सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी: टीना नेगी 

बच्चों द्वारा अपने सपने खुद बुनने को प्रोत्साहन देने में देश-दुनिया के गिने-चुने लोग ही सक्रिय हैं. इन्हीं में एक संस्था है ‘अंकुर सोसायटी फाॅर आॅल्टरनेटिव्ज़ इन एजुकेशन.’ दिल्ली के इर्द-गिर्द मजदूर बस्तियों में शैक्षणिक केंद्र चलाने वाली इस संस्था से जुड़े लोगों को जब लगा कि इन समाजों के अनुभव और अनुभूतियां शब्दों की दुनिया में सीधे पहुंचनी चाहिए और अब तक कहानी में पात्र भर रहे चरित्र यदि स्वयं अपनी बात कहें तो बेहतर होगा. बस! एक नई सकारात्मक शुरुआत हो गई. इन लोगों ने अपने शैक्षणिक केंद्रों के बाल-किशोर भागीदारों को लिखने के लिए उत्साहित और प्रेरित किया समय-समय पर लेखकीय कार्यशालाएं आयोजित कीं. धीरे-धीरे नतीजे सामने आने लगे. ‘अंकुर’ की शर्मिला भगत और प्रभात कुमार झा के प्रयासों से ‘बहुरूपिया शहर’(राजकमल प्रकाशन 2007), यशोदा सिंह की किताब दस्तक’(वाणी प्रकाशन 2012) और ‘अकार’ का 2014 का विशेषांक पाठकों के सामने है. हंस को उदय शंकर के माध्यम से उनकी कुछ रचनाएं देखने को मिलीं. हम इन किशोरों के लेखन-कौशल पर चमत्कृत रह गए. रचनाजी, बलवंत कौर और विभासजी के साथ मिलकर यह तय हुआ कि ‘घुसपैठिये’ शीर्षक से देश भर में हाशिए पर पड़े समाजों में हो रहे युवा लेखन को हम पाठकों के सामने लाएं-बगैर किसी मुरौवत के. इसी क्रम में इस अंक में प्रस्तुत है टीना नेगी की कहानी ‘‘सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी’’. # संजय सहाय, (संपादक, हंस )

यह स्तम्भ दिल्ली और आसपास की कामगार बस्तियों के तरुण-युवा लेखकों की प्रतिनिधि रचनाएं आप तक पहुंचाएगा. ये लेखक और इनका लेखन बने-बनाए खांचों में नहीं समाते. ‘घुसपैठिये’ स्तम्भ के लेखक अभी-अभी जवान हुए हैं या हो रहे हैं. एकाध को छोड़कर इसके सभी संभावित लेखकों की उम्र २0 वर्ष के अंदर ही है। लेकिन इन सब में कुछ सामान्य विशेषताएँ भी हैं. सभी की आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि लगभग समान हैं। इससे भी बड़ी विशेषता यह है कि इनके लिए बचपन की किताबें कागजों से उतनी नहीं बनती हैं जितनी उनके संघर्ष, मोहल्लों, माहौल और जगह से बनती हैं. उनकी लिखाई में वे जगहें आपको सुरक्षित मिलेंगी। आप शायद महसूस करें कि साहित्य के उत्पादक और उपभोक्ता, अभिलेखन/रिकाॅर्डिंग और सृजन, कि़स्सा और तथ्य के बीच के अंतर यहाँ धुंधले पड़ जाते हैं साहित्य के सुरक्षित-आरक्षित डिब्बे में घुस आये इन घुसपैठियों को आप कैसे बरतेंगे, यह आप ही को तय करना है. # घुसपैठिये स्तम्भ -परिचय 

दक्षिणपुरी की एक रसोई सौजन्य: अंकुर

दक्षिणपुरी की एक रसोई, सौजन्य: अंकुर

अंसारी जी

By टीना नेगी 

सुबह के साढ़े पाँच बजे, जब अँधेरा भूरा होने लगता है और सपाट आसमान में हल्के नीले बादल दरारें बनाकर उभरने लगते हैं तब अंसारी जी के मोहल्ले में सब कुछ रोज़ाना वाली एक-सी धुन में शुरू हो जाता है। घुर्र-घुर्र करती पानी की मोटरों से घरों की दीवारें और ज़मीन झन्नाटें लेने लगती हैं। चबूतरों पर पानी की बाल्टियाँ उड़ेल दी जाती हैं, नहीं तो पाइप से छूटती ताजे पानी की दूधिया धार सारा आँगन भिगोती हुई गली में उतर आती हैं और सींक वाली झाडुओं का ज़बरदस्त संगीत एक साथ नहीं तो एक के बाद एक सुनाई देने लगता। इस बीच अंसारी जी उबासियाँ लेते हुए अपने पुराने, जर्जर मकान की बालकनी पर खड़े होकर मोहल्ले भर को निहारते हैं।

