अज्ञेय ‘ईगोइस्ट’ हैं AKA बूर्ज्वा संस्कृति अज्ञेय का फ़िनिश्ड प्रॉडक्ट है: मलयज

By Malyaj 

  • वीरेंद्रकुमार जैन पर लिखी श्रीराम वर्मा की समीक्षा से-
    “अज्ञेय की नारियां पुरुष में लीन होती हैं, उन्हीं से सार्थक होती हैं, उन्हीं से सम्पूर्ण होती हैं, यद्यपि वे पृथक सत्ता होती हैं, पर पुरुष उनसे उच्च और वयस्क होता है। अज्ञेय की देह और विवेक दोनों से पुरुष सहचरी बनकर पूर्ण होती हैं। आकर्षण और अनाकर्षण, उनमें दोनों होता है।” विकल्प-7:1975। 14 मार्च से 21 मार्च 1976

    मलयज

    मलयज

  • बूर्ज्वा संस्कृति- अज्ञेय और उनके जैसे सोचनेवालों का फ़िनिश्ड प्रॉडक्ट है। उनकी मंजिल। इसमें देशी तत्वों-राष्ट्रीय तत्वों का भी इस्तेमाल करते हैं, विदेशी तत्वों का भी, पर उनके कारखाने से जो माल तैयार होकर निकलेगा वह अंततः बूर्ज्वा संस्कृति का परिष्कृत सुसंस्कृत माल ही होगा। 21 अप्रैल, 1978
  • कल शाम शमशेर जी के यहाँ। बाहर निखरई खाट पर बैठे थे। बातों-बातों में भुवनेश्वर का जिक्र आने पर बोले मैं भुवनेश्वर को अज्ञेय से ज्यादा प्रतिभाशाली मानता हूँ और अगर उनमें सुपर बोहेमियनिज़्म और निहिलिज्म न होता तो उनकी प्रतिभा निराला के स्तर की होती। अपने तमाम aberrations के बावजूद भुवनेश्वर पसंद हैं। 19 अगस्त, 1978
  • कल शाह(रमेशचन्द्र) के साथ अज्ञेय के यहाँ निज़ामुद्दीन में। एक घंटे वहाँ रहे। अज्ञेय ने मुझसे एक शब्द तक नहीं कहा। शाह बहुत लिहाज दिखाते हुये उनके साथ पेश आ रहे थे। स्वर को प्रयत्नपूर्वक मुलायम और संयत बनाते हुये। मुझसे लगभग लगे हुये ही ये दो सज्जन बैठे थे, पर इनके वार्तालाप का कोई भी अंश पूर्ण रूप से सुन पाना असंभव था। लगता था दोनों में होड़ है कि कौन ज्यादा मद्ध्म स्वर में स्वर को बस फुसफुसाहट से बचाते हुये कितने धीमे बोल सकता है। मुझे अपने आप पर गुस्सा आता रहा कि मैं क्यों वहाँ गया। क्या जरूरत थी मुझे जाने की?
    शाह के अंदर-सांस्कृतिक वैभव की जरूरतें कहीं-कहीं एक आत्महीनता का बिन्दु है जो उन्हें बार-बार अज्ञेय के निकट, उनके प्रभामंडलके निकट, ले जाता है। अज्ञेय इस आत्महीनता का लाभ एक होशियार खिलाड़ी की तरह अपने पक्ष में कर रहे हैं। शाह को इस गुप्त खेल का पता नहीं। पिछले दिनों जब अज्ञेय मेरे दफ्तर में चंद मिनटों के लिए आए थे तभी से मेरे मन में था कि मैं उनसे मिलुंगा। अज्ञेय के बारे में सुन-सुन कर ऐसा लगा था कि वे पहले की अपेक्षा लोगों से उतने रिजर्व नहीं रहते। पर शायद यह भ्रम था। अज्ञेय के मूल स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आया है। मैं भक्त की हैसियत से उनके पास नहीं गया था, मेरे पास उनके विरुद्ध वे सारे तर्क थे जो मैंने पिछले दिनों में अर्जित किए थे। शायद अज्ञेय को इसका पता हो। मुझे यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि अज्ञेय व्यक्ति के रूप में राग-द्वेष से ऊपर हैं और अपने विरोधी की उपेक्षा नहीं करेंगे। उन्होंने जानते-बूझते हुए मेरी उपस्थिती को मानने से ही इंकार किया। 18 जून, 1979
  • आज दोपहर शाह (रमेशचन्द्र) से बातचीत। अज्ञेय की नव-प्रकाशित ‘शाश्वती’ में उर्दू कविता पर अज्ञेय के विचारों को लेकर। समूचे उर्दू राग को अज्ञेय इतना हीन मानते हैं कि इसे ब्रजभाषा में चंद पदों के बराबर भी रखने को तैयार नहीं! इतनी अनर्गल विचार की अपेक्षा अज्ञेय से नहीं की थी। क्या वे सचमुच सठिया ही गए हैं?
    अज्ञेय शमशेर की कविता की भाषा को हिन्दी भाषा-संस्कार से हीन मानते हैं। पर यह हिन्दी भाषा का संस्कार क्या है इसे उन्होंने साफ नहीं किया। भाषा-संस्कार संस्कृत वाला या अंग्रेजी प्रभाव वाला? हिन्दी भाषा के तीसरे रूप- जिसमें उर्दू हिन्दी का गंगा जमुनी रूप अज्ञेय शायद स्वीकार नहीं करते। हिन्दी के एक रूप में क्या उर्दू की धारा घुली मिली नहीं है! भारतेन्दु और प्रेमचंद इनकी भाषा का संस्कार संस्कृत के निकट है या उर्दू के? हिन्दी भाषा के-शाह ने कहा- सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाती है और उसने अबतक की आभिजात्य परंपरा को उलट दिया है। वह परंपरा जो संस्कृत का सेवन पाकर उपजती-बढ़ती चली आ रही थी।
    अज्ञेय हिन्दी को शायद वही आभिजात्य संस्कार देना चाहते हैं। उसे ही वरेण्य मानते हैं। स्वयं उसी आभिजात्य परंपरा से वे जुड़े और भाषा के एक व्यापक अनुभव-वृत से निरंतर कटते चले चले गए। अपनी भाषा-संवेदना में एकाकी द्वीप पर निर्वासित-स्वयं निर्वासित।
    …उर्दू के नाम पर अज्ञेय को सिर्फ उसकी नफासत याद आती है। उसका वह रूप नहीं जो लोगों की जबान बनकर फलता-फूलता है- वह रूप जो हिन्दी का सहज रूप से मित्र नहीं है।…अगर उर्दू की नफासत एक सामाजिक मूल्य की दें है तो संस्कृत-परंपरा और उसका भाषा-संस्कार भी, जिसके अज्ञेय हिमायती हैं- एक खास आभिजात्य-ब्राह्मणवादी सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्य की ही देन है। अगर वह त्याज्य है तो यह किसलिए वरेण्य हो गई?
    अज्ञेय से जन्मी मुलाक़ात के संबंध में शाह ने एक बात बताई कि बातचीत में  अज्ञेय ने शाह के लेखन के बारे में जिज्ञासा नहीं की- न उनके लिखे पर अपनी प्रतिक्रिया ही की। कभी पूछा नहीं कि आजकल क्या लिख-पढ़ रहे हैं-  अज्ञेय हमेशा अपने को बातचीत के केंद्र में रखना चाहते हैं। पूर्वग्रह के पिछले अंक के बारे में इतना ही कहा कि उसमें आपका लेख देखा, अच्छा लगा। पर वह अंक स्वयं शाह पर केन्द्रित है। उसमें उन पर खास सामग्री भी प्रकाशित है इस बारे में एक शब्द भी नहीं। …. अज्ञेय  ‘ईगोइस्ट’ हैं। … तब अज्ञेय के संपर्क में शाह को क्या मिलता है? शाह कभी-कभी खुद से सवाल पुछते हैं। (मलयज की डायरी, खंड-3, पृ- 215-216, तारीख- 17 अक्टूबर, 1979)मलयज की डायरी, खंड-3 से साभार 

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