पंचांग और समोसा: आरती अग्रवाल

यह स्तम्भ  (घुसपैठिये)दिल्ली और आसपास की कामगार बस्तियों के तरुण-युवा लेखकों की प्रतिनिधि रचनाएं आप तक पहुंचाएगा. ये लेखक और इनका लेखन बने-बनाए खांचों में नहीं समाते. ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के लेखक अभी-अभी जवान हुए हैं या हो रहे हैं. एकाध को छोड़कर इसके सभी संभावित लेखकों की उम्र २0 वर्ष के अंदर ही है। लेकिन इन सब में कुछ सामान्य विशेषताएँ भी हैं. सभी की आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि लगभग समान हैं। इससे भी बड़ी विशेषता यह है कि इनके लिए बचपन की किताबें कागजों से उतनी नहीं बनती हैं जितनी उनके संघर्ष, मोहल्लों, माहौल और जगह से बनती हैं. उनकी लिखाई में वे जगहें आपको सुरक्षित मिलेंगी। आप शायद महसूस करें कि साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकाॅर्डिंग और सृजन, कि़स्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं साहित्य के सुरक्षित-आरक्षित डिब्बे में घुस आये इन घुसपैठियों को आप कैसे बरतेंगे, यह आप ही को तय करना है.

इस बार की घुसपैठिया हैं आरती अग्रवाल.

फोटो - शिवा नगरी

फोटो – शिवा नगरी

पंचांग और समोसा

By आरती अग्रवाल

 पंचांग

मोटी-मोटी चमकती आंखें स्थिर-सी हो पंचांग पर थम सी गई थीं। एक-एक पेज पलटते हुए वे गौर से काफी देर तक बारिकी से देखते जा रहे थे। पंचांग का हर पन्ना दूर से ही अपनी चिकनाहट का अहसास करवा रहा था। आलथी-पालथी मार  बारीक अक्षरो में लिखे उस पंचाग को अपनी गोद में करीने से रखकर वे बड़ी बेचैनी से पन्नों को पलटते हुए कुछ खोज रहे थे। बल्ब की झिलमिलाती-सी रौशनी में उनकी आंखे और छोटी हो गई थीं बल्कि बंद होने का अहसास करा रही थीं। तभी, पेजों को पलटती उनकी उंगली एक पेज पर थम सी गई। नज़रें उठाकर सामने सोफे पर बैठे शक्स की ओर देखते हुए बोले- “हाँ तो अनिल बाबू, पांच  जनवरी सोमवार का दिन आपके लिए बेहद शुभ रहेगा।”

“क्या?”

“पांच जनवरी, सोमवार आपके लिए शुभकारी रहेगा क्योंकि उस दिन पूर्णमासी भी है।” कहते हुए उनकी आंखें और बड़ी हो गईं। “जी-जी, तो पांच जनवरी को गेट लगवा दूं न!” काले जैकेट में लिपटे अनिल बाबू गर्दन को उठा,  हां में सिर हिलाते हुए बोले। पंडित जी ने सर हिलाया ही था कि उनकी नज़रें फिर से उसी पीले पन्ने पर अटक गईं, काफी गौर से देखते हुए बोले- “रुकिए, पांच जनवरी तो फस्कलास है अनिल बाबू, पर एक बात का ध्यान रखना होगा, काम थोड़ा संभल कर करना होगा।” अनिल बाबू कुछ खामोश हो गए। वे हैरत के साथ पंडित जी के चेहरे को ताकने लगे जिसमें असंतोष की छाया जरा भी न थी। “देखिए, बात बड़ी नहीं है बस काम बारह बजे से चार बजे के बीच करवाना होगा वरना उसके बाद संकट भारी है।” सुनते ही अनिल बाबू के कान चैकन्ने हो गए। वह अपने हाथ को हाथ में बांधते हुए बगल में बैठी पत्नी को हिलाते हुए बोले, “यार ठीक तो है, चार घण्टे में तो हो जाएगा।” “हां-हां क्यों नहीं।” दोनों ने पंडित जी की ओर देखते हुए कहा। पर पंडित जी खामोश हो मन ही मन कुछ बुदबुदाते हुए फिर उस पौथी में झांकने लगे। पेज़ पर ऊँगली लहराते हुए फिर बोले- “देखिए अपन के लिए दिन बढि़या निकला है, टेंशन की कोई बात नहीं है, बाकी सब कुछ भगवान के भरोसे छोड़ दीजिए, सब कुछ शुभ है।” “जी बिल्कुल, आपके रहते हमें किस बात की चिंता है मालिक, बस आपका सहारा बना रहे।” हां में हां मिलाते हुए अनिल बाबू बोले। “अरे अनिल बाबू, हमारा कहां?” उन्होंने हंसते हुए कहा और फिर अपने आसन के बगल में बने छोटे कमरे की ओर झांकने लगे, जो घण्टों से खामोश था लेकिन कानों में पड़ती चूडि़यों की खनखनाहट किसी महिला के अंदर होने का पैगाम दे रही थी, पंडित जी अपनी बढ़ी काली दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बोले- “हां सुनिए, जरा तीन कप चाय बना दीजिए, अनिल बाबू भी थक गए होंगे, क्यों अनिल बाबू?”