‘या अल्लाह’ कहते हुए जब उनकी मोटी-मोटी अकड़ी हुई साँवली बाँहों से अंगड़ाई फूटती है तब पड़ोस की औरतों की नज़रें भी उस बालकनी की तरफ़ उठ जाती हैं। चेहरे पर घूँघट और दरवाज़े के पल्ले खींच लिए जाते हैं, शर्म और लिहाज़ की ये झलकियाँ दो जगह और दो माहौल को जैसे एक फ़ासला दे देती हैं। अंसारी जी अपनी मूंछों पर ताव देते हुए एक अजीब अभिमान के साथ हँसते हैं, जैसे उनका कोई छोड़ा हुआ तीर बिल्कुल सटीक निशाने पर लग गया हो। कमर पर चेकदार सूती धोती, कुछ-कुछ लंगोट की तरह बाँध लेते हैं और अर्द्धनग्न सी अवस्था में अपने बेडौल शरीर के साथ वहीं बालकनी पर झुक जाते हैं। कमरे में रखे रेडियो के बजने की आवाज़ आती है। सत्तर के दशक के गाने तेज़ आवाज़ में बजने लगते हैं। आसपास को जबरन जागने पर मजबूर करता हुआ यह शोर अक्सर पड़ोसियों से झगड़े की वजह बनता है पर हफ्ते दस दिन बाद रेडियो फिर से बजने लगता है और अंसारी जी का गला भी, जो सातो सुर लगाकर गाने की कोशिश करता है। औरतें घूँघट की आड़ से बड़बड़ाती हैं, कनखियों से देखकर ताने देती हैं, मर्द जात से कौन बोले, सोचकर मुँह नहीं लगाती।

अंसारी जी की साइकिल के स्टैण्ड से उतरने की आवाज़ आती है और बेटी मासूमा चिल्लाती है, ‘अब्बूजान हमारे लिए अख़बार लेते आना!’ तब अंसारी जी के दफ़्तर जाने का पैग़ाम मिल जाता है। घंटे भर में पड़ोसन  शबनम बेगम को घेरते हुए कहती हैं, ‘समझाती क्यों नहीं अपने मियां को! सुबह-सुबह सबकी नींद हराम करता है।’ इस बात पर उनकी आपस में झड़प हो जाती है। शबनम बेगम सौ बराबर एक का काम करती हैं। अंसारी जी की हर मुमकिन हिमायत लेती हैं फिर चाहे हफ्ते भर सहेलियाँ पास न बुलाएँ पर शौहर से बढ़कर कुछ नहीं समझती हैं।

सत्रह गज ज़मीन पर खड़ी एक खोकेनुमा दुकान के उपर बने उनके दुमंजिला मकान की कुछ यही तस्वीर और कहानी रही है। अंसारी जी के घर की खिड़कियों और दरवाज़ों से धूप और हवा के अलावा शायद ही कोई बेरोक-टोक सफ़र करता है।

‘सरकारी नौकर हैं’ कहकर ख़ुद को देश की सेवा में लगा बताते हैं और अंसारी जी पाँच बजे तक की ड्यूटी पूरी लगन से निपटाकर दो बजे ही लौट आते हैं। उसके बाद दोपहर घर में और शाम गली में गुज़रती है। वही सत्तर के दशक के गाने रेडियो में गूँज पड़ते हैं। घर के आगे चारपाई डालते हैं और हाथ में चाय का कप लिए वहीं बैठ जाते हैं। आदमियों से कम ही बोलचाल रखते हैं पर हर गुज़रती महिला से दुआ-सलाम जरूर करते हैं। उम्र में जिनसे छोटे हैं और रिश्ते में जिनके भाईजान, उनसे तो हँसी-ठिठोली भी खूब होती है, जैसे सामने वाले घर में रहने वाली मधु बहन, इनसे मज़ाक करने को अंसारी जी की आदत कहें, या शौक, या उनके मिज़ाज़ का ही हिस्सा। जब तक मधु को मधुबाला कहते हुए उससे एक गिलास ठंडा पानी नहीं माँगते तब तक अंसारी जी का दिन नहीं बनता। शबनम बेगम ऊपर से अंसारी जी की हर आवाज़ पर कान जमाए रखती है। कभी चाय तो कभी पकौड़े के बहाने अपने मियाँ को घर की चैखट की तरफ़ खींचती रहती हैं। मन में खटका-सा लगा रहता है क्योंकि अपने शौहर के मिजाज वह जानती है।

