स्त्रीविरोधी और दिशाहीन फिल्म है हाइवे: तत्याना षुर्लेई

इम्तियाज अली की  इस फ़िल्म में बहुत कमियाँ है। पहली कि शायद वह खुद नहीं जानता था कि उसकी फ़िल्म किसके बारे में होगी। क्या यह फ़िल्म एक अमीर, ऊबी हुई लड़की के बारे में है जिसको जीवन में थोड़ा सा एडवेंचर चाहिए और जिसके लिए दुनिया के बाकी लोग उसके नौकर जैसे होते हैं, क्या स्टॉकहॉम सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति के बारे में है या एक ऐसी लड़की के बारे में है जो अचानक इस सच्चाई को ढूंढ लेती है कि उसको अपने झूठे परिवार की ज़रूरत नहीं है क्योंकि बाहर की दुनिया में ज्यादा अच्छे लोग रहते हैं।

Highway's Poster

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इम्तियाज अली की हाइवे  किसके बारे में है?

By तत्याना षुर्लेई

इम्तियाज अली की नयी और अत्यंत लोकप्रिय फ़िल्म हाइवे का मूल संदेश इसमें है कि उसकी नायिका, वीरा ‘खतरा/जोखिम’ से क्या समझती है। जवान लड़की अपने माँ-बाप द्वारा प्रवचित इस ज्ञान को नकारती है कि घर के बाहर की दुनिया लड़कियों के लिए बहुत खतरनाक है क्योंकि इस समय उसके लिए घर ही सबसे बड़ा खतरा है।

अली की फ़िल्म के समालोचक यह लिखकर उसको बड़ी दाद देते हैं कि आखिर पुरुष-प्रधान समाज से मुक्ति चाहने वाली नयी नायिकाएँ भारत में भी उत्पन्न हो गई हैं, जिनको हुक़्मऊदीली करने से डर नहीं है, जो उम्र में छोटी होने के बावजूद पूर्ण विकसित है। यह सब कुछ पढ़कर मैं खुद से पूछ रही हूँ कि मैंने वही फ़िल्म देखी या शायद कोई दूसरी; क्योंकि उपरोक्त दृष्टि से इस फिल्म को सिर्फ देखने में ही मैं असफल नहीं रही, बल्कि इसे देखकर मुझे लगता है कि जिस समय में महिलाओं के अधिकार के बारे में इतने सारे वाद-विवाद हो रहे हैं उस समय में यह फ़िल्म प्रतिक्रियावादी निष्कर्षों की शिकार लगती है और सब से खतरनाक बात यह कि कोई इस गलती को नहीं देखता है।

फ़िल्म की कहानी बहुत ही सरल है: वीरा बड़े घर की बेटी है और उसकी शादी होनेवाली है लेकिन वह ज़्यादा खुश नहीं लगती है। क्यों? कोई स्पष्ट कारण नहीं दिया जाता है, बस दर्शकों को मालूम हो जाता है कि उसको साँस लेने के लिए थोड़ी सी हवा चाहिए, थोड़ी सी शांति और आज़ादी भी। यह समझने वाली बात अवश्य है कि शादी की तैयारियों से वह थोड़ी सी थकी है लेकिन यह आज़ादी वाली इच्छा बिलकुल स्पष्ट नहीं है; ऐसा लगता है कि जैसे वीरा मध्ययुग में रहती है और उसके परिवार में अभी तक परदा-प्रथा का चलन है। नहीं तो वे कौन से कारण हैं कि इतने बड़े बाप की बेटी घर से बाहर नहीं निकल सकती है। हाँ, फ़िल्म की कहानी में यह स्पष्ट है कि वीरा आज़ाद लड़की है लेकिन उसकी आज़ादी की सीमाएँ भी बड़ी हैं। इतनी बड़ी कि वह अकेली कहीं नहीं जाती है, खुद गाड़ी नहीं चलाती है, साँस लेने के लिए भी लड़के के साथ बाहर निकलती है। लड़का अच्छी तरह जानता है कि आलीशान बंगलों से बाहर की दुनिया अमीर लोगों के लिए बहुत खतरनाक है – और कैसे न होगा? यही तो भारत है और सब को मालूम है कि यहाँ रात को क्या क्या होता है और वह भी तब जब जवान लड़की सड़क पर निकल आई हो, लेकिन वीरा साहसी और स्वतंत्र है न? समस्या यही है कि लड़के के साथ गाड़ी में बैठने के लिए ज़्यादा बहादुर होने की जरूरत नहीं है इसलिए पेट्रोल पम्प आने के बाद दुस्साहसिक अभियान (adventurous journey) की प्यासी वीरा गाड़ी से बाहर निकल जाती है। लड़का उसको वापस बुला रहा है लेकिन खुद नहीं निकलता है क्योंकि वह अच्छा लड़का है, नियमों को तोड़ने वाला नहीं है (क्या आजकल बड़े घर के लड़के भी परदों के पीछे बैठने लगे हैं?)। वीरा वापस आना नहीं चाहती है और इसी समय पेट्रोल पम्प लूटने आए डकैत उसका अपहरण कर लेते हैं। इतना सब कुछ हो जाने के बावजूद घर वापस आते ही वीरा अपने माँ-बाप को क्यों बोलती है कि घर के बाहर के खतरे के बारे में आप लोगों की बातें झूठी हैं? वह घर से निकली और उसका अपहरण हो गया। अनजान अत्याचारी पुरुषों ने उसे बार-बार पीटा और बाल पकड़कर अपने साथ दौड़ाया। क्या खतरे का यह रूप काफ़ी या अपमानजनक नहीं था? क्या औरतों के संदर्भ में घटित हिंसा का संबंध सिर्फ़ अस्मत से ही होता है, क्या हिंसा के बाकी रूप मामूली होते हैं? फ़िल्म के अधिकांश हिस्से में वीरा के चेहरे पर चोट के निशान दिखते हैं जो डकैतों के हिंसक व्यवहार को याद दिलाने के लिए काफी है, इसके बावजूद वह अपहरणकर्ता, महावीर उस लड़की को अपना रक्षक लगता है और वीरा उसके साथ रहना चाहती है।