सुशील बाबू की मोटी आंखें पूरे मैदान में गश्त लगाती हुई फिर से पंडित जी के उस चेहरे पर आ टिकी जिन्होंने अपनी पोथी को साईड में रख आंखों को मसला ही था। शॉल में लिपटी धीमे-धीमे कदमों से आगे बढ़ती एक अधेड़ उम्र की महिला की आवाज़ ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया- “राम राम महाराज जी, सुबह से कहां गए थे, अब तक चार चक्कर लगा चूकी हूँ,  सोचा आखिरी बार देख ही आती हूँ, बड़े दिनों से आपके दर्शन नहीं हुए था न!” एक ही सांस में कंपकपी-सी आवाज़ में कहते हुए वह आगे बढ़ी ही थी कि पंडित जी ने सोफे की ओर उन्हें बैठने का इशारा करते हुए कहा- “राम राम जी, आईए, अच्छा हुआ आप आ गईं, हम सुबह से पूजा में गए हुए थे, तो वहां देर हो गई।”

सिकुड़कर बैठ चूकी वह अधेड़ महिला तपाक से बोल पड़ी- “महाराज एक  मुश्किल है, मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि समाधान कैसे निकालूं, तो सोचा आपसे राय ले लूँ।” “जी-जी, बिल्कुल कहिए क्या बात है? अगर हल निकला तो जरुर निकालेंगे।” कहते हुए पंडित जी अपने उस आसन पर जंच कर बैठ गए जिस पर करीने से बिछी पीली चादर पंडित जी के दुपट्टे से मैच खा रही थी जो गर्दन में झुलता हुआ कुर्ते पर लहरा रहा था। उन्होंने आंखें मिंची मानो किसी का स्मरण कर रहे हों। आंख मींचने के बाद उन पर अपनी बड़ी-बड़ी हथेलियों को फेरते हुए एक लंबा-सा सांस खींचकर बोले- “हाँ जी, बोलिए क्या बात है? “महाराज मैं देख रही हूँ कि घर में बहुत सारे भगवान् क्या बिठाएं हैं कि मेरे घर का सर्वनाश होने लगा है, मैं तो कुछ समझ नहीं पा रही हूँ।”

वह इतना ही कह पायी थी कि अंदर से निकलती एक पतली-लम्बी महिला पर सभी की नज़रें जम गईं। गोरा रंग, लंबा-चौड़ा शरीर जिस पर जंचती हरी साड़ी लाईट में चमक रही थी, बड़ी-बड़ी आंखें, लंबा-सा चेहरा और मुस्कुराहट के साथ दो हिस्सों में बटते गाल, जिन पर सभी को देख एक मुस्कुराहट खिल आई थी। पंडिताइन सभी को चाय पकड़ाती हुई धीरे से बोली- “अभी आती हूँ, अंदर सब्जी बन रही है।” कहकर वह अंदर कमरे में चली गई और सभी गरमा-गरम चाय की चुस्की लेते हुए पंडित जी के चेहरे को ताकने लगे जो पल-पल न जाने किस दुनिया में डूब जाता था और फिर वापस अपनी अवस्था में आने के बाद माहौल में एक गर्माहट पैदा कर देता था।

“हां, तो रही बात भगवान जी की! देखिए, जो भगवान् होते हैं वे सब एक हैं कोई अच्छा या बुरा नहीं है, वो तो हम मनुष्य की सोच ऐसी बन गई है कि हमने भगवानों को भी बांट दिया है। आप मानती हो सांई बाबा को, अनिल बाबू मानते हैं लक्ष्मी माता को और बच्चे मानें शिवजी को। सबकी अपनी-अपनी मंशा है। लेकिन हम किसी को गलत नही कह सकते क्यों अनिल बाबू!” इन्हीं शब्दों को वे अब तक दस बार कह चुके थे और यह उनकी एक खास आदत बन चुकी थी कि सामने बैठे किसी भी इंसान को अपनी बातों में शामिल कर लेते। कभी लफ्जों से जी-जी कहकर तो कभी गर्दन को हिला बात को आगे बढ़ाने का इशारा देना अनिल बाबू की आदत का हिस्सा बन गया था। गर्दन झुकी पर नजरें उठीं और पंडित जी बोले- “देखिए होता क्या है कि घर में कम ही भगवान् रखें तो ज्यादा अच्छा है, भगवान् भी शैतान का रुप ले लेते हैं। अगर हमारी मानें तो यही सलाह है कि आप सारे भगवान् को हटा दीजिए बस एक-दो रखिये, जो आपकी मंशा के अनुसार हों।” “मतलब कैसे हटाउं महाराज?” बात पूरी होने से पहले ही वह झट से बोल पड़ी। “कैसे क्या, आप उन्हें आराम से उठाइए, नहलाइए और किसी पीपल के पेड़ के नीचे ठण्डा कर दीजिए।”

बात से बात का सिरा निकालते जाना पंडित जी की कला है। चाय की चुस्की भरते हुए पंडित जी बोले- “एक बात सोचिए, इंसान कहता है कि भगवान् कहां है? मैं एक छोटी-सी बात पूछता हूँ आप बताइए, अगर कोई मुझसे पूछता है कि मनोज कौन है? तो मैं अपने सीने पर हाथ धर कर कहता हूँ कि मैं मनोज हूँ। पर सोचिए, अगर वह कहे यह मनोज तो नहीं है बल्कि मनोज का सीना है; फिर मैं सिर पर हाथ धर कर कहता हूँ कि ये रहा मनोज़! पर वह भी मनोज कहाँ से हुआ वह तो मनोज़ का सिर है। अब मैं अपने जितने भी अंगों से मनोज़ को बता रहा हूँ वह मनोज़ नहीं बल्कि मनोज के अंग हैं, तो फिर पूरा इंसान कहां हैं? बस उसके अंग ही तो हैं लेकिन वह खुद कहां हैं?”

खामोशी छा गई, सभी आश्चर्य भरी नज़रों से पंडित जी के चेहरे को देखने लगे। वे वास्तव में इंसान की खोज करते मालूम पड़ रहे थे। एक अजीब-सा जुनून उनके भीतर उतर आया था। अनिल बाबू, उनकी पत्नी और वह महिला भौचक-से इस सवाल का जवाब जानने को बेचैन हो उठे थे। बदन को सहलाती सर्द हवा का भी किसी पर कोई असर नहीं था। ठण्डी होती अपनी चाय का भी ख्याल नहीं रहा किसी को और वह महिला अपने सिर उतरते शॉल से भी वेपरवाह चूकी हो थी। आज अभी इसी वक्त सब अपने-अपने रुप को खोज़ लेंगे, ऐसा लग रहा था।