नहाने के बाद गीले बदन ही अंसारी जी शाम को दोबारा घर के बाहर चारपाई पर जम जाते हैं। चारपाई का सिरहाना मधु के घर की चैखट के ठीक सामने लगाते हैं। फिर शरीर की मांसपेशियाँ तानकर कुछ इतने ज़ोर से अंगड़ाई लेते हैं कि गुद्दी पर टिकी पानी की बूंदें कमर पर फिसलने लगती हैं। चारपाई की रस्सियाँ चटख कर कर्र-सा शोर करती हैं। आसपास खेलते बच्चे अपना ठिकाना कुछ दूर जमा लेते हैं। शाम के उस माहौल में अजीब-सी गर्माहट भर आती है। अंसारी जी चारपाई पर लेट कर मस्ताने अंदाज़ में गीत गुनगुनाने लगते हैं, ‘जिंदगी एक सफर है सुहाना, यहाँ कल क्या हो किसने है जाना…’ या फिर ‘ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं, अब क्या करें…’। अंसारी जी की आँखें चारों तरफ़ कुछ ऐसे घूमती हैं जैसे माहौल से कुछ छाँट या बीन रही हांे। कुछ ऐसा ढूंढ़ रहीं हों जिसे टिक कर निहारा जा सके, जिससे बतियाया जा सके।

बेटी मासूमा जब अब्बूजान को गली में गाता हुआ सुनती है तो घर में बजता रेडियो बंद कर देती है और फरमाती है ‘अब्बूजान आप ख़ुद ही गा लीजिए! अच्छा गाते हैं’ कहकर वो अपनी पोथी-पुस्तकों में उलझ जाती है। अब्बू जो हर दिन उसे अख़बार लाकर देते हैं, उन अख़बारों से उसकी अलमारी का नीचे वाला ख़ाना भर चुका है। वह अख़बार को ज़्यादा नहीं पढ़ती, बस उसके तीसरे पन्ने पर आने वाले कैरियर विकल्प पढ़ती है और डायरी में एक फेहरिश्त बनाती जाती है कि बड़ी होकर क्या बनेगी! इससे भी उब जाती है तो सारे अख़बार निकालकर हीरो-हीरोइन की फ़ोटो की कटिंग शुरू कर देती है पर ऐसा वह सिर्फ़ तब करती है जब अब्बूजान घर पर नहीं होते। इसलिए अब्बूजान सिर्फ़ उसकी उस फेहरिश्त के बारे में ही जानते हैं जिसे रात को उनके कंधों पर लटक कर वो दिखाती है और बताती है- ‘‘देखिए, अब्बूजान! हमने डायटीशियन के कोर्स के बारे में पढ़ा है। हमें तो यही कराइयेगा!’’ अब्बूजान भी मासूमा की नर्म हथेलियाँ थाम कर बड़े प्यार से ‘हाँ’ में सिर हिला देते। उनकी चुप्पी और मुस्कुराहट उन हज़ार सपनों की गवाही देती है जो वह मासूमा के लिए देखते हैं। उनके लाए अख़बारों का सही इस्तेमाल मासूमा ही जानती है, ऐसा वह सोचते तो फ़क्र से फूल जाते हैं।

