पोलिश मिथक और अधमताएँ: तत्याना षुर्लेई

पोलैंड में तत्याना की ख्याति भारत-विज्ञ के साथ-साथ फिल्म-आलोचक के रूप में है। वे बॉलीवुड की फिल्मों को पैशन के साथ देखती हैं । उनके शोध-विषय का एक हिस्सा बॉलीवुड के साथ जुड़ा हुआ है। उनके द्वारा मूल रूप से हिन्दी में लिखे गए पूर्व प्रकाशित लेख भी बॉलीवुड-भारतीय सिनेमा से ही संदर्भित रहे हैं । हमने उनसे आग्रह किया कि पोलिश सिनेमा के बारे में भी कुछ नयी जानकारियाँ हिन्दी के पाठकों को मिलनी चाहिए । तत्याना का यह लेख इसी आग्रह की पहली कड़ी है। यह लेख दो हिस्सों में विभक्त है । पहला हिस्सा पोलिश सिनेमा के पृष्ठभूमि को संक्षेप में सारगर्भित तरीके से स्पष्ट करता है और दूसरा पोलैंड के एक महत्वपूर्ण समकालीन फिल्मकार वोइचेह स्मजोव्स्कि की फिल्मों को विश्लेषित करता है ।

अपनी समस्याओं के जिम्मेवार तत्व के रूप में अक्सर रूस और जर्मनी और आस्ट्रिया आदि को चिन्हित करना, विश्वयुद्धों की विभिषकाओं को अपनी त्रासदियों का उत्स मानना, अधिकतर पोलिश सिनेमा के विषय-व्यवहार का हिस्सा रहा है । इसके चलते पोलिश फिल्मों में जो विविधता परिलक्षित होनी चाहिये थी, वह नहीं हो पायी । एकरसता मानों स्थायी भाव सा हो गया था । वोइचेह स्मजोविस्क की फिल्में उस एकरसता को भंग करती हैं ।

कैथोलिक चर्च के प्रभामंडल में सबसे ज्यादा आलोकित होने वाले देशों में मुख्यत: चार को उद्धृत  किया जा सकता है : इटली, स्पेन, आयरलैंड और पोलैंड । इटली पूरी तरह से और स्पेन लगभग चर्च के प्रभावशाली दुर्ग से बाहर निकल चुका है । आयरलैंड और पोलैंड अभी भी सबसे मजबूत दुर्ग के बतौर विद्यमान हैं, ये दोनों देश कहीं न कहीं जनांदोलन के भी केन्द्र रहे हैं । पोलैंड जहाँ तथाकथित कम्युनिस्ट अधिकृत शासन-व्यवस्था के विरूद्ध संघर्षरत रहा है वहीं आयरलैंड पूंजीवादी राय-व्यवस्था के प्रतिनिधि ग्रेट ब्रिटेन के विरूद्ध। विडंबना यह है कि आंदोलन के इन दोनों पहलुओं की निष्पत्ति सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहारों में कैथोलिक चर्च के प्रभुत्व के रूप में हुयी । चर्च के इस प्रभुत्व का असर पोलिश सिनेमा पर भी होना तय ही था, जिसके परिणामस्वरूप पोलिश फिल्मों में एक अध्यात्मिक माहौल का रचाव दिखता है, परम्परा और धार्मिक-संस्कार अनुष्ठानों का महिमा गान भी परिलक्षित होता है। वोइचेह स्मजोव्स्कि शायद पहला पोलिश निदेशक होगा जिसने पोलैंड में रहते हुए बहुत ही सफाई के साथ पोलिश-समाज की आत्मलोचना को दृश्यांकित किया है । फिल्मकार वेलरियन ब्रौव्चेक की याद आती है जो पचास के दशक में ही सीधे-सीधे चर्च से भिड़ गया था और जल्द ही निर्वासित होकर फ्रांस चला गया था । तत्याना ने बहुत ही विस्तार से उपर्युक्त सन्दर्भ-बिन्दुओं को विश्लेषित किया है ।

By तत्याना षुर्लेई

वोइचेह स्मजोव्स्कि (Wojciech Smarzowski) की फ़िल्मों में पोलिश मिथक और अधमताएँ

भारत-प्रवास के समय बहुत लोग मुझसे पोलिश सिनेमा और उसके निर्देशकों के बारे में पूछ रहे थे। इस कारण मैंने सोचा कि शायद यह विषय गैर पोलिश लोगों के लिए सचमुच दिलचस्प हो सकता है। पोलिश सिनेमा को समझना आसान नहीं है क्योंकि इसके लिए पोलैंड के बारे में थोड़ी सी जानकारी की ज़रूरत है। दूसरे महायुद्ध के बाद पोलिश सिनेमा जो युद्ध से पहले बहुत अच्छा था, बिलकुल ध्वस्त हो गया और स्टालिन की मौत तक अधिकांश फ़िल्में प्रचार (Propaganda) के लिए बनाई जाती थीं। 1953 के बाद फ़िल्मों के ऊपर नियन्त्रण (Censorship) थोड़ा कम हो गया जिसके कारण पोलिश सिनेमा अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में जा पहुंची। इसी समय में पोलिश फ़िल्म स्कूल नाम की एक संस्था बनी। इस संस्था की फ़िल्मों के मुख्य विषय होते थे – युद्ध की घातक यादें, और इसके दो रूप थे: एक बहुत विलक्षण और वीरतापूर्ण जैसे अंजेई वइदा (Andrzej Wajda) की फ़िल्मों में और दुसरा, ज़्यादा कठोर और अवसादात्मक, जो कि अंजेई मुँक (Andrzej Munk) की फिल्मों में उपलब्ध है। येजि कवालेरोविच (Jerzy Kawalerowicz), कज़िम्येष कुत्स (Kazimierz Kutz), तदेउष कोन्वित्स्कि (Tadeusz Konwicki) और वोइचेह येजी हस (Wojciech Jerzy Has) पोलिश फ़िल्म स्कूल के दूसरे अन्य बहुत अच्छे निर्देशक थे। कुछ ऐसे भी निर्देशक थे जो पोलिश फ़िल्म स्कूल से संबंधित नहीं थे लेकिन वे भी दिलचस्प और प्रसिद्ध हैं जैसे: चेसुअव पेतेल्स्कि (Czesław Petelski), तदेउष ह्म्येलेव्स्कि (Tadeusz Chmielewski) और विदेशों में ज़्यादा मशहूर: रोमन पोलञ्स्कि (Roman Polański) और येजि स्कोलिमोव्स्कि (Jerzy Skolimowski).

