रुपकों-प्रतीकों का आख्यान और दिल्ली चुनाव: चंदन श्रीवास्तव

By चंदन श्रीवास्तव

जब जनता जागती है

किसी को लगा यह दीये और तूफान की लड़ाई थी, किसी ने कहा एक कंकड़ पहाड़ से भिड़ गया है, कोई बोल रहा था दसलखा सूट से डेढ़ सौ रुपल्ली का मफलर उलझ गया है। लोग साल भर से दिल्ली में जनता की सरकार देखने को आतुर थे और ज्यों-ज्यों मतदान का दिन नजदीक आ रहा था वे दिल्ली में सरकार बनाने की लड़ाई को रुपकों और प्रतीकों में बाँधकर आपस में बोल-बतिया रहे थे, अपने-अपने मुहावरे में उसके अर्थ निकाल रहे थे। दिल्ली विधान-सभा के चुनाव के नतीजों के अर्थ पार्टियों को हासिल मत-प्रतिशत के विश्लेषण से नहीं बल्कि इन रुपकों और प्रतीकों को समझने से खुलते हैं। कारण यह कि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा चुनावों में जो जीत हासिल( कुल मतों का 54 प्रतिशत) की है उस जीत को वह खुद भी चाहे तो अब भविष्य में नहीं दोहरा सकती। आम आदमी पार्टी की इस सुनामी सरीखी जीत को सिर्फ दीया और तूफान या फिर कंकड़ और पहाड़ के रुपक के विश्लेषण के सहारे समझा जा सकता है। यह रुपक दिल्ली के मतदाताओं के मानस के बारे में बताता है। लोगों को लग रहा था कि यह पार्टियों की चुनावी लड़ाई नहीं बल्कि दो शख्शियतों नरेन्द्र मोदी और अरविन्द केजरीवाल की लड़ाई है, एक ऐसी लड़ाई जिसमें सेर की भिड़ंत सवा सेर नहीं बल्कि मामला हाथी के जोर के आगे एक चींटी के अड़ जाने का है। राजनीतिक जोर के मामले में एकदम से गैर-बराबर जान पड़ती इस लड़ाई में लोगों ने उसका साथ दिया जो सबसे निर्बल जान पडा रहा था। नतीजा आपके सामने है- ‘चींटी शक्कर ले चली- हाथी के सर धूलि!’

By Anindito Mukherjee, reuters

By Anindito Mukherjee, reuters

यह जीत दरअसल भारत के अंतिम जन के भीतर पलती उस नैतिकता की जीत है जो अपने मन को सदियों से यह कहकर समझाता आया है कि ‘निर्बल के बल राम’। उत्तर भारत के गांवों में कहते हैं ‘ना अन्हरा गैया(अंधी गाय) के राम रखवईया’। और अपनी इसी नैतिकता के तकाजे से जनता ने आम आदमी पार्टी का साथ दिया क्योंकि अरविन्द केजरीवाल अपनी कथनी और करनी से बीते एक साल से लोगों को जताते-बताते आ रहे थे कि लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन होती है। उन्होंने लोगों का विश्वास हासिल हुआ क्योंकि वे निस्संकोच कहते रहे कि केजरीवाल महत्वपूर्ण नहीं है, आम आदमी पार्टी भी महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में जनता और उसकी जरुरतों का ही प्राथमिक तथा अंतिम तौर पर महत्व है। आम आदमी पार्टी का यही संदेश दिल्ली विधानसभा चुनावों में जीत गया है। लोगों ने आम आदमी पार्टी को नहीं बल्कि खुद को वोट दिया है, स्वयं ही को जिताया है।