एक रोज़ सर्द शाम को जब गली हल्की धुंध में ढकी हुई थी। सभी मकानों के बंद दरवाज़ें, खिड़कियों पर डाले परदे अपना उजाला अपने में ही समेट कर बैठे थे। गली का शोर भी जैसे शांत होकर उस शाम सिकुड़ गया था। कई चबूतरों पर शाम की दावत की तैयारी चल रही थी। इन चूल्हों और तसलों से उठता धुंआ कोहरे में घुल-मिलकर शाम को और धुंधला बना रहा था। अंसारी जी भी अपने कमरे की हीटर वाली गर्माहट को अलविदा कहकर बाहर निकले। हाथ में चाय का कप था पर होठों पर कोई गीत नहीं। इस ठंडी शाम भी उनके बदन पर सिर्फ़ एक धोती थी और गीले बालों में पानी की बूँदें मोती की तरह चमक रही थीं। सीढ़ी से उतरते ही उन्होंने चारपाई को हाथ से गिराकर घर के सामने बिछा दिया और हमेशा की तरह उस पर तनकर बैठ गए। आँखों ने मधु के घर के दरवाज़े की तरफ़ देखा जो कि बंद था। दरवाज़े के पीछे वाला परदा भी चैखट पर सरका हुआ था। अंसारी जी दरवाज़े की झिर्री से भी अंधेरे के सिवा कुछ और नहीं टटोल पा रहे थे। ऊपर शबनम बेगम भी चूल्हे-चैके में जुटी हुई थी। मासूमा अम्मी का हाथ बँटाते हुए तरकारी काट रही थी। अब्बूजान ने कहा था कि अगर मासूमा तरकारी काटना सीख जाएगी तब इस ईद पर उसे शरारा दिलायेंगे। नीचे खामोश बैठे अंसारी जी की नज़रें मधु को ढूंढ़ रही थीं। कान उस सन्नाटे से जैसे चिढ़ बैठे थे और कहीं से आती चूडि़यों की खनक पर गर्दन तुरंत घूम जाती थी। यहाँ शबनम बेगम का सारा ध्यान अंसारी जी पर सिमटा हुआ था। उनकी आवाज़ उसे नीचे के माहौल का अंदाज़ा देती थी पर आज वह भी नहीं सुन पायी थी। मधु के घर का बंद दरवाज़ा देखकर अंसारी जी की बेताबी बढ़ती जा रही थी। जाड़े की ठंड में भी माथा पसीने से गीला था कि अचानक चारपाई से उठकर सीढि़याँ चढ़ते हुए उन्होंने करारी आवाज़ में पुकारा, ‘शब्बो ज़रा टांड से तसला उतार, मैं आता हूँ! इस जाड़े का कुछ तो इंतज़ाम करना ही पड़ेगा!’ शबनम बेगम ने आवाज़ सुनते ही चूल्हा बुझा दिया और स्टूल को टांड की तरफ़ खिसका दिया और फट से चढ़कर तसला उतार लाई। जब तक अंसारी जी ऊपर आए वह उनके लिए तसला लेकर तैयार खड़ी थी। अंसारी जी ने बिना किसी भाव के अपनी शब्बो की तरफ़ देखा, तसला और चैखट के पास रखा कोयले का कट्टा लेकर नीचे उतरने लगे। जाते-जाते आले में से माचिस भी उठा ली। पीछे से मासूमा ने पुकारा, ‘अब्बू देखिए हम तरकारी काटना सीख गए’। मासूमा की खनखनाती आवाज से ही मानो अंसारी जी के चेहरे पर बसंत खिल आता हो, वे मुस्कुराते हुए पलटे और बोले, ‘हाँ तो ठीक है, अब हम अपनी मासूमा के लिए शरारा भी ला सकते हैं और अच्छा शौहर भी!’ कहते हुए वे अपने सामान के साथ नीचे उतर गए। मासूमा शरारा सुनकर बेहद खुश हो गई, इसलिए चाकू-तरकारी छोड़ अम्मी की तरफ़ घूमी और बोली, ‘अम्मी, अब्बू अच्छा शौहर कहाँ से लायेंगे? ये अच्छा शौहर क्या होता है?’

शबनम बेगम की निग़ाहें अब तक सीढ़ी पर टिकी हुई थी और अंसारी जी की उन आंखों को याद कर रही थी जो उससे कुछ नहीं कहती थीं, कुछ नहीं सुनाती थीं, बस कायदे पढ़ाना जानती थीं। जब मासूमा की ‘अच्छे शौहर’ वाली बात पर शबनम का ध्यान गया तो लगा, क्या बेहुदा सवाल पूछ रही है ! ऐसी कोई चीज़ तो आज तक शब्बो को मिली ही नहीं। वह मासूमा पर झल्ला पड़ी और बोली, ‘नहीं मिलेगा अच्छा शौहर! क्योंकि तुम्हारे अब्बू उसे पहचानते ही नहीं है इसलिए तुम सिर्फ़ तरकारी काटो, तुम्हें ही अच्छी बेगम बनना पड़ेगा।’ कहकर शबनम फिर से चूल्हा जलाने लगी, पर अंदर से जैसे भभक उठी थी।

नीचे अंसारी जी तसले में आग जलाने में जुटे हुए थे। तसले में मुट्ठी भर-भर के कोयले झोंकते जा रहे थे, फिर मिट्टी का तेल छिड़ककर माचिस की तीली से आग सुलगा दी। पहले काला धुंआ उनके घर के आगे मंडराता रहा फिर आग की लपटें ऊँची और ऊँची होने लगीं। आग की उस रोशनी में अंसारी जी के चेहरे का तमतमाता हुआ तेज़ गुस्सा साफ़ नज़र आ रहा था। वे शांत, एकदम खामोश उस जलती हुई आग को देख रहे थे। कोहनियाँ घुटनों पर टिकाए हुए दोनों हाथों की उंगलियाँ एक-दूसरे में फँसाए बैठे थे। दाहिने कान में डली सोने की बाली भी चमक रही थी। तसला चारपाई से नीचे लटकते पैरों के पास रखा था, जिसे बार-बार पैर मार कर घुमा देते। दूर पनवाड़ी की दुकान के पास खेलते बच्चे ऐसा करते हुए अंसारी जी को ग़ौर से देख रहे थे।

गली के लगभग सभी चूल्हे बुझ चुके थे, औरतों ने रोटी पकाकर चूल्हों को अंदर कर लिए थे और किवाड़ लगा सभी अपने घरों में घुस गए थे। पर यहाँ अंसारी जी का मकान गली के एक चैथाई हिस्से में रोशनी बिखेर रहा था। ऊपरी मंजिल से बल्ब की पीली रोशनी बाहर फैल रही थी जो शबनम बेगम ने अंसारी जी के इंतज़ार में जलाई थी और नीचे जलती हुई आग का उजाला था जो सीधे मधु के घर को रोशन कर रहा था।

अचानक सामने वाले घर की चैखट का परदा हटा, कुंड़ी खोलने की आवाज़ आई और किसी ने एक झटके से दरवाज़ा खोल दिया। अंसारी जी की आँखें कुछ ऐसी बेसब्री से उठी जैसे कोई कबूतर फड़फड़ाकर अचानक किसी दूसरी जगह आ बैठा हो। उस रोशनी में अंसारी जी ने मधु के चबूतरे पर आकार लेती एक बड़ी सी नवयौवना काली परछाई देखी। परछाई, जो पास आते-आते और बड़ी, और बड़ी होने लगी। उन्होंने नज़र उठाकर सामने देखा तो मधु नई नवेली दुल्हन की तरह सजी-सँवरी सामने खड़ी थी। भारी कढ़ाई वाली साड़ी मानो कहर बरपा रही हो, और मेकअप से चमचमाते सफेद चेहरे पर जैसे धूप खिली हो। चमेली के सफेद फूलों वाला गजरा जूड़े में सजा हुआ और गुलाबी होंठ आज और सूर्ख होकर मुस्कुरा रहे थे। अंसारी जी जैसे सच में किसी खूबसूरत ख़्वाब को जी रहे थे। उनके आसपास का उजाला और ज़्यादा रोशन हो गया था। ठंड से ठिठुरते बदन में एक गुनगुना-सा अहसास भर गया था कि तभी घुँघट माथे पर सरका कर मधु ने अंसारी जी की तरफ़ देखा; इस देखने में एक ऐसी जल्दबाजी थी कि उसमें अंसारी जी का हाल-चाल लेने का या कुछ पूछने का कोई भाव नहीं था। मधु ने घूमकर अपने घर का दरवाज़ा बंद कर दिया, ताले में खटाखट चाबी घुमा दी और पलटकर अंसारी जी की तरफ़ चाबी का गुच्छा उछालते हुए बोली, ‘ज़रा ये शब्बो भाभी को दे दीजिएगा। हम घूमने जा रहे हैं। बाहर वे मेरा इंतज़ार करते होंगे!’ उसके लफ़्ज जिस तेज़ी से गूँजकर गुम हुए, उतनी ही तेजी से पायल की झनकार छोड़ते उसके कदम गली से बाहर हो लिए।

अंसारी जी की आँखें गली की आखिरी छोर तक मधु को निहारती रहीं। पायल की छन-छन में कान अब भी खोए हुए थे, लगता था कि वह मूरत अब भी सामने चबूतरे पर खड़ी है। ऊँची उठती आग की लपटों में यह आसानी से पढ़ा जा सकता था। उनकी आँखें की चैंधियाहट ऐसी थी कि कल्पना और काश के आसमान से उतरना आसान नहीं था। इस उजाले में वास्तविक जीवन का सादा चेहरा कहीं कोसो दूर खड़ा नज़र आता है, फिर उस चेहरे से मासूमा और शबनम दिखाई भी पड़ जाए तो भी कान उनकी पुकार को नकार देते।

