शापित नस्लों के एकांत और यूटोपिया: गैब्रिएल गार्सिया मार्केज (अनु. संदीप सिंह)

 19 अप्रैल को अंग्रेजी अखबार ‘द हिन्दु’ में जिस रोज मार्केज की मृत्यु की खबर प्रकाशित हुयी उसी रोज एक खबर ‘क्राइम वेव इन सल्वादोर’ के नाम से छपी थी. दोनों घटनाएं अद्भुत तरीके से एक दुसरे से जुडी हुई थीं. मार्खेज के बारे में लोग जानते ही हैं. मैं यहाँ सल्वादोर की बात करूँगा जो कि खबर के मुताबिक लूट लिया गया था.  ये संभवतः दुनिया की सबसे बड़ी गैंग थी असाधारण और अनौपचारिक. बच्चे, औरतें और मर्दों के जत्थे निकले, कई जगह जुलूसों की शक्ल में, रोमांच, डर और उन्मादी मस्ती से भरे हुए और जो कुछ भी लूट सकते थे, ले जा सकते थे, ले गए. ब्राजील का शहर साल्वाडोर जो 19 अप्रैल के दो रोज पहले लुट गया. इस लूटपाट में तकरीबन चालीस लोग मारे गए. यहाँ फ़ुटबाल विश्वकप के कुछ मैच भी होने हैं. हुआ ये कि शहर की पुलिस वेतन वगैरा को लेकर हड़ताल पर चली गयी थी सो लोग संभवतः किसी आप्त प्रेरणा से संचालित होकर पूरा शहर लूट ले गए. अगर आपने फिल्म ‘सिटी ऑफ़ गोल्ड’ देखी होगी तो क्या हुआ होगा, इस दृश्य की कल्पना कर सकते हैं. कल्पना कीजिये कि शहर की बस्तियों से लोग झुण्ड के झुण्ड बनाकर निकल रहे हैं हाथों में हथौड़ियाँ, चाकू, लोहे की रॉड और छोटी-बड़ी पिस्तौलें लेकर दुकानों को, मॉल्स को लूट लेने के लिए. वे चीख रहे हैं, हंस रहे हैं, भाग रहे हैं, कईयों के हाथों में सिगार या शराब की बोतलें हैं, इसमें कईयों के सिर फटेंगे, कईयों की टांगों, बाहों और मुंह पर घाव होंगें, क्या पता एक किसी की आँखें किसी मुठभेड़ की भेंट चढ़ जाये और कुछ कभी नहीं लौटेंगें. अगर यह दृश्य साहित्य या कला में आये तो कैसा लगेगा- यथार्थ, जादुई यथार्थ या अति यथार्थ! ये है लैटिन अमेरिका! मार्केज़ का लैटिन अमेरिका!

पर ठहरिये, मास्टरस्ट्रोक तो पढ लीजिए. इस घटना पर बयान  सरकार के प्रतिनिधि ने कहा ‘हाँ, मौतें औसत से थोड़ा ज्यादा हुई हैं, पर इतनी भी ज्यादा नहीं की एब्सर्ड कहा जा सके’. पिछली बार जब पुलिस हड़ताल पर गयी थी तो तकरीबन 156 मौतें हुई थीं!! 

कभी मार्केज़ ने कहा भी था कि पता नहीं क्यों लोग उनके लेखन को ‘जादुई’ वगैरह कहते हैं क्योंकि उनके हिसाब से लैटिन अमेरिका का यथार्थ अपने आप में इतना विकट, विषम और कई बार मायावी होने जैसा है कि वह अन्य आख्यानों, मूलतः अंग्रेज़ी साहित्य परंपरा द्वारा उपलब्ध, स्थापित और बहुप्रचारित साहित्यिक रूपकों, बिम्बों, प्रतीकों और आख्यानात्मक संरचनाओं से पूरापूरी अभिव्यक्त ही नहीं किया जा सकता. इस समाज के इतिहास और संस्कृति को समझने के लिए आपको माच्चू-पिच्चू की ऊँचाइयों पर मिलने वाले अनन्त सन्नाटे को सुनना होगा, इंका और अजोर सभ्यताओं की जीवाश्मित अस्थियों की कहानियां सुननी होंगी, महाद्वीप के रहस्यमयी जंगलों में भूलना-भटकना होगा, सोने, चांदी, चीनी, केले और कॉफ़ी के क्रूर दस्तावेजों की ऐय्यारी को फिर फिर पढना होगा जिसकी गवाह एडूअर्दो गैलिआनो के शब्दों में इस महाद्वीप की छितरायी हुई नसें हैं. #  संदीप सिंह

