चिड़ियों की उड़ान में एक चिट्ठी: लख्मी चंद कोहली

यह स्तम्भ  (घुसपैठिये)दिल्ली और आसपास की कामगार बस्तियों के तरुण-युवा लेखकों की प्रतिनिधि रचनाएं आप तक पहुंचाएगा. ये लेखक और इनका लेखन बने-बनाए खांचों में नहीं समाते. ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के लेखक अभी-अभी जवान हुए हैं या हो रहे हैं. एकाध को छोड़कर इसके सभी संभावित लेखकों की उम्र २0 वर्ष के अंदर ही है। लेकिन इन सब में कुछ सामान्य विशेषताएँ भी हैं. सभी की आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि लगभग समान हैं। इससे भी बड़ी विशेषता यह है कि इनके लिए बचपन की किताबें कागजों से उतनी नहीं बनती हैं जितनी उनके संघर्ष, मोहल्लों, माहौल और जगह से बनती हैं. उनकी लिखाई में वे जगहें आपको सुरक्षित मिलेंगी। आप शायद महसूस करें कि साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकाॅर्डिंग और सृजन, कि़स्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं साहित्य के सुरक्षित-आरक्षित डिब्बे में घुस आये इन घुसपैठियों को आप कैसे बरतेंगे, यह आप ही को तय करना है.

प्यास और पानी, सौजन्य: अंकुर

प्यास और पानी, सौजन्य: अंकुर

लिखने वाली चिट्ठी

पढ़ने वाली चिट्ठी

By  लख्मी चंद कोहली

पिछले साल जो बस्ती तोड़ी गई तो कई ज़िंदगियां और रोजगार जैसे धराशायी हो गये। सुल्तान भाई का भी किताबों पर जिल्द चढ़ाने का काम बंद हो गया। उर्दू मे लिखी कहानियाँ और आयतों को मजबूत जिल्द देना और उन्हें पढ़ना सुल्तान भाई के जीवन का एक खूबसूरत मकसद बन गया था। अब सड़क के किनारे, जहां पर कभी वो अपना खाली वक्त बिताया करते थे, वहीं पर रेहड़ी लगा ली। कचोरियों को गरम आलू की सब्जी के साथ बेचने की।

जगह ऐसी थी कि रेहड़ी लगाने से पहले सड़क को झाड़ू मारते वक्त अक्सर उन्हे रेहड़ी के नीचे और आसपास कुछ पड़ा मिल ही जाता। उसे वो रख लिया करते थे। ऐसी ही चीज़ों से उनका घर भरा पड़ा था। कभी पर्स तो कभी कोई फॉर्म या कोई किताब। एक बार तो उन्हें किसी की डायरी ही मिल गई थी। उसपर अनेकों टेलीफोन नंबर लिखे हुये थे। उन्हीं नम्बरों पर फ़ोन कर करके उन्होनें उस आदमी को घर बुला लिया था जिसकी वो डायरी थी।

अभी रेहड़ी जमाने के लिए सड़क को साफ कर ही रहे थे कि उन्हें कुछ पन्ने मिल गए जिनको पूरा का पूरा टेप लपेटे हुए था। खोल कर देखने के लिये सुल्तान भाई का मन उनकी तरफ मे खींच गया। चार पन्नों का पूरा चिट्ठा था जिसे स्टेपलर से एक कोने में जोड़ा गया था और ऊपर से टेप लगा दी गयी थी। कागज के पन्नो पर सुल्तान भाई अपनी निगाह मार चुके थे। तारीख उसपर दो साल पुरानी थी। बीच–बीच में छेदों से भरा हुआ था। स्याही फैल चुकी थी। कुछ – कुछ जगह से तो मिटा-सा भी महसूस हो रहा था लेकिन पढ़ने वाले को कोई परेशानी होगी नहीं, ऐसा वे अन्दाज़ लगा रहे थे। तीसरा पन्ना तो एक दम सफेद था, शायद अलग से जोड़ा गया होगा, मगर सबसे आगे और सबसे पीछे के पन्ने की हालत बहुत ही ज्यादा खस्ता हो चुकी थी।

