अयेन्दे को क्यों मरना पड़ा: मार्केज (अनु. अशोक कुमार)

चालीस साल पहले चिली की राजधानी सैंतिआगो के ला मोनेदा पैलेस में वहाँ के वामपंथी राष्ट्रपति सल्वादोर अयेन्दे को सैन्य तख्तापलट के दौरान मौत के घाट उतार दिया गया था. अयेन्दे फिदेल कास्त्रो से भेंट में मिलीएके-47 रायफल से अपनी जान बचाने की नाकाम कोशिश करते हुए मारे गए. उस पूरे घटनाक्रम पर मार्च 1974 में उपन्यासकार गैब्रिएल गार्सिया मार्केज ने यह लेख लिखा था जो ‘न्यूस्टेट्समैन’में प्रकाशित हुआ था. इसमें उन्होंने चिली में अयेन्दे के कार्यों, अमेरिका के साथ तख्तापलट के साजिशकर्ताओं की साठगाँठ और उनके उत्तराधिकारी जनरल आगुस्टो पिनोशे के उदय की छानबीन की है. यह लेख सिर्फ अयेन्दे के जुझारू जज्बे का नहीं बल्कि वृहत्तर लैटिन अमेरिकी समाज और जिंदगी पर मार्केज की नजर और एक नागरिक के रूप में उससे उनके गहरे जुड़ाव का भी उदाहरण है. # अशोक कुमार 

सल्वादोर अयेन्दे

सल्वादोर अयेन्दे

By ग्रैब्रिएल गार्सिया मार्केज

यह सन 1969के अंतिम दिनों की बात है जब वाशिंगटन के एक उपनगर के एक घर में पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय) के तीन जनरलों ने चिली की सेना के पाँच अफसरों के साथ दावत की. मेजबान थे अमेरिका में चिली सैन्य मिशन के सहायक एयर अटैची लेफ्टिनेंट कर्नल जेरार्दो लोपेज अंगुलो. उनके चिली-मेहमान थे सेना के अन्य विभागों के उनके सहकर्मी. वह दावत चिली वायुसेना अकादमी के नए डायरेक्टर कार्लोस तोरो माज़ोते के सम्मान में थी. माज़ोते एक अध्ययन मिशन पर एक दिन पहले वहाँ पहुँचे थे. उन आठ अफसरों ने फलों का सलाद, बछड़े का भुना गोश्त और मटर खाया और सुदूर दक्षिण में स्थित अपने देश से लाई दिलकश शराबें पीं, जहाँ तब समुद्रतटों पर पक्षियों के चहचहाने का मौसम था, जबकि वाशिंगटन में उन दिनों बर्फ गिर रही थी. उन्होंने ज्यादातर बातें अंग्रेजी में कीं. उसी एकमात्र विषय को लेकर जिसमें उन दिनों चिलीवासियों की खास दिलचस्पी थी- आने वाले सितंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव. खाने के बाद मीठे के दौरान  पेंटागन के एक जनरल ने पूछा कि अगर सल्वादोर अयेन्दे जैसा कोई वामपंथी उम्मीदवार चुनाव जीत जाएगा तो चिली-सेना क्या करेगी. जनरल तोरो ने जवाब दिया, ‘‘हम आधे घंटे में मोनेदा पैलेस को कब्जे में ले लेंगे,  भले ही हमें इसके लिए उसे आग लगाकर ध्वस्त ही क्यों न कर देना पड़े.’’

मेहमानों में जनरल अर्नेस्तो बाएजा भी थे जो अभी (1974 में) चिली के राष्ट्रीय सुरक्षा के निदेशक हैं. उन्होंने ही गत सितंबर में तख्तापलट के दौरान प्रेसिडेंशियल पैलेस पर हुए आक्रमण का नेतृत्व किया था और उसे फूँक देने का हुक्म दिया था. उन शुरुआती दिनों में उनके जिन दो मातहतों को भी तख्तापलट के इस अभियान में मशहूर होना था, वे थे- जनरल आगुस्टो पिनोशे जो सैनिक परिषद (junta) के अध्यक्ष थे और दूसरे, जनरल हाविएर पैलासिओज. दावत की मेज पर वायुसेना के ब्रिगेडियर जनरल सर्जिओ फिगुएरोआ गुतिएरेज भी थे, जो अभी लोक निर्माण विभाग में मंत्री हैं, और सैनिक परिषद के दूसरे सदस्य वायुसेना के जनरल गुस्तावो लेह के घनिष्ठ मित्र हैं. गुस्तावो ने ही राष्ट्रपति भवन पर रॉकेटों से हमले का हुक्म दिया था. अंतिम मेहमान थे- एडमिरल आर्तूरो ट्रोंकोसो, जो अभी वाल्पाराइसो के नौसैनिक गवर्नर हैं; जिन्होंने प्रगतिशील नौसैनिक अफसरों के सफाए को अंजाम दिया था और उन लोगों में से एक थे जिन्होंने 11 सितंबर के सैनिक विद्रोह की अगुआई की थी.

वह दावत चिली-सेना के उच्चाधिकारियों और पेंटागन के बीच ऐतिहासिक बैठक साबित हुई. उसके बाद वाशिंगटन और सैन्तिआगो में हुई कई बैठकों में एक संभाव्य योजना पर सहमति बनी,जिसके तहत वैसे चिली सैनिक अधिकारी जो दिलोदिमाग से अमेरिकी हितों से बँधे हैं, अयेन्दे के ‘पॉपुलर यूनिटी कोअलिशन’ के द्वारा चुनाव जीतते ही सत्ता पर कब्जा कर लेंगे.

