ब्रेख्त और लुकाच की ऐतिहासिक बहस: शाश्वती मजूमदार (अनुवाद- वैभव सिंह)

By  शाश्वती मजूमदार

जर्मन लेखक बर्तोल्त ब्रेख्त और हंगरी के दार्शनिक जार्ज लुकाच के बीच बहस कभी औपचारिक बहस के रूप में नहीं संपन्न हुई बल्कि वह दोनों पक्षों में इस मुद्दे पर जारी व्यापक चिंतन की विभिन्न कड़ियों के रूप में सामने आई कि समाजवाद की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध क्रांतिकारी कला व साहित्य के मूल सृजनकारी तत्त्व कौन से होने चाहिए। इसे प्रायः अभिव्यंजनावादी (Expressionism) बहस या यथार्थवाद बनाम आधुनिकतावाद की बहस के रूप में भी देखा जाता है जिसमें लुकाच को कलात्मक सृजन के यथार्थवादी रूपों के पक्ष में खड़ा दिखाया जाता है। दूसरी ओर ब्रेख्त को अभिव्यंजनावादी व दूसरे आधुनिक कलाकारों द्वारा विकसित कला के प्रयोगशील रूपों का समर्थक बताया गया जो क्रांतिकारी कला की वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं। वास्तव में यह बहस मुख्यतः यथार्थवाद के बारे में बहस के रूप में देखी जानी चाहिए। ब्रेख्त व लुकाच, दोनों ने ही बड़े बलपूर्वक कहा कि पूरी बहस के केंद्र में यथार्थवाद ही प्रधान मुद्दा है।index

यह पूरी बहस 1930 के दशक में यूरोप में फासीवाद व जर्मनी में इसके ज्यादा बर्बर नाजीवादी विचारधारा के उदय की पृष्ठभूमि में संपन्न हुई। नाजीवाद-फासीवाद के श्रमिक वर्ग पर हमले तेज हो रहे थे और सोवियत संघ को नष्ट करने के लिए सैन्य अभियान जारी थे।  बहस मार्क्सवादी खेमे में जारी बहसों का ही हिस्सा थी जिसमें अर्नेस्ट ब्लाख, वाल्टर बेंजामिन, हैन्स आइजलर, थियोडोर अडोर्नो व मैक होर्कहेमर समेत कई लोग शामिल थे। बहस में विभिन्न तरह के संकटों के दौर में कला की सामाजिक भूमिका की अवधारणा निर्मित करने संबंधी विविध प्रकार के प्रयास व्यक्त हो रहे थे। ऐसे में इस बहस का पुनरावलोकन बीसवीं सदी के कला व दर्शन के दो महान व्यक्तियों के विचारों के पुनर्पाठ जैसा ही है।

यह बहस इस वजह से भी शुरू हुई क्योंकि ब्रेख्त मूलतः कलाकार थे जो कला व सृजन के व्यवहारिक पक्षों से जुड़े हुए थे, जबकि लुकाच मुख्य रूप से दार्शनिक थे जो पूंजीवादी समाज में सामाजिक अस्तित्व की प्रकृति के प्रश्नों से जूझ रहे थे। बहस का एक कारण यह भी था कि दोनों ही ऐसे समय में राजनीतिक संघर्ष व संघर्ष में कला की भूमिका के बारे में अलग दृष्टियां रखते थे जबकि विचारधारा के सवाल सीधे-सीधे जीवन तथा मौत से जुड़े हुए थे। बहस के दौरान आक्रामक विरोध व कभी-कभी पैदा हुई तीखी कटुताएं दोनों व्यक्तियों के निर्वासन में रहने तथा फासीवाद के खिलाफ निरंतर राजनीतिक, वैचारिक व सैन्य संघर्ष चलाने की सतत मांग के संदर्भ में समझी जा सकती हैं। संघर्ष में सौंदर्य के प्रश्न को दोनों पक्षों द्वारा काफी महत्त्वपूर्ण माना गया। उल्लेखनीय है कि बाद के शांतिकाल में, दूसरे महायुद्ध की समाप्ति व शांति की स्थापना के उपरांत, कलाकार व दर्शनशास्त्री के बीच संबंध काफी सामान्य हो गए और दोनों ने एक दूसरे के अवदानों को स्वीकार भी किया। तो भी दोनों के बीच के बुनियादी मतभेद इस बहस को रेखांकित करते हैं। तबसे लेकर आज तक कई परिवर्तन आ चुके हैं। पर वह बहस अभी भी केवल ऐतिहासिक महत्त्व तक सीमित नहीं है। दोनों पक्षों ने कई अहम सवाल खड़े किए जो पूंजीवाद की समाप्ति व समाजवादी भविष्य की स्थापना के लिए चलाए जा रहे राजनीतिक संघर्ष के अनुकूल प्रगतिशील कला व सांस्कृतिक कर्म से सरोकार रखने वालों से लिए काफी चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं।