लगता ही नहीं कि कभी किसी ने इसे पढ़ा भी होगा, यह तो छोड़ो, आज से पहले शायद इसे खोला तक भी नहीं गया होगा। यह भी हो सकता है कि पढ़ने वाले ने पढ़ने के बाद टेप लगाई हो। जो भी हो, लेकिन किसी के दिल की बात होगी इसमें। वे यही सब सोचने में लग गये थे।

ख़त देवनागरी में लिखे गए थे जिनको पढ़ना उनके बस के बाहर था। अगर उर्दू लिपि में लिखाई होती तो उनके लिए कोई मुश्किल नहीं थी। वो अभी के अभी पढ़ने के लिए बैठ जाते। लेकिन अब तो बस, उसमें लिखे शब्दों को पहचानने की कोशिश कर रहे थे। और बड़े नाज़ुक अहसास से उसे अपने हाथों में थामे खड़े थे।

रेहड़ी पर कचौड़ी खाने वालों की भीड़ लग रही थी। आज अपने ग्राहकों को देखने का नज़रिया सुल्तान भाई का कुछ और ही बनता दिख रहा था, वे यही सोच रहे थे कि किससे ये चार पन्ने पढ़वायें। जब भी कोई अकेला आता दिखता तो वो सोचते कि इनसे ही पढ़वा लेता हूँ, मगर ऐसा हो नहीं पाता। हिम्मत करते और खुद को रोक लेते। बस वो यही सोचते रहे और सबकी प्लेट बनाते रहे।

आज आधा घन्टा पहले ही सब कुछ निबट गया। घर के पास में रमेश भाई मिलेगें, उन्हीं से ये पन्ने पढ़वाऊंगा। उन्हें भी तो बहुत सारी चीज़ें पढ़ने का चस्का है। जब देखो कुछ न कुछ पढ़ते ही रहते हैं। वे ही पढ़ सकते हैं। जल्दी – जल्दी रेहड़ी को धकेलते हुये वे घर की तरफ आ गये। पूरी गली में सिर्फ कोने पर ही लाइट खुली थी, बाकी जगह पर अंधेरा था।

रमेश भाई अपनी ख़ाट के नीचे लेटे कुत्ते को पानी पिला रहे थे। इस वक़्त में अगर उनके पास कोई आता है तो वो कुछ नहीं कहते। बस, उनका कुत्ता ही आने वाले को जवाब देता है। सुल्तान भाई भी यह बात भली-भांति जानते थे। वे रमेश भाई के पास आये और बोले, “रमेश भाई आपसे एक इल्तज़ा है। ज़रा ये पन्ने पढ़ देगें? रेहड़ी के पास ये पड़े मिले। इसे पढ़ने का बड़ा मन हो रहा है।”

रमेश भाई तो पहले से ही पढ़ने के चस्के के शिकार हैं। रात में नींद लाने के लिए और सुबह जागने के लिये, बस कुछ मिल जाये पढ़ने के लिये। उन पन्नों को हल्के हाथ से संभालते हुये वे बोले, “अबे कितने साल पुराने हैं, इनका तो दम ही निकला हुआ है?”

सुल्तान भाई इस बात का जवाब देते हुये फ़ौरन बोले, “भाई जान, दो साल पुराने हैं। तभी तो इसे सुनने की इच्छा हो रही है।”

रमेश भाई ने उनकी तरफ देखते हुये कहा, “सब कुछ बदल गया सुल्तान मगर तू नहीं बदला।”

उन्होंने पन्ने पूरे खोल लिये। एक निगाह मारते हुए थोड़ा मुस्कुराने लगे। बिना कुछ बोले ही लिखे शब्दों को पढ़ने लगे –

