रात और दिन : जानू नागर

यह स्तम्भ  (घुसपैठिये)दिल्ली और आसपास की कामगार बस्तियों के तरुण-युवा लेखकों की प्रतिनिधि रचनाएं आप तक पहुंचाएगा. ये लेखक और इनका लेखन बने-बनाए खांचों में नहीं समाते. ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के लेखक अभी-अभी जवान हुए हैं या हो रहे हैं. एकाध को छोड़कर इसके सभी संभावित लेखकों की उम्र २0 वर्ष के अंदर ही है। लेकिन इन सब में कुछ सामान्य विशेषताएँ भी हैं. सभी की आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि लगभग समान हैं। इससे भी बड़ी विशेषता यह है कि इनके लिए बचपन की किताबें कागजों से उतनी नहीं बनती हैं जितनी उनके संघर्ष, मोहल्लों, माहौल और जगह से बनती हैं. उनकी लिखाई में वे जगहें आपको सुरक्षित मिलेंगी। आप शायद महसूस करें कि साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकाॅर्डिंग और सृजन, कि़स्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं साहित्य के सुरक्षित-आरक्षित डिब्बे में घुस आये इन घुसपैठियों को आप कैसे बरतेंगे, यह आप ही को तय करना है.

ब्रूनो द्यूमों निर्देशित एक धारावाहिक का दृश्य

ब्रूनो द्यूमों निर्देशित एक धारावाहिक का दृश्य

रात और दिन

By जानू नागर

दिन

12 दिसंबर को सुबह छह बजे से शाम छह बजे तक

सुबह की लीला निराली होती है। इस दौर में भागदौड़ का अपना मजा है। पेपर वाला, दूध वाला मंदिरों की तरफ ही भागता दिखता है। इस भागदौड़ भरी जिंदगी में सामने से गुजर जाने के बाद भी कहते हैं- भाई आपके तो दर्शन दुर्लभ हैं। लोगों की तो पूछो मत, पूजा-आरती करने में इतने मग्न रहते हैं कि जिस प्रतिमा के सामने होते हैं, उसका रूप रंग क्या है? उससे तो बेखबर ही रहते हैं। सुबह के अंधेरे में आए और सुबह के अंधेरे में गुम हो गए। इस लाइन से एक बात याद आती है।

“तुनी-तुनी चंदन पुनि-पुनि पानी, सड़ गए देवता, तब हम जानी।”

इसलिए यह कोई आश्चर्य कि बात नहीं कि सुबह के छः बजे जब एक महिला ने देखा कि मन्दिर में बजरंग बली की मूर्ति चोट खाई और बिखरी होने के साथ ही उसकी एक आँख भी गायब थी। उस महिला ने शोर मचाया, “मन्दिर मे अनर्थ हो गया है।”

महिला की आवाज़ काफी ऊँची और दमदार थी। बार-बार एक ही बात कह रही थी “जिसने बजरंग बली के साथ ऐसा बेहूदा काम किया उसका नाश हो!”

अब यह शोर किसी से छुपा नहीं रहा। कानों में भनक पहुँच ही गई।

“अरे यहाँ ये हो रहा!”

“वहाँ ये हो रहा हैं!”

इन आवाज़ों का अपना एक मजा होता है। बातों को सुनने के लिए कान तो पहले ही खड़े कर लिए जाते हैं। फिर कान कहाँ मानने वाले, वह तो आंखों को भी देखने के लिए कहते “बहन चल देख कर आते हैं। वहाँ किस बात का शोर है?”

महिला की आवाज़ ने कम समय में ही घर से, गली से, लोगों को मन्दिर के सामने सड़क पर जमा कर दिया। भीड़ उमड़ती गई। बात हवा और आग की तरह फैलती गई। सभी अपने-अपने मन मुताबिक बातें बनाते। जिसके दिल में जो गुबार था वही भक से कह देते।