ब्रेख्त और लुकाच के बीच वैचारिक टकराव, जो कि लेखन के अभिव्यंजनावाद व आधुनिकतावादी रूपों पर केंद्रित था, दास वोर्ट (द वर्ड, मास्को से 1936-39 के दौरान मास्को से प्रकाशित पत्र) नामक पत्र में सामने आया। इस बहस में लुकाच समेत 15 लेखकों, कलाकारों व साहित्यिक सिद्धांतकारों, ने गर्मजोशी से हिस्सा लिया। उस समय ब्रेख्त हालांकि पत्र की तीन सदस्यीय संपादकीय टीम का हिस्सा थे और उन्होंने पूरी बहस पर गंभीरता से निगाह रखी, पर उन्होंने सार्वजनिक रूप से बड़े स्तर पर हस्तक्षेप नहीं किया क्योंकि उनके मस्तिष्क में फासीवाद के विरुद्ध साझे संघर्ष के व्यापक हितों की चिंता मौजूद थी। पर बहस के बारे में अपने विचारों को वे निरंतर विस्तार से लिखते रहे और वे 13 साल बाद साहित्य व कला के बारे में दो खंडों में प्रकाशित उनके ग्रंथों में संकलित हुए। बहस की राजनीतिक पृष्ठभूमि कोमिन्टर्न द्वारा 1935 में स्वीकृत लोकप्रिय मोर्चे (पापुलर फ्रंट) की नीतियों तथा बुर्जुआ राजनीति के फासीवाद विरोधी धड़े भी शामिल करने वाले फासीवाद विरोधी विशाल मोर्चे के निर्माण से भी संबंधित थी। लुकाच ने बहस में एक निबंध लिखकर हस्तक्षेप किया जिसका शीर्षक था- Es geht um den Realismus (जिसका अंग्रेजी में अनुवाद रियलिज्म इन द बैलेंस, या दांव पर यथार्थवाद के नाम से किया गया)। इस निबंध में उन्होंने समकालीन लेखन की तीन धाराओं को परिभाषित किया। पहली, पूंजीवादी समाज की पक्षधर यथार्थवाद विरोधी या छद्म यथार्थवादी धारा। दूसरी, यथार्थवाद से दूर होती अवांगार्द की साहित्य-धारा। तीसरी, यथार्थवादी लेखन की धारा जिसके रचनाकारों में उन्होंने गोर्की, थामस और हेनरिख मान और रोमां रोलां का नाम लिया। लुकाच के मतानुसार दूसरी धारा के लेखक अपने समस्त साहित्यिक प्रयोगों के बावजूद यथार्थ के ऊपरी रूप व अनुभवों के स्वतःस्फूर्तपन तक ही सीमित रह गए। वे यथार्थ के भीतरी सार को न छू सके और अपने अनुभवों व उन्हें उत्पन्न करने वाली वास्तविक सामाजिक शक्तियों को पहचान न सके। उन्होंने अनुभव किया कि ऐसे लेखक आत्मनिष्ठ व अमूर्तन में जीने वाले होते हैं, वे जिस प्रकार यथार्थ के विखंडन व विरोधी तत्वों के समन्वय से कला रूप तैयार करते हैं वह काफी एकायामी होता है और संसार की सत्यता व चीजों की संबद्धता, यानी पूंजीवादी समाज की समग्रता का बोध पैदा करने में असफल रहे। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने अभिव्यंजनावादियों और दूसरे आधुनिकतावादी लेखकों की तुलना फूहड़ अर्थशास्त्रवादियों से की जो पूंजी के संचरण को स्वतंत्र तथा अमूर्त प्रक्रिया के रूप में देखते थे और महाजनी पूंजीवाद से इसके कार्यकारण संबंधों का विश्लेषण नहीं करते थे। इसलिए यथार्थ के संबंध में व्यक्तिनिष्ठ, सतही व अमूर्त धारणा के विपरीत, जो कि लुकाच के अनुसार काफी एकरस भी थी, लुकाच के अनुसार तीसरी धारा के यथार्थवादी लेखकों ने सामाजिक संबंधों को उसकी पूरा जीवंत समृद्धि व समग्रता में ज्यादा वस्तुगत रूप से प्रस्तुत किया। उनकी विविधता को भी चित्रित किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने भविष्य में सामने आने वाली मानवीय व सामाजिक प्रवृत्तियों को दर्शाने वाले प्रातिनिधिक चरित्रों के सृजन के माध्यम से भी यथार्थ का ज्यादा विश्वसनीय रूप व्यक्त किया। लुकाच के अनुसार ये यथार्थवादी लेखक 19वीं सदी के बाल्जाक व ताल्सताय जैसे यथार्थवादियों की ही परंपरा के लेखक हैं और केवल उन्हें ही साहित्यिक अवांगार्द के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार आधुनिकतावादी लेखकों द्वारा अपनाई गई प्रयोगात्मकता यथार्थवाद के पतन तथा बुर्जुआ कला के क्षरण को व्यक्त करती है।

