झलकै लाल लंगोटी राजा कासी हौ: अनिल यादव

By अनिल यादव

आदिशंकराचार्य के अद्वैतवाद को काशी के एक डोम ने चुनौती दी थी जिसके बाद उन्होंने उसे व्यवहार में उतारा। लोकस्मृति में अमिट इस मानीखेज घटना के भी पहले से इस पुरातन शहर में शास्त्रार्थ या बहस की परंपरा रही है जो संस्कृत पाठशालाओं, चाय के ठीहों में आबाद अड़ियों और विवाह के मंडप में वाद-विवाद के रूप में आज तक चली आती है। अस्सी मोहल्ले में पप्पू की चाय की दुकान से पहले इस तरह का अड्डा गोदौलिया का “द रेस्टोरेंट” हुआ करता था जिसमें अब जूलरी की दुकान खुल गई है। काशी विश्वनाथ मंदिर की दान-पेटिका पारदर्शी बनायी गई है और  आमद के  दर्शन को  भक्तों  के लिए संभव बना दिया गया है. द रेस्टोरेंट से पप्पू की दुकान के सफर में बनारस बहुत बदला है। एक तो यही कि नींबू की चाय को और चुलबुली बनाने के लिए हाजमोला मिलाया जाने लगा है जो रहस्यमय कहे जाने वाले इस शहर को समझने की अंतदृष्टि देता है।

Photo By  Marcin Ryczek

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अचूक ढंग से ध्यान खींचने और धंधे के प्रतिस्पर्धियों को पछाड़ देने के लिए ईजाद किए गए इस चुलबुलेपन की मात्रा बढ़ते-बढ़ते इतनी हो चुकी है कि पानी की कलकल और तारों के आलोक में हर शाम होने वाली गंगा आरती अब हैलोजन लाइटों की चकाचौंध और विशाल डमरुओं, घंटों के कानफाड़ू शोर में पर्यटकों के कैमरों के लिए बाकायदा मंचित की जाने लगी है। होली की शाम अस्सी चौराहे पर आयोजित होने वाला वर्जनाहीन कवि सम्मेलन प्रशासन ने बंद करा दिया क्योंकि इवेन्ट मैनेजर इसे सेठों और अफसरों के मनोरंजन के लिए गंगा के बीच बजरों पर ऑन डिमांड आयोजित करने लगे थे।

पप्पू की दुकान पर अब बहस गरमाने के लिए मीडिया के कैमरों का इंतजार किया जाता है। कैमरों की जद में आते ही अपनी ब्रांडिंग के नित नए तरीके खोजने वाले बुद्धिजीवियों पर मानो किसी प्रेत की सवारी आती है। वे सामने वाले की बिल्कुल नहीं सुनते, बाहें भांजते हुए उन्माद में बर्राते, चिल्लाते हैं और अंतत: निचुड़ कर दयनीय ढंग से हांफने लगते हैं। यह नया विमर्श है जिसमें दिमाग से ज्यादा देह है। विचार से ज्यादा जोर छवि बनाने और उसकी मार्केटिंग पर है। फास्टफूड की तर्ज पर जनभावना पकाने की संस्कृति भी आई है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के क्रू अपने साथ पुतले, टोपियां, नकली रूद्राक्ष की मालाएं, गमछे, कुर्ते, त्रिपुंड और भस्म लेकर चलते हैं। चैनल की जैसी जरूरत हो वैसा मंचन कराकर दर्शकों को ब्रेकिंग न्यूज की चिप्पी के साथ दुनिया के सबसे पुराने शहर के मिजाज से अवगत करा दिया जाता है क्योंकि नैसर्गिक अभिनेता बहुतायत में उपलब्ध हैं।

अस्सी के दशक में बंद होने से पहले हिप्पी, सनातनी, नक्सली, सोशलिस्ट, ओशोवादी, भूखी पीढ़ी से लेकर जनवाद और कलावाद की अनेक धाराओं के प्रतिनिधि राजनीतिक कार्यकर्ताओं लेखकों, कवियों, पेन्टरों, नाटककारों, संगीतज्ञों और आंवागार्दों की वैचारिक भिड़न्त के साक्षी रहे द रेस्टोरेंट में कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी को असहमति के कारण मारपीट कर अपनी बात ही कहने से रोक दिया गया हो। भाजपा के पीएम प्रत्याशी नरेंद्र मोदी के बनारस के चुनाव लड़ने के ऐलान के बाद से पप्पू की दुकान पर मोदीपंथ से असहमत वैचारिकी वालों को धौंसियाया और अपमानित कर खदेड़ा जा रहा है। मोदी को चुनौती दे रहे आप पार्टी के अरविंद केजरीवाल पर अंडा-स्याही और सोमनाथ भारती की पिटाई टीवी स्क्रीन पर बहुप्रचारित नमूने भर हैं वर्ना ऐसी घटनाएं शास्त्रार्थ की परंपरा वाले इस शहर में हर जगह देखने को मिल रही हैं। इससे पहले वॉटर फिल्म की शूटिंग को ध्वस्त कर दीपा मेहता और शबाना आजमी को खदेड़ देने का अभियान इसी दुकान से शुरू हुआ था और उसकी कामयाबी का जश्न भी यहीं मनाया गया था। काशी के नए संस्कृति रक्षकों की पंचलाइन थी- “बनारस ने दीपा मेहता का वॉटर निकाल दिया है।“

बाहर की दुनिया में जिस तरह काशिका बोली को गालियों का पर्याय भर मान लिया गया है, काशीनाथ सिंह का चर्चित उपन्यास “काशी का अस्सी” आने के बाद पप्पू की दुकान को ही बनारस के रूप में मीडिया प्रचारित करने में जुटा हुआ है। इसका खतरनाक नतीजा यह हुआ है कि वहां रणनीतिक ढंग से बैठने वाले अधिकतम आधा दर्जन लोगों को स्क्रीन पर बनारस की विशेषज्ञ आवाजें भी कहा जाने लगा है। नब्बे से पहले यह एक अज्ञात दुकान थी जहां भांग और बिना हाजमोला वाली चाय मिला करती थी। अस्सी मोहल्ले की अड़ी जयप्रकाश पोई और हजारी की दुकानें हुआ करती थीं जहां कवि त्रिलोचन, धूमिल, नागानंद, नामवर समेत जेपी आंदोलन के कई नेता, एक्टिविस्ट बैठा करते थे। बनारस के बौद्धिक परिदृश्य में आया यह उन्मादी हिंसक उथलापन उन अनेक परिर्वतनों में से एक है जो बाबरी मस्जिद के ध्वंस और आर्थिक उदारीकरण के बाद से घटित हो रहे हैं। इसे यूं भी समझा जा सकता है कि गंगा किनारे के मोहल्लों में विदेशी पर्यटकों से मोटे किराए की लालच में लोग बेधड़क अपने घरों में बने पुराने मंदिर तोड़ कर पश्चिमी शैली के कमोड फिट करा रहे हैं और बाहर सड़क पर काशी की संस्कृति को अमूर्त मस्ती और चंद प्रतीकों में समेट देने वाले हिंसक संस्कृति रक्षकों की तादाद बढ़ती जा रही है। जिनकी दिलचस्पी बनारस के व्यक्तित्व को तलाशने में है उन्हें भारतेंदु हरिश्चंद्र के लिखे गीत “देखी तुमरी कासी लोगों” पर गौर करना चाहिए जिसे उन्होंने अपने नाटक प्रेमयोगिनी में एक पथिक के मुंह से गवाया है। यह गीत बनारस के अंधेरे हिस्सों को पकड़ता है।

बनारस में जो कुछ पुराना है सब अच्छा ही नहीं है। यहां धर्म और अपराध का चोलीदामन का साथ रहा है। अब भी ठगी, सौदेबाजी और खातों के प्रबंधन की अपनी भाषाएं प्रचलित हैं जिन्हें आप डिकोड नहीं कर सकते। जगजीवन राम संपूर्णानंद की मूर्ति का उद्घाटन करते हैं तो मूर्ति को ही धुलवा दिया जाता है। दूसरा पहलू यह है कि इनके बरअक्स कबीर, रैदास लेकर तमाम प्रगतिशील, अन्याय विरोधी धाकड़ प्रगतिशील परंपराए भी प्रवाहमान हैं। बनारस की सबसे कीमती परंपरा किसी से भी बहस की चुनौती स्वीकार करने और खुले दिमाग से सोचने की रही है जो इन दिनों एक बार फिर खतरे में घिरती दिख रही है।

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One thought on “झलकै लाल लंगोटी राजा कासी हौ: अनिल यादव

  1. Ashok Kumar Gupta on said:

    A very good effort . I recommend-BANA RAHE BANARAS(1958) by Shri Biswanath Mukerji for a better feel of Kashi -Benares-Banaras-Varanasi.

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