धर्म को विवाद का मुद्दा बनता देख, मुस्लिम समुदाय वाले लोगों के चेहरे पर डर प्रतीत हो रहा था। आक्रोश वाले चेहरे सिर्फ हिन्दुओं के थे। सकुचाए चेहरे मुस्लिमों के थे। कुछ लोग तो उस भीड़ से कट लेना चाहते थे। लेकिन जहाँ दोनों धर्म की मौजूदगी हो वहाँ पर मामला एक तरफा नहीं हो सकता। दोनों धर्मों के बीच में उतार-चढ़ाव का माहौल बनकर बिखर रहा था। एक बात जो सच थी कि बिखरे माहौल को समटने वालों में भी दोनों धर्म के थे।

भीड़ बढ़ती ही जा रही थी, बस बढ़ती ही जा रही थी। अफ़वाहें अपना पैर फैला रही थीं। ऐसा लग रहा था कि अफवाहों में फैलते शब्दों को इस भीड़ ने बांध दिया है। सवालों के जवाब ढूढ़ने की हिम्मत किसी में न थी। हर कोई अपने-अपने परिवेश में छुप जाना चाहता है। किसी के सवाल का जवाब किसी को कहीं गलत रुख में न मोड़ दे!

तभी भीड़ से 100 नम्बर में कॉल हुआ। पुलिस भी हाँफती-भागती, सायरन बजाती भीड़ को चीर कर सावदा के सी ब्लॉक मन्दिर के सामने खड़ी हो गई। पुलिस वालों के तो अपने पुराने रटे-रटाए सवाल होते हैं।

कब टूटी?

तोड़ते हुए किसी को देखा?

कौन हो सकता है?

आप को किसी पर शक है?

पुलिस के इन बेहूदा सवालों को तोड़ते हुए किसी ने कहा की सर सवाल छोड़ो पता करो ये किसका काम है?

हाँ, कान को एक बात समझ में आई। किसी ने पुलिस वाले से कहा की भाई सब कुछ छोड़ो हिन्दू ने तोड़ा या मुस्लिम ने तोड़ा जिसने भी तोड़ा है ग़लत किया है। उसको सजा ऊपर वाला देगा। सभी लोग चंदा मिलाकर नई प्रतिमा ले आते है। भीड़ में शामिल हिन्दू व मुस्लिम दोनों ने हामी भरी। पुलिस को भी हाँ मे हाँ मिलाना पड़ा। मामला शांत हुआ। शोर गुफ्तगू में कहीं थमता चला जा रहा था। भीड़ बादलों की तरह बरसने के बाद छंट रही थी।

अब मन्दिर मस्जिद के लिए कमिटी बननी चाहिए ताकि दोबारा से इस तरह की कोई घटना न घटे। बातचीत से साफ हो चला था कि शाम को पंचायत बैठाई जाए। चंदा अभी के अभी वसूला जाए, दस-बीस लोग पुलिस के साथ मिलकर घर-घर जाकर चंदा इकट्ठा किया। दोपहर तक मूर्ति भर के लिए चंदा जमा हो गया।

शाम को पंचायत ने फैसला लिया कि जब मूर्ति चंदे से आ रही हैं, तो फालतू मुद्दा बढ़ाने से कोई फायदा नहीं है। गलती तो कमिटी की है। मन्दिर में कोई न कोई पुरोहित होना चाहिए। सारी बातों को यहीं दफन किया जाये।

ठंडे कुहासे ने आज कालोनी को पूरी तरह से घेर रखा था। ठंड हवाएँ लोगों को आग के पास भेजने का काम कर रही थी। शाम का बुढ़ा सूरज कोहरे को चीरने की कोशिश कर रहा था।

’’’’’’

11 दिसंबर शाम 6 बजे से 12 दिसंबर सुबह 4 बजे तक

रात

काम के वक्त मालिक से थोड़ी अनबन हो गई थी और यह सोच कर कि ईटों के टेढ़ेपन को कब तक सीधा करता रहूँगा, करनी-बसूली के साथ-साथ साहूल व सफ़ेद लम्बे धागे को पटक दिया। उसने मुझे झटके में 200 रुपए दिये थे। वह काफी गरम था। उसकी गर्मी से मुझे क्या लेना देना?

