मिंटगुमरी, सरगोधा और शेखूपुरा की नहरी आबादियों में सत्तर-अस्सी प्रतिशत भूमि और आबादी सिक्खों और हिन्दुओं की है। वे पाकिस्तान में क्यों रहें। क्या वे लोग अपनी भूमि उठाकर हिन्दुस्तान ले जायें? हिन्दुस्तान की सीमा वहाँ ही क्यों न हो!’’

‘‘उन्हें पाकिस्तान में रहने से कौन मना करता है!’’

‘‘तो मुस्लिम प्रधान पंजाब को ही हिन्दुस्तान का अंग बना रहने में क्या आपत्ति है?’’ प्रकट में झगड़ा न होने पर भी दोनों की बातचीत कम होती जा रही थी।’’ यशपाल, (2010: 232-233)

भारत में पश्चिम के ‘लैंग्वेज नेशन प्रोजेक्ट’ के तहत उन्नीसवीं सदी में भाषा के क्षेत्रीय रूपों की इक्स्क्लूसिव पहचान बनाने का प्रयास पश्चिम और भारत के विद्वानों ने किया। लेकिन सदियों से चली आ रही पारस्परिक संबद्धता की वजह से भाषायी क्षेत्रीय पहचान ने स्वतंत्र राष्ट्र-निर्माण की मांग का रूप नहीं लिया। पश्चिम की वजन पर देखें तो भारत में उतने राष्ट्र बनेंगे जितनी क्षेत्रीय भाषाएँ स्वीकार्य होंगी। क्षेत्रीय भाषायी अस्मिताओं का चाहे जितना विस्तार हुआ हो लेकिन इस प्रक्रिया का कभी भी स्वतंत्र राष्ट्रीय पहचान में रूपान्तरण नहीं हुआ। स्वतंत्र राष्ट्र-निर्माण का आधार भाषा नहीं बन पायी, इसलिए धार्मिक भिन्नता के आधार पर स्वतंत्र राष्ट्र बनाने का प्रयास किया गया और उसमें सफलता भी हासिल हुई। जैसाकि अमत्र्य सेन (2007) ने अपनी पुस्तक ‘अइडेन्टिटी एण्ड वायलेन्स’ में दिखाया है कि पहचान के कई आयाम होते हैं। सिर्फ धार्मिक आधार पर गढ़ी गई पहचान प्रायः एकायामी और हिंसक होती है। सिर्फ धार्मिक भिन्नता के आधार पर बने राष्ट्रों की विडम्बना यह है कि अपना स्वतंत्र वजूद कायम रखने के लिए उन्हें किसी न किसी रूप में, चाहे-अनचाहे, धार्मिक भिन्न्ता की भावना को हवा देनी पड़ती है। प्रसेनजित दुआरा (2012) ने अपने एक लेख में दिखाया है कि आरम्भिक आधुनिक दौर में विभिन्न सभ्यताओं के बीच पारस्परिक आदान-प्रदान का सिलसिला बहुत तेजी से आगे बढ़ता है। यही कारण है कि उस दौर के इतिहास को भिन्नता नहीं, बल्कि सम्बद्धता के सहारे ज्यादा बेहतर ढंग से व्याख्यायित किया जा सकता है। लेकिन राष्ट्रवाद के अभ्युदय के साथ सम्बद्धता के सूत्रों के निषेध का सिलसिला शुरू हो जाता है और इक्स्क्लूसिव भिन्नताओं पर जोर दिया जाने लगता है।

