रजनी कोठारी और भारतीय लोकतंत्र: चंदन श्रीवास्तव

रजनी कोठारी : भारतीय लोकतंत्र का पहला पन्ना

By चंदन श्रीवास्तव

दिल्ली विश्वविद्यालय के कंधे पर किसी तिल की तरह चमकता एक संस्थान है विकासशील समाज अध्ययन पीठ यानि सीएसडीएस। यों अकादमिक संस्थानों के नाम और काम में इस देश का आम आदमी खास दिलचस्पी नहीं रखता, और उसे रखना भी क्यों चाहिए। आखिर, अकदामिक संस्थान कोई सरकार तो हैं नहीं कि उसकी जिंदगी के रोजमर्रे को निर्णायक ढंग से प्रभावित करते हों। लेकिन, सीएसडीएस इस मामले में एक अपवाद की तरह है। इस देश का आदमी चाहे और किसी बात में रुचि ना रखे लेकिन बात चुनावों की हो तो वह इसकी चर्चा चटखारे लेकर करता और सुनता है। और बेखटके कहा जा सकता है कि भारत में चलने वाली चुनावी-चर्चा को उसका मुहावरा या कह लें एक पारिभाषिक शब्दकोश देने का काम सीएसडीएस ने किया है।

Source: Illustrated by C R Sasikumar

Source: Illustrated by C R Sasikumar

पार्टियों की हार-जीत आंकड़ा कितनी सीटों तक पहुंचेगा , मतदान का प्रतिशत अगर घटा तो क्यों और बढ़ा तो क्यों, किसी पार्टी को मिले वोटों का प्रतिशत ज्यादा होने के बावजूद उसके सीटों की संख्या क्यों कम रह गई और पार्टियों के बदलते जातिगत-वर्गगत आधार ने वोटों के स्विंग का किसी चुनाव में कैसा खेल खेला- अगर हम चुनावों की चर्चा कुछ ऐसे ही मुहावरों में करते हैं तो इसलिए कि सीएसडीएस ने बीते पचास सालों से भारत में इलेक्शन स्टडी को ना सिर्फ विधागत रुप दिया है बल्कि उसे भारत की राजनीतिक सच्चाइयों को दिखाने वाले एक आईने के रुप में भी स्थापित किया है। आज अगर इलेक्शन स्टडी एक शास्त्र है और इस शास्त्र में अपना-अपना जोर दिखाने वाले खूब सारे ‘शास्त्री’ हैं तो इसलिए कि कभी सीएसडीएस में ही इस विधा का व्याकरण रचा गया था। तो आखिर किसने रचा था यह व्याकरण?

बात आज से तकरीबन पचपन साल पहले की है। तब 1928 में जन्मा का एक नौजवान, जो स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सेदार था और रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह (1946) में शिरकत करने के कारण अंग्रेजी-जेल की हवा खा चुका था, सत्ताईस-अट्ठाईस की उम्र में लंदन स्कूल ऑव इकॉनिमिक्स से अर्थशास्त्र की डिग्री लेकर भारत लौटा और एम एस यूनिवर्सिटी वडोदरा में शिक्षक नियुक्त हुआ। वह दौर शिक्षण संस्थानों से लेकर बहस-मुबाहिसे की सार्वजनिक दुनिया तक अर्थशास्त्र के ही दबदबे का दौर था। राजनीति में मान लिया गया था कि देश की सारी समस्याओं का समाधान सही आर्थिक-मॉडल अपनाने से हो सकता है और इसी के अनुरुप तत्कालीन राजनीति अपना भरोसा पंचवर्षीय योजनाओं पर जता रही थी, राष्ट्र-निर्माण के इस दौर में जोर साइंटिफिक टेम्परामेंट के अनुकूल हरकुछ को साईंस में तब्दील करने का था और विश्वविद्यालयों के समाज-विज्ञान के विभाग एडम स्मिथ, रिकार्डो और कार्ल मार्क्स के अर्थशास्त्रीय चश्मे से सारा कुछ देखने-समझने की कोशिश में लगे थे।