60 और 70 के दशक में पोलिश फ़िल्म स्कूल की प्रासंगिकता धीरे-धीरे खत्म होनेवाली थी क्योंकि दूसरे महायुद्ध का ज़माना और उस समय की अवसादात्मक यादें पुरानी बात हो गई थी। आधुनिक समय इन सबसे ज़्यादा दिलचस्प लगने लगा था क्योंकि इस समय में भी बहुत सारी महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घट रही थीं। अफ़सोस की बात यह है कि 1968 के बाद फिल्मों पर नियन्त्रण फ़िर से तीखा हो गया। इस साल में कज़िम्येष देइमेक (Kazimierz Dejmek) के निर्देशन वाले अदम मित्स्क्येविच (Adam Mickiewicz) के नाटक को पूर्वजों के त्योहार (Dziady) के पहले दिन ही नाट्यशालों में रोक दिया गया। पोलैंड के सारे विद्यार्थियों ने बड़े शहरों के सड़कों पर इस फैसले का विरोध किया। यह नाटक पोलिश संस्कृति के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। मित्स्क्येविच ने इसे तब लिखा जब पोलैंड का बंटवारा किया गया। 1772, 1793 और 1795 में तीन बार पोलैंड का विभाजन हो चुका था और देश का एक हिस्सा रूस, दूसरा प्रशिया और तीसरा ऑस्ट्रीया के पास चला गया। रूस और प्रशिया पोलिश संस्कृति और भाषा को नष्ट करना चाहते थे जबकि ऑस्ट्रीया वाले हिस्से में जीवन इतना मुश्किल नहीं था और वहाँ कला का विकास संभव था। अदम मित्स्क्येविच का नाटक रूस के विरोध में है इसलिए 1968 में उसको दिखाना साम्यवादी सरकार को अच्छा नहीं लगा। विद्यार्थियों के प्रतिवादों के बाद सिनेमा की स्थिति फ़िर से मुश्किल हो गई और इसके कारण स्कोलिमोव्स्कि, पोलञ्स्कि और फ़ोर्द (Ford) पोलैंड को छोड़कर विदेश चले गये। इसी समय ऐतिहासिक सिनेमा प्रसिद्ध हो गया क्योंकि अतीत में घटित राजनीति वर्तमान को बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करती थी और ऐसी फ़िल्में सरकार के लिए कुशल भी थीं। इस समय में भी ऐसे निर्देशक अवश्य थे जिनकी फ़िल्में आधुनिक घटनाओं पर आधारित थीं, लेकिन ज़्यादा नहीं। इस समय में ऐसी फ़िल्में भी बनाई गईं जो रूस की सेना के दृष्टिकोण से अपनी कहानी कह जाती थीं।

70 और 80 के दशक के बीच के सिनेमा को सात्विक उत्सुकता का सिनेमा कह सकते हैं, जो कि पोलैंड के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। अंजेई वइदा इस दौर का भी बहुत महत्त्वपूर्ण निर्देशक था और उसके अलावा क्षिष्तोफ़ ज़नुस्सी (Krzysztof Zanussi), क्षिष्तोफ़ क्येश्लोव्स्कि (Krzysztof Kieślowski), फ़ेलिक्स फ़ल्क (Feliks Falk), फ़िलिप बयोन (Filip Bajon) और अग्ञेष्का होलांद (Agnieszka Holland)। इस समय जो फ़िल्में बनाई जाती थीं वे बहुत दुःखद और कठोर थीं इसलिए इनमें से ज़्यादातर को दिखाना उस समय में मना था। कान (Cannes) में ग्रैंड प्रिक्स जीतने वाली पहली पोलिश फिल्म को भी पोलैंड में कोई नहीं देख सकता था। ऐसी स्थितियों में पोलिश सिनेमा फ़िर से बिखर गया। कुछ निर्देशकों ने, जैसे अग्ञेष्का होलांद, पोलैंड छोड़ने का निश्चय किया। इस समय पोलैंड में प्रहसन और भावोत्तेजक फ़िल्में बनाई गईं क्योंकि इनमें तात्कालिक राजनीति की ज़रूरत नहीं थी। उन फ़िल्मों के मूल विषय धार्मिक-सांस्कृतिक रिवाज थे, जो आज भी बहुत प्रचलित प्रसंग है।

90 के दशक में फ़िल्मों के आर्थिक प्रबन्ध का तरीका बदल गया और पैसा देनेवाले अन्य स्रोत उपलब्ध नहीं थे । इस समय में बहुत ऐसी फ़िल्में बनीं जिनका विषय साम्यवाद और सैनिक कानून से संबंधित था और जो अपने समय की अलोचना प्रस्तुत करती थीं। कुछ ऐसे निर्देशक भी थे जिनके लिए राजनीति महत्त्वपूर्ण नहीं था लेकिन उनकी फ़िल्में शानदार हैं; जैसे यन यकुब कोल्स्कि (Jan Jakub Kolski) की फ़िल्में, जो भारत में भी काफ़ी लोकप्रिय हैं और अंजेई कोन्द्रत्युक (Andrzej Kondratiuk) की। उस समय में की फ़िल्में बहुत ही कठोर और निराशा भरी वास्तविकता को दिखाते हैं और जिनमें पोलैंड का चित्रण अच्छा नहीं है। उन फ़िल्मों में पोलैंड एक ऐसा देश है जो नयी जनतन्त्रीय रीति के लिए तैयार नहीं है और जहां ह्रासोन्मुख प्रवृतियाँ और अपराध हुकुमत करता है।

21 शताब्दी की शुरु में भी पोलिश सिनेमा के लिए बहुत अच्छा समय नहीं था क्योंकि ज़्यादातर फ़िल्में पोलिश साहित्य पर आधारित थीं। स्कूल में हर बच्चे को जिन किताबों को पढ़नी चाहिए थीं, उन सब पर फ़िल्में बन गईं और मज़ाक में लोग कहने लगे थे कि अब तो स्कूल के बच्चे न किताबें पढ़ते हैं न अच्छी फ़िल्में देखते हैं। कभी-कभी अच्छी फ़िल्में भी जरूर बनाई जाती थीं लेकिन वे भी खराब फ़िल्मों में डूब जाती थीं। 2005 में पोलिश फ़िल्मों का एक संस्थान बन गया जो कलात्मक फ़िल्में बनानेवालों को आर्थिक मदद देता है और जिसकी मदद से आजकल अच्छी फ़िल्में बनाई जाती हैं। मैं एक आधुनिक निर्देशक के बारे में कुछ लिखना चाहती हूँ जिसका नाम वोइचेह स्मजोव्स्कि है क्योंकि वह मुझे बहुत ही दिलचस्प लगता है। स्मजोव्स्कि बहुत अच्छी तरह से उस रीति का पालन करता है जिसमें इतिहास का मूल्यांकन संभव है और यह सब पोलैंड के लिए प्रतीकात्मक है, साथ ही साथ उसकी फ़िल्में बहुत ही ज्याद निष्ठुर और निराशावादी हैं जो कि एक नयी बात है। निराशावादी होना पोलिश सिनेमा में कोई नयी बात नहीं है लेकिन स्मजोव्स्कि की फ़िल्मों में किसी भी तरह की आशा नहीं है। स्मजोव्स्कि पोलैंड की सारी राष्ट्रीय पवित्र बातें और वर्जनाएँ दिखाता है और उनकी बहुत गहरी अलोचना करता है और इस कारण उसकी फ़िल्मों का असर बहुत तेज़ है। उसकी फ़िल्मों को अच्छी तरह समझने के लिए सब से पहले पोलिश लोकाचार को समझना चाहिए। पोलिश संस्कृति में कुछ बहुत ही बड़े घाव/निशान हैं जो साम्यवाद, युद्ध और बंटवारे से संबंधित हैं और जिनको हमेशा याद रखना चाहिए क्योंकि ये तत्व पोलिश संस्कृति के आधार हैं।