कुछ लोग बोलते हैं कि फ़िल्म स्टॉकहॉम सिंड्रोम के बारे में है और इसलिए वीरा का व्यवहार थोड़ा सा अजीब लग सकता है लेकिन बात यह है कि मुझे इस स्टॉकहॉम सिंड्रोम में विश्वास भी नहीं है। फ़िल्म में एक बहुत महत्त्वपूर्ण दृश्य है जब वीरा अपहरणकर्ताओं के चंगुल से भागना चाहती है लेकिन शोर हो जाने के कारण जल्दी पकड़ी जाती है। महावीर लड़की को भागने की सज़ा देता है और इसके बाद लड़की को कहता है कि भाग जाओ। वह अच्छी तरह जानता है कि वह वापस आ जाएगी। हाँ, यही सच है क्योंकि यहाँ रूपक के बतौर फिल्म को देखना एक भयंकर भूल होगी। क्यों? क्योंकि इसमें फ़िर से अच्छी तरह दिखाया जाता है कि बाहर की दुनिया लड़कियों के लिए खतरनाक है। वीरा बाहर निकल जाती है लेकिन वहाँ कोई मदद करनेवाला नहीं है और औरत को हमेशा किसी की मदद चाहिए। वह उतनी ही स्वतंत्र हो सकती है जितनी अनुमति उसके साथ वाला पुरुष उसे देगा। पहला निष्क्रमण एक पुरुष के साथ हुआ और दुसरा महाभिनिष्क्रमण भी पुरुषों की सहायता के बिना संभव नहीं हो सकता है। इसी कारण वीरा वापस आ जाती है और यह कदम उसकी अधीनता का सबसे बड़ा सबूत दे जाती है। इसलिए मेरी समझ में यह नहीं आता कि इस दृश्य को देखकर लोग कैसे विश्वास कर सकते हैं कि यह फ़िल्म एक ज़ोरदार और आज़ाद ख्याल की एक महिला के बारे में है और वीरा के वापस आने के बाद, महावीर की व्यंग्यपूर्ण टीका-टिप्पणी सुनकर सिनेमाघर में बैठे हुए लोग हँस कैसे सकते हैं?

 दर्शकों को जल्द ही पता चलता है कि वीरा का बचपन बहुत ही दमघोंटू घटनाओं के बीच बीता है। उसका अंकल उसे बचपन से ही मोलेस्ट (यौन हिंसा/छेड़-छाड़) करता आया है। वीरा ने अपनी माँ को सब कुछ बताया लेकिन माँ ने मदद करने के बजाय बेटी को ही चुप रहने को कहा। शायद इसीलिए जब महावीर उसको अपने ही आदमी से बचाता है (जो वीरा के साथ ज़ोर-जबर्दस्ती करने की कोशिश करता है) तब वीरा अचानक बदल जाती है। महावीर का यह छोटा व्यावसायिक-कर्तव्य (जिसका संबंध अपहरण उद्योग की नैतिकता से भी है) उसके लिए ही काफ़ी है, इसके बाद लड़की का डर अपने आप गायब हो जाता है और वीरा अपहरणकर्ताओं से बातचीत करनी शुरू कर देती है। उसके लिए यह काफ़ी है कि वे लोग उसकी अस्मत लूटनेवाले नहीं हैं और जो आदमी अस्मत की लूटपाट नहीं करता है, वह अपहरण करने, थप्पड़ मारने या बाल खींचने के बावजूद अच्छा है।  इसलिए वीरा निश्चय करती है कि वह उन लोगों के साथ जाएगी। उसको पता नहीं है कि वे कहाँ जा रहे हैं, वह ट्रक के पीछे बंद हो जाती है, ज्यादा कुछ भी नहीं देख सकती है लेकिन फिर भी, न जाने क्यों आज़ाद महसूस करती है। वह न वापस आना चाहती है और न ही मंज़िल पर पहुँचना – उसको बस, रास्ता, फ़िल्म के टाइटल वाला हाइवे पसंद है जिसका स्पष्ट मतलब यह है कि जब से वीरा को पता चला कि जो लोग उसके साथ हैं वे उसकी अस्मत लूटने वाले नहीं हैं, अच्छे लोग हैं, बस यही सब उसके लिए एक साहस बन जाता है।

फ़िल्म के शुरुआती अंश के दृश्य उदासीन और डार्क है लेकिन जब से वीरा के विचार में यात्रा ज़्यादा खतरनाक नहीं है, तब से फ़िल्म में ज़्यादा रंग और प्रकाश, गाने और सरसो के फूलों के खेत भी आते हैं। लेकिन स्टॉकहॉम सिंड्रोम कहाँ चला गया? मुझे लगा कि एक जटिल प्रेम संबंध देखूँगी जिसमें एक जवान लड़की खतरनाक आदमियों की रखैल बनना चाहती है लेकिन फ़िल्म एक बिगड़ैल लड़की के बारे में है जो दो आदमियों की लाड़ली गुड़िया बन जाती है और उनके साथ घूमती है। हाँ, एक आदमी थोड़ा सा सनकी और खतरनाक लगता है लेकिन दूसरा अच्छा अंकल जैसा है। वीरा खुद भी बदल जाती है और पश्चिमी कपड़े देशी में बदल जाते हैं। लेकिन यहाँ भी उसका व्यवहार ज़्यादा स्वभाविक नहीं है, टुरिस्ट जैसा है– उसको पता नहीं है कि वह भारत के किस प्रदेश में है, दूसरी भाषा के अक्षर नहीं पहचानती है, गरीबों के घर और छोटे-छोटे गंदे सड़क उसको ज्यादा अच्छे लगते हैं, एक डिस्को गाना बजाकर आदमियों के सामने नाचती है। इन सब का मतलब यही हो सकता है कि वह अच्छी तरह जानती है कि उसके साथ कुछ भी बुरा नहीं होगा या इतनी वेबकूफ़ है कि अपराधियों के साथ सफ़र करते हुये भी खतरों से अनजान है। कहने का मतलब कि यह जो भी है लेकिन स्टॉकहॉम सिंड्रोम नहीं है। फ़िल्म की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि उसके पात्रों का मनोवैज्ञानिक चित्रण बहुत ही सतही है।