‘‘मालिक-मालिक…’’, मालिक शब्द सुनकर दिल-दिमाग दोनों ही पाक गए थे। साथ काम करने वाले लेबरों की छुट्टी कर दी थी। अपने हाथ-पैरों के साथ मुँह मे लगी सीमेंट-बालू के पाउडर को पानी से धो लिया। अपना काम वाला कुर्ता उतार गुलाबी फुल बाजू वाली कमीज को धारण किया, जूते वही पहने रहा जो मुलायम रबड़ के बने थे।

एक लेबर ने सारे औजारों को साफ करके एक बोरी मे भरकर कल के काम के लिए तैयार कर दिया था। लेबर अपनी घर की ओर निकल लिए थे, कुछ अपनी साईकिल से तो कुछ पैदल। मैंने भी अपनी साईकिल उठाई और पैडल घूमाने लगा। दिमाग में एक ही बात का सुरूर था कि आज जी भर कर पिऊँगा। साईकिल सड़क पर दौड़ रही थी और दिमाग कहीं और चल रहा था। ख्यालों में खोया ही था कि एक कार वाले ने सामने से टक्कर मार गिरा दिया। जब तक मैं संभलता वह पहले ही कहने लगा कि “साले मरने चले आते हैं। घर में कोई इंतजार करने वाला है भी कि नहीं।” उसकी इस बात ने मेरे कलेजे को और भी जला दिया। उसका जाना और मेरा खड़ा होना एक साथ हुआ।

साईकिल का हैंडल काफी मुड़ गया था। अगले पहिये को पैरों के बीच में फंसा कर हाथों की ताकत से सीधा किया और पहले की तरह फिर से उसपर चढ़ लिया। ठंडी हवाएँ कानों में कुछ कह रही थीं। मैंने भी कह दिया कि “आज मेरे दिमाग को मत उलझाओ, बस आधे घण्टे की बात है। तुझको भी सबक सीखा दूँगा।” साईकिल भाग रही थी और मै गहरी-गहरी सांसें ले रहा था या कह लो कि हाँफ रहा था।

टेंशन से माथे पर पसीना फूट आया था। कॉलोनी नजदीक आ गई थी। मुझे आज किसी से कुछ नहीं कहना था। घर के सामने साईकिल को उसी तरह से गिराया जिस तरह साले कार वाले ने गिराया था। इस बार मैं नहीं गिरा, गिरी साईकिल को उठाया भी नहीं, बस उसमें ताला मार चाभी को कमरे के लटकते पर्दे के पीछे फेंक कर आगे बढ़ गया था। पीछे से बप्पा ने आवाज दी, “कहाँ को जा रहा है?” “कहू नहीं आउत हैं”, बिना पीछे मुड़े उत्तर दिया। “जल्दी ने आ जइयो। खाना बन गौ हैं।” लेकिन मैं बिना आवाज दिये बढ़ता गया।

जो भी जान-पहचान का मिलता उन सब को राम-राम करता हुआ आगे बढ़ता गया। पक्की सड़क को पार करते वक्त एक बाईक वाले ने टक्कर मारते-मारते छोड़ा। वह भी उल्टा ही कहने लगा कि “मरने को जी चाहता है क्या?” वह मेरे पड़ोस का ही लड़का था इसीलिए कुछ नहीं कहा।

एक गली नहीं दो गली नहीं तीसरी गली के सामने रुक गया। वहाँ पर ग्राहको का इंतजार करती औरत ने पूछा, “क्या चाहिए?” मैंने मज़ाक में कहा, “क्या दोगी?” वह थोड़े रूखे स्वर में बोली, “काम बता वरना आगे निकल, धन्धे का टाईम है। मज़ाक करना है तो सुबह आना।” “अरे! सुबह किसने देखी है? जरा अंगूर वाली बोतल दे दो।” वह हल्की मुस्कान साधते हुई चबूतरे के ऊपर से पैसे मांगी। कमीज के ऊपर वाले खिसा से पैसे निकाल कर थमा दिया।

वह शाशी थी, जो शराब का धन्धा करती है। बहुत कड़े स्वभाव वाली है। अगर कुछ भी उल्टा सीधा बोला तो सारा राशन-पानी लेकर ऊपर चढ़ जाती है। बस एक ही बात बोलती है, “भडुये जाता है या अभी सिखाऊँ तमीज, बोतल ले और आगे निकल ले।” अपनी दोनों बोतलों को कमर में खोस कर पंसारी की दुकान की तरफ बढ़ चला।

मेरी आदत नून चाट कर शराब पीने की नहीं है। नमकीन व सलाद के साथ ही पीता हूँ। परचून की दुकान की तरफ गया और वहाँ से एक गिलास, साथ में हल्दीराम की कड़क आलू भुजिया वाली नमकीन पैंट के खीसा मे भरकर पार्क की तरफ बढ़ गया। पार्क में कुछ समझ नहीं आया, वहाँ गंदगी भी बहुत थी तो यह सोचकर कि पीने में मजा नहीं आएगा नाई की दुकान की तरफ गया। दुकान तो बंद थी लेकिन उसके सामने लकड़ी का एक टूटा हुआ तख्त पड़ा था। उसी के ऊपर दोनों बोतल निकाल कर रख दिया।

ठंड में पानी की क्या जरूरत? शराब को नीट ही गिलास में पलटना शुरू किया। थोड़ी-थोड़ी नमकीन के साथ पैक पर पैक मारने लगा। खड़े-खड़े पैर भर आए थे सो वहीं बैठ गया। कई एक पैक पी गया पर साला नशा चढ़ ही नहीं रहा था। पर हाँ, सड़क के किनारे बैठकर पीने का अपना ही एक मजा है। एक बोतल खत्म हो चुकी थी, हल्का-हल्का सुरूर ठंडी हवा की वजह से होने लगा था। नमकीन मुँह का स्वाद बदल रही थी। पहली खाली बोतल को वहीं पटक दिया। वह उछल गई लेकिन फूटी नहीं। ओ हो ये काँच वाली नहीं प्लास्टिक वाली थी। दूसरी पर नंबर लगा दिया। एक दो हल्के हल्के पैक लेने के बाद सर चकराया, माथा घुमने लगा।

अब तो सब कुछ याद आने लगा था, जो कुछ भी हुआ था सब नज़रों के सामने घूमने लगा। माँ और भाई के मर जाने का गम, उनका चेहरा सामने आते ही एक पैक और लिया। सोचा तो आँखों में आँसू आ गए। काफी वक्त तक अपने बारे में सोचता रहा, नजर उठा कर आसमान की तरफ देखा तो चाँद-तारे मुँह चिढ़ा रहे थे। चल छोड़ यार, दारु पी, उनकी क्या मिसाल? अपने मन को समझाते हुए बोला कि “मेरी भी कोई जिंदगी है!” अब जो भी पैक बनता बहुत भारी लगता। “यह तख़्त अब मेरा, सिर्फ मेरा है। किसी के बाप में भी दम नहीं कि कोई आ कर यह कहे कि तख़्त मेरा है।” नमकीन पता नहीं किधर गिर गई। गिलास भी साला टेढ़ा दिखने लगा, लबों की तरफ ले जाता तो साला नाक की तरफ चला आता। अब बाकी की शराब को बोतल से ही गट-गट पीने लगा।

ठंड का असर अब मुझमें नहीं रहा, हवा को बार-बार अपनी मुट्ठी मे पकड़ता, बंधी मुट्ठी को सीने में ठोकता हुआ हवा से कहता, “आ… आ दम है तो घुस मेरे सीने में”, वह भी डर गई साली। अब तक कमीज की दो चार बटनें खुल गई थीं। कुहासा भी साला हीरो बन रहा था। उसके भी गालों पर दो चार थप्पड़ हवा में जमा दिया। सामने खड़ा कुत्ता भी शेर लग रहा था। उससे कहा, “आ मेरे बेटे, मेरे पास आ”, वह भी कमीना था हाथ चाट कर भाग गया। मैं भी चाटने के लिए खड़ा हुआ और तख़्त पर गिर गया, फिर संभला तो पैर स्प्रिंग की तरह हिल रहे थे।

कार वाले को जी भर कर गालियाँ दी। “अब अगर वह मुझे टक्कर मारे तो साले को कार से बाहर निकाल कर उसके सीने पर अपनी साईकिल चढ़ा दूँ। साला भाग गया नहीं तो बताता कि कौन मरने आया है!” जिसका घर बना रहा था उसकी तो “माँ की…..” जो न कहना था वह बकता रहा। अब तो न जाने कहाँ से ताकत आन पड़ी थी शरीर में। तखत को खड़ा कर दो चार लात उसको भी मारा। “साला पीते वक्त हिल रहा था।” किसी ने कहा, “अब घर चला जा बहुत पी लिया है।” “घर-घर, घर-वर मुझे नहीं जाना और अबे तू कौन होता है? साले तूझे भेजूं क्या? भाग जा नहीं तो बहुत मारूँगा।”

लम्बा भारी शरीर झुकने लगा था फिर भी सड़क पर चढ़ आया था। अब तो मैं कालोनी का डॉन था। “साला कोई भी बोला तो उसका मर्डर कर दूँगा। अगर भगवान भी आ जाए तो दो चार हाथ कर लूँ। उसने मुझे दिया भी क्या है, गम के सिवा? माँ व भाई को छीन लिया। मुझे भी कई बार मारने की कोशिश किया। मुझको मारेगा, अगर मिल गया तो आज उसकी खैर नहीं।” बोतल भी हाथ से छूट चुकी थी।

लड़खड़ाते कदम ऊँची सड़क की तरफ बढ़ चले थे। डगमगा तो इस तरह से रहा था, जैसे स्टेज मे नाचने वाली नाचती है। कैसे कमर हिला-हिला कर ठूमका मारती है। मै भी सकीरा से कम नहीं था। यह सोच काफी तेज हंसा और हंसता ही गया…….। फिर किसी ने कहा कि “पीकर पागल हो रहा है।” “जा-जा पागल खुद होगा। मुझे पागल बता रहा है! पागल तू होगा मै नहीं, अपनी पी रहा हूँ। तेरे बाप की नहीं। अपनी कमाई की पी रहा हूँ। भाग जा साले नहीं तो बहुत मारूँगा, मार-मार कर भूत बना दूँगा।” अभी कदम उसी जगह हिल रहे थे।

सड़क पर खड़े खम्भे की मर्करी जल रही थी। उसको जलता देख मैं भी जल गया। एक पत्थर उठा कर मारा वह भी वहाँ न जाकर मेरे ही पैरों के पास गिरा। “साला पत्थर में भी दम नहीं, यहीं पर गिर गया।” रात में कोई और रंग दिखाई नहीं दे रहा था सिर्फ काले के सिवा। लेकिन उसे छोड़ दिया क्योंकि काले तो मेरे दोस्त को भी कहते हैं।

सामने एक छोटा सा मन्दिर था। मन्दिर को देख लगा कि भगवान यहीं होगा। बजरंग बली की मूर्ति के सामने पहुँच गया। काफी तेज हंसा, “ये भगवान, नहीं ये भगवान नहीं, भगवान का भक्त है। और मैं भी भक्त हूँ देवी माँ का। आज दोनों भक्तों की लड़ाई होगी। देखता हूँ कौन जीतता है?” वह बहुत मुस्करा रहा था। वहीं बगल मे पड़े बाँस के डंडे को उठा कर झगड़ा शुरू कर दिया। भक्त को बहुत मारा।

मारता भी कहाँ उसके फुले गालों व गदे पर। मारते वक्त सिर्फ इतना कह पा रहा था। “उठा अपना गदा और दिखा अपनी ताकत…” कहता रहा और पीटता रहा। गदा टूट गया और क्या टूटा। मुझे याद नहीं। बगल मे खड़ी माँ मुस्करा रही थी।

उसी बाँस के डंडे को पटकता हुआ आगे बढ़ता गया। मुझसे जो टक्कर लेगा उसकी खैर नहीं, सड़क पर चीखता-चिल्लाता अपनी घर वाली गली में आगे बढ़ता गया।

समाप्त

???????????????????????????????जानू नागर- जन्म 1985 , बड़ागाँव, मछरिहा, फतेहपुर उत्तर प्रदेश. शिक्षा- इंटरमीडिएट. नांगला माँची, दिल्ली लैब में 2005 से जुड़े. उसी दौरान नांगला माँची का एक ऑडियो आर्काइव बनाया. नांगला विस्थापन के बाद भी लैब से जुड़े रहे. अंकुर के नियमित संवादक हैं.

साभार: हंस, मार्च, 2015

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