भाजपा से सबसे बड़ी चूक इसी मोर्चे पर हुई। उसकी मजबूती ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई। फिर से यह बात सच हुई कि जो किसी ने नहीं हारता वह आखिर को खुद ही से हार जाता है। भाजपा मान चुकी थी कि पार्टी नहीं जीतती पार्टी का चेहरा जीतता है। उसका यह विश्वास लाजिम था क्योंकि नरेन्द्र मोदी के चेहरे को आगे करके भाजपा मई महीने से लेकर अब तक लगातार चुनाव जीतती आ रही थी। भाजपा को विश्वास था, जनता खुद से कोई निर्णायक राय नहीं बना सकती बल्कि रणनीतिक कौशल और प्रबंधन के बूते उसे भाजपा के पक्ष में राय बनाने के लिए विवश किया जा सकता है।भाजपा के भीतर यह विश्वास रणनीतिक कौशल के उस्ताद अमित शाह ने भरा था। अपने इसी विश्वास के बूते उसने दिल्ली में अपनी राज्य इकाई को हाशिया पर धकेलते हुए आंदोलनकारी की छवि बना चुकी किरन बेदी को साथ लिया। किरन बेदी ने लोगों से कहा आप एक वोट देंगे तो आपको दो-दो चीजें मिलेंगी। प्रधानमंत्री से विकास मिलेगा, किरने बेदी से सुरक्षा मिलेगी। चूक इस सोच से हुई। इस सोच ने भाजपा को चुनाव लड़ने वाली एक मशीन में तबदील किया । इस सोच ने लोगों को बताया कि भाजपा जनता को जनार्दन नहीं बल्कि प्रजा मानकर चल रही है, प्रजा जो दाता के आगे हाथ पसारे खड़ी रहती है, दाता के भरोसे रहती है। प्रधानमंत्री ने पार्टी की तरफ से प्रचार करते हुए इस सोच में योगदान दिया। उन्होंने अपने को ‘नसीबवाला’ साबित किया। लोगों का लगा प्रधानमंत्री अपने निजी नसीब से ‘देश के नसीब’ को जोड़कर देख रहे हैं।, दिल्ली के लोगों ने प्रजा की तरह नहीं बल्कि स्वतंत्र नागरिक की तरह आचरण किया और देश की किस्मत को किसी एक व्यक्ति की किस्मत से जोड़कर देखने वाली इस सोच को ही हरा दिया।

बिहार और बंगाल में होने वाले अगामी विधानसभा चुनावों के लिए दिल्ली की मतपेटियों से निकला जनादेश महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इस जनादेश की गूंज देश में एक नई राजनीति की इबारत लिख सकती है। इस जनादेश से बिहार, बंगाल और यूपी सरीखे राज्यों की राजनीति के लिए दो संदेश निकले हैं। एक संदेश यह कि मीडिया केंद्रित राजनीति और मुखड़ा-केंद्रित पार्टी के इस दौर की काट की जा सकती है। लोगों के कंधे पर सहानुभूति के हाथ रखकर उन्हें जताया जा सकता है कि लोग किसी एक पार्टी के बंधुआ नहीं बल्कि सचमुच सत्ता-परिवर्तन की ताकत रखते हैं। दूसरा संदेश यह कि लोगों को सिर्फ विकास भर नहीं चाहिए। लोग रोटी, कपड़ा, मकान, सेहत, शिक्षा तो सरकार से चाहते ही हैं, उनके भीतर एक न्यायबोध भी होता है। वे चाहते हैं कि संसाधनों का बंटवारा न्यायसंगत ढंग से हो। बिहार, बंगाल और यूपी के गैर भाजपा शासित दल इन दो संदेशों के आधार पर अपनी जमीन पर भाजपा के बरक्स विपक्ष का एक कारगर विचार गढ़ सकते हैं। वे दिल्ली के जनादेश से हासिल आत्मविश्वास के सहारे साबित कर सकते हैं कि विपक्ष का विचार अभी धूमिल नहीं पडा। अगर ऐसा होता है तो माना जाएगा कि भारत में लोकतंत्र अब भी पार्टी या व्यक्ति केंद्रित नहीं बल्कि जनता-केंद्रित है!

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव

चन्दन श्रीवास्तव,  मूलतया छपरा(बिहार) के निवासी, पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली में। पहले आईआईएमसी और फिर जेएनयू में पढ़ाई। “उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी लोकवृत्त का निर्माण” शीर्षक से पीएचडी के बाद दिल्ली के कॉलेजों में छिटपुट अध्यापन, फिर टीवी चैनल की नौकरी और अब विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक परियोजना इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज से जुड़े हैं। इनसे  chandan@csds.in पर संपर्क संभव है। 

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One thought on “रुपकों-प्रतीकों का आख्यान और दिल्ली चुनाव: चंदन श्रीवास्तव

  1. सुनील कुमार 'सुमन' on said:

    नीमन लिखले बाड़ हो…

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