यथार्थ का दुस्स्वप्न और आखेटक स्त्री: आशुतोष कुमार

‘अपने जैसा जीवन ‘ , ‘नींद थी और रात थी ‘ और ‘स्वप्न समय ‘ सविता सिंह  के अब तक प्रकाशित तीन कविता- संग्रह हैं . इन कविताओं से गुजरते हुए सहज ही महसूस किया जा सकता है कि यहाँ जो ‘मैं’ है , वह एक ‘स्त्री’ है.  वह सभी कालों और सभ्यताओं की स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती है . बेशक वह कवयित्री के समय की, हमारे अपने समय की, निवासी  है. लेकिन उसे भरपूर अहसास है कि वह एक  परंपरा में स्थित है , बल्कि उसी के हाथों निर्मित है. यह पितृसत्ता की अतिप्राचीन परंपरा है . यह स्त्री के लिए वंचना, दमन और  उत्पीड़न की परंपरा है . सविता सिंह की कविताओं की  ‘स्त्री’ इस परंपरा के बारे में अच्छी तरह जानती है . सचेत है . वह इस महान परंपरा की  कैद से मुक्ति चाहती है .  उनकी कविता  मुक्ति के स्वप्न की कविता है . उनके यहाँ स्वप्न एक बार बार दुहराया जाने वाला का विषय है।  #लेखक

By Tumpa Chakraborty

By Tumpa Chakraborty

कविता मुक्ति की एक रणनीति है

By आशुतोष कुमार 

 ‘स्त्री’ के लिए कविता अनेक रूपों में मुक्ति की रणनीति हो सकती है.
अनादि काल से स्त्री कविता का विषय जरूर बनती रही है , लेकिन खुद उसकी  – एक साधारण स्त्री की –  पहुँच शास्त्रीय कविता तक नहीं रही . उसे कविता का लुत्फ़ उठाने लायक शिक्षा और दीक्षा से वंचित रखा गया .  उसे कभी इतनी फुर्सत ही नहीं दी गई कि वह कविता पर ध्यान दे सके . कुछ भी हो , कविता के लिए फुर्सत चाहिए .   रसास्वादन के लिए भी , रचना के लिए भी . यह फुर्सत पुरुष के पास  हो सकती थी . फुरसतिया तबके के पुरुष के पास तो इफरात में थी . उसने इस फुर्सत का इस्तेमाल नायिका- भेद और नख-शिख के अलावा प्रेम की विभिन्न दशाओं का रस लेने में किया.  लेकिन  ‘स्त्री’ के पास न तो फुर्सत थी , न अवसर था , न कविता तक उसकी पहुँच थी . अमीर तबकों की स्त्री के पास भी पुरुष को लुभाने के लिए आकर्षक स्त्री बने रहने की काम की व्यस्तता थी . पुरुष की रची कविता के सांचे में खुद को ढालने की अंतहीन व्यस्तता . खुद उसके लिए कविता नहीं थी.  उसके जीवन में कविता की गुंजाइश नहीं थी . मतलब यह कि कविता  ‘स्त्री’ के  उत्पीड़न के यंत्र के रूप में काम कर रही थी . पुरुष की कविता  ‘स्त्री’ से उसकी मनुष्यता छीन कर उसे श्रृंगार-सामग्री या भोगवस्तु में बदल रही थी . या , ज़्यादा से ज़्यादा देवी या माँ के छवि में कैद कर उसे पूजा की सामग्री में बदल रही थी .

‘ अपने जैसा जीवन ‘ संग्रह की कविता  ‘परंपरा में’ सविता सिंह की  ‘स्त्री’ साफ़ कहती है –

‘ दूर तक सदियों से चली आ रही परम्परा में
उल्लास नहीं मेरे लिए
कविता नहीं
शब्द भले ही रौशनी के पर्याय रहे हों औरों के लिए
जिन्होंने नगर बसाए हो ,
सभ्यताएं बनायी हों
युद्ध लादे हों
शब्द लेकिन छुप कर मेरी आँखों में धुंधलका ही बोते रहे हैं
और कविता रही  है गुमसुम
अपनी परिचित असहायता में
छल-छद्म से बुने जा रहे शब्दों के तंत्र में
इन नगरों के साथ निर्मित की गई एक स्त्री भी
जिसकी आत्मा बदल गई उसकी देह में’ ….

