विश्व हिन्दी सम्मेलन और साइकिल की कहानी: कृष्ण कल्पित

By कृष्ण कल्पित

 विश्व हिन्दी सम्मेलन

जिस भाषा में हम बिलखते हैं
और बहाते हैं आंसू
वे उस पर करते हैं सवारी
भरते हैं उड़ान उत्तुंग आसमानों में

एक कहता है मैं नहीं गया
मुझे गिना जाए त्यागियों में
एक कहता है मैं चला गया
मुझे गिना जाए भागियों में

एक आसमान से गिरा रहा था सूचियां
हिन्दी पट्टी के सूखे मैदानों पर

हिन्दी के एक नए शेख ने
बना रखा था सरकारी कमेटियों का हरम
एक से निकलकर
दूसरे में जाता हुआ

एक मूल में नष्ट हो रहा था
दूसरा ब्याज में और तीसरा लिहाज़ में

एक चिल्लाता था
मैं जीवन भर होता रहा अपमानित
अब मुझे भी किया जाए सम्मानित

एक कहता था
मुझे दे दिया जाए सारा पैसा
मैं उसका डॉलर में अनुवाद करूंगा
एक कहता था नहीं
सिर्फ मैं ही बजा सकता हूं
यह असाध्य वीणा

एक साम्राज्यवादी
एक सम्प्रदायवादी के गले में
फूल-मालाएं डाल रहा था
एक स्त्री किसी निर्दोष के रक्त से
करती थी विज्ञप्तियों पर हस्ताक्षर

यह एक अजीब शामिल बाजा था
जिसमें एक बाजारू गायक
अश्लील भजन गा रहा था

एक सम्पादक
विदेश राज्य मन्त्री के जूते में
निर्जनता ढूंढ रहा था
एक पत्रकार का
शास्त्री भवन की एक दराज़ में
स्थाई निवास था

एक कहता था मैं इतालवी में मरूंगा
एक स्पेनिश में अप्रासंगिक होना चाहता था
एक किसी लुप्त प्राय भाषा के पीछे
छिपता फिरता था

एक रूठ गया था
एक को मनाया जा रहा था
एक आचार्य जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
में कराह रहा था
एक मसखरा
मुक्तिबोध पर व्याख्यान दे रहा था

 एक मृतक

ब्रिटिश एअरवेज़ के पंखों से लिपटा हुआ था

दूसरा मृतक
भविष्य में होने वाली
सभी गोष्ठियों की अध्यक्षता कर चुका था
एक आत्मा
आगामी बरसों के
सभी प्रतिनिधि मण्डलों में घुसी हुई थी

यह भूमण्डलीकरण का अजब नज़ारा था कि
सोहो के एक भड़कीले वेश्यालय में
हिन्दी का लंगोट लटक रहा था

और दूर पूरब में
और धुर रेगिस्तान के किसी गांव में
जन्म लेता हुआ बच्चा
जिस भाषा में तुतलाता था
उसे हिन्दी कहा जाता था

कहां खो गया प्रतिरोध !
क्या भविष्य में सिर्फ़
भिखारियों के काम आएगी
यह महान भाषा !

इसी भाषा में एक कवि
दो टूक कलेजे के करता पछताता
लिखता जाता था कविता
और फाड़ता जाता था।

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Bicycle-thieves's Poster

Bicycle-thieves’s Poster

साइकिल की कहानी

यह मनुष्य से भी अधिक मानवीय है
चलती हुई कोई उम्मीद
ठहरी हुई एक संभावना
उड़ती हुई पतंग की अंगुलियों की ठुमक
और पांवों में चपलता का अलिखित आख्यान
इसे इसकी छाया से भी पहचाना जा सकता है

मूषक पर गणेश
बैल पर शिवजी
सिंह पर दुर्गा
मयूर पर कार्तिक
हाथी पर इन्द्र
हंस पर सरस्वती
उल्लू पर लक्ष्मी
भैंसे पर यमराज
बी. एम. डब्ल्यू पर महाजन
विमान पर राष्ट्राध्यक्ष
गधे पर मुल्ला नसरूद्दीन
रेलगाड़ी पर भीड़
लेकिन साइकिल पर हर बार कोई मनुष्य

कोई हारा-थका मजदूर
स्कूल जाता बच्चा
या फिर पटना की सड़कों पर
जनकवि लालधुआं की पत्नी
कैरियर पर सिलाई मशीन बांधे हुए
साइकिल अकेली सवारी है दुनिया में
जो किसी देवता की नहीं है

साइकिल का कोई शोकगीत नहीं हो सकता
वह जीवन की तरफ दौड़ती हुई अकेली
मशीन है मनुष्य और मशीन की यह सबसे प्राचीन
दोस्ती है जिसे कविता में लिखा पंजाबी कवि
अमरजीत चंदन ने और सिनेमा में दिखाया
वित्तोरिया देसीका ने ’बाइसिकल थीफ’ में

गरीबी यातना और अपमान की जिन
अंधेरी और तंग गलियों में
मनुष्यता रहती है
वहां तक सिर्फ साइकिल जा सकती है
घटना-स्थल पर पायी गयी सिर्फ इस बात से
हम इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकते कि
साइकिल का इस्तेमाल मनुष्यता के विरोध में
किया गया जब लाशें उठा ली गयी थीं
और बारूद का धुआं छट गया था तब

साइकिल के दो चमकते हुए चक्के सड़क के
बीचों-बीच पड़े हुए थे घंटी बहुत दूर
जा गिरी थी और वह टिफिन कैरियर जिसमें
रोटी की जगह बम रखा हुआ था कहीं
खलाओं में खो गया था।

एक साइकिल की कहानी
अंततः एक मनुष्य की कहानी है !

कृष्ण कल्पित

कृष्ण कल्पित

अपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं।  अभी  हाल ही में बाग़-ए-बेदिल नाम से  एक विलक्षण  और विशाल  काव्य-संकलन  प्रकाशित । आवारगी का काव्यशास्त्र  इसी संकलन  की भूमिका है। 

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3 thoughts on “विश्व हिन्दी सम्मेलन और साइकिल की कहानी: कृष्ण कल्पित

  1. sandhya on said:

    बेमिसाल कविताएँ… /

  2. seema vijay on said:

    adbhut hai …

  3. arpan kumar on said:

    दोनों ही कविताएँ अपने सशक्त व्यंजना -बोध के लिए याद की जाएंगी। अवसरवाद और विलासिता के प्रतिरोध में रचित मनुष्यता और रागात्मकता के पक्ष में रचित कविताएँ।

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