Courtesy:  Newsweek

Courtesy: Newsweek

 लैटिन अमेरिका का एकांत   

By गैब्रिएल गार्सिया मार्केज

मैग्लेन के साथ दुनिया का पहला चक्कर लगा रहे फ्लोरेंस के जहाजी अंतोनियो पिगाफेटा (स्पेन के बादशाह चार्ल्स प्रथम के आदेश पर खोजकर्ता फ़र्दिनांद मैग्लेन को 1519 में समुद्री मार्ग की खोज के लिए भेजा गया था. पिगाफेटा इस समुद्री यात्रा में उसका सहायक था) ने हमारे दक्षिणी छोर से गुजरते हुए अमेरिका के बारे में जो लिखा वह चीजों का कमोबेश सटीक विवरण होते हुए भी फैंटेसी के करीब पड़ताहै. वह लिखता है कि उसने ऐसे सुअर देखे जिनकी नाभियाँ उनके चूतडों पर थीं, बिना पंजों वाली मादा पक्षियाँ जो अपने साथी की पीठ पर अंडे सेती थीं, और भी ऐसे कई जीव; बिना जीभों वाले पेलिकन (जलसिंह) जिनकी चोंचें चम्मच जैसी थीं. वह लिखता है कि उसने एक ऐसे जीव को देखा जिसके सिर और कान खच्चर के थे, शरीर ऊंट का, पैर हिरन के और जिसकी आवाज में घोड़े की हिनहिनाहट थी. वह बताता है कि पैटागोनिया में एक नेटिव बन्दे ने जब अपनी शक्ल आईने में पहली बार देखी तो वह मुस्टंडा अपनी ही छवि के आतंक से बेहोश हो गया.

यह छोटी और दिलचस्प किताब, जिसमें हमारे आज के उपन्यासों के बीज छुपे हुए हैं, हमारे यथार्थ का किसी भी मायने में चकित करने वाला विवरण नहीं है. ‘एंडीज़ के किस्सों’ में हमारे लिए ऐसी और भी कहानियां हैं. रहस्यमयी और भ्रमित करने वाली हमारे सपनों की भूमि ‘अल डराडो’ (शाब्दिक अर्थ- सोने का राजा. स्पेनियों के आक्रमण से पहले कोलंबिया की एक जनजाति का मुखिया परंपरा के अनुसार अपने बदन पर सोने की गर्द लपेटे रहता था. बाद में यह विशेषण स्पेनी दंतकथा की लुप्त स्वर्णनगरी के नाम के तौर पर प्रयोग किया जाने लगा.), सदियों से कई सारे नक्शों में नक्शानवीसों की फंतासियों के मुताबिक, अपना रंग-रूप और स्थान बदलती रही है. चिर युवा बना देने वाले झरने की तलाश में मिथकीय आलवार तुनेस वेजा डे वाका (1527 में अमेरिकी अभियान पर निकले स्पेनी दल का सदस्य, जो जहाज के टूट जाने और साथियों के भटक जाने के बाद कुछ कबीलों का सदस्य रहा. उन कबीलों के रहन-सहन और परम्पराओं पर उसके लिखे ब्योरे यूरोपियनों के आगमन से पहले के अमेरिकी जनजीवन का प्रमाणिक दस्तावेज माने जाते हैं.) आठ सालों तक मैक्सिको के उत्तरी इलाके को छानता रहा. इस भ्रामक अभियान के सदस्यों ने एक दूसरे को भकोस लिया और अभियान में शामिल छः सौ लोगों में से केवल पांच जीवित लौटे. उस युग की अनेकों रहस्यमयी कहानियों में से एक यह है कि हरेक खच्चर पर सौ पोंड सोने से लदे हुए 11 हज़ार खच्चर, जब कुज्को (प्राचीन इंका राज्य का एक शहर, जिसका यह नाम उसके अठारह साल के शासक के नाम पर पड़ा.) से रंगदारी पहुंचाने अताहुआल्पा (इंका साम्राज्य के संप्रभु राज्य वातान्तिन्सुयु का शासक) के लिए चले पर कभी नहीं पहुंचे. आगे चलकर औपनिवेशिक काल में कार्टाजेना द इंडियाज़ (उत्तरी कोलंबिया का एक शहर) में कछारी जमीन में पाली मुर्गियां बेची जाती थीं जिनके पेषणी में सोने के छोटे-छोटे कण मिलते थे. एक औपनिवेशिक का स्वर्ण-प्रेम अभी तक हमें घेरे हुए है. 19वीं सदी में पनामा के इस्थ्मस (उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका को जोड़ने वाली संकरी पट्टी.) के आर-पार समुद्रों के बीच रेल बिछाने की संभावना का अध्ययन कर रहे जर्मन मिशन के मुताबिक यह योजना एक ही शर्त पर संभव हो सकती थी कि रेल की पटरिययाँ लोहे की न होकर सोने की हों- क्योंकि लोहा वहां बहुत दुर्लभ था.

