ओपन एयर तड़बन्ना: ज्ञानेश बब्बू

ज्ञानेश बब्बू पेशे से दारू के दारोगा के रूप में सुख्यात हैं और अपने बौद्धिक स्पार्क्स के लिए लोकोक्तियों के हवाले हो चुके हैं। अगर फेसबूक नहीं होता तो उनके ये स्पार्क्स हम तक नहीं पहुंचते।  फेसबूक  पर उनके 159 दोस्त  हैं  और जिस सरगर्मी से वे वहां जूझे रहते  हैं  उससे बहुत लोग अछूते हैं.  हिंदी में जब से  कवि , कहानीकार  और आलोचक  होना बेरोजगारी  का पर्याय और सबसे सस्ता काम हो गया है  वैसे समय में ज्ञानेश बब्बू की ये फेसबूकिया  रचनाएँ  कहीं ज्यादा मार्मिक और रचनात्मक हैं. 

courtesy: dsource

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By ज्ञानेश बब्बू

हमको काहे घसीटे तुम लोग ? धरती पर आख़िरी अत्याचारी हमी बचे हैं ? अब हम इन्टरनेट पर लिखा-पढी बंद कर न्यू वेव या अवाँ गार्द फिल्म, पोलंस्की, गोदार्द जैसों की फिल्म या हॉलीवुड की मार-धाड़,सेक्स एंड वायलेंस से भरपूर फिल्म से मतलब रखना चाहते हैं. अपने या दूसरे के दीवार पर चढ़ कर चालू कुत्ता-युद्ध में शामिल होने से यह बेहतर है. बंधुवर लोग भी ट्राई करें. जिन्दगी को समझाने वाली नजर बेहतर होगी.

ताड़ी विशुद्ध प्राकृतिक पेय है जिसमें इंसान की कमीनी फितरत शामिल नहीं होती है. ताड़ी प्रायः घर के बाहर ही पीया जाता है. प्रायः जहां पिया जाता है उसे ताड़ीघर, तड़बन्ना, पसियाना कहते है. ज़माना हिन्दी पेपर के रंगीन पन्ने वाली भाषा की है तो बार भी कह सकते है. बार में पेय के साथ अन्य सहायक चीजों— गिलास, पानी, बैठने का इन्तेजाम, चिखना-नमकीन, म्यूजिक-फूजिक वगैरह उपलब्ध करवाया जाता है. उक्त तस्वीर में दृष्टिगत होता है कि ये तमाम सुविधाएँ प्रदत्त हैं. और प्राकृतिक पेय के पान में प्रकृति का साथ भी उपलब्ध है. अतः यह बार से भी ज्यादा दिव्य है. इस तरह के पेय में प्रकृति के साथ का अनुभव अनोखा होता है. ताड़ी का बार खुली जगह को ताड़ और खजूर के पत्ते को बांस के खपच्चियों से बाँध कर बनाए गए टाट से घेरकर बनाया जाता है इसलिए तड़बन्ना कहलाता है.

ताड़ी और नीरा में फर्क है. पासी पत्ते के जड़ को छील कर कट मार देता है और लबनी सटा के टांग देता है. यह काम सूरज डूबने के बाद किया जाता है. और अलसुबह जब उसे उतार लिया जाता है तो लबनी में जमा द्रव/द्रव्य नीरा कहलाता है. इसमें नशा नहीं होता है. स्वाद में bitterness होता है, झनझनाहट होती है. पेट को कूल रखना है, ठीक रखना है तो यह अचूक द्रव्य है. डॉक्टर से बचने के लिए सेब नहीं रोज सुबह खाली पेट 250 मि.ली. नीरा पीजिये.  जब उसी द्रव्य को धूप लगाने के लिए छोड़ दिया जाता है तो द्रव्य में निहित शर्करा किण्वित( fermented) होकर एथेनोल में टूट जाता है और नशीला हो जाता है. यह झागदार हो जाता है.यह ताड़ी है– विशुद्ध प्राकृतिक पेय, इंसानी फितरत से अछूता !!

