आज की चीख़ पुकार में एक बहुत कोमल तान खो गयी है: उदय शंकर

By उदय शंकर

 राजेंद्र यादव को नजदीक से जानने का मेरा कोई दावा नहीं है। उनसे मिलना संयोगवश ही रहा है। ये संयोग मेरे जीवन के अद्भुत यादगार क्षण रहे हैं। उनसेकुल जमा चार मुलाकातों की याद है मुझे। शायद मैं इंटरमीडिएटअंतिम वर्ष का छात्र था, जब उन्हें पहली बार साक्षात देखने-सुनने का मौका मिला, गया में। वे कहानी की रचनाशीलता से संबन्धित किसी विषय पर बोल रहे थे। मैंने उनसे कुछ सवाल किए थे। उनका वक्तव्य और अपना सवाल कुछ भी याद नहीं है। सिर्फ कुछ दृश्य ही दिमाग में टंगे रह गए। बाद में मैं जेएनयू आ गया और आते ही छात्र-राजनीति और संस्कृति-कर्म के बारीक सीमांतों पर सक्रिय रहने लगा। मुझे प्रेमचंद के ऊपर एक जनसभा करने और वक्ताओं को तलाशने की जिम्मेवारी सौंपी गई थी। मैंने राजेन्द्र जी से फोन पर बात की, वे सहर्ष ही आने के लिए राजी हो गए और साफ-साफ कहा कि मैं अपनी गाड़ी से आऊँगा लेकिन पेट्रोल के पैसे देने पड़ेंगे। मैंने हाँ कह दिया। वे नियत समय से पहले ही जेएनयू आ गए थे। नियत समय तक के लिए क्या किया जाय यह उनकी फौरी चिंता थी, तो उन्होंने तपाक से कहा कि पाण्डेय जी (मैनेजर पाण्डेय) से मिलने चला जाय। मीटिंग खत्म हुयी और जाते समय पेट्रोल-खर्च के पैसे मैंने उनके हाथ में दिये तो उन्होंने उसे लौटा दिया और बोले कि तुमलोग विद्यार्थी हो, इसे अन्य मद में खर्च करना।

जब बोलने वाले ज्यादा होते हैं तब मैं खामोश रहना ही पसंद करता हूँ और जब बोलने वाला कोई नहीं हो तो सिर्फ मैं ही बोलता हूँ, ऐसी मेरी आदत बन गई है। राजेन्द्र जी अक्सर लोगों से घिरे रहने वाले व्यक्ति थे। ऐसे में उनके नजदीक पहुँचने के तीन ही तरीके बचते थे, जिन्हें अक्सर नवांकुर लोग आजमाते थे- एक आप वाचालपन के शिखर को प्राप्त हों, सुंदर-‘अवांगार्द’ कन्या हों या आप बेचारगी को प्राप्त हो चुके अस्मिता-लोलुपहों। मैं इन तीनों कसौटियों पर खरा नहीं उतर पाता था। इसलिए ये मुलाकातें आगे की नजदीकियों में तब्दील नहीं हो सकीं।