योजना पूरी तरह बेरहम थी. वह एक सीधी सैनिक कार्रवाई थी और ‘इंटरनेशनल टेलीफोन एंड टेलीग्राफ’ के दबाव का परिणाम नहीं थी. उस योजना के बीजारोपण में विश्व राजनीति के गहरे हेतुक छिपे थे. उत्तरी अमेरिका की तरफ जिसे इस कार्य का प्रभार मिला वह थी पेंटागन की सुरक्षा खुफिया एजेंसी; लेकिन व्यावहारिक रूप में यह भार नौसैनिक खुफिया एजेंसी को मिला जो सीआईए तथा नेशनल सिक्युरिटी काउंसिल के उच्चतर राजनीतिक नियंत्रण के अधीन थी. इस पूरे प्रोजेक्ट को थलसेना के बदले नौसेना के अधीन रखना एक सहज योजना थी, क्योंकि चिली के तख्तापलट की कार्रवाई को ऑपरेशन यूनिटास के साथ संपन्न होना था. यह नाम प्रशांत महासागर में अमेरिका और चिली के संयुक्त नौसैनिक अभ्यासों को दिया गया था. ऐसे अभ्यास प्रत्येक सितंबर के अंत में होते थे–यह वही महीना था जब चुनाव होने थे तथा चिली की जमीन और आकाश में युद्धास्त्रों और मौत की कला और विज्ञान में माहिर सैनिकों का जमावड़ा होना बिल्कुल स्वाभाविक लगता.

उस दौरान हेनरी किसिंजर ने चिली के एक ग्रुप के साथ व्यक्तिगत बातचीत में कहा था-‘‘पाइरेनीज की पहाड़ियों से नीचे दुनिया के दक्षिणी हिस्से में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है और ना ही मैं उसके बारे में कुछ जानता हूँ.’’उस समय तक वह संभाव्य योजना पूरे विस्तार में आकार ले चुकी थी और यह मानना असंभव है कि किसिंजर या खुद राष्ट्रपति निक्सन को इसकी जानकारी न थी.

चिली एक लंबाई में फैला देश है– 2260 मील लंबा और औसतन 119 मील चौड़ा, जिसमें एक करोड़ खुशहाल चिलीवासी रहते हैं और करीब तीस लाख लोग राजधानी सैंतिआगो के मेट्रोपोलिटन क्षेत्र में रहते हैं. इस देश की महानता इसके अंतर्निहित सद्गुणों की तादाद में नहीं है बल्कि इसकी कुछ खास विशिष्टताओं में है. यह देश एक ही चीज का उत्पादन गंभीरता से करता है, वह है तांब्र अयस्क और यह ताँबा दुनिया में बेहतरीन है. इसकी मात्रा रूस और अमेरिका के उत्पादन से थोड़ी ही कम है. यह देश अंगूर की शराब भी बनाता है, जो यूरोप की किसी ऐसी शराब से गुणवत्ता में कम नहीं है लेकिन इसका बहुत थोड़ी मात्रा में ही निर्यात होता है. चिली की प्रति व्यक्ति आय 650डालर है, जो लैटिन अमेरिका में उच्चतम है, लेकिन परम्परागत रूप से इसके कुल राष्ट्रीय उत्पाद का आधा हिस्सा सिर्फ़ तीन लाख लोगों में सिमटा है.

1932में चिली पूरे अमेरिकी महाद्वीप में पहला समाजवादी देश बना और मजदूरों के समर्थन से सरकार ने ताँबे और कोयले के राष्ट्रीयकरण का प्रयास किया. यह प्रयोग मात्र 13दिनों तक ही टिक सका. चिली में औसतन हर दो दिनों में एक बार और हर राष्ट्रपति चुनाव के समय एक विध्वंसकारी भूकंप अवश्य आता है. कुछ भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार चिली इस महाद्वीप का देश नहीं बल्कि कोहरेदार समुद्र में एंडीज पर्वतमाला का छज्जा है और उनका विश्वास है कि यह पूरा भूभाग भविष्य में आने वाली किसी प्रलय में विलीन हो जाएगा.