फ़िल्मवालों ने ब्यूटी ऐन्ड दी बीस्ट के आदिरूप से प्रेरणा ले लिया है। लड़की जवान, सुंदर और मासूम है और आदमी हिंसक, तीखा और खतरनाक। लेकिन इतना नहीं। महावीर वीरा को ज़बरदस्ती अपने पास रखता है लेकिन लड़की अच्छी तरह जानती है कि बीस्ट के अंदर एक खूबसूरत और अच्छा राजकुमार बंद है। वीरा से बातचीत करने का महावीर का तरीका अच्छा नहीं है लेकिन लड़की बार-बार उसके संपर्क में आने की कोशिश करती है, यह जानकर कि अंदर से वह ज़रूर बहुत अच्छा आदमी है। वह ऐसा क्यों करती है? इसलिए नहीं कि वह महावीर से भावनात्मक रूप से जुड़ी हुयी है, लगता है कि वह अपने सफ़र को खत्म करना नहीं चाहती है और सफ़र के लिए आदमी की ज़रूरत है। वीरा अच्छी तरह जानती है कि अपहरण के कारण महावीर का जीवन खतरे में है और यह भी अच्छी तरह जानती है कि ऐसे किसी अवश्यंभावी आपदा के बाद खुद उसे कुछ नहीं होगा क्योंकि वह बस पीड़िता है, इसके बावजूद वह महावीर को जाने नहीं देती है और वे दोनों पहाड़ जाते हैं। इस नयी जगह में भी लड़की का व्यवहार टुरिस्ट जैसा है जो झोपड़ी में रहने के खेल से खुश है। शायद इस मामले में भी वह फिर से इतनी भोली थी कि सचमुच उसको लगने लगा कि महावीर को अब कुछ नहीं होगा। महावीर की मौत के बाद, एक अनूठे और बहुत अच्छे दृश्य में उसका सच्चा दुख प्रकट होता है, यह जानकर कि यह सब कुछ उसकी गलती थी या शायद वह सचमुच अपहृत होकर खुश थी और अगर खुश थी तो बस इसलिए कि महावीर नौकर की तरह वह सब कुछ करता था, जो वह चाहती थी।

भारतीय सिनेमा ऐसी कहानियों को दिखा चुका है जिनमें औरत को अपने अपहरणकर्ता से प्यार हो जाता है और इतिहास में भी ऐसी बहुत सी कहानियाँ हैं जिनमें औरत अपने अपहरणकर्ता से शादी कर लेती है और वापस आना नहीं चाहती है। इन फिल्मों और कहानियों से यहाँ अंतर यह है कि वीरा महावीर से शादी करना नहीं चाहती है – वह उसके लिए बस एक दुस्साहसिक-अभियान (adventurous journey) था। लड़की का परिवार उसको वापस स्वीकर करता है, होनेवाला पति रिश्ता तोड़ना नहीं चाहता है। सब कुछ ठीक है लेकिन वीरा फ़िर से भागना चाहती है; अंकल के बारे में सच्चाई-वमन, चिल्लाना उसके लिए काफी नहीं है। अंततः पता नहीं चलता कि परिवार वालों ने वीरा के आरोपों का विश्वास किया कि नहीं या मान्सून वेडिंग के परिवार की तरह अश्लील अंकल से रिश्ता तोड़ लिया। लगता है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ, इसलिए वीरा वापस पहाड़ आती है लेकिन अपने सपने की झोपड़ी के लिए नहीं बल्कि इससे ज़्यादा सुविधा-सम्पन्न और बड़े घर में रहने। उस घर को देखकर लगता है कि अमीर बाप से भी रिश्ता तोड़ना असंभव था क्योंकि जिस लड़की को किसी पुरुष की मदद नहीं मिलती है, उसके लिए बाहर की दुनिया बहुत खतरनाक है।

इम्तियाज अली की फ़िल्म में बहुत कमियाँ है। पहली कि शायद वह खुद नहीं जानता था कि उसकी फ़िल्म किसके बारे में होगी। यह फ़िल्म न एक अमीर, ऊबी हुई लड़की के बारे में है जिसको जीवन में थोड़ा सा एडवेंचर चाहिए था और जिसके लिए दुनिया के बाकी लोग उसके नौकर जैसे होते हैं, न स्टॉकहॉम सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति के बारे में है और न ही एक ऐसी लड़की के बारे में है जो अचानक इस सच्चाई को ढूंढ लेती है कि उसको अपने झूठे परिवार की ज़रूरत नहीं है क्योंकि बाहर की दुनिया में ज्यादा अच्छे लोग रहते हैं। जो भी है, नायिका के “विद्रोही” व्यक्तित्व के अतिरिक्त पता नहीं क्यों फ़िल्म महावीर के वंचित/दमित बचपन को और उसके अपने माँ से मज़बूत रिश्ते को दिखाने की कोशिश करती है– उन सब दृश्यों की ज़रूरत नहीं थी, छोटी लड़की के फ़्लैशबैक वाले दृश्य के साथ, क्योंकि सस्ता और सतही मेलोड्रामा के अलावा उनका कोई इस्तेमाल नहीं है। लगता है कि सच्चे विद्रोही और आज़ादी का थोड़ा सा और इंतज़ार करना पड़ेगा। दुख की बात यह है कि हाइवे के लोकप्रियता का अर्थ यह नहीं है कि दर्शक विद्रोही नायिका को देखने के लिए तैयार है बल्कि वे हँसते-हँसते एक अविकसित, नासमझ  लड़की के खेल को उतना ही देखते हैं जितना उसके आसपास के पुरुषों ने उसको खेलने दिया।

तत्याना षुर्लेई

तत्याना षुर्लेई

तत्याना षुर्लेई एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं। हंस, पहल, अकार आदि हिन्दी पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation.  नामक विषय पर पीएचडी के लिए शोधरत हैं। उनसे tatiana.szurlej@gmail.com पर संपर्क संभव है।

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4 thoughts on “स्त्रीविरोधी और दिशाहीन फिल्म है हाइवे: तत्याना षुर्लेई

  1. BASU MITRA on said:

    शायद आपने फिल्म का विश्लेषण किस रूप में किया है उसकी नीति से मुझे कोई ज्यादा सिकायत नहीं , लेकिन वीरा के किरदार को ले कर आप ने जिस तरह से आपनी प्रतिक्रिया दी है वह बिल्कुल अलग दिख रही है . फिल्म में जिस तरह से इम्तियाज ने वीरा के चरित्र को गढ़ा है वो काबिले तारीफ़ है . कहने में बड़ा आसान लगता है की एक लड़की जिसका फैमिली में यौन शोषण हुआ है .वह कैसे इस तरह का व्यवहार कर सकती है … यह आज के फार्मूला कहानी से कभी अलग है … ये शै है की हमारे यहन ऐसी कई फिल्मे बन चुकी है .. आप अर्जुन पंडित का उदहारण ले सकती है ..

