बना रहे गंगा ढाबा: संदीप सिंह

आज-कल जे.एन.यू. के गंगा ढाबा की जबर्दस्त चर्चा चल रही है. उसके कारणों के विस्तार में जाने का यहाँ समय नहीं है. ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि गंगा ढाबा की उपस्थिति के क्या मायने हैं उसे समझा जाय. उन्हीं मायनों से आज की चर्चा प्रासंगिक होती है. कभी-कभी यह जरुर लगता है कि जेएनयू  वालों के लिए गंगा ढाबा एक ‘फेटिश’ तो नहीं है, जिन्हें सहलाना उन्हें बहुत पसंद है. या फिर एक ऐसी जगह जहाँ की कुछ यादें जीवन भर के लिए एक टीस की तरह बजती है. मौसम ख़ुशगवार हो तो यह दर्द मीठी-मीठी सुइयों की तरह चुभता है और मौसम ने साथ नहीं दिया तो खुद भी सुई बन जाने से नहीं हिचकते हैं.

खैर, संदीप सिंह द्वारा लिखित यह  छोटा सा टुकड़ा  ‘गंगा ढाबा’ के मायनों को समझने में नजदीक की एक  दृष्टि देता है.

गंगा ढाबा (फोटो- विकास कुमार)

गंगा ढाबा (फोटो- विकास कुमार)

By संदीप सिंह 

जेएनयू से कम नाम जेएनयू के ‘गंगा ढाबा’ का नहीं है।  जब हम लोग इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंडर ग्रैजूएशन के छात्र थे तभी से दिल्ली गए सीनियर्स से जेएनयू के किसी गंगा ढाबा का नाम सुना करते थे जो ‘सुबह चार बजे तक खुला रहता था और जहाँ लोग चाय के कप के साथ गर्मागर्म बहसें किया करते हैं’। इलाहाबाद जैसे शहर में हॉस्टल में रहते हुए, जहाँ देर रात गए चाय पीने के लिए हमें प्रयाग रेलवे स्टेशन जाना पड़ता था, हमारे मन में गंगा ढाबा की एक बड़ी ही रोमांटिक छवि उभरती थी।

जेएनयू में एडमिशन वाली भागदौड़ के बाद हम तीन-चार इलाहाबादी दोस्त जो उस साल अलग-अलग विषयों में वहां दाखिल हुए थे, बाकायदा तैयार होकर ‘गंगा ढाबा देखने’ निकले थे। संभवतः हम चारों के लिए ढाबे का पहला दर्शन ‘दृश्यभंग’ जैसा था। हमारी कल्पना में जो एक व्यवस्थित, रोशनी से भरपूर और अब तक हमारे देखे-जाने ढाबा-कैंटीनों की तस्वीर थी, टूट गयी. अजीब झाड-झंखाड़ से भरी हुई एक उबड़-खाबड़ जगह, जहाँ चलने में आपके पैरों को आँखें रखनी पड़ती हैं। बैठने के लिए कुर्सियां न मेजें बल्कि टेढ़े-मेढ़े पत्थर। ऊपर खुला आकाश और बबूल की लगातार गिरती रहने वाली पत्तियों  की कांटेदार शाखाएं, जिनसे कब आपकी चाय में चींटा गिर पड़ेगा इसका ख्याल हमेशा रखना पड़ता है।

इस शुरुआती झटके के बाद थोडा गौर करने पर हमने पाया कि थोड़ी-थोड़ी दूरी  पर बने स्टूलंनुमा पत्थरों पर बैठे लोग अँधेरे और रोशनी के बीच वाली स्थिति में सच में कुछ बतियाये जा रहे थे। दूसरा झटका हमें ढाबे के काउंटर पर लगा। न नानवेज  न वेज! सिर्फ चाय, शुरू में एकदम अच्छा न लगने वाला पराठा, आलू के एकाध तैरते टुकड़े के साथ पानी से पतली ‘आलू मटर’ की सब्जी और आमलेट जैसी एक दो चीजें, और बस! समझ में नहीं आया कि आखिर ढाबा इतना फेमस क्यों है?

कैम्पस में थोडा व्यवस्थित होने के बाद जब पूरी लाइब्रेरी ‘पढ़’ जाने का जोश अपने उफान पर था, 11.30 पर लाइब्रेरी बंद होने के बाद गंगा ढाबा जाकर घंटा डेढ़ घंटा बैठना हमारी आदतों में कब शामिल हुआ, ये मैं कभी ठीक से जान नहीं पाया। धीरे-धीरे उस ‘अँधेरे-उजाले’ में बिखरे हुए उबड़-खाबडपन के भीतर से बनने वाले ‘स्पेस’ का अहसास होने लगा था। यह ‘स्पेस’ जेएनयू की खासियत है। गंगा ढाबा के ‘स्पेस’ का एबनार्मल या अनप्लांड स्ट्रक्चर उसकी विशेषता है। इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि किसी भी किस्म की कितनी भी प्राइवेट बात जितने निश्चिन्त तरीके से आप गंगा ढाबा पर कर सकते हैं उतनी निश्चितता से संभवतः जेएनयू के किसी और पब्लिक स्पेस में नहीं, लाइब्रेरी कैंटीन और आजकल के 24*7 ढाबा पर तो बिलकुल ही नहीं। पार्थसारथी चट्टानों के बाद जेएनयू में सबसे ज्यादा प्रेम प्रस्ताव संभवतः गंगा ढाबा के ही स्टूलनुमा पत्थरों के बीच उपस्थित अँधेरे-उजाले में स्वीकारे या ठुकराए जाते हैं, ऐसा मैं सिर्फ दूसरों के अनुभव से नहीं कह रहा हूँ। गंगा ढाबा की यह संरचना उसके ‘स्पेस’ को  एक खास किस्म की ‘वैयक्तिक्त्ता/पहचान’ देती है जिसमें आप बहुत सहज महसूस करते हैं। अगर आप गौर से देखें तो पायेंगे के ढाबे की इस ‘व्याप्ति’ के किसी कोने में बैठा एक लड़का या लडकी सबकी नजरों में आये बगैर सबको या किसी एक को ताके जा रहा है।

