वह भी कोई देश है महाराज: ट्रेवेल्स विथ हेरोडोटस

By उदय शंकर 

अनिल यादव का यात्रा संस्मरण, ‘वह भी कोई देश है महाराज’, आज ही खत्म किया. खत्म करते ही गच्च से एक सन्नाटे का शिकार हो गया.

वह भी कोई देश है महाराज

वह भी कोई देश है महाराज

सात बहनों का वह देश कितना मनभावन लगता है. वहां का मुख्य मंत्री हवाई जहाज लिए गायब हो जाता है और हम इंडियन आइडियल के बिग बॉस नुमा तोंद सहलाते हुए, अपने ही डकार की बदबू में सहज हुए मलेशियन एयरलाइन्स के बारे में चिंतित चिप्स खा रहे होते हैं. सारी फजिहत का रामवाण ‘रामदेव पाचन पाउडर’ पी रहे होते हैं. सारी गलाजत और बदहजमी अपने में ही देखने के ऐसे आदि हुए कि सात बहनें और ध्रुव तारा सभी को स्वर्गादपि गरीयसी ही समझते रहे.

इक्की-दुक्की खबरें ऐसे पहुँचती हैं मानो शांत और स्थैर्य चित्त वाली बहनों ने बहुत दिन बाद स्त्रियोचित मर्यादाओं को ताक पर रख कर कोई छींक मार दी हो. यादव जी का यह पूरा संस्मरण उस छींक में सना हुआ है जो हमें सहज नहीं रहने देता है. यदा-कदा वाली छींक नहीं महराज, बल्कि छींकों का नैरन्तर्य है- वह देश.

ज्ञानरंजन ने इस पुस्तक के बारे में बहुत ही अर्थपूर्ण टिपण्णी की है- लेखक पथ का दावेदार नहीं है, वह जीवनदायी अन्वेषण करता है. यह हिंदी साहित्य की अकेली कृति है, इसके जोड़ या तोड़ की कोई और रचना अभी तक नहीं हुयी है, यही ज्ञानरंजन जी का कहना है. और यह सच भी है. इसे लिखने या अनुभव करने के लिए जिस तरह का फक्कड़पन और निस्सारता वाला अंदाज चाहिए वह अनिल यादव में है. यादव की कहानियों के सन्दर्भ अशोक भौमिक ने एक बात कही थी कि लेखक लिखने में रस लेने लगता है. यह संस्मरण जिस तटस्थता और रूखेपन से लिखा गया है, वह इस पुस्तक की गजब की पूंजी है.  अपने आप से,  दृश्यों से, घटनाओं से यह विलगाव विपस्सना के असर की याद दिलाती है, जिसका इस पुस्तक में जिक्र भी है- ‘विपस्सी अपनी मृत्यु को भी आते और खुद को ले जाते हुए तटस्थ भाव से देखता है.’ इतनी सारी बंदूके, हत्याएं, ध्रूमपान – नशाखोरी की तरकीबें और वेश्याएं,  क्या यह कम है किसी लेखक को भटकाने के लिए,  लेकिन यह अनिल यादव की ही खासियत है कि वह ऐसे दृश्यों को बहुत ही ठंडेपन से एक पंक्ति में निपटा कर अग्रिम यात्राओं के लिए अपनी ऊर्जा को बचा लेता है.

अनिल यादव के इस संस्मरण को पढ़ते हुए मुझे न तो हिंदी का कोई लेखक याद आया न ही पत्रकार. हिंदी में बौद्धिक जुगाली और उससे निर्मित अमर पक्षधरता एक ऐसी कुंजी है जिससे हम अपने पसंदीदा और आदर्श रचनात्मक संसार को खोल कर कबाड़खाने में सुरक्षित करते चलते हैं. ऐसे-ऐसे लेखक और पत्रकार हमारे आदर्श हैं जिनकी कूल जमा पूंजी उनकी बौद्धिक तलवार है और उसके चलने और न चलने को जांचने वाला कोई भी मानक इस ‘स्थिर समाज’ में नहीं है.

जेनुइन बौद्धिक तलवार सिर्फ विचारों को ही नहीं काटती बल्कि वह आत्मघाती भी होती है, आत्मघाती का अर्थ नैराश्य वाले दार्शनिक आधार में नहीं ढूंढा जाए- सीधा, सरल अर्थ यह कि तलवार की धार पे धावनो है. यह आत्मघाती तलवार इन तथाकथित आदर्शों में से किसी के पास नहीं है. वे सब हाई स्कूल में होने वाले भाषण-प्रतियोगिता के धुरंधर हैं जहाँ इच्छा से एक पक्ष चुन लेना होता है. अनिल यादव के पास ऐसा कोई भी पक्ष नहीं है, और जो तलवार है, वह भी आत्मघाती है.

अनिल यादव के इस यात्रा संस्मरण को पढ़ते हुए मुझे सिर्फ एक आदमी की याद आती रही, वह अनिल की तरह ही पत्रकार और धुरंधर यात्री था- रिजार्ड कपूसिंस्की. एकमात्र कम्युनिस्ट जिसे पोलैंड ने स्वीकार किया और सम्मान दिया. वह दुनिया भर के 27 क्रांतियों का साक्षी बना, 40 बार जेल गया और 4 बार फांसी की सजा हुयी और हर बार एक आश्चर्य की तरह महाभिनिष्क्रमण करता नज़र आया. वह आज़ादी के कुछ ही वर्षों बाद भारत आया था, उसे न तो अंग्रेजी आती थी और न ही अन्य भारतीय भाषाएँ. संवादविहीनता की स्थिति में भी वह किस तरह की संवेदनाएं पिरो गया, उसे उसकी पुस्तक- ट्रेवेल्स विथ हेरोडोटस में देखा जा सकता है. उसकी कुछ पंक्तियाँ-

I arrived in Calcutta from Benares by train, a progress, as I was to discover,from a relative heaven to an absolute hell….Usually,a different color skin attracts attention here; but nothing distracts the denizens of Sealdah Station, as they seem already to settle into a realm on the other side of life. An old woman next tome was digging a bit of rice out of the folds of her sari. She poured it into a little bowl and started to look around,perhaps for water, perhaps for fire, so that she could boil the rice. I noticed several children near her, eyeing the bowl. Staring—motionless, wordless.This lasts a moment, and the moment drag son. The children do not throw themselves on the rice; the rice is the property of the old woman, and these children have been inculcated with something more powerful than hunger.

A man is pushing his way through the huddled multitudes. He jostles the old woman, the bowl drops from her hands, and the rice scatters onto the platform, into the mud, amidst the garbage. In that split second, the children throw themselves down, dive between the legs of those still standing,dig around in the muck trying to find the grains of rice. The old woman stands there empty-handed, another man shoves her.The old woman, the children, the train station,everything—soaked through by the unending torrents of a tropical downpour. And I too stand dripping wet, afraid to take a step; and anyway, I don’t know where to go.

अनिल यादव में विवरण की ऐसी ही ताकत है और ऐसी ही संवेदनशील भाषा, जो कभी भी व्यक्त होने में ना-नुकुर नहीं करती है. और ‘अनिश्चितता ऐसी जैसे जरुरी आत्मविश्वास को पाने का चक्कर हो.’ अनिल यादव में हिंदी के रिजार्ड कपूसिंस्की होने की भरपूर संभावना को अक्षुण्ण पाता हूँ और ज्ञानरंजन के ही शब्दों में मेरा भी मन ‘वह भी कोई देश है महाराज’ को तरह-तरह से विज्ञापित करने का करता है.

पुस्तक को मंगाने हेतु अंतिका प्रकाशन से इस पते पर संपर्क किया जा सकता है – अंतिका प्रकाशन सी-५६/यूजीएफ़-४ शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-II ग़ाज़ियाबाद-२०१००५ (उ.प्र.) antika56@gmail.com]

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