इधर 2013 के शुरुआती महीनों में उनसे मिलना-जुलना फिर से शुरू हुआ और इन संयोगों को संभव बनाने का काम अक्सर कहानीकार-फ़िल्मकार मित्र संजय सहाय जी ने किया। एक मुलाक़ात काफी रंगीन और लंबी भी रही। प्रेसक्लब के खुले आसमान में करीब 3-4 घंटे की बैठकी। उन्होंने जिस ड्रिंक का ऑर्डर दिया था वह भी याद है- वर्जिन मैरी या ब्लडी मैरी। वे शायद सालों बाद प्रेस क्लब आए थे। यह शाम किसी भी साहित्यिक समाज के लिए गौरवान्वित होने वाली शाम थी। प्रेस क्लब के सचिव को जब पता चला कि यहाँ राजेन्द्र यादव आए हुये हैं, तो वे खुद हमारे टेबल के पास आए। राजेंद्र यादव की उपस्थिती को स्वयं और प्रेस क्लब के लिए सम्मान की बात कहते हुये विनम्रता से धन्यवाद ज्ञापित करते रहे। हमलोग राजेन्द्र जी के नेतृत्व में जब वहाँ से उठे तो ऐसा लगा मानो दो-तीन सौ लोगों से भरा-पूरा प्रेस क्लब उठ खड़ा हुआ हो; वे जहां से गुजरते लोग उठ खड़े होते, उनके गुजरते ही खुसफुसाहट शुरू हो जाती- अरे नहीं जानते राजेन्द्र यादव को,हंस के संपादक हैं। राजेन्द्र जी के प्रति सोचने-समझने के मेरे नजरिये को इस एक वाकये ने लगभग बदल दिया था। राजेन्द्र यादव के public-intellectual होने के ‘पाठकीय’/भावकीय प्रतिक्रिया का मैं साक्षी बना था। हिन्दी के बुद्धिजीवी जगत से अतिपरिचित किसी भी व्यक्ति के लिए यह एक विलक्षण और पराभौतिक अनुभव था। हिन्दी का लेखक और इतना सम्मान!! हिन्दी में सम्मान की अजीब स्थिति है। जब से वैचारिक प्रतिबद्धताओं की लेखनी थोड़ी उल्लंग हुयी है तब से हिन्दी वाले सिर्फ हिंदीतर लोगों का ही सम्मान कर पाते हैं। लेन-देन की एक सामान्य प्रक्रिया के अतिरिक्त सम्मान का कोई खास महत्व आजकल नहीं रह गया है। नुकसान करने की क्षमता रखना ही सम्मान पाने की योग्यता है। हिन्दी के अध्यापकों के पीछे चलने वाले भीड़नुमा चेला-चाकरों को देखकर यह अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है। राजेन्द्र जी किसी को क्या नुकसान पहुंचा सकते थे, और किसी को फायदा भी क्या पहुंचा सकते थे, खासकर उनलोगों को जिनके पास प्रेस क्लब में बैठ सकने का सामर्थ्य हो।

राजेन्द्र जी को हिन्दी में सत्ता के एक केंद्र के बतौर प्रचारित किया जाता है। मैं सत्ता के किसी वायवीय संकल्पना में अभी भी विश्वास नहीं कर पाता हूँ। सत्ता को मैं अभी भी आर्थिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्यों में ही समेटने का हामी हूँ। राजेन्द्र यादव को जितना भी जान पाया हूँ, मुझे वे कभी भी आर्थिक-राजनीतिक रूप से किसी को लाभान्वित करने वाली स्थिति में नज़र नहीं आए, नुकसान तो छोड़ ही दीजिये। राजेन्द्र जी अगर सत्ता के केंद्र थे भी तो उस केंद्र को मैं एक वायवीय केंद्र से ज्यादा कुछ नहीं मानता हूँ। राजेन्द्र जी ने इस सत्ता केंद्र को अपने आस-पास एक ‘नो लॉस नो प्रॉफ़िट ज़ोन’ की तरह विकसित किया था। यह उनका औरा था और कुछ नहीं। उनके संगी-साथी क्या-क्या कर गुजरे, इसका इशारा नामवर सिंह ने अभी हाल ही में किया है- “राजेन्द्र के मन में कहीं भीतर तक यह बात बैठ गई थी कि वे मोहन राकेश और कमलेश्वर से कम महत्वपूर्ण न मान लिए जाएं।” नई कविता-नई कहानी वाले दौर के जिन भी लोगों ने सत्ता-नवीसी नहीं की या सत्ता का एक वायवीय औरा बनाने में सफल नहीं हुये वे कब से कहाँ हैं या कवलित हुये किसी को पता नहीं है। बहुत पहले ही एक उदाहरण बन चुके भुवनेश्वर को हम भलीभाँति जानते हैं। बहुत दिनों तक लापता रहे और फिर रेलवे ट्रैक पर भिखारियों की दशा में मरे हुये पाये गए। स्वदेश दीपक लापता हैं। सतीश जमाली असाध्य बीमारियों से घिर कर अपने घर में ही कैद हैं। अमरकान्त अपनी दीन-हीन दशाओं के साथ कभी-कभी खबर बन जाते हैं। कुछ लोगों की बदौलत मधुकर सिंह भी अभी खबर बने थे। राजेन्द्र यादव में ही यह कौशल और सामर्थ्य था कि ऐसी खबरों से वे वाबस्ता बचे रहे और रंगीन-खुशमिजाज़ विषमयोगी तिग्गी के दिग्गी बने रहे।

