पुनर्जन्म : डब्लू॰ बी॰ इट्स, अनुवाद : ज्ञानेश बब्बू

ज्ञानेश बब्बू पेशे से दारू के दारोगा के रूप में सुख्यात हैं और अपने बौद्धिक स्पार्क्स के लिए लोकोक्तियों के हवाले हो चुके हैं। अगर फेसबूक नहीं होता तो उनके ये स्पार्क्स हम तक नहीं पहुंचते। डब्लू॰ बी॰ इट्स की कविता ‘द सेकंड कमिंग ‘ की याद दिलाकर बौद्धिक हस्तक्षेप का  एक जरिया तो  इन्होंने दे ही दिया है । ज्ञानेश बब्बू कोई पेशेवर अनुवादक नहीं हैं  और यही इस कविता के अनुवाद की खासियत बन गई है।  वैसे बब्बू  जी  को  निर्मम आलोचना की दरकार है।  ‘द सेकंड कमिंग ‘के अनुवाद ‘पुनर्जन्म ‘ को हम यहाँ साभार प्रकाशित कर रहे हैं। beast

पुनर्जन्म
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बड़े होते आवर्त्त में चक्कर काटता बाज
अपने स्वामी को सुन नहीं सकता;
परिधि पर चीजें बिखरती हैं, धुरी के वश के बाहर;
सिर्फ अराजकता ही छा गयी है संसार में ,
रक्तरंजित ज्वार उमड़ आया है,और जिसमें
निश्छलता का नाटक निमज्जित हो गया है ,
सर्वत्र.
जो अच्छे हैं वे दिशाहीन हैं,और जो बुरे हैं
वे उन्मत्त आवेग से भरे हैं.

निश्चयतः एक रहस्य खुलता है; दूसरा अवतार सन्निकट है, बेशक.
दूसरा अवतार ! जैसे ही ये शब्द उच्चरित होते हैं
सामूहिक स्मृति से उदभूत एक विकट छवि
मुझे झकझोड़ देती है : रेगिस्तान का उजाड़ ;
शेर का शरीर और इंसानी सर वाली एक आकृति ;
भावशून्य और सूरज सी निर्मम आँखें
अपनी मंद जंघाओं को आगे बढ़ा रहा है,जबकि इसके इर्द-गिर्द
रूष्ट रेगिस्तानी परिंदों की छायाएं फिरकी लगा रही हैं.

फिर से अँधेरा घिर जाता है लेकिन अब मैं जानता हूँ
बीस शताब्दियों की पथरीली शिशु- नींद
हिचकोले खाते पालने में दुस्वप्नों से संतप्त है,
और यह कैसा बर्बर नरपशु है ,जिसका समय अंततः आ गया है ,
जो बेढब चाल में बेथलेहम ( दिल्ली पढ़ा जाय ) जा रहा है
जन्म लेने के लिए ?

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THE SECOND COMING
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Turning and turning in the widening gyre
The falcon cannot hear the falconer ;
things fall apart, the centre cannot hold ;
mere anarchy is loosed upon the world ,
the blood -dimmed tide is loosed,and everywhere
the ceremony of innocence is drowned ;
the best lack all conviction, while the worst
are full of passionate intensity

surely some revelation is at hand; surely the second coming is at hand.
the second coming ! hardly are those words out
when a vast image out of Spiritus Mundi
troubles my sight : a waste of desert sand ;
a shape with lion body and the head of a man ;
a gaze blank and pitiless as the sun
is moving its slow thighs, while all about it
reel shadows of the indignant desert birds.

the darkness drops again but now i know
that twenty centuries of stony sleep
were vexed to nightmare by a rocking cradle ,
and what rough beast , its hour come round at last,
slouches towards Bethlehem to be born ?
———W.B. YEATS

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