माइकल जैक्सन का पीटर पैन सिंड्रोम: डॉ. विनय कुमार

माइकल जैक्सन अब इस दुनिया में नहीं है। मगर उसकी जिंदगी की खुली किताब में नये पन्नों का जुड़ना नहीं थमा है। उसे जो लिखना था, लिख चुका, मगर खोज, खुजली और खुन्नस से भरे दिमागों के मालिकान हर दिन कुछ न कुछ जोड़ रहे हैं। अब उसकी जिन्दगी को किताब नहीं ब्लॉग कहा जाना चाहिए जिस पर कोई भी विजिटर कैसी भी प्रतिक्रिया टांकने के लिए स्वतंत्र है। # लेखक Michal jacson.photo

By डॉ. विनय कुमार

उसकी कला के कई चेहरे हैं

माइकल जैक्सन का उद्गम चमत्कारिक था और उसका विकास एक शानदार जादू। अपनी त्वचा में मिट्टी और घास के सबसे गहरे रंग लिये युवा माइकल की आंखें बरसात की उस सुबह की तरह थीं जहां एक तकलीफ भरी गीली रात आते हुए उजाले से मिलती है। शायद यही वजह थी कि वह रात और दिन दोनों के आशिकों का चहेता था। उसकी कला के कई चेहरे हैं – गायकी, संगीत, गीत रचना, नृत्य और अभिनय। इनमें से एक भी चेहरा ऐसा नहीं जिसे आप नज़रअंदाज़ कर सकें। उसकी गायकी के कई मोड़ हैं। उसकी आवाज़ का सफर एक नए झरने के अल्हड़पन से शुरू हुआ, मगर आवेग इतना था कि मुश्किल रास्तों और पथरीली ऊँचाइयों को सर करने में ज़्यादा वक़्त नही लगा । आज भी, आनंद की आदिम अभिव्यक्ति की याद दिलाती उसकी वह विशेष चीख श्रोताओं से एक पल में ही समय और स्थान का बोध छीन लेती है और वे वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ सभ्यता का एक भी चिह्न नहीं- भाषा तक नहीं। माइकल के नृत्य में पश्चिमी नृत्य की यांत्रिकता के बावजूद जंगल का सौंदर्य था। तरह-तरह के अनुशासित फुट मुवमेंट्स करते-करते अचानक वह कोई ऐसा ‘मूव’ पेश करता था कि दर्शक अचरज से और अविश्वास के मारे चीखने लगते थे। वह एक नैसर्गिक अभिनेता था। उसका चेहरा बोलता था। अगर वह सिर्फ अभिनेता भी होता तो असफल तो कतई नहीं होता। वह एक कवि और गीतकार भी था। उसने दूसरों के लिखे गीत भी गाए हैं, मगर खुद भी काफी गीत रचे हैं। कविता के साथ एक अद्भुत बात है। कोई भी कवि अपनी रचना में अभिनय नहीं कर सकता। उसका मानस दिख ही जाता है। माइकल जैक्सन कोई चिंतनशील व्यक्ति नहीं था। भावनाएँ ही उसके जीवन को चलाती रहीं। यह बात उसकी रचनाएँ भी कहती हैं। अपनी कविता ‘मैजिकल चाइल्ड’ में वह एक बच्चे (या खुद) के बहाने सारे बच्चों में अंतर्निहित जादुई संभावनाओं, उनकी त्रासदियों और उनके सपनों का जि़क्र करता है। कविता का अंत इस अपील के साथ होता है कि एक पीड़ारहित विश्व की रचना के लिए अपने भीतर के बच्चे को पाने का जतन करो। एक अन्य कविता में वह मासूम बच्चे को ‘आनंद का संदेशवाहक’ कहता है और उसकी मर्मस्पर्शी छवि को दुनिया बदलने की प्रेरणा का स्रोत मानता है। थैलेसेमिया से ग्रस्त रेयान ह्वाइट नामक एक किशोर बार-बार ब्लड-ट्रांसफ्युजन के कारण एड्स की भेंट चढ़ गया था। माइकल ने उसकी स्मृति में एक बेहद मार्मिक गीत लिखा है। आलोचना के पैमाने से देखें तो उसकी काव्य रचनाओं का कोई महत्व नहीं, मगर जैसी भी हैं क़ाबिले-ग़ौर हैं क्योंकि उन्हें माइकल जैक्सन ने लिखा था ।