  2. इस समीक्षा की समस्या यह है कि इसमें पहले यह मान लिया गया है कि यह फिल्म या तो एक साहसी स्वतंत्र लडकी के बारे में है या स्टाकहोम सिंड्रोम के बारे में . ऐसा शायद कुछ दूसरी समीक्षाओं या विचारों को पढ़-सुन कर किया गया है . उसके बाद यह देख कर कि फिल्म में तो ये दोनों बातें नहीं हैं , यह निष्कर्ष निकाल लिया गया है कि निर्देशक को पता ही नहीं है कि आखिर वह क्या बनाना चाहता है !बेशक फिल्म में ये दोनो चीजें नहीं हैं , न निर्देशक ने उनके होने का दावा किया है . न फिल्म में कुछ ऐसा दिखाया गया है .
    वीरा बचपन में घरेलू यौन हिंसा की शिकार हुयी भारतीय लडकी है , जिसे खुद भी नहीं मालूम कि वह क्या चाहती है या उसे क्या चाहना चाहिए .जो कुछ उसके जीवन में घटता है , उस सब को वह खामोशी से मंजूर करती चलती है , क्योंकि भारतीय मध्यवर्गीय / उच्च -मध्यवर्गीय घरों में लड़कियों को यही संस्कार दिए जाते हैं . वह मातापिता की मर्जी से तय की गयी शादी से भी इनकार नहीं करती .वह किसी एडवेंचर के लिए बाहर नहीं निकलती , बल्कि एक ऐसी घुटन के बीच ,जिसे वह खुद भी ठीक से नहीं समझती ,थोड़ी-सी राहत की सांस लेने के लिए बाहर निकलती है .
    अपहरण के बाद , जब पहली बार उसे भाग जाने का मौक़ा मिलता है , वह भाग नहीं पाती . क्यों नहीं भाग पाती , यह भी उसके सामने स्पस्ट नहीं है . उसे हाइवे के सफर में मज़ा आने लगता है , लेकिन क्यों आने लगता है , इसे वह तब तक ठीक से नहीं नहीं समझ पाती जब तक वह वापिस घर नहीं ले जाई जाती .लेकिन वीरा और महावीर के बीच होने वाली बातचीत से दर्शक इस रहस्य को समझने लगते हैं . उसका अपहरण , उसके चाहे -अनचाहे , घर नाम के यातनाघर से ही नहीं , भारतीय पितृसत्ता की अदृश्य कैद से भी राहत का एक अवसर है .हालांकि यह अवसर भी अस्थायी और आभासी है . जिस तरह वह कोशिश कर के भी अपने अपहर्ताओं की कैद से नहीं छूट पाती , उसी तरह अपने घर की कैद से भी .उसे लौट कर आना ही पड़ता है , क्योंकि भारतीय लडकी के लिए ‘घर ‘ और ‘बाहर ‘ दोनों एक जैसे ही कैदखाने हैं .
    फिल्म जिस तरह आगे बढ़ती है , उसमें पहले दर्शक के सामने , फिर महावीर के और आखिरकार वीरा के सामने यह ‘रहस्य ‘ उद्घाटित होने लगता है , और इस प्रक्रिया में फिल्म के अंत तक , दोनों अपने मूल किरदारों के विपरीत चरित्रों में रूपांतरित होने लगते है . तब कहीं जा कर वीरा में यह साहस उत्पन्न हो पाताहै कि वह अपने उत्पीड़क को बेनकाब कर सके . फिल्म यहीं खत्म हो सकती थी . उसे इस से आगे बढ़ाना भारतीय दर्शक की अपेक्षाओं को संतुष्ट करने का एक तरीका हो सकता है , लेकिन फिल्म में बाहर चल रही यात्रा के साथ साथ मुख्य किरदारों और दर्शकों के भीतर चल रही यात्राएं भी ठीक से निभा और दिखा ली गयी हैं .
    कैमरा नाक की सीध में चलता है .सर्पिल पहाड़ी सड़कों पर.तेजरफ्तार .आसपास गहरी घाटियाँ , तीखे ढलान , जंगल , बीहड़. सुंदर . खतरनाक . यह आसपास दिखता है , लेकिन पूरा नहीं दिखता . कैमरा एक धुंध में भागता है , बदहवास . कोई चीखता है- भाग . कहाँ जाएगा भाग कर . जाने के लिए कोई जगह नहीं है . भागदौड़ जितनी तेज है , वापसी उतनी ही तयशुदा है .
    फिल्म हाइवे आप को लगातर दौडाती है . दिल्ली , राजस्थान , पंजाब , उत्तराखंड , कश्मीर . लेकिन यह सारा देशकाल एक छोटा -सा दायरा है , जो आपको अपने बाहर नहीं जाने देता .
    लेकिन पात्र के भीतर यात्रा चलती रहती है . वीरा आखीर तक जाते जाते प्रति-वीरा में तब्दील हो चुकी है . महावीर भाटी – प्रति-महावीर भाटी में . और दर्शक प्रति-दर्शक में .
    और यह कोई आसान फ़िल्मी सफर नहीं है . खून -पसीने औ आंसुओं से कमाया गया सफर है .
    लिखी हुयी होने की जगह यह एक कमाई हुई कहानी है .
    अगर यह सिर्फ वीरा की कहानी होती तो भुलाई जा सकती थी . लेकिन यह हम सबके भीतर खोई हुयी वीरा/ महावीर की कहानी है , जिस से कैमरा हमारी दुबारा मुलाकात कराता है .
    आलिया भट्ट इस फिल्म में अभिनय-प्रतिभा के एक मूक विस्फोट की तरह प्रकट हुई है , जिसका रणदीप ने भरपूर साथ दिया है .
    निर्देशक इम्तियाज़ अली की क्षमता तो एक उस दृश्य -क्रम से ही प्रकट हो जाती है , जिसमें भागते हुए ट्रक से बाहर निकली आलिया की अनेक मुद्राओं में नाचती हुई हथेली उसकी ज़िंदगी के समूचे सफर को एक बार फिर से बयां कर जाती है .
    फ़िलहाल इतना ही.