विजय सोनी

विजय सोनी

यह सब मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि राजेन्द्र जी के अन्त्येष्टि कार्यक्रम के साथ ही साथ एक और कलाकार की अन्त्येष्टि हुयी थी उस दिन। मेरे लिए यह लगभग कॉस्मिक अनुभव था। राजेंद्र जी के साथ-साथ जिस कलाकार की अन्त्येष्टि उस दिन सम्पन्न हुयी थी, वे विजय सोनी (1937-2013) थे। मेरे लिए यह कॉस्मिक अनुभव क्यों था, इसके लिए थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। साल भर पहले ही दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में मुक्तिबोध के ऊपर आयोजित कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल बोल रहे थे। उन्होंने याद दिलाया कि सत्तर के दशक में मुक्तिबोध की लंबी कविता ‘अंधेरे में’ का प्रयोगधर्मी मंचन विजय सोनी के निर्देशन में सम्पन्न हुआ था। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि उनकी विदुषी पत्नी अग्नेष्का सोनी थी। उस समय के बाद से वे दोनों लापता हैं, किसी को नहीं पता है कि वे आज-कल कहाँ हैं। अग्नेष्का नाम सुना-सुना लग रहा था, थोड़ा प्रयास किया तो याद आया कि अरे यह तो वही अग्नेष्का हैं जिन्हें मुक्तिबोध लंबी-लंबी चिट्ठियाँ लिखा करते थे। मैं उन चिट्ठियों को दुबारा पढ़ गया। उन चिट्ठियों में विजय सोनी का भी जिक्र है। अग्नेष्का की पसंद की मुक्तिबोध दाद देते हैं। विजय सोनी को वे अपना नया मित्र कहते हैं। अग्नेष्का मुक्तिबोध के काफी करीब थीं। मुक्तिबोध के जन्म के 50 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष में आलोचना ने एक विशेषांक निकाला था उसमें अग्नेष्का जी का भी एक लेख शामिल है, यह लेख मुक्तिबोध के सद्य प्रकाशित कहानी-संकलन काठ का सपना का बहुत ही सटीक मूल्यांकन करता है। बहुत ही मेहनत से लिखी गई समीक्षा थी यह। अग्नेष्का कोवल्स्का-सोनी नाम से हिन्दी कविता के ऊपर स्वतंत्र रूप से दो पुस्तकें पोलिश में लिख चुकी हैं- एक का नाम है 1947 के बाद हिन्दी कविता की नई राहें और दूसरे का, समकालीन हिन्दी कविता और हिन्दी की साहित्यिक परंपरा । इसी नाम से इनका एक पर्चा फ़िलॉसफ़ी की एक अङ्ग्रेज़ी पत्रिका में है, जिसका शीर्षक है- नेचर एंड फ्रीडम: सम रिफ़्लेक्संस । इसका प्रकशन वर्ष 1976 है। मुक्तिबोध की चिट्ठियों में ही नहीं बल्कि मलयज की डायरियों में भी अग्नेष्का और विजय सोनी का जिक्र पचासों बार मिलता है। अग्नेष्का मलयज की शिक्षिका थीं, पोलिश भाषा पढ़ाती थीं और मलयज से उनकी दोस्ती भी थी। बाद में जब अग्नेष्का जी ने विजय सोनी के साथ शादी कर ली तो मलयज भी इस दंपति के दोस्त हो गए। मलयज ने बहुत ही अपनापे के साथ इन लोगों का जिक्र किया है। मलयज लिखते हैं- “अग्नेष्का के मनोभाव उनके चेहरे पर उतने खुलकर नहीं आते, किन्हीं और चीजों में घुले-मिले रहते हैं। तब विजय को चित्रकारी के प्रति अपने नए-नए रुझान से काफी स्फूर्ति और उत्साह मिलता था। वे कुछ न कुछ पेंट कर रहे होते और लोगों की उनके चित्रों के बारे में क्या प्रतिक्रिया है यह जानने के लिए उत्सुक रहते।” विजय सोनी चित्रकारी की दुनिया में विको सोनी के नाम से जाने जाते थे। उनके चित्रों की प्रदर्शनी के समाचार/रिपोर्ट उस समय के अखबारों में छपते थे। मलयज की एक पुस्तक जख्म पर धूल के आवरण-चित्र और साज-सज्जा की जिम्मेवारी भी विजय सोनी ने संभाली थी। शमशेर भी चित्रकार विको सोनी/विजय सोनी के प्रशंसक थे। शमशेर की एक पूरी की पूरी कविता विजय सोनी के लिए है-

