शाश्वत अराजकता और विचारधारा की नग्नता: अविनाश मिश्र

आभासी पटल (सोशल साइट्स) के बाहर ‘कुंठित मन’ की ‘निर्लज्ज अभिव्यक्तियाँ’ कितनी अमानवीय होती हैं, वह जानी-पहचानी है. अविनाश के पास ‘कूटनीति’ की भाषा नहीं है, जिसका सबसे सजग इस्तेमाल आभासी लोक-वृत्त के दायरे में किया जाता है. जिस दिन उसके पास यह आ जायेगी, वह ख़त्म हो जाएगा.  यह आभासी-व्यवहार और कुछ नहीं, बल्कि हाल-चाल, दुआ-सलाम की भाषा को पाने का ही करतब है. यह भाषा आदमी को दलाल, अवसरवादी, व्यवसायी बना सकती है लेकिन रचनाकार नहीं. यह ‘सर्वधर्म-समभाव’ की सबसे उपजाऊ जमीन है. जहाँ भाषा गूगल-ट्रांसलेट हो जाती है.

अविनाश मिश्र इस समय का रचनात्मक, खतरनाक और ‘आत्मघाती’ स्फुटन है. तमाम आपत्तियों और बदनामियों के बावजूद उसे पसंद किया जाता है. वह रेयर है. तिरछीस्पेल्लिंग पर अविनाश की  ‘नए शेखर की जीवनी’ की  पहली प्रस्तुति  आप पढ़ चुके हैं, यह दूसरी प्रस्तुति है.

स्नैपशॉट- टिम्बकटू (2014)

स्नैपशॉट- टिम्बकटू (2014)

नए शेखर की जीवनी

By अविनाश मिश्र

बहुत बार वह कहानियां सुनाने लगता है बहुत बार कविताएं बहुत बार बहुत तकलीफ होती है बहुत बार वह बहुत चुप रहता है बहुत बार बहुत तस्वीर-सा लगता है बहुत सीधी बहुत सरल एक बात बहुत सीधे बहुत सरल ढंग से नहीं कह पाता बहुत बार बहुत ढंग से उलझाने लगता है

नए शेखर के जीवन में नए रहस्य हैं और यह रहस्यों का दुर्भाग्य है कि वे शेखर के जीवन में हैं।

*

भय शेखर को नहीं सताता है। भय उसमें आबाद है। भय को हत्याएं पसंद हैं। लेकिन शेखर ने भय को पालतू बना लिया है। इससे शेखर ने एक ऐसी सजगता अर्जित की है जिसमें हत्या की आशंका प्रत्येक क्षण सक्रिय रहती है। फिलहाल भय शेखर के काबू में है। शेखर उसे शाकाहारी बना रहा है।

*

बी.ए. के बाद शेखर ने एम.ए. नहीं किया। इसलिए वह उसके साथ कैसे होता जो एम.ए. के बाद होता है। बड़े राजनीतिक बदलाव हुए समाज में, लेकिन उसने खुद को खबरों से दूर रखा। घुस गया अजायबघरों में और देखता रहा जंग लगी हुईं तलवारें। पुस्तकालयों से वह वैसे ही गुजरा जैसे वेश्यालयों से— एकदम बेदाग। उसने कुछ भी जानना नहीं चाहा। उसने कुछ भी बदलना नहीं चाहा। उसने नहीं किया मतदान। नहीं बनवाया आधार-कार्ड। स्मार्ट-फोन तक नहीं खरीदा उसने। किसी आग्रह की विषय-वस्तु में वह नहीं उलझा। जब तक प्यार ने उसे नहीं छोड़ा, तब तक उसने भी प्यार को नहीं छोड़ा। यूं साथ और सफर तवील हुआ। लेकिन बहुत कुछ आखिर नहीं हुआ, जैसे बी.ए. के बाद एम.ए. नहीं हुआ।

