मो0 इकबाल- पाँव बीसवीं सदी में और सिर मध्ययुग में: अशोक कुमार

 भारत का आम आदमी मो0 अल्लामा इकबाल को “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दूस्ताँ हमारा” गीत से पहचानता है। यह गीत भारत का एक राष्ट्रीय गीत है जो हमेशा नहीं तो हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को बच्चों के हर स्कूल में लाउडस्पीकर पर सुनायी दे जाता है। इस लिहाज से मो0 इकबाल भारत के एक राष्ट्रीय कवि ठहरे। वे हिन्दुस्तान में पैदा हुए (9 नवम्बर 1877) और यहीं दिवंगत हुए (21 अप्रैल 1938)। लेकिन वे पाकिस्तान के आधिकारिक रूप में राष्ट्रीय कवि हैं। वहां उनका जन्म दिन सरकारी छुट्टी का दिन होता है। इतना ही नहीं, उन्हें वहां मुफाखिर-ए-पाकिस्तान और हकीम-उ-उम्मत जैसे खिताबों से भी नवाजा गया है। इकबाल के व्यक्तित्व और कर्म को लेकर उनके पक्ष-विपक्ष में कई सही-गलत धारणाएं और मत-मतान्तरों का बाजार गर्म रहा है। उदाहरण के लिए, मो0 वजीहुद्दीन को पढे़-लिखे भारतवासियों से शिकायत है कि उनका स्मृति-लोप हो गया है और उस इकबाल को जिन्होने राम को इमामे हिन्द की पदवी दी थी भारत के एक वर्ग में अछूत माना जा रहा है। वे कहतें हैं कि अनभिज्ञता तथा इतिहास में हेरफेर ने इन लोगों को दिग्भ्रमित कर दिया है और वे मानने लगे हैं कि एक महान देशभक्त (इकबाल) धर्मान्ध हो गया। रफीक जकारिया का भी कुछ ऐसा ही ख्याल है। अपनी किताब “इकबालः कवि और राजनीतिज्ञ” में वे कहते हैं कि जहां फैज और साहिर जैसे शायरों केा भारत में लोकप्रियता मिली, वहीं इकबाल को वो दर्जा नहीं मिला बावजूद इसके कि उन्होंनें “सारे जहाँ से अच्छा” गीत लिखा। जकारिया इकबाल की तुलना रवीन्द्रनाथ टैगोर से करतें हैं और जोर देकर कहते हैं कि इकबाल कट्टरता से दूर थे क्योंकि उन्होनें तो राम, कृष्ण, विश्वामित्र, भर्तृहरि जैसे अवतारों और ऋृषियों और संतो पर भी नज्में लिखीं। वे खासतौर पर इकबाल के “नया शिवाला” की भी याद दिलाते हैं। अली सरदार जाफरी इकबाल को महान क्रांतिकारी शायर/कवि मानते हैं। कुछ बुद्धिजीवियों का यह भी कहना है कि माना कि इकबाल के नैतिक और राजनीतिक आदर्श दकियानूसी थे, लेकिन हमें उन्हें महान शायर होने के नाते सलाम करना चाहिए। दूसरी ओर, वेल्स में बसे पाकिस्तानी लेखक अनवर शेख का कहना है कि इकबाल पहले दर्जे के धर्मान्ध व्यक्ति थे। उनके लफ्जों में “जब भी मैं इकबालिज्म पर नजर डालता हूँ मुझे एक राष्ट्र से ठगी करने वाला, राष्ट्र दस्यु दिखाई देता है।”

                इस विषम परिस्थिति में इकबाल के जीवनबोध, उनकी दृष्टि और उनकी तात्विक समझ को समझना जरूरी है क्योंकि ये ही वो पैमाने हैं जिनसे किसी व्यक्ति और उसके साहित्य का वास्तविक आकलन किया जा सकता है; और इसके लिए जरूरी है कि उनके लिखे का, साथ ही थोड़े इतिहास का भी पुनर्पाठ किया जाय और आँखें खोलकर देखा जाय कि वह हमे कहां ले जाता है।  # लेखक 