 लेकिन इसी कविता में यह  ‘स्त्री’ सदियों तक प्रतीक्षा  करती है , शब्दों को अपनी मुक्ति की रणनीति के रूप में आजमाने के लिए .

‘ …..शब्दों के षड्यंत्र तब होंगे  उसकी विजय के लिए
बनेंगे नए नगर फिर दूसरे
युद्ध और शांति पर नए सिरे से लिए जायेंगे फैसले .’

मुक्ति की रणनीति के रूप में कविता की यह नयी भूमिका ‘स्वप्न समय ‘ में  कविता के नाम लिखी गई  कविता ‘ तुम्हे लिखना ‘ में यों प्रकट होती है –

‘… एक गरम नदी के किनारे खड़े होना लिखना है मेरी कविता
उस दृश्य को देखना
जहां अनभिज्ञता के शव आते हैं
अपनी मासूम मनुष्यता छोड़ने
पहनने कठोर ज्ञान के परिधान

तुम्हे लिखना बदल लेना है
इस जीवन को दूसरे जीवन से
एक स्वप्न को दूसरे से
या फिर इस जीवन को स्वप्न से ‘

‘मासूमियत’ का त्याग कर परम्परा से प्राप्त शव जैसे जीवन को एक नए जीवन से बदल लेने  का स्वप्न . यह स्वप्न ही उस स्त्री की कविता है . यह स्वप्न उसकी रणनीति है . यह एक स्वप्न को दूसरे स्वप्न से बदलना भी है . अचेतन जीवन से उपजे निस्पंद स्वप्न को चेतना से दीप्त जीवन-स्वप्न में . यह कविता सपने  देखने का सपना है . सपने से वंचित  ‘स्त्री’ के लिए सपना  देखना मुक्ति की रणनीति है. उसके पास जीवित रहने का इसके सिवा और कोई तरीका नहीं है कि दुस्स्वप्न जैसे जीवन को स्वप्न से बदल लिया जाए .

सपने देखने का सपना मुक्ति की  रणनीति का एक हिस्सा है . दूसरा हिस्सा यथार्थ को सपने में देखना है .  दुस्स्वप्न की तरह देखना . यह दूसरा हिस्सा निर्णायक है .यथार्थ से आँखें मूँद कर सपने  देखना पलायन है . पलायन मुक्ति का रास्ता नहीं हो सकता . मुक्ति का रास्ता केवल उस सपने में हो सकता है , जो यथार्थ के दुस्स्वप्न के भीतर गहरे धंस कर देखा जाता है . उस यथार्थ को बाहर से देखना काफी नहीं है . उसे प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता . प्रत्यक्ष जो दिखता है , वह आभासी यथार्थ है . प्रत्यक्ष  दिखने वाला संसार आभासी यथार्थ का संसार है . यह आदर्शों , आदर्शवाक्यों  , घोषणापत्रों ,सजावटों , पच्चीकारियों , नकाबों , बहुरूपों , विभ्रमों और कपट का संसार है . यह , बकौल शमशेर , ‘होनी और अनहोनी की उदास रंगीनियों’ का संसार है . इस आभासी  संसार की  हकीकत को उसकी सारी तफसीलों के साथ आदि से अंत तक  देखने के लिए उसे सपने में ढाल कर देखने की तरकीब कारआमद पायी गयी है . कबीर ने अपनी उलटबांसियों में इसी तरकीब का इस्तेमाल किया था . मुक्तिबोध की फैंटेसी और बोर्खेज की जादुई कहानियों में इसी तरकीब का इस्तेमाल किया गया है .  सविता सिंह की कविताओं में बोर्खेज का आनाजाना लगा रहता है . यथार्थ को सपने में ढाल कर देखने की सब से बड़ी सुविधा यह है कि  कम से कम उसे देखा जा सकता है ! भले ही वह दुस्स्वप्न  हो , आखिरकार टूट सकता है . उसे बदला भी जा सकता है . उसमें  वे सारी सम्भावनाएं हो सकती हैं , जो यथार्थ में नहीं हो सकतीं .

