ख्याली मूर्ति: नन्दनी हल्दर

यह स्तम्भ  (घुसपैठिये)दिल्ली और आसपास की कामगार बस्तियों के तरुण-युवा लेखकों की प्रतिनिधि रचनाएं आप तक पहुंचाएगा. ये लेखक और इनका लेखन बने-बनाए खांचों में नहीं समाते. ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के लेखक अभी-अभी जवान हुए हैं या हो रहे हैं. एकाध को छोड़कर इसके सभी संभावित लेखकों की उम्र २0 वर्ष के अंदर ही है। लेकिन इन सब में कुछ सामान्य विशेषताएँ भी हैं. सभी की आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि लगभग समान हैं। इससे भी बड़ी विशेषता यह है कि इनके लिए बचपन की किताबें कागजों से उतनी नहीं बनती हैं जितनी उनके संघर्ष, मोहल्लों, माहौल और जगह से बनती हैं. उनकी लिखाई में वे जगहें आपको सुरक्षित मिलेंगी। आप शायद महसूस करें कि साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकाॅर्डिंग और सृजन, कि़स्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं साहित्य के सुरक्षित-आरक्षित डिब्बे में घुस आये इन घुसपैठियों को आप कैसे बरतेंगे, यह आप ही को तय करना है.

इस बार की घुसपैठिया हैं ग्यारह वर्षीय युवा लेखिका नंदिनी हल्दर .

सौजन्य: पीटीआई

सौजन्य: पीटीआई

ख्याली मूर्ति

By नन्दनी हल्दर

धूप की किरणें छांव में समा रही थीं। थोड़ी छांव तो उन खेले हुए कदमों पर भी थी जो कुछ देर पहले खेल रहे थे। मैं भी उसी धूप में बैठकर मूर्ति को बनते हुए देख रही थी। उसे बनने में एक हफ्ता लग सकता है, ऐसा रामू के मुँह से कहते सुना था। यह मूर्ति पूजा में शामिल होने वाली थी।

ठंडी हवा इधर यूंही टहलने के लिए आ गयी थी। आँखें उस हवा को तसल्ली देकर इशारा करतीं। वह घास का पुतला लगभग तैयार हो चुका था। रामू की सफेद रंग की शर्ट भीगी हुयी हथेलियों से गीली हो चुकी थी। उसने उसको मोड़कर बाजू तक चढ़ा लिया था। मिट्टी से सने हाथ अब इधर-उधर बिखरी पड़ी घास को समेटने में लगे थे। वह पीली-सुनहरी, नुकीली घास मानो उनके हाथों में चुभती ही नहीं हो, ऐसा मैं सोच रही थी।

“अरे रामू अंकल, देखो यह पानी कितना गंदा है?”

“अरे बेटा, गंदा पानी हुआ तो क्या हुआ? यह गंदा पानी ही ज़्यादा काम आयेगा!” वह बोला।

मेरे दिलोदिमाग में तो बस उस मूर्ति का नकाब था। मैं एक ख्याली दुनिया में खो चुकी थी और अपने आप में बुदबुदाने लगी, “आय-हाय! क्या सुंदर होगी मेरी मूर्ति! उसके काले-काले बाल! गोरा-गोरा चेहरा! सुंदर-सुंदर हीरे-मोती वाले गहने! लाल गुलाबी रंग की साड़ी!”

मैंने अब सोच लिया था कि मेरे पूरे मोहल्ले में उस ख्याली मूर्ति से सुंदर कोई भी नहीं। ज़ेहन के एक कोने में मूर्ति अपना घर बना चुकी थी। मूर्ति का नकाब तो एक हफ्ते बाद खुलेगा। जब पुतले को देखने पर ही इतनी खुश थी तो मूर्ति के बनने पर कितना खुश होऊँगी, यही सब सोच रही थी।

बच्चों की टोलियाँ तो वहाँ बैठ ही गई थीं। बच्चे अपनी बातों की ऊँची-ऊँची उड़ान भर रहे थे।

“अरे पता है, मेरे पापा दूसरी शादी करेंगे, वे मेरी सौतेली माँ लायेंगें और मेरी माँ की सौतन।”

“अरे चिंटू, तुझे इन सब के बारे में कैसे पता चला, तू तो स्कूल भी नहीं जाता है!”