“देखिए, मनुष्य कहता है भगवान् कहां हैं? भूमि, जल, पवन, अग्नि, मिट्टी इनमें से किस में? ये चीजें तो भगवान के शरीर के अंग हैं, भगवान् नहीं। अब आप देखिए, वो देख रहे हैं न!” उबड़-खाबड़ बने फर्श की ओर इशारा करते हुए पंडित जी ने कहा और सभी की नज़रे फर्श पर झूलती उस छवि पर जा टिकी जो दरअसल पंडित जी के हाथ में लहराती मखमली शॉल की परछाई थी, जिसे दिखाते हुए बोले- “ये हैं भगवान जो हर पल, हर घड़ी सिर्फ अपन मनुष्य के ही साथ नहीं, दुनिया की हर छोटी-बड़ी चीज़ यानी एक सूई के साथ भी रहते हैं। बस फर्क इतना है कि अपन अपने भगवान् को नहीं समझ पाते जबकि वे पल-पल हमारे साथ रहते हैं। दरअसल बात यही थी कि मनुष्य को किसी भी वहम में पढ़ना ही नहीं चाहिए। भगवान् को बंधनों में भी मत बांधो। बहनजी, हुआ यह है कि आपको वहम लग गया है। क्यों बहन जी? मैं गलत कह रहा हूँ तो बोलिए कि हां, पंडित जी आप गलत कह रहें हैं!” “नहीं-नहीं महाराज, यह तो सच है।” महिला अब जाकर अपने जवाबों को खोज पाई थी। “समझ गई महाराज़, अब अगर सण्डे को सारे भगवान् हटा दूं तो ठीक रहेगा न?” फिर से अपनी उलझन को बयान करते हुए उसने पूछा। “जी बिल्कुल, जरा सण्डे को छोड़कर बुधवार को कीजिए तो बढ़िया है।” “ठीक है महाराज, ओम नमः शिवाय।” पंडित जी के पैर छूती हुई वह महिला आगे बढ़ गई। “अरे-अरे ये क्या कर रही हैं, ओम नमः शिवाय” कहते हुए पंडित जी ने पैर नीचे लटका लिए और फिर कुछ पल खामोश हो गए।

जेब से हाथों को निकालते हुए अनिल बाबू ने कहा- “चलते हैं महाराज, नौ बज गए; बच्चे घर पर भूखे होगें, हम तो सुबह से ही निकले हैं।” इतने में पंडिताइन नीली साड़ी को संभालती हुई बाहर निकली और अनिल बाबू की पत्नी की ओर देखते हुए बोली- “और जी बढ़िया, सब ठीक है न?” “हां बस दुआ है आपकी।” वह पंडतानी जी के बगल में खड़ी हो, धीमे से मुस्कुराते हुए बोली- “और खाना-पीना बन गया?” “हां….” लंबी-सी हां भरते हुए पंडिताइन ने कहा- “आइए आप भी खा लीजिए।” “अरे नहीं..” बात को टालते हुए अनिल बाबू बोले- “घर पर बच्चे भूखे हैं, उन्हें भी देखना है ,चलो चलतें हैं। पंडित जी, फिर परसो दोबारा आयेंगे।” पंडित जी भी उनके साथ-साथ गेट तक छोड़ने चल पड़े।

समोसा

पंडिताइन अपने काम में व्यस्त हो चुकी थी। सारे बर्तनों को समेटती हुई साइड में रख ही रही थी कि धीमी-धीमी चाल आते हुए पंडित जी ने कहा- “यार, खाना डाल दो भूख लग रही है।” फटाफट हाथ धोकर वे अंदर कमरे में बिछी चादर पर पालथी मार टिक गए। पंडिताइन भी किचन में दाखिल हो फ्रिज़ से आटा निकाल गरमा-गरम रोटियां पकाने लगी। हर एक पकती रोटी के साथ उसमें घी लगाती और मोड़कर पंडित जी की थाली में रख देती। पंडित जी भी गरमा-गरम रोटी का मजा लेते हुए साइड में रखे आलू की ओर देखते हुए बोले- “अरे आज अभी तक आलू नहीं रखे क्या?” “कहां यार तुम देख नहीं रहे, सुबह से तो काम में ही लगी हूं, खिसियानी-सी आवाज में पंडिताइन ने कहा। जिनकी आंखें पंडित जी को घूर-घूर कर देखने लगी थी पर इनका गुस्सा तो कुछ पल में ही ठण्डा पड़ जाया करता है इसलिए आज भी ठण्डा हो गया।