‘… और यह जीवन भी है जैसे अपना ही हाथ उलटा पड़ा हुआ
किसी पत्थर के नीचे
इसे सीधा करते रहने का यत्न ही जैसे सारा जीवन
तडपना पत्थर की आत्मीयता के लिए ज्यूं सदा
हल्के पांव ही चलना श्रेयस्कर है  इस धरती पर इसलिए

एक नींद  की तरह है सब कुछ
नींद उचटी कि गायब हुआ
स्वप्न-सा चलता यह यथार्थ …’
(किसकी नींद स्वप्न किसका’/ ‘स्वप्न समय’)

नींद उचटने पर  गायब होने की गुंजाइश वह तिनका है जिसके सहारे ‘स्त्री’ -जीवन के इस  कठोर विकल्पहीन यथार्थ को आँख टिका कर देखा जा सकता है . कविता में दर्ज किया जा सकता है .  सपना यथार्थ के सब से मार्मिक तथ्यों को , उसके सारतत्व को , रूपक में बदल कर देखने की कला है . नींद में जो सपने की तरह दिखाई देता है , वही जागते हुए कविता की तरह  दिखता है .  पत्थर के नीचे उलटे पड़े हाथ जैसे जीवन को उसके इस असली रूप में स्वप्न में नहीं तो और कैसे देखा जा सकता है . जीवन जैसे पत्थर के नीचे दबे हाथ को सीधा करते रहने का यत्न . और तड़पना उस पत्थर की आत्मीयता के लिए ! भले ही  इसे एक स्वप्न या दुस्स्वप्न की तरह देखा जा सकता हो , लेकिन इस हकीकत को स्वप्न में भी देखना दुखदायी है. बकौल तुलसीदास ,  ‘पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं’ ! लेकिन आखिरकार उसे  देखना , ठीक- ठीक दर्ज़ करना और सलीके से  बयान करना उस से  मुक्ति पाने की एक रणनीति है .

स्वप्न में यथार्थ को देखने की इस कला की खोज किसने की ? अधिक सम्भावना है , यह ‘स्त्री’ की खोज रही होगी .  याद कीजिये , बचपन में मांओं और नानियों के मुंह से सुनी हुई कहानियां . इन कहानियों में जीवन का कितना बड़ा यथार्थ रूप बदल कर आता है.  कहानी में ढल कर आता है . वो तमाम कहानियाँ यथार्थ को सपने में ‘देखने’ लायक , कहने- सुनने लायक , समझने लायक और बदलने  की आशा जगाने लायक बनाने के सिवा कुछ और नहीं करती थीं . जादुई यथार्थवाद के महान लेखक गाब्रिएल गार्सिया मार्केस की तरह फैंटेसी के कवि मुक्तिबोध ने भी अपनी कला के लिए अपनी मां का ऋण स्वीकार किया है . यह उसके लिए ज़िन्दा रहने और जीने की कला भी है . उसने इसे अपने अनुभव से पाया होगा.यह  उसके जीने की शर्त रही होगी . असहनीय यथार्थ को सपने में ही सहा जा सकता है . दुस्स्वप्न जैसे जीवन को नींद में ही  जिया जा सकता है . ‘स्त्री’ का सारा जीवन जैसे एक लम्बी नींद हो.

‘बहुत सुबह जग जाती हैं मेरे शहर की औरतें
वे जगी रहती हैं नींद में भी
नींद में ही वे करती हैं प्यार, घृणा और सम्भोग
निरंतर रहती हैं बंधी नींद के पारदर्शी अस्तित्व से
बदन में उनके फुर्ती होती है
मस्तिष्क में शिथिलता ..’
(‘सच का दर्पण ‘से )

मस्तिष्क की यह शिथिलता जड़ता नहीं है .एक असम्भव जीवन जीने की रणनीति है . कविता की अंतिम पंक्तियाँ प्रमाण हैं –
‘… फिर भी
अपने एकांत के शब्दरहित लोक में
एक प्रतिध्वनि-सी
मन के किसी बेचैन कोने से उठती जल की तरंग-सी
अपने  चेहरे को देखा करती हैं
एक दूसरे के चेहरे में
बनाती रहस्यमय ढंग से
एक दूसरे को अपने सच का दर्पण ..’

‘स्त्री’ की कविता दुस्स्वप्न से स्वप्न तक एक निरंतर यात्रा है .  यथार्थ और स्वप्न का सहजीवन है . यह सहजीवन यथार्थ या स्वप्न की आतंककारी स्वायत्तता से मुक्ति की रणनीति है . यह यथार्थ को स्वप्न में और स्वप्न को यथार्थ में बदलने की प्रक्रिया भी है .