उस रात ऊपरी मंजिल पर बल्व की पीली रोशनी यूं ही कायम रही। शब्बो न तो अपने मियाँ को ऊपर बुलाने के लिए पुकार पाई न मासूमा के उस सवाल का, कि ‘अच्छा शौहर क्या होता है’, कोई वाजि़ब जवाब दे पाई। रात भर ज़हन में तरह-तरह के सवाल कुलमुलाते रहे। करवटों के खेल में आसमान फिर से नीला हो गया।

गली में फूल-माला बेचने वालों, अख़बार वालों का आना शुरू हो गया था। चबूतरों पर फिर से चूल्हे जल उठे थे। अंसारी जी की बेढब काया सुबह चारपाई पर पड़ी खर्राटे ले रही थी। मिट्टी के लाल तवे पर रोटी थपक कर डालते हुए औरतें कनखियों से चारपाई पर पसरे हुए अंसारी जी पर भी एक नज़र डाल देतीं, और आपस में इशारे करते हुए फुसफुसाने लगतीं। कई बार हँसी के सुरीले ठहाके भी उस ओर से सुनाई दे जाते – ‘आज क्या हुआ शब्बो के मियां को! लगता है शब्बो ने रात घर में घुसने नहीं दिया।’ कहकर सारी की सारी गर्दन उठाकर ऊपर शब्बों की बालकनी की तरफ़ देखने लगीं। उस सुबह मासूमा को किसी ने अख़बार लाने का वादा नहीं किया।

खैर, सूरज चढ़ा और मक्खियों ने अंसारी जी के कानों पर भिन्न-भिन्न का शोर किया और तब एक झटके से ‘या अल्लाह’ की पुकार के साथ अंसारी जी ने ख़ुद को चारपाई से परे धकेल दिया। उनके इस तरह अचानक उठने से चारपाई जैसे हैरान थी। उसकी रस्सियाँ काफ़ी देर तक चरमराते हुए झूलती रही। कंचे खेलने के लिए जमीन में पिल ढूंढ़ते बच्चे भी इस आवाज़ से दंग रह गए। हैरान-परेशान सा वह लम्हा अंसारी जी के नींद भरे चेहरे पर केन्द्रित हो गया- सूजी हुई आँखें… मूंछों पर ताव नहीं… चिपचिपाहट से भरा चेहरा, बाल बिखरे हुए और धोती पर हज़ार सिलवटें। उबासियाँ मानो पूरे चेहरे की त्वचा को हिला रही थीं। इस सज्जन पुरुष को कभी किसी ने ऐसे नहीं देखा था। आज की सुबह वाकई बेनकाब थी।

उस सुबह की चर्चा महीनों गली में चलती रही। अंसारी जी इस अजीब हादसे से, जो जाने कैसे उनके साथ हो गया था, परेशान होकर शब्बो से झगडते रहे। शब्बो को भी कई दिन अपनी सहेलियों का मज़ाक झेलना पड़ा। कई शाम घर के आगे चारपाई नहीं बिछी। रेडियों में गाने नहीं बजे। सुबह पांच बजे ‘या अल्लाह’ की अज़ान सुनाई दी पर उस बालकनी पर कोई भी खड़ा नज़र नहीं आया ताकि उसकी निगाहों से झिझक कर मुँह फेरना पड़े। इस दौरान अंसारी जी मासूमा को ज़्यादा वक़्त देने लगे। रात को वह अब्बू की गोद में लेटकर शेखचिल्ली के किस्से सुनती। अब सुबह में अब्बू उसे कुरान पढ़कर सुनाते और कई खेलों में मासूमा के जोड़ीदार बनते। अंसारी जी मासूमा के लिए अब किसी फि़ल्म के नायक से कम नहीं थे। उसके अब्बू जैसा कोई नहीं, ये बात उसने अपनी हर सखी-सहेली को रटवा दी थी। शब्बो बेगम बाप-बेटी के इस रिश्ते को हर पहलू से देख रही थी। मासूमा कब तक खुश रह पायेगी इस बात से वे परेशान रहती, पर उसके मियाँ इसी बहाने घर के भीतर को जीने लगे हैं, यह अहसास उसे सुकून पहुँचाने के लिए काफी था।