वडोदरा में रहते कांग्रेस की स्थानीय राजनीति को इस नौजवान ने गौर से देखा और उसे लगा कि विश्वविद्यालयों में जैसा राजनीति-विज्ञान पढ़ाया जा रहा है, उसके किसी भी सिद्धांत से ना तो इस देश में कांग्रेस के राजनीतिक वर्चस्व की व्याख्या हो सकती है और ना ही कांग्रेस के भीतर चलने वाली उस खींच-तान की जो उसे पार्टी से ज्यादा अलग-अलग हित-समूहों के लोकतांत्रिक संघर्ष का एक प्लेटफार्म बनाती हैं। अपने इस अनुभव को इस नौजवान ने एक लेख का रुप दिया और यह लेख छपा तब के इकॉनॉमिक वीकली( अब इसका नाम इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली है) में। लेख का शीर्षक था- ‘फार्मस् एंड सब्सटांस ऑव इंडियन पॉलिटिक्स’ यानि भारतीय राजनीति का रुप और अंतर्वस्तु। यह लेख एक लेखमाला में तब्दील होकर पत्रिका के अगले पाँच अंकों तक जारी रहा और इस लेखमाला ने सनसनी मचायी। पंचायती राज, संसदीय व्यवस्था, प्रशासनिक राजनीति, दलीय-व्यवस्था ही नहीं भारतीय लोकतंत्र की दशा और दिशा जैसे शीर्षकों से सोचने वाले लोगों के लिए यह लेख-माला नए सिरे से प्रश्नों को तय करने और उत्तर तलाशने की जमीन साबित हुई। लेख ने तब के समाज-विज्ञानियों का ही नहीं जयप्रकाश नारायण और अशोक मेहता सरीखे राजनेताओं का भी ध्यान खींचा और भारत की राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले पश्चिमी मुल्क के विद्वानों का भी। ऐसे ही एक अमेरिकी विद्वान रिचर्ड पार्क ने अपने एशिया फाऊंडेशन की तरफ से इस नौजवान को सत्तर हजार रुपये दिए यह कहकर कि अपना शोध जारी रखो। लेख साल 1961 में छपा था और अगले दो सालों में इस नौजवान ने रिचर्ड पार्क के दिए इन सत्तर हजार रुपयों को समाज-विज्ञान के क्षेत्र में शोध करने वाली श्रेष्ठ संस्था यानि सीएसडीएस के रुप में तब्दील कर दिया। इस नौजवान का नाम था रजनी कोठारी और सीएसडीएस सरीखी संस्था कायम करने वाले रजनी कोठारी की उम्र तब महज 33 साल की थी।

33 साल की उम्र में एक अकादमिक संस्था की नींव रखने का साहस रजनी कोठारी के भीतर किस आशय से जन्मा होगा ? यह बात सही है कि सेंटर का मुख्य सरोकार शुरुआती दिनों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को समझने का रहा। यह बात भी सच है कि शुरुआती दिनों में कोठारी किसी उदारवादी की तरह पश्चिमी लोकतंत्र को बहुत अच्छा समझते थे लेकिन उस दौर में ही ये बात साफ हो गई थी कि सेंटर में कार्यरत समाज विज्ञानी आधुनिकीकरण की किसी बंधी-बंधायी परिभाषा से संतुष्ट नहीं है। वे लोग अपने लेखन में ‘विकास’, ‘राष्ट्र-निर्माण’ और ‘सामाजिक परिवर्तन’ जैसे पदों का प्रयोग करते थे लेकिन उनके जेहन में यह बात कौंध रही थी कि एक समाज-विज्ञानी के रुप में उनका काम अमेरिकी विहेवियरलिज्म को भारतीय संदर्भ में अनूदित करना मात्र नहीं है बल्कि भारतीय समाज की अपनी विशेषताओं को समझने के लिए अवधारणा और पद्धति के स्तर पर उचित औजार तलाशने जरुरी हैं। रजनी कोठारी के ही शब्दों में कहें तो – “आर्थिक मॉडल को केंद्रीय मान लेने के कारण उस वक्त ज्ञान के विविध अनुशासनों की सीमाएं धुंधली पड़ रही थीं। अर्थशास्त्र के बर्चस्व ने ज्ञान का एक पदानुक्रम रच दिया था और किसी सामाजिक परिघटना को समझने के लिए किए जाने वाले अनुसंधान के तरीकों पर भी उसका गहरा असर था। मिसाल के लिए, किसी समाज के अजेंडे, मुद्दे और सरोकारों को गढ़ने में राजनीति की भूमिका को दरकिनार करते हुए, सिर्फ तवज्जो आर्थिक गतिविधियों को दी जाती थी। ” और ठीक इसी कारण रजनी कोठारी को लगा कि “ज्ञान के मौजूदा तौर-तरीकों को आलोचना की नजर से देखना जरुरी है।”

रजनी कोठारी की अगुवाई में सीएसडीएस ने आधुनिक भारत को भारतीय पदों में समझना शुरु किया। बौद्धिक और सांस्कृतिक आत्मविश्वास से भरा रजनी कोठारी का माथा इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था कि आधुनिकता भारत में यूरोप से लाकर रोपी गई कोई चीज है। रजनी कोठारी ने अपने बौद्धिक उपक्रम से आधुनिक भारत को परिभाषित करने वाली तत्कालीन पूर्व-सहमतियों का आधार ही बदल दिया। रजनी कोठारी से पहले भारतीय लोकतंत्र को यूरोपीय देशों में विकसित लोकतंत्र का असहज विस्तार मानने की प्रवृति थी। कुछ ऐसे भी थे जो इस धारणा की काट में यह कह रहे थे कि भारतीय लोकतंत्र एकदम ही अनूठी परिघटना है। इन दो प्रवृतियों से अलग रजनी कोठारी ने साबित किया कि भारतीय समाज का राजनीतिकरण समान रुप से उसके आधुनिकीकरण की परियोजना है। लोकतंत्र नाम की परिघटना हर देश की परिस्थिति के अनुरुप नया रुप लेती है, और उसके नए रुप की किसी और जगह के लोकतंत्र से तुलना तो की जा सकती है ताकि दोनों परस्पर एक-दूसरे के अनुभवों से समृद्ध हो सकें लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि दुनिया में हर जगह लोकतंत्र का स्वरुप एक जैसा होना चाहिए और जहां नहीं है, वहां का लोकतंत्र दोषपूर्ण है। इसी सिलसिले में रजनी कोठारी ने भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका को एक नए सिरे से देखना सिखाया, उसे हित-समूह माना ना कि भारतीय लोकतंत्र के पिछडेपन की पहचान और पूरे विश्वासपूर्वक यह साबित किया कि भारतीय राजनीति में जाति-व्यवहार परंपरागत वर्ण-व्यवहार से अलग हितगत प्रतिस्पर्धा का व्यवहार है। इस दौर की उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें पॉलिटिक्स इन इंडिया(1970) और कास्ट इन इंडियन पॉलिटिक्स(1973) हैं।

कोठारी की इस सोच ने बौद्धिक जगत में भारी उलट-फेर पैदा किया। वामधड़े के बुद्धिजीवी मानते थे कि सर्वे रिसर्च के नाम पर रजनी कोठारी अपना एक अलग ही अजेंडा बढ़ाने में लगे हैं और नये विचारों के विरोधी हैं। सेंटर चूंकि भारतीय राजनीति के अनुभवगम्य साक्ष्य जुटाने की कोशिश में अपने सर्वेक्षण करता था, सो मार्क्सवादी चिन्तकों में कुछेक को यह बात अटपटी लगती थी।उनकी विचार-योजना में ‘पार्टी’ भारत में क्रांति की अगुआ थी और इसलिए लोगों के विचार, सोच, राजनीतिक पसंद-नापसंद को जानने की खास जरुरत नहीं। दूसरे, कोठारी को यह भी लगता था कि 1960 के दशक में बहुत से मार्क्सवादी बुद्धिजीवी पश्चिम को राजनीतिक और बौद्धिक नवाचार की जन्मभूमि के रुप में देखते थे। तब के दौर में मार्क्सवादी खेमे के बुद्धिजीवियों की सोच में था कि पश्चिम में लोकतंत्र, उदारवाद या फिर मार्क्सवाद का जो अनुभव रहा है, भारत जैसे समाजों को ठीक वैसे ही अनुभवों की नकल करनी चाहिए ताकि एक भारतीय क्रांति की संभावना के बारे में सोचा जा सके। इसी के अनुकूल हाब्स, लॉक और मार्क्स पर राजनीतिक चिन्तन में जोर था। ऐसे बुद्धिजीवियों की सैद्धांतिक बहसों में चुनाव और उससे जुड़े सर्वे पर आधारित निष्कर्ष एकदम से मायने नहीं रखते थे।जबकि सर्वे का उद्देश्य भारतीय यथार्थ की जटिलता की व्याख्या करना था।शब्द के परंपरागत अर्थों में कोठारी राष्ट्रवादी कत्तई ना थे और ना ही पश्चिमी राजनीतिक चिन्तन से पूरी तरह संतुष्ट। वे भारत में राजनीति की भूमिका का अध्ययन करना चाहते थे। चूंकि उनपर विचारधारा का कोई दबाव नहीं था इसलिए वे पश्चिम की आँख से भारतीय राजनीतिक यथार्थ को देखने वाले बुद्धिजीवियों के तर्कदोष देख सके।

भारतीय लोकतंत्र की अपनी समझ को वे आगे और विस्तार दे पायें इसके पहले ही देश के मानस को झकझोर देने वाली घटना घटी। देश में आपात्काल लागू हुआ और रजनी कोठारी के भीतर का डेमोक्रेट एकबारगी स्तब्ध रह गया। उन्होंने अपनी स्थापनाओं पर पुनर्विचार का साहस दिखाया और ‘स्टेट अगेन्स्ट डेमोक्रेसी’ लिखकर भारतीय राजसत्ता के लोकतंत्र-रोधी तत्वों की एक तरह से समीक्षा प्रस्तुत की। गैर-दलीय जिस राजनीति को आज हम जन-आंदोलन और नागरिक संगठनों की राजनीतिक सक्रियता के नाम से जानते हैं उस राजनीति का व्याकरण रजनी कोठारी ने ही तैयार किया। 1970 के दशक में सेंटर राजसत्ता के विरोध की पुरजोर आवाज बनकर उभरा। राजनेता, जन-आंदोलनों से जुड़े लोग, पत्रकार, वकील, बुद्धिजीवी तथा विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े लोग इंदिरा गांधी की ‘इमर्जेंसी’ के विरोध में एकजुट हुए। सेंटर ने इन लोगों को एक प्लेटफार्म प्रदान किया और लोकतंत्र पर जारी बहस का नये सिरे से बौद्धिक दिशा-निर्देशन किया। ‘सेंटर’ ने अब तक अपने को इलेक्शन स्टडी तक ही सीमित रखा था लेकिन अब सेंटर ने चुनाव प्रक्रिया को जमीन पर चलने वाली विचार-प्रक्रियाओं से जोड़कर देखना शुरु किया। कार्यकर्ता और बुद्धिजीवियों के आपसी संवाद का परिणाम ‘लोकायन’ के रुप में सामने आया। मुबाहिसे के मंच के रुप में ‘लोकायन’ देश में सक्रिय नागरिक-सगठनों की नर्सरी साबित हुआ। आज जिन्हें हम सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता के रुप में पहचानते हैं जैसे मेधा पाटकर और वंदना शिवा, वे सब कभी लोकायन के सक्रिय सदस्य थे और वहीं उन्हें अपनी वैकल्पिक राजनीति के बुनियादी मुहावरे मिले।

संक्षेप में कहें तो रजनी कोठारी ज्ञान और कर्म के बीच की दूरी पाटने वाले उन विरली प्रतिभाओं में से एक थे जिनके लिए अंतिम जन का अधिकार लोकतंत्र की परीक्षा की अंतिम कसौटी है और जो स्वयं इस कसौटी पर खड़ा उतरने के लिए सीधी राजनीतिक भागीदारी करने से कभी गुरेज नहीं करते। खुद उन्हीं के शब्दों में- “ विचारों का जगत और राजनीति का जगत आपसे में संबद्ध हैं और एक-दूसरे पर असर डालते हैं। मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था की समीक्षा करने और उसकी समझ बनाने के लिए बुद्धिजीवियों को चाहिए कि वे राजनीतिक प्रक्रियाओं के महत्व को समझें। साथ ही राजनीति के क्षेत्र में जो लोग सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं उन्हें भी विचारों का महत्व समझना चाहिए। मुखामुखम की इस प्रक्रिया में मेरा विश्वास है कि हाब्स, लॉक, मिल और मार्क्स जैसे महान चिन्तकों के राजनीतिक विचार ही प्रासंगिक नहीं होते बल्कि विचारधारा का सवाल भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ-बिन्दु बनकर उठ खड़ा होता है। बहरहाल मेरे विचार से बुद्धिजीवियों का काम महज विभिन्न स्तरों पर राजनीति द्वारा निभायी जा रही निर्णायक भूमिका का अध्ययन करना भर नहीं होता बल्कि उन्हें मौजूदा राजनीति की आलोचना भी विकसित करनी पड़ती है। मेरा यह भी कहना है कि बुद्धिजीवी को बहस में अपने आलोचनात्मक विचारों के जरिए योगदान देते हुए राजनीतिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना चाहिए। मेरा यह भी विश्वास है कि हमारी सोच में आत्मसमीक्षा और आलोचना का स्थान होना चाहिए। यदि हम आलोचना का स्पेस बंद करते हैं तो राजनीतिक प्रक्रिया और विचार का अंतराल बढ़ता जाएगा। यह एक बुद्धिजीवी के रुप में हमारी भूमिका को सीमित करेगा। ”

भारतीय लोकतंत्र की समझ और शक्ति को अपने विचार और काम से कोसो आगे ले जाने वाले रजनी कोठारी एक समय से उम्र के हाथो मजबूर थे। उनकी बनायी संस्था जब अपने नये अवतार में स्वर्ण-जयंती वर्ष मना रही थी तो लोगों ने उन्हें व्हील-चेयर पर चलते देखा था, भीड़ में एकदम ही अकेला। बरसो बीमार रहने के कारण आवाज इतनी मद्धम हो गई थी कि बात करना हो तो अपने कान उनके चेहरे के पास ले जाना पड़ता था। कभी आने-जाने वाले की भीड़ से भरा रहने वाला उनका दिल्ली वाला मकान लगातार सूना रहने लगा था। वे एक केयरटेकर के भरोसे थे। केयरटेकर खूब देखभाल करता था लेकिन यह भी सच है कि उसे कहीं बाहर जाना हो तो वह सुरक्षा के लिहाज से घर का दरवाजा बाहर से बंद करके जाता था और व्हीलचेयर पर बैठे रजनी कोठारी अपनी शांत-मुद्रा में उसके आने का इंतजार करते रहते थे। बाहर देश में लोकतंत्र का संघर्ष जल-जंगल-जमीन के आंदोलन के रुप में सतत जारी था लेकिन इस संघर्ष को सबसे पहले और सबसे गहरे अर्थों में समझने वाला उम्र के हाथो बेबस अपने कमरे में अकेला अब चुप बैठा रहता था।

ज्ञान को कर्म से जोड़ने वाला भारतीय राजनीति का यह सितारा आज नहीं है तो भी आंदोलनों से जन्मी एक नई-नई पार्टी उसके विचार-सरणि में नये शब्द भरकर दिल्ली विधान सभा का चुनाव लड़ा और जीता है। कौन जानता है, शायद यही रजनी कोठारी की आखिरी इच्छा हो।

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

साभार- हंस (मार्च, २०१५ अंक)

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One thought on “रजनी कोठारी और भारतीय लोकतंत्र: चंदन श्रीवास्तव

  1. Priyaamvad on said:

    बहुत सारी जानकारियों से भरा हुआ शानदार आलेख….

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