यह गजब की चीज होती है. अपने छोटे से कसबे में मैंने इसके कद्रदानों को देखा है और आश्चर्यचकित भी हुआ कि इतने पैसे वाले सब यहाँ जमीन पर बैठ कर मैला उठाने वालों के साथ ताड़ी पी रहे हैं, धौल-धप्पा कर रहे हैं, शायरी भूंक रहे हैं. ”संगत से गुण होत है, संगत से गुण जात” जैसे कथन मैंने टाट से छान-छान कर आती आवाजों के साथ ही पहली बार सुना था. लेकिन वह आश्चर्य बचपन की आँखों ने दी थी. बड़ा होने पर यह बड़ा मार्क्सवादी पेय लगने लगा

बचपन में ताड़ी, ताड़ीघर को नजदीक से देखने का मौका मिला. घर के अगल-बगल में ही कई पसियाने थे. इस व्यवसाय में लगे कुछ निहायत उज्जड थे तो कुछ बेहद शरीफ. ऐसे ही एक शरीफ का बेटा था बिन्दु जिससे मेरी यारी थी. पता नहीं अब कहाँ है. पसियाने में जमीन पर बैठने के लिए ताड़ के पत्ते से बना 2 x2 फुट की चटाई होती थी. जो कांच का गिलास प्रयुक्त होता था वह वैसा ही था जो चाय की दुकानों में देखने को मिल जाता है. घुघनी, भिंगोये चने में प्याज वगैरह मिला कर बनाया गया द्रव्य ही मुख्य चिखना होता था. कुछ शौक़ीन पापड़ का भी इस्तेमाल करते थे. बीड़ी, सिगरेट अपरिहार्य तत्त्व हुआ करता था.पीते-पीते ताश का खेल भी चलता रहता था. पॉपुलर खेल था —-28, ब्रे, कोट-पीस, रमी. और झाम-झगडा भी. 8-10 दिनों में एक बार हल्लागुल्ला, मार देने ,काट देने की धमकीयुक्त चिल्लाहट सुनाई देने लगता था. महीने में एक बार सर फूटने, खून बहने की घटना हो जाती थी. बेचने वाले सभी पासी गोतिया-दायाद ही थे. अतः आपसी वैमनस्य, जलन, प्रतिद्वंदिता की वजह से वे लोग भी आपस में भिड जाते थे.

सबसे ज्यादा झगडा जिस दूकान पर होता था उस दूकान की मुख्य करता-धर्ता एक महिला थी, जवानी और अधेड़ावस्था के बीच. तुर्श स्वभाव वाली जो किसी के दो गाली पर दस गाली बोल देती थी. तुरंत ही कचिया या दबिया हाथ में ले लेती थी. लबनी में जमा ताड़ी को एक बड़े घड़े में जमा किया जाता था. उसी में से ताड़ी निकाल कर ग्राहकों को दिया जाता था. ग्राहकों को जिस मिटटी के बर्तन में दिया जाता था उसे चुक्कड़ कहते थे और वह सपाट पेंदे वाले लोटे के आकार का होता था. उसने 4-5 गिलास ताड़ी आता होगा. जब वह महिला देखती थी कि पियक्कड़ नशा खा चूका है तो चुक्कड़ में ताड़ी की अगली खेप में डंडी मार देती थी. लेकिन पी लेने के बाद इंसान पैसे और दारू में अपने हिस्से के बारे और ज्यादा चौकन्ना हो जाता है. भुक्तभोगी भांप जाता था और झाम शुरू हो जाता था. झगडा और भी कई कारणों से होता था मगर जब भी होता था बड़ा अतियथार्थवादी सीन पैदा हो जाता था. भुक्तभोगी क्रेता और विक्रेता के बीच के झगड़े के अलावा पीने वाले अन्य फरीक भी पता नहीं किन-किन वजहों से आपस में भी भिड़ना शुरू कर देते थे. फिर यह समझ पाना मुश्किल हो जाता था कि कौन किस से झगड़ रहा है, कौन किसको गरिया रहा है.बिलकुल भारतीय चुनाव वाला सीन बन जाता था. लेकिन इस भयानक उथल- पुथल में भी एकाध ग्रुप ऐसा भी होता था जो आप-पास के कोलाहल से निस्संग,तटस्थ अपने दिव्यतम कर्म में तल्लीन रहते थे. यह जिन्दगी का बड़ा सबक था- जहां मन रमे, बेपरवाह हो उसी में तल्लीन रहिये. वे महापुरुष थे.

एक भयानक पियांक था. दिन भर वह अड्डे पर ही जमा दिखता था. नाम भूल रहा हूँ. वह सर्दियों के मौसम में किसी बड़े शहर में रास्ते के किनारे बड़ा सा छाता लगाकर पेन बेचता था. पैसा जमाकर वापस कसबे में लौट आता था और पीता था. वह भी नायाब टुकड़ा था. अकेले पीता था. किसी से झाम में नहीं जाता था. पीकर कर के दुनिया भर की वजहों से पूरी की पूरी दुनिया को ही गरियाता था, किसी को व्यक्तिगत रूप से नहीं. मैं आजकल फेसबुक पर ऐसे ही गरिया रहा हूँ. ( लगता है उसी वक्त का यह अनुभव मेरे अवचेतन में बैठा और आज चेतन में आ गया है.) तड़बन्ना ओपन एयर होता था. बारिश की वजह से जब पीने का कर्म बाधित हो जाता था तो वह सीधे भगवान को ही चैलेन्ज करने लगता था, फैटम-फैटी के लिए. उसी के मुंह से मैंने पहली बार यह कथन सुना था कि जिसको भी थोडा सा पॉवर मिल जाता है, रंगबाजी दिखाने लगता है. (हाल की आंधी, बारिश में फंस जाने पर मैं भी भगवान को ऐसे ही गरिया रहा था, बिना पिये.)मैंने उसे एक ही बार औरों से झगडा करते देखा था. गुस्से में वह वह छाते का नुकीला डंडा ले आया और पसियाने की रणभूमि में अकेले 4-5 को थाम लिया. कभी-कभी लगता है वह मेरी जिन्दगी का सबसे प्रेरक आदमी रहा हो.

उस वक्त ताड़ी का दाम क्या था, नहीं पता. मुझे लगता है 10-20 पैसे में एक चुक्कड़ ताड़ी मिलता होगा.सस्ती का ज़माना था. 1 रुपये में पनामा सिगरेट का पैकेट मिल जाता था. पसियाने का जो हिस्सा टाटरहित होता था उधर से देखने पर मामला बड़ा जादूभरा लगता था, एक ही वक्त खुला भी और रहस्यमय भी, पवित्र भी और पापमय भी. पीने वाले ऐसे तल्लीन बैठे दीखते थे जैसे कोई दैविक अनुष्ठान संपन्न किया जा रहा हो और अचानक झगडा भभक उठता था. टाट से छन-छान कर गालियाँ भी,अश्लील वचन भी सुनाई देते थे और प्रेरणास्पद सूक्तवाक्य भी. माहौल एक ही वक्त जादुई यथार्थवादी भी होता था और अतियथार्थवादी(surrealist) भी.

हमलोग एक पसियाने के टाट के बगल में खाली जमीन पर रबर की गेंद से ”पिट्टो” खेलते थे. गेंद 15 या 25 पैसे में मिलती थी. इस खेल में गेंद से किसी दूसरे खिलाड़ी को मारा जाता था. इस मारा-मारी में गेंद कभी-कभी टाट को चीर कर पसियाने में चली जाती थी. अगर गेंद से टकराकर कोई भरा गिलास लुढ़क जाता था तो गेंद वापस नहीं मिलती थी. कोई नुकसान नहीं होने पर बहुत उदारता से गेंद को टाट के उस तरफ से फेंक दिया जाता था. कुछ लडके ऐसे थे जो पेड़ पर टंगे लबनी को नीचे से ढेला मार कर चनका देते थे. लबनी में जमा ताड़ी बूंद-बूंद टपकने लगता था वे लौंडे नीचे चातक की तरह मुंह फाड़ कर खड़े हो जाते थे. अब समझ में आता है कि उस बूँद-बूँद से नशा तो खैर क्या होता होगा,वे बस यह दिखलाना चाहते थे कि वे शरीफ नहीं हैं, हरामी हैं. जल्दी ही बिहार का हरेक इंसान यही साबित करने पे तुल गया. अब यह यू.पी. में हो रहा है. शराफत की चाहत घटती गयी. यह शर्मिन्दगी की निशानी बन गयी है.

समय बहुत बदल गया. अब ताड़ी प्रचलन से गायब है या गायब हो रहा है. दारू का ज़माना आ गया है. विकास, खगोलीकरण की मारा-मारी में ऐसे ही अन्य कई चीजें हमारे जीवन से गायब हो गयी या तेजी से विलुप्त होती जा रही हैं जिनसे हमारा होना निर्मित हुआ है. लेकिन यह भी लगता है कि यह दुःख हमसे पहले की पीढी को भी हुआ होगा और आने वाली पीढ़ियों को भी होता रहेगा.

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2 thoughts on “ओपन एयर तड़बन्ना: ज्ञानेश बब्बू

  1. munna on said:

    jiyo babbu! really you transported me to teeny labni days

  2. Aditya on said:

    As usual mast likhaayi by babbu sir……waise Maharshtra mein aaj bhi neera daba ke aur taadi chhupa ke piya ja raha hai

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