अठारहवीं सदी के दौरान भाखा-क्षेत्र में दो भाषायी रूपों, जिन्हें आज ब्रज और हिन्दी-उर्दू के रूप में जाना जाता है, का वर्चस्व स्थापित हो गया। हिन्दी-उर्दू की कहानी से तो हम वाकिफ हैं, लेकिन ब्रजभाषा के विस्तार के किस्से को हम भूल चुके हैं। विद्वानों ने इस ओर संकेत किया है कि खड़ी बोली के समानान्तर दक्खिनी और गुर्जरी का विकास सोलहवीं सदी में दिखाई पड़ता है। लेकिन उल्लेखनीय तथ्य ये भी है कि गुजरात समेत भारत के कई क्षेत्रों में अठारहवीं सदी तक ब्रजभाषा का बड़े पैमाने पर विस्तार हो चुका था। इन क्षेत्रों में ब्रजभाषा में कविता लिखने और ब्रजभाषा सिखाने की परम्परा सुदृढ़ हो गई थी। महाराष्ट्र के कवियों ने भी भाखा-क्षेत्र की बानियों में भक्ति की कविताएँ लिखी थीं। इसलिए भाखा-क्षेत्र के अतिरिक्त वृहत्तर भाखा-क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से भाखा-क्षेत्र से अलग पड़ने के बावजूद भाखा-क्षेत्र की बोली/बानियों से प्रभावित होता रहा है और उन्हें प्रभावित भी करता रहा है। कुछ प्रसंगों में तो उसकी भूमिका भाषा-क्षेत्र में घटित होने वाले भाषायी परिवर्तन में निर्णायक रही है।

ये कहना पूरी तरह सही नहीं है कि राष्ट्रवादी आग्रह के कारण समूचे भाखा-क्षेत्र में इस क्षेत्र के स्थानीय रूपों को दरकिनार कर हिन्दी का आरोप कर दिया गया। असल में 19वीं सदी तक आते-आते भाखा-क्षेत्र में इस क्षेत्र के दो कॉस्मोपोलिटन भाषा-रूपों का विकास और वर्चस्व हो चुका था, जिन्हें ब्रजभाषा और हिन्दी/उर्दू के रूप में जाना जाता है।

ये सच है कि 18 वीं सदी में ब्रजभाषा का वर्चस्व भाखा-क्षेत्र और वृहत्तर भाखा-क्षेत्र में कायम हो चुका था। लेकिन शासन-प्रशासन से जुड़ी हुई भाषा होने के कारण उर्दू का प्रयोग ब्रजभाषा की तरह सिर्फ साहित्य-लेखन के लिए नहीं, बल्कि शहरों में वैचारिक आदान-प्रदान तथा प्रशासनिक कार्यों के लिए भी किया जाने लगा था। इसलिए भाखा-क्षेत्र की एक भाषा के रूप में उर्दू/हिन्दी का दावा ब्रज के मुकाबले ज्यादा मजबूत साबित हुआ। ये जरूर है कि खड़ी बोली पर आधारित फारसीकृत उर्दू को हिन्दी बनाने की प्रक्रिया में उस समूचे ऐतिहासिक विकासक्रम को लगभग उलट दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप पहले रेख्ता और फिर 1700 के आसपास फारसी-बहुल उर्दू का विकास हुआ था। उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में भाखा-क्षेत्र के विभिन्न स्थानीय रूपों और फारसी के प्रचलित शब्दों को हटाकर एक तत्सम-प्रधान संस्कृत-बहुल हिन्दी गढ़ने की कोशिश की गयी। इस प्रक्रिया में रेख्ता एवं सधुक्कड़ी की साझी और मिलीजुली विरासत को दरकिनार कर दिया गया।

उन्नीसवीं सदी में भारतेन्दु के द्वारा कविता की भाषा के रूप में ब्रजभाषा को न छोड़ पाने के पीछे ब्रजभाषा की सुदीर्घ साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्परा की भी भूमिका थी। उल्लेखनीय है कि ब्रजभाषा और उर्दू का अन्तर सिर्फ लिपि और शब्द चयन के कारण नहीं है, सांस्कृतिक विरासत के भिन्न स्रोतों से अपना सम्बन्ध जोड़ने के कारण भी है।