यह तय है कि मुक्ति की रणनीति के रूप में देखा गया स्वप्न एकांतिक निजी स्वप्न नहीं हो सकता . यथार्थ हमेशा सांझा होता है , इसलिए मुक्ति भी सांझी ही हो सकती है . ‘स्त्री’ अपने अनुभव से इस सच को जानती है . वह जानती है कि उसका दुख न  संयोग है , न निजी दुर्भाग्य . यह उसके सामाजिक अस्तित्व में अंतर्निहित है .  मनुष्य की सभ्यता ने अब तक जो अपना स्वरूप रचा है , यह दुख उसकी मूल अंतर्वस्तु है . इस दुख के भागीदार के लिए अपने सहभागियों से अपरिचित रहना मुमकिन नहीं . वर्चस्व और हिंसा की सभ्यता में दुख केवल स्त्रियों के हिस्से में नहीं आया है . यह उन सब की नियति बन कर आया है जो इस उत्पीड़न और हिंसा के निशाने पर हैं . जैसे वे ‘रेड इंडियन ‘ लोग , जिन्हें संयुक्त राज्य अमरीका  की स्थापना के लिए लगभग पूरी तरह उजाड़ दिया गया (‘शैटगे ,जहां ज़िन्दगी रिसती जाती है’) . जैसे भारत के वे आदिवासी जिन्हें तेज विकास दर के नाम पर रोज  उजाड़ा और खदेड़ा जा रहा है (स्वप्न के ये राग’). जैसे ‘कर्नाटक के  एक  अँधेरे गाँव में / जीवन का खेल समाप्त करने की तैयारी कर रहा’  किसान परिवार(‘अंत’) ,जैसे बीच सडक पर गिर पड़े खदेड़े जाते वे मुश्ताक मियाँ  जो ‘ढाबा चलाते थे / लाखों लोगों को अब तक खिला चुके थे / गोश्त रोटी तरकारी दाल सलाद’ (‘मुश्ताक मियाँ की दौड़’), जैसे दुनिया भर के गरीब मेहनतकश लोग , जैसे देश भर में छाये एक ‘नए अँधेरे ‘ को पह्चानने की कोशिश कर रहा बच्चा( ‘नया अन्धेरा’)जैसे खून और खामोशी में धकेल दी गयी मासूम बच्चियां (‘खून और खामोशी’), जैसे किताबें , जैसे जंगल- नदियाँ- पहाड़ , और जैसे वे पेड़ जो ‘रात भर जगे रहते हैं'(‘अनिद्रा में’).

‘….जंगल के जंगल कारतूस और बन्दूकों से लैस अब
रात भर जगे रहते हैं पेड़
कुछ बच नहीं पा रहा
न मर्द , न औरतें , न बच्चे
न रात , न उसका रहस्य ..’
(‘अनिद्रा में’ से )

‘स्त्री’ जानती है कि इन सब कविता-वंचितों की नियति और मुक्ति सांझा है . इसलिए उसकी कविता इन सब की कविता  है . इन सब की मुक्ति की रणनीति है. इन सब की मुक्ति का स्वप्न है . ‘स्त्री’ इन सब का प्रतिनिधित्व करती है .

इस तरह जब ‘स्त्री’ इस  विराट विकराल यथार्थ को स्वप्न के जरिये देखती है , तब उसे सभी कालों और सभ्यताओं में चल रहे आखेट के दृश्य दिखाई देते हैं . इस आखेट के निशाने पर स्त्री हो या भील लोग हों या मासूम बच्चियां हों या ‘नये अँधेरे’  को पहचान रहे बच्चे हों . यह आखेट इतना पुराना है और इस तरह लगातार जारी है कि  अक्सर  उसके दृश्य स्वप्न में  पूर्वजन्म की स्मृतियों की तरह आते हैं ( ‘सपने और तितलियाँ’ ; ‘चांद, तीर और अनश्वर स्त्री’ ). यह आखेट जो  ‘स्त्री’ की कविता में यथार्थ का दुस्स्वप्न है  , वह उसके स्वप्न में एक प्रति-आखेट में बदल जाता  है . यह इस तरह होता है कि जो आखेट के निशाने पर थे , वे खुद को बचाने-छुपाने- भगाने की कोशिश करना छोड़ खुद आखेट में शामिल हो जाते हैं . बचने -भागने की कोशिश करना बेकार है , क्योंकि आखेटक कई गुना अधिक ताकतवर है , और हर जगह मौजूद है .  उसके मंसूबों को विफल करने का एक ही उपाय है , उसे खुद आखेट के निशाने में बदल देना . इकतरफा आखेट को दुतरफा  बना देना . यह आखेटक के लिए हतप्रभ करने वाली स्थिति है . यह उसके पराजय की शरुआत है . क्योंकि  इस स्थिति से निपटना उसे आता ही नहीं . उसे आखेट के निशाने पर होने का  कोई अनुभव ही नहीं है . वह भागते हुए शिकार पर तीर चला सकता है , लेकिन पलटवार की स्थिति में चारो खाने चित हो जा सकता है .

यों  स्वप्न में स्त्री पलटवार करती है. प्रतिआखेटक है. यही मुक्ति की रणनीति है . यही उसकी कविता है .

‘.. वे ही कह सकते हैं कि एक स्वर उन्होंने बचा रखा है
कहने के लिए कि कितना जरूरी है
इस संसार को अपनी ही खूंरेजी  से बचाना
वे कह रहे हैं या कि गा रहे हैं
कि वे पुराने हैं बहुत पुराने
उन्होंने देखे हैं छः सौ चालीस चाँद
और भगवान का मरना भी
जबकि बिरसा भगवान मर नहीं सकता
जब तक तीर है और निशाना
जब तक आता है उन्हें विषकंटक  से विष निकलना
पकाना  उसे तीर पर लगाना ..’
(‘स्वप्न के ये राग’ से )

‘.. आखेट के लिए बुलाता है अगर कोई मुझे
नहीं है भागना
शामिल होना है इस खेल में
आखेटक से डरना नहीं
यदि बचे रहना है

मुझे मालूम है अब खूब
रात  और स्वप्न के मैदान में
तीर और चाँद मुझे देखा करेंगे
और मैं रहूंगी हिरणों के झुण्ड में शामिल
उनकी छलांगों के मुक्ति विलास में
लांघती -फांदती जंगल के जंगल ..’
(‘चांद, तीर और अनश्वर स्त्री’ से )

‘… वह मेरे पीछे पीछे है घोड़े पर
थोड़ा सुस्त अब रह रह कर दहाड़ता मगर
फिर बिलखता और सर को पटकता
दिखाता अपने घाव और रक्तस्राव
और मैं भागती जाती हूँ
पेड़ों की फुनगियों पर पहुँच जाती हूँ
डालों पर झूलती हूँ
यह सब मुझे एक खेल- सा लग रहा है
तभी वह फेंकता है संशय के बीज हवा में
कहता है यह खेल नहीं क्रूरता है ..’
(‘सपने और तितलियाँ’से )

इन तीन में से आख़िरी उद्धरण जिस कविता से लिया गया है , वह मुक्ति की  रणनीति के रूप में कविता विधा की स्वाभाविक सीमा को भी दर्ज करती है . कविता में आखेट और प्रतिआखेट के रूपक के जरिये  ‘स्त्री’ आखेट के लक्ष्य जैसी अपनी नियति को चुनौती देती है . वह स्वप्न देखने के साहस का इस्तेमाल यथार्थ के दुस्स्वप्न को चुनौती देने में करती है . लेकिन सपने में वह इस दुस्स्वप्न को  किसी सुस्वप्न से बदल नहीं सकती . इसके लिए उसे सपने से बाहर जाना होगा . सपना देखना स्वप्नहीन  यथार्थ को चुनौती देना है , उसे  सपने -जैसी सच्चाई में बदल देना नहीं .

आखेट के  सपने का  प्रतिआखेट के सपने में बदलना  स्वप्न- चक्र का पूरा हो जाना है . सपने में इसके आगे की सम्भावना नहीं है . सपने में इसके आगे केवल इस स्वप्न-चक्र को दुहराया जा सकता है . ‘सपने और तितलियाँ ‘ में यही  दुहराव अनेक जन्मों में दुहराई जा रही कथाओं के रूप में प्रकट होता है .  हर जन्म में वही घुड़सवार आखेटक पुरुष ‘स्त्री ‘ के प्रेमी के रूप में लौटता है . हर जन्म में वह स्वयं  आखेट भी बनता है. पिछले जन्म में वह अपने प्रतिद्वंदियों का आखेट बनता है और इस जन्म में अपनी प्रेमिका का.  अपने हर जन्म में वह आखिरकार मार दिया जाता है . फिर भी एक नए जन्म में उसे लौटना  है , क्योंकि ‘स्त्री’ और पुरुष , प्रेमिका और प्रेमी , आखेट और आखेटक  एक दूसरे के हिस्से हैं .