  3. Tatiana szurlej on said:

    यह हमेशा खुशी की बात है जब किसी फ़िल्म के बारे में इतने अलग-अलग विचार होते हैं, लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि इतनी जोरदार बहस एक बेहद ही कमज़ोर फ़िल्म के ऊपर हो रही है और यह मेरा धेय तो बिल्कुल ही नहीं था। फ़िल्म देखने से पहले मैंने Wikipedia में चेक किया कि यह फिल्म किसके बारे में है और तब मुझे पता चला कि कहानी स्टॉक हॉम सिंड्रोम के बारे में है। सिनेमा घर में बैठे-हंसते हुये दर्शकों की प्रतिक्रिया मुझे अच्छी नहीं लगी क्योंकि मैं जानती थी कि निर्देशक का आइडिया कि एक आहात और दुखी (traumatized, unhappy) लड़की की कहानी को दिखाना था। फ़िर भी, अगर लोग हंसते हैं तो इसका मतलब कि निर्देशक ने अपनी कहानी को अच्छी तरह नहीं व्यक्त नहीं किया? और मुझे लगता है कि “funny” moments की ज़रूरत भी नहीं थी? किसी गंभीर और मर्मस्पर्शी कहानी में हास्य के क्षण पिरोना इतना आसान काम नहीं है और यह कला सभी फिल्मवालों के वश की बात नहीं है इसलिए मैं सोचती हूँ कि इसे छोड़ना चाहिए था। क्योंकि इम्तियाज़ अली को यह कला सचमुच नहीं आती है। मेरे लिए यह फ़िल्म न तो दिलचस्प थी और न ही समीक्षा के लायक थी लेकिन जब मैंने दूसरों के समीक्षाएं पढ़ीं तो पता चला कि कुछ लोगों के लिए यह महिला मुद्दों से संबन्धित कहानी है, बहादुर लड़की के बारे में कहानी है, महिला आज़ादी के बारे में फ़िल्म है आदि-आदि, तभी मैंने सोचा कि ऐसे दावों को खंडित करने की जरूरत है।
    फ़िल्म से सब से बड़ी मेरे लिए समस्या यह है कि मुझे वीरा के ऊपर विश्वास नहीं है। मुझे लगता है कि यह आलिया भट्ट की एक्टिंग की कमजोरी नहीं है बल्कि स्क्रिप्ट की कमजोरी है। इम्तियाज़ अली फिल्म की कहानी में सब कुछ दिखाना चाहता था और उसकी उन सब सूचनाओं में महत्त्वपूर्ण बातों के लिए उतना स्थान नहीं है जितना चाहिए था। फिर भी उसकी सब से बड़ी गलती यह है कि वह अपने दर्शकों को बोलता है कि उनको क्या-क्या सोचना चाहिए और ज़्यादा विश्लेषण और बहस की गुंजाइश को समाप्त कर देता है। हमें पता है कि वीरा के अंकल ने उसको बचपन में मोलेस्ट किया और माँ ने अपनी बेटी को नहीं बचाया। अली के लिए यह काफ़ी है– माँ बुरी, लड़की बेचारी लेकिन मैं जानना चाहती हूँ क्यों? अगर अपने बच्चे की ऐसी बात सुनकर एक माँ कुछ नहीं करती है तो यह इतनी अजीब बात है और मुझे उसका स्पष्टीकरण चाहिए – मेरे लिए यह काफ़ी नहीं है कि यह वीरा ने कहा, मैं उसकी माँ को भी सुनना चाहती थी और यह भी जानना चाहती थी कि वीरा को क्यों अचानक, पिंजरे में रहने के इतने सालों बाद स्वच्छा हवा चाहिए – उसका फ्रेश एयर का डिमांड का काफ़ी नहीं है। मैं उसके परिवार की स्थिति देखना चाहती थी ताकि मैं खुद निश्चय कर सकूँ कि उसने सही किया या नहीं। अगर वह खुश नहीं थी तो मैं देखना चाहती थी कि क्यों, अगर शादी के लिए तैयार नहीं थी तो मैं यह भी देखना चाहती थी। अगर माँ-बाप के पास अपनी बेटी के लिए कभी समय नहीं था, अगर कोई सही दोस्त कभी नहीं था, अगर वह जो पढ़ना चाहती थी और नहीं पढ़ सकती थी, आदि आदि… अच्छी फ़िल्म यह सब कुछ दिखाती है ताकि दर्शक खुद निश्चय करे कि वीरा सचमुच दुखी थी या थोड़ी सी बिगड़ैल और यही वह जगह है कथानक में जहां लोग बहस कर सकते हैं। अंकल द्वारा मोलेस्टेसन वाली कहानी की यहाँ सचमुच ज़रूरत नहीं थी – मुझे लगता है कि फ़िल्मवालों ने इसे मेलोड्रामा वाला टच देने के लिए दाल दिया या शायद उनके विचार में लड़की को घर छोड़ने के लिए सचमुच “गंभीर” कारण चाहिए और यौन-उत्पीड़न के अलावा अन्य दूसरे कारण गंभीर नहीं हैं।
    जिस भी कारण से वीरा महावीर के साथ यात्रा करती है, ठीक है लेकिन यहाँ भी मैं जानना चाहती हूँ क्यों? महावीर में वह कौन सा विशेष गुण है कि वह उसे साथ सुरक्षित/खुश/स्वतंत्र है? लेकिन यहाँ भी स्पष्टीकरण के लिए स्थान नहीं है क्योंकि फ़िल्मवालों ने निश्चय किया कि कहानी में महावीर की माँ को डालना चाहिए। क्यों? यह दिखाने के लिए कि वह आदमी अच्छा है; यहाँ फिर से अली अपने दर्शकों को खुद निश्चय करने नहीं देता है। महावीर अच्छा था या नहीं – अच्छा था, बस, जैसे वीरा की माँ बुरी। और अगर फ़िल्म वीरा के बारे में है तो महावीर को उसका बैक्ग्राउण्ड होना चाहिए था ताकि वह खुद का विकास दिखा सके।
    कुछ लोग खुद को वीरा के स्थान में डाल देते हैं और उसके निर्णय को स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं। मेरे लिए यह महत्त्वपूर्ण नहीं है कि उसने शायद कुछ और सोचा, कि उसके पापा ने शायद उसको गाड़ी की चाबी नहीं दी, कि वह अपने अपहरणकर्ताओं से शायद भाग नहीं सकी – मेरे लिए सब से महत्त्वपूर्ण यह है जो फ़िल्म ने मुझे दिखाया और अगर किन्हीं स्थितियों में वे तार्किक नहीं हैं तो यह कोई “शायद” नहीं बल्कि स्क्रिप्ट की कमी है। यह अलग बात है कि फ़िल्म के दृश्य हमेशा थोड़े से मेटाफोरिकल होते हैं इसलिए उनके स्पष्टीकरण वास्तविक जीवन के नियमों के अनुसार कभी हो नहीं सकता है। फ़िल्म के सभी दृश्यों में कोई मतलब है: जब लड़की खुद गाड़ी नहीं चलाती है तो यह मेरे लिए एक सूचना है, जब भागने की कोशिश करती है और आसपास घुप्प अंधेरा देखती है तो यह मेरे लिए एक मेटाफर है, जब अपने अपहरणकर्ता के सामने नाचती है तो इसलिए नहीं कि शायद य़ात्रा करके थोड़ी सी थकी और ऊबी हुयी है, जब अपने सपनों की झोंपड़ी में नूडल्स बना रही है तो इसलिए नहीं कि उनके पास शायद खाने के लिए कुछ और नहीं है– यह सब बहुत महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ हैं या उन सब को बहुत ही महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ होनी चाहिए।
    किसी ने लिखा की वीरा के निर्णय स्पष्ट नहीं हैं और हमको शायद कभी पता नहीं चलेगा कि उसने क्यों कुछ किया और क्यों कुछ नहीं किया और यह न सिर्फ़ सच है बल्कि इस फ़िल्म की बड़ी कमी भी; फ़िल्म एक कहानी है जो कभी कभी ज़िंदगी से मिलती जुलती लगती है लेकिन फिर भी ज़िंदगी नहीं है। वास्तविक दुनिया में यह कभी कभी होता है कि लोगों के व्यवहार में कोई तर्क या cause-effect relation नहीं है लेकिन फ़िल्म की कहानी में अगर कुछ ऐसा है तो यह स्क्रिप्ट की कमी है। फ़िल्म में पात्रों के व्यवहार का स्पष्टीकरण चाहिए: व्यवहार, जिसका दर्शकों के अनुमान और मत से विरोध होता है, जो अजीब लगता है, अच्छा लगता है। इसी व्यवहार की मदद से नायक कागज़ के लोग नहीं लगते हैं बल्कि दर्शक देख सकते हैं कि उन के अंदर कितनी तरह की भावनाएँ सक्रिय हैं। जब कुछ ऐसा होगा तब फ़िल्म के बारे में बहस हो सकती है। अगर निर्देशक खुद निश्चय करता है कि दर्शकों को क्या सोचना चाहिए और उसकी फ़िल्म देखकर लोग मानते हैं कि उसने बहुत अच्छी फ़िल्म बनाई तब मुझे सचमुच अफ़सोस होता है।