आधुनिक युग की जरूरतों और व्यावहारिक तकाजों की दृष्टि से हिन्दी का एक मानक रूप तय करने के दौरान भाखा के विभिन्न स्थानीय रूपों को पूरी तरह दरकिनार कर हम हिन्दी-क्षेत्र के सांस्कृतिक वैविध्य और उसकी पूर्व परम्परा के साथ न्याय नहीं कर पाये। एक शुद्ध हिन्दी गढ़ने के पीछे औपनिवेशिक प्रभुओं के भाषा-परिवार विषयक चिन्तन का भी छाप सहज ही पहचानी जा सकती है। यह सही है कि समय-समय पर नाना कारणों से इस क्षेत्र में अनेक ऐसे केन्द्र बने, जिनकी पहचान भाखा के स्थानीय रूपों के आधार पर की जा सकती है। किन्तु समस्या यह भी है कि कई क्षेत्रों में भाषा के स्थानीय रूपों का साहित्य-संस्कृति की भाषा के रूप में उन्नयन ही नहीं हुआ। ऐसा क्यों हुआ? संभवतः हिन्दवी/ब्रजभाषा के कॉस्मोपॉलिटन रूप ने इस संभावना का निषेध कर दिया।

(6)

भाखा के इन विविध रूपों में जो साहित्य लिखा गया उसका गहरा सम्बन्ध संगीत और अन्य कला रूपों से रहा है। यह साहित्य एक से अधिक लिपि में लिखा गया है फिर भी अपने प्रदर्शनकारी/वाचिक (¼Performative/recitative) चरित्र  के कारण इसकी पहुँच उन लोगों तक भी होती रही है जो उस लिपि को नहीं जानते, जिसमें इसे लिखा गया। यही नहीं, यह साहित्य अपने प्रदर्शनकारी चरित्र (Performative character) के कारण उन लोगों तक भी पहुँचता है जो आज के मुहावरे में निरक्षर हैं। इसलिए भाषा के लिखित रूप और वाचिकता के बीच गहरे सम्बन्ध पर भी गंभीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है।

भाखा के इन विभिन्न रूपों ने अपने विकास के दौरान शास्त्रीय भाषाओं के साहित्य से ही नहीं, लोकसाहित्य से भी बहुत कुछ ग्रहण किया है। यही नहीं, लोकसाहित्य का चरित्र तो प्रदर्शनकारी है ही, लिखित साहित्य का चरित्र भी प्रदर्शनकारी/वाचिक है। यह वो बिन्दु है जहाँ लोकसाहित्य और लिखित साहित्य पुनः एक दूसरे के सम्पर्क में आ जाते हैं।

विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक-धार्मिक प्रभावों के परिणाम स्वरूप निर्मित अनेक केन्द्र तो हिन्दी-क्षेत्र में दिखाई पड़ते हैं, किन्तु भाखा की ही तरह इन केन्द्रों को पूर्णतः आत्मपूर्ण और दूसरे केन्द्रों से निरपेक्ष कोटियों के रूप में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। जैसे अवध के केन्द्र में कृष्ण काव्य की परम्परा दिखाई पड़ती है और ब्रज-क्षेत्र में रामकाव्य परम्परा का अभाव नहीं है।एक भाषायी केन्द्र में ही विभिन्न परम्पराओं के बीच संवाद और सह-अस्तित्व दिखायी पड़ता है।ये भी सोचने की जरूरत है कि कोई सांस्कृतिक-धार्मिक परम्परा पूरी तरह नये सिरे से किसी केन्द्र का निर्माण नहीं करती, बल्कि पहले से चली आ रही परम्पराओं से वाद-विवाद-संवाद करते हुए, उस केन्द्र पर एक नयी परत चढ़ाती है। इसलिए किसी केन्द्र का अध्ययन क्षैतिज और लम्बवत दोनों दृष्टियों से किया जाना चाहिए। इसका निहितार्थ यह है कि चली आ रही परम्पराएँ नयी परम्परा को यथावत् स्वीकार नहीं करतीं, बल्कि उसे अपने ढंग से ढालती और बदलती हैं। इसका मतलब यह भी है कि शास्त्रीय परम्पराओं का इन केन्द्रों के इर्द-गिर्द जितना गहरा प्रभाव होगा, उतना गहरा प्रभाव केन्द्र से दूर जाने पर नहीं दिखाई पड़ेगा। इसलिए हिन्दी-क्षेत्र की सांस्कृतिक बनावट को सिर्फ शास्त्रीय परम्परा के केन्द्रों के आधार पर ठीक से व्याख्यायित नहीं किया जासकता। लोकजीवन के दैनंदिन व्यवहार के गंभीर अध्ययन के बिना हिन्दी-क्षेत्र की सांस्कृतिक बनावट की समग्रता को नहीं समझा जा सकता।

