कान फिल्म महोत्सव के नाम गोडार्ड की वीडियो-चिट्ठी

ज्यां ल्यूक गोडार्ड की सार्वजनिक उपस्थति, प्रस्तुति बहुत दिनों से बड़ी खबर बनती रही है. गोडार्ड अपनी पेशेवर दुनिया के सार्वजनिक मंचों और उत्सवों से लंबे अरसो से गायब रहते आ रहे हैं. फिल्म बनाते हैं, फिल्म प्रदर्शित भी होती है लेकिन उन्होंने अपने-आपको साक्षात प्रदर्शित करने से रोक रखा है. इसे उन्होंने सैद्धांतिक आचरण का आधार बना दिया है. गोडार्ड उन विरले निदेशकों में हैं जिनका अपना सिक्का चलता है. वे बाजारू तरकीबों वाले पैसों के मोहताज नहीं रहते हैं. फिल्म उनका जीवन है, व्यवसाय नहीं. इसीलिए वे अपने इस फ़िल्मी सफ़र को बाजारू सफ़र में तब्दील होने से हमेशा रोकते रहते हैं.

गोडार्ड ने इसी साल एक बनाई है, फिल्म का नाम है- गुड बाय टू लैंग्वेज. यह फिल्म कान फिल्म महोत्सव के लिए चयनित हुयी और जैसा कि विदित है वे 68 के दौर से ही कान फिल्म महोत्सव को सैद्धांतिक तौर पर बहिष्कृत कर रखे हैं. लोगों को इस बार अपेक्षा थी कि शायद इस बार गोडार्ड के दर्शन संभव हो सकते हैं. लेकिन उन्होंने अपने रचनात्मक दर्शन से इस बार लोगों को फिर से चकित कर देने में सफल रहे. कान महोत्सव के सहभागियों और आयोजकों के नाम उन्होंने एक वीडियो सन्देश/चिट्ठी भेजी और उस वीडियो चिट्ठी का वहां प्रदर्शन हुआ. यहाँ उसी विडिओ चिट्ठी का लिंक लगाया गया है और उसके टेक्स्ट के हिंदी अनुवाद को भी चिपकाया गया है. यह विडियो सन्देश गोडार्ड  के बारे में बहुत कुछ कहता है. आज के जमाने में  वे एक ऐसे बौद्धिक और रचनात्मक व्यक्तित्व हैं जो अपने रचना-संसार की भाषा के दायरे में अपनी बात को रखने के पाबन्द हैं. वे अपनी बात को पुष्ट करने या मूर्त करने के लिए समाचार पत्रों या टेलीविजनों की तात्कालिक मसालों वाली छौंकदार आंसुओं का इस्तेमाल नहीं करते हैं. एक महान कलाकार का रचनात्मक दायरा या पीड़ा क्या हो सकती है,  इस वीडियो -सन्देश में देखा-सुना जा सकता है.

मेरे प्रिये अध्यक्ष जी, फिल्मोत्सव के निदेशक महोदय और प्यारे दोस्तों,

इस फिल्मोत्सव में आमंत्रित करने के लिए आप सभी को धन्यवाद्. लेकिन आप यह भी जानते हैं कि लम्बे समय से मैं किसी भी फिल्म-वितरण-प्रणाली का हिस्सा नहीं रहा हूँ. और मैं वहां से भी नहीं हूँ जहाँ से आप मुझे समझते हैं. दरअसल मैं एक और ही रास्ते पर चल रहा हूँ. मैं इस दुनिया से इतर दुनिया का निवासी हो गया हूँ; कभी-कभी वर्षों तक के लिए और कभी क्षण भर के लिए. फिल्म के प्रति अपने उत्साही आग्रहों के कारण वहां गया और वहीं ठहर गया.

[फिल्म ‘अल्फाविल्ले’ के एक दृश्य में लेमी कॉशन के रूप में एडी कोंसटेंटाइन ]

 एडी कोंसटेंटाइन/ लेमी कॉशन: इस वातावरण में मैं खुद को किसी भी तरह से सहज नहीं पाता हूँ. १९२३ अब नहीं है. मैं वह आदमी भी नहीं हूँ जो पुलिस के साथ संघर्षरत था, आदमी जो हाथ में बंदूक लिए परदे के पीछे से लड़ाई लड़ा. जिंदादिल महसूस करना क्रांति और स्टालिन से ज्यादा महत्वपूर्ण था.

 एकांत का जोखिम अपने आप को खोने का जोखिम है. इस स्थिति में आदमी खुद को दार्शनिक मान लेता है क्योंकि वह मानता है कि आध्यात्मिक सवालों के सन्दर्भ में सत्य एक विस्मय है, यह एक ऐसा सवाल है जिसे हर कोई पूछ रहा है. एक दार्शनिक का तर्क कहता है कि ‘अन्यता के बोध वालों’ को बचा पाने का क्या कोई भी रास्ता बचा है, और यही वह बिंदु है जिसे हम तर्क कहते हैं.

[गोडार्ड की फिल्म ‘किंग लियर’ का एक दृश्य, बर्गेस मेरेडिथ और मोलियो हिंगवाल्द के साथ]

मोलियो हिंगवाल्द/कॉर्डेलिया किंग लियर से कहती है- “मैं अपने दिल को अपने मुंह में नहीं रखती हूँ.”

[दृश्य यहाँ से कट होकर वर्तमान गोडार्ड के पास टिक जाता है]

मैं भी अपने दिल को अपने मुंह में अब और नहीं रख पाता. इसीलिए मैं वहां जा रहा हूँ जहाँ मैं हवा के झोंकों से बजता हूँ, (कैमरे के साथ ट्रूफ़ो की तस्वीर) जैसे पतझड़ की पत्तियाँ दूर उड़ती चली जाती हैं. (याक प्रेवेर की एक प्रसिद्ध कविता के अंश).

उदाहरण के बतौर देखें तो पिछले साल मैंने ट्राम लिया जो कि एक रूपक है, एक रूपक और…

[काले परदे पर सफ़ेद अक्षर में लिखा है: हाँ, क्यूबा.]

[पेरिस में हवाना बार, ब्लैक एंड व्हाईट फिल्म का एक दृश्य  ]

१९६८ से बकाये पैसों को चुकाने के लिए आ, हवाना बार के पास वापस आ…. और अब मैं विश्वास करता हूँ कि चीजों को विश्लेषित करने की संभावना भाषा के साथ लड़ाई का एकमात्र बहाना है….और हमेशा कि तरह मेरा विशवास है कि यह असंभव है. आज २१ मई है. अध्यक्ष जी, यह फिल्म नहीं है बल्कि एक व्यक्ति के नजदीकी नियति के सचे संतुलन को पकड़ने वाला एक सरल नृत्य (वाल्ट्ज) है.

बाशऊर
ज्यां ल्यूक गोडार्ड

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