स्पेनी गुलामी से आज़ादी ने हमारे पागलपन को कम नहीं किया है. तीन बार तानाशाह रह चुके मैक्सिको के जनरल एतोनियो नोपेन डे सान्ताना ने तथाकथित पेस्ट्री युद्ध (1839 में मेक्सिको और फ्रांस के बीच हुआ युद्ध) में गँवाई अपनी दाहिनी टांग का भव्य अंतिम संस्कार आयोजित किया. 16 साल तक इक्वाडोर पर एक निरंकुश राजा की तरह राज करने वाले जनरल ग्रेब्रियल गर्सिया मोरलेनो (जो उदारपंथियों की घृणा का शिकार बना, और जिसने 1875 में अपनी हत्या से पहले तत्कालीन पोप को लिखे एक पत्र में इसकी आशंका जताई थी.) के मरने के उपरान्त तमगों से सजे-धजे उसके शव को पूरी वेशभूषा में राष्ट्रपति की कुर्सी पर बिठाया गया. जनरल मैक्सिमिलियानो हारनान्डेज़ मार्टिनेज़ ने, जो अल सल्वाडोर का धार्मिक निरंकुश शासक था और जिसने तीस हज़ार किसानों का कत्लेआम करवाया था, अपने खाने में जहर का पता लगाने के लिए एक पेंडुलम का आविष्कार किया तथा लाल बुखार से बचने के लिए लैम्पपोस्टों को लाल कागज़ से ढँकवा दिया था. जनरल फ्रांसिस्को मोराज़ की प्रतिमा जो तेगूसिगाल्पा के मुख्य चौराहे पर लगी है वह वस्तुतः ‘मार्शल ने’ की है जिसे पेरिस के पुरानी–धुरानी और दोयम दर्जे के कबाड़खाने से खरीदा गया था.