*

अराजकता को अंतत: शाश्वत होना था और ‘विचारधारा’ को नग्न और निर्मूल्य। इस दृश्य में वहां जाना था, जहां रंगों को किसी ध्वज में इस्तेमाल न किया जा सके।

लेकिन वह वहां से आया था जहां एक पार्क में खाकी रंग की नेकर और आधी बाजू की सफेद कमीज पहनकर गोल-गोल भागते हुए उसकी देह स्वेद से भीग जाती थी।

उन दिनों खेलों में इतना दुर्निवार आकर्षण था कि उनके लिए भविष्य तक ले जाने वाली कक्षाएं तक भंग की जा सकती थीं। पुस्तकें परीक्षाओं से कुछ क्षण पूर्व खोली जाती थीं। उनके पृष्ठों के आपसी सौहार्द को बहुत मृदुलता के साथ चाकू, ब्लेड या फुटे से अलग करना होता था।

चाकू, ब्लेड या फुटा दैनिक प्रयोग की वस्तुएं थीं। रस्सी, सीढ़ी, कुदाल, फावड़ा, कुल्हाड़ी, करनी, बल्लम, बसूला… दैनिक प्रयोग की वस्तुएं थीं। नाव, नदियों का पानी, धर्मस्थलों की सीढ़ियां और मशाल दैनिक प्रयोग की वस्तुएं थीं। जहालत और मुशायरे, फतवे और वुजू, फटी हुईं टोपियां, छोटे पायजामे, काले बुर्के, मोहम्मद रफी के नगमे और तंग, अंधेरी, बदबूदार गलियां, खत और खुदा हाफिज… दैनिक प्रयोग की वस्तुएं थीं।

इस सबके समानांतर विध्वंस था जहां घृणा के नैरंतर्य में रूपक भ्रष्ट हो गए थे और आग बराबर फैलती जा रही थी। वह आग को मनुष्यता के लिए अनिवार्य समझता था, लेकिन आग ने सारा सद्भाव और उसकी सारी संभावनाएं नष्ट कर दी थीं। मंगलेश डबराल की कविता में दर्ज एक बयान के मुताबिक :

पहले भी शायद मैं थोड़ा-थोड़ा मरता था

बचपन से ही धीरे-धीरे जीता और मरता था

जीवित रहने की अंतहीन खोज ही था जीवन

जब मुझे जलाकर पूरा मार दिया गया

तब तक मुझे आग के ऐसे इस्तेमाल के बारे में पता नहीं था

मैं रंगता था कपड़े ताने-बाने रेशे

टूटी-फूटी चीजों की मरम्मत करता था

गढ़ता था लकड़ी के हिंडोले और गरबा के रंगीन डांडिये

अल्युमिनियम के तारों से बच्चों के लिए छोटी-छोटी साइकिलें बनाता

इसके बदले में मुझे मिल जाती थी एक जोड़ी चप्पल एक तहमद

अपनी गरीबी में दिन भर उसे पहनता रात को ओढ़ लेता

आधा अपनी औरत को देता हुआ

 

मेरी औरत मुझसे पहले ही जला दी गई

वह मुझे बचाने के लिए मेरे आगे खड़ी हो गई थी

और मेरे बच्चों को मारा जाना तो पता ही नहीं चला

वे इतने छोटे थे उनकी कोई चीख भी सुनाई नहीं दी

मेरे हाथों में जो हुनर था पता नहीं उसका क्या हुआ

मेरे हाथों का ही पता नहीं क्या हुआ

वे अब सिर्फ जले हुए ढांचे हैं एक जली हुई देह पर चिपके हुए

उनमें जो हरकत थी वही थी उनकी कला

और मुझे इस तरह मारा गया

जैसे एक साथ बहुत से दूसरे लोग मारे जा रहे हों

मेरे जीवित होने का कोई बड़ा मकसद नहीं था

लेकिन मुझे इस तरह मारा गया

जैसे मुझे मारना कोई बड़ा मकसद हो

…जारी विध्वंस और नरसंहारों के एक अंतराल में वह उस पार्क में है जहां खाकी रंग की नेकर और आधी बाजू की सफेद कमीज पहनकर गोल-गोल भागते हुए उसकी देह स्वेद से भीग जाती थी। शुरुआत को एक अंतराल से देखकर विकास जांचा का सकता है।

वह इस पार्क से बाहर जाना चाहता है। यहां जन्मीं सारी कल्पनाओं, यहां देखे गए सारे स्वप्नों, यहां आए सारे विचारों से बाहर जाना चाहता है। इसके सारे रंगों और सारे रूपकों से बाहर जाना चाहता है। इस पार्क में ही खड़े होकर किसी पद के लिए किसी उम्मीदवार को चुनने की बजाए वह अपनी व्यस्कता का दैनिक प्रयोग डूबते हुए केसरिया सूरज को देखने में करना चाहता है…।

‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ का कॉडर कैसा होता है, यह शेखर जानता है।

शेखर के मत के बगैर भी चुनी जाती हैं सरकारें पूर्ण बहुमत से, यह शेखर जानता है।

*

शेखर के पास बड़े वाक्य नहीं हैं। बड़े वाक्यों से दुर्घटनाएं होती हैं। छोटे मुंह से निकले बड़े वाक्यों की असावधानी पकड़ में आ जाती है। जीवन बड़े वाक्यों से नहीं चलता। कभी-कभी वह बगैर वाक्यों के भी बहुत बेहतर ढंग से चलता है और कभी-कभी केवल प्रतीकों से ही बन जाते हैं रास्ते, जिन पर बगैर हांफे भर उम्र दौड़ता रहता है जीवन…।

‘‘शेखर जून की गर्मी में प्यासा भटक रहा है।’’

‘‘वह घर जाकर पानी पीना चाहता है।’’

‘‘बाद इसके पंखे की हवा में सुखाना चाहता है पसीना।’’

जीवन में ऐसे ही छोटे वाक्यों से राहत मिलती है। जैसे :

—‘‘मुझे पांच हजार रुपए की जरूरत है।’’

—‘‘मेरे पास नहीं हैं भाई।’’

—:-(

—‘‘लेकिन मैं कुछ इंतजाम करता हूं।’’

इस सच्चाई को ऐसे कहने से क्या फायदा :

‘‘जून की एक तपती दुपहरी में जब महानगर अपनी बैचेनियों से चिपचिपा रहा है और इस प्रतीक्षा में है कि धूप का रंग दिन पर से उतर जाए और सांझ कुछ अपने विवेक से काम ले वह उस घर में पहुंचकर जहां वह वर्षों से एकांतवास करता आ रहा है सुराही से उस पानी को पीना चाहता है जो वह सुबह भरकर गया था और जो अब तक इस तपिश में सूखने से बचा रहा आया वह पानी पीने के बाद और पंखा खोलने और उसकी हवा में अपना पसीना सुखाने से पहले समाचार सुनना चाहता है लेकिन अचानक उसे इलहाम होता है कि वह समाचार सुनते हुए भी पसीना सुखा सकता है और यह भी इलहाम ही है कि इतनी गर्मी में समाचार से सुनने से क्या होगा काश इस पंखे में तीन की जगह चार पर होते या चार हजार तो वह सारा पसीना अब तक सूख गया होता जिससे जल्द ही कोई निजात नहीं…’’

बड़े वाक्यों से केवल निराशा मिलती है। जैसे :

—‘‘मुझे बहुत जरूरत है भाई अगर आप मुझे पांच हजार रुपए उधार दे दें जो कि मुझे जैसे ही कहीं और से उधार मिलता है मैं बगैर देर किए आपको लौटा दूंगा क्योंकि मैं सदा आपका अभिन्न और विश्वसनीय बना रहना चाहता हूं ताकि जब भी मुझे कोई उलझन आ पड़े जो पांच हजार रुपए से ही सुलझेगी तो आप मुझे उधार दे सकें…’’

—”देखिए मैं आपको मना नहीं करता और दे देता आप मेरे बहुत अभिन्न और विश्वसनीय हैं लेकिन इस वक्त तो इतनी गर्मी पड़ रही है आप देख ही रहे हैं कि सारा व्यापार चौपट है क्या आप समाचार नहीं सुनते…’’

शेखर समाचार नहीं सुनता। शेखर के पास समाचार नहीं हैं। जीवन समाचारों से नहीं चलता। समाचारों से केवल दुर्घटनाएं चलती हैं। जीवन छोटे-छोटे वाक्यों से चलता है। जैसे :

‘‘शांत हो जाइए।’’

‘‘कहीं कुछ नहीं हुआ है।’’

‘‘यह एक अफवाह है।’’

‘‘यह शेखर ने फैलाई है।’’

शेखर पागल थोड़ा नहीं है, अर्थात् बहुत है।

*

संप्रभुओं के जघन्य अपराधों से भरे हुए ये वे क्षण हैं, जब भाषाएं संक्रमित हो रही हैं और क्षेत्रीयता क्षेत्र के बाहर भी इस कदर उपलब्ध है कि उसे देखकर उबकाई आती है। बोलियां रफ्ता-रफ्ता नष्ट हो रही हैं या अधिग्रहित, उन्हें बोलने वाले उन्हें बचा नहीं पा रहे हैं। ‘बचाना’ अतीत की एक क्रिया है और अतीत आराम चाहता है।

शेखर अब जो भी बोलता उसे उसका मूल्य चुकाना पड़ता है।

*

शेखर समाज को देखता है, उसे बदलता नहीं।

जो समाज को बदल रहे हैं, वे देख नहीं रहे हैं समाज को।

*

बहुत कम वक्त में शेखर ने बहुत महत्वपूर्ण कार्य किए। इनमें दो बार आत्महत्या की कोशिशों को भी गिना जाए। ये कोशिशें अगर कामयाब होतीं तो वक्त कुछ इस तरह का था कि इस कामयाबी का औचित्य सिद्ध किया जा सकता था।

प्रतिभावानों की नहीं, आज्ञाकारियों की जरूरत थी। इस दृश्य में वह इस कदर चुपचाप इस वक्त से गुजर जाना चाहता था कि किसी को कोई तकलीफ न हो। वह अधिक जानता था और अधिक जानकारी के लिए उसने कहीं संपर्क नहीं किया।

सारे रास्ते अगर योग्यताओं को ही मिल जाते तो मूर्खताएं कहां जातीं?

*

शेखर अकेलेपन के बारे में जो जानता है, वह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है वह जो वह सामूहिकता के बारे में जानता है। जो सीढ़ियां वह वर्षों से चढ़ता-उतरता आया, उनके बारे में बताने को कुछ भी नहीं है उसके पास। वे सारे रास्ते काबिले-जिक्र हैं जो उससे छूट गए।

अधूरे बिंब ही फैले हुए हैं जीवन के गद्य में… कैसी सुंदर आयु होती अगर शब्दों की जरूरत न होती।

***

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3 thoughts on “शाश्वत अराजकता और विचारधारा की नग्नता: अविनाश मिश्र

  1. यह गद्य एक दिन सम्पूर्णता में खिलेगा। एक जिल्द में पढ़ने को मिलेगा। हम सब इस जीवन को जी रहे होते हैं, जीवनी कोई कोई लिख पाता है।

  2. बेहद ही सधे और संतुलित शब्दों में एक पूर्ण-अपूर्ण जीवन की कीमियागिरी।

    शेखर सिर्फ अविनाश का आत्म नहीं है, मतलब तमाम अविनाशों का है।

    साधुवाद!

  3. बड़े वाक्यों से केवल निराशा मिलती है . इस छोटे-से वाक्य में एक बड़ी उम्मीद की सुगबुगाहट है .

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