केजरीवाल की टोपी या किसान का साफा: चंदन श्रीवास्तव

By चंदन श्रीवास्तव 

अब से पहले इतना जिम्मेदार कहां था सवा अरब लोगों का यह लोकतंत्र? बीस सालों में तीन लाख तीस हजार किसानों के आत्महत्या कर लेने के बाद फिर से एक किसान ने आत्महत्या की है। गजेन्द्र की मौत आत्महत्या के आंकड़े में एक अंक का इजाफा भर होकर रह सकती थी। लेकिन नहीं, गजेन्द्र की आत्महत्या अनंत की और बढ़ती एक संख्या भर होकर नहीं रह सकी। उसकी आत्महत्या से एकाएक सबका जमीर जाग गया है!  सब अपनी भूमिका पूरी जिम्मेदारी से निभा रहे हैं।

By Katrina Miller

By Katrina Miller

विपक्ष जानता है कि सदन में अब सिर्फ सत्तापक्ष शेष बचा है। तो भी, सदन में इस बचे-खुचे विपक्ष को अपनी जिम्मेदारी याद आई। उसने समवेत स्वर में कहा- प्रश्नकाल स्थगित हो, किसान की आत्महत्या पर तुरंत चर्चा करवायी जाय। लेकिन अध्यक्ष का आसन नहीं डोला। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद के अध्यक्ष ने भी संसदीय कार्यवाही की गरिमा निभायी। उसे लगा लोकतंत्र तो क्रियाविधि से चलता है, लोकतंत्र में प्रक्रियाओं का बड़ा ही महत्व है। सो, उसने प्रक्रियाओं के महत्व की रक्षा की, अपनी जिम्मेवारी निभायी।

प्रश्नकाल स्थगित नहीं हुआ तो सदन में रस्म के मुताबिक हल्ला उठा। सदन के रस्म की रक्षा हुई। रस्म के मुताबिक ही सदन बीस मिनट स्थगित रहा। रस्म के मुताबिक ही कुछ ने वाकआऊट किया, कुछ ने अध्यक्ष के आसन के समीप नारेबाजी की। अध्यक्ष शांत-धीर बैठा रहा जैसा कि उसे आसन की गरिमा का ख्याल करते हुए करना चाहिए था। अध्यक्ष ने अपने पद की गरिमा के अनुरुप कहा “किसानों की आत्महत्या का मामला गंभीर है, इसका राजनीतिकरण मत कीजिए। उसे लगा सदन में समूचा विपक्ष किसान की आत्महत्या की राजनीति कर रहा है। सदन में मौजूद सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को लगा कि प्रश्नकाल तो स्थगित होना ही चाहिए क्योंकि किसानों की आत्महत्या का मुद्दा प्रश्नकाल से ज्यादा महत्वपूर्ण है। सदन फैसला नहीं कर सका कि लोकतंत्र में कौन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है? वह प्रश्नकाल ज्यादा महत्वपूर्ण है जिसमें प्रश्न पूछने और उत्तर देने की रस्म निभायी जाती है या किसान की आत्महत्या पर चर्चा ज्यादा महत्वपूर्ण है जिसमें रस्म के मुताबिक ही किसानों की आत्महत्या पर सामूहिक रुप से शोक-संताप-संवेदना व्यक्त की जाती है! यह स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। स्वस्थ लोकतंत्र किसी भी प्रश्न पर तुरंत निर्णय नहीं देता, वह उत्तरों को स्थगित रखता है।

सदन के स्थगन के बाद कार्यवाही फिर शुरु हुई। इस बार सरकार ने अपनी सफाई दी। गृहमंत्री ने सर्टिफिकेट दिया कि पुलिस अपनी जिम्मेवारी का निर्वाह कर रही थी।गृहमंत्री ने कहा कि पुलिस मुस्तैद थी, किसान गजेन्द्र सिंह को आत्महत्या से बचाने के लिए दिल्ली “पुलिस लोगों को ताली बजाने से रोक रही थी क्योंकि लोग आम आदमी पार्टी की सभा में बात-बात पर ताली बजा रहे थे, शोर मचा रहे थे।” गृहमंत्री का जमीर जाग चुका था। गजेन्द्र की आत्महत्या के बाद उसे यह भी लगा कि देश में बीते सत्तर साल से कुछ ऐसा चल रहा है जो 60 करोड़ से ज्यादा लोगों के विरुद्ध है। उसने सदन से कहा कि ‘हम सबको एक साथ बैठकर सोचना चाहिए कि क्यों देश के साठ फीसदी लोग इस दशा में हैं कि उन्हें अब भी खाद्य-सुरक्षा की जरुरत पड़ती है। गृहमंत्री का यह कहना सरकार के जमीर के जागने का सूचक था। आखिर सरकार एक किसान की आत्महत्या के बाद सोचना चाहती थी कि इस देश के नौ करोड़ किसान परिवारों में से पचास फीसदी से ज्यादा परिवार क्योंकर इज्जत-आबरु के साथ दो जून की रोटी नहीं जुटा सकते ? सरकार ने जो सत्तर सालों में नहीं सोचा उसे अब सोचना चाह रही थी। वह लगातार सोचे जा रही थी, उसे खुद को नैतिक और वैध साबित करने के लिए लगातार सोचते चले जाने का आभास भर देना होता था। हां, सोचने की इस सतत साधना में बस कोई समाधान नहीं दिख रहा था।