  4. Tatiana’ above reply is based on these facebook’s debates also

    Sandeep Singh shared a link.
    4 March · Edited
    I watched the film with a bit of expectation because people in the known ‘folk’ were exited about it and were writing inspirational posts. When I finished it watching, felt uncomfortable with its message and politics. Moreover with friends response on it. Here comes up Tatiana Szurlej with her insights and detailed dissection of the film. Ruchi Tara Vinay Param Prakash and others pls read this. Deepak Mishra

    संभवतः हिन्दी सिनेमा के दर्शक और समीक्षक दोनों अति-भावुक होते हैं. यहाँ विश्लेषण से ज्यादा कल्पना और मनपसंद अर्थ का महत्व है. निर्देशक का मंतव्य क्या है, फिल्म की दृष्टि क्या है, यह पकड़ने से ज्यादा महत्व इस बात का हो जाता है कि आप क्या देखना चाह रहे हैं. ‘हाईवे’ चाहकर भी उस परंपरा में फिट नहीं बैठती है जिसमें उसे बैठने की कोशिश की जा रही है. ‘घर-घर में दीवारें हैं, घर-घर में फाँसीघर हैं’ यह हम जानते हैं. प्रश्न है कि ‘ताकतवर और आज़ाद महिला चरित्र’ के रचियता का तमगा दिए जा रहे इम्तेयाज़ अली की यह फिल्म क्या सच में इस कड़ी में आती है? इम्तेयाज़ अली की फिल्मों की ख़ास विशेषता रही है- ‘दिशाहीनता, अमीरी-गरीबी का बम्बईया काकटेल, कोई सूफी/लोक धुन, आवेगपूर्ण प्रेम और मसीहाई कर्बानी का mode’ जो ‘जब वी मेट’, ‘रॉकस्टार’ से लेकर ‘हाईवे’ तक में मिलता है, इसमें सूफियाना कुछ भी नहीं है. बाकि फिल्मों में तो यह चल जाता है क्योंकि वे मूलतः प्रेम और आवेग पर केन्द्रित थीं पर ‘हाईवे’ में आकर वे उसी फ्रेमवर्क के शिकार हो जाते हैं जिसे तोड़ने की कोशिश आज का महिला आन्दोलन और खुदमुख्तार लड़कियां कर रही है.
    हमारे समाज की सभ्यता-समीक्षा कर रहे महिला प्रश्न पर अधकचरे तरीके से ‘समयानुकूल’ फिल्म बनाकर मकबूल हो जाने की कोशिशों को हमें और गंभीरता से समझना चाहिए.
    तत्याना का सिनेमाई दृष्टिकोण और दर्शकीय तटस्थता उन्हें इस फिल्म की फांक को बेहतर तरीके से पकड़ने में सक्षम बनाते हैं जिसमें हम अक्सर चूक जाते हैं.