लुकाच ने इस पर भी बल दिया कि आधुनिकतावादी लेखकों के प्रयोगशील कलारूपों और गोर्की या थामस मान द्वारा अपनाए परंपरागत रूपों का मूल्यांकन कैसे किया जाए, यह केवल साहित्यिक सवाल नहीं है बल्कि फासीवाद के खिलाफ एक व्यापक जनमोर्चा कैसे बनाया जाए, इससे भी गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने महसूस किया कि आधुनिकतावादियों द्वारा साहित्य-परंपरा तथा सांस्कृतिक विरासत का अस्वीकार लोकप्रिय समर्थन नहीं हासिल कर सकेगा। बल्कि सांस्कृतिक विरासत के सभी मूल्यवान पक्षों को आलोचनात्मक रूप में ही सही पर अपनाने व आत्मसात करने की जरूरत है जिससे आम जनों से संबंध और अधिक सुदृढ़ हो सकें। निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि अपने निबंध के केंद्रीय तर्क रूप में उन्होंने जीवन व समाज को पूरी समग्रता से चित्रित करने के महत्त्व को स्थापित किया।

फासीवाद विरोध संघर्ष में एक आम मोर्चा बनाने की राजनीतिक आवश्यकता को लेकर ब्रेख्त तथा लुकाच के बीच कोई मतभेद न था और न यथार्थवाद पर बल देने को लेकर। लेकिन ब्रेख्त यथार्थवाद की परिभाषा तथा 19वीं सदी के यथार्थवादी लेखकों द्वारा प्रयोग किए गए रूपों की प्रासंगिकता को लेकर लुकाच से असहमत थे। ब्रेख्त के अनुसार वे लेखक निस्संदेह महान थे पर उनकी दूसरी ही समस्याएं थीं। वे ऐसे समय में लिख रहे थे जब बुर्जुआ वर्ग तथा बुर्जुआ वैयक्तिकता का विकास हो रहा था। जबकि समकालीन लेखक इस दौर में बुर्जुआ व सर्वहारा के मध्य जारी अंतिम संघर्ष के बीच स्वयं को पाते हैं। बुर्जुआ व्यक्ति का विघटन हो रहा है, आम जनता आगे बढ़ रही है और प्रश्न यह है कि किस प्रकार इस नए यथार्थ को व्यक्त किया जाए। ब्रेख्त के मुताबिक वर्तमान नए यथार्थ की अभिव्यक्ति कैसे की जाए, इस समस्या से जूझ रहे समकालीन लेखकों के बारे में लुकाच ने ज्यादा चिंता नहीं की। ब्रेख्त ने कहा कि इस यथार्थ को केवल नैरेटिव के खास रूप के अनुकरण से नहीं व्यक्त किया जा सकता क्योंकि वे पहले काफी अधिक प्रयोग किए जा चुके हैं। ऐसा कोई भी रवैया अपनी प्रकृति में रूपवादी होगा। वह इसलिए क्योंकि यह नए परिवर्तनशील यथार्थ पर पुराने साहित्यिक रूपों को थोपने जैसा होगा। उनका मत था कि लेखकों को हर माध्यम, चाहे वह नया हो या पुराना, प्रयोग हुआ हो या नहीं, कला से निकला हो या किसी अन्य स्रोत से, अगर यथार्थ के संवहन में सहायता करता है तो उसका सहारा लेना चाहिए। यथार्थवाद