 विजय सोनी के चित्र

(नयी दिल्ली में विजय सोनी के चित्रों की प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए दो शब्द)

जिस्म जहां घुलता है/ रंगों की कोमलता में खो जाने/ पावन आवेश दुख और दर्द का/ सुख की झांकियों का/ जहां रोशनी और अंधेरे की/ शतरंज बिछाता है/ जहां दूरियों में हम हैं/ और नज़दीकियों में तुम/ और जहां मिलते हैं वह/ एक कैनवस है/ जिसे हम छू नहीं सकते/ क्योंकि उसे हम जी रहे हैं/ यह एक माध्यम है/ जिसे रंग मिल-मिल के पकड़ने के लिए/ खोये जा रहे हैं/ यहां जो कुछ ठोस है/ वह धड़क रहा है/ और जहां धड़कन है वहां ख़ामोशी है/ दम साधे हुए। आज की चीख़ पुकार में/ एक बहुत कोमल तान/ खो गयी है। उसे पाना है। विजय सोनी, तुम डेनमार्क जाओ /स्वीडन पोलैण्ड में /कोई नया रूप /जन्म ले रहा है /अनपहचाने शायद/ उसकी परछाईं मैं यहां /पकड़ रहा हूं/ “शिल्प चक्र” में। शायद मुक्तिबोध आज/ यहीं खड़ा है*./वह ऊंचा व्यक्ति /जो हम सब के पीछे है, और /हम सब को ऊपर से/ देख रहा है। हम पीछे मुड़ कर न देखें। सामने ही देखें। शायद उसकी नज़र/आईना बने। हम सब की नज़र/उसका आईना बने। और हम उसको देखें /जो हमारा /आने वाला व्यक्ति है.

 विजय सोनी चित्रकार के रूप में दिल्ली में काफी लोकप्रिय थे। कम से कम हिन्दी बुद्धिजीवियों की बीच इनकी चर्चा ज़ोरों पर थी। लेकिन इनके चित्रकार वाले रूप से अलग भी इनका एक रूप था और वह था उनका रंगकर्म। वे विश्वविख्यात पोलिश रंगकर्मी येजि ग्रोतोव्स्कि के ‘थियेटर लैब’ से पूअर थियेटर में बाकायदा प्रशिक्षित थे। येजि ग्रोतोव्स्कि के नजदीकी लोगों का मानना है कि उनका हिंदुस्तान के प्रति अद्भुत लगाव था, 1960 में उन्होंने ‘शकुंतला’ का मंचन पोलैंड में किया था। एक बार एक एक्टर की तलाश में भारत भी आ चुके थे। ऐसे में विजय सोनी का येजि ग्रोतोव्स्कि के प्रति आकर्षित होना और उनके पास थियेटर सीखने चले जाना उस समय के लिहाज से बहुत बड़ी बात थी। प्रशिक्षण समाप्त कर वापस लौटते ही उन्होंने ‘अंधेरे में’ का आशंका के द्वीप नाम से मंचन किया। यह अपने-आप में एक जटिल टेक्स्ट का चुनाव था लेकिन बहुत ही कम संसाधनों की मदद से उन्होंने इसे सम्पन्न किया। जयदेव तनेजा लिखते हैं- ‘काली पैंट पहने छः अभिनेताओं ने मंच पर, अपनी देह भंगिमाओं और समूहनों से अन्याय और शोषण के कुछ धारावाहिक बिम्ब उभारे।’ महादेवी बुद्धिजीवी वर्ग के बारे कहती हैं कि ‘उसके एक शरीर में दो प्रेतात्माएँ रहती हैं- धन-लिप्सा और अभाव। इसी की उछल-कूद उसके भीतर मची रहती है।’ दूधनाथ सिंह इस संदर्भ में विजय सोनी को याद करते हुये लिखते हैं- ‘एक बार बहुत पहले श्री विजय सोनी ने यहाँ इलाहाबाद में मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ का एक नृत्य-नाट्य प्रस्तुत किया था। उसमें हर पात्र सिर्फ लंगोटी लगाए हुये नंगा था। सबकी नसें और पसलियाँ और चेहरे ऐंठे हुये थे। महादेवी की उन्हीं प्रेतात्माओं का प्रतीकात्मक नृत्य था वह।’ आशंका के द्वीप के अलावा उनके द्वारा निर्देशित एक और नाटक की जानकारी मिलती है- लंकाधिराज। इन नाटकों का मंचन उन्होंने दिल्ली के बाहर अन्य शहरों में भी किया था। कहने का तात्पर्य यह है कि विजय सोनी और अग्नेष्का सोनी अपने दौर के लेखकों-बुद्धिजीवियों के बीच में बहुत ही जाने-पहचाने नाम थे।

उस दिन विजय सोनी की गुमनामी/लापता हो जाने वाले वक्तव्य ने मुझे काफी चौंकाया था। मुझे यह भी लगा कि शायद वे पोलैंड में जाकर बस गए होंगे। मैंने अपने जान-पहचान के कुछ पोलिश दोस्तों को भी (जो हिन्दी पब्लिक स्फियर में रुचि भी रखते हैं) इस बारे में कई-एक बार बताया, लेकिन वे भी कुछ बता पाने सफल नहीं रहे। हिन्दी के किन्हीं लोगों से पूछने की कोई जरूरत ही बाकी नहीं रह गई थी क्योंकि हिन्दी के बुद्धिजीवियों की सभा में ही मंगलेश यह बोल रहे थे। मैंने इंटरनेट पर भी बहुत कुछ ढूँढने की कोशिश की लेकिन कुछ हाथ नहीं आया। धीरे-धीरे इसे भूलता ही जा रहा था कि राजेन्द्र जी वाले अन्त्येष्टि कार्यक्रम में मैं युवा आलोचक संजीव कुमार के साथ खड़ा था, तभी उन्होंने एक वृद्ध विदेशी महिला की ओर इशारा किया जिनके गले में एक रुद्राक्ष की माला पड़ी हुयी थी। वे उस वृद्ध महिला की फुर्ती और इस उम्र में भी इतने स्वस्थ चाल पर आश्चर्य व्यक्त कर रहे थे। मेरी तरह संजीव भी उस महिला से अपरिचित थे और सिर्फ उत्सुक निगाहों के आसरे थे। थोड़ी देर में ही पता चला कि यह अग्नेष्का सोनी हैं जो वह अपने पति विजय सोनी के शव के साथ अंतेयष्टि के लिए यहाँ आयी हैं। थोड़ी देर के लिए अपने पति के शव को छोडकर वे राजेंद्र जी को भी श्रद्धांजली देने आयीं। जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि यह दुर्योग मेरे लिए लगभग कॉस्मिक था। जिस कलाकार-विदुषी दंपति को लगभगलापता-गुमनाम समझ लिया गया था उसका प्रकटीकरण क्या ऐसे ही होना था! वे कौन सी स्थितियाँ होती हैं जिनमें लोग गुमनाम हो जाते हैं। जबकि वे होते हैं, उसी जगह होते हैं जहां हम उनकी गुमनामी की चर्चाएँ करते हैं। वे दोनों इसी शहर में पिछले 30 वर्षों से थे। उनकी बेटी चारु सोनी अङ्ग्रेज़ी की बड़ी पत्रकार हैं। (मलयज ने अपनी डायरी लिखा है- “चारु तब बहुत छोटी थी शायद दो साल की। मैं घर की सीढ़ियाँ चढ़ने के पहले पहले सड़क पार वाली दुकान से कैडवरी की रंग-बिरंगी चाकलेटी गोलियों का पैकेट खरीदना नहीं भूलता…” ऐसी ही कई-एक पंक्तियाँ चारु के लिए भी हैं) इंडिया टुडे, मेल टुडे, आउटलुक जैसी अङ्ग्रेज़ी की राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लिखती रही हैं। लेकिन हम हिन्दी वाले एकदम से उपराम हो जाते हैं और इसी तरह कितने लोग गुमनाम हो जाते हैं। विजय सोनी की मृत्यु की खबर सिर्फ एक अङ्ग्रेज़ी अखबार के अलावा कहीं छपा हुआ नहीं दिखा। अगर उनके अन्त्येष्टि का समय राजेन्द्र यादव के समय से अनायास नहीं टकराया होता तो हम आज भी यही मानते रहते कि वे लापता हैं। मैं इसे सिर्फ एक घटना नहीं मानता हूँ बल्कि एक प्रवृति के बतौर देखता हूँ। हिन्दी साहित्य समाज के भीतर कुछ तो बदला है जिसके सूचक के बतौर इसे देखने कोशिश करता हूँ।