    Param Prakash Rai sandeep singh, Tatiana Szurlej इन बहसों को लेकर सबसे पहले तो यह ख्याल आता है कि जिस विषय पर बात की जा रही है और जो बात की जा रही है, उसका एक आम दर्शक, एक आम पाठक पर क्या प्रभाव पड़ता है…क्या उसकी जो प्रतिक्रिया उस विषय को लेकर (यहाँ पर ‘हाईवे’ फिल्म) होती है, उसका कोई महत्त्व नहीं है ? या अगर विषय-लेखक, विषय-निर्देशक आम पाठकों, दर्शकों में एक जागरूकता उत्पन्न करने में सफल रहता है, तो उसे हम “अति-भावुकता”, “अबौद्धिकता”,”अपरिपक्वता” कह कर खारिज कर देंगे और उन्हें हम अपने बौद्धिक खांचों में सोचने के लिए मजबूर करेंगे कि ऐसे सोचो ?? खैर, यहाँ पर कोई आम दर्शक अपनी बात कहने के लिए उपस्थित नहीं है.
    तात्याना ने लिखा है- “इम्तियाज अली की नयी और अत्यंत लोकप्रिय फ़िल्म हाइवे का मूल संदेश इसमें है कि उसकी नायिका, वीरा ‘खतरा/जोखिम’ से क्या समझती है।” नहीं, इस फिल्म का मूल सन्देश इसमें है कि भौतिकवादी दुनिया के अति-सुविधासंपन्न और ‘विक्टोरियन तहजीबदार’ जीवन के अलावा बाहर देखने और महसूस करने को बहुत कुछ है और यही आज़ाद एहसास इस फिल्म का एक मूल्य बन जाता है जिसके लिए वीरा इस हाईवे के कभी न ख़त्म होने की बात करती है, जिस के लिए वह महावीर के साथ थोड़ी दूर और जाने के लिए प्रतिबद्ध है. ये वो एहसास है, न कि कोई ‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’, जिसके कारण उसका व्यवहार अजीब लग सकता है जहां उसे छोटी-छोटी किन्तु अपने जीवन से अब तक अनभिज्ञ चीज़ें आकर्षित करती हैं, जिन्हें वह जी भरकर जी लेना चाहती है. इस यात्रा को ‘tourism’ की संज्ञा देना वीरा के चरित्र-चित्रण के साथ अन्याय है. हाँ, आगे चलकर महावीर के ‘सॉफ्ट कॉर्नर्स’ से जुड़ जाने के कारण अगर कोई चाहे तो परिभाषा के लिए मोटा-मोटी इसे ‘stockholm syndrome’ नाम दे सकता है.
    तात्याना ने अपने लेख में आगे लिखा है – “नहीं तो वे कौन से कारण हैं कि इतने बड़े बाप की बेटी घर से बाहर नहीं निकल सकती है। हाँ, फ़िल्म की कहानी में यह स्पष्ट है कि वीरा आज़ाद लड़की है लेकिन उसकी आज़ादी की सीमाएँ भी बड़ी हैं। इतनी बड़ी कि वह अकेली कहीं नहीं जाती है, खुद गाड़ी नहीं चलाती है, साँस लेने के लिए भी लड़के के साथ बाहर निकलती है।” मुझे आश्चर्य है, एक अमीर बाप की बेटी की आज़ादी का बहुत आसान तरीके से लेखिका ने सामान्यीकरण कर दिया है. क्या वे बहुतायत पायी जाने वाली पारिवारिक रूढ़ियों से अनभिज्ञ हैं ? निर्देशक ने बारम्बार यह स्पष्ट किया है कि तमीज, तहजीब के नाम पर कैसे वीरा ‘विक्टोरियन युग की एक पुतली’ जैसी बन कर रह गयी थी घर में. आगे चलकर ठीक इसी तरह से लेखिका ने लड़कों का भी सामान्यीकरण किया है, जिस में उनके हिसाब से अमीर लड़कों को तो दुस्साहसिक होना ही चाहिए, गरीब लड़का डरता हुआ दिखाया जाता तो उन्हें कोई समस्या न होती.
    “इतना सब कुछ हो जाने के बावजूद घर वापस आते ही वीरा अपने माँ-बाप को क्यों बोलती है कि घर के बाहर के खतरे के बारे में आप लोगों की बातें झूठी हैं?” गलत उद्धरण और गलत व्याख्या. वीरा कहती है कि आपने मुझे बाहर के बारे में सावधान किया लेकिन अन्दर तो मैं exposed थी, यहाँ क्यों नहीं बताया… क्या यह कहा जाये कि न सिर्फ़ “अति भावुक” भारतीय दर्शक बल्कि “बौद्धिकऔर तार्किक” भारतीय दर्शक भी वही देखता है जो वह देखना चाहता है ? वीरा वापस आती है, आधी रात में भागकर थक कर चूर हो जाने और रास्ते के अनंत छोर को देखने के बाद. अपहरणकर्ता और हिंसक महावीर आगे चलकर भले उसे अच्छा लगने लगता है लेकिन वीरा उन लोगों से बातचीत करना शुरू करती है किसी दुर्निवार खतरे की संभावना तब तक न होने के कारण जब तक वह भागने की कोशिश न करे. और इस सीमा में वह अपना आत्मविश्वास और चुलबुलापन बखूबी प्रदर्शित करती है…’हाईवे’ में कमियाँ हो सकती हैं लेकिन वह सस्ता और सतही मेलोड्रामा कतई नहीं और न ही वह ‘एक अविकसित, नासमझ लड़की का उतना ही खेल है जितना उसे खेलने दिया गया’. हाँ, अगर खेलने देने वाले पुरुष से तात्पर्य निर्देशक से है तो बात अलग है.
    4 March at 09:19 PM · Edited · Like · 5

    Ruchi Bhattacharya ‘ameer ghar ki bigdael ladki’!!!!! How sensible a critique!! What a sensible language!! Mujhe aaj pata chala ki ameer ghar ki bigdael ladkion ka exploitation nahi ho sakta!!!
    4 March at 10:20 PM · Like · 2