का संबंध केवल रूप से नहीं है और जो चीजें पहले लोकप्रिय थीं वे कोई आवश्यक नहीं कि वर्तमान में भी लोकप्रिय हों क्योंकि लोगों का व्यक्तित्व व चरित्र भी बदलता रहता है। कई आधुनिकतावादी लेखकों के लेखन के व्यक्तिनिष्ठ व अमूर्तनवादी पक्ष के बारे में लुकाच के मत से ब्रेख्त सहमत थे पर उनका कहना था कि उनके द्वारा विकसित तकनीक जैसे कि चित्र-कल्पना समन्वय, अंतरालाप और अपरिचयीकरण तथा तटस्थता की तकनीक ने समकालीन यथार्थ की ठोस तथा वस्तुगत अभिव्यक्ति में ज्यादा उपयोग संसाधन उपलब्ध कराए, बनिस्पत 19वीं सदी के यथार्थवादी लेखकों की वर्णन शैली के। बुर्जुआ लेखक इन आधुनिक तकनीकों का प्रयोग अपनी निराशा की भावना की अभिव्यक्ति के लिए कर सकते हैं, समाजवादी लेखक इसका प्रयोग दूसरी तरह कर सकते हैं। ब्रेख्त ने खुद भी साहित्यिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को खारिज नहीं किया बल्कि उन्होंने आरंभिक प्रबोधनकालीन लेखकों जैसे शेक्सपीयर, स्विफ्ट, रिबेलयस, वाल्तेयर और दिदेरां को काफी उत्सुकता से पढ़ा। इसके अलावा उन्होंने चीन व भारत समेत दुनिया के दूसरे हिस्सों के साथ-साथ लोकप्रिय व लोकवादी कला रूपों से भी विचार ग्रहण किए।

लुकाच की तरह ही ब्रेख्त भी पूंजीवादी समाज में सामाजिक संबंधों के वस्तुकरण (Reification) और कलाकार द्वारा ऊपरी सतह के नीचे छिपी सच्चाइयों को उजागर करने के सरोकार से जुड़े हुए थे। वह भी मानते थे कि सच्चे यथार्थवाद को वास्तविकता के भीतर तक धंसना होता है और जीवन को आकार देने वाले नियमों, सामाजिक शक्तियों के बीच के कार्य-कारण संबंधों को सामने लाना होगा। जैसे कि किसी फैक्ट्री की तस्वीर फैक्ट्री के सत्य को नहीं बता सकती। लेकिन वह यह भी नहीं मानते थे कि इस बारे में सत्य को केवल उस सत्य का साक्षात्कार करने वाले व्यक्ति की आंख या दिल को उधार लेकर व्यक्त किया जा सकता है। इसके लिए कलाकार को विशेष तरीकों से यथार्थ में हस्तक्षेप करना होगा ताकि यथार्थ के बारे में भ्रम खत्म हो और देखने वालों को यथार्थ को वह पक्ष भी दिख सके जो उस यथार्थ से सीधे जुड़े व्यक्ति को भी नहीं दिखता है। सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध कलाकार का काम केवल सौंदर्यबोधीय हस्तक्षेप के माध्यम से यथार्थ का ठंडा, तटस्थ अनुभव प्रदान करना नहीं है बल्कि अपने पाठक व दर्शक को सक्रिय हस्तक्षेप के जरिए यथार्थ को बदलने के लिए प्रोत्साहित करना है।