अंकित, मुझे पता है तुम मुझसे बहुत परेशान हो गए हो। लेकिन मैं क्या करूँ, मुझे तुमसे इतना प्यार है कि मैं तुम्हारी एक पल की भी रूस्वाई सहन नहीं कर सकती। मेरे कारण तुम्हें अपने कई काम छोड़ने पड़े हैं, ये भी जानती हूँ। तुमसे हर बात पर सवाल करती हूँ और अपने पास तुम्हें नहीं पाकर परेशान और जिद्दी हो जाती हूँ। मैं जब तक तुमसे बात नहीं कर लेती, चैन से रह नहीं पाती। मैं चाहूँ तो पूरे दिन कईयों से बातें कर सकती हूँ, और करती भी हूँ। मगर क्या, मैं जब भी तुमसे बातें करूँ तो बस तुम्हारे परिवार के बारे मे ही पूछूं? क्या मैं कुछ और नहीं पूछ सकती? जो बीत गया वो तो गया, अब हम आगे की बात कर सकते हैं। मैं पिछले कई दिनों से तुमसे बहुत सारी बातें करना चाहती थी लेकिन हमारा मिलना ही नहीं हो पाया। मैं जब तुमसे बात करती हूँ तो कई तरह की बातें जो कहना चाहती हूँ मगर मिस कर जाती हूँ. जब बातें करती हूँ तो बोलते – बोलते रूक जाती हूँ, मुझे बात कहने नहीं आती और वही जब मैं तुम्हें लिखकर कहती हूँ तो बहुत सारी बातें लिखने का मन होता है। अबकी बार हम जब मिलेगें तो यूँही लिखकर–लिखकर बातें करेगें। मजा आयेगा। मेरी सारी सहेलियाँ यूहीं स्कूल में लिख लिखकर बातें करती हैं।

इतना पढ़ना ही था कि बिजली ने साथ छोड़ दिया, वे एक दूसरे को यूँही देखते रह गये। इस वक़्त दोनों के मन में उस ख़त को पूरा पढ़ने की इच्छा उमड़ रही थी। रमेश भाई ने अपनी जेब से एक माचिस निकाली और सुल्तान भाई को बीच–बीच मे जलाते रहने को कहा। एक तिली जली और पढ़ना फिर से शुरू हुआ।

तुम मेरी बातों को गलत मत लेना – और मुझे भी गलत मत समझना। बहुत प्यार करती हूँ तुमसे। चाहो तो मेरा इम्तिहान भी ले सकते हो। मैं बस, कुछ कहना चाहती हूँ।

पहली तिली खत्म हो चुकी थी , एक और जली

बहुत हिम्मत करके ये बता रही हूँ मैं तुम्हें, सोचो कि ये बातें मैंने पहले क्यों नहीं बताई? या समझो कि ऐसी बातें मैं सबको कहती फिरती हूँ।

दूसरी तिली भी खत्म हो चुकी थी। चारों तरफ सन्नाटा और गहरा हो गया। एक – दूसरे के पास अल्फाज़ नहीं थे कुछ कहने लिये भी। दोनों एक – दूसरे का मुँह देखते रहे। कुछ देर के लिये दोनों के बीच में खामोशी रही – इस इंतजार में कि शायद बिजली अभी आ जायेगी। लेकिन शायद अब यह होने वाला नहीं था। रोड की बिजली भी तो गई थी। लगभग आधा घंटा बैठने के बाद मे दोनों ने फैसला किया कि बाकी का कल पढेंगे। बिना कुछ बात किये वे अपने – अपने घरों में चले आये।

सुल्तान भाई रेहड़ी पर गीला कपड़ा मारकर लेट गये। न जाने कितनी बार उन्होंने उन लाइनों को दोहराया था जिन्हें माचिस की रोशनी में सुना था, शायद आखिरी बार वही सुना था – इसलिये वही घूम रहा था। इंतजार, आने वाले कल का था।

