यादगारे ‘फ़िराक़’: रामजी राय

रघुपति सहाय ‘फ़िराक़’के व्यक्तित्व के बारे में लिखने की इच्छा वर्षों पहले तब पैदा हुई, जब अली सरदार जाफ़री द्वारा जलाल आगा के निर्देशन में उर्दू के 6 अदीबों (हसरत मोहानी, जिगर मुरादाबादी, जोश मलीहाबादी, मजाज लखनवी, ‘फ़िराक़’ गोरखपुरी और मखदूम मोहिउद्दीन) पर बने सीरियल ‘‘कह्कशाँ’’ में ‘फ़िराक़’ वाला इपीसोड देखा। उसमें ‘फ़िराक़’ के साथ अन्याय तो नहीं हुआ है लेकिन मुझे लगा कि ‘फ़िराक़’ के बहुआयामी व्यक्तित्व की बनावट, उसकी द्वंदात्मकता की झलक दे पाने में वह सफल नहीं हो पाया है। ऐसा शायद सीरियल बनाने की बहुतेरी सीमाओं के कारण हुआ हो।

लेकिन एक सवाल मुझे परेशान कर रहा है कि तब से लेकर बहुत अर्सा गुज़रा मैं क्यों नहीं लिख सका, फिर अभी क्यों? ठीक-ठीक कह नहीं सकता। ‘फ़िराक़’ के ही हवाले से शायद इसलिए –

ये रात वो कि सूझे जहां न हाथ को हाथ

ख़यालों दूर न जाओ बहुत अंधेरा है

गुज़श्ता अह्द की यादों को फिर करो ताज़ा

बुझे चिराग जलाओ बहुत  अंधेरा है।

‘‘गैर क्या जानिए क्यों मुझको बुरा कहते हैं

आप कहते हैं जो ऐसा तो बजा कहते हैं

‘फ़िराक़’ अपनी ज़िंदगी में ही किंवदंती बन गए थे। एक अजीब आदमी -हिंदी-विरोधी, झक्की, मुशायरों में और यूं भी शराब पीकर हंगामा खड़ा कर देने वाला, समलैंगिक, इसी नाते परिवार को पास न रखने वाला, बेटे ने भी इसी नाते आत्महत्या कर ली आदि-आदि बातें उनके बारे में सुनने को मिलीं जब हम इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में आए-ही-आए थे। ये बातें आज भी आपको सुनने को मिल जाएंगी।

‘फ़िराक़’ से अपनी पहली मुलाकात का जिक्र महादेवी वर्मा के संदर्भ में मैं पहले भी कर चुका हूँ। उसके बाद से उनके यहाँ बराबर जाना होता रहा। तब इलाहाबाद में परिवेश नाम की एक साहित्यिक संस्था थी। जिसमें नए लिखनेवाले लोग थे। विभूतिनारायन राय (वी.एन. राय), दिनेश शुक्ल, मसूद भाई, (जिनकी पहली नौकरी लखनऊ में ‘फ़िराक़’साहब ने जान-पहचान के किसी जज से कह-सुन कर लगवाई थी), कृष्णप्रताप सिंह (केपी), डीपीटी (देवी प्रसाद त्रिपाठी), कमलाकांत त्रिपाठी, राकेश श्रीवास्तव, रवीन्द्र उपाध्याय आदि आदि। बाद को उसमें उर्मिलेश, राजेन्द्र मंगज आदि जुड़ते गए।

तो कई मौकों पर यह परिवेश का सकल झुंड ‘फ़िराक़’ के यहाँ जा धमकता था। उसमें बाज़ दफा चितरंजन सिंह जैसे और लोग भी शामिल रहते। लेकिन अक्सर जानेवालों में विभूतिनारायन राय, दिनेश शुक्ल, मसूद भाई, कृष्णप्रताप सिंह, डीपीटी (देवी प्रसाद त्रिपाठी) और मैं हुआ करते थे। बाद को मैं और केपी लगभग हर तीसरे-चौथे रोज उनके यहाँ जाते। ‘फ़िराक़’ साहब के अंतिम दिनो में मैं, अपनी बेटी समता को साथ लिए, जो तब बमुश्किल दो-ढाई साल की थी, जाता रहा था।

यादों का सिलसिला शुरू करूँ इसके पहले मैं आपको साफ बता देना चाहता हूँ कि ‘फ़िराक़’ जैसा हैरतअंगेज, हाजि़र-जवाब, दिलचस्प, जीवंत, उम्र-हैसियत-तजुर्बा-ज्ञान-ख्याति किसी का कोई भेद-भाव, लाज-लिहाज़ किए बगैर सबसे बराबरी के स्तर पर आकर बात करने वाला, निहायत डेमोक्रेटिक मिज़ाज की शखि़्सयत का कोई दूसरा आदमी मुझे नहीं मिला।

दूसरी बात कि इन यादों के इस सिलसिले में कोई तरतीब नहीं है, न कोई अंतर्निहित संबंध-सूत्र, सिवा उस व्यक्तित्व के। @लेखक

रघुपति सहाय ‘फ़िराक़’

रघुपति सहाय ‘फ़िराक़’

‘फ़िराक़’: ‘बच्चा सोते में मुस्कुराये जैसे’

By रामजी राय

एक निराला शख़्स

‘‘गुज़श्ता अह्द की यादों को फिर करो ताज़ा’’

बैंक रोड पर टीचर्स फ्लैट में ‘फ़िराक़’ साहब रहते थे। उनके फ्लैट में बाहर के लॉन में एक मंडपनुमा मड़ई भी थी। बांस की फट्टियों से चारों तरफ घिरी, खुली-खुली सी। उसमें चचरी भी बांस की ही लगी थी। वहाँ एक मेज, एक छोटी टेबल, कुछ कुर्सियाँ और एक बिस्तर लगी चारपाई रहते। ‘फ़िराक़’ साहब गर्मी की शाम और बरसात के दिनों में, अगर तेज़ हवा और बौछारों वाली बारिश न हो रही हो, बाज़ दफा दोपहर में भी, वहीं देर तक रहते, नहीं तो फिर अमूमन अंदर बारामदे में। वहीं बड़ा-सा एक टेबल, जो उनका खास अपना, काम करने का टेबल था, कुछ कुर्सियाँ और बिस्तर लगी चारपाई या शायद तखत होते थे। उनकी देख-भाल करने वाले जब साफ-सफाई करते होते, वे एक बात जरूर कहते, रमेश (मैंने अक्सर यही नाम सुना) देखना मेरी टेबल को मत छूना भाई नहीं तो सब उलट-पलट, बेतरतीब कर दोगे, फिर मुझे चीज़ें तलाश करने में परेशानी होगी। अब आप किताबों, कागज के टुकड़ों और क्या-क्या से जैसे-तैसे अंटे पड़े उस टेबल को देखते तो उससे बेतरतीब आपको कुछ और न लगता, ऊपर से दिखने वाली उनकी ऊटपटाँग, बेतरतीब, मैली-कुचैली जिंदगी के बाहरी अक्स की तरह। लेकिन उसके भीतर एक और ज़िंदगी थी जो उसी से अपने ग़म और फि़क्रोफ़न के सामान सहेजती, उन्हें तरतीब देती, दिव्य बनाती, जैसे ऐसा न हो तो सब कुछ उलट-पलट जाएगा।

‘फ़िराक़’ को जब भी देखा, होटों में सिगरेट दबाये बैठे या अध-लेटे कुछ गुनगुनाते हुए। उस उम्र में भी उनकी भारी-सी गूँज भरी खनकदार आवाज़ उसी तरह क़ायम थी। जब वे अपनी बात ख़त्म करते उनका मुंह छोटा गोल-सा खुला होता और चौंक, चुनौती, शरारत से भरी उनकी आँखें फैल कर बड़ी हो जातीं। उनकी बातें और मुद्राएँ एक-दूसरे को संप्रेषित करती एक प्रभावकारी अंदाज़-ए-बयां में एकरस हो जातीं। ‘फ़िराक़’ साहब ने अपनी शायरी के बारे में जो बात कही है, वह उनकी बातचीत के लहजे पर भी लागू होती है – ‘‘मैं जिन विषयों पर काव्य रचना करना चाहता था- स्वर, ध्वनि और संकेत के सहारे उन्हें काव्यात्मक और कलात्मक बना कर दिव्य भी बनाता था। साथ ही साथ ठेठ मानवता का लबोलहजा भी अपनी कविता में मुझे पैदा करना था। …..दिव्यता भौतिकता से अलग वस्तु नहीं है। …साधारण-से-साधारण विषयों को सुगम-से-सुगम भाषा और स्वाभाविक-से-स्वाभविक शैली में इतना उठा देना कि पंक्तियों की उँगलियाँ सितारों को छू लें, यही उच्चतम काव्य-रचना है।’’ वे बातचीत में बिलकुल बेबनाव, अनौपचारिक और बेबाक रहते। लेकिन वे साधारण से साधारण बातचीत को अपने स्वर, ध्वनि, संकेतों और शरारतों से भरी वक्तृत्व कला से दिव्य बना देते थे। ऊंचे से ऊंचे विषयों को बोलचाल की भाषा, रोज़मर्रे के उदाहरणों, ठेठ मुहावरों और बातचीत की शैली में इतना हल्का-फुल्का, सहज-सरल बना देते थे कि उनकी बातचीत की उँगलियां सुनने वालों के मन के तार को छू लेती थीं। कृष्ण कल्पित ने अपनी किताब ‘बाग-ए-बेदिल’ में ‘फ़िराक़’ का जो चित्र खींचा है वो सटीक-सा शब्द-चित्र है, सिवाय एक बात के- वे ‘सुन्न’ (सूने) भवन में तो रहते थे, चेन स्मोकर थे ही, हर घंटे शराब की एक पेग चहिए होती थी लेकिन वे ‘टुन्न’ नहीं रहते थे। वह एक ऐसी बेहोशी थी जो होश वालों का पता रखती थी। वह एक ख्वाबीदा बेखबरी होती थी, जो किसी के आ जाने या बात करते वक्त कितना टूटती थी कितना नहीं, नहीं कह सकता-

जाओ न तुम इस बेखबरी पर कि हमारे

हर ख़्वाब से इक अह्द (युग) की बुनियाद पड़ी है।

वे न एक रंग की शराब पीते थे, न एक रंग की सिगरेट। उनके दराज में कितने तरह की शराब होती थी यह तो कभी नहीं देखा लेकिन उनके सिरहाने स्टूल पर चार-पाँच तरह की सिगरेट पड़ी रहती थी। एकबार हमलोगों ने पूछा, हुजूर (उनसे इसी सम्बोधन से हम सब बात करते थे, शायद और लोग भी) आपको सबसे अच्छी शराब कौन सी लगती है?

‘पी तो बहुत तरह की लेकिन खिंची जमुनापारी (महुए की चुलाई देसी) के मुकाबले की कोई नहीं।’

अन्य दूसरी शराब तो वे दूकानों से मंगाते थे लेकिन इसके लिए ‘फ़िराक़’ साहब अक्सर खुद जाते थे रिक्शे पर बैठ कर, ले आने।

एक बार ‘फ़िराक़’ साहब अपनी उसी खिंची जमुनापारी एक काँख में दबाये, दूसरी हाथ में लिए रिक्शे से गुजर रहे थे। रास्ते में डायमंड जुबली हॉस्टल दिखा। केपी उसी हॉस्टल में रहते थे। ‘फ़िराक़’ साहब ने अपना रिक्शा हॉस्टल के अंदर मुड़वाया। भीतर लड़कों से पूछने लगे -एक केपी नाम का लड़का यहाँ रहता है। लड़के मुंह दबाये मुस्कुरा रहे थे। अब ‘फ़िराक़’ साहब, वह भी हॉस्टल में जा कर किसी लड़के के बारे में पूछें और लड़के मुस्कुराएं न, यह हो नहीं सकता। बताया कि हाँ रहते हैं, फर्स्ट फ्लोर पर। तो ज़रा बुला लाने की तक्लीफ़ करिएगा- ‘फ़िराक़’ साहब ने कहा। एक लड़का दौड़ता गया केपी को बुलाने। पलक झपकते यह बात हॉस्टल के कमरे-कमरे तक फैल गई। हॉस्टल के लगभग सारे लड़के बाहर आ गए, ‘फ़िराक़’ साहब को देखने। बुलाने गये लड़के ने आ कर बताया – वे कहीं बाहर गए हैं, कमरे में ताला बंद है। ‘फ़िराक़’ साहब ने रिक्शा मुड़वाया और वापस चल दिये। अब आप सोच सकते हैं कि जब केपी लौट कर हॉस्टल आए होंगे तो लड़कों ने उनकी क्या गत बनाई होगी।

उसके एक दो-दिन बाद मैं और केपी ‘फ़िराक़’ साहब के यहां पहुंचे। केपी ने पूछा आप डीजे हॉस्टल गए थे हुजूर?

‘हां उधर से आ रहा था तो सोचा तुमसे मिलता चलूँ।’

लेकिन मेरी तो आफत हो गई, केपी ने कहा।

-क्यूं?

अब आप किसी लड़के को ढूंढते हॉस्टल जाएं और उसकी फ़ज़ीहत न हो जाये यह हो सकता है!