इन परस्पर विरोधी विचारों का नतीजा क्या निकलता है? ब्रेख्त और लुकाच, दोनों ही कला के बोधपरक कार्य और जीवन के प्रत्यक्ष रूपों के भीतर तक धंसी सच्चाइयों को पहचानने वाले सौंदर्यशास्त्र की आवश्यकता के बारे में सहमत थे। दोनों ने ही ऊपरी सतह के भीतर के सत्य को जानने तथा पूंजीवादी समाज के वर्ग चरित्र व उससे जुड़े विखंडन तथा वस्तुकरण को व्यक्त करने के लिए अमूर्तन व कला-माध्यम के महत्त्व पर बल दिया। दोनों ही कला को लोकप्रिय बनाने चाहते थे ताकि उसका जन-जन के संबंध बना रहे। दोनों यह भी मानते थे कि हिटलर के खिलाफ पापुलर फ्रंट में बुर्जुआ लेखकों और कलाकारों को शामिल करना होगा और उन्होंने इस नीति के पक्ष में काफी सक्रियता भी दिखाई। यानी पूंजीवादी समाज द्वारा किए जा रहे अमानवीयकरण के खिलाफ साहित्य-कला की सामाजिक संघर्ष संबंधी भूमिका से प्रेरित थे पर दोनों अलग-अलग दिशाओं में चल रहे थे।

एक दार्शनिक के रूप में लुकाच का मुख्य सरोकार पूंजीवाद के अंतर्गत होने वाले अलगाव, विखंडन तथा मानवीय संबंधों का वस्तुकरण (reification) था। उनके दर्शन में सौंदर्यशास्त्र का केंद्रीय वस्तु के रूप में मुख्य काम इन्हीं अनुभवों के नकारात्मक पहलुओं से उबारना था। बिखराव तथा विखंडन के मध्य ‘संपूर्णता’ (Whole) को खोजना था और इसमें प्रगतिशील अंतर्वस्तुओं को शामिल करना था। इस संपूर्णता या सामाजिक संबंधों की समग्रता को न केवल बोधगम्य बनाना होता है बल्कि उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति भी ऐसी होनी चाहिए कि पाठक उसकी पूरी सच्ची जीवंतता का अनुभव कर सके। लुकाच ने इसे ऐसे असाधारण रूप से कठिन कार्य के रूप में देखा जिसमें लेखक का दोहरा श्रम लगता था। पहला, उसे इन संबंधों को बौद्धिक रूप से खोजना था और उसे कला में ढालना था। दूसरा, हालांकि दोनों प्रक्रियाएं परस्पर जुड़ी होती हैं, उसे अमूर्तन के माध्यम से उस खोजे गए संबंध को आवृत करना भी होता है। यह दोहरा श्रम एक नया कलारूप पैदा करता है। पहला, जिसमें सौंदर्य का गहरा प्रभाव होता है। इसमें हालांकि जीवन का बाह्य रूप काफी पारदर्शी होता है जिसके अंदर से जीवनसार झलकता रहता है (जोकि वास्तविक जीवन में नहीं होता है), तो भी यह काफी निकट का तात्कालिक अनुभव व्यक्त करता है, जीवन को वैसा ही दिखाता है जैसा वह होता है। इसके अतिरिक्त ऐसे लेखकों के लेखन में जीवन के पूरे बाह्य रूपों को उसके बुनियादी तत्त्वों के साथ ही पाते हैं, न कि अमूर्तन व अतिआवेग मय ढंग से निजी तौर पर अनुभव किए गए क्षण मात्र को जो कि समग्रता से अलग होता है। लुकाच के अनुसार हम रोजाना जीवन को टुकड़ों में जीते हैं जिसमें कला के स्थान पर नीरस सम्मोहकता ( fetischized ) रहती है। पर कला का सबसे महत्त्वपूर्ण काम होता है वह पूरी समग्रता के साथ यथार्थ का इंद्रियपरक तथा भावनात्मक अभिव्यक्ति वाला अनुभव प्रदान करती है। लुकाच के अनुसार कलाकार का काम यह है कि वह बाह्य जीवन के बहुस्तरीय मानव संबंधों को बौद्धिक रूप से खोजता है और फिर उन्हें पूरी समग्रता से व्यक्त करने के लिए उनपर कला का आवरण डालता है ताकि वह भावजगत व इंद्रियों को उत्तेजित कर सकें। लुकाच के विचारों से यह बात भी निकलती है कि सौंदर्यबोधीय अनुभव अपने में परिवर्तनकारी और मानवीयकरण करने वाली प्रक्रिया है जोकि विरेचन के माध्यम से कार्य करती है। यह प्रक्रिया किसी पाठक विशेष से जुड़ी होती है और ‘धीरे-धीरे, लंबे तथा जटिल रूप में’ घटित होती है।