“अरे दीदी, मेरे मम्मी-पापा दिन-रात यही सब बातें करते रहते हैं?”

“कितना छोटू है रे तू, लेकिन तेरी बातें इतनी बड़ी-बड़ी हैं, शैतान कहीं का!”

“दीदी मैं शैतान नहीं हूँ।”

“अच्छा चल तू शैतान नहीं, महाशैतान है। अच्छा, वैसे तेरे पापा दूसरी शादी क्यों कर रहे हैं?”

“दीदी, वह सौतेली मम्मी बहुत सुंदर है न इसीलिए।”

तभी चिंटू कुछ सोचने-सा लगा और बोला।

“वाह! मेरी मूर्ति कितनी सुंदर लग रही है, मेरी सौतेली मम्मी की तरह। इसके भूरे-भूरे बाल और सांवली, बिलकुल मेरी तरह। होठों पर उनकी मतवाली लाली, मॉडर्न डिजाइन वाली उनकी साड़ी, जो मैंने मार्केट में देखी थी। अरे दीदी, पता है मेरी सौतेली मम्मी के बाल कैसे हैं? उनके होठ कैसे हैं? उनकी साड़ी पता है, कैसी है? पिंक और आसमानी कलर की है। उसके बॉर्डर में मेहँदी का डिजाइन है। उनके भूरे बाल अधकटे हैं और होठों पर पिंक लिपिस्टिक है।”

उंगली को दिमाग के दायीं तरफ पीटते हुये फिर बोला- “स्क्रू टाईट हो जा, स्क्रू टाईट हो जा। और हाँ, उसके पास चमकने वाली घड़ी भी है। और न… और न… नगों वाली माला भी है। सांवली है पर सुंदर बहुत है। पता है दीदी, मैंने तो यह भी डिसाइड कर लिया है कि रामू अंकल मेरी वाली ही मूर्ति ही बनाएंगें और वह सांवली होगी। वह पिंक और हल्का आसमानी कलर की साड़ी पहनेगी। देखना बिलकुल मेरी सौतेली मम्मी जैसी लगेगी।”

“अरे चिंटू, इतना छोड़ता क्यों है? न ही तेरी सौतेली मम्मी आई है और न ही मूर्ति बनी है और तू अभी से ही आसमान में उड़ने लगा!”

“मेरी मम्मी से पापा पक गए हैं। यह मैं सच कह रहा हूँ।”

“पर चिंटू एक बात ध्यान में रखियो, अगर तेरे पापा तेरे से पक गए तो क्या वे तुझे भी चेंज कर देंगे!”

“मेरे पर विश्वास क्यों नहीं करती हो, सौ बार बोल चुका हूँ कि मैं सच कह रहा हूँ, पर तुम मानती ही नहीं। आज से पहले मेरे पापा तीन शादियाँ कर चुके हैं। पर किसी ने भी मुझे भाई नहीं दिया। पहली मम्मी थोड़ी अटपटी थी। दूसरी मम्मी बहुत हरामन थी। तीसरी जिसने मुझे जन्म दिया और चौथी, सुंदर तो है पर होगी कैसी, यह आगे देखेंगे! मैं चलता हूँ! बाय टाटा सी यू!”

वह घासों से बना पुतला! बच्चे उसे देख खुश हो जाते। पुतले के चारो ओर लोगों की इकट्ठी भीड़ और उनमें चलती बातें। ‘भाई यह क्या है?’ ‘यह रामू क्या बना रहा है?’ ‘पता नहीं, लेकिन सुना है कि कोई मूर्ति बना रहा है।’ ‘कुछ कर तो रहा है। रामू के पास कोई काम भी तो नहीं है।’ ‘राम-राम जी!’ ‘अरे सुरेश भाई क्या हाल हैं?’ ‘हम तो भाई ठीक हैं! तुम कइसन हो?’ ‘राम –राम जी!’ इस तरह की आवाजें जब भी कानों की कुंडी खटखटाती, मेरे ख्यालों और ख्याली मूर्ति को चूर-चूर कर देतीं।

मैं सोच रही थी कि यह पुतला बड़ा सुंदर लग रहा है! अगर उसे दूर से देखा जाये तो असली मानुष लगेगा!