उस दिन घर मासूमा की किलकारियों से गूँज रहा था। अंसारी जी ने शेखचिल्ली का कोई मज़ेदार किस्सा खत्म किया था। उनके घुटनों पर बैठकर झूलती मासूमा उस किस्से पर अब तक हँस रही थी। जब अंसारी जी मासूमा को झुलाते हुए ऊपर की तरफ़ ऊँचा उठा देते तब वह और तेज़ी से चिल्ला कर हँसती। अंसारी जी भी मासूमा की इस अदा पर ठहाका लगाने लगते। बाहर बरामदे में शब्बो, मासूमा को नहाने के लिए पुकार रही थी पर अब्बू के आगे अम्मी को कौन सुने! सुबह की चाय के बाद दोनों अपनी मस्ती में खो गए थे। शुरूआत मासूमा ने अपनी डायरी खोल कर की थी फिर अख़बारों का पुलिंदा अब्बू के आगे बिखेर दिया था। उसके बाद मासूमा की फरमाइश पर अब्बू कहानी सुनाने लगे थे। शब्बो ने बीच में अपनी मौजूदगी छेड़ते हुए कहा भी था कि दोपहर में कहानी नहीं सुनाते, कोई रास्ता भटक जाएगा, पर बाप-बेटी के उस रिश्ते में शब्बो के दाखिल होने की कोई जगह नहीं थी। अब दोनों झूलने और झुलाने में मगन हो गए थे कि अचानक मासूमा अब्बू के पैरों से उतरकर उनकी पीठ से चिपक गई। अब्बू की गर्दन को उसने अपनी दोनों बाँहों के घेरे में लेकर मुँह को उनके कान के करीब ले जाकर धीरे से बोली, ‘अब्बूजान आज सात समंदर पार वाला गीत हो जाए, बहुत दिन हो गए!’ अंसारी जी ने खरखरा कर गला साफ़ किया और फिर राम जी के तोते की तरह शुरू हो गए- ‘सात समंदर पार से गुडि़यों के बाज़ार से…’ तभी मासूमा बोली, ‘पापा जल्दी आ जाना, एक सुंदर सी गुडि़या लाना..’ फिर दोनों साथ में गाते रहे।

मासूमा के चेहरे पर खुशी बिना अपना रूख बदले उसी तरह कायम थी। अंसारी जी की आँखें बंद, चेहरा स्थिर सा और होंठ अपनी धुन में गाए जा रहा था। शब्बो उनकी आवाज़ में असीम सुख की कल्पनाएँ संजो रही थी। वह बाप-बेटी के इस रिश्ते के दरम्यान नहीं बल्कि दरकिनार हो दूर खड़ी थी, फिर भी इसे दूर से दर्शक की तरह ही देखने और महसूस करने का जो लुत्फ़ था वह उसके लिए किसी जन्नत से कम नहीं था; अंसारी जी की शखि़्सयत में अपने शौहर को तलाशती हुई मानो मासूमा के अब्बूजान से टकरा गई हो और इस टकराने वाले लम्हें को अब वह ताउम्र जीना चाह रही हो।