11 साल पहले, जब हमारे समय के महान चिली कवि पाब्लो नेरुदा ने अपने जादुई शब्दों से इस हॉल में बैठे श्रोताओं को चमत्कृत किया तबसे अच्छी-बुरी मंशा वाले यूरोपीय, लातिन अमेरिका की दन्तकथाओं की तरफ और किंवदंती की हद तक जिद्दी उसके अभिशापित मर्दों और ऐतिहासिक औरतों की तरफ, और ज्यादा आवेग से आकर्षित हुए. तब से हमें एक पल का चैन नहीं है. अपने जलते महल में घिरा हुआ एक प्रोमेथियन राष्ट्रपति (चिली के राष्ट्रपति सल्वादोर अयेंदे) एक पूरी सेना से अकेले लड़ते हुए मारा गया; और वे दो रहस्यमयी हवाई दुर्घटनाएं, जिनका सच हम अभी भी नहीं जानते,  जिन्होंने अपने लोगों के आत्मसम्मान को वापस लौटने वाले एक महान ह्रदय वाले राष्ट्रपति (1981 में एक हवाई दुर्घटना में मारे गए इक्वेडोर के राष्ट्रपति जाईमे रोल्डोस अगिलेरा; इस दुर्घटना को अमेरिका की साजिश बताया गया था.) और लोकतान्त्रिक सिपाही (पानं के सैन्य शासक ओमर टोरिहो, जिनकी मौत भी अगिलेरा से मिलती-जुलती हवाई दुर्घटना में हुई.) के जीवन का अंत कर दिया गया. हमारे यहाँ अब तक पांच बड़े युद्ध और सत्रह तख्तापलट हो चुके हैं; इसी बीच एक ऐसा पैशाचिक तानाशाह (अयेंदे ड=के बाद सत्ता संभालने वाला चिली का तानाशाह आगुस्टो पिनोशे, जिसने हजारों वामपंथियों का संहार करवाया. ) उभरा है जो पहली बार ईश्वर के नाम पर लैटिन अमेरिका में हमारे समय का नरसंहार रच रहा है. इस बीच, यूरोप में सन 1970 से अब तक जितने बच्चे पैदा हुए उससे ज्यादा, 21 लाख लातिन अमेरिकी बच्चे अपनी उम्र के एक साल पूरा होने से पहले ही मर गए. दमन के चलते गायब लोगों की संख्या एक लाख बीस हज़ार है, मानों उप्पस्ला के लोगों के लिए कोई जवाबदेह नहीं है. अर्जेंटीना की सलाखों के पीछे पैदा हुए उन असंख्य गर्भवती महिलाओं के बच्चे जिनकी कोई शिनाख्त नहीं हो सकी और जिन्हें फ़ौजी हुकूमत के फरमानों के तहत चुपचाप गोद ले लिया गया या अनाथालयों में भेज दिया गया. पूरे महाद्वीप में तकरीबन दो लाख औरतें और मर्द मार दिए गए क्योंकि उन्होंने इन परिस्थितियों को चुनौती देने की कोशिश की; और तकरीबन एक लाख लोग तीन दुर्भाग्यशाली देशों – निकारागुआ, अल सल्वाडोर और ग्वाटेमाला में. फ़र्ज़ कीजिए कि यही घटना संयक्त राज्य अमेरिका में हुई होती तो चार सालों में 16 लाख लोग हिंसक मौतों के शिकार होते.

अपनी मेहमाननवाजी के लिए मशहूर चिली के दस लाख लोगों को, जो पूरी आबादी का दस फीसदी है, मजबूरन अपना देश छोड़ना पड़ा. 25 लाख लोगों का एक छोटा सा देश उरुग्वे, जो महाद्वीप का सबसे सभ्य देश माना जाता है, अपने हर पांच में से एक व्यक्ति को निर्वासन में खो चुका है. अल सल्वाडोर, 1979 से जारी गृहयुद्ध के चलते हर बीस मिनट में एक रिफ्यूजी पैदा कर रहा है. इन निष्कासित और जबरिया शरणार्थी बना दिए गए लैटिन अमेरीकियों का अगर कोई देश बनाया जाय तो वह नार्वे की आबादी से बड़ा होगा.

 मैं हिमाकत के साथ यह कह सकता हूँ कि जिसने स्वीडिश अकेडमी ऑफ़ लेटर्स का ध्यान खींचा है वह हमारा बेढंगा यथार्थ है न कि उसका साहित्यिक निरूपण. वह यथार्थ जो सिर्फ कागजों पर नहीं है बल्कि हमारे अन्दर जीवित है बल्कि हमारी रोज की जिन्दगी में हर लम्हे होने वाली असंख्य मौतों को तय करता है, जिसने हमारे भीतर एक ऐसी अतृप्त रचनात्मकता को पैदा किया है जो दर्द और ख़ूबसूरती से भरी हुई है और जिसका यह घुमंतू और स्मृत्याभासी(nostalgic) कोलंबियाई एक नगण्य लेखक है. कवि और फ़कीर, संगीतज्ञ और पैगंबर, योद्धा और बदमाश, इस बेलगाम यथार्थ के इन सारे प्राणियों की हमें बहुत कल्पना नहीं करनी पड़ती. और यही हमारी समस्या है कि जीवन को विश्वास योग्य तरीके से बताने के लिए हमारे पास पारंपरिक उपकरण नहीं हैं. मेरे दोस्तों, यही हमारे एकांत का सार है.