ब्रेख्त, जोकि खुद भी कला सृजन के व्यावहारिक प्रश्नों से जुड़े हुए थे, उनके लिए भी यह मुख्य सवाल था कि बाह्य जीवनरूपों के भीतर छिपे सत्य को कैसे व्यक्त किया जाए। उन्होंने उन 5 समस्याओं का उल्लेख किया जिनका किसी लेखक को सामना करना होता है। उन्होंने लिखाः इन दिनों जो भी झूठ और अज्ञानता से लड़ना चाहता है और सच लिखना चाहता है, उसे कम से कम पांच मुश्किलों पर अवश्य विजय हासिल करनी चाहिए। उसमें ऐसे समय में सच लिखने का ‘साहस’(courage) होना चाहिए जब सच का हर तरफ विरोध हो रहा हो। उसमें सत्य को पहचानने की ‘उत्सुकता’ (keenness) होनी चाहिए, भले ही हर तरफ उसे ढंकने-छिपाने का प्रयास किया जा रहा हो। उसमें सत्य का हथियार की तरह प्रयोग करने का ‘गुण’ (skill) होना चाहिए। उसमें यह निर्णय (judgement) करने की क्षमता होनी चाहिए कि किसके हाथ में सत्य अधिक प्रभावशाली होगा। उसमें ऐसे योग्य लोगों के बीच सत्य का प्रचार करने की चतुराई (cunning) भी होनी चाहिए। फासीवाद के अधीन रह रहे लेखकों के लिए ये भारी मुश्किलें होती हैं, लेकिन ये उनके सामने भी होती हैं जो पलायन कर गए हैं या निर्वासन में हैं। ये मुश्किलें वहां भी हैं जहां लेखक ऐसे देश में रह रहे हैं जहां नागरिक स्वतंत्रता मिली हुई है। ब्रेख्त मानते थे कि अगर कला का उद्देश्य युयुत्स तथा प्रतिरोधी यथार्थवाद है तो वह केवल बुर्जुआ तथा सर्वहारा के मध्य के निर्णायक संघर्ष के दौरान ही अपनी सार्थक भूमिका का निर्वाह कर सकती है। यह ऐसे संघर्ष में हथियार की तरह है जो बुर्जुआ समाज के अंतिम भ्रामक रूपों को भी समाप्त कर देगा। इसके लिए केवल सत्य लिखना काफी नहीं है बल्कि एक विशेष पाठक वर्ग को ध्यान में रखकर सत्य को व्यक्त करना होगा। उनके लिए व्यक्त करना है जिन्हें इसकी सर्वाधिक आवश्कता है और पूंजीवाद की समाप्ति के संघर्ष में इसका सबसे अधिक प्रभावशाली इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए ब्रेख्त के अनुसार, लोकप्रिय कला का अर्थ है उत्पादक वर्ग की कला जो शताब्दियों से राजनीति का शिकार (object) रहे हैं और अब वे राजनीति का स्वयं प्रयोग करने की स्थिति (subject) में हैं। समाजवादी कलाकारों का काम ऐसे लोगों की सहायता करना है ताकि वे ऐतिहासिक विकास प्रक्रिया में सक्रियता से हस्तक्षेप कर सकें, ‘उसे उलट सकें, उसकी गति बढ़ा सकें, उसकी दिशा निर्धारित कर सकें।’ अपने प्रतिरोधी यथार्थवाद की अवधारणा की भांति ही उन्होंने लोकप्रियता की प्रतिरोधी अवधारणा पर बल दिया। उनके समस्त कला-सृजन के पीछे का मुख्य विचार बदलते यथार्थ को दिखाना था या यह दिखाना था कि यथार्थ को बदला जा सकता है। समाजवादी कला का उद्देश्य ‘परिवर्तनशील यथार्थ में निहित आनंद को समझने की इच्छा को प्रेरित’ करना रहा है। कला-सृजन के व्यावहारिक प्रश्नों से ब्रेख्त का सरोकार दरअसल कला के व्यावहारिक प्रयोग से जुड़ा हुआ था।