सदन से बाहर भी सब अपनी जिम्मेवारियां निभा रहे थे। जैसे कि आम आदमी का नाम जपकर मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठा वह परम ईमानदार नौकरशाह जो अपनी साफ-सुथरी छवि पर इतना मुग्ध था कि अपनी टोपी पर भी अपनी ही फोटो लगाता था, खुद भी पहनता और किसी पवित्र कर्मकांड की तरह शेष सबको पहनाता था। इसी मुख्यमंत्री ने किसानों के हक में एक सभा की थी। इसी सभा में एक किसान गजेन्द्र ने जान दी थी। गजेन्द्र की जान जाने के बाद यह मुख्यमंत्री अपने मंत्रिमंडल समेत किसानों के हक के लिए मंच पर घंटों जमा रहा। भाषण देता रहा। उसे लगा भाषण देने से किसानों के हक की रक्षा होगी। अब उसे लग रहा है कि उससे गलती हुई, वह माफी मांग रहा है। इस मुख्यमंत्री ने देश के लोकतंत्र में बहुत बड़ा योगदान किया है। उसने भूल-गलती-माफी, धरना-प्रदर्शन आदि को एक अपशब्द में बदल डाला है। एक अपशब्द, जिसमें एक ही साथ दो काम सधते हैं। दूसरे के भरोसे को गाली देना संभव हो जाता है और गाली की जिम्मेवारी से जान छुड़ाना भी संभव हो जाता है। इस मुख्यमंत्री ने गजेन्द्र की जान की कीमत दस लाख लगायी है। यह एक जिम्मेदार मुख्यमंत्री की पहचान है। मुख्यमंत्री जानता है, गजेन्द्र जैसा छोटा-मोटा किसान सारी उम्र खेतों में खटनी करे तो भी खेती की लागत और कीमत के हिसाब से दस लाख नहीं कमा सकता। इस पार्टी का एक प्रवक्ता टेलीविजन पर पूरे देश के सामने रो रहा है। गजेन्द्र की मौत ने उसे भीतर तक झकझोरा है, वह लोगों को बताना चाह रहा है कि गजेन्द्र मौत जितनी सच्ची थी, उसके आंसू भी उतने ही सच्चे हैं। वह इस मौत की सच्चाई को मिटाने के लिए पूरी जिम्मेदारी के साथ अपनी आँख से सच्चे आंसू निकाल रहा है।

गृहमंत्री ने पुलिसिया जांच के और मुख्यमंत्री ने मैजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए हैं। पुलिस जांच करेगी कि आत्महत्या के लिए गजेन्द्र को किसी ने उकसाया तो नहीं था। मैजिस्ट्रेट जांच करेगा कि गजेन्द्र को किसी ने सभा बिगाड़ने के ख्याल से पेड़ पर चढ़ाया तो नहीं था। टेलीविजन चीख रहा है, वह अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है। उसका जोर यह बताने पर है कि गजेन्द्र पगड़ी बांधने में पारंगत था, उसकी रौबीली मूंछे भी थीं, वह मरने से ऐन पहले तक हताश कत्तई नहीं था। टेलीविजन बताना चाह रहा है कि वैसे तो इस देश में किसान आत्महत्या कर रहे हैं लेकिन गजेन्द्र वैसे किसानों में नहीं था जो आत्महत्या कर लें। टेलीविजन गजेन्द्र की मौत पर शोक मनाने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहता है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर आम आदमी की सभा में जो हुआ वह किसी किसान का आत्महत्या करना ही था।

देश का प्रधानमंत्री, राज्य का मुख्यमंत्री, मंत्रिमंडल और पार्टी प्रवक्ता, मीडिया और उसके दर्शक-पाठक सब सन्न और शोक-संतप्त हैं, अपनी भूमिका निभा रहे हैं। बस, एक किसान है जिसकी मौत इस सजग लोकतंत्र में थामे नहीं थम रही है। शायद, देश मान चुका है कि जैसे जन्म लेने वाले की मृत्य़ु ध्रुव है वैसे ही किसान का आत्महत्या करना भी अटल सत्य है।

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

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One thought on “केजरीवाल की टोपी या किसान का साफा: चंदन श्रीवास्तव

  1. Dinkar Singh on said:

    कुछ लोग अवसाद में हैं
    नौकरशाही दबाव में है
    पत्रकारिता सच को खोजकर बचा रही है
    हम सब कोशिश कर रहे हैं
    लिहाजा हम सब जिन्दा हैं
    योग करनेवाले ठहाके लगा रहे हैं
    चीनी पंद्रह रुपये किलो है
    और हम वैश्विक नेतृत्व के लिए तैयार हैं
    – दिनकर

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