    Tara Shanker कई बातें हैं!
    पहले तो ये बताएं कि किस तरह ये फ़िल्म स्त्री विरोधी लगी आपको? क्या किसी खूंखार पुरुष (जो हक़ीक़त में अन्दर से एक बेहतर इंसान है) के साथ होने से आज़ादी महसूस करना ग़लत है? तब जबकि लड़की इससे ज़्यादा खूंखार (अपने) लोगों के बीच बचपन से घुटती रही हो? क्या आपको फ़िल्म में ये नहीं दिखता कि दरअसल कहानी दो स्त्रियों की है (वीरा और महावीर की माँ) जिनके लैंगिक शोषण को दर्शाने के लिए अपहरण का फ्रेम और महावीर के चरित्र का सहारा लिया गया? क्या मूवी ये नहीं कहना चाहती कि स्त्रियाँ संपन्न घरों की हों या झोपड़पट्टी की, उनका लैंगिक शोषण समानरूप से होता है इस समाज में? घर से किसी पुरुष (उसके मंगेतर) के साथ निकलना बेख़ौफ़ आज़ादी तो नहीं लेकिन घर के घुटन से थोड़ी देर के पलायन उसके आज़ाद होने की कसमसाहट नहीं दिखाती क्या? अगर अपनों द्वारा लैंगिक हिंसा की शिकार और मानसिक तौर पे शोषित लड़की एक दूसरे प्रकार की हिंसा सहते हुए भी सुरक्षित महसूस करती है तो इसमें इतना भी क्या अस्वाभाविक है?
    बाकी अगर आज़ादी के हर छोटे से छोटे पहलू की टांग पकड़ के लटकेंगे तो आपको बहुत कुछ ऐसा मिला जाएगा जिसमे आप मीन मेष निकाल सकते हैं. लड़की की उम्र कम दिखाई गई है इसलिए उसके रोल में बेख़ौफ़ आज़ादी के हर पहलू को मुक़म्मल रूप में खोजना ज़रूरी तो नहीं!
    आपकी इस समीक्षा में मुझे पूर्वाग्रह साफ़ दिख रहा है!
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    4 March at 10:36 PM · Like · 3

    Param Prakash Rai ruchi…और ऐसी भाषा में खुद ही महिला विरोध छिपा हुआ है, जो इन्हें नहीं दीखता.
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    4 March at 10:42 PM · Like · 1

    Vinay Sultan ये आलोचना कई जगह आतिवाद का शिकार है, लेकिन इसने बहस के कई नए आयाम भी खोले हैं. महावीर के चरित्र के विश्लेषण में उन पहलुओं को नजरंदाज कर दिया गया जिसने उसकी शख्सियत को गढ़ा. इसके अलावा स्त्री मुक्ति के प्रश्न को सिर्फ वर्गीय खांचों में देखा गया है जिससे मेरी असहमति है. क्या आलोचक ये मानती हैं कि आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग में महिलाएं आज़ाद हैं?
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    4 March at 10:43 PM · Like · 1

    Vinay Sultan जिस व्यावसायिक नैतिकता के हवाले से वो महावीर को वीरा की इज्जत का रखवाला बता रही है, उसी व्यावसायिक जरुरत के हवाले से उसका वीरा के साथ हिंसक हो जाना भी समझा जा सकता है. मैंने आपकी पिछली पोस्ट पर भी लिखा था कि ये फिल्म दरअसल दो महिलाओं की फिल्म है, जो वर्ग से पार जा कर स्त्रीमुक्ति को देखने का प्रयास करती है. मैं इस फिल्म को अलेक्जेंड्रा कोलान्ताई के चश्मे से देख रहा हूं.
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    4 March at 10:50 PM · Like · 2

    Tara Shanker इस आलोचना की इस भाषा पे भी गौर कीजिएगा..”यह फ़िल्म न एक अमीर, ऊबी हुई लड़की के बारे में है जिसको जीवन में थोड़ा सा एडवेंचर चाहिए था और जिसके लिए दुनिया के बाकी लोग उसके नौकर जैसे होते हैं, न स्टॉकहॉम सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति के बारे में है और न ही एक ऐसी लड़की के बारे में है जो अचानक इस सच्चाई को ढूंढ लेती है कि उसको अपने झूठे परिवार की ज़रूरत नहीं है क्योंकि बाहर की दुनिया में ज्यादा अच्छे लोग रहते हैं”…….इन्हें घर की घुटन से बाहर निकलने की लड़की द्वारा की गयी कोशिश सिर्फ़ ‘एडवेंचर’ लगा!
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    4 March at 10:52 PM · Like · 1

    Tara Shanker सहमत Vinay भाई कि जिस व्यावसायिक नैतिकता के हवाले से वो महावीर को वीरा की इज्जत का रखवाला बता रही है, उसी व्यावसायिक जरुरत के हवाले से उसका वीरा के साथ हिंसक हो जाना भी समझा जा सकता है!…
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    4 March at 10:53 PM · Like

    Tara Shanker तीसरी बात कि लड़की घर से बाहर खुद गाड़ी चलाकर नहीं निकलती, अपने बॉयफ्रेंड के साथ निकलती है…..बहुत अस्वाभाविक तो नहीं लगता क्योंकि बहुत से बड़े घरों में लोग अपने बच्चों को गाड़ी की चाबी सुरक्षा कारणों से नहीं देते…और फिर जिस समय वो घर से निकली थी थोड़ी हवा खाने के लिए उस समय अपनी गाड़ी में खुद चलाकर जाना संभव भी नहीं था…रात का समय था सब जाग जाते! इस बात को इन्होने बतंगड़ बना दिया!
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    4 March at 10:56 PM · Like

    Tara Shanker और सबसे अंतिम बात ये कि जिस तरह से इस आलोचना के माध्यम से फिल्म को एक सिरे से पूरी तरह नकार देने की बेवजह कोशिश की गयी है वो पूर्वाग्रहित लगती है!
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    4 March at 10:58 PM · Like · 1

    Lokesh Malti Prakash Thanks for sharing this Sandeep bhai. An essential intervention.
    4 March at 11:34 PM · Like

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