स्मजोव्स्कि की पहली फ़िल्म 1998 की है और इसका नाम है – बहिकर्ण (Małżowina) है। यह फ़िल्म एक कवि की रचनात्मक कमजोरी के बारे में है। फ़िल्म के नायक का नाम म. है और वह एक लेखक है जो किताब लिखने के लिए क्राकोव शहर (Kraków) के एक पुरानी इमारत में एक कमरा किराये पर लेता है। अफ़सोस की बात यह है कि यहाँ उसका लिख पाना असंभव है क्योंकि आसपास हमेशा कुछ ऐसा होता है जिससे वह परेशान हो जाता है। सब से बड़ी परेशानी पड़ोसियों के द्वारा खड़ी की जाती है, क्योंकि पति के शराब पीने के कारण पति-पत्नी रोज़ लड़ाई करते हैं। म. के पड़ोसी इतने आततायी हैं कि वह इस समस्या का समाधान कड़ाई से करता है। यह फ़िल्म नाटक की शैली में बनाई गई है इसलिए पूरी कहानी एक छोटे कमरे में चल रही है। फ़िल्म के नायक के अंधेरे, गंदे कमरे में दोस्त, लेनदार, मालकीन, पड़ोसी और अंत में पुलिस आते हैं। लेकिन इन सब लोगों के बावजूद फ़िल्म देखनेवालों को लगता है कि बहिकर्ण, जिसका नाम फ्रैंज काफ्का (Franz Kafka) की डायरी 1910-1923 के अवतरण से लिया गया है, के नायक ने न सिर्फ़ अपने पड़ोसियों को ईज़ाद किया बल्कि अपने पूरे अपराध को भी। चूँकि, परेशान करनेवाले लोग उसके दिमाग में घर कर गए लोग लगते हैं। इस फ़िल्म का मूल विषय कलाकर की ज़िम्मेदारी है और कलाकर का काम चरित्र और घटनाओं को उत्पन्न करने जैसा है, वह जन्मदाता है। किताबों, कविताओं, संगीत या तस्वीरों में जो लोग आते हैं वे अपना जीवन जी रहे हैं इसलिए हर कलाकर को उनके बारे में सोचना चाहिए और हर की ज़िम्मेदारी स्वयं कलाकार की ज़िम्मेदारी है। स्मजोव्स्कि की फ़िल्म एक दूसरी फ़िल्म, मार्क फोर्स्टर (Mark Forster) की स्ट्रैन्जर दैन फिक्शन (2006) से मिलती-जुलती है, और जिसका नायक एक दिन में समझता है कि वह वास्तविक आदमी नहीं है, सिर्फ़ एक किताब का नायक जिसे एक लेखिका ने अविष्कृत किया है। हालांकि बहिकर्ण में कष्टदायी पड़ोसियों का होना या न होना इतना स्पष्ट नहीं है लेकिन जब अंत में फ़िल्म का नायक अपने टंकण मशीन को फेंक देता है तो इसका मतलब यह हो सकता है कि उसने प्रतीकात्मक रूप में सचमुच अपने कल्पनाशील पड़ोसियों को मार दिया या ऐसा ही कुछ।

म. के चरित्र का अभिनय कोई पेशेवर अभिनेता नहीं करता है; इस भूमिका को मर्चिन श्व्येत्लित्स्कि (Marcin Świetlicki) ने किया और यह फ़िल्म के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है, क्योंकि पोलिश संस्कृति में श्व्येत्लित्स्कि का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण है। मर्चिन श्व्येत्लित्स्कि लेखक और कवि है जिसका काम क्राकोव शहर से संबंधित है। क्राकोव पोलिश संस्कृति का केन्द्र है और वह 1795 तक पोलैंड की राजधानी थी। बाद में, बंटवारे के समय जब पोलैंड 123 सालों के लिए यूरोप से गायब हो गया; क्राकोव में, जो ऑस्ट्रीया का हिस्सा था, पोलिश संस्कृति का सब से ज्यादा विकास हुआ क्योंकि, जैसा कि मैंने ज़िक्र किया था, यह राज्य दूसरे दोनों राज्यों से ज्यादा उदार था। फिर भी, मर्चिन श्व्येत्लित्स्कि का क्राकोव बिलकुल अलग शहर है, जिसमें बहादुरी के लिए स्थान नहीं है, और वह कवि अक्सर राष्ट्रीय मिथकों और भक्तिभावना से परिपूर्ण रचनाओं की हंसी उड़ाता है। भूमिगत और साम्यवाद-विरोधी संस्थाओं से संबंध के बावजूद वह सोचता है कि सही और अच्छी कविता को हमेशा रीति-रिवाजों-परिपाटी के विरुद्ध होना चाहिए। हर तरह के रिवाज और किसी भी तरह के कानून के विरुद्ध। अपनी एक प्रसिद्ध कविता में, जिसका नाम यान पोल्कोव्स्कि के लिए है, उसने लिखा कि भक्तिभावना की रचनाएँ गुलाम की कविता है जिसके हर वृक्ष के अंदर काँटेदार तारों से बने होली क्रॉस (ईसाई धर्म-चिन्ह) छिपे होते हैं।

फ़िल्म का नायक विद्रोही कलाकर है और फिल्म में इस बात पर ज़ोर दिया गया है। जब फ़िल्म के एक प्रसंग में म. की सहेली कहती है कि अंजेई बुर्सा (Andrzej Bursa) उसके टाइपराइटर का इस्तेमाल करता था। अंजेई बुर्सा एक जवान विद्रोही कवि था। उसकी कविताओं में बहुत ही ज्यादा निराशा का माहौल था और जो अक्सर पाठकों को झटका देती थीं। क्राकोव भी, जो पोलैंड की संस्कृति का केन्द्र है इस फ़िल्म में अनजान शहर लगता है, पर्यटकों के चहेते-सुंदर स्थान से बिलकुल अलग। लगता है कि फ़िल्म के शहर में सिर्फ़ गंदे पिछवाड़े के अहाते और छोटे अँधेरे कमरे हैं और वहाँ रहनेवाले लोग सिर्फ़ वोदका और सिगरेट पीते हैं। एकरंगा दृश्य और अनाड़ी कैमरे के इस्तेमाल से फ़िल्म ज़्यादा ही निराशात्मक लगती है और यह वोइचेह स्मजोव्स्कि फिल्मों की एक लाक्षणिक विशेषता है।

निर्देशक की दूसरी फ़िल्म का नाम शादी (Wesele) है। यह फ़िल्म 2004 की है। यह फ़िल्म थोड़ी सी अलग है और दूसरे आगामी फिल्मों की तुलना में आशावादी। फ़िल्म की कहानी दक्षिण पूर्व पोलैंड में रहने वाले एक अमीर व्यापारी की बेटी की शादी के बारे में है। गाँव की शादी धुमधाम से चल रही है। जबकि दुल्हन पहले से ही गर्भवती है। गर्भवती दुल्हन से जो बच्चा होगा उसका ‘असली’ पिता विश्वविद्यालय में लड़की का दोस्त था। इसीलिए, दुल्हन का पिता गाँव में रहनेवाले एक लड़के को शादी करने के लिए रिश्वत देता है क्योंकि बिना शादी के बच्चा पैदा करना छोटे पोलिश गाँवों में आज भी बड़ी शर्म की बात है। शादी की रिश्वत जर्मनी से लायी गई एक बहुत महंगी गाड़ी है। लेकिन जल्दी ही यह पता चलता है कि गाड़ी चोरी हो गई है, जो कि पोलैंड में अक्सर ही होता है। जिन डाकुओं ने गाड़ी की चोरी की है, वे पैसे के अलावा ज़मीन भी चाहते हैं, जिसके मालिक दुल्हन के नाना जी हैं। बुढ़ा आदमी अपना ज़मीन किसी को देना नहीं चाहता है। डाकू व्यापारी की उँगली को काट देते हैं। इसके अलावा दुल्हन के बच्चे का बाप यानी दुल्हन के विश्वविद्यालय वाला दोस्त भी शादी में आता है। मेहमानों के पेट खराब हो जाते हैं क्योंकि व्यापारी ने गाँव के नज़दीकवाले शहर सनोक से सस्ता और बासी माँस खरीदा। नाना जी मर जाते हैं। अनुपयोगी पुलिस गाड़ी के नकली कागजात बनाते हैं। एक वकील जो व्यापारी का दोस्त है, प्रलोभन में आ जाता है और ज़मीन को अपने नाम हस्तांतरित करवा लेता है। फ़िल्म के अंत में व्यापारी के सारे गंदे कारनामों की पोल खुलती है। उसकी बेटी और पत्नी उसको छोड़ देती है।

शादी ऐसा नाम है जो पोलिश दर्शकों के लिए महत्त्वपूर्ण है और उनको आकर्षित करता है। क्योंकि, यह पोलैंड के राष्ट्रीय नाटक का नाम भी है जिसे स्तञिसुअव विस्प्याञ्स्कि (Stanisław Wyspiański) ने लिखा और जिसे 1901 में पहली बार दिखाया गया। विस्प्याञ्स्कि लेखक होने के अलावा मशहूर चित्रकार भी था। उसने अपना नाटक तब लिखा जब पोलैंड आज़ाद देश नहीं था। यह नाटक क्राकोव के पास एक गाँव में शादी के बारे में है। जहाँ गाँव में रहनेवाले मेहमानों के अलावा वे ऐतिहासिक व्यक्ति भी आते हैं जिनका पोलिश संस्कृति से बड़ा संबंध है। वे लोग मेहमानों को लड़ाई के लिए उत्तेजित करने की कोशिश करते हैं लेकिन उनकी चेष्टा असफल हो रही है। नाटक में जमींदार लोगों के हत्याकांड का संदर्भ है जिसे 1846 में ऑस्ट्रिया के हिस्से में रहते हुए गाँववालों ने अंजाम दिया था। ऑस्ट्रिया की सरकार को पोलिश लोगों की बगावत से डर था इसलिए उसने गाँववालों को बताया कि अमीर लोग उनको मार देना चाहते हैं। यह सब सुनकर गाँववालों ने अपने जमींदारों को मार दिया। विस्प्याञ्स्कि के नाटक में यह बात स्पष्ट है कि देशी जमींदारों और उनकी प्रजा के बीच समझौते-साझेदारी के बिना पोलैंड अपनी अज़ादी के लिए कभी लड़ाई नहीं कर सकेगा। गाँव की शादी में वेर्निहोड़ा नाम का एक भविष्यवक्ता आता है। कहावत है कि पोलैंड के बंटवारे और आज़ादी की भविष्यवाणी उसी की है। विस्प्याञ्स्कि का वेर्निहोड़ा गाँववालों को सोने का रण-सिंगा (युद्ध में बजने वाला वाद्ययंत्र) देता है, जिसमें पुरे देश को लड़ाई के लिए बुलाने की शक्ति है। अफ़सोस की बात यह है कि रण-सिंगा को एक जवान लड़का लेता है जिसका नाम यशेक है और वह थोड़ा सा चंचल है। यशेक रण-सिंगा के बारे में ज़्यादा नहीं सोचता है क्योंकि उसके लिए क्राकोव की अपनी परम्परागत, सुंदर लाल टोपी (फ़ोटो 1), जिसमें मोर के पंख हैं और जिसे उसने शादी के लिए बनवाया है, ज़्यादा महत्त्वहूर्ण है।

फ़ोटो 1.

फ़ोटो 1.

सोने का रण-सिंगा हमेशा के लिए खो जाता है। शादी के मेहमान किसी कठपुतली की तरह नाच में मतिभ्रमित हैं, व्यस्त हैं और अपने देश के बारे में नहीं सोचते हैं। शादी में पुआल की एक मूर्ति भी आती है। उस मूर्ति का रूप-आकार वैसा ही है, जैसे सर्दी के मौसम में गुलाब के पौधे को ठंड से बचाने उसमें पुआल लपेट दिया गया हो और विस्प्याञ्स्कि ने जिसका एक चित्र भी बनाया (फ़ोटो 2)। नाटक में, पुआल वाली मूर्ति गाँववालों के लिए संगीत बजाती है।

फ़ोटो 2.

फ़ोटो 2.

विस्प्याञ्स्कि का नाटक- शादी फ़िल्म के लिए बहुत ही अनुकूल विषय बन गया और जिसे अंजेई वइदा ने 1972 में चित्रित किया। स्मजोव्स्कि की फ़िल्म नाटक पर आधारित नहीं है लेकिन यहाँ भी, बिलकुल अलग कहानी होने के बावजूद बहुत ऐसे अंश हैं जो राष्ट्रीय नाटक से संबंधित हैं। फ़िल्म की कहानी आधुनिक समय में चलती है, जब पोलैंड न सिर्फ़ साम्यवाद से बाहर आया बल्कि यूरोपीय संघ का सदस्य भी बन गया। दुल्हन का बाप एक ठेठ निष्ठुर कारोबारी है जिसको मुक्त बाज़ार के लेनदेन की मदद से इतना पैसा मिला कि वह गाँव का सब से अमीर आदमी हो गया है। अपनी धन-दौलत और नई पहचान के बावजूद वह आदमी मानसिक रूप से पुराने ज़माने के परम्परागत पोलिश समाज के अनुसार सोचता है, इसलिए उसके लिए सब से महत्त्वपूर्ण बात दिखावट है और उसकी बेटी बिना शादी बच्चा पैदा नहीं कर सकती है। उसके लिए बेटी की खुशी महत्त्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि सबसे विशिष्ट बात यह है कि पड़ोसियों और गाँव के पुजारी उसके परिवार के बारे में क्या राय रखते हैं। उसे प्रतिष्ठा खोने का डर इतना बड़ा है कि वह हर व्यक्ति को पैसे देने के लिए तैयार है ताकि प्रतिष्ठा पर आंच न आये। यह व्यवहार इसका अच्छा उदाहरण है कि राजनीतिक व्यवस्था बदलने के बावजूद पोलिश गाँवों में आज भी पैसे और वोदका के बदले सब कुछ करवाना संभव है। यह बात विस्प्याञ्स्कि के नाटक से मिलती-जूलती है क्योंकि पुराने शादी में सब लोग आज़ादी के लिए लड़ाई कर नहीं सकते थे और स्मजोव्स्कि के नायक सिर्फ़ सोचते हैं कि उनको आज़ादी मिल गई। स्वतन्त्रता और राष्ट्रीय आदर्श केवल प्रचार-वाक्य हैं जिसका कोई अर्थ नहीं है और जिसे सिर्फ़ नशे में गाया जा रहा है। एक क्षण में शादी के शराबी मेहमान प्रसिद्ध स्वदेशानुरागपूरित गाना गाते हैं जो कि पोलिश संस्कृति के एक लाक्षणिक व्यवहार के रूप व्यंजित हो चुका है। गाने में सोने के रण-सिंगा और उसके आह्वान के इंतज़ार का संदर्भ है। आह्वान के इंतज़ार के बारे में नशे की हालत में गाते सभी मेहमान ऐसे लगते हैं मानो नाटक के ही पात्रों को चरितार्थ कर रहे हों। फ़िल्म में भी विस्प्याञ्स्कि की प्रसिद्ध तस्वीर (फ़ोटो 3) दिखाई गई जो इसका सबूत हो सकता है कि स्मजोव्स्कि नाटक से बहुत अभिप्रेरित था और अपने दर्शकों को यह बताना चाहता है कि उसकी शादी ज़्यादा स्वतंत्र फ़िल्म नहीं है और उसे नाटक से जोड़ना चाहिए (फ़ोटो 4)। फ़िल्म के अंत में वोइचेह कुचोक (Wojciech Kuczok) के गोबर (Gnój) नाम के उपन्यास को प्रेरणास्रोत के बतौर दिखाया गया है जिसके अंत में सब कुछ गोबर में डूब जाता है और दुख स्मृतियों का नाश करता है।

फ़ोटो 3.

फ़ोटो 3.

फ़ोटो 4.

फ़ोटो 4.

स्मजोव्स्कि की फ़िल्म में सब लोग गोबर में नहीं फँसते हैं। लेकिन, यहाँ जो शौचालय की बदइंतजामी है, यह भी बड़ा संकेत है। बाहर में जो निकालते हैं वे भी परिवार और राष्ट्र की सारी गंदगी से ही संबंधित हैं क्योंकि वे बहुत बुरी तरह और अचानक शादी के समय में ही बाहर निकलते हैं। इस फ़िल्म में भी स्मजोव्स्कि अनाड़ी कैमरे का इस्तेमाल करता है क्योंकि शादी में फोटोग्राफर उपस्थित है। अनजाने में ही इस फोटोग्राफर की फ़िल्म में बहुत सारे धोखेबाज़ उसके फिल्म में रेकॉर्ड हो जाते हैं और दुल्हन को पता चलता है कि उसका पति उससे नहीं, गाड़ी से प्यार करता है और इसीलिए उसने यह शादी की है। नाना जी की ज़मीन के बारे में भी सच निकलता है और दुल्हन को यह भी पता चलता है कि ज़मीन इतनी महंगी इसलिए है क्योंकि वहाँ यूरोपीय संघ के पैसों के मदद से राजमार्ग बन जाएगा। शादी इतनी कठोर फ़िल्म नहीं, ज़्यादा व्यंग्यपूर्ण है। लेकिन राष्ट्रीय नाटक से स्पष्ट संबंध होने के कारण पोलिश संस्कृति के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। साथ ही साथ इसको कुशलतापूर्वक आधुनिक समय में डालना स्टीरियोटाइप्ड पोलैंड का बहुत अच्छा चित्रण है।

स्मजोव्स्कि की तीसरी फ़िल्म का नाम डार्क हाउस (Dom zły) है और यह 2009 की है। यह बहुत ही डार्क (Dark) कहानी है जो 1982 के दक्षिणी पोलैंड के पहाड़ों में चलती है। कहानी साम्यवादी पोलैंड के ज़माने की है। वर्णन के दो स्तर हैं: एक अपराध के स्थान के निरीक्षण की प्रक्रिया है, और दुसरा, एक अवलोकन जिसके मदद से दर्शक देख सकता है कि क्या हुआ। अपराध एक छोटे घर में हुआ है जहाँ नागरिक सेना (Peoples Army) आती है, संदिग्ध अपराधी के साथ। फ़िल्म का नायक जिसका नाम एद्वर्द श्रोदोञ है। वह काम करने के लिए पहाड़ों में आया है और एक रात तेज़ बारिश में फंस कर एक दम्पति के पास पहुँच जाता है। वे लोग उसको रात को सोने के लिए अपने यहाँ शरण देते हैं और साथ में खाने-पीने का दौर चलता है। पास ही चीनी का एक करखाना है जहाँ एडवर्ड को काम मिल जाता है। उसके पहले वहाँ एक और आदमी काम करता था जिसके बारे में ज्यादा कुछ मालूम नहीं पड़ता है। आसपास के लोग कहते हैं कि उस आदमी को कारखाने के वैसे बहुत सारे बड़े भ्रष्ट लोगों के बारे में पता था, जो बड़े-बड़े भ्रष्टाचार में लिप्त थे। जब वह इन सब चीजों के बारे में लोगों को बताने लगा, तुरंत लापता हो गया। एडवर्ड को शरण देने वाले दंपति का मानना है कि यह दुर्घटना कारखाने में काम करने वालों के लिए कोई अप्रत्याशित घटना नहीं थी क्योंकि उसकी मृत्यु करखाने में चोरी करनेवालों के लिए फायदेमंद थी। घर का मालिक और उसका मेहमान शराब पीकर बहुत ही दिलचस्प बात करते हैं। घर में रहनेवाले आदमी की पहली पत्नी का एक बेटा है, जो अक्सर पूरे रात के लिए कहीं जाता है। बेटा बहुत बड़ा शराबी है और अपने पिता का बहुत सारा पैसा शराब पर खर्च करता है। अलग-अलग बातों के बारे में बतियाते हुए दोनों आदमी निश्चय करते हैं कि वे दोनों साथ-साथ काम करेंगे और घर में वोदका बनाकर स्थानीय लोगों को बेचेंगे। घर का मालिक एद्वर्द को अपना पैसा दिखाता है और यह देखकर एद्वर्द भी, जो नशे में है, उसको कहता है कि उसके पास भी बहुत पैसा है। बाद में एद्वर्द नागरिक सेना वालों को कहता है कि घर का मालिक उसके पैसे को देखने के बाद उसको मार देना चाहता था, पैसों को चुराने के लिए। मालिक का पागलपन कुछ ज्यादा ही बढ़ता जा रहा है और एडवर्ड वहाँ से भगता है। लगता है कि सारे नागरिक सेना वाले अभियुक्त की कहानी पर विश्वास नहीं करते हैं लेकिन उनमें से एक प्रतिनिधि जिसका नाम म्रुज़ है, इस मामले की जाँच अच्छी तरह करना चाहता है। सब से पहले वह चीनी के कारखाने के बारे में सोचता है और उसको वे दस्तावेज मिलते हैं, जो गाँव के पूजारी के पास थे, जिनमें इस बात सबूत है कि जो एडवर्ड और गाँववालों ने कहा वह सब कुछ सच है। म्रुज़ का काम पुरा हो नहीं सकता है क्योंकि इसी समय में अपराध के स्थान में शासक पार्टी का एक बड़ा नेता बार-बार आता है, जो म्रुज़ को बताता है कि सब लोगों के लिए यह अच्छा होगा कि वह इन जानकारियों को छुपाए क्योंकि इन सच्चाईयों को बताना उचित नहीं है। वह बड़ा नेता देख सकता है कि म्रुज़ को यह राय पसंद नहीं है इसलिए वह कुछ फ़ोटो दिखाकर, जो विवाहित औरत के साथ म्रुज़ के प्रेम सम्बन्ध के सबूत हैं, उसको ब्लैकमेल करना चाहता है। फ़ोटो देखने के बावजूद म्रुज़ कारखाने के बारे में भूलना नहीं चाहता है लेकिन ये हालात उसके लिए बहुत ही तकलीफ़देह है और वह भी दूसरों की तरह शराब पीने लगता है, जिनको इस सुनसान और सर्दी के मौसम में काम करना चाहिए (फ़ोटो 5)।

फ़ोटो 5.

फ़ोटो 5.

फ़िल्म के अंत में दिखता है कि नागरिक सेनावाले अपराध-स्थल पर कैमरे से ‘फ़िल्म’ बनाते हैं, वे म्रुज़ के लाश के पास भयभीत खड़े हुए एडवर्ड का फ़ोटो खिंचते हैं और इस तरह पूरी जांच-पड़ताल सम्पन्न होती है (फ़ोटो 6)। इसका मतलब यह हुआ कि अब पार्टी के नेता/जनप्रतिनिधि कुछ नहीं बोलेगा क्योंकि उनके पास पहले से ही एक अभियुक्त आदमी है, जिसके ऊपर एक और अपराध का दोषारोपण बड़ी समस्या नहीं होगी।

फ़ोटो 6.

फ़ोटो 6.

यह फ़िल्म शायद पोलिश की सबसे अधिक निराशाजनक और डार्क फ़िल्मों में से एक है और एक चौंकानेवाली फ़िल्म जिसे एक बार देखने के बाद दुबारा देखने की इच्छा नहीं होती है। फ़िल्म जहां अपने बहुत ही अच्छे स्क्रिप्ट के कारण उत्तम है, वहीं इसके छायांकन (Cinematography) का पक्ष बहुत ही रूखा और भद्दा है जिसमें बर्फ़ के कारण सब से प्रमुख रंग सफ़ेद है। चमचमाते अपराध-स्थल और अंधेरे घर (जहां एडवर्ड दंपति के साथ रुका था) के बीच कैमरा आवाजाही करता है। अवलोकन के दृश्यों का रंग डार्क होने के बावजूद ज़्यादा स्नेही और मानवीय है और इस अंतर्विरोध को यह फिल्म अच्छी तरह दिखलाता है कि किसी एक क्षण में जीवन कितना बदल सकता है। एडवर्ड और घर में रहनेवाला परिवार दारू पीकर नाचते हैं, हंसते हैं और साथ साथ काम करना चाहते हैं लेकिन दर्शकों को पता है कि इस घर में अपराध होगा इसलिए मासूम उत्सवी माहौल के बावजूद वह जानता है कि कुछ अनहोनी होगी। यह शायद इसलिए क्योंकि वृद्ध पति में थोड़ा सा अवहेलना का भाव है और अपनी पत्नी को देखकर अनुमान लगाता है कि वह एडवर्ड को शायद पसंद है। इस फिल्म में भूगोल फ़िर से महत्त्वपूर्ण है। कहानी ब्येष्चादि (Bieszczady) नाम के पहाड़ों में चलती है और दक्षिण-पूर्व पोलैंड के छोटे छोटे पहाड़ वे खास जगह हैं जो हमेशा से देश का सब से जंगली हिस्सा रहा है। इस स्थान में खो जाना बहुत आसान है और यहाँ की घटनाओं के बारे में कोई कभी नहीं पूछता है। यहाँ अव्यवसायी/अनाड़ी कैमरे का इस्तेमाल भी दिलचस्प है, जिसके बारे में पहले ही कहा गया और जो निर्देशक के लिए खास बात है। हालाँकि स्मजोव्स्कि ऐसे कैमरे का इस्तेमाल अक्सर करता है, लेकिन यहाँ इसका मतलब थोड़ा अलग दिखता है। पहली दोनों फ़िल्मों में, खास तौर पर शादी में अनाड़ी कैमरे की मदद से सच का बखान किया गया था। यहाँ की स्थिति अलग है और डार्क हाउस में यह कैमरा झूठ बोलता है और नागरिक सेनावाले जानबुझकर नकली फ़ोटो खींचते हैं क्योंकि ऐसा ‘सच’ उनके लिए ज़्यादा सुविधाजनक है। वे अच्छी तरह जानते हैं कि उन्होंने अगर ऐसा नहीं किया तो शायद उनकी मौत भी हो सकती है। जबकि फरमाबरदारी के परिणाम अच्छे पुरस्कार होते हैं: किसी को समृद्धि मिल जाएगी, किसी को पैसा और एक आदमी विदेश जा सकेगा क्योंकि उसको पासपोर्ट मिल जाएगी।

फ़िल्म के नाम का घर देश की स्थिति का रूपकालंकार लगता है और जैसे साम्यवादी पोलैंड के समय में पुरा देश एक बड़ा पिंजरा था। जहाँ से भागना मुश्किल है और आप लाख चाह कर भी स्वतंत्रता और सच नहीं पा सकते हैं। धोखेबाजी और सच को छुपाना वे मूख्य चीज़ें हैं जिनकी फ़िल्मों में आलोचना होती है, जो साम्यवादी पोलैंड के बहुव्यापी लक्षण थे। फ़िर भी दिलचस्प बात यह है कि अपनी अंतीम फ़िल्म में स्मजोव्स्कि इसके बारे में फ़िर से कुछ बोलना चाहता है। 2013 की फ़िल्म का नाम यातायात-पुलिस (Drogówka) है और यह कहानी डार्क हाउस से बहुत मिलती-जुलती है। इस बार सारी घटनाएँ पोलांड की राजधानी, वार्सा (Warsaw) और माजूदा समय में चलती हैं। यह फ़िल्म पुलिस के बारे में है जो यातायात की बातों के विशेषज्ञ हैं। उन लोगों को किसी को सज़ा देने का अवसर अक्सर नहीं मिलता है क्योंकि जो भी गाड़ी-चालक कोई नियम तोड़ता है वह हमेशा किसी न किसी बड़े आदमी का नजदीकी निकलता है और एक फ़ोन की मदद से सज़ा से वंचित हो सकते हैं। इस खराब स्थिति के कारण असंतुष्ट पुलिसवाले सब से गरीब लोगों पर अपना गुस्सा निकालते हैं जिनके ऐसे प्रतापी दोस्त नहीं होते हैं।

एक दिन, पता नहीं क्यों एक पुलिसवाला मर जाता है और उसकी मौत का दोष उसके दोस्त पर डाला जाता है। फ़िल्म का नायक सब को दिखाना चाहता है कि उसने यह अपराध नहीं किया और सबूत खोजने की प्रक्रिया में वह एक बड़े भ्रष्ट अधिकारी को ढूंढ निकालता है। इस भ्रष्टाचार में सरकार के लिए काम करनेवाले लोग भी संलिप्त हैं और वे यूरोपीय संघ से राजमार्ग बनाने के लिए जो पैसा आता है, उसमें उलट-फेर करते हैं। यहाँ भी, जैसे पिछली फ़िल्म में नायक अपने पार्टी के बड़े नेता द्वारा ब्लैकमेल के प्रयास को अनसुना करता है और उससे नहीं डरता है इसलिए फ़िल्म के अंत में उसको मौत मिलती है । यातायात-पुलिस डार्क हाउस जैसी अच्छी फ़िल्म नहीं है, सम्भवतः इसलिए कि ऐसी कहानी एक बार बताई जा चुकी है। इसके अतिरिक्त यातायात-पुलिस का आलेख भी उतना अच्छा नहीं, ज़्यादा आसान है और नायक को फंसाने वाला षडयंत्र बिल्कुल ही आश्चर्यचकित नहीं करता है। इस फिल्म में शायद अश्लीलता ज़्यादा है और कैमरा इतना अनाड़ी है कि देखनेवालों को थका देते हैं। ऐसा होने पर भी दोनों फ़िल्मों के बारे में साथ साथ सोचना बहुत अच्छी बात है क्योंकि इसमें, दो शादियों (स्मजोव्स्कि की शादी नामक फिल्म और इसी नाम से स्तञिसुअव विस्प्याञ्स्कि का नाटक) में जैसे बहुत स्पष्ट है कि स्मजोव्स्कि द्वारा प्रस्तुत आलोचना सिर्फ़ समकालीन समय की आलोचना नहीं है। उसकी फिल्में दुसरे पोलिश फिल्मों के विपरित हैं और फिल्मों में प्रस्तुत आलोचना सभी के प्रति निष्ठुर है। फ़िल्म का निर्देशक एक और बार यह दिखाता है कि जैसे शादी के लोग जिनको सिर्फ़ लगता है कि वे स्वतंत्र हैं और वास्तव में वे पिंजड़े में रहते हैं, यातायात-पुलिस के लोगों में भी यही समस्या है, साम्यवाद और पूंजीवाद उनके लिए एक ही है और जो वे पहले करते थे, वही हमेशा करेंगे।

अंत में एक और फ़िल्म के बारे में ज़िक्र करना चाहिए जिसका नाम रोज़ा (Róża) है और जो यातायात-पुलिस से पहले, 2011 की है। इस बार स्मजोव्स्कि युद्ध के बारे में कुछ बताना चाहता है जो पोलिश सिनेमा के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है और जो अक्सर फ़िल्मों की विषय-वस्तु रही है। दूसरा महायुद्ध एक ऐसी बात है जिसके बारे में पोलैंड में रहनेवाला हर व्यक्ति बार-बार कुछ कह सकता है और कभी थकता भी नहीं है। अगर इन बतकहियों के दौरान थोड़ी सी शराब हो, जो कि अक्सर होता है, तब पोलिश लोग हमेशा खुद को युद्ध के विशेषज्ञ समझते हैं। ऐसी सारी बातें युद्ध के दौरान उपजे मानसिक आघात और पोलैंड की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के बारे में हैं। स्टालिन से डरे उन मित्र देशों के बारे में जिन्होंने इस देश को तब छोड़ दिया जब उनकी सब से ज्यादा ज़रूरत थी और सोवियत संघ को बेच दिया। युद्ध के बाद सोवियत संघ ने पोलैंड का बहुत बड़ा हिस्सा ले लिया जो आजकल यूक्रेन और लिथुआनिया में हैं। यह सच है कि देश को पश्चिमी हिस्सा मिल गया जो युद्ध से पहले जर्मनी के कब्जे में था लेकिन यह हिस्सा खो चुके पूर्वी हिस्से से काफी छोटा था।

पोलैंड के सबसे लोकप्रिय एक प्रहसन फिल्म, जो कि तीन भागों में बनी है, से पोलैंड के खोये हुए पूर्वी हिस्से में रहनेवाले लोगों के बारे में सब लोग जानते हैं, जिसमें पात्रों को अपने घरों को छोड़कर रहने के लिए पश्चिमी हिस्से में आना है। यह फ़िल्म आज भी बहुत प्रचलित है और टीवी में अक्सर दिखाई जाती है। स्मजोव्स्कि की फ़िल्म भी इतिहास के इसी खण्ड के बारे में है लेकिन उसकी कहानी को फ़िर से अलग दृष्टी से दिखाई जाती है और फ़िल्म में जिसकी बहुत ही कटू अलोचना की गई है। इस बार फ़िल्म की कहानी उत्तर पोलैंड में चलती है, एक ऐसे प्रदेश में जहाँ युद्ध से पहले अलग-अलग स्थानों पर मज़ूर्या (Mazuria) नाम का जातीय अल्पसंख्यक रहता था। उन लोगों की भाषा जर्मन थी लेकिन अपने विचार के अनुसार वे न पोलिश थे और न ही जर्मन। यहाँ यह भी स्मरण कर लेना चाहिये कि दूसरे महायुद्ध के पहले पोलैंड में रहनेवाले लोग एक समान जातीय समूह के लोग नहीं थे जैसे आजकाल हैं। वहाँ न सिर्फ़ यहूदी, बल्कि दूसरे धर्मिक और जातीय अल्पसंख्यक भी थे जो युद्ध के समय मारे गए और जो बच गए उन्हें बाद में दूसरी जगहों पर से फिर से बसना था।

फ़िल्म एक औरत के बारे में है जिसका नास रोज़ा है और जो मज़ूर्या जाति से संबद्ध है। युद्ध के बाद उसके घर में एक पोलिश फ़ौजी आता है, जिसका नाम तदेउष है, जो रोज़ा के पति के साथ युद्ध में था। चूँकि रोज़ा का पति और तदेउष की पत्नी मर गई है, वह अकेली औरत को मदद करने का निश्चय करता है और उसके साथ रहने लगता है। यह समय औरतों के लिए खूंखार-समय है क्योंकि आसपास बहुत सारे फ़ौजी हैं जो औरतों का बलात्कार करते हैं। सब से खतरनाक सोवियत सेना है जो सिर्फ़ फ़िल्म की वास्तविकता नहीं, ऐतिहासिक सच है। रोज़ा के साथ इतनी बार बलात्कार हो चुका है कि उसकी हालत अच्छी नहीं है। उसके मेहमान को भी पता चलता है कि उस औरत के साथ उसकी बेटी रहती है जिसे वह लोगों से छुपाती है ताकि उसके साथ कुछ बुरा न हो जाए। कुछ समय बाद रोज़ा के बगल वाले घर में पूर्वी ज़मीन से भागे हुए लोग आते हैं। धीरे धीरे यह स्पष्ट होता है कि रोज़ा सुरक्षित नहीं है क्योंकि पोलिश लोग मज़ूर्या लोगों को उनकी भाषा और धर्म के कारण जर्मन समझते हैं। रुजा के अलावा आसपास के दूसरे मज़ूर्या लोग भी रहते हैं लेकिन उनके लिए रोज़ा एक पापी औरत है क्योंकि अनगिनत बार उसका बलात्कार हुआ है और उसने सोवियत फ़ौज़ियों को रोकने के लिए ज़्यादा प्रतिरोध नहीं किया। यह सब सही बात है लेकिन रोज़ा ने इसलिए ज़्यादा मना नहीं करती थी क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि उन आदमियों को उसकी बेटी के बारे में पता चले, लेकिन युद्ध के बाद उसकी स्थिति बहुत खराब है क्योंकि वह न पोलिश है, न जर्मन, न मज़ूर्या के लोग ही उसे मान्यता देने को तैयार हैं। पोलिश फ़ौजी तदेउष सिर्फ़ एक आदमी है जिसके लिए रोज़ा बस मनुष्य है। मौत से पहले तदेउष की पत्नी के साथ भी बलात्कार किया गया था और फ़ौजी ने यह सब कुछ देखा इसलिए वह इसे कभी पाप या औरत की गलती नहीं समझता है। जब रोज़ा के नये पड़ोसी की पत्नी के साथ भी बलात्कार होता है तो उसका पति उसको मार नहीं सकता है, जो बहुत अच्छी तरह यह भी दिखाता है कि औरतों की स्थिति कितनी मुश्किल थी। तदेउष की स्थिति भी अच्छी नहीं है क्योंकि युद्ध के बाद राजनीतिक व्यवस्था बदल गई। युद्ध के समय पोलैंड में दो सेनाएँ थीं – एक, जो सोवियत संघ वाले हिस्से में बनी और दूसरी जो पश्चिम में(जहां वह जर्मनी से लड़ रही थी)। दोनों में पोलिश लोग थे और दोनों अपने देश के लिए संघष करना चाहती थीं। लेकिन, युद्ध के बाद पश्चिम देशों से संबंधित सेना को नये राजनीतिक परिदृश्य में देश के लिए खतरनाक मान लिया गया और वे लोग अक्सर बिना कारण से जेल जाते थे। फ़िल्म का नायक राजनीतिक कारण से अचानक पोलैंड गणराज्य के लिए काँटा बन जाता है और उसकी स्थिति के लिए यह भी अच्छी बात नहीं है कि वह एक “जर्मन” औरत के साथ रहता है इसलिए उसको गिरफ़्तार करने के बाद बहुत यातनाएँ मिलती हैं।

रोज़ा आसान फ़िल्म नहीं है क्योंकि उसको अच्छी तरह समझने के लिए पोलिश इतिहास और उसकी राजनीतिक स्थिति को जानना चाहिए, इसलिए लगता है कि यह फ़िल्म सब से पहले पोलिश दर्शकों के लिए है जो खोई हुई पूर्वी हिस्से के कारण बार-बार रोता था और कभी इसके बारे में नहीं सोचता है कि पश्चिमी हिस्से में भी युद्ध से पहले कुछ ऐसे लोग रहते थे जिनकी जन्मभूमि खो गई है। व्यक्ति, राष्ट्र, इतिहास, राजनीति, जाति आदि के बिम्ब या रूपक के बतौर उभरे पोलैंड की निष्ठुर आलोचना स्मजोव्स्कि एक बार और करता है, इस मायने में वह पक्षपाती नहीं है। ऐसी स्थिति में फ़िल्म में दिखाये गए सब लोग सही हैं और सब गलत। हर इनसान के लिए इतिहास अलग है क्योंकि हर की दृष्टी अलग है। स्मजोव्स्कि की फ़िल्म में कोई जवाब नहीं मिलता है कि कौन सही है और कौन नहीं। ज़रूर, यहाँ कुछ लोग हैं जो सिर्फ़ खलनायक लगते हैं लेकिन वे लोग इतने महत्त्वपूर्ण नायक नहीं हैं और लगता है कि वे सिर्फ़ इसलिए फ़िल्म में आते हैं कि निर्देशक अपने दर्शकों को दिखाना चाहता था कि परिस्थिति कितनी मुश्किल और उलझनदार थी। वह कोई जवाब नहीं देता है और फ़िल्म के दर्शक फ़िर से उत्तेजित होते हैं क्योंकि इस बार युद्ध के बारे में होने के बावजूद इस फ़िल्म में पोलिश लोग न तो वीरता से भरपूर हैं न ही हताहत। पोलिश फ़ौजी तदेउष स्मजोव्स्कि की सारी फ़िल्मों में एक मात्र व्यक्ति है जिसमें कोई बुराई नहीं है, बाकी सब लोग अक्सर गलतियाँ करते हैं और यह शायद इस निर्देशक की सब से बड़ी मज़बूती है और इसलिए मुझे लगता है कि उसकी फ़िल्मों के मदद से पोलिश सिनेमा के बारे में कुछ दिलचस्प कहना हो सकता है।

स्मजोव्स्कि की फ़िल्में दूसरी पोलिश फ़िल्में जैसी हैं जिनको अच्छी तरह समझने के लिए पोलिश बेचैनियों, मिथकों और अभिघातों को जानना चाहिए। स्मजोव्स्कि पोलिश सिनेमा का लाक्षणिक, इतिहास में डूबा हुआ निर्देशक है लेकिन इसी समय में वह उन सभी मिथकों की इतनी कड़ी आलोचना करता है मानो पूछना चाहता है कि पोलिश लोकाचार पर आधारित सिनेमा आज भी जीवित क्यों है!? स्मजोव्स्कि के नायकों का अधिकांश अनुपयोगी, शराबी, चोर हैं जो पोलिश लोगों का सब से पारंपरिक चित्रण है। इसी समय में भी वह बार बार पोलिश मनोभाव की विसंरचना करता है इसलिए उनकी फ़िल्मों के दर्शक हर फ़िल्म की याद करते हैं और अपने बारे में कुछ न कुछ सोच-कर सकते हैं।

तत्याना षुर्लेई

तत्याना षुर्लेई

तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। हंस, पहल, अकार आदि हिन्दी पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University में The Courtesan Figure in Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation. नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं। उनसे tatiana.szurlej@gmail.com पर संपर्क संभव है।

साभार- अकार 

 

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