***

सुबह का आलम बिलकुल वैसा ही था जैसा रोज़ होता था। आज सुलतान भाई की आँख काफी पहले ही खुल चुकी थी। बेगम साहिबा रेहड़ी लगाने का समान बनाने की तैयारी में लगी हुई थीं। पर सुल्तान भाई ख़तों को अपनी जेब में रखे बाकी का हिस्सा सुनने के लिए बेकरार थे। वो अंदाज़ा लगा रहे थे कि पन्ने की लाइनों में वो लड़की कौन होगी, कैसी होगी? शायद 20 या 21 साल की होगी। लिखते वक्त उसकी आँखों में पानी उतरा हुआ होगा। इस सब के बाद भी उनको लड़के का चेहरा साफ – साफ नज़र नहीं आ रहा था। फिर भी वो अंकित का चेहरा बनाने लगे। उसकी उम्र सोचने लगे।

सुल्तान भाई ने अपनी बेगम को समान रखने को कहा और वे वहाँ से रमेश भाई की घर की तरफ चल दिये। रमेश भाई के घर का दरवाजा बंद था। वे वहीं बैठ गए। अब उन्हे इंतजार था रमेश भाई के आने का। अबकी बार वो पूरा ही सुनकर जायेंगे। ये वो ठान चुके थे।

कुछ ही देर के बाद रमेश भाई आये और बोले, “अरे सुल्तान, तू यहाँ कैसे बैठा है? तुझे देखकर लगता है, तू सोया ही नहीं रात भर।“

सुल्तान भाई ने पन्ना हाथ में देते हुए कहा, “सुना दीजिये रमेश भाई।”

रमेश भाई मुस्कुराए, पन्ना खोला और पढ़ना शुरु कर दिया।

मैं थोड़ी सी पागल हूँ। चीजों को समझने मे जितना वक़्त लगाती हूँ उतना ही उन्हें भुलाने में भी। मैं अपने यहाँ के रिश्तों को समझ नहीं पा रही हूँ। कब कौन सा रिश्ता मुझ पर अपना रौब जमाने लग जाता है, पता ही नहीं चलता। पहले कहते हैं ये कर, वो कर और जब करने की ठान लो तो कहते है छोड़ दो। ये कहाँ की बात है? बता सकते हो? सच बताऊँ, मैं जैसे जीना चाहती हूँ वैसे जी नहीं पाती। मैं तो तोते की तरह जीना चाहती हूँ, उसे लोग बेबफा कहते हैं – लेकिन उसकी असली बात मैं तुम्हें बताऊँ, वह किसी भी रिश्ते मे फँसकर रहना नहीं चाहता – सबके बीच में रहेगा, बोलना सीखेगा, खाना खायेगा, और तो और गाना भी गायेगा, लेकिन मौका पाते ही उड़ जाता है। फिर किसी और के यहाँ भी यही सब करता है। कितना अच्छा हो कि हर कोई ऐसा हो?

रमेश भाई सुल्तान की तरफ देखते जा रहे थे। लेकिन सुल्तान भाई को इससे कोई वास्ता नहीं था। उनको तो बस, ये पूरा सुनना था कि आख़िर में होना क्या है? यह पूरा ही उनके जीवन से बिलकुल परे था। उनकी जिज्ञासा देखकर रमेश भाई मुस्कुरा दिये। वो बिना रुके पढ़ते गए।

कल मेरी एक बहुत पुरानी सहेली मुझसे मिलने आई, उसकी शादी हो चुकी है। वह जब मुझसे बात कर रही थी तो पता है, मैंने उसे यही कह दिया कि पागल तोते की तरह जी। सही किया न मैनें? वह हर वक़्त किसी न किसी दिन को याद करती रहती है, कभी अच्छे बीते दिन तो कभी बुरे दिन। अच्छे दिनों को बुरे दिनो का जवाब बना देगी और बुरे दिनों को अच्छे दिनों का। मेरी तो कुछ समझ मे नहीं आता। लेकिन तुमको तो मेरी बातें समझ में आती है न! कोई है ही नहीं जिसे मैं अपनी बातों को बता कर उसे मानने के लिए कहूँ? तुम बता सकते हो कि तुम कितनों को अपनी बातों को मानने के लिए कहते हो? मैं बताऊँ – तुम तो कह ही नहीं पाते होगे, तुम तो बस, काम-काम और काम के कीड़े की तरह से जीते हो, कभी उससे कुछ देर के लिए बाहर निकलकर देखो, तुम्हें कितने लोग देखते हैं? मालूम है तुम जब मेरी गली से निकलते हो तो कितने लोग तुम्हे देखते हैं? बता सकते हो!