‘फ़िराक़’ हँसते हुए – लौण्डे होते बहुत शरारती हैं।

फिर उस दिन चुहलबाजी-सी शुरू हो गई। एक बात केपी कहते, उस पर दहला जड़ते ‘फ़िराक़’ कुछ कहते। इस नहले पर दहले में ‘फ़िराक़’ साहब ने कोई ऐसा दहला मारा कि हार-सी मानते हुए केपी ने कहा- हुजूर आप ने तो मुझे फ्लैट, (एकदम चित) कर दिया। फैल कर बड़ी हो आई शरारती मुस्कान भरी आँखें केपी के चेहरे पर केंद्रित करते हुए ‘फ़िराक़’ साहब ने जड़ा- इरादा न था। और हम तीनों जोर से हंस पड़े।

‘फ़िराक़’साहब सबसे बराबरी के स्तर पर आकर बात ही नहीं करते थे, दूसरे को अपना मत रखने के लिए उकसाते भी थे। उन्हें केवल हुंकारी भरने वाले कभी पसंद न आते। एक बार मैं और केपी पहुंचे ‘फ़िराक़’ साहब के यहां। उस वक्त कोई सज्जन उनसे बात कर रहे थे। हम दोनों बगल कि कुर्सियों पर आहिस्ता चुपचाप बैठ गए। बात क्या हो रही थी, ‘फ़िराक़’ साहब ही बोल रहे थे और वे महोदय हां हुजूर, जी हुजूर करते जा रहे थे। अचानक ‘फ़िराक़’ साहब ने कहा -एक बार तो नहीं करिए हुजूर ताकि लगे कि दो लोग बात कर रहे हैं।- अब हम दोनों को तो इतनी जोर से हंसी फूट रही थी कि उसे रोके बुरा हाल था। वे सज्जन लजाये लड़के की तरह कुछ देर इधर-उधर किए यानि ढेंढुकी खुजलाए और बोले -तो हुजूर मैं चल रहा हूँ! -हां चलिये, बिना देर किए ‘फ़िराक़’ साहब ने कहा। उनके बाहर निकल जाने के बाद हम दोनों देर तक हँसते रहे। ‘फ़िराक़’ ने (मुंह बनाते हुए) कहा -देर से ये साहब हां, हूँ, जी किए जा रहे थे, अरे भाई एक बार भी तो कुछ अपनी कहो, बोर हो गया था मैं। ये तो अच्छा हुआ कि तुम लोग आ गए।

वसंत पंचमी प्रकरण

वसंत पंचमी। निराला जी का जन्मदिन। योजना बनी आज ‘फ़िराक़’ के यहाँ चला जाय। उनसे निराला के बारे में बात की जाएगी और उन्हें मानसिक-भौतिक दोनों तरह से क्षति पहुंचाई जाएगी। जाहिर है ‘फ़िराक़’ साहब निराला और साथ में हिंदी वालों को गरियाते ही। तो मानसिक उन्हें भी गरिया कर और भौतिक यूं कि वे जब-जब सिगरेट जलाएंगे तो हम लोग भी उनकी सिगरेट में से एक-एक उठा कर जलाएंगे। बात तय हो गई और अपेक्षाकृत एक बड़ा, लगभग 10-12 का झुंड ‘फ़िराक़’ साहब के यहाँ जा धमका। योजनाकार वीएन राय थे और उसके कार्यान्वयन का जिम्मा दिनेश सुकुल (हिंदी के कवि दिनेश शुक्ल जिन्हें तब हम सब दिनेश सुकुल कहा करते थे) के कंधों पर डाला गया था।

‘हुजूर निराला जी को तो आप बड़ा कवि मानते ही होंगे?’ दिनेश सुकुल ने बात छेड़ी।

आप तो मानते हैं न! तो उनकी कोई कविता सुनाइए, जिसे आप बड़ी मानते हों या सबसे अधिक पसंद करते हों। मैं भी ज़रा सुनूँ।

सुकुल ने शुरू किया -वह तोड़ती पत्थर/ उसे……आगे की पंक्ति अपने अंदाज़ में पूरा करते हुए- दे खा एलाहा बाद के पथ पर- ‘फ़िराक़’ ने शरारतभरी, बड़ी हो फैल आई आँखें नचाते हुए कहा- बंद करो, ड़ ड़ ड़ लगता है जैसे कोई कान में कंकड़ मार रहा है। ‘फ़िराक़’ साहब ने सिगरेट जलाया और इधर भी एक-दो को छोड़ सबने उनकी डिब्बी से सिगरेट निकाल जला ली।

सिगरेट का कश लेते हुए ‘फ़िराक़’ साहब ने कहा – मैंने भी ड़ का प्रयोग किया है लेकिन इस तरह कंकड़ की तरह नहीं लगेगा, ड़ जैसे गुम हो जाता हो उसमें-

‘तुम चले जाओगे हो जाएगी ये रात पहाड़

रात की रात ठहर जाओ कि कुछ रात कटे।’

दिनेश ने छूटते ही बड़े आराम और ठंढे लहजे में कहा – ‘इसमें कविता जैसा क्या है, यह तो शुद्ध मादर…ई है।’

‘तुम घसियारे हो तुम्हें कविता की तमीज़ ताजिंदगी नहीं आएगी।‘ ‘फ़िराक़’ साहब ने जड़ा- शेक्सपियर को पढ़ो, शेली, किट्स, वर्ड्सवर्थ यूरोप के कवियों को पढ़ो। नाम सुनते ही गांड़ फटती है। और आपके हिंदी में देखिये माखेलाल, लाला धुनिया प्रसाद, सामने खड़ा कर दो लोगों को तो देख कर बता दे कोई कि कौन सूअर हिंदीवाला है।’

दिनेश सुकुल पहले ही जैसे लहज़े में – ‘ये तो हुजूर आपकी ग़ुलाम मानसिकता है, सोलहो आने कलोनियल।’

इस पर जो कुछ भी ‘फ़िराक़’ कहते दिनेश सुकुल बस वही एक ही बात जड़ते – हुजूर यह तो वही ग़ुलाम मानसिकता है, कलोनियल। आजिज़ आ ‘फ़िराक़’ साहब ने हल्के-जोर से कहा हाँ, हाँ मैं गु़लाम मानसिकता का हूँ, कालोनियल हूँ, अब कहो! यह कह ‘फ़िराक़’ साहब ने सिगरेट उठाई और उनके साथ उनकी 10-12 सिगरेटें और उठीं।

इस बीच हमलोगों में से एक थे राकेश जी। देह से सुदर्शन, हर वक्त चिंतन में खोये-से गंभीर दार्शनिक मुद्रा ओढ़े रखते थे। उनकी इस अदा की कई कथा है लेकिन उन्हें समझने के लिए एक टुकड़ा- मैं और कृष्ण प्रताप (के.पी.) खड़े बात कर रहे थे कि कहीं से राकेश जी आए। नमस्कार के बाद केपी ने पूछा -राकेश जी आपका स्वास्थ्य कैसा है! राकेश जी- यह भी कोई प्रश्न हुआ! हम दोनों को भीतर से हंसी आने लगी लेकिन मैंने बहुत गंभीर हो कर पूछा- राकेश जी आपका मानसिक स्वास्थ्य कैसा है! राकेश जी -‘हाँ यह कुछ प्रश्न हुआ।‘ अब लेकिन हम दोनों की हंसी न रुक सकी, ठठा कर हंस पड़े। खैर, तो ऐसे राकेश जी ने बहुत पीडि़त-मृदु-मंद स्वर में ‘फ़िराक़’ साहब की ओर मुखातिब हो कहा- ‘हुजूर आपको तनाव तो नहीं हो रहा!’ ‘फ़िराक़’ साहब ने उनकी तरफ़ नज़र घुमाते हुए कहा- ‘मैं बात कर रहा हूँ, वह (दिनेश सुकुल) बात कर रहा है तुम्हारी क्यों फट रही है!’ हम सभी हंस पड़े और राकेश जी फक्क!

बातों का सिलसिला जारी रहा और एक बनाम 10-12 सिगरेटों के जलने का भी कि एक समय पर ‘फ़िराक़’ साहब ने कहा -‘एक सिगरेट छोड़ दीजिएगा जनाब।’ हममें से किसी ने कहा -‘छोड़ दी है हुजूर!’

बड़ी इनायत है! कहते हुए ‘फ़िराक़’ साहब ने बात को दूसरा मोड़ दिया – मुझे निराला का एक गीत बहुत पसंद है। कौन सा हुजूर! सुकुल ने पूछा। अपने अंदाज़ और आवाज़ में ‘फ़िराक़’ ने पहली पंक्ति सुनाई -बांधो न नाव इस ठांव बंधु! सुकुल ने कहा वाः क्या चुना है आपने हुजूर!

बहुत मेहरबानी, बहुत करम मेरी गुलाम, कालोनियल मानसिकता पर!

सुकुल ने पूछा हुजूर सुनते हैं कि आपके हिंदी को गरियाने को लेकर निराला ने एक बार आपको डंडा लेकर दौड़ाया था? नहीं भाई ये सब बातें हैं, जो मज़ा लेने के लिए फैलाई हैं लोगों ने। निराला हमारे यहाँ आता था तो कहता था -आप अपनी रचनाएँ देवनागरी में क्यों नहीं छपवाते! आपको ऐसा करना चाहिए। वह शराब नहीं पिता था, अब जो शराब न पिये तो वह अच्छा क्या खाक लिखेगा। मैंने उसे शराब पीना सिखाया। वह नहीं जानता था कि क़ाग़ज के रुपये में कहाँ से ताक़त आती है जो वह सब खरीद लेता है। उसे मैंने समझाया कि कैसे। लेकिन जो हो, वह आदमी बहुत बड़ा था हमलोगों से!

सुकुल चौंक-से गए और हम सब भी। चौंक के साथ ही सुकुल ने पूछा – सो कैसे हुजूर? देखो, वह पैसे को झांट बराबर समझता था और हम हैं कि उसे दांत तले दबाये रखते हैं।

हम लोग सोच कर गए थे ‘फ़िराक़’ के पुर्जे उड़ाने और अपने होश ठिकाने लगा, लौटे।

वह जेठ की तपती खड़खडि़या दोपहरी थी। हमलोग ‘फ़िराक़’ के यहाँ रवाना हुए। उस दिन साथ में चितरंजन भाई भी थे। बारामदे में लोहे के छड़ों वाला दरवाजा था जो दिन में खुला ही रहता, बस थोड़ा सा लगा दिया जाता। ‘फ़िराक़’ ने हमें देखा और मोटी गूँजती आवाज़ में कहा- ‘यह भी किसी शरीफ आदमी के यहाँ जाने का समय है!’ यही सोच कर तो हमलोग आए हुजूर- हम में से किसी ने कहा। तो फिर अंदर आ जाओ, बैठो। हम लोग अंदर दाखिल हो लिए। ‘फ़िराक़’ साहब बोले -मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। उतना याद नहीं रहता। भूल रहा हूँ, तुम लोग अपना नाम, परिचय बताओ। और जितने थे सबने अपना परिचय दे दिया -नाम, क्लास, हॉस्टल या डेलीगेसी के साथ, बचे थे दो लोग। डीपीटी और चितरंजन सिंह।

डीपीटी ने कहा- हमको तो जानते होंगे हुजूर! एक सेकेंड भी नहीं लगा, ‘फ़िराक़’ साहब ने अपने नाटकीय अंदाज़ में कहा -सो क्यूँ? आप कोई बड़े लेखक हैं, कवि हैं, कि कोई बड़े आदमी हैं, बड़े नेता, या फिर कोई बड़े अमीर! मैं क्यूँ जानूँ भला आपको!

डीपीटी ने किसी जगह का नाम बताते हुए कहा- वहाँ जब एक मुशायरा हुआ था, जिसमें आप भी थे, तो आपकी बगल में ही मैं बैठा था।

उसी नाटकीय अंदाज़ में ‘फ़िराक़’ साहब- अच्छा! तो कोई आदमी दीवाल कि तरफ मुंह किए पेशाब कर रहा हो, मैं उधर से गुजरूँ और वह मुंह घुमा कर मुझसे पूछे कि क्या टाइम हुआ, तो इसके लिए मैं उसे याद रखूँ!?

अब बारी चितरंजन भाई की थी- हमको तो जरूर जानते होंगे आप?

अपने उसी नाटकीय अंदाज़ में ‘फि़राक़’- सो क्यूँ जनाब!

चितरंजन- उस दिन आप जब वाइसचांसलर के कमरे में बैठे थे तभी लड़कों ने वाइसचांसलर ऑफिस का घेराव कर दिया था, आप बाहर निकलने के लिए परेशान-परेशान थे, तो मैंने ही आपको बाहर निकाल, रिक्शे पर बैठा कर घर भेजा था, इसलिए!

एक-दो सेकेंड चुप रहने के बाद जैसे ‘हाँ याद आया वाले अंदाज़ में’ ‘फ़िराक़’- अच्छा, तो उस दिन आप ही थे! इसके साथ ही पहले वाला अंदाज़ गायब हो शरारती अंदाज़ में बदल गया- तो अब एक रेलगाड़ी में हजारों लोग होते हैं। उन हजारों लोगों की जान उस रेलगाड़ी के ड्राइवर की एक नज़र पर टिकी होती है। तो क्या उतरने के बाद लोग उसे याद रखते हैं कि इसी ने हमें सही-सलामत पहुंचाया था।

चितरंजन सिंह, कुछ खिझे-तीखे स्वर में- उस दिन दो झापड़ दिये होते तो जरूर याद रखते आप।

‘फ़िराक़’- कभी कर के देखिएगा ज़रा! उनकी शरारत भरी मुस्कुराती आँखों के चुनौती के अंदाज़ ने सबको हंसा दिया, चितरंजन सिंह को भी।

अच्छा बताओ पढ़ क्या रहे हो आजकल तुमलोग! सबने अपना जो कुछ था, बता दिया लेकिन डीपीटी तो डीपीटी थे, बताना शुरू किया- अफ्रीकी, स्पैनिस, वियतनामी कवियों का अटरपटर नाम लेते हुए आगे स्वेहली भाषा के किसी कवि के नाम तक पहुंचे ही थे कि पहले से ही चिढ़ते जा रहे ‘फ़िराक़’ ने जोर से डांटा- चोप्प, जा कर हॉस्टल के लौंडों को चूतिया बनाना।

थोड़ी देर इधर-उधर की बात के बाद ‘फ़िराक़’ ने पूछा- तुम लोग लिखते भी हो कुछ-कुछ? हममें से कुछ ने कहा- हाँ। तो सुनो जितना लिखो, उससे दस गुना पढ़ो, सैकड़ों शेर पढ़ो तो एक कहने की सोचो। लोगों की ज़िंदगी को गौर से देखो, बिना कोई पूर्वग्रह के। उसी तरह जैसे बच्चा दुनिया को जिज्ञासा और अचरज से भरा देखता-सुनता है, आँख-कान-मुंह पूरे शरीर से। यही उसका पढ़ना होता है। उसी के जरिये वह अपनी समझ बनाता है, जो उसकी अपनी होती है। तुम लोगों को पढ़ना भी उसमें जोड़ लेना चाहिए। ओरिजनेलिटी इज मोस्ट इंडेटेड थिंग ऑफ द वर्ल्ड, मौलिकता दुनिया का सबसे बड़ा ऋण है।

आगे सुकुल ने पूछा- हुजूर रचना किसी को बदलती-वदलती भी है या बस स्वांतः सुखाय होती है?

‘फ़िराक़’- अगर वह रचनाकार को नहीं बदलती, तो नहीं। रचना सबसे पहले रचनाकार को बदलती है, अगर वह रचनाकार को नहीं बदलती तो वह दूसरे को क्या बदलेगी खाक! किसी रचना को पढ़ने के बाद अगर आप यह महसूस नहीं करते कि आप वह नहीं रहे जो रचना को पढ़ने से पहले थे, तो फिर वह रचना क्या हुई!