तभी मासूमा अब्बू की पीठ से उतर गई। अंसारी जी थोड़ी रौबदार आवाज़ में बोले, ‘जाओ मासूमा अब ज़रा एक गिलास पानी लेकर आओ!’ मासूमा दौड़कर पानी ले आई। अंसारी जी गटागट पानी गले से उतार गए। पानी पीने के बाद अब्बू की भीगी मूंछों को देखकर मासूमा हँस पड़ी। अंसारी जी बोले, ‘हमारी मासूमा तो हमारी हर बात मानती है, अब तो शरारा दिलाना ही पड़ेगा, है ना!’ मासूमा ने झट से हाँ में गर्दन हिला दी। अगले ही पल सवाल दागा, ‘शरारा आप कहाँ से लायेंगे अब्बू?’ अब्बू हँसकर बोले, ‘अरे कहाँ से लायेंगे कि क्या बात है पगली, चांदनी चैक ले चलेंगे तुम्हें, जो पसंद आए वह ले लेना!’ सुनकर मासूमा शांत हो गई। कुछ पल अंसारी जी के चेहरे को देखती रही। अंसारी जी का ध्यान अब उस पर से हट गया था। वे अख़बार पर निगाहें जमा कर बैठ गए थे। उनकी आँखें अखबार की लिखावट पर तैर रही थी। उनके धीरे-धीरे हिलते होंठो को देखकर मासूमा समझ गई कि वे अख़बार पढ़ रहे हैं पर फिर भी उसके बेचैन दिल ने उसे उकसाया और वह बोल पड़ी, ‘अब्बू शरारा तो ठीक है पर आप हमारे लिए अच्छा शौहर भी लाने वाले थे!’ ये सुनते ही अंसारी जी ने हैरतभरी आँखों से मासूमा को देखा। मासूमा के गंभीर चेहरे पर हँसी का नामोनिशान नहीं था। वह अपने जवाब के इंतज़ार में अब्बू की ओर ताक रही थी। मायूस सी मासूमा के मुँह से इतना बड़ा सवाल सुनकर वह खुद को हँसने से रोक न सके। अख़बार को छोड़कर ज़ोर से हंस पड़े। उनका मोटा पेट हँसी के ठहाकों से काफी देर हिलता रहा। आँखें चमक उठीं। चेहरा तरोताज़ा हो गया। अपनी हँसी को विराम और गले को आराम देकर उन्होंने कुछ दम भरते हुए कहा, ‘हाँ, हाँ, ज़रूर! क्यों नहीं! अच्छा शौहर भी ले आयेंगे हम!’ सुनकर मासूमा ने अगला सवाल किया, ‘पर अब्बू, पहले बताइये कि अच्छा शौहर होता क्या है?’ मासूमा की आँखों में जिज्ञासा साफ़ नज़र आ रही थी। अब्बू ने उसकी कलाई पकड़कर पास खिसकाते हुए उसे बोले, ‘अच्छा शौहर वह होता है जो हमारी मासूमा को बेइंतहा मोहब्बत करे। उसकी सारी ख्वाहिशें पूरी करे। उसका अपने से भी ज़्यादा ध्यान रखे और हमेशा उसे खुश रखे।’ जवाब सुनकर खामोश मासूमा जैसे अब्बू की आँखों में कुछ टटोलने लगी पर अंसारी जी तो इस बेहद सच्चे जवाब के साथ ख़ुद को ख़ाली कर चुके थे। ज्ञान और धर्म की कोई अनमोल बात किसी को बताते हुए जैसा आनंद कोई गुरू महसूस करता है कुछ वैसे ही फक्र का अहसास अंसारी जी के चेहरे पर नज़र आ रहा था। मासूमा एकटक अपने अब्बू की आँखों में झाँक रही थी कि तभी उसने फिर से अब्बू को पुकारा और कहा, ‘अब्बूजान क्या आप भी एक अच्छे शौहर हैं?’ सवाल सुनकर अंसारी जी के मुँह से निकलने वाली ‘हाँ’ अंदर ही कहीं घुट कर रह गई और स्तब्ध से मासूमा को देखते रहे। चाहकर भी अपना जवाब बुनने के लिए शब्द नहीं खोज पाए। मासूमा ने बेसब्री दिखाते हुए उनकी बाँह झिंझोड़ कर पुकारा, ‘बताइए न अब्बू, आपके जैसा ही होता है न अच्छा शौहर?’ अंसारी जी के हाथों से मासूमा की कलाई छूट गई। शब्बो ने बाहर से पुकारा, ‘मासूमा, आज नहाना नहीं है क्या या अंदर बातें ही बनाती रहोगी?’ मासूमा अब्बू को खामोश पाकर सब्र खो बैठी और उठकर तौलिया ढूँढ़ने लगी। अंसारी जी भी हाथ में अख़बार उठाकर बैठ गए पर इस बार उनकी नज़रें अख़बार की लिखावट पर ही टिकी रहीं, तैर नहीं पाईं!

टीना नेगी

टीना नेगी

 ‘अंकुर-कलेक्टिव’ की नियमित रियाजकर्ता। 2011 में लाहौर में आयोजित बाल-साहित्य-सम्मेलन में अंकुर की तरफ से बाल-लेखकों के साथ किस्सागोई की प्रस्तुती। उनके लेखन के कुछ टुकड़े ‘फर्स्ट सिटी’ और ‘अकार’ में प्रकाशित। संपर्कः एल-259, सेक्टर- 5, दक्षिणपुरी, डाॅ. अम्बेदकर नगर, नई दिल्ली-110062

साभार: हंस, जनवरी, 2015 

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2 thoughts on “सुबह वाकई बेनकाब थी उर्फ अंसारी जी: टीना नेगी 

  1. बहुत सहज और सधा हुआ अंदाज़. यह सहजता मुश्किल से ही सधती है.

  2. लेखिका के पास एक मंजी हुई भाषा है। रोजमर्रे की बोली। रोजमर्रे की ज़िन्दगी से कहानी के लिए आधार- समस्या चुनने का विवेक भी। बेशक आगे अधिक जटिल और बहुस्तरीय परिप्रेक्ष्य के साथ काम करने लिए वे कमर कसे होंगी।

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