पढ़ने वाले रमेश भाई तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उनके मन मे तो उन शब्दों की जैसे माला-सी पिरोती जा रही थी। दोनों एक सुर लगाए बस उस खत में छुपे एहसास में डूबे हुये थे।

तुम कभी समझ पाओगे या नहीं मेरी इन सारी बातों को, लेकिन मैं हमेशा से बस हर बात तुमको बता देना चाहती हूँ। मैंने बहुत कुछ सुना और देखा है, लेकिन शायद वे सब अब भी मुझे कम लगते हैं। सच कहूँ तो मैं किसी भी तरह के रिश्तेदारियों को समझना नहीं चाहती। हाँ, मैं उनके बीच में रहकर जीना चाहती हूँ, लेकिन रिश्तेदारी से थोड़ा दूर। तुम सोचोगे कि ये लड़की अगर मेरे घर मे आ गई तो क्या होगा? रिश्तेदारों के बीच मे रहने के लिये उनको समझना क्या जरूरी होता है? इसे ज़रा समझाना। यह सब मैं लिखकर ही तुम्हें बता सकती हूँ। इसीलिए सब कुछ लिखने की कोशिश कर रही हूँ । पर एक बात बताऊँ, मुझे डर भी है बहुत – न जाने तुम क्या सोचोगे मेरे बारे में! डर मुझे इस बात का नहीं है कि तुम मुझे छोड़ दोगे। मुझे डर बस इसका है कि तुम भी मेरी बात नहीं समझ पाओगे।

रमेश भाई पढ़ना बंद करते हुये बोले, “आगे की लाइनें तो बहुत ही धुंधली हैं कैसे पढूँ?” सुल्तान भाई के मन में बिलकुल चैन नहीं था। वो तो उनसे पढ़वा कर ही छोड़ेंगे। वो कहने लगे, “क्या फायदा फिर पढ़ाई का रमेश भाई? साफ साफ तो सभी पढ़ लेते हैं। धुंधले अक्षरों को पढ़ना ही तो पढ़ाई है। कोशिश तो करो।”

रमेश भाई रुक-रुक और अटक-अटक कर पढ़ने लगे।

इसलिये मैं तुम्हें ये लिख तो रही हूँ लेकिन भेजूँगी नहीं, यह सदा मेरे पास ही रहेगा, जब मैं यह दुनिया छोड़कर जाऊँगी तब तुम्हे देकर जाऊँगी, क्योंकि ये बातें मैं खुद में रखकर इसको ज़िन्दा दबोचना चाहती नहीं। एक दिन तो तुम्हें जरूर बताऊँगी।

मैं सदा तुमसे इतना ही प्यार करूँगी

जैसे एक ही पल में सब कुछ बीत गया। पन्नों के अन्दर की बातों का सारा अहसास उस एक पल में बस गया। दोनों के पास कुछ शब्द ही नहीं बचे थे। सुल्तान भाई और रमेश भाई उस ख़त के राज़ों के चोर बन गये थे। दोनों एक दूसरे को देखते रहे। फिर बिना कुछ बोले सुल्तान भाई ने पन्ने लिए और अपने घर की ओर चल दिये।

घर पहुंचे तो घर में बिलकुल शांति थी। रेहड़ी का समान बन चुका था। बेगम रेहड़ी के समान से फ़ारिग होकर सुबह का नाश्ता बना रही थी। सुल्तान भाई ने उनसे कुछ पूछना चाहा लेकिन वह सवाल ऐसे तुरंत ही पूछ नहीं सकते थे तो पहले चाय मांगी, फिर उन्होंने बात करने की कोशिश मे पूछा, “एक बात मैं पूछूँ तुमसे?