मैंने उनसे बात करते हुए भी ऐसा ही महसूस किया है। ‘फ़िराक़’ साहब से जब भी बात हुई कभी ऐसा नहीं हुआ कि कोई नई बात न मिली हो जानने-समझने लायक। यह भी कि आपकी समझ न बढ़ी हो कल के मुकाबले, आप वही नहीं रह जाते जो आप कल थे। ‘फ़िराक़’ से जब भी मिलना हुआ ऐसा ही हुआ।

‘फ़िराक़’ ने हम लोगों के साथ कभी कोई ऐसा व्यवहार नहीं किया जो यह भान कराये कि ‘फ़िराक़’ ऊटपटाँग, झक्की, या ऐसे-वैसे हों। हो सकता है ऐसा हम लोगों के विद्यार्थी होने के कारण हो, उनसे तनावपूर्ण तीखी बातचीत, बहसें हुईं, हल्की से हल्की गंभीर से गंभीर बातें भी। उन्होंने कई बार हम लोगों से कहा होगा -भाग जाओ, भागो यहाँ से लेकिन कभी नहीं लगा कि सचमुच वे भाग जाने को कह रहे हैं। हम लोग भागते भी नहीं थे, वे भगाते भी नहीं थे। लेकिन एक ऐसा प्रकरण है जो थोड़ा अजीब और अटपटा लगा हम सबको भी- हुआ यह कि कोई लेखक सम्मेलन था इलाहाबाद में। अब ठीक-ठीक याद नहीं कि वह किस विषय पर था। उसमें हरीशंकर परसाई भी आए थे। संघ और सांप्रदायिकता को लेकर अपनी किसी व्यंग्य रचना के लिए उन पर संघियों का शारीरिक हमला हुआ था। सो, इसकी बड़ी चर्चा थी। उन्होंने ‘फ़िराक़’ से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की। हम लोगों में से एक रवीन्द्र उपाध्याय थे, भोजपुरी वाले मोती बी.ए. के भतीजा या कुछ थे। उन्हें ही परसाई जी को ‘फ़िराक़’ के यहाँ ले जाने का जिम्मा दिया गया। वे लेकर गए। आगे की कथा उन्हीं की जुबानी। बकौल रवीन्द्र उपाध्याय- वे परसाई जी को लेकर गए तो परसाई जी पहले ‘फ़िराक़’ के बगल में रह रहे गणित के प्रोफेसर टी. पति के यहाँ गये। वहाँ उनसे कुछ बात-चीत की और वहीं 2-3 पेग लगा लिये। फिर ‘फ़िराक़’ के यहाँ हम दोनों गये। परसाई जी ने बैठते ही कहा- ‘मैं हिंदी का अदना सा लेखक हूँ।’ इतना कहे नहीं कि ‘फ़िराक़’ साहब ने कहा- ‘आप न भी बताते तो यह आपके चेहरे से टपक रहा है।’ ‘फ़िराक़’ ने आवाज़ दी- ‘रमेश जरा लाना।’ इस ‘लाना’ का अर्थ हमेशा शराब की एक पेग बना लाना होता था। यह सुनते ही परसाई जी ने कहा- ‘हुजूर मैं भी शौक फरमाता हूँ।’ इतना सुनना ही था कि ‘फ़िराक़’ साहब बोले ‘रमेश इस कूड़े को बाहर करो भाई! ये ‘शौक फ़रमाता’ है। (बकौल रवीन्द्र उपाध्याय ही) ‘फ़िराक़’ के बोलने के साथ ही हुआ यह कि परसाई जी तेजी से वहाँ से भागे, अपनी डायरी भी वहीं छोड़ दी। मैंने उनकी डायरी उठाई और उनके पीछे भागा। परसाई जी सड़क पर मिले।

अब इस बात में ऐसा क्या था जिस पर ‘फ़िराक़’ इस कदर भड़क उठे -अमानवीय होने की हद तक। मैं नहीं जानता कि वहाँ ‘शौक फ़रमाना’ कहना वाजि़ब था या नहीं। कहीं उन्हें यह शब्द-प्रयोग तो नहीं खटका? अन्यथा हिंदी और हिंदी वालों (लेखकों) को वे अक्सर और मुंह पर बहुत कुछ कह डालने के लिए बदनाम थे। अब हिंदी के बारे में उनकी सारी बातें या एतराज गलत थे ऐसा मुझे नहीं लगता। जो हो हिंदी का होने के नाते उनका परसाई जी के साथ यह सुलूक नहीं था। बेशक, ग़लत शब्द प्रयोग और उच्चारण, किसी भी तरह की भद्दगी, फूहड़पन और बनावटीपन उन्हें सिरे से कतई पसंद नहीं थे। वे कई बार इस पर भड़क उठते थे। इस बाबत उन्होंने हम लोगों से बातचीत में कई बार कहा था। मसलन एक बार दिनेश सुकुल ने भाषा और तहज़ीब को आर्थिक स्थिति से जोड़ा तो इस पर ‘फ़िराक़’ साहब ने कहा ऐसा नहीं है। ग़रीब-अपढ़ लोगों के बारे में तुम्हारी मालूमात ग़लत हैं। मैं इस तरह नहीं देखता। अब मेरी मां अच्छे-खासे, खाते-पीते परिवार की थी लेकिन दूकान पर जा थस्स से बैठ जाती और शुरू हो जाती -जरा किसिम-किसिम के मोजे दिखाओ- जी करता था कि मारें दो झापड़। इसी तरह उन्होंने बताया कि मैं अपने डिपार्टमेंट की होने वाली टीचर्स मीटिंगों में नहीं जाता। यह पूछने पर कि ऐसा क्यों? वे कहते कि हमारे डिपार्टमेंट में ज़्यादातर टीचर्स जोड़े हैं। (ऐसा था भी, आज भी ऐसा है या नहीं, नहीं कह सकता।) तो मीटिंगों में वे साथ-साथ आते हैं। महाशय जी लोग जैसे हैं; हैं ही, महिला टीचर्स को देखिये तो चेहरे के किसी कोने पर न कोई कल्चर, न तहज़ीब, पाउडर पोते, होंठ रंगे इतनी भद्दी और फूहड़ लगती हैं कि उनकी तरफ देखने को जी नहीं चाहता। (मुस्कुरा कर) -अब उनमें एकाध-दो होंगी भी तो कौन देखता है।

इसी प्रसंग में उन्होंने बताया कि एक बार महाकुम्भ लगा था। कोई विदेशी राजनयिक मेहमान जवाहर लाल के साथ आए थे, इलाहाबाद। उस अवसर पर आपके हिंदी के राष्ट्र कवि भी मौजूद थे। उस विदेशी मेहमान ने राष्ट्र कवि से मिलने की इच्छा जाहिर की। जवाहर लाल उसको साथ लेकर चले, मिलाने। आगे देखते क्या हैं कि राष्ट्र कवि दोने में चाट खा रहे हैं। जब चाट खतम हुई तो दोना चाट रहे हैं। जवाहर लाल सलीके के आदमी थे, दोना चाटते राष्ट्र कवि से उस मेहमान को कैसे मिलाते। उसके साथ आगे बढ़ गए, यह कहते हुए कि अभी वे यहाँ नहीं हैं।

इसी जगह इस प्रसंग को भी रख देना शायद जरूरी है। कुछ लोग कहते थे कि ‘फ़िराक़’ साहब अपने भाई वाई(यदुपति) सहाय से जलते थे कि वे तो रीडर तक न बन पाये और वह उसी विभाग में हेड बन गए। इस बात को खींच कर लोग यहाँ तक ले जाते कि वाई सहाय को दिल का दौरा पड़ने पर वे देखने तक न जाते थे, वे मर गए तब भी। लेकिन यह बात सिरे से ग़लत है।

वाई सहाय को जब अबकी बार दिल का दौरा पड़ा तो फिर वे नहीं बच पाये। हमलोग उनके यहाँ गए, वहाँ बहुत लोग थे लेकिन ‘फ़िराक़’ साहब न थे। वहाँ परिवार के लोग खड़ी हिंदी में रो रहे थे। मुझे न जाने क्यों बड़ा अजीब-सा लग रहा था। मुझे दुख की कोई अनुभूति नहीं हो रही थी। मैं अपनी इस स्थिति पर बहुत परेशान था और ग्लानि का अनुभव कर रहा था। मैं लगातार सोच रहा था कि ऐसा क्यों है लेकिन समझ नहीं पा रहा था। बहुत दिनों बाद जहां मैं किराये के मकान में रहता था, पड़ोस के एक सज्जन चल बसे। वहाँ भी लोग खड़ी हिंदी में ही रो रहे थे। यह दूसरी बार था कि मुझे फिर अजीब-सा लग रहा था। अचानक मुझे लगा- अरे ये लोग तो खड़ी हिंदी में रो रहे हैं! मैंने पहले कभी किसी को खड़ी हिंदी में रोते सुना ही नहीं था। अचानक मुझ पर यह राज़ जाहिर हुआ कि खड़ी हिंदी में रोना सुनना ही वह बात थी जो मुझे दुख की कोई अनुभूति नहीं हो रही थी।

बहरहाल, वाई सहाय को देख, उनको प्रणाम कर वहाँ से निकलते वक्त वीएन राय ने कहा आज ‘फ़िराक़’ के यहाँ चलना और उन्हें देखना एक अनुभव होगा। हमलोग वहाँ से ‘फ़िराक़’ साहब के यहाँ गए। ‘फ़िराक़’ साहब बेहद दुखी थे। आवाज़ टूटी हुई, बोले- ‘उनके गुजर जाने की खबर सबसे पहले मुझे लगी। मैं तो जैसे बैठ गया। उठने की सकत ही न हो जैसे। छड़ी उठाया और जैसे-तैसे उनके घर गया। वहाँ रोती हुई अलका (वाई सहाय की बड़ी बेटी, यही नाम था शायद ) को देख कर मुझे सहारा मिला।’ ‘फ़िराक़’ साहब का यह वाक्य और उस समय की उनकी सूरत आज तक दिल और आँखों में बदस्तूर है। ‘फ़िराक़’ साहब आगे बोलते रहे- ‘मेरे पिता कई बार नजूमियों जैसी बातें करते थे। एक बार उन्होंने कहा तुम्हारे भाइयों की उम्र तुमसे कम होगी। मैंने कहा -ऐसा क्यों कहते हैं। उन्होंने कहा तुम्हारे पैदा होने के बाद मैं ब्लड सुगर (मधुमेह) का शिकार हो गया, सो कहता हूँ कि तुम्हारे भाइयों कि उम्र तुमसे कम होगी। अब देखिये एक पहले ही चले गए थे, आज ये भी चले गए! और जो ये हैं (वहाँ मौजूद अपने भाई की ओर इशारा करते हुए) इनके बारे में कुछ कहते हुए जीभ ऐंठती है!’ सचमुच ‘फ़िराक़’ साहब के यहाँ उस दिन का जाना और उन्हें देखना एक अनुभव था।

फिर भी परसाई के साथ उनके व्यवहार को देखते-सोचते मुझे बराबर खटकता रहा कि ऐसा क्या है ‘फ़िराक़’ की ज़िंदगी में जो उन्हें इस कदर अमानवीय तक बना देता है। उनकी निजी जि़ंदगी पर कभी बातें नहीं हुईं। कभी-कभी उसकी कुछ झलक जरूर मिली। इस बाबत कुछ बातें मैंने बाद को उनसे की थीं।

मेरा राज़े-निहाँ हरगिज़ समझ में आ नहीं सकता

‘फ़िराक़’ साहब के भाई वाई (यदुपति) सहाय इलाहाबाद युनिवर्सिटी में अंग्रेजी विभाग में ही पढ़ाते थे और बाद को विभाग के हेड भी रहे। वहीं ‘फ़िराक़’ साहब कभी रीडर तक न बनाए गए, न जाने क्यों। बहरहाल, किसी ने बताया था कि ‘एकबार वाई सहाय को दिल का दौरा पड़ा था। हम कुछ लोग ‘फ़िराक़’ साहब के यहाँ बैठे बात कर रहे थे कि अचानक ‘फ़िराक़’ ने कहा ‘अब जी के दिखाएँ!’ (यानि वाई सहाय।) किसी ने टोका क्यों? ‘वह आ गई है न उनको देखने, अब बताएं जी कर।’ उन्होंने अपनी पत्नी को रिक्शे से वाई सहाय के यहाँ जाते देख लिया था। सुन कर अजीब लगा।’ मुझे भी यह सुन कर अजीब लगा।

एकबार हम लोगों में से किसी ने पूछा -’फ़िराक़’ साहब आप परिवार के साथ क्यों नहीं रहे।’ ‘फ़िराक़’ ने गंभीर आवाज़ में संक्षिप्त उत्तर दिया- ‘वह रहती तो जितना और जो कुछ हूँ, उतना भी न हो पाता।’ बस। मेरे मित्र गोरख पांडे भी अपनी पत्नी के साथ नहीं रह पाये। सो मेरे लिए यह एक गुत्थी थी। मैं नहीं जानता कि वामिक़ जौनपुरी की शरीके हयात सुंदर थीं या नहीं लेकिन पढ़ी-लिखी वे बिलकुल न थीं। वामिक़ साहब से एकबार मैंने पूछा उनकी शरीके हयात के बारे में कि कैसे निभती है आपकी अपनी पत्नी से? उनका जवाब ‘फ़िराक़’ के बिलकुल उलट था- ‘वे न होतीं तो मैं जो कुछ और जितना भी हूँ न हो पाता।’ यह सोच कर कि शायद ‘फ़िराक़’ और गोरख अपनी पत्नियों को अपने रचना-विचार का साथी न पाएँ हों, सो मैंने वामिक़ साहब को छेड़ा- रचना-विचार में तो वह आपका साथ न निभा पाती होंगी? वामिक़ साहब- ‘उसका इंतजाम वही करती थीं, नहीं तो सोचना-विचारना-लिखना सब धरा रह जाता। रही बात रचनात्मक अनुभव के उस क्षण की तो वहाँ तो कोई संग नहीं जाता, वहाँ अकेले होना होता है।’ मुझे प्रसाद के ‘आँसू’ की पंक्ति याद आई-

           ‘नाविक इस सूने तट पर

           किन लहरों में खे लाया

           इस निर्जन वेला में क्या

           अब तक था कोई आया।

मेरी गुत्थी सुलझ नहीं रही थी।

गोरख मेरे दोस्त थे, लंबे समय तक का साथ रहा। उनसे लड़-झगड़, तर्क-बहस कर उनके मर्म को समझ लिया था कुछ-कुछ, लेकिन ‘फ़िराक़’ के साथ इस विषय में कभी लंबी बात हुई ही नहीं। इसको समझने का जरिया शेष था तो ‘फ़िराक़’ की रचनाएँ। उनसे गुजरते हुए मुझे गोरख और ‘फ़िराक़’ के व्यक्तित्व और मनोजगत की बनावट में कुछ मूलभूत समानताएं नजर आईं। यहां इसके विस्तार की दरकार नहीं है लेकिन कुछेक बातें कहना जरूरी लग रहा है। घटना और कारण में भिन्नता होते हुए भी उसके गुण-सूत्र समान से हैं। एक दिन पत्नी के साथ लेटे गोरख अचानक चैंक उठे। ‘फ़िराक़’ शादी के बाद अपनी शरीके हयात को देखते ही भड़क उठे। गोरख की पत्नी कुरूप नहीं सुंदर थीं लेकिन घरेलू सोच की थीं। ‘फ़िराक़’ की शरीके हयात कुरूप थीं, भद्दी। उससे भी ज्यादा यह कि शादी में उनके साथ धोखा हुआ और ‘फ़िराक़’ के भड़क उठने में कुरूप और भद्दे होने के साथ धोके के मिल जाने ने विकराल रूप ले लिया। ‘फ़िराक़’ और गोरख दोनों ने एक हद तक अपनी पत्नियों के साथ निभाया लेकिन अंततः नहीं निभ पाया।

गोरख ने बताया, जिसकी तसदीक उनके बहनोई के जरिये भी हुई, कि ‘वह समय था जब वियतनाम पर भयानक अमरीकी बमबारी जारी थी। एक रात मैं घर पर पत्नी के साथ लेटा हुआ उसी पर सोच रहा था कि अचानक मुझे सुनाई दिया साड़ी… मैं चौंक गया- अरे ये क्या बात कर रही है! मैं उठा और दुआर (दरवाजे) पर आ लेट गया। आगे कोशिशों के बाद भी मुझे उसमें कुछ बदलता नजर नहीं आया। मुझे लगा हम एक दूसरे के लिए नहीं बने हैं। जानता हूँ इसमें उसका दोष नहीं है। हम दोनों एक ही सिस्टम के शिकार हैं लेकिन मैं कर भी क्या सकता हूँ। मेरी अपनी दशा यह है कि मैं न अपनी इच्छाओं का किसी को गुलाम बना सकता हूँ, न किसी की इच्छा का गुलाम बन सकता हूँ।’

‘फ़िराक़’ साहब की शरीके हयात सुंदर न थीं, कुरूप और भद्दी थीं। कुछ का कहना था कि बहुत सुंदर नहीं थीं लेकिन कुरूप भी नहीं थीं। जो हो, बचपन से ही ‘फ़िराक़’ साहब के मानस और व्यक्तित्व की जो बनावट थी वह बेहद अलग तरह की। इसका ब्योरा अपनी मशहूर नज़्म ‘हिंडोला’ में उन्होंने विस्तार से दिया है। वह बालपन बद-क़वारा, ऐबी या बदसूरत लोगों के पास तक नहीं फटकता था। 9-10 की उम्र में ही उसके जीवन में ऐसा हुस्ने-इंसानी आया कि जिसे देख उसे महसूस होता था कि उसकी आंच उसकी हड्डियाँ जला देंगी। रगों में फूटते रहते थे बेशुमार अनार (वो जिस्म जैसे चाँदनी में फूटता अनार), बचपन से ऐसे किस्से-कहानियों ने उसके मनोजगत को रचा था, जिनकी ओट में चमकता था दर्दे-इंसानी। ऐसे बाल मन को उसकी युवा-दहलीज पर ही जोर का झटका लगा। और इसने उसकी ज़िंदगी को तहस नहस कर दिया। ‘फ़िराक़’ साहब ने अपनी उसी मशहूर नज़्म ‘हिंडोला’ में अपने व्यक्तित्व और मिज़ाज की बनावट और शादी के साथ, जो धोखे से हुई, आई बरबादी- रगों में उठती हुई आंधियों के झटके, अपनी हस्ती के नफरतों के अग्निकुंड बन जाने, व्यक्तित्व के नागफनी में बदल जाने से लेकर जिंदगी के विषपान की कथा में बदल जाने का वर्णन जिस खूबसूरती, बेबाकी और पुरअसर ढंग से किया है वह ला-सानी, बेजोड़ है। तो क्या यह एक पोएटिक हॉरर है? अगर है भी तो बहुत न्यारा। गोरख और ‘फ़िराक़’ दोनों जो ऐसे सदमों से बच के निकल आए उसकी वजह उन दोनों के भीतर एक बच्चे का जीवित बने रहना है- अपनी चौंक, जिज्ञाशा, सिहरन और चिहुंकन के साथ। ‘फ़िराक़’ के यहाँ इसका भी ब्यौरा पेश है। कोई देखे तो!

माना कि इसमें उन स्त्रियों का क्या दोष, और इसके चलते उनकी जो दुर्दशा हुई उसका क्या! फिर भी-

‘हद चाहिए सज़ा में उकूबत के वास्ते

आखिर गुनहगार हूँ काफ़िर नहीं हूँ मैं।’ (मिर्ज़ा गा़लिब)

लेकिन देखने वालों ने ऐसे नहीं देखा। निराला की जटिल मनोदशा, उनकी ऊटपटाँग बातों-व्यवहारों और कटुक्तियों को समझ लेने और व्याख्या कर लेने वाले बहुतेरे भी ‘फ़िराक़’ को लेकिन अराजक, घोर व्यक्तिवादी, अहंकारी, बनावटी, दिखावा करने वाला ही मानते हैं। उन्हें ‘फ़िराक़’ समझ में नहीं आते। जबकि ‘फ़िराक़’ ने अपनी इस स्थिति का वर्णन न केवल ‘नग़मा-ए-हक़ीक़त’, ‘जुगुनू’, ‘हिंडोला’ आदि रचनाओं में, जो अपनी काव्यात्मक सौंदर्य और ऊंचाई में भी बेजोड़ हैं, किया है बल्कि अपनी बातचीत और तकरीरों में भी इसका बारहा इज़हार किया है। वैसे ही जैसे एक बच्चा अपनी तकलीफ, परेशानी, मन की चोट, चीख और क्रोध को (थोड़ा-मोड़ा बढ़ा कर ही सही) बेझिझक, बेबाक और उसी डिग्री और अनुपात में रख देता है, जैसा उसे लगता है। ‘फ़िराक़’ जैसों को समझने के लिए बच्चों जैसा मन चाहिए।

गोरख शादी करना चाहते थे लेकिन प्यार कर के। ‘फ़िराक़’ के लिए इस ओर से जैसे सब कुछ खत्म हो चुका था। दोनों एक भरा-पूरा अपना परिवार, बच्चे चाहते थे, जिसके न होने ने उन्हें बहुत हानि पहुंचाई। ‘फ़िराक़’ साहब को आखिरी दिनों में मैंने देखा -बहुत टूटा हुआ। मैं उनके यहाँ गया हुआ था। उन्होंने कहा -‘शादी हो गई है न पंडित तुम्हारी! (पता नहीं क्यों वे मुझे पंडित कह कर ही संबोधित करते थे) इतनी जल्दी नहीं करनी चाहिए थी।’ मैं कुछ बोला नहीं। बस उन्हें देखता और ध्यान से सुनता रहा। उन्होंने पूछा- ‘अपने से की थी या कर दी गई थी?’ मैंने कहा अपने की थी, देख-भाल कर और सोच-समझ कर।’ मुसकुराते हुए ‘फ़िराक़’- ‘चलो अच्छा है लेकिन जल्दी की। अभी भी हमारे यहाँ यही है -जल्दी कर लेने की।’ बात करते बीच में उन्हें खांसी आई, जोर की और थोड़ी देर तक। इस बीच उनकी तहमद बिगड़ गई, जिसे वे यूं ही बांधे रखते थे, जो उनके उठते ही अक्सर खुल जाया करती। वे उठे और बोले कपड़ा बदल कर आता हूँ। वे आए और बोले ‘पारिवारिक जीवन नहीं मिलने से मुझे बहुत नुकसान हुआ।’ चेहरे पर कोई मायूसी नहीं थी, न कोई अफ़्सोस, न हार जाने जैसा कोई भाव, वहाँ बोलती हुई-सी जर्द-नाजुक शांति थी- ‘तड़प वो हूँ सुकुने-इंतिहाई जिसमें पिनहाँ है।’

उस समय की अपने मन की हालत मैं क्या बताऊँ-

-‘आज कैसी हवा चली ऐ ‘फ़िराक़’ आँख बेइख्तियार भर आई।’

दुनिया मेरे आगे

फिर थी जेठ की एक तपती दोपहरी। हम लोग ‘फ़िराक़’ के यहाँ पहुंचे। बैठने के साथ ही ‘फ़िराक़’ साहब ने पूछा- अच्छा बताओ इंदिरा गांधी के बारे में तुम लोगों के क्या ख़याल हैं। के.पी. -‘यह भी कोई पूछने की बात है हुजूर, बहुत बुरे ख़याल हैं।’

-‘मुझे तो वह बचपन से ही ऐसी लगती थी,’ -’फ़िराक़’ साहब ने कहा। बचपन से ही! हम लोग चौंके! ‘हाँ अब जो बच्चा गांधी और मेरे गोद में आए ही न वह कैसा होगा! वह हम दोनों के गोद में आती ही न थी।’ लोगों के बारे में ‘फ़िराक़’ साहब की राय बनाने का तरीका बड़ा दिलचस्प था, खास कर उनके बारे में जो हस्तियाँ थे।

के.पी. ने पूछा- ‘जयप्रकाश नारायण के बारे में आपके क्या विचार है।‘ तपाक से ‘फ़िराक़’- ‘उसके तो चेहरे से कन्फ़्यूजन टपकता है।’ एक समवेत जोरदार ठहाका गूंज पड़ा।

के.पी. ने बहुत आहिस्ते से पूछा- ‘और गांधी जी के बारे में हुजूर?’ ‘फ़िराक़’- ‘गांधी बहुत बड़े आदमी थे लेकिन कई मामले में उनके विचार से मैं इत्तिफ़ाक़ नहीं रखता। मसलन उनके अहिंसा की बात को ले लो। अब मच्छर-खटमल मारोगे कि नहीं, भेड़-बकरी, मुर्गा-मुर्गी को मारोगे कि नहीं। नहीं मारोगे तो फिर वही सब झाड-झंखाड़ में बदल जाएगा, जिसे साफ़ करते हम यहाँ तक आए हैं। और हाँ, उनमें कई सतहों पर घामड़पन भी था। एकबार उनके आश्रम में एक लड़का और एक लड़की कहीं एकांत में बैठे बातें कर रहे थे। लोगों ने गांधी को जा कर बताया। अगले दिन गांधी ने उन्हें बुला कर उनके बाल मुड़वा दिये।’ यह बताते हुए ‘फ़िराक़’ के चेहरे पर तीखी नफ़रत उभर आई। आगे उन्होंने कहा -‘ऐसी ही एक घटना गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के शांतिनिकेतन में हुई। एक लड़का, एक लड़की शाम के झुटपुटे में किसी पेड़ तले एकांत में बैठे बातें कर रहे थे। उधर से कुछ अध्यापक गुजर रहे थे। वे रवीन्द्रनाथ के यहाँ ही जा रहे थे। लड़के-लड़की को एकांत में बैठे बातें करते हुए उन्होंने देखा। वहाँ पहुँचने पर यह बात उन्होंने गुरुदेव को बताई। गुरुदेव ने उनसे पूछा -‘इज देयर एनी कोअर्सन?’ शिक्षकों ने कहा – नो। ‘देन वंस आई एम यंग!’ उमंग के साथ गुरुदेव ने कहा।’ अब बताओ कहाँ यह खूबसूरती और तहज़ीब और कहाँ वह घामड़पन और भद्दगी!

दिनेश सुकुल ने मौका ताड़ा और पूछ बैठे जो वे कब से पूछना चाह रहे थे, और हम सभी भी – ‘ हुजूर समलैंगिकता के बारे में आपके क्या ख़याल हैं?’

‘फ़िराक़’ -‘मैं इसे सही और वैज्ञानिक मानता हूँ, लेकिन यह गुह तुम अपने मुंह से थूको।’ -उन्होंने देश-दुनिया के कई ऐसे ख्यातिनाम लोगों का जिक्र किया जो समलैंगिक थे।

सुकुल- ‘जब आप इसे सही और वैज्ञानिक मानते हैं तो फिर यह गुह क्यों कर हुआ?’

‘फ़िराक़’- ‘तुम्हारा इंटेन्शन! वह न गुह है! थूको उसे।’

आज समलैंगिकता को अपराध और पतन मानने की जगह उसे कानूनी दर्ज़ा देने की बात चल रही है, समलैंगिकों को समाज में सम्मान की निगाह से देखे जाने के संघर्ष चल रहे हैं। तब यही ‘फ़िराक़’ साहब के चेहरे पर तोहमत की सियाही के रूप में थी। इसे लेकर क्या-क्या नहीं कहा गया उन्हें। आज भी समलैंगिकता पर उनकी बेबाक राय को सहज स्वीकारने और उन्हें आरोपों से बरी करने को तैयार हैं हम?

‘फ़िराक़’ साहब इस बात के बड़े क़ायल थे खास कर शायरी में कि एक भी शब्द फालतू, बेमतलब, बेवजह और भरती का नहीं होना चाहिए। शायरी में शब्दों की किफ़ायत बरतने को लेकर वे सख़्त थे। एक शाम ‘फ़िराक़’ के यहाँ हम लोग पहुंचे। उस दिन मसूद भाई भी साथ थे। मसूद भाई ने कहा- ‘हुजूर हाल ही में एक रोज लखनऊ में एक निशस्त (गोष्ठी) हुई थी। उसमें एक बात आई कि आपके एक बहुत ही मकबूल और मशहूर शेर में एक मिस्रा बिलकुल फालतू है। ‘कौन सा?’ ‘फ़िराक़’ ने पूछा। वही- ‘अब अक्सर चुप चुप से रहे हैं यूं ही कभू लब खोले हैं’, लोगों की राय थी इस मिस्रे में बात पूरी हो जाती है यानि पहला मिस्रा ही बता देता है कि अब जो है वैसा पहले नहीं था और इस नाते दूसरा मिस्रा- ‘पहले ‘फ़िराक़’ को देखा होता, अब तो बहुत कम बोले हैं’, फ़ालतू हो जाता है, उसकी कोई जरूरत नहीं रह जाती।’ ‘फ़िराक़’ साहब चुप रहे, कुछ नहीं बोले। (इसका मतलब यह नहीं कि ‘फ़िराक़’ साहब ने इस बात को सही मान लिया।) शेरो-शायरी को ले कर और और बातें होती रहीं कि इसी बीच मसूद भाई ने कहा आपका एक बहुत अच्छा शेर इस वक़्त मुझे याद आ रहा है। झट से ‘फ़िराक़’ ने कहा -‘नहीं, ज़रूर ख़राब होगा क्योंकि वह तुम्हारी ज़बान पर है।’

इस बार भी मसूद भाई साथ थे। हम लोगों के पहुँचते ही ‘फ़िराक़’ साहब ने कहा -‘आओ, आओ तुम लोग! मैं भी सोच रहा था कि नौजवान आयें तो पूछूं कि भारत, पाकिस्तान बँटवारे से क्या फ़ायदे-नुक्सान हुए? छूटते ही मसूद भाई ने कहा -‘हुजूर और कुछ हुआ हो या नहीं आप शायरे-आज़म (हिंदुस्तान) तो हो ही गए। (मसूद भाई का इशारा फ़ैज़ साहब को लेकर था) -‘नहीं भाई मैं मज़ाक़ नहीं कर रहा हूँ, सचमुच जानना चाहता हूँ कि इस बाबत तुम नए लोगों की क्या राय है!’- ‘फ़िराक़’ ने कहा। लेकिन क्या हुआ कि बात मुड़ गई कहीं और, और वह लौट कर आई ही नहीं हिंदुस्तान-पाकिस्तान बँटवारे और फ़ायदे-नुक्सान की तरफ। यूं यह बात रह गई होने से उस दिन। लेकिन वह अब भी पड़ी हुई है हमारे समय के सामने, ख़त्म नहीं हुई। हमें इस पर ध्यान लाना होगा, हम दोनों मुल्कों के लोगों को। इसका सही हिसाब कर पाने में शायद दोनों मुल्कों का उज्वल भविष्य निहित हो।

यहाँ एक प्रसंग का उल्लेख करना सही होगा। इलाहाबाद में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ आए थे। यूनिवर्सिटी ने उनके सम्मान में एक जलसे का आयोजन किया था। बाहर सीनेट हॉल के बरगद वाले लॉन में। पूरा लॉन, उसके अगल-बगल की सड़कें यहाँ तक की छात्र संघ भवन और उसके बाहर की सड़क तक सब, लोगों से खचाखच भरे थे। मंच पर फ़ैज़ साहब के साथ महादेवी वर्मा और ‘फ़िराक़’ साहब भी तशरीफ़ फ़र्मा थे। जहां तक मुझे याद है महादेवी जी और ‘फ़िराक़’ ने अपने कलाम नहीं पढ़े। ‘फ़िराक़’ साहब ने फ़ैज़ साहब की शान में कुछ चंद सतरें कहीं। ठीक-ठीक तो नहीं लेकिन जो सतरें याद में हैं यूं थीं- ‘यह जलसा एक तारीख़ी जलसा है। —–न फ़ैज़ साहब, न महादेवी और न मेरी शायरी में कहीं तोप-तलवार, बम-पिस्तौल है, न वह हाहाकार करती है लेकिन उसकी तासीर, उसका असर कहीं कमतर नहीं है।’ (एक-दो सतरें और रही होंगी।)

यह सचमुच एक तारीख़ी जलसा था इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद शहर के लिए ही नहीं बल्कि देश के लिए भी। जिन्होंने भी इसे देखा है, वे न केवल इसे भूल नहीं सकते बल्कि उनके लिए यह फ़ख़्र करने जैसी बात है। शायद फ़ैज़ साहब के लिए भी।

गोरख पांडे जिनका जिक्र ऊपर हो चुका है, मार्क्सवाद में उनकी अच्छी गति थी। नक्सलबाड़ी के आंदोलन में शरीक हो, कुछ वर्षों तक भूमिगत रहने के बाद, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में दर्शन शास्त्र से एम.ए. कर रहे थे। जनता के संघर्षों के भोजपुरी में लिखे उनके गीत लोगों के बीच बिना छपे लोक गीतों की तरह लोकप्रिय हो रहे थे। वे इलाहाबाद आए हुए थे और उस दिन ‘फ़िराक़’ के साथ बैठकी में हम लोगों के साथ वे भी थे। ‘फ़िराक़’ उस दिन गाँव से कैसे शहरों का विकास हुआ, इसमें इस्लाम का क्या योगदान था, इस पर बहुत अच्छी तरह और तार्किक बातें कर रहे थे। बीच में अचानक गोरख ने कहा- ‘बेहतरीन! आप की यह व्याख्या तो बिलकुल मार्क्सवाद की संगत में है।’

‘फ़िराक़’- आई एम येट एट्टी परसेंट मार्कसिस्ट!

‘एट्टी परसेंट ही क्यों!? किसी ने पूछा।

‘फ़िराक़’- मार्क्स भी होते तो वे भी हंड्रेड परसेंट मार्क्सवादी न होते!

गोरख पांडे ने ज़ोर का ठहाका लगाया, उसमें हम लोगों की हंसी भी शामिल थी। तब न जाने क्या सोच कर हँसे थे लेकिन बाद को इसका मायने समझ आया।

‘फ़िराक़’ साहब की ‘दास्ताने आदम’ एक स्तर पर कविता में आदिम समाज से अब तक के मानव-मुक्ति का इतिहास है और आगे की मुक्ति यात्रा का स्वप्न भी। अपने पूरे मानवीय वजूद और रंगो-बू के साथ। –

‘खेतों को संवारा तो सँवरते गए ख़ुद भी

फ़सलों को उभारा तो उभरते गए ख़ुद भी

फ़ित्रत को निखारा तो निखरते गए ख़ुद भी

नित अपने बनाए हुए साँचों में ढलेंगे

हम ज़िंदा थे, हम ज़िंदा हैं, हम ज़िंदा रहेंगे।

अपने लिखे जाने के बाद से समाज के अपने इतिहास बोध से सहज निकली, ऐतिहासिक-भौतिकवादी नजरिए से संवरी हुई नज़्म की यह टेक- ‘हम ज़िंदा थे, हम ज़िंदा हैं, हम ज़िंदा रहेंगे’, नारा बन गई।

‘फ़िराक़’ साहब ने बात को दूसरी ओर आगे बढ़ाया। जानते हो हमारी संस्कृति में दोगलापन कहाँ से आया? और बताने लगे- ‘पंडितों के यहाँ से। दिन में तो जनेऊ धारे, नहा-धो सत्यनारायन की कथा बाँचते, पूजा-पाठ करने का ढोंग रचते, शाम को चोरी-छिपे किसी होटल में जा शराब पीते और गोश्त खाते। मुसलमानों को यह करने की ज़रूरत नहीं थी, और गद्दी उनकी थी तो राज-काज में उनके साथ रहे आए लालाओं को भी। वे घर में अपनी बीवी के हाथ का बना बढ़िया गोश्त खाते और शराब पी सकते थे। उन्हें इसके लिये चोरी-छुपे किसी होटल में जाने की ज़रूरत नहीं थी। संस्कृति में यह जो जहालत और दोगलापन है वह वहीं से आया।

और देखो रईसों ने, बाबू लोगों ने दूसरी जातियों की छोड़ो, अपने घर की औरतों को तो पढ़ने-लिखने, गीत-संगीत-नृत्य सीखने से रोक दिया था। उनका काम घर में चूल्हा फूँकना रह गया था। अब फूँक रहीं हैं चूल्हा, (नाटकीय अंदाज़ में उसे बताते हुए) -फूँ फूँ फूँ-फूँ करते उनकी नाक (उँगलियों से दिखाते हुए) यूं फैल जाती। और नहीं तो ऊपर से गहने से लाद दिया, दिन भर फचर-फचर पान चबाएँ बैठ कर। न बोलने की तहज़ीब, न उठने-बैठने की, तो क्या करते वे कोठे पर पतुरियों के यहाँ जाने के सिवाय। वहाँ उन्हें अदा से पान पेश किया जाता, तहज़ीब से बात की जाती, नाच-गाना देखते-सुनते वहीं सो जाते।

बात बदलने के खयाल से केपी ने पूछा- अछा हुजूर आप पर किन-किन लोगों का प्रभाव पड़ा?’

थोड़ा रुक कर ‘फ़िराक़’ साहब ने बताया- थोड़ा वेद-उपनिषदों का, ज़रा-सा रवीन्द्रनाथ का, कुछ भक्त कवियों का और कुछ मीर और गा़लिब का। बस। आगे बोले ज़िंदगी में उनके (मीर, गा़लिब के) बराबर का एक भी शेर कह पाते तो समझते कि कुछ कहा।

केपी- सुना आपके पिता जी भी शाएर थे, उनका कुछ….

हाँ वे भी कुछ-कुछ कह लेते थे, कभी-कभी एकाध अच्छा भी, (गुनगुनाते हुए) जैसे यह शेर-

जो तेरे गेसू-ए-पुरख़म से ख़ेल भी न सकीं

उन उँगलियों से सितारों को छेड़ सकता हूँ।

‘फ़िराक़’ साहब की आवाज़ में उनके अब्बा मरहूम का यह शेर हम लोगों के लिए अपनी ताकत के साथ जाग उठा था। पर ‘फ़िराक़’ साहब ने यह नहीं कहा कि उन पर अपने अब्बा का कोई प्रभाव पड़ा था। लेकिन देखिये कि ‘फ़िराक़’ ने अपनी एक ग़ज़ल में अपने वालिद के इस शेर की ज़मीन, बहर, तर्जे-बयां ही नहीं ली, इस पूरी पंक्ति को ही हड़प लिया –

     नहीं हैं फूल तो ख़ारों को छेड़ सकता हूँ

     खि़ज़ाँ में रफ़्ता (बीती) बहारों को छेड़ सकता हूँ।

     जो तेरे गेसू-ए-पुरख़म से खेल भी न सकीं

     उन उँगलियों से सितारों को छेड़ सकता हूँ।

किन्न किन्न, उन्न उन्न और नकियाना

यह भी दिलचस्प बातचीत थी। हमलोग पहुंचे ही थे कि ‘फ़िराक़’ साहब को छेड़ा दिनेश सुकुल ने।

सुकुल- ‘ये किन्न निगाहों ने, ये किन्न निगाहों ने। ये उन्न निगाहों ने, ये उन्न निगाहों ने- यह उन्न उन्न, किन्न किन्न में क्या है हुज़ूर जो उर्दू का कसीदा काढ़ते रहते हैं और हिंदी के सामयिक सरोकारों से भरे साहित्य को आप गरियाते रहते हैं।

‘फ़िराक़’ -अपनी जहालत अपने पास रखिए और करिए यह कि किसी औरत को ज्यादा नहीं 5 मिनट खड़ी हिंदी में बोलने को कहिए। आप देखिएगा कि 1-2 मिनट में उसकी हालत ख़राब होने लगेगी और वह नाक से बोलने लगेगी। औरतें ऐसी खड़खड़ भाषा बोलते-बोलते शर्माने लगती हैं और उसे कोमल बनाने के लिए नाक से बोलने लगती हैं। (जैसे चिढ़ा रहे हों) नंकिंयांने लगती हैं।

‘एक बार मैं रिक्शे से आ रहा था। रास्ते में देखा एक बोर्ड पर लिखा हुआ है- हिंदू छात्रावास- छा त्रा वास एक बार मुंह खुला तो बंद होने को आता ही नहीं साला! ऐसे ही कहीं पर एक बोर्ड देखा लिखा था- मत्स्य पालन विभाग। ये मत्स्य क्या है भाई! साथ वाले से मैंने पूछा। उसने बताया- ‘मत्स्य का मतलब मछली।’ तो मछली नहीं लिख सकते थे, जाहिल कहीं के। सबको समझ भी आता। हिंदी में यह जहालत पंडितों के यहाँ से आई है। (मज़ाक उड़ाते हुए) जथार्थ में, जो है सो की, तब सत्यनारायन भगवान कहते भए।’

सुकुल- अब बहुत बदल गई है हिंदी हुजूर, आप कहाँ हैं, पंत जी ने उसे कोमलता दी है, उनके पास भाषा है, एक वीज़न है। प्रसाद, निराला….

‘फ़िराक़’ ने सुकुल को काटते हुए कहना शुरू किया- कोमलता दी है, वाः! जनाब लिखते हैं- ‘चंचल पग दीपशिखा के धर।’ अब आप बताइये ये क्या है! दीपशिखा के चंचल पग धर, गाल हलवे जैसा है तो कहा जा सकता है लेकिन कोई कहे हलवा गाल जैसा है तो कैसा लगेगा! यही कोमलता दिये हैं पंत जी। एक पूरा वाक्य तो लिख नहीं पाते, कविता लिखेंगे। और पंत में वीज़न कहाँ है और आयेगा भी कहाँ से! सुबह लोटा लिए झाड़ा फिरने भी निकलते होंगे तो नाक के सामने पहाड़, होराइज़न कहीं है ही नहीं, जिसके पास होराइज़न ही न हो उसमें वीज़न कहाँ से आयेगा!

अब अपने प्रसाद जी को देखिये- (तर्जनी उंगली उठाते उसे धीरे ऊपर ले जाते हुए, मज़ा लेने के अंदाज़ में) हिमगिरि के उ..तुंग शिखर पर … बैठ (उनकी फैल कर बड़ी हो आईं आँखें किसी पैन कैमरे सी घूम रही थीं, जो दृश्य बना, उनके सुनाने के अंदाज़ से, हम सबको हंसी आने लगी।) शरारती मुस्कान- चलो किसी तरह बैठ भी गए तो यह शिला की शीतल छांव कहाँ से? हँसते-हँसते हम सबका बुरा हाल था।

लेकिन हिंदी का विरोध और मज़ाक उड़ाते हुए वे कई बार ऐसी नादानी की बात कर जाते, जिससे पता चलता था कि उनका यह विरोध बहुत कुछ अज्ञानता के चलते भी है।

‘फ़िराक़’-अब निराला हैं – ‘विजन वन बल्लरी पर – कोमल बनाने के लिए बल्ला का स्त्रिलिंग बना रहे हैं बल्लरी।’ मैंने हँसना रोकते हुए टोका- ‘नहीं हुज़ूर वह वल्लरी है बल्ले का स्त्रिलिंग नहीं। उसका अर्थ है लता, लतर जो आपके अगल-बगल बहुत है, चढ़ी हुई पेड़ों पर।’

‘फ़िराक़’- ‘अच्छा चलो तो कविता को डिक्शेनरी लेकर पढ़ना पड़े तो कौन पढ़ेगा और कविता की क्या गत बनेगी। और नहीं तो ऊपर से संस्कृत ठूँसते गए, बेवजः, बेजगह। भाषा वो होनी चाहिए जो तरकारी बेचने वाली कुजडि़न से लेकर आलिमों-फ़ाजि़ल तक सब एक तरह से बोल-समझ सकें।’

‘फ़िराक़’ (सुकुल की ओर इशारा करते हुए)- ‘कीन्न, उन्न कर रहे हो, उर्दू के संवार से बना एक शब्द है ‘उनकी’, तुम्हें कोई हिंदी कविता याद हो, जिसमें उसका बेहतर इस्तेमाल हुआ हो तो सुनाओ।‘

मैंने उन्हें सुनाया-

               ‘मेरे जीवन की उलझन

               बिखरी थीं उनकी अलकें

               पी ली मधु मदिरा किसने

               थीं बंद हमारी पलकें

‘फ़िराक़’- ‘अच्छा है, है किसकी?’

मैंने कहा जयशंकर प्रसाद की, उनकी कविता-पुस्तक ‘आँसू’ में है यह।

‘फ़िराक़’- ‘तो पढ़ो और खुश होओ!’

सुकुल- हुजूर आपको हिंदी का कोई कवि पसंद है या नहीं, या कि हिंदी ही पसंद नहीं है?

खड़ी हिंदी ही हिंदी नहीं है, वह हिंदी की एक शैली है। मैं हिंदी-विरोधी नहीं हूँ, न खड़ी हिंदी-विरोधी। प्रेमचंद की हिंदी का मैं क़ायल हूँ। हिंदी में तुलसी दास, कबीर, मीरा मुझे बहुत पसंद हैं। दुनिया की कविता के सामने इन्हें खड़ा कर दीजिये ये भारी पड़ेंगे।

तुलसी दास को तो वर्णों- स्वर और व्यंजन, मात्राओं- लघु और गुरु का अनुपात बनाने में महारत हासिल है, वे इसके मास्टर हैं, वैसा कोई और नहीं दिखता। जहां, जैसा, जो कहना हो, वहाँ उसके अनुरूप स्वर-व्यंजन, लघु-गुरु का सटीक अनुपात पाइएगा आप उनकी कविता में। जहां ख़ुशी का प्रसंग, भाव हो, वहाँ भाषा में व्यंजन, लघु की प्रधानता- ‘जब ते राम ब्याहि घर आए। नित नव मंगल बाजि बधाए।।’ और जहां गंभीर प्रसंग, भाव हो वहाँ स्वर और गुरु की प्रधानता। इसलिए वह खट से जबान पर चढ़ जाती है।

तुम लोगों ने कभी भोर में नदी को देखा है! कबीर का पद है- ‘नदिया बहे गंभीर रे साधो!’ इस गंभीर बहने का मतलब समझ आयेगा, भोर में नदी को देखोगे तो। उस समय उसके बहने का रूप ही कुछ और होता है। तुम वहाँ नदी को ही नहीं अपने भीतर के नदी को भी बहता देखोगे -गंभीर। कबीर उलट्बांसी भी बोलते हैं तो वह लोगों को सीधे समझ आ जाती है। क्यों? उनकी जिंदगी में भी बहुत कुछ ऐसा है जिसे सीधे कहने पर उतना नहीं व्यक्त होता जितना उसे थोड़ा उलट कर बोलने में।

मीरा ने अपने समय में स्त्रियों के दुख को जितना और जिस तरह से व्यक्त किया उससे अधिक कोई और क्या करेगा- ‘कोई कहियो रे प्रभु आवन की।’ इसमें राजशाही के भीतर स्त्रियों की दशा, उनकी स्थिति, कातरता सब कुछ जैसे एक पंक्ति में। ‘कोई कहियों रे’ में कितनी लाचारी, कितनी विकलता है, (व्यंग्य और घृणा से) जहां ‘प्रभु जी’ को बुलवाना पड़ता है, -‘कहीं और से।’

‘फ़िराक़’ उर्दू-हिंदी के सच्चे दोआब

ऊपर से देखने पर लगता है कि ‘फ़िराक़’ हिंदी के विरोधी हैं लेकिन उनकी बातों से यह अर्थ नहीं निकलता। खड़ी हिंदी कविता और हिंदी कवियों (इसे छायावादी कविता और कवि पढ़ना चाहिए, बहुत अधिक हुआ तो छायावादोत्तर कविता तक) के प्रति उनके विरोध-भाव में अति की मात्रा है लेकिन उस कविता भाषा को लेकर उनके द्वारा उठाए गए सवाल सिरे से ख़ारिज नहीं किए जा सकते। ‘फ़िराक़’ उर्दू को हिंदी खड़ी बोली का एक रूप मानते हैं, आम बोल चाल और लबो लहजे को अपनाने पर बल देते हैं, और इसे अपनी शायरी के लिए भी कसौटी बनाते हैं।

यह मानते हुए भी कि खड़ी बोली का जो चमत्कार है वह खड़ी बोली हिंदी कविता में है ही नहीं कि उसे तो उर्दू ने अपने भीतर रचा-बसा लिया है, उन्होंने खड़ी बोली हिंदी के शब्दों को अपनी शायरी में बेहतर इस्तेमाल किया है और वे उनकी शायरी की ताक़त और उनके नए ख़यालों को वहन करते हैं।

प्रगतिशील आंदोलन से जुड़ने के बाद तो उनकी भाषा को नए पंख लग गये। वे हिंदी शब्दों का बेधड़क इस्तेमाल करते हैं। हिंदी के वे शब्द उनकी शायरी में इस तरह खप कर आते हैं कि उनको वहाँ से हटाना या अलगाना नामुमकिन है। वे उर्दू के मशहूर ग़ज़ल के टुकड़ों का तो अपनी शायरी में नया मानी देते हुए इस्तेमाल कर ही ले जाते हैं, तुलसी की चैपाई के अर्धाली का भी वे नए मानी देते हुए इस्तेमाल कर ले जाते हैं, जैसे वे उसके हिस्से हों और कहीं अन्यत्र से न लिए गए हों।

कुछ नमूने-

हिंदी का एक शब्द है ‘गट्टा’, हाथ के पंजे के निचे वाले हिस्से को गट्टा कहते हैं। हिंदी वाले भी इस शब्द का प्रयोग नहीं करते दिखते। इसके लिए कलाई शब्द चलन में है। इस तरह कहिए तो यह भोजपुरी का शब्द है जो पूर्वांचल के जिलों में बोला जाता है और मुहावरे के बतौर ताकत, स्वाभिमान कई रूप में प्रयोग होता है- गट्टा पकड़ लेना, गट्टा पकड़ लेने की ताकत, उसका गट्टा पकड़ लिया आदि। उसी तरह एक शब्द है ‘पंचभूत’- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर। ‘फ़िराक़’ ने ‘मजदूरों, कारीगरों, शिल्पकारों की ललकार’ नामक अपनी नज़्म में इन दोनों शब्दों को उठाया है और चमत्कार पैदा कर दिया है।-

     ‘सरकश पंचभूत का गट्टा

      हमने झटक कर तोड़ दिया है

      जिस किस्मत की मार गजब थी

      उसका पंजा मोड़ दिया है।’

इसी तरह ‘शिक्षा में गोलमाल’ नज़्म में नये समाज का, जिसका ‘फ़िराक़’ सपना देखते हैं, नज़ारा करिए-

     यही संभालेंगे सब उहदे

     तलवार और कलम दोनों को

     अपने हाथों में ले लेंगे

     कलावंत भी कलाकार भी

     अब होगी इनकी संतान

     एक अछेद, अभेद, अखंड

     एक सजीव, सुयोग्य समाज

     भारत में आँखें खोलेगा

     नई सभ्यता कायम होगी।

इसी तरह जिन भी दूसरों की पंक्तियां जस की तस ले ली हैं उनका अर्थ लेकिन नया कर दिया है-

     वीर, सूरमा, धर्मी दानी

     आठों गांठ कुमैत जवानी

     जिसकी छवि नहिं जाय बखानी

     ‘‘गिरा अनयन नयन बिनु बानी’’

     लेकिन कब तक ये मन-मानी

ये कुछ नमूने हैं। इस तरह के सैकड़ों शब्द, न केवल नज़्मों, रुबाइयों बल्कि ग़ज़लों में भी भरे पड़े हैं। न केवल खड़ी हिंदी के बल्कि उसकी बोलियों (खास कर भोजपुरी) के शब्द वहाँ हैं, अलग से चमकते जड़ाऊ किस्म से नहीं, बिलकुल रवां, खपे हुए। वहाँ ‘निरधिकार चेष्टा, मनुष्य, ब्रह्मानन्द सहोदर कविता, ध्यान, अटूट, सिधार, जीवनधारा, सौगंध, दीप जैसे तत्सम खड़ी हिंदी के शब्द हैं तो ‘घामड़, अनपढ़, डग्गा, हड़बोंग’ जैसे देसज शब्द भी हैं। त्रिलोचन कहते थे हिंदी ‘जनपदीय भाषा’ है। कहते थे कि ‘उससे (जनपदीय बोलियों से) शब्द लेकर ही हिंदी विकसित होगी। यह भी कि उर्दू से हिंदी का और हिंदी से उर्दू का रिस्ता एक-दूसरे को संवारेंगे, उन्हें खूबसूरती और ताकत देंगे।’ ‘बशर्ते ‘आपसदारी और लेन-देन का शऊर हो और मेहनत की जाये’ यह ‘फ़िराक़’ कहते थे। ‘फ़िराक़’ इसके अव्वल उदाहरण भी हैं। वे सही मायने में उर्दू-हिंदी के दोआब हैं। हम हिंदी वाले शमशेर को हिंदी-उर्दू का दोआब कहते हैं लेकिन ‘फ़िराक़’ को उसमें शुमार नहीं करते, शायद इस नाते कि शमशेर ने हिंदी-उर्दू दोनों में लिखा है लेकिन ‘फ़िराक़’ ने केवल उर्दू में! अगर दोआब की यही परिभाषा है तो यह बड़ी बे-आब है।

इसी तरह प्रगतिशील आंदोलन को जो रचनात्मक योगदान ‘फ़िराक़’ का है, उसे खुले दिल से स्वीकारने में हिंदी हिचकिचाती नजर आती है, उर्दू भी। आम लोगों की ज़बान और लबो लहजे में रची ‘फ़िराक़’ की ढेरों नज़्में हैं जो लोकप्रियता और नई भाषा गढ़ने दोनों के लिहाज से, और हाँ शब्दों में तोड़-फोड़ करने, उसके जरिये नया शब्द बना लेने या उनमें नया अर्थ भरने, देसज शब्दों को बरतने में ‘फ़िराक़’ के बराबर का हिंदी में कोई नाम है तो वह हैं नागार्जुन। दूसरा कोई वैसा नहीं दिखता। लेकिन हमने ‘फ़िराक़’ को वह दरजा नहीं दिया, जिसके वे हकदार हैं। आखिर क्यों? शायद इसलिए कि प्रगतिशील आंदोलन भी हिंदी-उर्दू विभाजन के असर से बच नहीं पाया। दोनों के बीच दरार कल भी थी और आज भी है। कल कम थी आज ज्यादा है। दूसरा कारण शायद ‘फ़िराक़’ का हिंदी और हिंदी कविता का विरोध और तीसरा शायद उनकी बदनाम और ऊटपटाँग लगती जि़ंदगी। जो हो, इसमें मूल कारण हिंदी-उर्दू के बीच विभेदवादी रवैया है, जो अब तक चला आया है। आज जिस दौर के हम गवाह बन रहे हैं क्या वह हमसे यह मांग नहीं करता कि हम अपने अंदर और बाहर के इस विभेदवादी रवैये को चुनौती दें। एक ‘अछेद, अभेद, अखंड, सजीव, सुयोग्य’ नया भाषा-समाज बनाएँ जो आम समाज के दुख-दर्द और सपने को आम की ज़बान और ठेठ मानवता के लबो लहजा में व्यक्त करे।

‘फ़िराक़’ का नज़रिया मार्क्सी नज़रिया है। ऐतिहासिक-भौतिक-द्वंद्ववादी नज़रिया। ‘दास्ताने आदम’ उनके इस नज़रिये का इंतख़ाब है।

     ‘‘खेतों को सँवारा तो सँवरते गए खुद भी

     फ़सलों को उभारा तो उभरते गए खुद भी

     फ़ित्रत को निखारा तो निखरते गए खुद भी

     नित अपने बनाए हुए साँचों में ढलेंगे,

     हम ज़िंदा थे, हम ज़िंदा हैं, हम ज़िंदा रहेंगे।

यह ऊपर से ओढ़ा हुआ, फैशन या कि चलन में होने के नाते नहीं है बल्कि अपनी ज़िंदगी के अनुभवों से हासिल है। बचपन से जीवन-जगत को उनके देखने-समझने-अनुभव करने का जो ढंग रहा आया, वह उससे विकसित हुआ है। उनकी ‘हिंडोला’ नामक रचना में उनके बचपन का यह रूप बड़ी खूबसूरती और गहरी संवेदना के साथ व्यक्त हुआ है। ‘‘भौतिकता के चमत्कार के अनुभव को ही मैं उच्च-से-उच्च आध्यात्मिकता महसूस करता था। जिसे भौतिक कहते हैं वही दिव्य भी है और उसके अतिरिक्त कोई विचार दिव्य नहीं हैं।’’ मज़ा यह है कि ‘‘हिंदू संस्कृति और इस संस्कृति के मिज़ाज ने मुझे वह अनुभव कराया कि प्रेमी-प्रेमिका का संबंध, घरेलू जीवन, सामाजिक जीवन, प्रकृति के दृश्य, धरती, नदियां, सागर, पहाड़, लहलहाते खेत, बाग और जंगल, अग्नि, हवा, सूर्य, चंद्रमा, सितारे, मौसमों का जुलूस- किसी भी ईश्वर-पैगंबर, धार्मिक ग्रंथ, काबा या काशी से कहीं अधिक दिव्य पवित्र हैं।’’ (बज़्मे जि़ंदगी रंगे शाएरी)

     जिसे मालूम है मैं ला-सबब हूँ और ना-पैदा

     मेरे जेरे-नगीं जो सारे-आलम को समझता है

     कभी अवहामे-बातिल से वो धोका खा नहीं सकता

     कि दाग़े-मासियत से उसका दामन पाक होता है।      (नग़मा-ए-हक़ीक़त)

हक़ीक़त के दोनों पक्षों पर उनकी निगाह यकसां जमी रहती है। और भी कि उनके यहाँ तख़य्युल हक़ीक़त में पिनहाँ है, उसके अंग के बतौर। वहाँ तख़य्युल और हक़ीक़त एक-दूसरे से अलग-अलग शै नहीं-

     सुकूते-नीमशबी, लहलहे बदन का निखार

     कि जैसे नींद की वादी में जागता संसार

     है बज़्मे-माह कि परछाइयों की बस्ती है

     फ़ज़ा की ओट से वो खामुशी बरसती है

     कि बूंद-बूंद से पैदा हो गोशो दिल में खनक (परछाइयाँ)

वे केवल ‘सुर्मई फ़ज़ाओं की कुछ कुनमुनाहटें’ ही नहीं ‘तराना-ए-खि़ज़ाँ’ भी लिखते हैं। सच कहिए तो वे द्वन्द्वों के शाएर हैं, विरोधी बातों को एक साथ रख कर वे अपनी बात के गहरे मानी को उजागर करते हैं। इस नुक्त़े नज़र से ‘फ़िराक़’ की ‘नग़मा-ए-हक़ीक़त’ को देख लेना भी काफी होगा। पाये की, दमदार, बेहद खूबसूरत और मानीखेज रचना।

     वो इक लम्हा हूँ मैं जिसका कभी कटना नहीं मूम्किन

     वो दिन हूँ आके जो शहरे-ख़मोशां को जागा जाये।

     मैं ऐसा वक्त़ हूँ जिसका कभी घटना नहीं मूम्किन

     वो शब हूँ मैं सितारों को भी जिसमें नींद आ जाये।

‘फ़िराक़’ आत्म-चेतस ही नहीं, विश्व-चेतस, वर्ग-चेतस भी हैं। वे चाहे जिन दिलकश या ग़मग़ीन नजारों में खोये या गुम हों, उनकी नज़र से इंसानी दर्द ओझल नहीं होता। यह चमकता हुआ इंसानी दुख ‘फ़िराक़’ की शायरी में हर जगह मौजूद है, शायरी के वजूद की तरह। नमूने के बतौर उनकी नज़्म ‘आधी रात’ को देखा जा सकता है। जहां ‘मौजे-नूर से भरपूर खुली हुई रात’ है, वहीं यह चिंता भी कि ‘सिपाहे-रूस हैं अब कितनी दूर बर्लिन से।’ जहां ‘नदी के बीच कुमुदिनी के फूल खिल उठे हैं’, वहाँ ‘न मुफ़लिसी हो तो कितनी हसीन है दुनिया’ की टीस भी। जहां नज़र चकित है कि ‘ये चाँदनी है कि उमड़ा हुआ है रस-सागर’ वहीं वह दुखती रग भी कि ‘एक आदमी है कि इतना दुखी है दुनिया में।’ भूखे-दूखे-कुचले इंसान की महज चिंता के रूप में ही नहीं, ‘पुराना निजामे ग़म बदले’ के ख़्वाब के साथ, उस इन्क़लाब के इंतज़ार में, जिसकी अभी कोई खबर नहीं आ रही, जिसे आना ही आना है, जिसकी आहट पर सितारों के कान लगे हैं।’

‘फ़िराक़’ और रात का रिस्ता बहुत सघन और गहन (जटिल) है –

नक़्शो-निगारे-ग़ज़ल में जो तुम ये शादाबी पाओ हो

हम अश्क़ों में कायनात के नोके़-क़लम डुबो ले हैं।

वहाँ रात और कायनात के सौंदर्य के ऐसे-ऐसे दृश्य और अनुभव हैं जो इससे पहले अदेखे-अजाने थे। ये दृश्य किसी चौखटे, फ्रेम में फिट स्थिर दृश्य नहीं, गतिशील दृश्य हैं। ये दृश्य, ये अनुभव, क्रिया से भरे हैं, क्रिया के एक नहीं एक साथ कई रूपों में। उस रात में समय का सरगम है, अपनी जटिल स्वर-लिपि में। ‘फ़िराक़’ के यहाँ अल्फ़ाज़ ठहरे हुए नहीं हरकतों से भरे हुए हैं। उनकी काव्यभाषा हरकतों-भरी, जैविक काव्यभाषा है। इन सबका एक साथ नज़ारा करना हो तो ‘आधी रात को’ और ‘परछाइयाँ’ इन दो नज़्मों को जरूर और भरपूर देखना चाहिए-

सियाह पेड़ हैं अब आप अपनी परछाईं

ज़मीं से ता महो अंजुम सुकूत के मीनार

………

झलक रहा है पड़ा चाँदनी के दर्पन में

रसीले कैफ़ भरे मंजरों का जागता ख़्वाब

…….

खड़ा है ओस में चुपचाप हरसिंगार का पेड़

दुल्हन हो जैसे हया की सुगंध से बोझल

……….

छलक रही है ख़मे-गैब से शराबे-वजद

फ़ज़ा-ए-नीमशबी नरगिसे-ख़ुमार आलद

कंवल की चुटकियों में बंद है नदी का सुहाग

……….

ये सांस लेती हुई कायनात, ये शबे-माह

ये पुरसुकूँ, ये पुरअसरार, ये उदास समां

ये नर्म-नर्म हवाओं के नीलगू झोंके

फ़ज़ा की ओट में मुर्दों की गुनगुनाहट है

ये रात मौत की बेरंग मुस्कुराहट है

धुआँ-धुआँ से मनाजि़र तमाम नमदीदा

ख़ुनक धुंदलके की आँखें भी नीम-ख़्वाबीदा

सितारें हैं कि जहाँ पर है आँसुओं का कफ़न

हयात परदा-ए-शब में बदलती है पहलू

……….

गुलों ने चादरे-शबनम में मुँह लपेट लिया

लबों प सो गयी कलियों की मुस्कुराहट भी

…………

नयी ज़मीन, नया आसमाँ, नयी दुनिया

नए सितारे, नयी गर्दिशें, नए दिन-रात

ज़मीं से ताफ़लक इंतिज़ार का आलम

फ़ज़ा-ए-ज़र्द में धुँधले गुबार का आलम

हयात मौतनुमा इंतिशार का आलम

है मौजे-दूद कि धुंदली फ़ज़ा की नब्ज़ें हैं

तमाम ख़स्तगी-ओ-मांदगी ये दौरे-हयात

थके-थके-से ये तारे थकी-थकी-सी ये रात

ये सर्द-सर्द ये बेजान फीकी-फीकी चमक

निज़ामे-सानिया की मौत का पसीना है

ख़ुद अपने आपमें ये कायनात डूब गयी

ख़ुद अपने कोख से फिर जगमगा के उभरेगी

बदल के केचुली जिस तरह नाग लहराये! (आधी रात को)

(निज़ामें-सानिया शब्द गौर तलब है, जिसका ‘फ़िराक़’ मायने बताते हैं – पहला निज़ाम जागीरदारी, दूसरा निज़ाम सरमायादारी, तीसरा निज़ाम इश्तिराकीयत (कम्यूनिज्म) )

एक टुकड़ा ‘परछाइयाँ’ से भी-

किसी ख़याल में है ग़र्क चांदनी की चमक

हवाएं नींद के खेतों से जैसे आती हों

हयातो-मौत में सरगोशियां सी होती हैं

करोड़ों साल के जागे सितारे नमदीदा

सियाह गेसूओं के साँप नीम ख़्वाबीदा

ये पिछली रात ये रग-रग में नर्म-नर्म कसक

जिस ज़बान पर मेरा कोई दखल नहीं उसको अर्थाने की हिमाकत बेजा बात है। लेकिन शायद यह बड़े कवियों की खूबी है कि वो जो अपना काव्य-संसार रचते हैं, उसमें आपको डुबो लेते हैं, आप एक साथ दो दुनियाओं के बासिंदे बने रहते हैं – कवि की दुनिया और वास्तविक दुनिया दोनों के, और आपको इसका गुमान तक नहीं होता। ‘फ़िराक़’ के काव्य संसार की जो एक बड़ी खूबी है, जिसके जरिये उर्दू भाषा पर दखल न रखने वालों को भी उनकी कविता अपने में डुबो-सामो लेती है, वह है अल्फ़ाज़ के रगों में संगीत की झनकार, जो यूं ही नहीं, बड़े जतन से पैदा की गई है।

पहली हिमाकत

शब्दों का अपना सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश और इतिहास होता है। अगर आपका उस भाषा पर अधिकार नहीं है तो आप उसे डिक्सेनरी के सहारे नहीं समझ सकते और अपनी स्थिति है कि कुछ बोध और कुछ डिक्सेनरी के सहारे ही उस दुनिया को छूना हो पाता है। फिर भी एक हिमाकत कर रहा हूँ, ‘फ़िराक़’ और फै़ज़ को लेकर। मुझे बराबर लगता है कि फै़ज़ अपने विषयवस्तु को, और काव्य-ढांचे को मूलतः पोलिटिकली बरतते हैं और ‘फ़िराक़’ मूलतः फिलॉसाफिकली।

दूसरी हिमाकत

‘फ़िराक़’ पर हिंदी के कवियों- तुलसीदास, कबीर, सूरदास और मीरा का गहरा असर है। कहीं-कहीं तो उन्होंने उनकी पंक्तियाँ तक ज्यों की त्यों ले ली हैं और अपने अर्थों में ढाल उन्हें खपा लिया है लेकिन कहीं-कहीं उनका उल्था भर है जो अच्छा नहीं है। लेकिन तुलसी और खास कर सूरदास से जिन्होंने मुख्य रूप से राम, कृष्ण के बालपन के वर्णन के साथ कौसल्या और यशोदा का भी वर्णन कर दिया है, उससे अलग ‘फ़िराक़’ ‘‘रुबाइयात’’ में खालिस माँ के सौंदर्य का वर्णन करते हैं, जिसके गोद में बच्चा है, जैसा वर्णन हिंदी-उर्दू के साहित्य में इससे पहले नहीं मिलता। कुछ पंक्तियाँ-

गुल हैं कि रुख़े-गर्म के हैं अंगारे

बालक के नयन से टूटते हैं तारे

रहमत का फ़रिस्ता बनके देती है सज़ा

माँ ही को पुकारे और माँ ही मारे

…….

किस प्यार से होती है ख़फ़ा बच्चे से

कुछ त्योरी चढ़ाये हुए मुंह फेरे हुए

इस रूठने पर प्रेम का संसार निसार

कहती है कि जा तुझसे नहीं बोलेंगे

उस माँ के सौंदर्य की उतनी ही निर्मल, अकुंठ अभिव्यक्ति हमें कहाँ से कहाँ पहुंचा देती है-

लहरों में खिला कंवल नहाये जैसे

दोशीज़ा-ए-सुबह गुनगुनाये जैसे

ये सज, ये धज, ये नर्म उजाला, ये निखार

बच्चा सोते में मुस्कुराये जैसे

इन पंक्तियों को पढ़ते हुए हम वहाँ पहुँच जाते हैं जहां से यह कविता शुरू हुई थी-

हर जलवे से एक दर्से-नुमु लेता हूँ

लबरेज़ कई जामो-सुबू लेता हूँ

पड़ती है जब आँख तुम पे ऐ जाने-बहार

संगीत की सरहदों को छू लेता हूँ।

‘फ़िराक़’ यूं ही नहीं कहते थे कि कविता वह जिसे पढ़ने के बाद आप यह महसूस करें कि आप वही नहीं रह गए जो इसे पढ़ने के पहले थे।

‘‘माँ ही को पुकारे और माँ ही मारे’’ जैसी जानी-पहचानी लेकिन अजानी जैसी रह गई न जाने कितनी पंक्तियाँ ‘फ़िराक़’ के काव्य-संसार में पहली बार आती हैं और हम हैरान रह जाते हैं कि हमने इन्हें इस रूप में अब तक देखा-अनुभव क्यों नहीं किया था। ऐसी ही एक पंक्ति ‘‘जुगुनू’’ कविता से- ‘‘वो माँ हम उससे जो दम भर को दुश्मनी कर लें / तो ये न कह सके अब आओ दोस्ती कर लें।“ माँ-बच्चे को लेकर ‘‘रुबाइयात’’ और यतीम बच्चे और दूसरे और बच्चों को लेकर ‘‘जुगुनू’’ और ‘‘हिंडोला’’ तो जैसे हमारे संस्कृत-हिंदी-उर्दू साहित्य की वह आब है जिसके लिए ज़माना ‘फ़िराक़’ का ऋणी रहेगा।

तीसरी हिमाकत

‘फ़िराक़’ के काव्य-संसार (ग़ज़ल और नज़्म) का ‘की वर्ड’ है इन्क़लाब। ‘इन्क़लाबी शाएर’ के चालू अर्थों में नहीं, इसके सच्चे और गहरे अर्थों में-

कौन रख सकता है इसको साकिनो-जामिद कि ज़ीस्त

इन्क़लाबो – इन्क़लाबो – इन्क़लाबो – इन्क़लाब

….

अह्ले-रज़ा में शाने-बग़ावत भी हो ज़रा

इतनी भी जि़ंदगी न हो पाबंदे-रस्मियात

पैदा करे ज़मीन नयी आसमां नया

इतना तो ले कोई असरे-दौरे-कायनात

….

हरीमे-इश्क़ के पर्दे से लौ निकलती है

ये सोज़ो-साज़ है किस नग़्म-ए-रबाब कि आँच

…..

‘फ़िराक़’ वक्त के रुख़ से उलट रही है नक़ाब

ज़मीं से ताबफ़लक है इस इन्कि़लाब कि आँच

देख रफ़्तारे-इन्कि़लाब ‘फि़राक़’

कितनी आहिस्ता और कितनी तेज़’

(इस शेर पर ‘फ़िराक़’ की टिप्पणी- इन्किलाब की शाम तक कोई चीज इन्कि़लाब से ज़्यादा अनहोनी नहीं होती- अनातोल फ्रांस)

……

अभी मशीय्यतों प फ़त्ह पा नहीं सका बशर

अभी मुक़द्दरों को बस में ला नहीं सका बशर।

अभी तो इस दुखी जहाँ में मौत ही का दौर है

अभी तो जिसको ज़िंदगी कहें वो चीज़ और है।

अभी तो खून थूकती है ज़िंदगी बहार में

अभी तो रोने की सदा है नग़म-ए-सितार में।

….

अभी फि़ज़ा-ए-दहर लेगी कर्वटों पे कर्वटें

अभी तो सोती हैं हवाओं की वो सनसनाहटें।

अभी तो सीन-ए-बशर में सोते हैं वो ज़लज़ले

कि जिनके जागते ही मौत का भी दिल दहल उठे।

अभी तो बत्ने-गैब में है उस सवाल का जवाब

खुदा-ए-खैरो-शर भी ला नहीं सका था जिसकी ताब।

……

अभी रगे-जहाँ में जि़ंदगी मचलने वाली है

अभी हयात की नयी शराब ढलने वाली है।

अभी छुरी सितम की डूब कर उछलने वाली है

अभी तो हसरत इक जहान की निकलने वाली है।

अभी तो घन-गरज सुनाई देगी इंक़्लाब की

अभी तो गोशबर सदा है बज़्म आफ़ताब की।

…..

मगर अभी तो जि़ंदगी मुसीबतों का नाम है…. (शामे आयादत)

……..

सोज़े-पिनहाँ हो, चश्मे-पुरनम हो।

दिल में अच्छा-बुरा कोई ग़म हो।

फिर से तरतीब दें जमाने को।

ऐ ग़में जि़ंदगी मुनज़्ज़म हो।

इन्कि़लाब आ ही जाएगा इक रोज।

और नज़्में-हयात बरहम हो।

गरज़ ये कि हयात से कायनात तक, ज़मीं से फ़लक तक, समाजी-सियासी से हुस्नो-जमाल तक, ग़ज़ल से नज़्म-नस्र तक ‘फ़िराक़’ के रचना-संसार में जो एक चीज, निहाँ-नुमाया जिस रूप में हो, हर जगह मौजूद है, वह है इन्क़लाब। जो इन्क़लाब को नहीं जानना-समझना चाहता वो ‘फ़िराक़’ को नहीं जान-समझ सकता।

एक शाम ‘फ़िराक़’ के यहाँ गया हुआ था। बैठने के बाद ‘फ़िराक़’ साहब ने पूछा- ‘पंडित तुम्हारे रिसर्च का विषय क्या है?’ ‘कविता की रचना प्रक्रिया’- मैंने बताया। सुनते ही ‘फ़िराक़’ साहब ने कहा- ‘कैसे-कैसे घामड़ बैठे हैं यूनिवर्सिटीज में, और हिंदी विभाग में तो और भी, यह भी कोई विषय है भला!’ मैंने कहा- ‘यह विषय मुझे किसी ने नहीं सुझाया, मैंने खुद चुना है।’ ‘फ़िराक़’ ने मेरी बात पर कान नहीं दिया शायद, और आगे जो कुछ बोलते रहे मेरे लिए बहुत काम का था, शोध के विषय के लिहाज से भी। वह संक्षिप्त-सी बात इतनी गहरी और प्रभावकारी थी कि मैं उसे आज तक नहीं भूला। कविता पर सोचते, बोलते या कभी कभार लिखते वह बात हमेशा जेह्न में रहती है। ‘फ़िराक़’ साहब कह रहे थे- ‘ये कविता की जड़ खोजना है या जड़ खोदना। हर लिखने वाला जानता है कि उसकी जड़ कहाँ है, उसके लिए यह रहस्य नहीं होता। वह अपनी रचना के रहस्य को जानता है लेकिन उस जड़ का ढके रहना ही रचना का सौंदर्य है, उसकी सुंदरता उसके रहस्य बने रहने में है। पौधे को उखाड़ कर तुम उसका सौंदर्य देखना चाहते हो, तो उखाड़ते ही वह मुरझा जाएगा, उसका सौंदर्य तुम कभी नहीं देख पाओगे।’

अल्फ़ाज़ के पर्दों में करो इसका यकीं

लेती है साँस नज़्मे शायर की ज़मीं

आहिस्ता ही गुनगुनाओ मेरे अशआर

डर है न मेरे ख़ाब कुचल जायें कहीं

एक बुजुर्ग बालक

(‘बचा के रखी थी मैंने अमानते-तिफ़ली’)

मैं पहले भी कह आया हूँ कि ‘फ़िराक़’ के भीतर एक बच्चा रहता है। वे इस हयात, कायनात, उसके रहस्य-रोमांच और सौंदर्य को, उसकी नजर से देखते हैं- ‘बच्चा सोते में मुस्कुराए जैसे।’ वे दूसरे की कविताओं को भी बच्चे की मासूमियत और जिज्ञासा से देखते-समझते थे।

एक बार उनके यहाँ बैठे बात कर रहा था कि एक लड़का आहिस्ते आ सर झुकाये चुप खड़ा हो गया। उधर नजर फेरते हुए ‘फ़िराक़’साहब ने उस लड़के से पूछा- ‘कहिए!’ लड़के ने सर झुकाये ही कहा – ‘हुजूर मैं उर्दू डिपार्टमेन्ट का छात्र हूँ, ग़ालिब पर रिसर्च कर रहा हूँ। मेरे गाइड ने कहा कि मैं आप से मिल लूँ।’

‘फ़िराक़’ साहब ने कहा, ‘यह तो ठीक है लेकिन पहले आप अपने गाइड से ग़ालिब के इस शेर का अर्थ पूछ कर आइये- ‘बैठे रहे महफिल में इशारे हुआ किए’- तो ग़ालिब क्या कोई बेहया थे, ….कोई गुंडे थे …या बेगैरत, क्या थे- पहले पूछ कर आइये फिर आप से बात होगी, जरूर होगी।’

वह लड़का कहता भी क्या, वैसे ही चुपचाप चला गया। ‘फ़िराक़’ साहब ने उर्दू विभागों और आज के उर्दू वालों को भला-बुरा कहते हुए बात जारी रक्खा- ‘ग़ालिब के इस शेर को समझना बच्चे को समझना है, (मैं थोड़ा चौंका और उत्सुक भी) अब फ़र्ज कीजिये की मेरे पड़ोस में एक बच्चा है। उसे रसगुल्ले बहुत प्यारे हैं। पड़ोस के उस घर से हमारे घर का रिश्ता बहुत ख़राब है, ऐसा कि उस घर के बच्चों तक को लोग पसंद नहीं करते। मैं रसगुल्ले का एक कुल्हड़ लिये उधर से चला आ रहा हूँ। उस बच्चे ने मुझे कुल्हड़ लिये आते देख लिया है और मेरे पीछे-पीछे हो लिया। मैं घर में दाखिल हो रहा हूँ। अब लड़का इधर उधर से झांके जा रहा है। हमारे घर के लोग नाक सिकोड़े उस पर इशारे कर रहे हैं, फ़ब्तियाँ कस रहे हैं लेकिन लड़के को क्या, उसका ध्यान तो मेरे हाथ के रसगुल्ले के कुल्हड़ पर है- ‘बैठे रहे महफिल में इशारे हुआ किये।’ मेरे विस्मय का ठिकाना नहीं था, मैं ये सोच भी नहीं सकता था कि इस तरह भी इस शेर को समझा जा सकता है।

‘फ़िराक़’ साहब ने अपनी बेटी का जिक्र करते हुए बताया कि बचपन से ही उसके पेट में दर्द रहा करता था। एक रोज वह लॉन में बच्चों के साथ खेल रही थी। मैं सामने कुर्सी डाले बैठा हुआ था। अचानक उसके पेट में दर्द उठा, वह पेट पकड़ कर बैठ गई। दर्द के मारे उसकी आँखें भर आई थीं, अचानक मेरी नजर उस पर पड़ी और वह मुस्कुरा दी, उस दिन मैंने ये शेर कहा-

वो ग़म क्या जो हंसा न दे

वो ख़ुशी क्या जो रुला न दे।

उस दिन ‘फ़िराक़’ साहब ने बच्चों की बाबत ढेर सारी बातें सुनाईं। बताया कि एक बार जब अकाल पड़ा था, एक औरत कहीं जा रही थी। पीछे-पीछे उसका बच्चा माँ के आँचल का छोर खींचते ठुनक रहा था- ‘माई भात खाब, माई भात खाब!’ गोरखपुर वालों के खाने में भात न हो तो बात नहीं बनती। माँ क्या बोले! यह देख कर ऐसा गुजरा दिल पर कि क्या महाभारत गुजरा होगा किसी पर!’

‘फ़िराक़’ साहब ने आगे सुनाया- ‘मेरे घर में एक बिल्ली थी। उसने बच्चे दिये थे। वह बच्चे को ढूंढती इस कमरे, उस कमरे म्यावं, म्यावं करती फिर रही थी। किसी कुत्ते ने उसका एक बच्चा तोड़ दिया होगा। क्या कौशल्या रोई होंगी राम के लिये, जैसा वह अपने बच्चे के लिये रो रही थी।

जैसा कि मैंने कहा ‘फ़िराक़’ साहब के अंतिम समयों में मैं अकेले अक्सर अपनी बेटी समता, तब वह बहुत छोटी थी, को लिये उनके यहाँ जाया करता था। एक दिन हम बैठे बातें कर रहे थे कि समता ने चौंकते हुए कहा- ‘पापा बिल्ली!’ मैं इधर-उधर देखने लगा पर बिल्ली दिख नहीं रही थी। ‘फ़िराक़’ साहब बोले- ‘छोडि़ए साहब आप बातें करिए वो आपको नहीं दिखेगी, जिसकी चीज होती है उसी को दिखाई पड़ती है।’

उसी तरह एक दिन हम बैठे बातें कर रहे थे। ‘फ़िराक़’ साहब की स्टूल पर सिगरेटों की पैकटें बदस्तूर रखी हुई थीं। समता ने उन्हें उठा कर तोड़ना और इधर-उधर बिखेरना शुरू कर दिया। मैं रोकने के लिये उठने को हुआ ही कि ‘फ़िराक़’ साहब ने अपने होठों पर अंगुली रख इशारे से मुझे कुछ कहने-करने से सख़्ती से रोक दिया। और बोले- ‘रमेश बिस्कुट है क्या, ले आओ!’ रमेश प्लेट में बिस्कुट रख कर ले आए और स्टूल पर रख दिये। समता अब बिस्कुट में लगीं और ‘फ़िराक़’ साहब ने अपनी सिगरेटें समेट दूसरी तरफ छिपा कर रख लिया और फिर बोले- ‘तुम उसे नफ़ा-नुकसान के हिसाब से टोकते लेकिन वह तो इसे जानती नहीं, वह तो खेल रही थी और देख-समझ रही थी उसे। तुम्हारे ऐसा करने से उसके दिमाग में टेढी लकीरें बन जातीं, यह अच्छा न होता। देखो एक बात याद रखना, कमरे में तुम पति-पत्नी चाहे जितनी और जैसी व्यक्तिगत बातें कर रहे हो, अगर उस समय कोई बच्चा कमरे में आ जाये तो एक दम से चुप नहीं हो जाना चाहिए। इससे धप्प करती हवा वहाँ से जैसे खाली हो जाती है और वह बच्चे के दिमाग से जा टकराती है, उसके सिर को जैसे दबा देती है दोनों तरफ से। इससे उसके दिमाग में गड़बड़ लकीरें बन जाती हैं, जो उसे नुकसान पहुंचाती हैं।’

मैं अक्सर सोचता रहा हूँ कि जिस आदमी का अपने परिवार से कोई बहुत नाता नहीं रहा, वह बच्चों को लेकर इस कदर संवेदनशील कैसे!

हिंदी के कवि गजानन माधव मुक्तिबोध ‘साहित्य और जिज्ञासा’ नाम के अपने निबंध में लिखते हैं, ‘जिज्ञासा जो बाल्यकाल, नवयौवन और तारुण्य के विभिन्न उषःकालों में हृदय का छोर खींचती हुई, आकर्षण के सुदूर ध्रुव-बिंदुओं से हमें जोड़ देती है।… ‘देखने’ की इच्छा, ‘जानने’ की इच्छा, ‘रहस्य’ की उलझी हुई बातों को सुलझाने की इच्छा, कितनी मनोहर, कितनी दुर्निवार और अदम्य हो सकती है, यह उसी से जाना जा सकता है जो जिज्ञासा का शिकार है।’

‘‘उम्र में बढ़कर, जब हमें ‘ओपीनियन’ बनाने की आदत पड़ जाती है, जब हम बुद्धिमान और बुद्धिवादी बन जाते हैं तब हमारे दिमाग की बाल-कमानी यानी जिज्ञासा पुरानी और घटिया हो जाती है। तब इसे किसी बालक की जरूरत पड़ती है, जो यह टाइमपीस तोड़कर देखे कि उसकी भीतरी बनावट क्या है।

लेकिन पुराने बालकों में ऐसे लोग भी निकलते हैं, जिनमें जिज्ञासा की तीव्र दृष्टि और आग्रहशीलता के साथ उस ओर यौवनसुलभ श्रम करने की प्रवृत्ति और खोज के आधर पर वृद्धसुलभ अनुभवपूर्ण मत बनाने की शक्ति रहती है। साहित्य इस जिज्ञासा का ऋणी है।”

‘फ़िराक़’ से मिलते-मिलाते, बातें करते मुझे बारहा लगता रहा है कि ‘फ़िराक़’ के भीतर एक बच्चा, एक बुजुर्ग बालक है, जिसे ‘फ़िराक़’ ने अपने भीतर पूरी जिंदगी बड़े जतन से महफ़ूज़ रखा। जिसने अपने समय की टाइमपीस तोड़ कर यह देखने की कोशिश की कि उसकी भीतरी बनावट क्या है।

मुक्तिबोध की कविता के इस पहलू पर अपने लिखे हुए को मैं यहाँ इसलिए उद्धृत कर रहा हूँ कि यह ‘फ़िराक़’ साहब के बारे में भी सही लगता है- ‘इस वृद्ध बालक की सुदूर नेब्युला से लेकर आभ्यांतर निराले लोक तक, अति निकट वर्तमान से लेकर सुदूर अतीत तक, अपने देश से लेकर देश-देशांतर तक की इस साहस और जोखिम भरी जिज्ञासा-यात्रा में ‘सहसा’, ‘अचानक’, ‘यकायक’, ‘अकस्मात’ बहुत कुछ दिखता, लुप्त होता, मिलता, खोता, आता, जाता रहता है। भय और पुलक की, चिहुंकन और सिहरन, खतरनाक अघट घटनाओं की थरथरी आदि बहुत कुछ अनुभव के हिस्से बनते रहते हैं।’

सनद के बतौर ‘‘हिंडोला’’ की चंद पंक्तियाँ, जो ‘फ़िराक़’ साहब ने अपने बारे में लिखी हैं-

ये कम नहीं है कि तिफ़ली-ए-रफ़्ता छोड़ गयी

दिले-हज़ीं में कई छोटे-छोटे नक़्शे-कदम

मेरी अना के रगों में पड़े हुए हैं अभी

न जाने कितने बहुत नर्म उँगलियों के निशाँ

….

ज़माना छीन सकेगा न मेरी फि़तरत से

मेरी सफ़ा मेरे तहतश्शउर की इस्मत

तख़य्युलात की दोशीज़गी-ये-रद्दे-अमल

जवान होके भी बेलौस तिफ़्लवश जज़बात

….

बग़ैर बैर के अनबन, गरज़ से पाक तपाक

गरज़ से पाक ये आँसू गरज़ से पाक हँसी

…..

ये साज़े दिल में मेरे नग़म-ए-अनलकौनैन

हर इजि़्तराब में रूहे – सुकुने – बे – पायाँ

ज़मान – ए – गुज़रां में दवाम का सरगम

…..

ये रम्जि़यत के अनासिर, शऊरे-पुख्ता में

फलक प वज्द में लाती है जो फ़रिश्तों को

वो शायरी भी बुलूगे-मिज़ाजे-तिफ़ली है

के नशतरिय्यते-हस्ती ये उसकी शेरीयत

….

इसी वदीअते – तिफ़ली का अब सहारा है

….

इन्हीं को रखना है महफ़ूज़ ता-दमे आखि़र

बच्चों पर बहुत सी कवितायें लिखी गयी हैं लेकिन यतीम, गरीब, यहाँ तक कि खाते-पीते घरों, गरज़ के बच्चों के बारे में जिस सरोकार, तकलीफ़ और पाक गुस्से के साथ ‘फ़िराक़’ ने कवितायें लिखी हैं वैसी कम देखने को मिलती हैं। ‘‘हिंडोला’’ का आखिरी हिस्सा इस नज़र से काबिले गौर है-

अगर हिसाब करें दस करोड़ बच्चों का

ये बच्चे हिन्द की सबसे बड़ी अमानत हैं

हर एक बच्चे में हैं सद जहाने-इमकानात

मगर वतन का हालो-अक़्द जिनके हाथ में है

निज़ामे-जि़ंदगी-ए-हिन्द जिनके बस में है

रवैया देख के उनका ये कहना पड़ता है

किसे पड़ी है कि समझे वो इस अमानत को

किसे पड़ी है कि बच्चों की जि़ंदगी को बचाए

ख़राब होने से, मिटने से, सूख जाने से

बचाए कौन इन आज़ुर्दा होनहारों को

वो जि़ंदगी जिसे ये दे रहे हैं भारत को

करोड़ों बच्चों के मिटने का एक अलमिया है

…..

जो खाते-पीते घरों के बच्चे हैं उनको भी क्या

समाज फलने-फूलने के दे सकी साधन

वे सांस लेते हैं तहज़ीब-कुश फ़ज़ाओं में

हम उनको देते हैं बेजान और ग़लत तालीम

…..

वो जिसको बच्चों को तालिम कह के देते हैं

वो दर्स उलटी छुरी है, गले पे बचपन के

ज़मीने-हिन्द हिंडोला नहीं है बच्चों का

करोड़ों बच्चों का ये देश अब जनाज़ा है

हम इन्कि़लाब के ख़तरों से खूब वाकि़फ़ हैं

कुछ और रोज़ यही रह गए जो लैलो-निहार

तो मोल लेना पड़ेगा हमें ये ख़तरा भी

कि बच्चे कौम की सबसे बड़ी अमानत हैं।

हम तो गए थे ‘फ़िराक़’ के यहाँ उनकी झक्कीपने की बातें सुनने, उसपर हंसने, उन्हें चिढ़ाने, उनके चिढ़ने का मज़ा लेने, उनकी गालियां सुनने लेकिन हुआ यह-

आये थे हंसते-खेलते मयख़ाने में ‘फि़राक़’

जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए।

रामजी राय

रामजी राय। बहुत कम लिखने और बहस-मुहाबिसों में जबरदस्त हस्तक्षेप करने के साथ-साथ अपनी राजनीतिक सक्रियताओं के लिए जाने जाते हैं। समकालीन जनमत के प्रधान संपादक और जन संस्कृति मंच से जुड़ाव। उनसे  rai.ramji@gmail.com पर संभव  है।

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2 thoughts on “यादगारे ‘फ़िराक़’: रामजी राय

  1. Bhai, bahut gaharai se likha hai. Ek hi saans mein padh gaya.

  2. श्‍याम बिहारी श्‍यामल on said:

    औपन्‍यासिक आस्‍वाद देने वाला संस्‍मरण.. निराला जी के व्‍यक्तित्‍व को लेकर फिराक साहब के नजरिये की जानकारी ने सुख दिया.. कहने की जरूरत नहीं कि फिराक तो आखिर फिराक ही थे.. पाये के इंसान.. रामजी भाई को बेहतरीन अभिव्‍यक्ति के लिए बधाई .

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