स्पष्ट है कि पश्चिमी अध्येताओं ने भारत के भाषायी मानचित्र का अध्ययन, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, भाषा और राष्ट्र की परियोजना के तहत किया। यह स्वाभाविक था कि वे भारतीय भाषाओं की पारस्परिक संबद्धता के बजाय भिन्नता पर जोर देते। मैं पूरी विनम्रता के साथ यह प्रस्ताव करना चाहता हूँ कि भारतीय भाषाओं के चरित्र को भिन्नता के बजाय पारस्परिक सम्बद्धता के पैराडाइम में देखने की जरूरत है। पारस्परिक सम्बद्धता के पैराडाइम में देखने पर भारतीय भाषायी मानचित्र की तस्वीर बहुत कुछ बदल जाती है। और फिर मनमाने ढंग से निर्मित की गई भिन्नता में एकता देखने की कोशिश का खोखलापन भी उजागर हो जाता है। भाषाएँ ही नहीं भारत की क्षेत्रीय संस्कृतियों के संबंध भी पारस्परिक संबद्धता के पैराडाइम में ज्यादा बेहतर ढंग से समझे जा सकते हैं। वह एक स्वतंत्र अध्ययन का विषय है और उसे अंजाम देने के लिए एक नहीं, अनेक लोगों को मिल कर काम करना होगा। लेकिन यह काम अवश्य ही किया जाना चाहिए। क्योंकि इस तरह के काम से ही वास्तविक भारत और उसकी नैसर्गिक गति का बोध संभव होगा और औपनिवेशिक आधुनिकता द्वारा निर्मित की गई भारत की छवि की सीमाओं और विडम्बनाओं का एहसास होगा। और तभी सही मायने में भारत के उत्तर-औपनिवेशिक सांस्कृतिक पुनर्पाठ की शुरुआत होगी।

सन्दर्भ:

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अंगे्रजी विभाग, बीएचयू के प्रो० संजय कुमार और प्रो० अर्चना कुमार  के प्रति अपना आभार प्रकट करता हूँ। इस लेख को तैयार करने में मुझे इनके विचारों का लाभ मिला। इस लेख की पांडुलिपि तैयार करने में मेरे प्रिय शोध-छात्रों अशोक सिंह यादव और सुकेश लोहार ने योगदान दिया। उन्हें साधुवाद!

प्रो॰राजकुमार

प्रो॰ राजकुमार।  शोर-शराबे से दूर अध्ययन-अध्यापन में मग्न रहने  वाले युवा-तुर्क हिन्दी आलोचक। भक्ति साहित्य, हिन्दी नवजागरण, भाषा, आधुनिकता, आधुनिक साहित्य, प्रेमचंद, हिन्दी कहानी इत्यादि पर लगातार लेखन।  किताबों में जैसी रुचि इनकी  है,  वह अन्यत्र दुर्लभ ही हो गई है। फिलहाल, घेंट विश्वविद्यालय , बेल्जियम  के हिंदी विभाग में  विजिटिंग प्रोफेसर।इनसे dr.kumar.raj@gmail.com पर संपर्क संभव।

साभार- तद्भव

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