Muhammad Iqbal

Muhammad Iqbal

मो0 इकबाल, फायरबाख और हम

                इकबाल की प्रारम्भिक नज्मों में भारत के पौराणिक चरित्रों की गाथाएं हैं। उन्हें हम कभी विश्वामित्र से पहाड़ की कंदरा में ज्ञान चर्चा करते पाते हैं, तो कभी गायत्री मंत्र की प्रशंसा करते; कभी वे कृष्ण की गीता की तारीफ करते हैं तो कभी राम की  आरती उतारतें हैं। राम पर लिखी नज्म कुछ यूँ हैः

‘‘लबरेज है शराबे हकीकत से जामेहिंद

सब फलसफीं हैं खिता – ए- मगरिब के रामे हिंद

है राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज

अहले नजर उसको समझते हैं इमामे हिंद

फिर उन्होंने ‘नया शिवाला लिखा जो बाँग-ए-दरा में छपा। इस नज्म की कुछ पंक्तियाँ यूँ हैः

…..पत्थर की मूरतों में समझा है तू खुदा है

खाके वतन का मुझको हर जर्रा देवता है….

….सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्ती

आ एक नया शिवाला इस देश में बना दें ….

…..हर सुबह उठ के गायें मंतर वो मीठे मीठे

सारे पुजारिओं को मय प्रीत की पिला दें….

ये उनकी प्रारम्भिक नज्मों के नमूने हैं जहां इकबाल के हदय के तार  भारत के ईश्वरों अवतारों से जुडे़ दिखाई देते हैं। वे  वेदों की ऋचाओं में भक्ति भाव से डुबकियाँ लगाते नजर आते है।  जो भी हो, उनका वजूद इससमय निःसंदेह पूरी तरह आर्यावर्त की सरजमीन पर टिका नजर आता है।

                1904 में इकबाल ने अपनी सबसे मशहूर नज्म लिखी जिसका नाम था ‘‘तराना-ए-हिंदी’’ । यह तराना 16 अगस्त 1904 को साप्ताहिक पत्रिका ‘‘इत्तिहाद’’ में छपा था जो बाद में बाँग-ए-दरा में भी छपा। इस गीत की हमेशा दुहाई दी जाती है और यह उनकी देशभक्ति और  सर्वधर्म समभाव के सबसे बड़े सबूत के रूप में पेश किया जाता है। मूल तराने में 9 छंद हैं लेकिन भारत में उसका कतरब्योंत कर सिर्फ  चार छंद (पहला, तीसरा, चैथा और छठा) ही सामान्यतः गाये जाते हैं। यह कटा-छंटा गीत (सारे जहाँ से अच्छा…) भारत के राष्ट्रीय गीतों में शुमार है और यहां की मिलिट्री का प्रयाण संगीत भी है। कतरा हुआ भाग यूँ हैं:

गुर्बत में हो अगर हम रहता है दिल वतन में।

समझो वहीं हमें भी दिल है जहाँ हमारा 2

ऐ आब रूद-ए गंगा वो दिन है याद तुझको

उतरा तिरे किनारे जब कारवाँ हमारा । 5

यूनान – ओ- मिस्र-ओ-रूमा सब मिट गये जहाँ से

अब तक मगर है बाकी नाम – ओ- निशां हमारा  7

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

सदिओं रहा हैं दुश्मन दौर-ए-जमां हमारा 8

इकबाल कोई मेहरम अपना नहीं जहाँ में

मालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहा हमारा’’  9

इस कतरन से कुछ सवाल उठते हैं – पहला यह कि पांचवें छंद में गंगा की  बहती धारा को किस कारवाँ की याद दिलायी गयी है?  दूसरा यह कि इस पूरे  गीत में ‘हम’, ‘हमारा’, किनको  इंगित है ? इन सवालों के जवाब इकबाल यहां नहीं देते।

                1905 में इकबाल उच्च शिक्षा के लिए इंगलैण्ड चले जाते हैं और 1908 में  भारत लौटने के बाद 1910 में एक नयी  नज्म ‘‘तराना-ए-मिल्ली ’’ (मिल्लत का तराना) लिखते हैं। यह तराना भी बाँग-ए-दरा में छपा जो बाद में ‘‘कुल्लियात -ए- इकबाल’’ (लाहौरः शेरव गुलाम अली ऐण्ड सन्स पब्लिशर्स, 1973, पृ0 159) में  भी छपा। इकबाल ने यह तराना भी उसी छंद और लय में लिखा  जिसमें पहला तराना लिखा था। वह नया तराना यूँ हैं:

