रजुआ और लतिका: अमरकांत को याद करते हुए

1st July 1925--17th Feb 2014

1st July 1925–17th Feb 2014

By सुरेन्द्र चौधरी 

तमाम कुशलता के बावजूद ‘परिंदे’ जैनेन्द्र का अतिक्रमण नहीं करती थी. इतना अवश्य था कि लतिका का पिंजरा बड़ा हो गया था, मगर कैच २२ वह तब भी नहीं न बन पाया था. फिर भी नई स्थितियों में स्त्री की यह नियति एक paradox खड़ा करती थी! लतिका को पिंजरे से ज्यादा उसका अपना नैतिक आवेश बाँधता था- इसी बिंदु पर उसकी पहली और आखिरी पहचान संभव है. उसका रक्षा-कवच ही उसका पिंजरा है, जो एक छाया बनकर उसे घेरता है, न स्वयं मिटता है और न उसे मुक्त करता है! कहानी के गुंजलक में एक पारदर्शी मन की यातनाएँ इन्हीं निर्विरोध क्षणों में उसे घेरती हैं.

‘परिंदे’ का डा. मुखर्जी कहता है, ‘वैसे हम सबकी अपनी-अपनी जिद होती है, कोई छोड़ देता है, कुछ लोग आखिर तक उससे छिपकर रहते हैं… कभी-कभी मैं सोचता हूँ मिस लतिका, किसी चीज को न जानना यदि गलत है तो जानबूझ कर न भूल पाना, हमेशा जोंक की तरह चिपके रहना, यह भी गलत है.’ और इस कथन के साथ एक कहानी मेरे दिमाग में कौंधती है, अमरकांत की कहानी ‘जिन्दगी और जोंक’. यह सरल योग-पद नहीं है, यह मैं जानता हूँ. दोनों की जमीन अलग है. समतल पर संक्रमण आसान होता है. मगर जिंदगियाँ सम-असम-तल पर विभाजित हैं, फिर भी मानसिक यात्रा में उन्हें लांघना संभव है. जीवन अपने लिए कैसे-कैसे हेतु गढ़ लेता है! बौद्धिक-अबौद्धिक!! रजुआ के लिए उसका अतीत रायपुर का बरई होने तक सीमित है. अपने नाम की याद उसे आती भी है तो इसी प्रसंग में, जब वह अपनी मौत की खबर गाँव भेजना चाहता है और जब वह अपने जिन्दा होने की खबर गाँव भेजता है. इसके सिवा वह पूर्णतः अतीत-मुक्त है. मगर वर्तमान! अपने वर्तमान के साथ उसकी लड़ाई निरंतर जारी है. एक बलवती जीवनेच्छा उसे परिचालित करती है. इसी में उसकी सारी अपेक्षाएं सीमित हैं- भूख भी, प्रेम भी, परिहास भी!!! आत्मदया के लिए उस अभागे के पास न चेतना है और न अवकाश ही. एक विडम्बना की तरह है उसका अस्तित्व. फिर भी जिन्दा है, जिन्दगी से उसे मोह है. इस मरजीवा पात्र को भूतनाथ की तरह हर बार लेखक अपने तिलिस्म से जिन्दा बाहर आता देखता है. जिन्दगी के साथ उसकी ऐय्यारी दिलचस्प है, मानव इच्छा का विस्तार है.

सुरेन्द्र चौधरी के लेख ‘उत्तरशती की कथा-यात्रा’ का एक अंश
सुरेन्द्र चौधरी, हिंदी कहानी: रचना और परिस्थिति, अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद, २००९, पृष्ठ.२६-२७

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