खैर, इसी ढाबे से हमने छात्र संगठनों के नेताओं/कार्यकर्ताओं को ‘आइडेंटीफाई’ करना शुरू किया। 2004 के उस ज़माने में मौर्याजी की दुकान के बगल में देर रात तक लगने ‘आइसा के लोगों का अड्डा काफी विजिबल हुआ करता था। एसएफआई के लोग वहां कम दिखते थे, उनका मुख्य अड्डा उस समय छात्रसंघ का ऑफिस ही हुआ करता था जिसको हम लोग अक्सर बाहर से झाँककर लौट आया करते थे। ऐसे ही किसी एक दिन जब मैं अपने कुछ मित्रों के साथ देर रात गंगा ढाबा पर बैठा हुआ था हमें आइसा के किसी कार्यकर्ता ने अगले दिन दिखाई जा रही फिल्म ‘एक मिनट का मौन’ की पर्ची दी जिसमें उस क्रांतिकारी छात्र नेता के जीवन और संघर्ष को  देखने के बाद रवि यादव और क्लास के ‘बाबा’ अमरेन्द्र त्रिपाठी के साथ मैं काफी खराब मनःस्थिति में चला गया था।

उस समय हम अभिषेक सर जो हाल ही में फुलब्राईट स्कालरशिप पूरी कर लौटे थे और आजकल बोस्टन विश्वविद्यालय में अध्यापक हैं, की शागिर्दगी में उनके शब्दों में ‘गंगा ढाबा’ करते थे। उनके हिसाब से ‘गंगा ढाबा करना’ सही में जेएनयूआइट होना है। यह भी सच है कि सबसे पहले ठीक ठीक से ऋत्विक घटक, सबाल्टर्न स्टडीज, रणधीर सिंह, फ्रेंचेस्का के पब्लिक स्फेयर, पाल ब्रास, पाल रिकर, फूको और हैबरमास के बारे में वहीँ और उन्ही से सुना।

बाद में छात्र सक्रियता के दौर में जब अक्सर हमारा मेस का खाना छूट जाया करता था या देर रात कैम्पेन ख़त्म होती थी, हमारी भूख वही ढाबा वाला पराठा ही मिटाता था जिससे हमारी शिकायतें कभी ख़त्म नहीं हुईं। जुलूस ख़त्म हुआ है और रात के 1 बज चुके हैं। 10-15 रूपये में अगर पेट भरना है तो चलो गंगा ढाबा। संगठन की कमेटी की बैठक देर रात ख़त्म हुई है, अगले दिन की प्लानिंग का तनाव साफ़ दिख रहा है, भूख लगी है, चलो गंगा ढाबा। युनियन की काउंसिल की तल्ख़ बैठक ख़त्म हुई है, मूड ऑफ़ है, चाय पीनी है, चलो गंगा ढाबा। मालूम है कोई दोस्त/कामरेड या अच्छा लगने वाला मिल ही जायेगा जिसको देखकर आप खुश हो जाते हैं. आप अकेले हैं, मन नहीं लग रहा है, चलो गंगा ढाबा।

जेएनयू का अघोषित पोलिटिकल सेंटर है गंगा ढाबा। सब कुछ वहीँ से शुरू होता है, जुलूस भी और चुनावी अफवाह भी। आजकल के नए ढाबे/कैंटीन  अपनी संरचना में काफी सीमित और संकुचित है जिन पर इस बाजारू समय का असर साफ़ दिखता है. और दिखता है कि कैसे इस ‘समय’ में दीक्षित होने वाले हमारे नौजवान गंगा ढाबा की अहमियत को शायद कम समझ रहे हैं। बावजूद इसके गंगा ढाबा इस ‘समय’ के दबाव में नहीं आता है, अपनी पहचान के साथ खड़ा रहता है, सर नहीं झुकाता। चमक-दमक भरे इस ‘बाजारू’ समय का एक तरह से क्रिटीक है गंगा ढाबा।
जेएनयू में गंगा ढाबा  का होना आश्वस्तिदायक है। वो कहता है कि तुम आओ, मैं हूँ और वहीँ मिलूंगा। बना रहे, बचा रहे गंगा ढाबा।

sandeep singhसंदीप सिंह जेएनयू  छात्रसंघ के अध्यक्ष  और छात्र संगठन आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं . आजकल अध्ययन-चिंतन  में निमग्न हैं . उनसे संपर्क जरिया उनका गुल्लक , sandeep.gullak@gmail.com है. 

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2 thoughts on “बना रहे गंगा ढाबा: संदीप सिंह

  1. sanjay prajapati on said:

    खुबसूरत शब्द चित्रांकन संदीप भाई ..

  2. अत्यंत सटीक और दिल को छू लेना वाला |

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