‘‘चीनो अरब हमारा  हिंदूस्ताँ हमारा

मुस्लिम हैं हम वतन हैं सारा जहाँ हमारा

तौहीद की अमानत सीनों में है बाकी

आसां नहीं मिटाना नामों निशां हमारा

दुनिया के तबकदों में पहला वो घर खुदा का

हम उसके पासबां हैं वो पासबां हमारा

तेगों के साये में हम पलकर जवां हुए हैं

खंजर हिलाल का है कौमी निशां हमारा

मगरिब के वादियों में गूँजे अजा हमारी

थमता नहीं था किसी से सैल-ओ रवा हमारा

बातिल से दबनेवाले ऐ आस्मां नहीं हम

सौ बार कर चुका है तू इम्तेहां हमारा

ऐ गुलिस्ताने अंदलुस वो दिन है याद तुझको

था तेरी डालियों में जब आशियां हमारा

ऐ आब- रूद -ए गंगा वो दिन है याद तुझको

उतरा तिरे किनारे जब कारवाँ हमारा

ऐ मौजे दजला तू भी पहचानती हैं हमको

अबतक तेरे दरया अफसाना ख्वा हमारा

ऐ अर्दे पाक तेरी हुरमत पे कट मरे हम

है खू तेरी रगों में अबतक खुआ हमारा

सालारे  कारवाँ है मिरे हिजाज

इस नाम से से है बाकी आरामे जां हमारा

इकबाल का तराना बाँग-ए-दरा हो गया

होता है जादा पामाया फिर कारवां हमारा’’

यहाँ हम पाते है कि इकबाल का काव्य जगत और उनकी अस्मिता  व्यापक हो गई  है। उनकी अस्मिता राष्ट्रीय से अन्तर्राष्ट्रीय हो गयी है। वे इस्लाम के अतीत के गौरव को याद करते हुए हिंदुस्तान की तंग गलियों से निकल सेन्ट्रल एशिया, अरब और स्पेन के गुलिस्तानों से होते हुए टिग्रिस की मौजो में तैरते हुए मिरे हिजाज में आरामें जां होते है। जो सवाल उन्होंने तराना-ए-हिंदी में गंगा से पूछा था उसका जवाब भी वे यहां दे देते हैं- सालारे कारवां है मिरे हिजाज (मुहम्मद) और यह भी पता लगता है कि वह ‘हम’  हिंदुस्तान के सारे लोग नहीं, कुछ अपने लोग हैं। अन्त में वे ऐलान भी कर देते है कि वह कारवां अभी थमा नहीं हैं। विडम्वना यह है कि ज्यों ज्यों उनका काव्य लोक और उनकी अस्मिता  विस्तृत  होती जाती है,  त्यों त्यों वह संकीर्ण और खंडित या द्विखंडित होती नजर आती है। वे एक अति से दूसरे अति पर छलांग लगाते हैं। 1904 के पहले की नज्मों में उनका प्रेरणा स्रोत पुराण था, अब कुरान है।हिंदुस्तान इस तराने में उनका स्थायी निवास नहीं, अस्थायी पड़ाव जैसा दिखता है। लेकिन सबसे बड़ी ताज्जुब की बात तो यह है कि भारत ने कैसे तराना-ए-हिंदी को  अपना एक राष्ट्रीय गीत स्वीकार लिया (वेसे संशोधित रूप में भी यह बहुत ही बड़बोला गीत है)।

                ‘‘तराना-ए-मिल्ली’’ कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह इकबाल के जीवन दर्शन की उपज है,ं उसका परावर्तन है,उनका कायांतरण है। 1908 में लाहौर में अंग्रेजी में दिये उनके पहले व्याख्यान ‘‘इस्लाम-ऐन एथिकल एण्ड पालिटिकल आइडियल’’ (लाहौर, ओरिऐनटैलिया 1955, प0 53-101) को पढ़ने से तो यही पता चलता है। उस व्याख्यान का संक्षेप यह हैः