माइकल जैक्सन और स्टीवेन स्पीलबर्ग उर्फ पीटर पैन

माइकल जैक्सन एक अद्भुत चरित्र है। वह एक ऐसा आख्यान है जहां पीड़ा के अंधेरों के बावजूद उम्मीद की रोशनी का उत्सव है। आर्थिक अभावों और पिता की महत्वाकांक्षा की वजह से माइकल का बचपन सहज-सामान्य नहीं रहा। ग़़रीबी की मार और पिता द्वारा दी जाने वाली ट्रेनिंग के क्रूर अनुशासन ने जहां उसके बचपन को ज़़ख्मी किया, वहीं परिपक्वता से पहले आई सफलता ने उसके व्यक्तित्व के आंतरिक विकास को बाधित किया। जिस माइकल जैक्सन को दुनिया ने जाना वह एक किशोर था और जो ‘ऑल टाईम ग्रेट पॉप स्टार’ दुनिया से गया, वह भी एक किशोर ही था। उसकी कला, उसकी गायकी तो बदली मगर एक व्यक्ति के रूप में किशोर ही रहा वह। वह खुद को ‘पीटर पैन’ कहता था और उसने ‘पीटर पैन’ की कहानी में वर्णित फैन्टेसी आइलैण्ड ‘नेवरलैन्ड’ के नाम पर अपने फार्म हाउस का नाम ‘नेवरलैन्ड रैन्च’ रखा था।

‘पीटर पैन’ स्कॉट उपन्यासकार-नाटककार जे.एम.बैरी द्वारा रचित एक चरित्र है। यह चरित्र एक शरारती लड़का है जो उड़ सकता है और अपने जादू के ज़ोर से अपने को विकसित और परिपक्व होने से रोक देता है। बैरी के उपन्यास ‘पीटर पैन एन्ड वेन्डी’ का यह नायक खोए हुए बच्चों के नायक के रूप में फैंटेसी आइलैन्ड ‘नेवरलैंड’ पर अपने गैंग के साथ अपने अक्षय बचपन को एन्ज्वाय करते हुए परियों, जलपरियों, नेटिव अमेरिकन्स, लुटेरों और दुनिया के सामान्य बच्चों के साथ इंटरएक्ट करता है। इस चरित्र ने लेखन के अतिरिक्त अन्य कला माध्यमों से जुड़े रचनाकारों को भी आकर्षित किया। ‘पीटर पैन’ की कथा पर उपन्यासों, चित्रों और मूर्तियों के अलावा कुछ फिल्में व म्युजिक वीडियो भी बने। इनमें स्टीवेन स्पीलबर्ग की फिल्म ‘हूक’ भी है। ‘हूक’ का नामकरण ‘पीटर पैन एन्ड वेन्डी’ के खलनायक कैप्टन हूक के नाम पर हुआ है। स्पीलबर्ग की फिल्म में पीटर पैन को एक शादीशुदा-बाल बच्चेदार युवा के रूप में चित्रित किया गया है। वह अपना बचपन और नेवरलैंड के दिन भूल चुका है। फिल्म की कहानी यूं बनती है कि पीटर और उसका परिवार नेवरलैंड के बाल-समूह की नायिका- वृद्धा हो चुकी वेन्डी – से मिलने लंदन जाता है और उसी दौरान कैप्टन हूक पीटर के बच्चों का अपहरण कर नेवरलैन्ड आइलैन्ड पर लेकर चला जाता है। वेन्डी की प्रेरणा से पीटर नेवरलैन्ड जाता है, जहां उसकी खोयी यादें वापस आती हैं और वह खलनायक को पराजित कर अपने परिवार के साथ वास्तविक दुनिया में लौट आता है।

स्पीलबर्ग का जिक्र अकारण नहीं है। ‘पीटर पैन एन्ड वेन्डी’ उसकी मां की पसंदीदा ‘बेड टाइम स्टोरी’ की किताब थी। उसकी मां ने ही उसका परिचय पीटर पैन से कराया था और मात्र 11 वर्ष की उम्र में स्टीवेन ने अपने स्कूल में पीटर पैन पर आधारित एक नाटक का निर्देशन किया था। 1985 में एक बातचीत में स्टीवेन ने क़बूल किया था – ‘‘मैंने हमेशा पीटर पैन की तरह महसूस किया है… उम्र के साथ विकास करना मेरे लिए बहुत मुश्किल रहा है- मैं पीटर पैन सिंड्रोम का शिकार हूं।’’ ‘हूक’ के पहले भी स्टीवेन ने कई बार पीटर पैन की कहानी पर फिल्म बनाने की योजना बनायी थी। वह माइकल जैक्सन को लेकर एक म्युजिक वीडियो भी बनाना चाहता था।

पीटर पैन सिंड्रोम

मनोरंजन जगत की दो-दो हस्तियों से जुड़ा ‘पीटर पैन सिंड्रोम’ मनोचिकित्सकीय शब्दावली में नहीं आता। यह डब्लू.एच.ओ. के इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ़ डिजीजेज या अमेरिकन सायकाएट्रिक एसोसिएशन के डायग्नॉस्टिक एन्ड स्टैटिस्टिकल मैनुअल ऑफ़ मेंटल डिजार्डर्स में शामिल नहीं है। दरअसल या लोकप्रिय मनोविज्ञान (पोपुलर सायकॉलॅजी) का टर्म (पद) है। यह चिर युवा रहने की इच्छा और जिम्मेवारियों से पलायन का नाम है। किशोरावस्था समाप्त होने के बाद ऐसी मनोदशा आम है, जब हम अपना बचपना भूल नहीं पाते और जवानी अनंत लगती है मगर यथार्थ से टकराव हमें बदल देता है। जिस मनुष्य का मानस इस टकराव को झेलने से खुद को बचाता है वह अपने विकास को अवरुद्ध करता है। कटु वास्तविकताओं से मुठभेड़ और अपनी जय-पराजय का समान भाव से स्वीकार ही हमें परिपक्व करता है।

‘पीटर पैन सिंड्रोम’ एक क्वासी सायकॉलॅजिकल (अर्द्धमनोवैज्ञानिक) शब्दावली भले हो, इसकी जड़ें प्योर सायकॉलॅजी में है। प्रसिद्ध दार्शनिक मनोचिकित्सक कार्ल गुस्ताव जुंग एक आलेख है – सायकॉलॅजी ऑफ़ चाइल्ड आर्किटाइप। इसमें वे ग्रीक मिथकीय चरित्र ‘पुएर एटरनस’ यानी ‘शाश्वत शिशु’ प्रतीक के आधार पर चाइल्ड आर्किटाइप की अवधारणा विकसित करते हैं। पुएर एटरनस शब्द रोमन कवि ऑविड के महाकाव्य ‘मेटामॉरफॉसिस’ की देन है। इसमें वे शिशु ईश्वर ‘इयाकस’ को पुएर एटरनस कहकर प्रशंसित करते हैं। जुंग का आर्किटाइप मानव के मन का ‘आदिम रचना तत्व है। उनका मानना है कि सामूहिक अवचेतन में कई अर्किटाइप्स समाहित होते हैं। इन्हीं अर्किटाइप्स में एक है- पुएर एटरनस। जुंग के अनुसार अर्किटाइप्स बाइपोलर (दो ध्रुवों वाले) होते हैं। एक ध्रुव सकरात्मक होता है और दूसरा नकारात्मक। शाश्वत शिशु का सकारात्मक पहलू नवीनता, विकास की संभावना और भविष्य की आशा को प्रतीकित करता है जबकि नकारात्मक पहलू परिपक्वता से परहेज, जीवन संघर्षों से मुह मोड़ने और समाधान लेकर आनेवाले काल्पनिक जहाज के दिवास्वप्न में डूब रहने को।

माइकल जैक्सन सचमुच एक पीटर पैन था, जो एक नवयुवा की तरह बेहद ग़़ैर दुनियादार तरीके से जीता रहा। उसकी रचनाओं में हमेशा एक नयापन रहा – नवयौवन से आने वाला नयापन, मगर ठोस वास्तविकताओं के समझदार स्वीकार की जगह आवेगों के नशे और नशे के आवेगों में इस हद तक डूबा रहा कि न उसे अपने तन की परवाह रही, न मन की और न ही धन की। वह शाश्वत शिशु के सकारात्मक पहलू की ऊर्जा से रचता तो रहा मगर नकारात्मक पहलू के दबाव में जीवन की आग से चमत्कारिक ढंग से बचने की आशा में झुलसता भी रहा और एक दिन सुपुर्दे ख़ाक हो गया – नाहक। न जाने की उम्र थी और न वजह। माइकल जैक्सन हमारे समय पर हावी अमेरिकी सभ्यता की एक दुखती रग है, जिसपर बार-बार उंगली रखे जाने की ज़रूरत है।