”अरे बेटा, देखना पुतला कैसा लग रहा है?“

“हाँ अंकल, ठीक है!”

रामू ने यह सवाल तभी पूछा जब मैं ख्यालो में खोई थी। मानो वह मेरे जहन में घुसकर मेरे ख्यालों को जान जाता है। डूबते सूरज को शाम की लालिमा घेर चुकी थी। बच्चों के हाथों में अब एक ही चीज़ नज़र आने लगी थी- इधर-उधर करती डोलची, जिसमें वे मदर डेयरी से दूध भरकर लौट रहे थे।

लाल रंग की उबड़-खाबड़ ईंट से रामू मिट्टी के ढेलों को तोड़ रह़ा था। कुछ पल बाद ही मिट्टी के ढेले मुलायम मिट्टी में तब्दील हो चुके थे। रामू उन्हें सान रहा था। अब उस मिट्टी को हाथों में लपेट कर चुभते घासों पर लगा रहा था। शरारती फौज भी अपने कदमों की हाजि़री लगाने चल दिये थे। उनकी निगाहें अब आसपास के माहौल में जम चुकी थीं। वह पिसी हुई, मुलायम सी मिट्टी अब उस मेहमान के कमर तक चढ़ चुकी थी।

आसपास के शोर-गुल से रामू बहुत परेशान था। उसकी परेशान निगाहें मूर्ति से हट नहीं रही थीं लेकिन आवाज़ उसके कानों में समा रही थी जो आसपास से गुजर कर हवा में दूर-दूर तक फैल रही थी। वह मिट्टी सूरज की किरणों से सूख रही थी लेकिन अब भी कहीं न कहीं गीली थी।

घास का पुतला एक मूर्ति में तब्दील हो चुका था। उसने मेहमान का मुखौटा ही बदल दिया था। अब भी मूर्ति के कुछ अवशेष बाकी थे और जिनको निखारने में अभी और वक्त लगना बाकी था। यही वजह थी कि लोगों के कदम अब यहाँ कुछ पल ही टिकने वाले थे। रामू भी बेफ्रिक होकर आसपास बिखरे सामानों को समेटने में लगा था। पड़ोसियों के गले से उतरते लफ्ज भी बंद हो चुके थे, केवल सवारी-गाड़ियों के शोर के अलावा और कुछ भी कानों तक नहीं पहुँच पा रहा था। रात होने ही वाली थी।

रामू के घर की दहलीज़ पर लगी एक छोटी सी तस्वीर मुझे रोक कर अपनी ओर खींच चुकी थी। हाथों के सहारे तस्वीर को उठाया और इस तस्वीर में बनी मूर्ति भी मेरे ख्यालों में अपना घर बनाने लगी।

कदम उस संकरी गली में पहुँचे जहाँ सन्नाटा था। लोग मूर्ति की तरह चुपचाप बैठे थे। कदम अपनी चुप्पी के साथ अब घर के आँगन में पहुँचे। मूर्ति का नकाब पहनकर दिमाग भी तकिये की तरफ़ सरक चुका था। खेलते कदम भी एक-दूसरे के पास सटे लेटे थे। मूर्ति का सुंदर चेहरा बार-बार आँखों के सामने आ रहा था, ऊपर से घर का शोरगुल भी था और आँखों में नींद नहीं थी। इसीलिए ख्याली मूर्ति के बारे में इधर-उधर की बातों को मैं बटोरने में लगी थी। आँखें उन बातों के साथ कब सो गईं, इसकी याद मुझे भी नहीं थी।

सुबह उठकर दादी को अलग ही तरह से सजे हुए देखा। दादी के घुंघरू जैसी लट को देखते ही ज़ेहन में मूर्ति का नकाब आ पहुँचा। हाथों से उस नकाब को हटाया।

“आय-हाय क्या सुंदर लग रही है?”