चिली के लोग अपने देश की तरह ही हैं. वे इस महाद्वीप में सबसे खुशमिजाज लोग हैं. वे जिंदादिली के साथ रहना पसंद करते हैं और जानते हैं कि जहाँ तक संभव हो या उससे कुछ अधिक ही बेहतरीन तरीके से कैसे जिया जाए. लेकिन उनमें संशयवाद और बौद्धिक चिंतन के प्रति एक खतरनाक रुझान है. एक सोमवार को एक चिलीवासी ने मुझसे कहा,‘‘किसी भी चिलीवासी को यह यकीन नहीं कि कल मंगलवार होगा.’’ और वह खुद भी उन्हीं में से था. फिर भी इस गहन अविश्वास के बावजूद, या शायद इसके कारण ही चिलीवासियों ने एक प्राकृतिक सभ्यता, राजनीतिक परिपक्वता और सांस्कृतिक स्तर को उस सीमा तक हासिल किया है जो उन्हें औरों से अलग कोटि में रखता है. साहित्य के तीन नोबेल पुरस्कार जो लैटिन अमेरिका ने जीते हैं,में से दो चिलीवासियों के खाते में गए हैं. उनमें से एक पाब्लो नेरूदा इस शताब्दी के महानतम कवि थे. किसिंजर को संभवतः यह सब मालूम रहा होगा जब उन्होंने कहा था कि मैं दुनिया के दक्षिणी भाग के बारे में कुछ नहीं जानता. जो भी हो,अमेरिका का खुफिया विभाग इससे बहुत आगे की जानकारियाँ रखता था. 1965 में चिली असामान्य सामाजिक और राजनीतिक जासूसी कार्रवाई ‘प्रोजेक्ट कैमेलौत’का केंद्रीय मंच बन गया. यह एक गुप्त अनुसंधान था जिसमें सटीक प्रश्नावलियाँ जनता के हर तबके,हर पेशे और हर संगठन के सामने रखी गई थीं और उसका प्रसार लैटिन अमेरिका के सुदूर हिस्से तक था. उसका उद्देश्य था- वैज्ञानिक तरीके से विभिन्न सामाजिक संगठनों के राजनीतिक विकास और सामाजिक रुझानों को चिन्हित करना. सेना के लिए तैयार की गई प्रश्नावली में वही सवाल थे जिन्हें वाशिंगटन की दावत में चिली के अधिकारियों ने फिर से सुना : ‘‘आपकी स्थिति क्या होगी अगर साम्यवाद सत्ता में आ जाएगा?’’ तब यह एक ख्याली जिज्ञासा भर थी.

चिली लंबे समय से अनुसंधान के लिए उत्तरी अमेरिका के सामाजिक वैज्ञानिकों का पसंदीदा क्षेत्र रहा है. इसके जनआंदोलन की उम्र और ताकत,इसके नेताओं की दृढ़ता तथा बुद्धिमता और खुद इसकी आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियाँ इस देश की किस्मत लिखती थीं. यह बात यकीन से कहने के लिए कि चिली लैटिन अमेरिका में क्यूबा के बाद दूसरा समाजवादी गणराज्य होने की काबिलियत रखता है, किसी प्रोजेक्ट कैमेलौत के निष्कर्षों की जरूरत नहीं थी. इसलिए अमेरिका का लक्ष्य अयेन्दे को सत्ता में आने से रोकना भर नहीं था ताकि अमेरिका के निवेशों की सुरक्षा की जा सके; इससे भी बड़ा लक्ष्य यह था कि उस लाभदायक कार्यविधि को दुहराया जाए जिसे साम्राज्यवाद ने ब्राजील में सफलतापूर्वक अंजाम दिया था.

4 सितंबर 1970 को जैसा कि अनुमान था, समाजवादी डॉ. अयेन्दे चिली गणराज्य के राष्ट्रपति चुन लिए गए. हालाँकि तख्तापलट की वह संभाव्य योजना तब अमल में नहीं लाई गई. इसका सबसे बहुचर्चित और हास्यास्पद स्पष्टीकरण भी है : पेंटागन में किसी ने गलती कर दी और एक तथाकथित नौसेनिक-कोरस (समूहगान) के लिए 200 लोगों के वीजा का आवेदन दिया गया जो असल में सैनिक सत्तापलट के लिए विशेषज्ञों की एक टोली थी; हालाँकि उनमें कई एडमिरल ऐसे थे जो एक सुर भी नहीं लगा सकते थे. उस भारी भूल ने, ऐसा समझा जाता है, उस खतरनाक खेल को स्थगित करने में बड़ी भूमिका निभाई. सच यह है कि उस प्रोजेक्ट का गहराई से मूल्यांकन किया गया था : अमेरिका की दूसरी एजेंसियों ने,खासकर सीआईए और चिली में अमेरिका के राजदूत ने महसूस किया कि वह संभाव्य योजना  मूलतः एक सैनिक कार्रवाई थी और उस योजना में वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों को अनदेखा कर दिया गया था.

वास्तव में पॉपुलर यूनिटी की जीत से वैसी कोई सामाजिक उथल-पुथल नहीं दिखाई दी जैसी अमेरिका को उम्मीद थी. अंतर्राष्ट्रीय मामलों में नई सरकार की स्वतंत्र नीतियाँ एवं आर्थिक मुद्दों पर उसकी दृढ़ता ने सामाजिक उत्सव का वातावरण पैदा कर दिया.

पहले वर्ष बैकिंग व्यवस्था के साथ-साथ 47 औद्योगिक कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया. कृषि सुधार कार्यक्रम में बड़े जमींदारों की साठ लाख एकड़ जमीन जब्त कर ली गई और वे जमीनें सामुदायिक संपत्ति में तब्दील हो गईं. मुद्रास्फीति की दर घट गई, संपूर्ण रोजगार का लक्ष्य प्राप्त हो गया और मजदूरी में 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.

ताँबे का राष्ट्रीयकरण

क्रिस्टियन डेमोक्रेट एडुआर्डो फ्री की पिछली सरकार ने ताँबे के राष्ट्रीयकरण की दिशा में कदम उठाने शुरू किए थे. हालाँकि उन्होंने इसे ‘चिलीकरण’की संज्ञा दी थी. उस योजना ने यही किया कि अमेरिकी खनन संपत्तियों के 51 फीसदी अंश खरीद लिए और सिर्फ एल तेनिएन्ते की खानों के एवज में उसके कुल लिखित मूल्य (बुक वैल्यू) से ज्यादा कीमत अदा कर दी.