उनकी बेगम बोली, “हाँ जी, पूछिये?”

“ज़रा बताना, तुम अपने मन की बात किससे करती हो?”

बेगम साहिबा चुप सुल्तान भाई को देखने लगी।

सुल्तान भाई ने फिर पूछा, “जब तुम अपनी सहेलियों से मिलती हो तो क्या बातें करती हो?” उन्होंने चाय की चुसकियाँ भरना शुरू किया।

बेगम उनकी तरफ कुछ देर देखती रही कि आज से पहले तो इन्होंने कभी इस तरह के सवाल नहीं किए, ये इन्हे आज क्या हुआ? पर वो बोली, “जी, ज़्यादा बात करने का मन ही नहीं होता। बस, इधर -उधर की ही बातें होती हैं। कभी पुरानी सहेलियों की बातें तो कभी घर–परिवार की, अगर कोई सहेली कहीं घूमने – वूमने चली जाती है तो वहाँ के बारे में बताती है।”

सुल्तान भाई बोले, “अच्छा, पहले जब तुम सहेलियों से बातें करती थी, जब शादी नहीं हुई थी और अब जब करती हो तो तुमको कुछ फ़र्क लगता है?”

“फ़र्क तो है, लेकिन पहले भी बढ़िया था, आज भी बढ़िया है।” उनकी बेगम बात को टालते हुये बोली।

सुल्तान भाई कहने लगे, “जब हम अकेले होते हैं तो ज्यादा अच्छा होता है, जब रिश्तेदारियों में फँस जाते हैं तो सब कुछ बुरा होने लगता है- है ना! तुम जब अपनी सहेलियों को अपने आज के दिनों के बारे में बताती होगीं तो वो क्या कहती हैं?”

“सब अपने-अपने तरीके से समझाती हैं। सब कहती हैं, ऐसे जियो, वैसे जियो – हर कोई चाहती है कि उसकी तरह जियें, हमें मालूम है कि हमें कैसे जीना है?”

“तुम किस तरह जीना चाहती हो बता सकती हो?”

सुल्तान भाई की बेगम बोली, “हमें चिड़िया की तरह जीना चाहिए, जो अपने बच्चो को उड़ना सिखाती है, खाना सिखाती है फिर एक दिन उन्हे छोड़ देती है ताकि वो खुद से जीना सीख लें। सही है न जी!” आज से पहले शायद उन्होनें कभी ऐसी कोई बात नहीं की होगी लेकिन आज बातों ही बातों वो बोल गई।

सुल्तान भाई ख़त में क़ैद तोते के बारे में सोचने लगे। ख़त को पढ़कर जैसे बातचीत कि नई गाँठे खुल गई थी। गाठें जो सुल्तान भाई और उनकी बेगम के रिश्ते के बीच बंधी हुई थी। ख़त के अंदर छुपी दास्तां सुल्तान भाई से भी उतना ही वास्ता रखती थी।

अपनी रेहड़ी को संभाल कर सुल्तान भाई अपने ठीये पर पहुँच गए। आसपास खड़े लोगों में उस चेहरे को तलाशना बेकार था। ख़त के किरदार पहचान में नहीं थे और शायद न ही वो भीड़ में मौजूद थे। पर शाम को बेगम साहिबा से होने वाली बातचीत में शायद नए सवाल जुड़ जाये।

समाप्त

लख्मी चंद कोहली

लख्मी चंद कोहली

 

स्कूल पास करने के बाद लख्मी ने शहर में तरह तरह के काम किए हैं। 2001 से अंकुर के नियमित संवादक। इनके लेख बहुरूपिया शहर (राजकमल प्रकाशन 2007) में प्रकाशित हुये। ‘एक शहर है’ नामक ब्लॉग में नियमित लिखते हैं। संपर्क : Email : lakhmikohli@gmail.com Phone : 9811535505

 

 

साभार: हंस, फरवरी, 2015

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