                किसी भी मजहबी व्यवस्था को जांचने के तीन दृष्टिकोण हैं: 1. एक शिक्षक का दृष्टिकोण 2. एक प्रतिपादक का दृष्टिकोण 3. एक आलोचक विद्यार्थी का दृष्टिकोण आलोचक विधार्थी अपनी विषय वस्तु के पास सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर पहुचता है, और किसी मजहबी व्यवस्था के सभी अंगों की प्रकृति को समझने की कोशिश करता है जैसे कोई जीव विज्ञानी किसी जीव का या कोई भूगर्भ-विज्ञानी किसी खनिज का अध्ययन करता है।  वह अपने विषय को इतिहास की दृष्टि से देखता है और उस व्यवस्था की उत्पत्ति तथा विकास के बारे में मूलभूत प्रश्न खड़े करता है। मैं एक आलोचक विद्यार्थी के दृष्टिकोण  से इस्लाम की व्यवस्था को जाचूँगा…इल्हाम (रेविलेशन) एक तथ्य (फैक्ट) है जो इस्लाम का अन्तिम आधार है।

                यह बात गौर करने की है कि विषय प्रवेश से पहले ही इकबाल का विद्यार्थी इस्लाम की उत्पत्ति और विकास के मूलभूत प्रश्न को स्वयंसिद्ध मान लेता है।  विद्यार्थी को जिस आधार वाक्य की जाँच करनी थी, वह अगर तथ्य (फैक्ट) हैं, प्रस्थान बिन्दु  है- तो फिर लक्ष्य बिन्दु क्या होगा, यह आसानी से समझा जा सकता है। विद्यार्थी यहां इतिहास की दृष्टि से, आलोचनात्मक दृष्टि से विषय प्रवेश नहीं करता बल्कि एक आस्थावान के नजरिए से विषय प्रवेश करता है। इल्हाम के अन्तर्विरोध के बारे में उसके अन्दर कोई पृच्छा नहीं है। आधुनिक भौतिकवाद के जनक लुडविग फायरवाख (दि एसेन्स आफ क्रिस्टिऐनिटी, डोवर पब्लिकेशंस न्यूयार्क, पृ0 169-175) इल्हाम के तथाकथित तथ्य के  अन्तर्विरोध के बारे में कहते है,

                तथ्य (फैक्ट) ऐसा अस्तित्व है जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता, न उसकी आलोचना की जा सकती है। तथ्य एक कायिक उपस्थिति है, मान्यता नहीं है, दलील नहीं है। तथ्य वह सब कुछ है जिसपर संदेह नहीं किया जाता-क्योंकि उसपर संदेह नहीं किया जाता। इल्हाम (देववाणी) का तथ्य ऐसा ही तथ्य है। और इस तथ्य से इन्कार करना, या उस पर संदेह करना गुनाह है, और इसीलिए मजहब में इसके लिए सजा है। लेकिन क्या वह (तथाकथित) तथ्य निरपेक्ष हैं? क्योंकि ऐसे तथ्य तो हर मजहब में हैं, और वे सभी एक दूसरे के विरोध में हैं, और तथ्य अन्तर्विरोधी नहीं होते है। इल्हाम में आस्था एक बालसुलम विश्वास है और तभी तक आदर योग्य है जबतक यह बालसुलम है । अल्लाह की वाणी सुस्पष्ट वाणी है। अल्लाह ने फलां ईस्वी सन् में अपने आप को सदा के लिए प्रकटित किया और वह भी सार्वभौम और सर्वकालिक मनुष्य के सामने  नहीं, पूरी मानवजाति के सामने नहीं, बल्कि सीमित लोगों के सामने (वह भी निज एकांत में )। किसी खास समय और स्थान में बोली गयी देववाणी (इल्हाम) हर हाल में लिखाई में जड़ दी जानी चाहिए ताकि उनके शब्द अक्षुण्ण रूप में संचारित हो सकें । अगर उनकी इच्छा के बिना एक पत्ता तक नहीं खड़कता, फिर कैसे वे अपने शब्द-वे शब्द जिनपर मानव जाति का शाश्वत उद्धार निर्भर है, अल्पवुद्धि कातिबों के भरोसे छोड़ सकते थे? उन्होंने अपने शब्दों को डिक्टेट क्यों नहीं किया ताकि उनके विरूपण और हेरफेर की सारी सम्भावना ही खत्म हो जाए ?

                अब आगे इकबाल आस्थावान छात्र से शिक्षक और धर्मप्रचारक होते जाते है। वे कहते हैं: अब निश्चित रूप से जो भी जन्नत में है और जो भी दोजख में है, सब अल्लाह का है (कुरान 10:66)’’। जो भी इस कायनात में है, वह अल्लाह का है। मनुष्य की मौलिक प्रकृति संकल्प में है, अक्लमंदी और समझदारी में नहीं। हर बच्चा मुस्लिम पैदा होता है। इस्लाम की दृष्टि में सर्वोच्च गुणा है- ईमान जिसका मतलब है ‘‘ हरेक को अल्लाह पर, और कयामत के दिन पर, और देवदूतों पर, और धर्म शास्त्रों पर, और पैगम्बरों पर आस्था रखनी चाहिए (कुरान 2:177)

                अक्लमंदी और समझदारी के बिना संकल्प एक पतवार  विहीन नौका के समान है। लेकिन यह भी सच है कि कमअक्लों की पतवार तो अक्लमंद धर्मसंस्थापक और प्रचारक के हाथ में होती है! सभी शास्त्र और देवदूत नैतिकता के अन्तर्विरोध में खडे़ हैं और एक दूसरे से तथा अपने  आप से अन्तर्विरोध में खडे़ हैं।  प्रकृति प्रदत्त हमारा बुद्धि -विवेक और हमारी समझदारी आस्था का वाचडॉग नहीं हो सकती। वह किसी पैगम्बर का मुहाफिज नहीं,  रक्षक नहीं, उसका परीक्षक है (फायरबाख)।

                अब इकबाल इस्लाम के नैतिक और राजनीतिक आदर्शे के बारे में बताते हैः

                ऐसी शिक्षा जो एक खास तरह के चरित्र निर्माण में सहायक न हो किसी काम की नहीं ।  सही कौमी (नेशनल) चरित्र के लिए आपको सही कौमी शिक्षा की जरूरत है। मैं बेझिझक कह सकता हूँ कि इस देश में शिक्षा की आधुनिक पद्धति हमारी कौमी विशिष्टता पर खरा नहीं उतरती। यह गैर इस्लामी चरित्र का निर्माण करती है। यह पद्धति हिन्दुओं के लिए भी सही नहीं हैं।

इस बिन्दु पर दो धर्मान्ध समानान्तर रेखाएं (मुल्ला और बरहमन) मिल जाती हैं।

                इकबाल आगे कहते है: कहा गया है कि इस्लाम ऐसा मजहब है जिसमें युद्ध अन्तर्निहित है। अब इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि युद्ध एक कौम की उर्जा को व्यक्त करता है। लेकिन कुंरान फसाद जैसी बुराई को बर्दास्त नहीं करता। पुराने जमाने में और आज भी गुप्त बैठकें सामाजिक और राजनीतिक उथलपुथल की स्रोत रही  हैं । ऐसी बैठकों के बारें में कुरान का कहना है, ‘‘अगर तुम बातें करते हो तो पाप और विद्रोह के लिए मत करों।’’इस्लाम का आदर्श हैं- हर कीमत पर शांति । ‘‘ अगर तुमने एक आदमी का अनुयायी बनना स्वीकार कर लिया है, तब अगर दूसरा आदमी आता है और तुम्हारे मनोबल को कमजोर करने की कोशिश करता है तो उसका कत्ल कर दो।’’ .भारतीय मुसलमान कहने में शाब्दिक अन्तर्विरोध है, क्योंकि इस्लाम अपने सार रूप में दिक् अैर काल की परिस्थितिओें से ऊपर है।हमारे लिए राष्ट्रीयता का कोई भौगोलिक आधार नहीं है। लेकिन जहां तक एक औसत दर्जे का आदमी राष्ट्रीयता के भौतिक केन्द्र की मांग करता है, तो मुसलमान उसे मक्का के मुक्कदस शहर में ढूंढता है। इस देश के मुसलमान एक बार फिर एक महान ओजस्वी सम्पूर्ण इकाई में संगठित हो जाएं।