पॉपुलर यूनिटी ने सिर्फ एक अधिनियम के द्वारा, जिसे कांग्रेस में सभी लोकप्रिय दलों का समर्थन मिला,बिना क्षतिपूर्ति किए अमेरिकी कंपनी अनाकौंडा और केनेकॉट की अधीनस्थ कंपनियों के ताँबे के सारे स्टॉक जब्त कर लिए. सरकार ने हिसाब लगाया कि 15 वर्षों में इन दो कंपनियों ने 80 करोड़ डालर से ज्यादा मुनाफा कमाया था.

निम्न पूँजीपति वर्ग और मध्यवर्ग दो बड़ी सामाजिक शक्तियाँ थीं जो उस समय सैन्य तख्ता-पलट को समर्थन दे सकती थीं लेकिन इस नई सरकार में उनके पौ बारह हो गए थे. उनका यह अभूतपूर्व उत्कर्ष मजदूर वर्ग की कीमत पर नहीं था जैसा पहले हुआ करता था, बल्कि वित्तीय कुलीन तंत्र एवं विदेशी पूँजी की कीमत पर था. एक सामाजिक संगठन के रूप में सेना के लोगों का उद्गम और उनकी महत्त्वाकांक्षाएँ भी मध्यवर्ग के समान थीं;इसलिए उनके पास कोई ऐसी वजह नहीं थी कि  वे मुट्ठी भर बगावती अफसरों का साथ देते. इस सच्चाई का बोध क्रिस्टियन डेमोक्रेट्स को था,इसीलिए उन्होंने उस वक्त सैनिक षड्यंत्र का साथ नहीं दिया. इतना ही नहीं, उसका दृढ़ता से विरोध किया, क्योंकि वे जानते थे कि ऐसा नहीं करने पर वे सामान्य जनता की नजरों में गिर जाएँगे.

उनका उद्देश्य भिन्न था : हर संभव तरीके से सरकार की लोकप्रियता में बट्टा लगाना, ताकि मार्च 1973के चुनावों में कांग्रेस में दो-तिहाई बहुमत हासिल किया जा सके. इतने बहुमत की बदौलत वे गणतंत्र के राष्ट्रपति को संवैधानिक रूप से पद्च्युत कर सकते थे.

क्रिस्टियन डेमोक्रेट्स का संगठन इतना बड़ा था कि वह वर्गीय सीमाओं को लाँघता था. आधुनिक औद्योगिक मजदूर वर्ग,निम्न और मध्यम ग्रामीण भूस्वामी,शहरों का निम्न पूँजीपति वर्ग और मध्यवर्ग- इन सभी में उनका व्यापक प्रामाणिक जनाधार था. हालाँकि पॉपुलर यूनिटी का जनाधार भी अंतर्वर्गीय था फिर भी उसका मुख्य जनाधार कृषि मजदूरों और शहरी निम्न मध्यम वर्ग में था.

क्रिस्टियन डेमोक्रेट्स का उग्र दक्षिणपंथी नेशनल पार्टी के साथ गठबंधन था और इस गठबंधन का कांग्रेस तथा न्यायपालिका पर नियंत्रण था. पॉपुलर यूनिटी का कार्यपालिका पर नियंत्रण था. इन दो पार्टियों के ध्रुवीकरण का मतलब देश का ध्रुवीकरण था. विचित्र बात यह है कि कैथोलिक एडुआर्डो फ्री का मार्क्सवाद में विश्वास नहीं था फिर भी उन्होंने वर्ग संघर्ष का भरपूर फायदा उठाया और इस आग में खूब घी डाला ताकि सरकार को अस्थिर किया जा सके और इस देश को पतन एवं आर्थिक संकट के गर्त में डुबाया जा सके.

क्षतिपूर्ति के बिना संपत्तिहरण के परिणामस्वरूप अमेरिका द्वारा आर्थिक नाकेबंदी ने बाकी काम कर दिया. चिली में हर प्रकार का माल उत्पादित होता है- मोटरकार से लेकर टूथपेस्ट तक, लेकिन यह इस औद्योगिक आधार की मिथ्या पहचान है. 160सबसे महत्त्वपूर्ण फर्मों में 60 फीसदी पूँजी विदेशी थी और 80 प्रतिशत आधारभूत वस्तुएँ आयातित थीं. इसके अतिरिक्त देश को उपभोक्ता सामग्रियों के आयात के लिए प्रतिवर्ष 30 करोड़ डालर की जरूरत थी और 45 करोड़ डालर विदेशी कर्जों पर सूद को चुकाने के लिए भी.

लेकिन चिली की तात्कालिक जरूरतें असाधारण थीं और उनकी जड़ें गहरी थीं. उच्चवर्गीय खुशमिजाज औरतें राशनिंग, बढ़ती मुद्रास्फीति और गरीबों की दुर्दशा के खिलाफ आवाज उठाने के बहाने अपने खाली हाँडी-बरतन पीटते हुए सड़कों पर उतर गईं. यह संयोगवश नहीं था बल्कि इसके उलट बहुत अर्थगर्भित था, क्योंकि इन बनी-ठनी श्रीमतियों का वह तमाशा उसी दिन प्रदर्शित किया गया जिस दोपहर फिदेल कास्त्रो अपनी 30 दिवसीय यात्रा का अंत कर रहे थे. इसने सरकार के समर्थकों में सामाजिक लामबंदी का एक भूचाल बरपा दिया था.

विनाश का बीज

राष्ट्रपति अयेन्दे तब समझते थे और उन्होंने ऐसा कहा भी था कि जनता के पास सरकार है पर सत्ता नहीं है. यह उक्ति जितनी कटु प्रतीत होती थी उससे कहीं ज्यादा कटु थी और चेतावनी भरी थी क्योंकि अयेन्दे के भीतर एक कानूनवादी कीड़ा पलता था जिसमें उनके स्वयं के विनाश का बीज भी छिपा था– एक आदमी जिसने वैधानिकता की रक्षा में लड़ते-लड़ते मृत्यु का वरण किया. वे अपना सर ऊँचा करके ला मोनेदा पैलेस से बाहर चले जाने में सक्षम थे अगर कांग्रेस ने उन्हें संविधान के दायरे में पद्च्युत कर दिया होता.

इतालवी पत्रकार और राजनीतिज्ञ रोस-साना-रोजांदा, जिन्होंने उस दरमियान अयेन्दे से मुलाकात की थी, ने उन्हें थका हुआ और विषादपूर्ण आशंकाओं से भरा पाया था जब वे पीले सोफे पर बैठे उनसे बातें कर रहे थेजिसपर सात महीनों बाद गोलियों से छलनी और रायफल के कुंदे से कुचला उनका शव रखा जाने वाला था.मार्च 1973 के चुनावों में, जब उनकी तकदीर दाँव पर लगी थी,अगर पॉपुलर यूनिटी को 36 फीसदी मत भी मिले होते तो उनके लिए संतुष्टि की बात होती. किंतु चढ़ती मुद्रास्फीति,सख्त राशनिंग और उच्चवर्गीय खुशमिजाज औरतों के हाँडी-बरतन सहगान के बावजूद उन्हें 44 फीसदी मत मिले. यह ऐसी भव्य और निर्णायक जीत थी कि जब अयेन्दे अपने मित्र और हमराज पत्रकार अगूस्तो ओलिवारेस के साथ अपने कार्यालय में अकेले थे, तब उन्होंने दरवाजा बंद किया और क्यूएका नृत्य करने लगे थे.

क्रिस्टियन डेमोक्रेट्स के लिए यह सबूत था कि पॉपुलर यूनिटी गठबंधन द्वारा शुरू की गई सामाजिक न्याय की प्रक्रिया अब कानूनी उपायों द्वारा पीछे नहीं खींची जा सकती थी. लेकिन उनमें अपने कदमों के अंजाम को मापने की दृष्टि नहीं थी. अमेरिका के लिए यह चुनाव गंभीर चेतावनी था और महज उसके आर्थिक हितों के नुकसान से परे जा चुका था. यह शांतिपूर्ण परिवर्तन और सामाजिक बदलाव के निमित्त दुनिया के लोगों, खासकर फ्रांस और इटली, के लिए एक नजीर थी जहाँ मौजूदा परिस्थितियाँ चिली की तर्ज पर प्रयोग करने का आह्वान कर रही थीं. लेकिन उन्हें यह मंजूर नहीं  था. आंतरिक और बाह्य प्रत्याक्रमण की सारी शक्तियाँ एक ठोस गुट में एकजुट हो गईं.

सीआईए ने अंतिम प्रहार का खर्च उठाया

ट्रक मालिकों की हड़ताल अंतिम प्रहार थी. देश के विस्तृत भूगोल के कारण चिली की अर्थव्यवस्था उसके परिवहन पर निर्भर है. परिवहन को ठप्प करना देश को ठप्प करना है. विरोधी पार्टियों के लिए हड़ताल को समन्वित करना आसान था क्योंकि ट्रक मालिकों का संघ अपने कल-पुर्जों की दुर्लभता से परेशान था. इसके अतिरिक्त राष्ट्र के दक्षिणी हिस्से में ट्रक परिवहन को सरकार द्वारा अपने हाथ में लेने के कारण उनका व्यवसाय खतरे में पड़ गया था. यह हड़ताल अंत तक टिकी रही और इसने एक क्षण की भी राहत नहीं दी,और ऐसा इसलिए हो सका कि इसे बाहर से आर्थिक खुराक मिल रही थी. पाब्लो नेरूदा ने अपने एक दोस्त को लिखा था,‘‘हड़ताल को थामे रखने के लिए देश को डालरों से पाट दिया गया और…विदेशी पूँजी काला बाजार के रास्ते देश में प्रवेश करती रही.’’सैनिक सत्ता पलट के एक सप्ताह पहले तेल,दूध और रोटी के लाले पड़ गए.

पॉपुलर यूनिटी के अंतिम दिनों में जब अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त हो चुकी थी. और देश गृहयुद्ध के कगार पर पहुँच चुका था, सरकार और विपक्षी दलों का प्रयास एक ही बिन्दु पर केंद्रित हो गया कि कैसे सेना में शक्ति संतुलन को अपने-अपने पक्ष में किया जाए. अंतिम चाल भ्रांतिपूर्ण थी : तख्तापलट के 48 घंटे पहले विपक्ष ने ऐसी चालें चलीं कि अयेन्दे का समर्थन करने वाले सारे उच्चपदस्थ अफसरों को बर्खास्त कर दिया गया और उनकी जगह एक-एक कर उन सारे अफसरों को दे दी गई जो वाशिंगटन की दावत में शामिल थे.

उस क्षण राजनीतिक शतरंज का खेल खिलाड़ियों के हाथ से निकल चुका था. वे एक ऐसे द्वंद्ववाद के दुष्चक्र में घसीट लिए गए थे जिससे पीछे लौटना असंभव था. खिलाड़ी खुद ही एक वृहत्तर शतरंज के खेल में मोहरे बन चुके थे. यह ऐसा खेल था जो साम्राज्यवाद और सरकार विरोधियों के निरे सम्मिलित षड्यंत्र के मुकाबले कहीं अधिक पेचीदा और राजनीतिक रूप से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण था. यह वर्गों के बीच का भयानक मुकाबला था जो उन्हीं के हाथों से फिसला जा रहा था जिन्होंने इसे हवा दी थी. यह स्वार्थों की क्रूर और खूँखार छीना-झपटी थी जिसकी परिणति एक विभीषिका में होनी थी;जिसकी अमेरिकी महाद्वीप के इतिहास में इससे पहले कोई मिसाल नहीं थी.

उन परिस्थितियों में सैनिक तख्तापलट की कार्रवाई रक्तहीन नहीं हो सकती थी. अयेन्दे यह जानते थे. चिली की सशस्त्र सेना ने, जब-जब उसके वर्गीय हित खतरे में पड़े हैं, आम धारणा के विपरीत राजनीति में हमेशा हस्तक्षेप किया है,और उसने यह काम बहुत निर्दयता से किया है. पिछले सौ वर्षों में देश ने दो-दो संविधान देखे हैं और वे दोनों संविधान हथियारों की ताकत से थोपे गए हैं और पिछली सैनिक कार्रवाई 50वर्षों की अवधि में छठी सैनिक कार्रवाई है.

चिली सेना की खूँरेजी उसका जन्मसिद्ध अधिकार है, जिसे उसने अराडकैनियन इंडियंस (दक्षिणी अमेरिका के मूल निवासी, जिनकी बची-खुची तादाद बाद में दक्षिण-मध्य चिली में केंद्रित हो गई) के विरुद्ध 300 वर्षों की भयानक मुठभेड़ों के जरिए उत्तराधिकार में प्राप्त किया है. इसके अग्रदूतों में से एक ने डींग मारी थी कि मैंने 1620 में एक लड़ाई में 2000 लोगों को अपने हाथों से मारा था. होआक्विन एडवर्ड बेलो ने अपने इतिवृत्त में लिखा है कि प्लेग की महामारी के दौरान सेना ने बीमार लोगों को उनके घरों से बाहर घसीटा और विषस्नान देकर मौत की नींद सुला दिया ताकि प्लेग का उन्मूलन किया जा सके. 1891 में सात माह के गृहयुद्ध के दौरान 10,000 लोग रक्तरंजित मुठभेड़ों में मार दिए गए. पेरूवियन लोगों का दावा है कि प्रशांत युद्ध में लिमा के कब्जे के दौरान चिली सैनिकों ने डॉन रिकार्डो पालमा का पुस्तकालय लूट लिया और वे सारी किताबें अपने साथ लेते गए–पढ़ने के लिए नहीं बल्कि चूतड़ पोंछने के लिए.

पाशविकता का इतिहास

लोकप्रिय आन्दोलनों को इसी तरह पाशविकता से कुचला गया है. 1906 के वालपाराइसो भूकंप के बाद नौसेना ने 8000 मजदूरों के संगठन का सफाया कर दिया था. शताब्दी के प्रारंभ में इफिके में, जब हड़ताली मजदूरों ने सैनिकों से बचने की कोशिश की तब उन्हें दस मिनटों के अंदर मशीनगनों से भून दिया गया और 2000 लोग मारे गए. 2 अप्रैल 1957 को सेना ने सैन्तिआगो के व्यापारिक क्षेत्र में एक नागरिक प्रतिरोध को कुचल दिया और मृतकों की संख्या का इसलिए पता नहीं चला क्योंकि लोगों को गुप्त रूप से दफना दिया गया. एडुआर्डो फ्री सरकार के कार्यकाल में एल सल्वादोर की एक खान में एक हड़ताल के दौरान एक सैनिक गश्ती दल ने एक प्रदर्शन पर गोलियाँ चलाईं और छह लोगों को मौत के घाट उतार दिया,उनमें कुछ बच्चे और गर्भवती औरतें भी थीं. उस गश्ती दल का कमांडर 52 साल का एक अज्ञात जनरल था जो पाँच बच्चों का पिता था,भूगोल का शिक्षक था,उसने सैनिक विषयों पर कई पुस्तकें लिखी थीं : और उसका नाम ऑगुस्टो पिनोशे था.

उस नृशंस सेना की कानूनसम्मतता और भद्रता का मिथक चिली के पूँजीपति वर्ग ने अपने फायदे के लिए गढ़ा था. पॉपुलर यूनिटी ने उस मिथक को जिंदा रखा क्योंकि उन्हें आशा थी कि सेना के उच्चपदस्थ अफसरों के वर्गीय गठन को अपने पक्ष में मोड़ा जा सकता है. लेकिन अयेन्दे को कैराबिनेरोस पर ज्यादा भरोसा था जो एक लोकप्रिय सैनिक टुकड़ी थी और मूलतः कृषक वर्ग से आती थी और गणराज्य के राष्ट्रपति के सीधे नियंत्रण में थी. वास्तव में बगावती गुट को उस वरीय अफसर को ढूँढ़ने के लिए सेना की वरीयता सूची में छह पायदान नीचे उतरना पड़ा जो तख्तापलट को सपोर्ट कर सकता था. नौजवान अफसरों ने सैन्तिआगो के कनिष्ठ अफसरों के क्लब में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली और वे चार दिनों तक टिके रहे जब तक उनका सफाया नहीं कर दिया गया.

तख्तापलट की पूर्वसंध्या पर सेना के भीतर छिड़ा वह गुप्त युद्ध वास्तव में एक सर्वविदित संग्राम था. वे अफसर जिन्होंने उस कार्रवाई में साथ नहीं दिया और वे भी जिन्होंने दमन की आज्ञाओं का समुचित पालन नहीं किया,मार डाले गए. सैन्तिआगो में तथा प्रांतों में पूरी रेजीमेंट्स ने विद्रोह कर दिया लेकिन उन्हें निर्दयता से दबा दिया गया ताकि सैनिक इससे सबक लें.

विना देल मार में बख्तरबंद यूनिटों के कप्तान कर्नल कान्तुरिआस को उनके अधीनस्थों ने मशीनगन से भून दिया. सुदूर भविष्य में ही पता लग पाएगा कि उस बूचड़खाने में कितने लोग मारे गए क्योंकि लाशों को गुप्त रूप से सेना के कचरा ट्रकों में भरकर कहीं दूर दफन कर दिया गया. कुल मिलाकर सिर्फ 50 अफसर ही भरोसे के लायक समझे गए जो नेतृत्व कर सकते थे.

विदेशी एजेंटों की भूमिका

इस षड्यंत्र की पूरी तस्वीर बनाने के लिए कई स्रोतों से टुकड़े जुटाने पड़ेंगे. उनमें से कुछ विश्वसनीय हैं और कुछ अविश्वसनीय. लगता है उस कार्रवाई में कई विदेशी एजेंटों ने भाग लिया होगा. चिली के गुप्त स्रोतों से हमें पता चला है कि ला मोनेदा पैलेस पर हुई बमबारी-जिसकी तकनीकी सटीकता ने विशेषज्ञों को अचम्भे में डाल दिया- अमेरिकी हवाई कलाबाजों की एक टोली द्वारा अंजाम दी गई थी जो ऑपरेशन यूनिटास (अमेरिका और चिली का संयुक्त युद्धाभ्यास) की आड़ में देश में प्रवेश कर चुकी थी, और जिसे आगामी 18 सितंबर को चिली के राष्ट्रीय स्वतंत्रता दिवस पर उड़न सर्कस प्रदर्शित करना था. इसका भी साक्ष्य मिला है कि पड़ोसी देशों की खुफिया पुलिस के कई सदस्य बोलीविया की सीमा से प्रवेश कर चुके थे और सत्तापलट के दिन तक छिपे रहे थे, जब उन्होंने लैटिन अमेरिका के अन्य देशों के राजनीतिक शरणार्थियों का खूनी उत्पीड़न किया था.

ब्राजील, जो प्रमुख गोरिल्लाओं की अपनी भूमि है,ने उन सेवाओं का बीड़ा उठाया था. दो साल पहले ब्राजील ने बोलीविया में प्रतिक्रांतिकारी तख्तापलट को अंजाम दिया था, जिसका मतलब था चिली के लिए बहुत बड़े समर्थन का लोप और इसने हर तरीके और साधन से विध्वंसक कार्रवाइयों को सरल बना दिया. अमेरिका द्वारा ब्राजील को दिए गए कर्जों का एक हिस्सा गुप्त रूप से बोलीविया को स्थानांतरित कर दिया गया ताकि चिली में विध्वंसक कार्रवाइयों को आर्थिक मदद पहुँचाई जा सके. 1972में अमेरिका के एक सैनिक सलाहकार ग्रुप ने ला पाज की यात्रा की, जिसका उद्देश्य अज्ञात है. हो सकता है यह एक आकस्मिक घटना हो. जो भी हो,उस यात्रा के थोड़े ही दिनों बाद चिली की सीमा पर सैनिकों और सैनिक साजोसामान का जमावड़ा शुरू हो गया, जिसने चिली सेना को अतिरिक्त मौका दिया कि वे अपनी स्थिति को मजबूत करें और आसन्न तख्तापलट के नेतृत्व के अनुकूल मनचाहे तबादले और पदोन्नतियाँ करें.

अंत में, 11 सितंबर को, जब ऑपरेशन यूनिटास प्रगति पर था,वाशिंगटन की दावत में तैयार की गई योजना को कार्यान्वित कर दिया गया– नियत समय से तीन साल बाद, लेकिन ठीक उसी तरह जिस तरह विचार किया गया था : बैरकों  के अंदर एक पारंपरिक सैनिक विद्रोह की तरह नहीं बल्कि एक विध्वंसक युद्ध की तरह.

इसे ऐसा ही होना था, क्योंकि यह मामला सिर्फ किसी को सत्ताच्युत करने का नहीं था बल्कि ब्राजील से आयातित शैतानी सोच को थोपने का था, ताकि उस राजनीतिक और सामाजिक ढाँचे का, जिसने पॉपुलर यूनिटी को संभव बनाया था,कोई चिह्न भी न बचे. सबसे निष्ठुर चरण शुरू हो गया था.

उस अंतिम मुठभेड़ में, जब देश विध्वंस की बेकाबू और अदृश्य शक्तियों के रहम पर था, अयेन्दे तब भी वैधानिकता से बँधे थे. उनके जीवन का सबसे नाटकीय अंतर्विरोध यह था कि वे एक ही समय में हिंसा के जन्मजात शत्रु और उत्कट क्रांतिकारी एक साथ थे. उनका विश्वास था कि उन्होंने अंतर्विरोध का समाधान कर दिया है. यह विश्वास इस परिकल्पना पर आधारित था कि चिली के हालात पूँजीवादी कानूनों के दायरे में समाजवाद की ओर शांतिपूर्ण विकास की इजाजत देंगे. अनुभव ने उन्हें बहुत देर से सिखाया कि व्यवस्था को वैसी सरकार से नहीं बदला जा सकता जिसके पास सत्ता न हो.

देर से ही सही लेकिन उनका मोहभंग अवश्य हुआ अन्यथा वे मौत का प्रतिरोध नहीं करते. वे उस जलते पैलेस को बचाने का प्रयास नहीं करते जो उनका अपना नहीं था. वह एक ऐसा गमजदा घर था जिसे एक इतालवी वास्तुकार ने टकसाल के लिए बनाया था और जो अंत में एक सत्ताविहीन राष्ट्रपति का शरणस्थल बना. उन्होंने 6 घंटों तक एक सब-मशीनगन से, जिसे कास्त्रो ने उन्हें दिया था, प्रतिरोध किया. वह पहला हथियार था जिससे अयेन्दे ने कभी फायर किया हो.

शाम 4 बजे मेजर जनरल हाविएर पालासिओस अपने सहयोगी कैप्टन गालार्दो एवं अन्य अफसरों के साथ दूसरी मंजिल पर पहुँचने में कामयाब हुआ. वहाँ लाल बैठकखाने में नकली लुई पंद्रहवीं कुर्सियों,चीनी ड्रैगन फूलदानों और रूगेन्दास चित्रों के बीच अयेन्दे उनका इंतजार कर रहे थे. उन्होंने बिना टाई की कमीज और सर पर खदानों में काम करने वाले मजदूरों का हेलमेट पहना हुआ था और उनके कपड़े खून से रंगे थे. उनके हाथ में सब-मशीनगन थी, लेकिन गोलियाँ खत्म होने को थीं.

अयेन्दे जनरल पालासिओस को अच्छी तरह जानते थे. कुछ दिन पहले उन्होंने आगुस्टो ओलिवारेज से कहा था कि यह खतरनाक आदमी है जिसके अमेरिकी दूतावास से गहरे रिश्ते हैं. जैसे ही उन्होंने उसे सीढ़ियों पर चढ़ते देखा, वे जोर से चिल्लाए : ‘‘गद्दार!’’ और उसके हाथ पर गोली मारी.

अंत तक लड़े

नाम न बताने की शर्त पर एक गवाह ने मुझे बताया कि अयेन्दे उस गिरोह की गोलियों का जवाब गोलियों से देते हुए मरे. तब सारे अफसरों ने धार्मिक अनुष्ठान की तरह उनके शरीर पर गोली दागीं. अंत में एक कनिष्ठ अफसर ने अपनी रायफल के कुंदे से उनके चेहरे को कुचल दिया.

उनकी एक तस्वीर है—‘एल मर्कुरिओ’ समाचारपत्र के एक फोटोग्राफर हुआन एनरिक लिरा ने वह तस्वीर खींची थी. वही एकमात्र व्यक्ति था जिसे लाश की तस्वीर खींचने की इजाजत मिली. वह इतनी क्षत-विक्षत थी कि जब उन्होंने ताबूत में रखी लाश उनकी पत्नी सेनोरा होर्टेनासिया अयेन्दे को दिखाई तो चेहरे से कपड़े को हटाने नहीं दिया.

वे आगामी जुलाई में 64 वर्ष के हो जाते. उनका सबसे बड़ा गुण था- मरते दम तक हार नहीं मानना. लेकिन किस्मत ने उन्हें शहीद होने की दुर्लभ और त्रासद महानता ही बख्शी, जो उनके हिस्से आई पूँजीवादी कानून के एक पुराने छल की हिफाजत के लिए,सुप्रीम कोर्ट को बचाने के लिए- जिसने उनके बजाय उनके हत्यारों को सही ठहराया, एक कमबख्त कांग्रेस को बचाने के लिए जिसने उन्हें अवैध घोषित किया लेकिन जो अपने अपहर्ताओं की मरजी के आगे खुद फरामोशी में निहुर गई, विरोधी दलों की आजादी को बचाने के लिए जिन्होंने अपनी आत्माएँ फासीवाद को बेच दीं, औरएक बेहूदी व्यवस्था- जिसे बगैर खून बहाए समाप्त करने का बीड़ा उन्होंने उठाया था- के कुतर खाए गए साजोसामान को बचाने के लिए.

चिलीवासियों के दुर्भाग्य से यह नाटक चिली में खेला गया; लेकिन यह इतिहास के पन्नों में ऐसे दर्ज होगा जैसे यह हम सबों के साथ- इस युग के बच्चों के साथ- घटित हुआ हो,और यह हमेशा के लिए हमारी जिंदगी में बना रहेगा.

मार्केज के इस लेख का अनुवाद करने वाले अशोक कुमार कम्युनिस्ट आंदोलन से गहरे रूप से जुड़े रहे हैं। मार्क्सवादी दर्शन-साहित्य के अद्भुत अध्येता। फिलहाल  सिविल कोर्ट, गया,  बिहार में अधिवक्ता। गया के ही शास्त्री नगर कॉलोनी में रहते हैं। इनसे +919973046066 और ashokjpn@gmail.com पर संपर्क संभव है।

आभार- हंस जून 2014 

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