यही वे मुश्किलें हैं जिनका अभिप्राय हम बताते हैं और जो हमारे आड़े आती हैं. इसीलिये यह बात समझ में आती है कि अपनी संस्कृतियों की श्रेष्ठता के बखान में जुटे  दुनिया के इस हिस्से (यूरोप) के अक्लमंद लोग हमारे बारे में बताते वक़्त खुद को सक्षम महसूस नहीं करते. यह स्वाभाविक है कि वे उन्हीं प्रतिमानों से हमें देखते हैं जिनसे वे खुद को मापते हैं और यह भूल जाते हैं कि जिंदगियों की बरबादियाँ सबके लिए एक जैसी नहीं हैं, और अपनी अस्मिता की खोज हमारे लिए भी उतनी ही कठिन और रक्तरंजित है जितनी उनके लिए. हमारे यथार्थ को बयान करने के वे तरीके जो हमारे अपने नहीं हैं हमारी शिनाख्त को और भी गुमनामी में धकेल देते हैं- पहले से कहीं अधिक कम आज़ाद, पहले से कहीं ज्यादा एकाकी. आदरणीय यूरोप शायद और अधिक अंतर्दृष्टि प्राप्त करेगा यदि वह अपने अतीत में हमें देख सके. मैं याद दिलाना चाहूँगा कि अपने शहर की दीवार बनाने में लन्दन को तीन सौ साल लगे और अपना बिशप पाने में तीन सौ और साल लगे. बीस शताब्दियों तक रोम अनिश्चितता के गर्भ में घूमता रहा जब तक कि इट्रस्कन (इतालवी सभ्यता का प्राचीन केंद्र) राजा ने उसे इतिहास का रास्ता नहीं दिखाया. और आज के शांतिप्रिय स्विस नागरिक जो अपनी बेहतरीन पनीर (चीज़) और भावशून्य घड़ियों से हमें लुभाते हैं, 16वीं सदी तक तकदीर के सिपाही बनकर यूरोप को खून में नहलाते रहे. यहाँ तक कि पुनर्जागरण के स्वर्णिम दौर में भी स्विस दरबार से पैसा पाते 12 हज़ार भाड़े के सिपाहियों ने रोम को लूट कर तबाह कर दिया और इसके आठ हज़ार वासियों को अपनी तलवारों से मौत के घाट उतार दिया.

मेरा इरादा तोनियो क्रागर (1903 में प्रकाशित टॉमस मान का उपन्यास, जिसका केन्द्रीय पात्र उत्तरी जर्मनी के व्यापारी पिटा और इतालवी कलाकार माँ की संतान है और उन दोनों के आनुवांशिक गुणों को लिए हुए है.) के भ्रम को साकार करने का नहीं है जिसके पवित्र उत्तर और जज्बाती दक्षिण को एक करने की भव्य कल्पना थामस मान ने की थी. लेकिन, मुझे यकीन है कि साफ़ दृष्टि वाले यूरोपीय, जो यहाँ भी न्यायोचित और मानवीय सरजमीं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, हमें और बेहतर मदद कर सकते हैं; बशर्ते वे हमें देखने के अपने नजरियों पर पुनर्विचार करें. हमारे सपनों के साथ आपकी एकजुटता इस अकेलेपन को तब तक कम नहीं करेगी जब तक वह दुनिया के बंटवारे में अपना जीवन ढूँढने का भ्रम पाले हुए लोगों के लिए उचित मदद के ठोस कार्यक्रमों के तौर पर पर नहीं बदलती.

लैटिन अमेरिका नहीं चाहता और न ही ऐसा कोई कारण है कि वह इच्छाशक्ति रहित एक प्यादा हो, न ही उसे चाहत है कि उसकी आज़ादी की चाह और मौलिकता पश्चिम के लिए कोई मिसाल बने. हालांकि, परिवहन की उपलब्धियों ने लैटिन अमेरिका और यूरोप की दूरियाँ तो कम की हैं पर हमारी सांस्कृतिक दूरी और बढ़ी है. आखिर ऐसा क्यों है कि साहित्य में हमारी मौलिकता को तत्परता से कबूल किया जाता है, पर सामजिक बदलाव के हमारे कठिन प्रयासों को अविश्वासपूर्वक नकार दिया जाता है? आखिर प्रगतिशील यूरोपियों द्वारा उनके अपने देशों में सामाजिक न्याय (Social Justice) की  तलाश लैटिन अमेरिका के लिए भिन्न परिस्थितियों में अलग तरीकों से-एक लक्ष्य क्यों नहीं हो सकती है? नहीं, यह अथाह हिंसा और हमारे इतिहास की पीड़ा कई सदी पुराने पक्षपात और अनकही कटुता का परिणाम है, न कि हमारे घर से तीन हज़ार मील दूर रची गयी कोई शाजिश. लेकिन बहुत सारे यूरोपीय नेता और विचारक, जो बूढ़े लोगों की तरह अपनी जवानी की उर्वर अतियों को भूल चुके हैं, ऐसा ही सोचते हैं, कि दुनिया के इन दो आकाओं (सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका) के रहमोकरम के अलावा किसी और नियति के साथ जीना असंभव है. दोस्तों, यही हमारे एकांत का पैमाना है.