                तराना-ए-मिल्ली को इकबाल के इस व्याख्यान में निहित सोच का काव्यांतरण कहा जा सकता है। सच तो यह है कि इस कायनात में कुछ भी दिक् और काल की परिस्थितिओं से ऊपर नहीं। हर धर्म की तरह इस्लाम भी किसी खास दिक् और काल की पैदाइश है। कौम (राष्ट्र) एक भूभाग पर रहनेवाले लोगों, उनकी समान भाषा और संस्कृति से बनती है, मजहब उसका आधार नहीं होता। वह भी दिक् और काल में परिसीमित होता है। जैसे कि सिर्फ एक संप्रदाय का होने से ही ईसाईयों या हिन्दुओं की अलग-अलग कौमें नहीं बन जाती उसी तरह अरब, तुर्क, इरानी, इराकी सब पृथक कौमें हैं बावजूद इसके कि वे सभी मुसलमान हैं। किसी समरूप इकाई की तरह मुसलमान  कोई एक कौम नहीं होता। अगर गुप्त बैठके न होती तो दुनियाँ में कोई क्रांति न होती। हर कीमत पर शांति तो निश्चित रूप से अवाम की कीमत पर ही होगी। तानाशाह की कीमत पर तो हरगिज नहीं। क्योंकि तब तो वह फसाद होगा जिसकी इकबाल के द्वारा मनाही है। जहां तक नैतिकता की बात है किसी भी नैतिकता और किसी भी राजनीति का स्रोत मजहब नहीं हो सकता, हम इनकी बागडोर किसी ईश्वर के हाथ में नहीं सोंप सकते। इन्हें ईश्वर के हाथ में सौंपने का मतलब है बुद्धि विवेक ओर तर्क की कसौटी से उन्हें दूर कर देना। हमें राजनीतिक अधिकार की  किसी ईसाई नियमावली की जरूरत नहीं हमें सिर्फ उसकी जरूरत है जो बुद्धिसंगत, न्यायसंगत और मानवीय हो। अगर ऐसा नहीं होता है तो नैतिकता किसी मजहब की निराधार मनमानिओं के आगे घुटने टेकने के लिए अभिशप्त है’’ (फायरबाख)।

                समय के साथ इकबाल के राजनीतिक आदर्श में फिर एक नयी तब्दीली आती है। इस्लाम, जो समय और स्थान से परे था, 1930 तक आते आते एक छोटे स्थान में सिमट जाता है। इस तब्दीली को समझने के लिए उनके उस व्याख्यान को पढना जरूरी है जो उन्होनें 1930 मंे इलाहाबाद में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के सत्र में अध्यक्ष की कुर्सी से अंग्रेजी में दिया था। वह व्याख्यान (ग्रेट स्पीचेज आफ माडर्न इंडिया, रैंडम हाउस इंडिया, नयी दिल्ली, पृ0 118-142) संक्षेप में यह है,

                इस सत्र को संबोधित करने के लिए आपने ऐसे आदमी को चुना है जिसका विश्वास है कि व्यक्तियों और राज्यों के जीवन में मजहब का चरम महत्व है। इस समस्या के उचित समाधान पर ही भारत में एक अलग सांस्कृतिक इकाई के रूप में आपका भविष्य निर्भर करता है। क्या मजहब एक निजी मामला है? क्या आप इस्लाम का वही हस्र देखना चाहेंगे जो यूरोप मंे ईसाई धर्म का हुआ है? क्या यह सम्भव है कि इस्लाम को सिर्फ नैतिक आदर्श के रूप में स्वीकार किया जाय और इसके राजनीतिक आदर्श को त्याग दिया जाय? यह दलील कि मजहब निजी अनुभूति है, एक यूरोपियन के जुबान पर शोभा देती है। पैगम्बर का मजहबी तजरूबा इससे एकदम अलग है। इसलिए वैसी राजनीति जो राष्ट्रवाद से प्रेरित हो लेकिन जिसमें एकता का इस्लामी सिद्धान्त न हो, एक मुस्लिम के लिए कल्पनातीत है। मेरे दिल में दूसरे समुदायों के लिए बहुत कद्र है। फिर भी मै उस सम्प्रदाय को प्यार करता हूँ जो मेरे जीवन और व्यवहार का स्रोत है; और जिसने मुझे अपना मजहब, अपना साहित्य, अपनी विचारधारा, अपनी संस्कृति देकर मेरे स्व का निर्माण किया है, और इसतरह मेरे मौजूदा चेतन में जीवित और सक्रिय तत्व के रूप में अपने सम्पूर्ण अतीत का पुनर्सृजन किया है।……….भारत जैसे देश में एक सुसंगत सम्पूर्णता के निर्माण के लिए साम्प्रदायिकता अपरिहार्य है। साम्प्रदायिक टोलियों की मान्यता के बगैर यूरोपीय जनतंत्र का सिद्धांत भारत में लागू नहीं किया जा सकता। अतः भारत में मुस्लिम भारत की मुस्लिम मांग पूरी तरह न्यायसंगत है। मैं पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत, सिंध और बलुचिस्तान का एक राज्य में विलयन देखना चाहता हूँ। ब्रितानी साम्राज्य के अन्दर या ब्रितानी साम्राज्य के बाहर स्वशासन ही मुसलमानों का अंतिम मुक्कदर है। इस देश में इस्लाम की जिंदगी एक सांस्कृतिक ताकत के रूप में एक विशिष्ट भू-भाग में उसके केन्द्रीकरण पर निर्भर करती है। हम 7 करोड़ लोग हैं और भारत के अन्य समुदायों की तुलना में कहीं अधिक समरूप हैं। सचमुच  आधुनिक अर्थ में मुसलमान ही हैं जिन्हें सही मायने में एक कौम (नेशन) कहा जा सकता है। मैं एक बात खुलकर कह देना चाहता हूँ कि भारत के मुसलमान दो बुराइओं से ग्रस्त हैं। पहली बुराई है- व्यक्तित्वों का अभाव। दूसरी यह है कि यह समुदाय हर्ड इन्सटिंक्ट (ढोरवृत्ति) को तेजी से खोता जा रहा है। पहली बुराई का इलाज हमारे हाथ में नहीं; लेकिन दूसरी का इलाज मुमकिन है।     

                इस धिक्कार के साथ इकबाल अपना व्याख्यान खत्म करते हैं। एक जमाना था जब पूरा हिन्दूस्तान इकबाल के लिए अपनी कौम था, फिर वह सकल विश्व मे पसर गया जिसकी राजधानी मक्का हो गयी, और फिर वह भारत के कुछ विशिष्ट भू-भाग में सिमट गया जो भारत की सरहद के बाहर भी हो तो हर्ज नहीं। अब सिर्फ 7 करोड़ लोग ही अपने रह गये थे, एक “कौम” रह गये थे। उन्होनें अपनी “कौम” का, अपने स्वप्न टोले  का मनचाहा नक्शा भी खींच दिया। बिना सोचे कि एक बलूच, एक सिंधी, एक पंजाबी, एक बंगाली, एक बिहारी, एक मलयाली………..की संस्कृतियाँ अलग अलग है, चाहे उनका मजहब कुछ भी हो; वैसे ही जैसे  एक अरब मुसलमान, एक सुडानी मुसलमान, एक फ्रेंच मुसलमान की संस्कृतियों- जीवन पद्धतिओं में भी कोई समानता नहीं होती। ऐसा नहीं कि इकबाल की इस भ्रांत धारणा का विरोध नहीं हुआ। मौलाना हुसैन अहमद मदानी और अबुल कलाम आजाद (इंडिया विन्स फ्रीडम) जैसों ने उनका खंडन किया और अपने तर्कों और तथ्यों से साबित किया कि मुसलमान नामकी कोई पृथक राष्ट्रीयता (कौम) नहीं होती लेकिन उनकी एक न चली। एक पटु वितण्डावादी के गीत के आगे विवेकशीलों का गद्य हार गया और इकबाल ने साबित कर दिया कि सत्य की हमेशा विजय नहीं होती (इतिहास में ऐसा पहली और आखिरी बार नहीं हुआ है)। इंतहा हो जाती है जब एक समय इंसान की “मौलिक प्रकृति-संकल्प शक्ति” की दुहाई देने वाला “महान  क्रांतिकारी कवि” ढोर वृत्ति का आह्वान करने लगता है।

                अन्त में हम उनके कुछ खतों को पढ़ें जो उन्होने जिन्ना को अंग्रेजी में लिखे थे।

                ‘28 मई 1937

                मुझे जरा भी शक नहीं कि जहां तक मुस्लिम भारत की बात है, आप हालात की नजाकत को पूरी तरह समझते हैं। एक आजाद मुस्लिम राज्य के बिना इस्लाम की शरीयत का पालन इस देश मे नामुमकिन है। अगर ऐसी कोई चीज भारत में असम्भव है तो गृहयुद्ध ही एकमात्र रास्ता है जो सच पूछें तो कुछ समय से हिन्दू-मुस्लिम दंगों की शक्ल में धटता दिखाई दे रहा है। मुस्लिम भारत के मसले के हल के लिए देश का पुनर्बंटन जरूरी है। शायद यह करारा जवाब होगा जो आप नेहरू के नास्तिकतावादी समाजवाद को दे सकते हैं।’

                ‘21 जून 1937

                आपके पत्र के लिए शुक्रिया।………..आज भारत में सिर्फ आप ही एक मुसलमान हैं जिनकी ओर मुस्लिम समुदाय महफूज अगुआई के लिए आशा भरी नजरों से देख रहा है। मैं कह दूँ, हम सचमुच एक गृहयुद्ध के हालात में जी रहे हैं जो फौरन हर तरफ फैल सकता है अगर पुलिस और मिलिट्री न होती। इधर कुछ महीनों से भारत में हिन्दू-मुस्लिम दंगों का सिलसिला चल रहा है। सिर्फ उत्तर-पश्चिम भारत मेें ही कम से कम तीन दंगे हुए हैं और पैगम्बर की निंदा के कम से कम चार वारदात हुए हैं। हरेक वारदात में निंदक की हत्या कर दी गयी है।……….मेरे ख्याल में नये भारतीय संविधान में एकल भारतीय संघ की जो बात है वह एकदम निराशा जनक है। मुस्लिम प्रांतों का एक अलग संघ ही एकमात्र विकल्प है जिसके द्वारा हम मुसलमानों को गैर मुसलमानों के प्रभुत्व से बचा सकते हैं। उत्तर पश्चिम भारत और बंगाल के मुसलमानों को क्यों  नहीं एक कौम समझा जाए जिन्हें आत्म निर्णय का अधिकार हो ?’

                                अबतक के परिदृश्य से इकबाल के पाँव बीसवीं सदी में और उनका सिर मध्ययुग में दिखाई देता है।

                                इकबाल ने अपने मानस पुत्र का नामकरण नहीं किया था। उनकी मुस्लिम लीग ने वह कर दिया उनकी मृत्यु के दो साल बाद 23 मार्च 1940 को लाहौर के मिन्टो पार्क में आयोजित सम्मेलन में। पाकिस्तान नामकी एक ‘‘मुस्लिम कौम’’ का उद्घोष हुआ जिसकी भौगोलिक सीमा वही थी जैसा मुफाखिर-ए-पाकिस्तान’’ ने सुझाया था। उस उद्घोष को करारदाद-ए-लाहौर कहा गया । उनकी प्रशस्ति में मिन्टो पार्क अब इकबाल पार्क हो गया है। उस ‘‘कौम’’ से बंगाली कौम बाहर निकल गयी है, कई और कौमें उनके नक्शे कदम पर चलने को आतुर हैं।

इकबाल को इतना पढ़ने के बाद उनके जीवनबोध, उनकी दृष्टि और  तात्विक समझ के बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं रह जाती, खुद इकबाल ने सारा कुछ कह दिया है।

छंदो की छटा और विशेषणों-रूपकालंकारों के  चातुर्य से जीवनबोध की सांघातिकता, दृष्टि की संकीर्णता और तात्विक समझ के अभाव की क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती।

अशोक कुमार

अशोक कुमार

 

अशोक कुमार कम्युनिस्ट आंदोलन से गहरे रूप से जुड़े रहे हैं। मार्क्सवादी दर्शन-साहित्य के अद्भुत अध्येता। फिलहाल  सिविल कोर्ट, गया,  बिहार में अधिवक्ता। गया के ही शास्त्री नगर कॉलोनी में रहते हैं। इनसे +919973046066 और ashokjpn@gmail.com पर संपर्क संभव है। 

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One thought on “मो0 इकबाल- पाँव बीसवीं सदी में और सिर मध्ययुग में: अशोक कुमार

  1. मिलिन्द रोंघे on said:

    सही जानकारी, खेद का विषय है कि इकबाल को आज भी हिंदू मुस्लिम एकता का दूत समझा जाता है ।

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