“शुक्रिया…शुक्रिया!” मेरे बगल में खड़ी दादी बोल पड़ी।

“दादी, आप कहाँ की सोच रही हो? मैं तो अपनी ख्याली मूर्ति की बात कर रही हूँ। उसके काले-काले बाल, गोरा-गोरा चेहरा, हीरे-मोती वाले गहने!”

“देख, मैं भी तो वैसी ही दिख रही हूँ न!” दादी बोली

दादी के साथ बहसबाजी के बाद कदम उस संकरी गली में जा पहुँचे जहाँ गली मूर्ति के कारण जीते-जागते माहौल में तब्दील हो चुकी थी। उस खिड़की के सींकचों पर नज़र बिल्कुल टिकी हुई थी क्योंकि मूर्ति के कुछ अंश उससे दिखाई पड़ रहे थे।

मूर्ति की उंगलियाँ रंगों से भीगी हुई थीं। एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं, चार नहीं, पाँच-पाँच उँगलियाँ! कदम उस दहलीज़ के पास जा पहुँचे। मैंने उन उँगलियों को रामू की खिलखिलाती निगाहों के पास रख दिया जो अभी भी मूर्ति को तराशने में लगा था।

“अरे बेटा, तुम आ गई?”

“जी अंकल!”

“बैठो-बैठो! एक खुशखबरी है।”

“क्या अंकल?”

“कल मूर्ति की रंगाई होगी!”

“क्या? फिर बड़ा मज़ा आयेगा!”

सूरज की किरणें मूर्ति के शरीर को और भी उभार रही थीं। कोई खुरदरी चमकदार-सी चीज़ लेकर रामू मूर्ति के शरीर पर घिसने लगा। मूर्ति के होंठों की खिलखिलाती मुस्कुराहट के साथ-साथ उसकी प्यारी-प्यारी आँखें भी मूर्ति की शोभा को बढ़ा रही थीं।

रामू बड़े उत्साह से अपना काम कर रहा था। शर्ट के बाजू उसी तरह मुड़े हुए थे जिस तरह पहले थे। मूर्ति की घिसाई का वह काम भी निपट चुका था। रामू का थकावटी शरीर उससे बार-बार कह रहा था कि ‘मुझे आराम करना है, मुझे आराम करना है!’ यह बात मेरे ज़ेहन में महफूज़ थी। पर रामू को तो इस बात का एहसास ही नहीं था।

“अंकल, आप सुबह से काम कर रहे हैं! अपने शरीर को आराम तो करने दो!”

“अरे बेटा, इसे परसो देना है!”

“पर अंकल, कल तो रंगाई है!”

मेरे आगे रामू की एक न चली।

“उफ्फ, तू तो मेरा दिमाग़ खा जाती है!” कहकर रामू अपने थकावटी शरीर को बैठा चुके थे।

सामने निगाहों में बसी मूर्ति मुझे और रामू से कुछ न कुछ कह रही थीं, पर मैं और रामू उसे समझने में असमर्थ थे। रामू के गले से निकलते लफ्ज़ होंठों पर मुस्कुराहट ला रहे थे। कुछ पल बाद शैतानी टोली अपनी बातों के साथ वहाँ पहुँच गई।

“अंकल बड़ा ही सुंदर लग रहा है!”

“हाँ-हाँ चिंटू, तुने सही कहा!”

“अंकल इसमें जंग नहीं करोगे?”

चिंटू की बातों से सब ठहाका मारकर हँस पड़े। तभी मैंने जवाब दिया,

“अरे चिंटू जंग नहीं, रंग!”

अक्सर इन्हीं बातों से उदासी भरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट खिलखिला उठती है। वक़्त की रफ़्तार अब मौसमों में तब्दील हो चली थी। ‘कल तो रंगाई है, बड़ा मज़ा आयेगा!’