क्या हिन्दी में आधुनिकता समकालीनता का द्योतक हुआ करती थी, जिसे हम आज कहीं न कहीं खो चुके हैं। मुक्तिबोध, शमशेर, मलयज, विजय सोनी, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, कमलेश्वर तो दूसरी तरफ रेणु, मार्कन्डेय, शिव प्रसाद सिंह, अमरकांत, शेखर जोशी जैसे लेखकों द्वारा जिस भी रचना परिवेश का निर्माण हो रहा था क्या वह एक समकालीन रचना-समाज को निर्मित करता था। समकालीनता से तात्पर्य यह कि अपने समय और समाज के बृहत्तर/बहुयामी यथार्थ को व्यक्त करने वाला परिवेश। यह हुआ विषय-रूपों की समकालीनता। मैं इसी को विधा-रूपों की समकालीनता तक खींचने की कोशिश करता हूँ तो लगता है कि मुक्तिबोध, शमशेर, मलयज, विजय सोनी, राजेंद्र यादव,मोहन राकेश, कमलेश्वर इत्यादि लेखक –कलाकार विधारूपों के संदर्भ में समकालीनता का एक नया ही परिवेश गढ़ रहे थे। चित्रकार, फ़िल्मकार, रंगकर्मी, पत्रकार आदि पहली बार हिन्दी साहित्यिक-समाज की मुख्य धारा में पहचाने जाने लगे थे। एक तरह की आवाजाही दिखने लगती है और प्रगाढ़ होती है। यह आवाजाही साहित्य-रूपों को प्रभावित करने लगती है। कविता-कहानी आदि पर चित्रकला, रंगकर्म और सिनेमा के असर दिखने शुरू होते हैं। पहली बार एक भरापूरा हिन्दी बुद्धिजीवी तबके का निर्माण होता हुआ दिखता है। राजेन्द्र जी के अन्त्येष्टि कार्यक्रम में जो इतनी भीड़ उमड़ी थी क्या वह सिर्फ हिन्दी लेखकों की भीड़ थी। नहीं, उसमें उन सारे विधाओं के लोग थे जिनसे एक बुद्धिजीवी तबका का निर्माण होता है और इस तबके के साथ राजेन्द्र जी के आवयविक संबंध ने भी उन्हें पब्लिक इंटेलेक्चुअल का दर्जा दिया है। यह उनका अपना कौशल था। अपने समय में विजय सोनी इसी भरेपूरे बौद्धिक समाज में चमक उठते हैं। इस प्रक्रिया को स्वाभाविक गति से आगे बढ़ना था लेकिन स्वाभाविकता अक्सर जालों-जंजालों के हाथों परास्त होती रही। फिर हम इस पराजय को ही स्वाभाविक मान लेते हैं। अगर यह उस स्वाभाविक प्रक्रिया का पराजय नहीं तो और क्या है कि अपने समय के लोकप्रिय-चर्चित-हुनरमंद और विद्वत दंपति से हमारा साक्षात्कार सिर्फ दैवीय दुर्योगों या संयोगों पर ही क्यों निर्भर था!! कुछ तो ऐसा चल रहा है जो सीधा नहीं है। टेढ़ा है पर मेरा है वाले समाज में सीधे की चिंता ही कहीं लोगों को टेढ़ा न लगने लगे!!

 उदय शंकर

उदय शंकर

जेएनयू से पीएचडी के लिए शोधरत। तीन खंडों में आलोचक सुरेंद्र चौधरी के रचना संचयन का संपादन। सांस्‍कृतिक आंदोलनों से जुड़ाव। उनसे udayshankar151@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

साभार- अकार 

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One thought on “आज की चीख़ पुकार में एक बहुत कोमल तान खो गयी है: उदय शंकर

  1. Dhiraj on said:

    An original reflection.

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