ब्रेख्त और लुकाच, दोनों ही कलात्मक सृजन के सिद्धांतों के बारे में लिख रहे थे, पर इस मामले में कलाकार और दार्शनिक के बीच का अंतर उनके द्वारा साहित्यिक विधाओं के चयन से प्रकट होता था। जैसे कि लुकाच की पहली पसंद उपन्यास थे जहां वैयक्तिकता अधिक स्पष्टता से उभरती थी और सौंदर्यबोधीय अनुभव परोक्ष रूप में ग्रहण होता था। ब्रेख्त ने हालांकि उपन्यास और कविताएं भी काफी लिखी हैं, पर मुख्य रूप से उनका जुड़ाव रंगमंच से था जहां किसी पाठक विशेष के स्थान पर व्यापक जनसमूह से संपर्क कायम होता है। इसका यह मतलब नहीं कि उनके तर्क विधाओं की प्राथमिकता से तय हो रहे थे। पर इससे यह तो जाहिर होता है कि सौंदर्यशास्त्र के बारे में प्रस्तावित भिन्न धारणाएं कला की भिन्न-भिन्न जरूरतों को रेखांकित कर रही थीं और इसमें व्यक्तिगत स्तर पर एक-दूसरे को नकारने की कोई भावना नहीं थी।

Shaswati-Mazumdar

शाश्वती मजूमदार, दिल्ली विश्विद्यालय के जर्मनिक एंड रोमांस स्टडीज में जर्मन की प्रोफेसर हैं. जॉर्ज लुकाच और बर्तोल्त ब्रेख्त के लेखन और इनके विवादों से गहरे रूप से परिचित हैं. फासीवाद  से मार्क्सवादी साहित्य-आलोचना के टकराव पर भी उनकी नज़र रही है. 

वैभव सिंह हिंदी के युवा आलोचक हैं. इनकी शोधवृत्ति  भाषा,  नवजागरण, इतिहास, राष्ट्रवाद जैसे इलाकों तक फैली हुयी है.  अनुवाद एक तरह से उनकी हॉबी है,  इनके द्वारा अनुदित टेरी इगलटन की पुस्तक ‘मार्क्सवाद और साहित्य-आलोचना ‘  हिंदी अकादमिक जगत में सबसे ज्यादा बिकने और पढ़ी जाने  वाली पुस्तकों में शुमार है.   

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