बॉडी डिसमॉर्फिक डिजार्डर

मनोचिकित्सकीय विमर्श में माइकल जैक्सन की उपस्थिति की एक और वजह है। उसने जिस बेरहमी से अपने चेहरे की एक के बाद एक कई सर्जरी कराई वह एक रोचक ख़बर नहीं बल्कि मनोचिकित्सकीय मुद्दा है। एक मनोरोग होता है- बॉडी डिसमॉर्फिक डिजार्डर। पहले इसे ‘बॉडी डिसमॉरफोफोबिया’ भी कहा जाता था। इसमें होता यह है कि ग्रस्त व्यक्ति अपने शरीर की बनावट और अपनी छवि में खोट महसूस करने लगता है। उसे लगता है कि उसके चेहरे या शरीर के किसी अन्य हिस्से में कोई गड़बड़ी है। यह खयाल बार-बार उसके मन में आता है और वह परेशान हो उठता है। वह चिंता और अवसाद से ग्रस्त हो जाता है। किसी विचार के मन में बार-बार आने को आब्सेशन कहते हैं। जहां आबसेशन होता है वहां कंपल्सन यानी बाध्यकारी विचार भी आता है जो व्यक्ति को इस बात के लिए बाध्य करता है कि वह ऐसी कोई हरकत करे जिससे इस त्रासद विचार श्रृंखला से मुक्ति मिले। आपको आए दिन ऐसे लोग मिल जाएंगे जिन्हें अपने रंग से शिकायत है और चेहरे पर तरह-तरह के रासायनिक पदार्थों की मालिश करने में लगे रहते हैं। फेयर एन्ड लवली जैसे क्रीम का बाज़ार बढ़ाने में इस मनोरोग का सहयोग यकीनन मिलता है। कुछ लोग चेहरे के एक दाग़ के पीछे इस क़दर पड़ जाते हैं कि अपने सारे वजूद को दाग़दार कर लेते हैं। अनुमानतः यह रोग 1-2 प्रतिशत आबादी को ग्रसित करता है और ग्रस्त व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता (क्वालिटी ऑफ़ लाइफ) को बुरी तरह प्रभावित करता है। बॉडी डिसमार्फिक डिजार्डर से ग्रस्त व्यक्ति में मेजर डिप्रेशन (गंभीर अवसाद) और सोशल फोबिया के लक्षण भी मिलते हैं। अगर समुचित इलाज न हो तो ग्रसित लोगों में आत्महत्या की दर बढ़ जाती है।

इस रोग के कारणों का ठीक-ठीक पता नहीं। मगर शोधों के अनुसार इसके कारणों में जैविक, मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों का सम्मिलित योगदान होता है। आइए इसे माइकल जैक्सन के जीवन के उदाहरण से समझें। वह अश्वेत था और अश्वेतों की तरह उसकी नाक चैड़ी थी और होठ मोटे। यूरोपीय दृष्टिकोण से वह एक कुरूप व्यक्ति था। माइकल ने इस बात का जि़क्र भी किया है कि उसके पिता उसकी मोटी और भद्दी नाक को मसलकर उसे सताया करते थे। गोरों के बीच कामयाबी हासिल करने वाले माइकल को अपने काले रंग, मोटे होठ और चैड़ी नाक से शिकायत होने लगी। वह इस आब्सेशन से इस हद तक परेशान हो गया कि उसने अपने चेहरे की बनावट ही बदल ली। सर्जरी-दर-सर्जरी उसकी नाक पतली होती गयी। सिर्फ नाक ही नहीं होठ भी। उसके चेहरे का रंग भी पहले से साफ होता गया। पूरे प्रसंग पर न्यूयॉर्क की प्रसिद्ध प्लास्टिक सर्जन पामेला लिपिकिन का कहना है कि संभवतः उसे अपनी अफ्रीकी-अमेरिकन छवि से शिकायत थी, इसीलिए उसने अपने चेहरे को कुछ से कुछ बना दिया। प्लास्टिक सर्जरी की भाषा में उसकी नाक को ‘एन्ड स्टेज नोज’ या ‘क्रिपल्ड नोज’ कहते हैं। माइकेल का ऑपरेशन करने वाले सर्जन डा. स्टीफेन हॉफिज कहते हैं कि उसे अपनी अफ्रीकी छवि से शिकायत नहीं थी, दरअसल वह अपने चेहरे को बेहतर शिल्पित देखना चाहता था। माइकल स्वयं इन अफवाहों का खंडन करता रहा। उसने सिर्फ यह माना कि नाक की सर्जरी बेहतर गाने के लिए कराई और विटिलिगो (सफेद दाग) से ग्रस्त चेहरे के दाग़ों को कम करने के चक्कर में अपने चेहरे की ब्लीचिंग की। मगर लिपकिन प्रश्न उठाती हैं- पहले क्या हुआ विटिलिगो या स्कीन ब्लीच? और कहती हैं शायद वह काॅकैशियन दिखना चाहता था।… उसने अपने चेहरे को यूरोपियन स्त्री के चेहरे के क़रीब लाने की कोशिश की।… लिपकिन की इस टिप्पणी को माइकल पर लगे समलैंगिकता के आरोपों से जोड़ कर भी देखा जाता है। कुछ लोगों का मानना है कि माइकल की यौन रुचि को समलिंगी नहीं बल्कि दुविधाग्रस्त मानना चाहिए और यह भी कि शायद खुद उसे अपने जेंडर को लेकर भ्रम था।

माइकल जैक्सन एक ड्रग एडिक्ट भी था। वह तरह-तरह के नशे का तजुर्बा करता रहा। कुछ मनोवैज्ञानिक माइकल की खतरनाक नशाखोरी को ‘खुद से बेहद घृणा’ की आत्मनाशक (सेल्फ डिस्ट्रक्टिव) परिणति मानते थे। और वह गया भी इसी रास्ते। और जब गया तो भारी क़ज़ऱ् में डूबकर। जिस व्यक्ति ने बेहिसाब दौलत कमायी उसकी यह गति? तो क्या वह मैनिया के मरीज़ों की तरह शाहखर्च भी था?

इस पहेली के अधखुले अर्थों के निहितार्थ गहरे हैं

माइकल जैक्सन एक अबूझ पहेली है। मगर इस पहेली के अधखुले अर्थों के निहितार्थ गहरे हैं और उपयोगी भी। जबर्दस्त ख्याति के बावजूद अपनी पहचान को बदलने और खुशी के अनजान और शायद अस्तित्वहीन टापुओं की तलाश में खुद को तबाह करने वाला माइकल हमारे समय का एक एक एद्भुत शिक्षाप्रद प्रतीक है। हमारे समय के लोग खासकर युवा हेयर स्टाइल, हेयर कलर और बॉडी लैंग्वेज से यूरोपीय या अमेरिकन दिखने की कोशिश करते नज़र आ रहे हैं। कॉस्मेटिक सर्जरी का बाज़ार बढ़ता जा रहा है। बाजार हमें अपनी छवि में खोट ढूंढने के लिए लगातार उकसा रहा है। इसकी वजह से हम ‘जैसे हैं’ उसे स्वीकार न करने का फैशन महामारी की शक़्ल ले रहा है। ‘एक-सा’-पन की तरफ यह सामूहिक दौड़ क्या ख़तरनाक नहीं? क्या आपको नहीं लगता कि माइकल जैक्सन अगर अपनी जड़ों से जुड़ा और कला की उदात्तता मात्र से संतुष्ट होता तो उसका जीवन अधिक समृद्ध होता?

भाषा, कपड़े और विधा को दरकिनार कर माइकल की तुलना बिस्मिल्ला ख़ान या रविशंकर से कर के देखें। मानता हूं कि माइकल की कला विस्फोटक थी। मगर यह भी सोचता हूं कि क्या आग का खेल दिखाने वाले जेब में आग लेकर चलते हैं? क्या माचिस से काम नहीं चल सकता? ऐसे सुर लगाने का क्या मतलब जो जीवन को ही बेसुरा कर दे? दुख होता है कि लगभग 25 हजार मनोचिकित्सकों के महादेश अमेरिका में माइकल को प्लास्टिक सर्जन और नशीली दवाओं के सौदागर तो मिले एक भी मनोचिकित्सक नहीं मिला। अगर मिला होता तो बीसवीं सदी में शुरू हुआ यह सुरीला अफ़साना इक्कीसवीं सदी में अभी और आगे जाता!

vinay kumar

डॉ. विनय कुमार मनोवेद माइंड हॉस्पिटल, पटना में मनोचिकित्सक हैं.  हिंदी साहित्य से लेकर साहित्येत्तर सांस्कृतिक रुचियों तक को बहुत नजदीक से परखते हैं. नॉन फिक्शनल हिंदी की अकाल वेला में अद्भुत चमक के अधिकारी हैं. हाल ही आई पुस्तक ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ से खासे चर्चित. उनसे dr.vinaykr@gmail.com पर संपर्क संभव है. 

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