पंडित जी को फटाफट रोटी खिला पंडिताइन ने टोकरे से आलू को निकाल रगड़-रगड़ कर धो डाली। फिर उसे बड़े से पतीले में डालकर गैस पर चढ़ा दिए और हीटर के पास बैठ पालक, धनिया, हरी मिर्च तथा टमाटर ले काटने-चुनने बैठ गई। आलू के उबलते ही पंडित जी उसे छिलने बैठ गए। सारे सामान के कटते ही पंडिताइन ने चटनी भी तैयार कर डाली। पंडित जी मस्ती-मस्ती में आलू छिल चुके थे। उन्होंने सारे कटे सामान, मसाले और छिले आलू को एक बर्तन में मसल कर चोखा भी तैयार कर लिया। पंडिताइन द्वारा गुंथे हुए मैदे के साथ काम का सिलसिला शुरु हो गया। पंडिताइन जहां एक तरफ समोसे भरने में मस्त थी वहीं दूसरी ओर पंडित जी अपनी धून में खोए करारे समोसे तलते जा रहे थे। यूँही मस्ती ही मस्ती में समोसे बनकर तैयार हो गए कि अहसास भी नहीं हुआ।

बड़े से थैले में समोसे, चटनी और सब्जी अपनी स्कूटी पर टांग वे सुबह-सुबह सफदरजंग अस्पताल,  ट्रॉमा सेंटर व एम्स अस्पताल की ओर चल पड़े थे, जहां के लोगों को हमेशा ही उनके पांच रुपये के एक समोसे की तलब रहती है।

पंडित जी की रेहड़ी के लगने में आज भी देर हो गयी थी। पानी की रेहड़ी से भागे आ रहे गुप्ता जी समोसे की ओर इशारा करते हुए बोले- ‘‘आज तो लेट हो गए महाराज़!’’  “हां, रास्ते में जाम लगा था।” दोने में चार गरमा-गरम समोसे पर सब्जी, चटनी डाल गुप्ता जी की ओर बढ़ा दिए। दोने को हाथ में लेते हुए गुप्ता जी बोले- ‘‘मै तो बहुत परेशान हो गया हूँ, पता नहीं मेरे रोजगार को क्या हो गया है, बिल्कुल मंदा पड़ गया है।’’ अब तक आस-पास के और दुकानदार भी आ खड़े हुए थे। उन्हें दो-दो समोसे देते हुए गुप्ता जी की ओर देखकर पंडित जी बोले, ‘‘देखिए गुप्ता जी रोजगार नहीं चल रहा इसका मतलब यह कतई नहीं है कि किसी ने आपको बांध दिया है, ऐसा मत सोचिए, यह वहम है और कुछ नहीं, हमारी बात को समझ रहे हैं न! आप चिंता मत कीजिए बस अपने काम को मेहनत से कीजिए अवश्य चलेगा।’’ पंडित जी की निगाहें अब दूसरे ग्राहक की ओर चली गई।

पंडित जी को इस बात का पूरा एहसास था कि अपने भविष्य को जानने वालों की भीड़ उन्हें घर पर भी काफी घंटों तक घेरती है। रोजाना ही अपने संकटों से घिरे और उनका हल निकलवाने के लिए लोग दौड़े चले आते हैं। उनका आना तो जैसे हर दिन का रूटीन बन गया है। वे आराम से आते, बंद पंचांग को खुलवाकर कुछ नया ही पूछने के लिए बैठ जाते हैं और बिना कुछ दिये ही सलाम करके चले जाते हैं। पंडित जी पंचांग को अपने बगल में रख अपनी उसी दुनिया में उतर जाते जो उनका रोजगार बन गया है।

बदलते शहर ने उनका काम भी बदल दिया था। वे इस बात को अच्छी तरह समझ चुके थे कि शहर से अब पंडिताई गायब होती जा रही है। पूछने वालों की तादात तो अब भी है, लेकिन सिर्फ जान-पहचान वालों की, जिनके दुखों का हल निकालना उनका काम नहीं बल्कि फर्ज बनकर रह गया है। जिन लोगों को शुभ दिनों की फ़ेहरिस्त बांटते है वे तो  अपने दिनो को बदलते जा रहे हैं। लेकिन पंडित जी का दिन कब शुभ होगा, यह शायद उनको भी मालूम नहीं था।

पंडिताई उनके घर चलाने का जरिया नहीं बल्कि लोगों की कहानियाँ सुनने का जरिया बनकर रह गया था। वे अपने बदले हुये काम के दरमियान रह कर भी खुद को खोना नहीं चाहते थे तो कहानियाँ सुनने का दौर वहाँ भी चल पड़ा।

कुछ देर के लिए वे अपने में ही कहीं खो गए थे। इतने में एक पतली-सी आवाज ने उन्हें वापस समोसो के बीच ला पटक दिया। एक छोटी-सी, करीब सात-आठ साल की बच्ची को रेहड़ी के करीब देखते हुए वह उठ खड़े हुए और बोले, ‘‘हां मोड़ी क्या चाहिए?’’ इतना कहा ही था कि उस लड़की ने कुछ न बोलते हुए तीन रुपये बढ़ा दिए और  समोसे की ओर इशारा किया। यह लड़की यहीं रहती है। यहाँ अकेली कैसे आई इसका किसी को कुछ नहीं मालूम। कई लोग यहाँ इलाज कराने आए और कुछ न कुछ अपना छोड़ कर चले गए। पैसे देख पंडित जी कुछ नहीं बोल पाए, बस दो समोसे उसकी ओर बढ़ा दिए, ‘‘ले मोड़ी, साइड में बैठकर खा ले।’’

वे धम्म से स्टूल पर बैठ गए। नजरें अब भी उसी बच्ची पर थीं जो समोसे खाने में मस्त थी। गोल-मटोल सा चेहरा, कसकर बंधी दो चोटियाँ और छोटी-छोटी आंखें, जिनमें जरा भी डर नहीं था। काफी देर तक लड़की को देख लेने के बाद वह बोल ही पड़े, ‘‘गुप्ता जी, कुछ मां-बाप भी पता नहीं कैसे होते हैं जो बच्चों को अकेला छोड़ देते हैं। मालूम नहीं किसकी मोड़ी है?”  तभी पीछे से आती आवाज़ ने अचानक पंडित जी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। गुप्ता जी और साथ में खड़े लोगों की नज़रें भी उसी आदमी पर जा टिकी जो पंडित जी की ओर आता हुआ बोला- ‘‘सही कहता हूं इस दुनिया में भलाई का तो जमाना ही नहीं रहा। यहां तक कि लोग तो लोग साला भगवान् भी मतलबी हो गया है।’’  “क्या भाई साहब, होश में तो हैं, जानते हो क्या कह रहे हो।” वह आदमी आगे कुछ कहता कि गुप्ता जी तपाक से बोल पड़े। आदमी का गुस्सा रुका नहीं था, “हां भगवान के लिए।” उसकी आंखें अचानक लाल हो गई थीं, बाल छोटे होने के बावजूद भी माथे पर बिखरे हुए थे और अंधेरे के बावजूद भी पसीना बूंद-बूंद बनकर माथे से चमक रहा था। पंडित जी धैर्य से बोले, ‘‘अरे बैठिए तो भाई साहब, इतना गुस्सा किसलिए?’’ पंडित जी ने इतना ही कहा था कि वह फिर बोल पड़ा, ‘‘अरे क्या दिया है इस भगवान् ने मुझे? मैंने तो इसके लिए सब कुछ किया पर इसने मेरे लिए क्या किया?’’ कहकर ही कहीं वह शांत हुआ था पर अब पंडित जी चालू हो गए थे। ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके अंतरंग का तार छेड़ दिया हो। वह बोले, ‘‘एक बात समझ में नहीं आती कि लोग हर बात का कसूर घूमा-फिरा कर किसी और को ही क्यूं देते हैं, हम जो करते हैं, वह असल में अपने लिए करते हैं, लेकिन जब हम अपने किए को खुद नहीं समझ पाते हैं तो किसी ऐसे दोषी को तलाशते हैं जो कुछ बोलता ही न हो। अरे माना तुमने भगवान के लिए सब कुछ किया पर क्या भगवान से पूछकर किया था।”