काश! मेरी ख्याली मूर्ति इस मूर्ति से मैच कर जाये! इन्हीं बातों को सोचते हुए घर के दरवाज़े पर दस्तक दी। घर में कोई नहीं था। घर में घुसते ही कदम चौकी पर जा पहुँचे। घर अब वैसा नहीं था जैसा पहले था। मूर्ति के अनुभव के साथ पलकें झुकने को थीं। नींद आँखों में कब आई पता ही नहीं चला।

मूर्ति अभी तक ज़ेहन में थी और जिसका जिक्र बार-बार दिमाग़ में हो रहा था। कुछ पल बाद मेरे कदम रामू के घर पहुँच चुके थे। मूर्ति की रंगाई मेरे आने पर ही शुरू हुई। शैतानी फौज कोने में अपना झुंड बनाए बैठी थी। उन्हीं के पास जाकर मैं भी बैठ गई।

“दीदी, मैंने कहा था न कि रामू अंकल यह मूर्ति बिलकुल मेरी सौतेली माँ जैसी बनायेंगें!”

“अरे चिंटू, अभी तक अंकल ने तो रंग भी नहीं किया। तू तो पहले ही डींगें मारने लग गया।”

रंगों में भींगे पेंट-ब्रुश। उन रंगों से उभरती मूर्ति की छवि जो कि दिल में एक घर-सा बना चुकी थी। इकट्ठी भीड़ में हर निहारती निगाहें जो सिर्फ और सिर्फ उस छवि पर ही टिकी हुयी थीं। मैं भी अपनी ही धून में थी।

मूर्ति की रंगाई शुरू हुई। सबसे पहले मूर्ति के शरीर को सफेद रंग से रंगा, उसके बाद मानुष कलर, हथेलियों के गड्ढों पर थोड़ा-थोड़ा लाल रंग और गालों पर भी वही रंग। कुछ देर बाद रंगाई की यह दुनिया भी खत्म हुयी। मूर्ति को रंग में देखकर आँखें उसे निहारती रहीं। रंगने के बाद उसका शरीर उभर आया था। सफ़ेद मूर्ति अब इंसानी कलर वाले शरीर में तब्दील होने चली थी। अब रामू उसे सजाने में लगा था और मेरा मन मचल-सा रहा था कि काश मैं भी मूर्ति को सजा पाती। मेरे दिल की बात जुबां पर आ ही गई।

“अंकल-अंकल मैं भी सजाऊँ!”

“नहीं बेटा, यह बच्चों का खेल नहीं है।” अपने काम में व्यस्त रामू बोला।

मूर्ति के घुँघराले बाल जो दादी के लटों की तरह लग रहे थे जिसे मैंने आज सुबह-सुबह ही देखा था। मोतियों की एक छोटी-सी माला जिसे मूर्ति को पहनाया जाना था बिलकुल वैसी ही लग रही थी जिसे मैं कमला मार्केट से लायी थी। बहुत-से गहने थे जैसे चूड़ियाँ, लटकन वाले झुमके, बड़ी-बड़ी मालाएँ, गुलाबी ब्यूटीफुल-सी साड़ी जो मन को जिज्ञासु बना रही थी क्योंकि ऐसी साड़ी मैंने कभी देखी ही नहीं थी। बार्डर के रंग आसमानी और लाल थे। रामू इन गहनों और साड़ी को बारी-बारी पहनाते गए। वह सजावट का माहौल भी लगभग खत्म ही हो चुका था।

गहनों के साथ वह प्यारी-सी साड़ी मूर्ति की शोभा में चार चाँद लगा रही थी। उस वक्त चिंटू का मुंह देखने लायक था। बड़ा ही डींगें मार रहा था। ‘मेरी सौतेली मम्मी जैसी मूर्ति बनेगी! आप देख लेना दीदी!’ शायद वह भी मन ही मन सोच रहा होगा कि ‘क्या सोचा था और क्या हो गया!’ उसकी शक्ल के बारह बज चुके थे।

सौतेली माँ किसी मूर्ति में नहीं थी। उनकी खुद की खूबसूरती भला कोई मूर्ति कैसे ले सकती थी!

—समाप्त—-

???????????????????????????????

नंदिनी हल्दर. जन्म- 26 नवंबर 2004, लक्ष्मीनगर, दिल्ली. अंकुर किताबघर की नियमित रियाजकर्ता. पता- सी-68, सावदा-घेवरा जे.जे. कॉलोनी, दिल्ली- 110081 

साभार: हंस, अप्रैल, 2015

Single Post Navigation

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: