बोलान्यो दि बाप: मयंक तिवारी

By मयंक तिवारी 

जैसा मैं दिखता  हूँ, वैसा मैं लिखता हूँ. जी चाहे पढ़ लो, जी चाहे लड़ लो. पहले ऐसा कहते कुछ संकोच होता था. मैं लेखक हूँ कि नहीं? हूँ तो कैसा हूँ?  मगर बोलान्यो पढने के पश्चात हाल कुछ  ऐसा है मानो सीने  में  किसी ने तरस खा कर हिम्मत का इन्जेक्शन ठोंक दिया हो. वाकई,  बोलान्यो  बाप  है. और मेरे जैसे कुंठित, अपनी सड़ती जड़ो से पीठ फेरे, अपने इतिहास से अनभिज्ञ, अंग्रेजी में अपने आप को तोलने वाले लेखक के लिए तो बोलान्यो बाप से भी बढ़ कर है.

कितना आसान है किसी लेखक पर बकैती झाड़ना। दो चार किताबे पढ़ो, थोड़ा पकाओ, थोड़ा पचाओ, और उगल दो. आजकल सुनते है बकैती के लिए किताब की भी आवश्यकता नहीं है. लड़की से भी काम चल जाता है. साहित्य और सेक्स में फर्क केवल फॉर्म का रह गया है. अंग्रेजी साहित्य का तो यही हाल है.  हिंदुस्तान मे अंग्रेजी साहित्य मेट्रो का वह डब्बा है जिसमें  बैठकर कनॉट प्लेस ट्राफलगर स्क्वायर लगता है. यही कारण है कि अपने लेखको पर लिखने की मेरी कभी हिम्मत नहीं हुई. बोलान्यो की बात और है. बोलान्यो जवानी में अपनी तरह ही नशेबाज था. मर चुका है अब. शायद इसलिए अब बिलकुल बकवास नहीं करता। ईमानदार जिया, ईमानदार मरा. roberto

सत्तर के शुरू की बात है शायद। मेक्सिको शहर में, या शायद कोई और लातिन अमेरिकी शहर रहा होगा, एक कवि सम्मलेन हो रहा था. कवि आते जा रहे थे, कविता कभी निलंबित, कभी ज़लील  होती जा रही थी. तमाशे के आदी लोग, जो कुछ सुनाई दे रहा था उसे कविता जान खुश थे.  अचानक सभा में एक बरगलाया सा लौंडा ऐसे घुसा मानो अभी अपने बस्ते से बन्दूक निकाल सब कवियों का मुँह वन्स एंड फॉर आल बंद कर देगा। जैसे ही लौंडे ने हाथ बस्ते में डाला चूहों और कवियों में फर्क में करना कठिन हो गया. थैंकफुल्ली चूहे मौका देख फरार हो गए. लौंडे की आँखों में खून था — कुछ नशे के कारण कुछ नींद के.  उसने बस्ते में हाथ डाला और एक कागज़ का परचा निकाल उसे से जोर जोर से पढ़ने लगा. लौंडा कवि निकला। चीख चीख कर लौंडा जिसे पढ़ रहा था वह उसकी कविता नहीं, बल्कि भविष्य में उसकी कविताओं का घोषणापत्र था. लौंडा पढ़ता रहा, लोग सुनते रहे. फिर अंतरिक्ष के किसी दूर कोने से आये धूमकेतु की तरह अपना प्रकाश बाँट लौंडा अंतर्ध्यान हो गया. वह लौंडा बोलान्यो था.  मगर मैं भी हो सकता था.  इसलिए कहता हूँ, बोलान्यो बाप है.

अचानक कलम रुक गई.
कभी कभी रुकनी चाहिए कलम को.
लेट जानी चाहिए सफ़ेद पृष्ठ पे निढाल।
केवल ताड़े, कलम कवि को, कवि कलम को.

२०१३ की एक सितम्बरी शाम. एक बुकशॉप. मैं वक़्त को, वक़्त मुझे ज़ाया कर रहा था. मैं किताब चुराने आया था. ऐसा पहले दो बार कर चुका था. ‘फूको’ और ‘स्चोपेन्हौरेर’. तीसरी किताब खोज रहा था. मिली, मगर साली को खरीदना पड़ा. बोलान्यो की सैवेज डिटेक्टिव. उस दिन कोई ढंग की किताब मिल नहीं रही थी. फिलॉसोफी का खाना खाली सा था. वहां अमिश त्रिपाठी की किताबों का ढेर जमा था. चुराने लायक किताब कोई नज़र नहीं आ रही थी. कॉलेज की लड़कियों ने ऊधम मचा रखा था. तब अचानक याद आया कुछ दिन पहले फ़ोन पर उदय शंकर किसी लेखक के बारे में कह रहे थे. मैं उन्हें डेविड फोस्टर वॉलेस के किस्से सुना रहा था, वह मुझे विनोद कुमार शुक्ल पड़ने को उकसा रहे थे.  उस दिन गांजा ज्यादा हो गया था. अक्षर मुँह फांद फूट पड़े. क्या रखा है साहित्य में? क्यों पढ़े हम शुक्ल को, काफ्का को, हज़ारी परसाद द्विवेदी को, डेविड फोस्टर वॉलेस को.… जवाब में भाईजी ने गूगली फ़ेंक दी. “बोलान्यो पढ़ो समझ आ जाएगा।” बुकशॉप  से मैंने भाईजी को फिर फ़ोन किया. “… नाम भूल गया था.…” “बोलान्यो,” भाईजी ने प्रेम पूर्वक याद कराया। अगले दो घंटे मैंने बुकशॉप छान मारा मगर बोलान्यो न मिला। आखिर थक कर जब मैं जा रहा था तब बुकशॉप की एक महिला कार्यकरता  पास आई और कहने लगी की अक्सर जो कोई और नहीं ढूंढ पाता, मैं खोज लेती हूँ. सैवेज डेटेक्टिवेस, मैं बोला। महिला दफा हो गई. दो मिनट बाद बोलान्यो और बिल दोनों थमा दिये। खर्चा करके मैं कई अरसे बाद खुश हुआ था. सैवेज डेटेक्टिवेस का  सीधा सीधा अनुवाद दो जाहिल जासूस हो सकता है। अगर मुझे हिंदी में अनुदित करने को मिले तो मेरा टाइटल होगा: जवानी ज़िंदाबाद. किताब पड़ते पड़ते मैं कई बार रोया। ऐसा क्यों है आप किताब पड़कर ही समझ सकते है. किताब ख़त्म होते ही मैंने फ्लिपकार्ट पे दे दना दन बोलान्यो का सारा साहित्य जो कि अंग्रेजी मैं मौजूद था आर्डर कर दिया। पैसे कम थे इसलिए अगले ही दिन 2666 छोड़ सभी आर्डर रद्द कर दिये। 2666. उस झटके से मैं अब तक नहीं उबार पाया हूँ. मैंने साहित्य से आज तक जो जो सवाल किये, उन सब का जवाब 2666 में मौजूद है.

पठन-पाठन की दुनिया में ज्यादातर सभी मेरे दुश्मन है. मुझे भक्ति नहीं आती द्वेष भक्ति आती है. अंग्रेजी में लिखता हूँ और गुस्सा होने के लिए इतना काफी है. अंग्रेजी साहित्य गुंडा साहित्य है. मैं अंग्रेजी साहित्य को गुंडा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैं उससे डरता हूँ. इतना डरता हूँ की टट्टी लगने पे लैट्रिन कहना छोड़, लू लू करता फिर रहा हूँ. अंग्रेजी साहित्य गुंडा है क्योंकि इससे पहले हम उससे बदले वह हमें बदल देता है. अंग्रेजी साहित्य जितना खोखला होता गया उतना और फैल गया, चौड़ा हो गया.  शायद इसी लिए भारत में वह बहुत मशहूर है. मैं साहित्य की बात कर रहा हूँ, भाषा की नही. (भाषा में इतनी हिम्मत होती तो प्रसून जोशी को कौन नौकरी देता?) आज के अपराधी समय में साहित्य गुंडागर्दी न करे तो करे क्या, इस तर्ज़ पर भी बहस की जा सकती है. मगर ऐसा करने में मेरी कोई रूचि नहीं है. जिनकी हो उन्हें मेरी शुभकामनाएं। वह इस पठन को स्थगित कर गुंडे साहित्य पर क्राइम रिपोर्टिंग करे.

बोलान्यो पढ़ मेरा गुस्सा कुछ कुछ शांत सा होने लगा है. एक दिशा सी दिखने लगी. कविता फिर चालू हो गई है. सिर्फ ईमानदार रहना चाहता हूँ. किसके प्रति, अपने, आपके, या साहित्य के, यह अभी तय नहीं कर पाया हूँ. मगर लिखूंगा। जब तक दम है कलम चलेगी। मुश्किल वक़्त, कमांडो सख्त. अभी बोलान्यो मिले साल भर भी नहीं हुआ है और यह हाल है. इसीलिए कहता हूँ, बोलान्यो बाप है.

मयंक तिवारी

मयंक तिवारी

मयंक तिवारी अद्भुत पढ़ाकू आदमी हैं. अंग्रेजी अखबार डीनए में कॉलम और फिल्मों के लिए पटकथा लिखते हैं, फिल्म रागिनी एमएमएस से चर्चित. अंग्रेजी की मंचीय कविताओं वाले जमात में भी इनकी अच्छी खासी घुसपैठ है. फिल्म ‘सुलेमानी कीड़ा’ के मार्फ़त अभिनय की भी शुरुआत कर चुके हैं और कॉमेडी के कार्यक्रमों में भी अपना जलवा दिखा चुके हैं. उनसे mayankis@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है

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