पंडित जी ने इतना कहा ही था कि निगाहें समोसे का इंतजार कर रहे उन ग्राहको पर टिक गईं  जो हर दिन के ग्राहाक हैं। पडित जी ने बिना पूछे उन ग्राहकों को समोसे पैक कर अलग-अलग थमा दिए थे। पर हैरानी कि वे आज गए नहीं वहीं जमे थे और जमते भी क्यूं नहीं, आखिर हर दिन माहौल को बनाने वाले पंडित जी की राय आज उफान पर थी। जेब में पैसो को डालते हुए वे फिर अपने उसी रुप में उतर आए। ‘‘ एक बात सोचिए कि हम हमेशा मांगते ही क्यों रहते हैं? क्या हमने कभी सोचा है कि हम जिससे मांग रहे है वह हमारा कौन है? भई, जिससे हम मांग रहे हैं वह हमारा लगता क्या है और हम उसके क्या लगते हैं?”

सभी को इतना तो मालूम था कि अक्सर सवाल पैदा करने वाले पंडित जी आज़ फिर कुछ नया ही उगल देगें और जिसे सुनने की आशा में हर रोज़ की तरह सबके कान चौकन्ने हो गए थे। यहां-वहां फिरती पंडित जी की निगाहें भी वापस उन चेहरों पर आ टिकी थीं जिन्हें बस उनके ही बोलने का इंतजार था। एक लम्बी-सी सांस छोड़ते हुए बोले- “अगर यही सवाल आपसे पूछें तो सिर्फ आप लोग ही नहीं पूरा संसार यही कहेगा कि वे हमारे मां-बाप है और हम उनके बच्चे हैं। फिर तो सभी उसके बच्चे हुए, वह कितनों की मनोकामना पूरी करेगा? इसलिए बढि़या यही है कि भगवान से कहो- ‘हे भगवान, जो है बस तू ही तू है,  मैं कुछ भी नही हूं।’ तब वह तुम्हारी सुनेगा वरना तो सारा संसार एक ही बात कहता है कि वह किस-किस की सुनेगा?” कहते हुए पंडित जी के चेहरे पर चुप्पी छा गई। यहां तक की माहौल में शरीक आस-पास के दुकानदार ही नहीं बल्कि अस्पतालों के बाहर रुकने वाले लोग भी खामोश हो गए थे। शायद इसलिए कि इससे पहले किसी ने भी ऐसे सोचा ही नहीं था जैसा उनकी कानों ने अब सुन लिया था।

कानों ने इन अल्फाजों को अभी हज़म भी नहीं किया था कि उससे पहले कानों में पड़ती एक नई गूंज ने सारा ध्यान ही भटका दिया था- ‘‘राम-राम महाराज जी, आज हमारा एक छोटा-सा काम कर दो।’’ इस आवाज़ ने सभी की नजरों में खुद को केंद्र बना डाला। पंडित जी भी पलटकर उस ओर देखने लगे- वह नौजवान लड़का, जिसे महीने पहले सभी आइस्क्रीम वाले के नाम से जाना करते थे। अचानक गायब होने के बाद उसका आज एकदम से आना सभी को चौंका गया था। करीब आते ही उसकी जुबान से फिर वही अल्फाज़ निकले- ‘‘पंडित जी एक छोटा-सा काम कर दो।’’ सब हाल-चाल पूछते कि इससे पहले ही उसने फटाक से हाथ को आगे बढ़ाते हुए कहा-‘‘पंडित जी मेरा रिश्ता तय हुआ है जरा देखकर बताओ कि शादी का बंधन कैसा रहेगा?”  यह सुनकर पल भर के लिए तो सभी हंस पड़े पर पंडित जी के दारा अचानक उसका हाथ पकड़ते ही सबकी बेचैनी बढ़ गई। वे मुस्कुराते हुए बोले– ‘‘मोड़ा देख, तेरे लिए शादी तो बढि़या है क्योंकि तुम्हारी किस्मत की रेखा तेरी बीवी के हाथों में ही है।” पल भर के लिए चुप हो गए और झुककर काफी गौर से हाथ को देखते हुए बोले- ‘‘ भाई जिस दिन तेरी शादी होगी उस दिन जबरदस्त मौसम होगा, काली आंधी, जानता है न!’’ वे फिर से खामोश हो गए, लड़का तो लड़का भीड़ में मौजूद लोग भी पलभर के लिए घबरा गए पर तभी पीछे से आती आवाज़ ने सभी का ध्यान भटका दिया-‘‘काली आंधी!” बगल से आती यह आवाज उस बुढ़िया की थी, जिसे यहाँ पर सभी काकी कहकर बुलाते हैं। वह हर रोज गहराते अंधेरे में चली आती है और जल्दबाजी मचाती हुई समोसे ले निकल पड़ती है। पर आज, काकी रेहड़ी के आस-पास लगी भीड़ को चीरती हुई अपनी लाठी के सहारे आगे बढ़ पंडित जी के स्टूल पर आ बैठी। अब सबकी नज़रें फिर से पंडित जी पर थम गई थी। वे फिर स्टार्ट हो गए- “बता भई, तेरी बीबी का नाम क्या है?”  लड़का फटाक से बोला- “रानी।” “क्या?” सुनते ही मानो पंडित जी के होश उड़ गए- “मोड़ा देख तुम्हारी तो बिल्कुल नहीं बनने वाली, क्योंकि मोड़ी का नाम है रानी और तुम्हारा राजा। तुम्हारी राशि हुई म और उसकी य यानी बिल्ली और चूहा, जिनकी कभी नहीं बनती। पर चिंता मत कर, सब भगवान के भरोसे है।” इतना कहते ही माहौल में बिल्कुल सन्नाटा छा गया। माहौल इतना गंभीर हो गया था कि काकी भी हैरान हो गई थी। वह भी चुप हो अपनी राह चलने को हुयी ही थी कि पंडित जी जोर से हँसे, सभी उनको देखकर चौंक गए। फिर पंडित जी बोले, “अरे यार, पंडित मजाक नहीं कर सकते क्या?”

वक्त काफी हो चुका था। अंधेरा गहराने लगा था। रात के 10 बज चुके थे। सभी दुआ-सलाम कर अपनी-अपनी दुकानों की ओर बढ़ रहे थे। पंडित जी के सभी समोसे रोजाना की तरह बिक चुके थे।

 

aarti-yuth

आरती अग्रवाल। जन्म: 1999, दिल्ली। ग्यारवी कक्षा में पढ़ती हैं और दक्षिणपुरी दिल्ली में रहती हैं। अंकुरके साथ 2005 से जुड़ी हैं। ‘फर्स्टसिटी’ और ‘अकार’ के साथ-साथ वेब पोर्टल ‘यूथ की आवाज़’ में रचनाएँ प्रकाशित. पता: जे- 455, दक्षिणपुरी, डॉ. अम्बेडकर नगर सेक्टर- 5, नई दिल्ली- 110062.

साभार: हंस, मई, 2015

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