‘… याद करो हम कौन हैं  – एक दूसरे के हिस्से
अलग कर दिए गए थे जो कई सदी पहले…’

बेहद दिलचस्प है देखना कि एक सचेत मुक्तिकामी स्त्री  की कविता में  पुरुष और स्त्री की छवियाँ कितनी पारंपरिक हैं!  पुरुष हमेशा घोड़े पर सवार हो कर आता है . ‘..ऐसा लगता है कि वह खुद भी एक घोड़ा है / उसके भीतर भी एक वेग है / एक सनक तापों के रौंदने की क्षमता से उपजी.. .’ और ‘स्त्री’ भी वही पारंपरिक स्त्री है , जिसके ‘पांव दुर्बल हैं’ , और जिसके पास ‘फल और नदियाँ’ हैं ! उनका  इसी तरह होना स्वाभाविक है , क्योंकि वे एक ही स्वप्न के दो हिस्से हैं .  वे एक ही स्वप्न -रणनीति के दो हिस्से हैं . वे एक ही कविता के दो हिस्से हैं . वे एक दूसरे के बिना अधूरे हैं . एक दूसरे के बिना उनका होना सम्भव ही नहीं. यह एक विपरीत युग्म ( देरिदा का ‘बाइनरी अपोजीशन’ ) है .उनकी निष्पत्ति  आखेट और प्रतिआखेट के निरंतर चलने वाले चक्र में ही है . इसलिए अंततः

‘.. आता है धीरेधीरे लौट कर
फिर सारा दुख सारा पश्चाताप
जिनसे मेरी दुनिया तब भी जीवंत थी
सिर्फ उनमें तितलियाँ चुम्बनों की तरह नहीं
यातनाओं में शामिल हमशक्लों के तरह थीं
और प्रेम के लिए अस्तित्व खतरों में था ..’

दुहराव की जिस प्रक्रिया का संकेत इस कविता में है , उसे तीनों संग्रहों की कुल कविताओं में भी देखा जा सकता है . यहाँ स्वप्न , दुस्स्वप्न , रात , नींद , आखेट और प्रतिआखेट के मजमून बार बार दुहराए जाते हैं . जैसे स्त्री और  पुरुष की  परम्परागत छवियाँ बार-बार दुहराई जाती हैं . इस तरह मुक्ति की रणनीति के रूप में कविता सपना देखने का संकल्प  तो  है , लेकिन वह किसी अदेखे नए स्वप्नलोक के  सृजन से कुछ  दूर है . ये कवितायें सपनों के बारे में  हैं . लेकिन इन कविताओं में उस  मुक्त स्त्री की उपस्थिति , उसकी नयी छवि , उसका नया यथार्थ ,उसकी नयी कल्पनाएँ , उसके नए सपने , उसका नया प्रेमी –यह सब कुछ अभी संभावना भर है  .  यहाँ कविता के बाहर वास्तविक जीवन में  जीवनमरण का संघर्ष करती हुई मुक्त स्त्री के अनुभव  कम   है . यह अभी भी ‘अजन्मी मछलियों का संसार है ‘ . ‘स्वप्न समय ‘ में इसी शीर्षक  की एक कविता का अंत इस तरह होता है –

‘..काश ! मुक्ति इससे भी थोड़ी आसान होती
कोई ऐसी स्थिति होती
कि आक्रोश और अस्वीकृति बदल जाते सीधे नए यथार्थ में
जैसे रोशनी और शब्द बोर्खेज के यहाँ
तब्दील हो जाते हैं आँखों में .. ‘

लेकिन आक्रोश और अस्वीकृति (माने कविता ) सीधे नए यथार्थ में नहीं बदल सकते . मुक्तिकामी कवि के लिए यह अहसास भी कम नहीं . इसका मतलब यह है कि स्वप्नलोक में विचरते हुए भी  उसके पांव हकीकत की जमीन से अलग नहीं हैं . इसका मतलब यह है  कि मुक्ति की रणनीति की तरह लिखी जा रही  कविता मुक्ति की  रणभूमि से बहुत दूर नहीं है .

 आशुतोष कुमार

आशुतोष कुमार

  चर्चित युवा आलोचक. हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफ़ेसर. जनसंस्कृति मंच से जुड़ाव. इनसे   ashuvandana@gmail.com  पर संपर्क संभव है.

Single Post Navigation

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: