भारतेन्दु बरक्स अज्ञात हिन्दू औरत: चारु सिंह

हँसमुख गद्य में स्त्री : भारतेन्दु बरक्स अज्ञात हिन्दू औरत 

 “ किसी आदमी ने एक शेर की तस्वीर देख के कहा-देखो आदमी कैसा जोरावर है –शेर की गर्दन हाथ में और पाँव छाती पर , कैसी सूरत से शेर को कैद किया है । शेर ने जवाब दिया कि इसका मुसव्विर आदमी था । अगर शेर होता तो आदमी की छाती पर पाँव और मुंह पर पंजा होता । ” (सीमंतनी उपदेश ,77)

By चारु सिंह 

पुरुषों द्वारा रचे गए साहित्य ने स्त्री की छवि को किस कदर विकृत किया है, ये पंक्तियाँ इसी ओर इशारा कर रही हैं। 1882  में एक लेखिका ने ये पंक्तियाँ लिखकर न केवल अपने समकालीन भारतेन्दु युग के लेखन पर ही सवाल खड़ा किया ,बल्कि उससे पहले और बाद के भी समस्त लेखन को कटघरे मे ला दिया। संभवतः यही वजह है कि हिन्दी के इतिहास में इस लेखिका का नामोनिशान नहीं मिलता। इस लेखिका को खोज निकालने का श्रेय डॉ. धर्मवीर को जाता है जिन्होंने स्त्री-साहित्य की मिटा दी गयी परंपरा के एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ को खोजा, सँवारा और पाठकों के सामने रखा। ठीक उसी तरह जैसे नारीवादी इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने 19वीं सदी की महत्वपूर्ण आंदोलनकारी लेखिका पंडिता रमाबाई को खोज निकाला था या फिर हिन्दू महिलाओं के वैवाहिक अधिकारों की शुरुआती लड़ाई लड़ने वाली रुखमाबाई जैसी महिलाओं की परंपरा को डॉ. सुधीर चन्द्र ने सामने रखा। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में स्त्री अधिकारों के सवाल पूरी सरगर्मी से उठाए जाने लगे थे लेकिन हिन्दी साहित्य का कोई भी सामान्य पाठक इन जानकारियों से अनभिज्ञ है। ऐसे में स्त्रियों के पक्ष में किसी भी सवाल को यह कहकर नकार दिया जाता है कि उस समय किसी भी तरह के अधिकारों की चेतना खुद स्त्रियों में नहीं थी , ऐसे में हिन्दी के पुरुष साहित्यकारों की स्त्री विरोधी मानसिकता पर सवाल उठाना बेमानी हो जाता है। जबकि वास्तविकता इससे अलग है। औरतों द्वारा की गयी अधिकारों की हर मांग को इस कठोरता से उपेक्षित किया गया था कि आज उसका नामोनिशान बाकी नहीं।  आज जब उस जमाने की कुछेक लेखिकाएँ खोजी जा सकीं हैं तब इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि अपने अधिकारों की आवाज उठाने वाली और भी महिलाएं जरूर रही होंगी।

चाँद पत्रिका में छपा एक कार्टून

चाँद पत्रिका में छपा एक कार्टून

लेकिन गोरक्षा , नागरी और हिन्दी-उर्दू विवाद के शोरगुल में साहित्यिक सत्ता पर काबिज लोगों ने इन सवालों की ओर ध्यान नहीं दिया । अब जबकि साहित्य मठाधीशों के हाथ से फिसल रहा है ,उस वक्त किसी युग को बस एक ही रंग से रंगा देखने की जिद्द करने वालों से अलग जरूरत यह देखने की है कि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध के समय हिन्दी में केवल भारतेन्दु हरिश्चंद्र तथा उन्हीं के मण्डल के लोग लिख बोल रहे थे या कुछ दूसरे स्वर भी थे ,जिन पर हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया । भारतेन्दु तथा उनकी मंडली में राष्ट्रवादी स्वर मिलते हैं इससे इंकार नहीं है लेकिन फ्रांचेसका ओर्सीनी जिसे हिन्दी का लोकवृत्त कहती हैं वह केवल मध्यवर्गीय अङ्ग्रेज़ी शिक्षा प्राप्त पुरुषों से ही नहीं बना था जोकि इस राष्ट्रवाद का हिमायती था । जरूरत खोजने और बात करने की है , तब उस लोकवृत्त में स्त्रियों के स्वर भी मिलेंगे और दूसरे उपेक्षित वर्गों के भी ।

यह देखने के लिए कि जिस युग को भारतेन्दु युग का नाम दिया गया है और जिसकी मुख्य प्रवृत्ति भारतेन्दु आदि के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधारा को माना जाता है , इससे अलग उभरते वे कौन से स्वर थे जिनका अपने तथाकथित ‘महान’ राष्ट्र के एजेंडा के तले ‘हिन्दी नवजागरण’ के लेखकों ने गला घोंट दिया । इस संदर्भ में भारतेन्दु की तुलना इसी युग में स्त्रीवाद की प्रखर चेतना से युक्त सीमंतनी उपदेश की अज्ञात लेखिका से करना उपयुक्त होगा । लेखिका ने 1882 में हिन्दी प्रदेश की आम स्त्रियों के बीच चेतना फैलाने के उद्देश्य से ‘सीमंतनी उपदेश’ नाम की पुस्तिका लिखकर इसकी तीन सौ प्रतियाँ मुफ्त बांटने के लिए छपवायीं। डॉ. धर्मवीर ने अपने शोध में इस लेखिका से संबन्धित तमाम जानकारियों को सामने रखा है और इस लेखिका और ‘ वुमेन राइटिंग इन इंडिया ‘ की अज्ञात लेखिका को एक ही माना है। डॉ . धर्मवीर के अनुसार इस पुस्तक का, “पहला लेख एक भाषण है जो इस महिला ने बंबई के प्रार्थना समाज द्वारा आयोजित एक स्त्री सभा में दिया था” (16, सीमंतनी उपदेश) ऐसे में ज़हीर है कि यह महिला केवल पुस्तक में अज्ञात है , अपने सामान्य जीवन में न सिर्फ यह भली-भांति ज्ञात थी बल्कि बढ़-चढ़ कर स्त्री आंदोलन में हिस्सा भी ले रही थी।

भारतेन्दु उस लेखकीय वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे थे जिन्होंने हिन्दी को नयी चाल में ढालने का दावा किया । उनके पास एक सुसंगठित विचारधारा थी ,उसके कुछ प्रतीक थे, कुछ पौराणिक आधार थे, जिन्हें वे इतिहास बनाकर पेश किया करते थे  और अपने मध्यवर्गीय हित को साधने के लिए हिन्दी-उर्दू विवाद से अनजान आम जनता की वह संख्या थी जिसे गिनाकर वे मध्यवर्गीय हिन्दी भाषी हिंदुओं के लिए ब्रिटिश सत्ता से मोल-भाव कर रहे थे । उनके पास गिनाने  के लिए वे स्त्रियाँ भी थीं जिन्हें आज तक उनके समुदाय के लोग पैदा होते ही दफनाते और जिंदा जलाते रहे थे । अब इन सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों ने अपने लक्ष्य को साधने के लिए उन्हें भी ‘शिक्षिका माता’ और ‘वीरप्रसविनी’ की भूमिका दी।  सांस्कृतिक राष्ट्रवाद प्रतीकों की राजनीति करता है । उन्होंने भारतीयता  के सभी गुणों का प्रतीक अब हिन्दू स्त्रियों को बनाना शुरू कर दिया । जिन्हें आज तक मनुष्य भी नहीं समझा गया था , उन्हें देवी का स्थान दिया जाने लगा । लेकिन अभी भी भारतेन्दु युगीन लेखकों का मन स्त्री  की उस शुद्ध आध्यात्मिक छवि को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था , जहां उसके देह की भूमिका , आध्यात्मिक-सामाजिक भूमिका की तुलना में कम महत्वपूर्ण हो जाती है। यह अधिक स्पष्टता से प्रेमचंद और उनके युग के लेखन में दिखता है ।भारतेन्दु के समय राष्ट्रवाद की तरह ही स्त्री का प्रतीकीकरण भी अपने शैशवकाल में था । भारतेन्दु तथा दूसरे अन्य इस युग के लेखक जो ब्रजभाषा में कवितायें भी लिखा करते थे , अपनी रीतिकालीन शृंगारिकता और रसिकता को छोड़ नहीं पाये थे जहां स्त्री की ‘भोग्या’ छवि ही केंद्र में होती है । भारतेन्दु का लेखन उभरते हुये राष्ट्रवादी तथा रीतिवादी शृंगारिक संस्कारों से युक्त कवि के आंतरिक द्वंद्व से उपजा है । एक तरफ वे स्त्री के शरीर के रास्ते स्वर्ग तलाशते नज़र आते हैं । वहीं इनका सांस्कृतिक राष्ट्रवाद इन्हें उस जगह ले जाकर खड़ा कर देता है जहां ये स्त्रियॉं को अविश्वसनीय , व्यभिचारिणी और पुरुषों से आठ गुना कामुक बताते हुये भी भ्रूणहत्या का विरोध करते हैं और ‘कामुक’ स्त्रियों के पुनर्विवाह को जरूरी बताते हैं क्योंकि वे आर्यसन्तति को जन्म देती हैं । (96/6)

सवाल है कि क्या भारतेन्दु के लेखन से उस समय की स्त्रियों की वास्तविक स्थिति को जाना जा सकता है? क्या भारतेन्दु युग के लेखकों का साहित्य 19वीं सदी की स्त्रियों की सही तस्वीर पेश करता है? क्या भारतेन्दु के लेखन में कहीं भी स्त्रियों के दुख-दर्द, छटपटाहट को आवाज़ मिली है?

यह तस्वीर साफ होती है उस उस समय के स्त्री लेखन में , जोकि दुर्भाग्य से दफन किया जा चुका है। सीमंतनी उपदेश की लेखिका पुरुष साहित्यकारों की उस परंपरा से दूर है , जहां औरत केवल पुरुषों के मनोरंजन के लिए एक object के रूप में जगह पाती है या फिर व्यंग्य-विनोद के लिए कच्चे माल के रूप में।  इस अज्ञात औरत की लेखनी समाज की क्रूर सच्चाईयों में तपी एक बाल विधवा की लेखनी है, जिसने विधवा जीवन को करीब से जाना है, समाज की निष्ठुरताओं को झेला है और स्त्रियों को इस शोषण के विरुद्ध एक संगठित लड़ाई के लिए तैयार करने का बीड़ा उठाया है। यूं ही नहीं वह बड़ी होशियारी से अपना नाम अज्ञात रखती हुई, किसी धार्मिक या नैतिक शिक्षा संबंधी पुस्तिका जैसा बाहरी रूप-रंग देकर अपनी घोर क्रांतिकारी पुस्तक को घरों की चहारदीवारी के भीतर प्रवेश दिलाने का प्रयास कर रही थीं। पुरुषों के कड़े पहरे के भीतर रहने वाली घरेलू स्त्रियों को संबोधित करने की यह कोशिश अपने-आप मे अद्भुत है।

सीमंतनी उपदेश की लेखिका ने भी अङ्ग्रेज़ी कान्वेंट से शिक्षा पायी है (जैसा कि डॉ. धर्मवीर के शोध से मालूम होता है ) आधुनिक चेतना एवं विश्व के ज्ञान –विज्ञान से यह भी भारतेन्दु के समान ही परिचित रही होगी । लेकिन इसकी चिंता भारतेन्दु की तरह हिन्दू राष्ट्रीयता नहीं , कुछ और है । जहां भारतेन्दु को गायों की रक्षा की चिंता खाये जा रही है ,वहीं यह लेखिका स्त्रियों को अपनी रक्षा के लिए उठ खड़े होने को चेता रही है । उसे पता है कि  पितृसत्ता के ये ठेकेदार गाय की रक्षा भले कर लें , लेकिन अपने ही घर की औरतों की सुध कभी नहीं लेंगे। ‘सीमंतनी उपदेश की लेखिका ने अन्यत्र भी लेखन किया होगा लेकिन अभी तक कुछ प्रकाश में नहीं आया है। पंडिता रमाबाई की पुस्तक ‘the high cast hindu women’ में सीमंतनी उपदेश का एक लेख अनुवादित रूप में संकलित है। इससे यह समझ में आता है कि तथाकथित हिन्दी नवजागरण के साहित्यिक कुलीनों ने यदि इनकी ओर ध्यान नहीं दिया तो यह नहीं मान लेना चाहिए कि इन महिलाओं के लेखन से कोई परिचित ही नहीं था । पंडिता रमाबाई की पुस्तक में उद्धृत यह लेख और उन्हीं की पुस्तक में प्रकाशित महान विद्रोहिनी रुख्माबाई का पत्र ,ये सब इस बात कि गवाही देते हैं कि ये लेखिकायें आपस में जुड़ी हुयी थी और एक दूसरे से प्रेरणा भी ले रही थी ।( राधा कुमार ने अपनी पुस्तक ‘स्त्री संघर्ष का इतिहास में उन्नीसवीं सदी में भारत में चल रहे स्त्री आंदोलनों की विस्तार से चर्चा की है)

अजीब बात है कि ऐसे  समय में जब महिलाएं खुद अपने समुदाय की बेहतरी के लिए आगे आ रही थीं , भारतेन्दु हरिश्चंद्र उनका साथ देने के बजाय खीझ कर उन्हें कामुक ठहरा रहे थे और इन आंदोलनों के दबाव तथा परिस्थियों की मांग को देखते हुये जो थोड़े बहुत बदलाव भी वे स्त्रियों के जीवन में लाना चाह रहे थे वह पुरुषों के माध्यम से। यह खयाल हर वक्त उनके दिमाग में बना हुआ था कि स्त्रियों को स्वतंत्र होकर निर्णय लेने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए । परिवार के दायरे के भीतर रहते हुये पुरुषों के हाथों से ही उनका उद्धार होना चाहिए जबकि सारी परम्पराओं को तोड़-फोड़ डालने के लिए , यह लेखिका सीधे महिलाओं को संबोधित कर रही थी , ऐ नेक गरीब भोली हिंदनियों , इस खुदमतलबियों के कहने को हरगिज़ न मानो। तुमको पतिव्रता महात्म्य सुनाते हैं और तुम्हारे खाविंदो को कोकशास्त्र और नायिकाभेद और बहार ऐश और लज्जतुल निसा की पोथियाँ सुनाकर कहते हैं इस दुनिया में जिसने दो चार दस बीस कन्याओं का संग नहीं किया उसका पैदा होना ही निष्फल है” (112)

सीमंतनी उपदेश की लेखिका ने न केवल हिन्दी-उर्दू के झगड़े की उपेक्षा की है बल्कि भारतेन्दु के ‘राष्ट्र’ या ‘जाति’ में भी उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। वे खुलकर लिखती हैं, हम सिवाय चारदीवारी मकान के और कुछ नहीं देखतीं , और हम चाहे इसी को तमाम दुनियाँ खयाल करें ,चाहे इसी को हिंदुस्तान समझें। इसी जेलखाने में पैदा हुई हैं और इसी मे मर जाएंगी 42)) भारतेन्दु साहित्यकार थे, रंगकर्मी थे, ब्रजभाषा के शृंगारिक कवि थे। सांस्कृतिक हिन्दू पुनरुत्थान की चेतना के प्रसार के लिए नाटक भी लिखा करते थे तथा रसिकों के मनोरंजन के लिए नख-शिख वर्णन की कविता भी लिखते थे। वे मध्यवर्गीय शिक्षितों को गोलबंद करने के लिए पत्र-पत्रिका भी निकालते थे और राष्ट्रवादी जरूरतों में हाथ बंटाने वाली पितृसत्तात्मक साँचे में ढली माता’ तथा पतिव्रता’ की फौज तैयार करने का सपना लेकर ‘बालाबोधिनी जैसी स्त्री-संबंधी पत्रिका भी निकालते थे। इस तरह भारतेन्दु के लेखन का फ़लक बहुत व्यापक था। वे हिंदुस्तानियों को भी संबोधित कर रहे थे और उनके प्रतिनिधि के रूप में ब्रिटिश सत्ता को भी।

दूसरी ओर यह लेखिका एक बाल विधवा है जिसने उस दौर में जाने कितनी मुश्किलें झेल कर खुद को इस लायक बनाया होगा कि वह इस घोर पित्तृसत्तात्मक व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठा सके, अपनी दूसरी बहनों के बीच इस चेतना को ले जाना ही उसका लक्ष्य था । पितृसत्ता द्वारा खड़े किए गए हिन्दू-मुस्लिम के झगड़े से न तो उसे कोई सहानुभूति थी, न ही वह स्त्रियों की सारी ऊर्जा इस पितृसत्ता के लिए आर्यसन्तति पैदा करने में खपा देने को राजी थी। जिस मातृत्व को भारतेन्दु युग के लेखक स्त्रियों का एकमात्र लक्ष्य मानते थे, उसे यह लेखिका स्त्रियों के लिए बेकार की चीज मानती है,  जब से दुनिया पैदा हुई है तभी से लड़के का नाम बाप के नाम के साथ लिया जाता है । तवारीख में बराबर राजाओं का हाल है । कहीं भी उनकी माँ , बहन , जोरू का जिक्र नहीं । मगर उन्हीं औरतों का नाम है जिन्होंने कोई किताब तसनीफ की हो या कोई इमारत बनवाई हो या कोई और मुल्की बंदोबस्त किया हो या मजहब साथ में किसी तरह की दिलेरी की हो या परमेश्वर के भजन में मशहूर हो (100)  स्त्री शिक्षा को लेकर भारतेन्दु के रवैये को सभी जानते हैं , लड़कियों को भी पढ़ाइए ,किन्तु उस चाल से नहीं जैसे आजकल पढ़ाई जाती हैं जिससे उपकार के बदले बुराई होती है। ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिये कि वह अपना देश और कुल धर्म सीखें , पति की भक्ति करें और लड़कों को सहज में शिक्षा दें” (70/6 समाज में पुरुषों के हित साधने के लिए महिलाओं को शिक्षा दिये जाने के तर्क को सीमंतनी उपदेश की लेखिका स्वीकार नहीं करती। उसे स्त्रियों के लिए ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे वे खुद अपना जीवन संवार सकें, अगर कहो कि हिंदुस्तानियों ने विद्या में बहुत तरक्की की है और बहुत इल्म हासिल किया है, बेशक माना। फिर हमें क्या, एक के खाना खाने से दूसरे का पेट नहीं भरता है (44) साफ है कि यह लेखिका स्त्रियों को स्त्रियों के हित में पढ़ने – आगे बढ्ने के लिए प्रेरित कर रही है।

जिस तरह उसका विषय एक ही जगह केन्द्रित है, उसी की परिणति है उसके द्वारा किया गया विधागत चयन जो कि मुख्यतः निबंध पर केन्द्रित है। कुछेक खड़ी बोली की कवितायें भी इस पुस्तक में है ,जो भारतेन्दु के इस दावे का खंडन करती हैं कि खड़ी बोली में कविता नहीं हो सकती। इस पुस्तक में लेखिका ने दो- एक कहानियाँ भी सुनाई हैं जो हो सकता है साहित्यिकता के आग्रही लोगो को मनोरंजक न लगे ,या कहानी के निर्धारित तत्व उन्हें नकार दें । लेकिन कहानी अगर जीवन के दर्द को कहीं गहरे बयान करने का नाम है तो यह लेखिका यहाँ भी सफल रही है। सीमंतनी उपदेश में “ऑनर किलिंग” की कहानी हैं, रिश्तेदारों द्वारा होने वाले यौन शोषण की कहानी है, पति से मार खाती औरत की कहानी है और इसमें कहानी है उन बाल विधवाओं की जो कैसे-कैसे मानसिक और यौनिक शोषण सहती हुई अंत में वेश्या बन जाती हैं। इन कहानियों में औरतों के लिए शिक्षाएँ भी दी हुई हैं। ये शिक्षा है- औरतें खुद पसंद करके शादी करें, घर वाले न करने दें तो पुलिस का सहारा लें, खुद अपने लिए शिक्षा पाएँ और सबसे बढ़कर जो इसमें शिक्षा है वह ये की अगर संभव हो तो औरतें शादी करने से बचें क्योंकि शादी औरतों के लिए गुलामी का दूसरा रूप है, शादी करने से अपने अख्त्यरात दूसरे के अख्तयार में देने पड़ते हैं । जब अपने जिस्मी अख्तयार दूसरे को दिये तब  दुनिया में अपनी क्या चीज बाकी रही ? अगर इस दुनिया में कुछ खुशी है तो उन्हीं को है जो अपने तई आजाद रखते हैं “(84)लेखिका सिर्फ स्त्रियों को शादी से बचाने की सलाह देती है बल्कि वैधव्य को स्त्रियों के हित में एक सकारात्मक घटना मानती है, “पुरुष की हर रोज मार खाने से रांड रहना अच्छा है” शीर्षक लेख में वह विधवाओं को दोबारा शादी की मुसीबत से बचने की सलाह देती है। एक औरत अपनी स्वतन्त्रता खो देने के दर से रांड हो जाने को खुशकिस्मती मान रही है, यह तो आज भी एक रेडिकल बात है, उस दौर की तो बात ही छोड़ दीजिये जब भारतेन्दु विधवा औरतों को सती प्रथा के लिए प्रोत्साहित करते हुए नीलदेवी जैसे नाटकों की भूमिका में ही लिख  रहे थे आप लोग, इन पुण्यरूप स्त्रियों के चरित्रों को पढ़ें ,सुनें,और क्रम से यथाशक्ति अपनी वृद्धि करें स्त्री के लिए भारतेन्दु का  आदर्श क्या है इसी नाटक की नायिका के अंतिम वाक्य से मालूम होता है जब वह कहती है, अब मैं सुखपूर्वक सती हुंगी (335/1) तो यह है वह आदर्श जहां स्त्री अपने पति की मृत्यु के बाद उसके हत्यारे से बदला लेकर सती हो जाती है, इससे अधिक स्त्रियों के जीने की कोई उपयोगिता नहीं है भारतेन्दु की नजरों मे । सीधी बात कहते समय भारतेन्दु शायद कभी सती-प्रथा का समर्थन नहीं कर पाते क्योंकि वैचारिक निबंधों की यह सीमा है कि लेखक कथनी – करनी में भेद नहीं कर सकता ।  लेकिन साहित्यिक रचनाएँ इन शोषणपरक परम्पराओं को भी आदर्श बनाकर महिमामंडित करने की पूरी छूट देती हैं । पाँचवाँ पैगंबर (चूसा) एक ऐसा ही नाटक है जहां भारतेन्दु ने समाज सुधार के उन सभी प्रयासों का जम कर मज़ाक उड़ाया है ,जिन सुधारों का वे अपने वैचारिक निबंधों में खुल कर विरोध नहीं कर सकते  थे। ध्यान देने वाली बात यह है कि पैगम्बरी धर्मों की खिल्ली उड़ाते हुए भारतेन्दु ने एक पांचवें पैगंबर ‘चूसा’ की कल्पना की है जो ‘मूसा’ का बिगड़ा हुआ रूप है। यह समस्त दुर्गुणों की खान है । इन दुर्गुणों की श्रेणी में भारतेन्दु ने चोरी,दलाली आदि को तो रखा ही है ,साथ ही विधवा विवाह तथा स्त्री समानता जैसी मांगो को और दूसरे धर्मों के रीति-रिवाजों को भी भारतेन्दु ने इन बुराइयों की श्रेणी में ही रखा है और इन सबका जमकर मज़ाक उड़ाया है

इस लेख में भारतेन्दु एक ऐसे काल्पनिक पैगंबर का चित्र खींचते हैं जो वास्तव में इस नाटक का खलनायक है। एक ऐसा खलनायक जिसने अपनी ‘बुराइयों’ से सभी ‘अच्छाइयों’ पर विजय पा ली है। भारतेन्दु जिन बातों को अच्छाई  कह रहे हैं वह सब वैष्णव धर्म से जुड़ी हुई बातें हैं ।भारतेन्दु इस नाटक में इस खलनायक का पार्ट अदा कर रहे पैगंबर से खुदा का संवाद कराते हुए इस्लाम और दूसरे पैगम्बरी धर्मो को चोरी, शराब आदि से जोड़ते हैं तथा इस खलनायक से स्त्री समानता के आदर्शो का समर्थन कराते हैं । कुल मिलाकर भारतेन्दु ने व्यंग्य शैली का सहारा लेते हुए जम कर अपनी भड़ास निकाली है। इस पैगंबर का परिचय देते समय ही भारतेन्दु की दृष्टि का पता चल जाता है ,जब वे अपने पैगंबर रूपी खलनायक का मज़ाक उसी से उड़वाते हैं, मेरा नाम चूसा पैगंबर है, मैं विधवा के गर्भ से जन्मा हूँ”(75/1)

किसी को गाली देने के लिए स्त्री यौनिकता को जिस तरह लक्ष्य किया जाता है ,उसे आम जीवन में तो हम माँ-बहन की गालियों के रूप में सुनते ही हैं, किसी भाषा को नयी चाल में ढालने वाला साहित्यकार भी जब यही लेखनशैली अपना रहा है तो नींव पर खड़े भवन की कल्पना की जा सकती है। ‘चूसा में किए गए व्यंग्य का एक नमूना देखिये ,अपने मज़हब के वास्ते झूठ बोलना और हुकुम दिया तुझको औरतों की इज्जत करने और उनको अपने बराबर हिस्सा देने का बल्कि यारों के संग जाने का “(76/1) और भी, देखो शराब पियो , विधवा विवाह करो , बालापाठशाला करो , ,आगे से लेने आओ , बाल्यविवाह उठाओ , जातिभेद मिटाओ , कुलीन कुल को सत्यानाश में मिलाओ ,होटल में खाओ , लव करना सीखो , स्पीच दो,, क्रिकेट खेलो , शादी मे खर्च कम करो,मेम्बर बनो”(77/1) भारतेन्दु का खलनायक जिन चीजों का विरोध करता है वे सब हिन्दू धर्म के रीति रिवाज हैं,जिनके प्रति भारतेन्दु की सहानुभूति इस लेख में देखी जा सकती है,   हराम किया बुत्परस्ती बेईमानी ,सच बोलना , इंसाफ करना , धोती पहरना , तिलक लगाना ,दतुवन करना,स्वछंद होना ,उदार होना , निर्भय होना ,कथा, पुराण , जातिभेद ,बाल्यविवाह , भाई वा माँ वा पिता के साथ रहना, मूर्तिपूज(1/78) इन चीजों को एक साथ रखना भारतेन्दु की विचारधारा के साथ ही “हिन्दी नवजागरण” की वास्तविकता को स्पष्ट कर देता है, वे नाटक के खलनायक से जिन बातों का समर्थन करा रहे है, वह हैं ,जहां पर खुदा ने हलाल किया है शराब बीफ , मटन , बग्गी , दगल ,फसल , नेशनैलिटी , कोट , बूट , छड़ी ,जेबीघड़ी, रेल धुआँकाश ,विधवा ,कुमारी , परकीया , चाबुक , चुरूट , सड़ी मछली , सड़ी पनीर,…………मौसी, मामी, बुआ, चाची में अपनी बेटी पोतियों के, कज़िन फ्रेंड“(77/1) हंसमुख गद्य अपने भीतर स्त्री-समानता , जातिप्रथा का अंत करने की मांगों और दूसरे धर्मों के प्रति कितनी कड़वी घृणा छिपाए है, इसकी उपेक्षा करके कैसे किसी को हंसी आ सकती है और कैसे कोई आनंदित हो सकता है?

इसका एकदम उलट है सीमंतनी उपदेश का गद्य ,जो हंसमुख नहीं है, कारुणिक है क्योंकि इसकी लेखिका खुद को इतना बड़ा नहीं समझती कि वह बाकी सभी का उपहास करे। वह तो उस उपेक्षित स्त्री समुदाय की बात कर रही है जो खुद को इंसान का दर्जा दिलाने की जद्दोजहद कर रहीं हैं । सभी का मज़ाक उड़ाने वाले भारतेन्दु के गद्य से उलट सीमंतनी उपदेश के आंसुओं से भरे गद्य का एक नमूना देखिये,  “तमाम घर की खिदमतें करे तब रोटी खाने को मिलती है । अगर खाविंद हुक्का पीता हो तो तीन बजे उठकर हुक्का भरना होगा । चाहे कितनी ही सर्दी पड़ती हो मगर तुम्हें जरूर उठना है । अगर लाला साहब कहीं नौकर हों तो नौ बजे खाना तैयार करना पड़ेगा । वह खाना खा दफ्तर को जाते हैं या अपने और किसी काम को । अब अपना हाल सुनिए । दोचार लड़के अपने,दो-चार पहले-कोई रोता है, कोई रोटी मांगता है , कोई मैले में लिसा पड़ा है। तीन घंटे उन्हीं की खिदमत में लग गए । अभी तक अपने नहानेखाने की कुछ खबर ही नहीं।  इतने में एक बजा । अब झटपट उठ दो-एक लोटा पानी बदन पर डाला। पाँव सूखे हैं। पीठ भीगी ही नहीं। जल्दी से उठ एक आधी रोटी बड़ेबड़े लुकमे  खाये । मारे जल्दी के हलक में अटकते जाते हैं । आंखे निकली आती हैं । उधर मारे खौफ के कलेजा धडक रहा है अगर तीन बजे आते ही खाना न तैयार हुआ तो खुदा जाने क्या हाल करें । खाना हो रहा है ,इतने में लाला साहब भी आ पहुंचे । दोचार गाली दीं । दोएक लात मारीं । झिड़क के बैठ गए । बीवी मारे डर के हुक्का भर लायी । पंखा हिलाने लगी । आप खाना खा सैर को गए । तुम्हें फिर वही लड़कों की खिदमत अब दरवाजा खोले इंतेजार कर रही हैं कब आवे,कब आराम करे। दस बज गए हैं नींद आ रही है मगर जरूर दरवाजा खोले बैठी रहो। ग्यारह बारह बजे आप तो आए नहीं ,तमाम रात जागना पड़ा। अगर इस हालत में कुछ कह बैठी तो वही हालत किया, जैसा चोरों का कोतवाल के हुक्म से मेहतर करते हैं और बहुत-बहुत तकलीफ़े उठानी पड़ती हैं। यह सिर्फ जाहिरी बाते हैं । अगर कोई कहे , गरीब घरों में यह हालत होती है अमीरों के घरों में नहीं, हिंदुस्तान में बादशाह अमीर गरीब औरतों के हक़ में सब एक ही माफिक हैं”(86)                                                                             

ये है हिंदुस्तान की विवाहित स्त्रियों की हालत। इसे देखना तो दूर भारतेन्दु अपने साहित्य में औरतों की ऐसी छवि बनाकर पेश करते हैं मानो सभी खराबियों की जड़ औरत ही हो “स्त्रिय: स्वभावतो दुष्टा या फिर “पुरुष का आठ गुना इनमे काम है “या “सती स्त्री तभी तक है जब तक उनको मौका नही मिलता शास्त्रों से उठाए गए ये उद्धरण जो भारतेन्दु ने अपने तर्क को मजबूत बनाने के लिए इस्तेमाल किए हैं , भारतेन्दु का स्त्रियों के प्रति क्या नज़रिया था इसे साफ कर देते हैं।  इस तरह का गाली गलौज औरतों के लिए ही क्यों ? वो भी इतने बड़े साहित्यकार के लेखन में ?  जर्मेन ग्रियर ने इन्हीं गालियों पर लिखा है , दुर्भाग्यवश उन्मादी अतिशयोक्ति के कारण गालियों का हल्का पड़ जाना स्त्रीघृणा की भाषा में एक विशिष्ट घटना है। बहुत से शब्द जो स्त्रियों और पुरुषों दोनों के लिए इस्तेमाल होते थे, सिर्फ स्त्री तक सीमित होकर बहुत मारक बन गए हैं“(240,बधिया स्त्री)  अगर ऐसी कहावतों की जड़ें खोजी जाए तो ये लोक और शास्त्र दोनों जगह मिलेंगी, भारतेन्दु जब ‘ स्त्री सेवा पद्धति ’ या वेश्यास्तवक लिख कर मज़लूम औरतों का मज़ाक उड़ाते हैं तो उसे हिन्दी में जिस सहजता से स्वीकार कर लिया जाता है,यह अपने आप में हिन्दी के लोक-वृत्त की स्त्री विरोधी छवि का प्रमाण है। वास्तव में हिन्दी साहित्य की जहां नींव पड़ रही थी ,उसी भारतेन्दु युग ने न केवल शब्द चयन ,मुहावरों आदि के स्तर पर वरन इनके माध्यम से उस पितृसत्तात्मक ,मर्दवाद से ओतप्रोत विचारधारा को हिन्दी साहित्य के संस्कारों के साथ इस तरह एकमेक कर दिया है कि आज भी इन शब्दों, मुहावरों को दी जाने वाली चुनौती को हिन्दी के लोकवृत्त में स्वीकार्यता नहीं मिल पाती । आज भी हिन्दी के ब्राह्मणवादी आलोचकों और भारतेन्दु-भक्तों के यहाँ स्त्री विमर्श और दलित विमर्श उपहास के विषय हैं और असाहित्यिकता के आरोप से लथपथ पड़े हैं। “नारीवादी” शब्द तो वास्तव में जर्मेन ग्रियर की परिभाषा पर इतना खरा उतरता है कि प्रतिक्रियावादी बाकायदा इसका प्रयोग गाली देने या मज़ाक उड़ाने के लिए करते हैं।

स्त्रियों के आभूषण प्रेम का पुरुष साहित्यकार मज़ाक भले उड़ाएं लेकिन उनके साहित्य की नायिका गहनों से लदी-जगमगाती कोई सुंदरी ही हो सकती है। याद दिलाने कि जरूरत नहीं है कि समाज के नियम पुरुष हितों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। इन्हीं पुरुषों ने विवाहित स्त्रियों के लिए तरह-तरह के सुहाग-चिन्ह अनिवार्य बनाए हैं। जिन्हें समाज में आज भी बड़ी कड़ाई से औरतों से धारण कराया जाता है, फिर उस समय की तो बात ही क्या जब भारतेन्दु खुद बालबोधिनी जैसी स्त्री-शिक्षा संबंधी पत्रिका निकाल कर इन सुहग संबंधी कर्मकांडों का महिमामंडन कर रहे थे(५२,बालबोधिनी। मे स. १८७४) लेकिन यह लेखिका सुहाग चिन्ह के नाम पर स्थापित पुरुष वर्चस्व से महिलाओं को आजाद करना चाहती है। वह जानती है कि ये आभूषण ही वे बेड़ियाँ है जिनके सहारे पीढ़ी दर पीढ़ी औरत को सुस्त और कमजोर बनाकर पुरुषों पर निर्भर बना दिया गया है। प्रेमचंद से बहुत पहले यह लेखिका औरतों के आभूषण-प्रेम के लिए उन्हें कड़ी फटकार लगाती है,

“अब मैं आपसे पूछती हूँ कि तुम्हारे वास्ते तुम्हारे खाविंद कौन सी निशानी रखते हैं? और मुझे याद आ गई-मर्दों को क्या जरूरत है जो इनके लिए तकलीफ उठावें, क्योंकि एक जोरू के मरने से बहुत मिल सकती हैं, बल्कि इनकी ज़िंदगी में ही”(50)   

अफसोस कि सवा सौ साल पहले जिन सुहाग-चिन्हों कि गुलामी से यह लेखिका औरतों को आजाद कराना चाहती थी, वह आज भी इस समुदाय कि लगभग सभी औरतों को गुलाम बनाए हुए हैं। सुहाग के नाम पर औरतों से चिपका दिये गए जेवरों पर हँसती हुई वह लिखती है,

अफसोस है, सुहाग का खूंटा सिर में गड़ा रहे फिर विधवा हो जावे।……..जब हममें से किसी का खाविंद मरता है तब चूड़ी उतारी जाती हैं। चूड़ियों में तो सुहाग न हुआ। चूड़ियों में सुहाग तब माना जाता कि जब तुम उतारो तभी खाविंद मरता”(51)

यह किसी स्त्री की ही दृष्टि हो सकती थी जिसने अनुभव करके जाना हो कि ये आभूषण पुरुषों के मनोरंजन के लिए भले ही सजी-संवरी गुड़िया तैयार रखते हैं लेकिन औरतों के लिए न केवल गुलामी का प्रतीक हैं बल्कि उन्हे शारीरिक रूप से भी तकलीफ दिया करते हैं। संभवतः आभूषण-विहीन स्त्री-समाज की कल्पना उस समय का रसिक साहित्यकार कर भी नहीं सकता था।

 साहित्य और धर्म दोनों ने मिल कर स्त्री को एक मिथकीय छवि से बांध दिया है जहां स्त्री या तो देवी होती है या दानवी, मनुष्य रूप में उसे देखने से हमेशा ही परहेज किया गया है।साहित्य ने स्त्रियों के विरुद्ध एक बड़ा काम यह किया है कि एक तो पुरुषों ने लिखा, पुरुषों के लिए लिखा लेकिन लिखा स्त्री के बारे में । भारतेन्दु के पूरे लेखन में यह बात साफ तौर पर देखी जा सकती है। यहीं पर भारतेन्दु के लेखन की जेंडर आधारित कुंजी मिलती है। एक तरफ भारतेन्दु का साहित्य रीतिकालीन संस्कारों,मिथकों, मान्यताओं से संचालित हो रहा है जिसमें वे नायिका के अंगों तथा हाव-भाव का कामुक वर्णन करते हैं। ऐसा साहित्य वे अपने पुरुष पाठकों के लिए रचते हैं ।  दूसरी ओर वे बालाबोधिनी जैसी पत्रिकाओं में स्त्रियों को आदर्श माता तथा पतिव्रता पत्नी बनाने के लिए लिखते है । क्योंकि यहाँ वे स्त्रियों के लिए लिख रहे हैं इसलिए बहुत सावधानी से किसी भी तरह के कामुक या यौनिक वर्णन से बचते हैं । जब वे अपने सामान्य पाठकों के लिए लिखते हैं जो कि पुरुष हैं, तब वे स्त्री को यौन-तृप्ति के प्रॉडक्ट के रूप मे चित्रित करते हैं ,कभी उसके ऊंचे स्तनों का चित्र खींचते हैं कभी उसकी देह के रास्ते स्वर्ग जाने की कल्पना करते हैं ।लेकिन जब महिलाओं को संबोधित करते हैं तो किसी भी यौनोत्तेजक बिम्ब या दृश्य को सावधानी से अलग रखते हैं । ध्यान देने वाली बात यह है की स्त्रियों का मज़ाक उड़ाते समय भी भारतेन्दु अपनी रीतिकालीन रसिकता को नहीं छोडते,     “आयु रूपी आँगन मे सौंदर्य  तृष्णा रूपी खूंटा है, उपासक का प्राणपुंज छाग उस मे बंध रहा है। …….प्रत्येक शनिवार की रात्री इस में महाष्टमी है और पुरोहित यौवन है। …….तुम्हारा प्रेम अमृत है जिसकी प्रारब्ध में होता है वह इसी शरीर से स्वर्ग सुख अनुभव करता है”(150/6) स्त्री के सहारे शरीर से स्वर्ग पाने वाले भारतेन्दु “श्री वेश्यास्तवराज” मे वेश्याओं का वर्णन इसी रसिकता के साथ करते हैं।एक ओर वे उन्हे भोले-भाले आदमियों का घर तबाह करने के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं ,”सदगृहस्थ गेह कि उजाड़नी” वहीं मद्धिम स्वर से उनके अत्त्युच्च्स्तनमंडला‘ अर्थात ऊंचे स्तनों पर भी एक नजर डाल ही लेते हैं। गिलट के आभूषण पहनने का मज़ाक तो उड़ाते हैं ,लेकिन उनकी गरीबी या बेबसी की बजाय उनकी कामुक प्रकृति को उनके वेश्या बनने के लिए उत्तरदाई ठहराते हैं। आतशक सुजाक और फ़िरंग की कहते वक्त वे भूल जाते हैं कि कौन सा सुख इन बीमारियों वाले से संसर्ग करके वेश्या को मिल रहा होगा? दरअसल स्त्री को कोई दर्द या बीमारी भी हो सकती है, कोई दुख हो सकता है,इस पर भारतेन्दु का कभी ध्यान ही नहीं गया। दें भी कैसे, ऊंचे स्तनों से ध्यान हटे और उसके हृदय तक पहुंचे तब ना !

 लेकिन सीमंतनी उपदेश की लेखिका ने पुरुष साहित्यकारों के उस पूर्वाग्रह-ग्रसित तर्क को ध्वस्त कर दिया है कि स्त्रियों के वेश्या बनने का कारण उनकी कामुक या विलासी प्रकृति है, “स्वार्थ सिद्धि हेतही विलासिनी” (९८७,भारतेन्दु समग्र) कहने वाले भारतेन्दु से अलग यह लेखिका कई कहानियों का उदाहरण देकर यह समझाती है कि किस तरह इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने पुरुषों की काम-वासना तृप्त होती रहे इसके लिए ऐसा उपाय कर रखा है कि हमेशा विपदा की मारी स्त्रियाँ उन्हें बाज़ार में  वेश्या के रूप में सुलभ होती रहें। एक बाल विधवा किन चरणों से गुजर कर वेश्या बनती है , इसे कार्य-कारण की एक शृंखला के रूप में लेखिका ने दर्शाया है।यह भी दिखाया है कि किस तरह यह समाज पुरुषों के लिए तो अनेकों विवाह का विकल्प खोल कर रखता है लेकिन बाल विधवा को बस इसलिए करीबी नाते-रिश्तेदार शादी नहीं करने देते ताकि वे उनसे अनैतिक संबंध बना सकें। कभी रिशतेदारों द्वारा होने वाले शोषण से गर्भ रह जाने पर , कभी विधवा जीवन की कठोर यातना से तंग आकर या फिर किसी के प्रेम में पड़कर, जब कोई स्त्री परिवार से बाहर कदम रखती थी, तो बस वेश्यालयों में ही आसरा मिलता था।

 भारतेन्दु ने वेश्याओं को “सदगृहस्थ गेह की उजाड़नी”(वही) कहकर भले ही इन वेश्याओं से आनंद उठाने वाले पुरुषों को क्लीन-चिट दे दी हो या वेश्यागामी पुरुषों के घर की बरबादी का सारा ठीकरा वेश्याओं के सिर फोड़ दिया हो लेकिन यह लेखिका इन ‘सदगृहस्थों’(??) को इतना भोला-भला नहीं मानती। सीमंतनी उपदेश में जगह-जगह “रंडी-लौंडों” के युग्म का प्रयोग लेखिका ने यों ही नहीं किया। यह उस युग की सच्चाई है, जिसका जिक्र तक भारतेन्दु ने नहीं किया। लेखिका की पुस्तक से पता चलता है कि उस समय का पुरुष वर्ग अपने यौन-व्यसनों की पूर्ति के लिए केवल वेश्याओं के पास ही नहीं जाता था, बल्कि किशोर लड़कों( लौंडों) का भी यौन शोषण करता था। जिस समाज का पुरुष वर्ग गले तक इन व्यसनों में डूबा हो, उन्हें नज़रअंदाज़ करके सारा दोष स्त्रियों के माथे मढ़ देना केवल पूर्वाग्रह ही कहा जाएगा।

यहीं पर सीमंतनी उपदेश की लेखिका अलग है। उसने स्त्री का चित्रण किसी भोगने योग्य वस्तु के रूप में नहीं किया,एक जीते-जागते इंसान की तरह किया है। पुरुषों को गुदगुदाने वाली औरत की मिथकीय छवि यहाँ नहीं है ।यहाँ है औरत की ऐसी दर्द भरी पुकार जिसे सुनकर किसी का भी हृदय रो उठेगा।

पुरुषों की आपसी बातचीत किस तरह महिलाओं पर जाकर केन्द्रित हो जाती है इसे संता-बंता के चुटकुलों में तो हम देखा ही करते हैं ,लोक में प्रचलित कहानियाँ, पंचतंत्र की कथाएँ और भारतेन्दु का लेखन ,ये सब जगह हैं । स्त्रियों को लेकर कुछ पूर्वाग्रह समाज में ऐसे प्रचारित कर दिये गए हैं कि अब वे सच की तरह ही स्वीकार कर लिए गए हैं ।उन्हें आमतौर पर समाज में कोई चुनौती नहीं देता।मैं कुछ मुहावरों पर ध्यान दिलाना चाहूंगी जो नवजागरण कालीन लेखकों द्वारा समय-समय पर प्रयुक्त हुए हैं।असल में यह मुहावरे-कहावतों वाली भाषा, जिसका प्रयोग होने के कारण भारतेन्दु के गद्य को उम्दा गद्य का नमूना कहकर सराहा जाता है ,यह किस हद तक जेंडर और कास्ट पर आधारित था,इसे देखा जा सकता है,         1॰स्त्रियाँ बहुत ज्यादा बोलती हैं=  जीवन के मार्ग में तुम रेलगाड़ी हो,जिस समय रसना रूपी एंजिन तेज करती हो एक घड़ी में चौदहों भुवन दिखला देती हो”(150/6)  2॰स्त्रियाँ इधर की बात उधर करती हैं= “कार्य क्षेत्र में तुम इलेक्ट्रिक टेलीग्राफ हो,बात पड़ने पर एक निमेष में उसे देश देशांतर पहुंचा देती हो”(150/6)  3.औरतें रोने का नाटक करती हैं= “तुम वरुण हो क्योंकि इच्छा करते ही अश्रु जल से पृथ्वी आर्द्र कर सकती हो”(151/6)   4॰अलग-अलग जातियों के पति-पत्नी की संतान लाश के बराबर होती है = “ब्राह्मण से वैश्य कन्या में होय सो अर्बष्ठ , शूद्र कन्या में हो सो विषाद उसी का नाम पारशव है। उसका संस्कार नहीं होता है क्योंकि वह जीते जी शव के तुल्य है”(97-98/6)  जातिप्रथा के संबंध में भारतेन्दु की दृष्टि ने उनके गद्य पर क्या प्रभाव डाला इसे “ दूषणमालिका ” के जरिये भी समझा जा सकता है। वे दयानन्द द्वारा हिन्दू धर्म में सुधार की कोशिशों से नाराज होकर विशुद्ध शास्त्रार्थ की शैली मे 64 प्रश्नों की एक दूषणमालिका तैयार करते हैं । वैसे तो इसमें किए गए किसी भी प्रश्न का दूर-दूर तक तर्क से कोई लेना-देना नहीं है लेकिन सबसे दुखद है इसमें भारतेन्दु द्वारा की गयी जाति विषयक टिप्पणियाँ ,जो साफ तौर पर छुआछूत का समर्थन करती नजर आती हैं-

“अथ दयानंदनामी क्या जाने कौन जाति व किस आश्रम के कोई नग्न पुरुष”

वेद के मंत्र शूद्रों और म्लेछादिको के हाथ में देने से आपको दोष हुआ की नहीं”                                

आप…. किस जाति के हैं”   ,   “बात सौ पंडितों की मानें या एक आपकी”

किसी भी तरह के धार्मिक सुधार का विरोध करने के लिए  जाने कबसे शास्त्रार्थ की यह तर्क विहीन शैली ब्राह्मणों द्वारा अपनाई जाती रही है,दुख की बात है कि भारतेन्दु इसे साहित्य में भी ले आए। इससे हिन्दी नवजागरण के खोखलेपन का भी पता चलता है

जहां ‘स्वर्ग में विचार सभा का अधिवेशन और ‘ दूषणमालिका ’ आदि में भारतेन्दु समाज सुधारकों के सुधार कार्यों का मज़ाक उड़ा रहे थे,उसी समय यह लेखिका सभी स्त्रियों से इन सुधारकों का शुक्र अदा करने को कह रही थी। वह स्त्रियों से इन सुधारकों को देवतुल्य मानने का आग्रह करती है जिन्होंने उन्हे इंसान तो समझा । इन उद्धारकों में वह दयानन्द समेत कई सुधारकों का नाम बड़े आदर के साथ लेती है। धर्म सुधारकों का इस हद तक मज़ाक उड़ाने वाले भारतेन्दु ने मनु जैसे हिन्दू शास्त्रकारों का उल्लेख किस श्रद्धा से किया है, देखने योग्य है, “अपने परम पूर्व्व पुरुष जगद्विख्यात और जगत मान्य परम प्राचीन आर्य्य भूषण मनु जी कि उदारता और उनकी समझ को देखो। क्या उनसे मान्य भी कोई और है?” (96/6) लेकिन इस लेखिका के लिए मनु बिलकुल भी मान्य नहीं हैं क्योंकि उसके पास आधुनिक तर्क की कसौटी है, कहती है, इससे तो मनु जी की बिल्कुल खुद्गर्जी पायी जाती है । जब मर्द अपनी स्त्री को प्रेम तो दरकिनार रहा गैर मर्द से बात करते देखते ही गला काटने को तैयार हो जाते हैं, तब स्त्री क्योंकर देवता के समान पूज सके ? जबर्दस्ती और चीज है। क्यों ना हो मनु जी भी हिन्दी मर्दों के दादा परदादा गुरु थे”(76)

               भारतेन्दु से बहुत पहले ब्राह्मणवादी-पितृसत्ता ने औरतों को मूर्ख बनाने के लिए कुछ व्रत कथाएँ रची थीं ।  बालाबोधिनी में स्त्रियों की शिक्षा के लिए जो लेख छापे जाते थे, उनमें ये व्रत-कथाएँ भी थीं । बालाबोधिनी मे स. 1874″ में छपा सावित्री उपाख्यान इसका नमूना है । जबकि इसी अंक में लवली और मालती संवाद नाम के स्त्री शिक्षा संबंधी लेख में भारतेन्दु पूजा- पाठ- व्रत के औचित्य पर सवाल भी उठा रहे थे । उनकी शिक्षित पात्र तर्क करती है,भला सौभाग्यवती को सेवाय पति की सेवा ये सब नेम धरम बहुत सी पूजा पाठ और व्रत करना कहाँ शास्त्र में लिखा है ………… पर हाँ बहिना जो सौभाग्य के व्रत हों उन्हें तो अवश्य ही करना उचित है भारतेन्दु की आधुनिकता यहाँ उन्हीं के पितृसत्तात्मक हितों से टकरा कर ढेर हो गयी है ।

लेकिन यह अज्ञात हिन्दू औरत इन पितृसत्तात्मक संस्कारों से मुक्त है। कुछ कथा  का हाल लिखा जाता है” नाम के अपने लेख में सलाह देती है,  पहले उन किताबों को आग में फूँक दो जिनमें स्त्रियों के वास्ते इस धर्म की हिदायत है और मर्दों के वास्ते कुछ   नहीं(112) वह औरतों से इन को नकारने की अपील करती है,बस अब तुम इस धर्म को छोड़ दो । ऐसी पति सेवा से स्वर्ग नहीं मिलेगा “(112)  वह धर्म के शोषणपरक रूप को पहचानती है , बस,तुम्हारे इस धर्म करने से तुम्हारे पति अधर्म करते हैं……ज्यों-ज्यों तुम इस धर्म में दृढ़ होती जाती हो त्यों-त्यों वे अधर्म में ज्यादा हो जाते हैं” निदान,  बस, अब इस जमाने के वास्ते नया धर्म बनाओ जिसमें स्त्री पतिव्रता धर्म करे । मर्द दूसरी का ख्याल ख्वाब में भी ना लावे । अगर ख्याल करे फौरन स्वर्ग से निकाला जावे(112)  यही तो है किसी भी नवजागरण की पहचान , जहां मनुष्य मात्र की समानता का तर्क, धर्म को भी पुनर्परिभाषित करने का साहस देता है ।

इस तरह भारतेन्दु हरिश्चंद्र का लेखन ऐसे लेखक की तस्वीर पेश करता है जिसके लिए बहुत सारी चिंताएँ है, व्यापक फ़लक है दखल के लिए। वह औरतों , आम लोगों सभी को अपने एजेंडे के हिसाब से रखकर देखता है। उसे अंग्रेजों से होड़ है, मुस्लिम एलीट से प्रतिस्पर्धा है। यही वजह है कि समाज के अपमानित और तिरस्कृत वर्ग की भारतेन्दु के लेखन में कहीं चिंता नहीं मिलती । यह औपनिवेशिक पराधीनता में जी रहे हिन्दू मध्यवर्ग की कुंठाओ के अनुरूप ही था । पार्थ चटर्जी ने स्त्रियों को अंग्रेजों कि औपनिवेशिक अधीनता में जी रहे भारतीय पुरुषों के “देशी पुरुषत्व” के लिए बचे हुये एकमात्र उपनिवेश के रूप में ठीक ही पहचाना है। शायद यही वजह है कि भारतेन्दु के लेखन में जिस नवजागरण को देखा जाता है ,उसमें स्त्री कहीं है ही नहीं।

जबकि यह अज्ञात स्त्री लेखिका जिस शैली को अपने लेखन के लिए अपनाती है, वह उस समय की आम अशिक्षित औरतों को संबोधित है । उसकी मुख्य चिंता स्त्रियों को तर्क की नयी रौशनी से वाकिफ कराने की है । लेखिका ने जिस तर्क को अपने चिंतन का आधार बनाया है ,वह उससे अन्तर्जातीय विवाह का समर्थन तो कराता ही है “धर्म की शराब”(107), को पहचानने का विवेक भी देता है। कहना न होगा कि किसी भी नवजागरण की पहचान यह तर्क और विवेक ही हो सकता है, पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रह नहीं। क्या ही बेहतर होता अगर ‘हिन्दी नवजागरण’ की बातें करने वाले आलोचक इन उपेक्षित आवाज़ों को ध्यान मे रख कर अपना निष्कर्ष देते !

चारु सिंह

चारु सिंह

चारु सिंह, भारतीय भाषा केंद्र, जेएनयू, नई दिल्ली की शोध छात्रा हैं, इनसे charusingh.jnu@gmail.com पर संपर्क संभव है.

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