 इस दमन, लूट और अकेले छोड़ दिए जाने के बावजूद हमारा  जिन्दगी का जज्बा वैसा ही है. न बाढ़, न प्लेग, न अकाल, न आपदा, न ही सदी दर सदी तक चलने वाले अंतहीन युद्ध-मौत के बरक्स जिन्दगी की निरंतर बढ़त को कोई भी कम नहीं कर सके हैं. एक ऐसी बढ़त जिसमें हर साल और तेजी से इजाफा हो रहा है- हर साल होने वाली मौतों की तुलना में हर साल सात करोड़ चालीस लाख जन्म हो रहे हैं, ये संख्या न्यूयार्क की आबादी से सात गुना ज्यादा है. इनमें से अधिक़तर जन्म संसाधनरहित उन देशों में हो रहे हैं जिनमें लैटिन अमेरिका के देश भी शामिल हैं. इसके विपरीत, सबसे संपन्न देशों ने विनाश की ऐसी शक्तियों को अर्जित करने में सफलता पाई है जो दुनिया का अस्तित्व ख़त्म करने की हद तक सैकड़ों बार उसे तबाह कर सकती हैं- उन इंसानों का ही अस्तित्व नहीं जो आज की तारीख तक इस धरती पर रहे, बल्कि उन सभी जीवित चीजों को जिन्होंने कभी भी बदनसीबी के इस अभागे ग्रह पर सांसें ली होंगी.

आज के ही दिन जैसे किसी दिन मेरे गुरु विलियम फाकनर ने कहा था- “मैं इंसान के अंत को मानने से इनकार करता हूँ.” मैं इस जगह पर खड़े होने के लिए अपात्र समझा जाऊँगा अगर मैं उस विराट त्रासदी से पूरी तरह वाकिफ न रहूँ जिसे 32 साल पहले फाकनर ने मानने से इनकार कर दिया था- मनुष्यता के इतिहास में पहली दफे ‘इंसान का अंत’ अब एक सामान्य वैज्ञानिक संभावना से ज्यादा कुछ नहीं है. आज का यह विस्मय्कारी यथार्थ मनुष्यता के अब तक के इतिहास में महज यूटोपिया (संकल्पना) ही प्रतीत होता था. हम किस्से गढ़ने वाले लोग, जो हर चीज पर यकीन करते हैं, इस यथार्थ का सामना करते हुए पुरे हक के साथ इस यकीन को महसूस करते हैं कि एक विपरीत यूटोपिया (आदर्श जगत) की रचना के लिए जुटने में अभी बहुत देर नहीं हुई है. जीवन का एक नया और व्यापक आदर्श जगत, जहाँ कोई दूसरों के मरने के ढंग को तय करने की हैसियत में नहीं होगा; जहाँ प्यार सच साबित होगा और खुशियाँ मुमकिन; और जहाँ सौ बरस का एकांत भोगने के लिए शापित नस्लों को आखिरकार इस धरती पर  हमेशा के लिए दूसरा मौका मिलेगा.

मार्खेज़ 1982

मार्केज के नोबेल भाषण का  अनुवाद करने वाले संदीप सिंह जेएनयू  छात्रसंघ के अध्यक्ष  और छात्र संगठन आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं . आजकल अध्ययन-चिंतन  में निमग्न हैं . उनसे संपर्क जरिया उनका गुल्लक , sandeep.gullak@gmail.com है. 

साभार:  हंस, जून 2014 

Single Post Navigation

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: