कार्ल मार्क्स और उनका आदर्श कम्युनिस्ट परिवार

आज  (26 नवंबर )पॉल लाफ़ार्ज और लोरा मार्क्स की 102 वीं पुण्य तिथि है। इसी बहाने मार्क्स और मार्क्स के परिवार को याद करना लाजिमी लग रहा है। कार्ल मार्क्स के जीवन और लेखनी से संदर्भित ऐसी कोई भी बात नहीं है, जो बतौर दस्तावेज उपलब्ध न हो। लेकिन, विचारधारा के प्रति पूर्वाग्रह कभी-कभी व्यक्ति और विचार से जुड़े तथ्यों का मिथकीकरण करता है, इसके उपरांत जो सच्चाई सामने आती है वह तथ्यों के ठीक विपरीत होती है। इस पूरी प्रक्रिया में विरोधी विचारों या व्यक्तियों को ओछा दिखाना ही एकमात्र मकसद होता है।

मार्क्स के बारे में बहुत सारी ‘किंवदंतियाँ ‘पूंजीवादी विचारधारा ने प्रचारित कर रखी हैं। जैसे, मार्क्स का अपने घरेलू नौकरानी से संबंध था, मार्क्स के कारण उनकी बेटियाँ बहुत ही दमघोटू जीवन जीती थीं और इस चलते उन्होंने आत्महत्याएँ कीं। हमारी हिन्दी पट्टी में मार्क्स के बारे में प्रचलित इन ‘किंवदंतियों ‘को तथ्यात्मक रूप से पुष्ट/अपुष्ट करने की चिंता तक नहीं दिखी। मार्क्स की कुल जमा तीन बेटियाँ ही बालिग होकर अपनी ज़िंदगी जी पायीं। उनकी तीनों बेटियाँ जीते-जी कम्यूनिज़्म और इंटरनेशनल के लिए कार्यरत रहीं। यह संयोग ही कहा जा सकता है कि मार्क्स के तीनों दामाद भी कम्युनिस्ट पार्टी में ही थे और एक कम्युनिस्ट समाज के निर्माण में अपने जीवन के अधिकांश हिस्से को झोंक दिये। विश्व कम्युनिस्ट इतिहास में मार्क्स के परिवार  के अलावा शायद ही कोई परिवार नज़र आए जिसकी एक-एक इकाई कम्युनिस्ट आंदोलन का हिस्सा रही हो।tumblr_l3mhmvG97Z1qb9wc5o1_500

मार्क्स की तीनों बेटियों की मृत्यु असामयिक ही कही जाएंगी, यह सच है। मार्क्स की सबसे बड़ी बेटी जेनी मार्क्स, जो खुद एक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता थी, की मृत्यु कैंसर के कारण हुयी।  जेनी के पति पेरिस कम्यून के दिग्गज चार्ल्स लॉन्गवेट थे। मार्क्स की तीसरी बेटी एलिएना मार्क्स सोशल डेमोक्रेटिक फ़ैडरेशन की कार्यकारिणी की सदस्य थी। इनके पति एडवर्ड एवलिंग थे, जो कि सोशलिस्ट लीग और इंडिपेंडेंस लेबर पार्टी के संस्थापक सदस्य थे। एलिएना मार्क्स ने 43 वर्ष की उम्र में आत्महत्या कर ली जब उन्हें पता चला कि एडवर्ड एवलिंग ने चुपके से एक और शादी कर रखी है। इस आत्महत्या को सिर्फ वैवाहिक संबंधों में वफादरी और वेवफ़ाई के तराजू में तौल कर देखना लाजिमी नहीं होगा। साम्यवादी विचारधारा के अंदर trustworthiness एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और एलिएना इसके बिखराव को बर्दाश्त नहीं कर सकी। लोरा मार्क्स कार्ल मार्क्स की दूसरी बेटी थी, जो सबसे बाद तक जीवित रहीं। इनके पति का नाम पॉल लाफ़ार्ज था। पॉल लाफ़ार्ज फ्रेंच क्रांतिकारी, मार्क्सवादी-समाजवादी पत्रकार, साहित्यिक आलोचक, राजनीतिक लेखक के साथ-साथ राजनीतिक कार्यकर्ता भी थे। वे 1866 में फ़्रांस से लंदन आये और फ़र्स्ट इंटरनेशनल के साथ जुड़ गए। इस क्रम में वे मार्क्स के काफी नजदीक हुए। मार्क्स की मृत्यु के बाद लोरा मार्क्स और पॉल लाफ़ार्ज ने साथ मिलकर फ़्रांस में मार्क्सवाद को प्रचारित किया। दोनों ने मार्क्स और एंगेल्स की पुस्तकों को फ्रेंच में अनूदित भी किए। 26 नवंबर 1911 को इस क्रांतिकारी दंपति ने भी आत्महत्या कर ली, यह लोरा मार्क्स और पॉल लाफ़ार्ज का पहले से ही किया हुआ करार था। इन दोनों का मानना था कि इस उम्र में आकर हमारे पास अब ऐसा कुछ भी नहीं है, जो आंदोलन को दे सकें। एक साथ, एक ही समय में एक आत्महत्या-नोट लिखकर दोनों इस संसार से विदा हो लिए। उन्होंने अपने नोट में लिखा-

Healthy in body and mind, I end my life before pitiless old age which has taken from me my pleasures and joys one after another; and which has been stripping me of my physical and mental powers, can paralyse my energy and break my will, making me a burden to myself and to others. For some years I had promised myself not to live beyond 70; and I fixed the exact year for my departure from life. I prepared the method for the execution of our resolution, it was a hypodermic of cyanide acid. I die with the supreme joy of knowing that at some future time, the cause triumph to which I have been devoted for forty-five years will triumph. Long live Communism! Long Live the Second International.

क्रुप्सकाया लिखती हैं कि लेनिन के लिए लाफ़ार्ज और लोरा की आत्महत्या दिल दहला देने वाली घटना  थी। लेनिन इस दंपति से मिल चुके थे। लेनिन ने क्रुप्सकाया से यह भी कहा था कि यदि कोई व्यक्ति कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए कुछ भी करने में खुद को अक्षम पा रहा हो तो उसे इस सच्चाई को स्वीकार कर लेना चाहिए और लाफ़ार्ज-लोरा के मृत्यु के तरीके को वरण करना चाहिए।

आज पॉल लाफ़ार्ज और लोरा मार्क्स की 102 वीं पुण्य तिथि के अवसर पर मार्क्स और मार्क्स के परिवार को याद करने के बहाने से यहाँ दो सामाग्री प्रस्तुत की जा रही है। पहली के लेखक हैं खुद पॉल लाफ़ार्ज। उन्होंने इसमें मार्क्स को बड़े ही आत्मीय ढंग से याद किया है और दूसरी सामग्री मार्क्स की तीसरी बेटी एलिएना मार्क्स द्वारा लीबनेख्त को लिखा मार्मिक पत्र है, इस पत्र में विस्तार से मार्क्स के परिवार की एक संरचना भी खींची गई है।  निम्न दोनों सामग्रियों को अकार से साभार प्रस्तुत किया जा रहा है। 

मार्क्स की स्मृतियाँ

By पॉल लाफ़ार्ज 

मैने सबसे पहली बार कार्ल मार्क्स को फरवरी सन 1865 में देखा । 28 सितम्बर सन 1864 को सैण्ट मार्टिन हॉल की मीटिंग में, इन्टरनेशनल की स्थापना हो चुकी थी । मैं उनको पेरिस से इस नन्हीं संस्था की प्रगति का समाचार देने आया था । मोशिये तेलाँने, जो अब फ्रांस के पूंजीवादी प्रजातंत्र के एक मंत्री हैं और जो बर्लिन की एक कॉन्फ्रेन्स में उसके एक प्रतिनिधि थे, ने मुझे एक परिचय-पत्र दिया था ।

      मेरी उम्र 24 बरस की थी । उस पहली भेंट का मुझ पर जो असर पड़ा उसे मैं अपने जीवन में कभी नहीं भूलूंगा । उस समय मार्क्स का स्वास्थ्य अच्छा नहीं था और वह ‘कैपीटल’ के पहले भाग के लिखने में कड़ी मेहनत कर रहे थे ।(वह दो साल बाद सन 1867 में प्रकाशित हुआ) उन्हें यह डर था कि शायद वह उसे समाप्त न कर सकें । वह युवकों से बड़ी खुशी से मिलते थे क्योंकि वह कहा करते थे कि ”मुझे ऐसे आदमियों को सिखाना चाहिये जो मेरे बाद कम्युनिम के प्रचार का काम जारी रखें ।”

      कार्ल मार्क्स उन अनमोल आदमियों में थे जो विज्ञान और सार्वजनिक  जीवन दोनों में प्रथम श्रेणी के योग्य हों । ये दोनों पहलू उनमें  इतनी इच्छी तरह मिले हुए थे कि जब तक हम उन्हें एक साथ ही वैज्ञानिक और समाजवादी योद्धा के रूप में न जान लें, तब तक हम उन्हें नहीं समझ सकते । उनका यह विचार था कि प्रत्येक विज्ञान का स्वयं विज्ञान के लिये अध्ययन करना चाहिये और जब हम वैज्ञानिक अनुसंधान का काम शुरू करें तो फल का विचार छोड़ देना चाहिये । फिर भी वह यह विश्वास करते थे कि अगर विद्वान मनुष्य अपनी अवनति न चाहता हो तो उसे सार्वजनिक कार्योँ में हमेशा भाग लेते रहना चाहिये – अपनी प्रयोगशाला  या अध्ययनशाला में अपने को बन्द करके, पनीर के कीड़े की तरह, अपने सहजीवियों के जीवन तथा सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों की अवेहलना नहीं करनी चाहिये । ‘वैज्ञानिक को स्वार्थी नहीं होना चाहिये । जो लोग इतने भाग्यवान हैं कि वैज्ञानिक अध्ययन में समय बिता सकें  उन्हें, सबसे पहले अपने ज्ञान को मनुष्य की सेवा में लगाना चाहिये ।’ उनका एक प्रिय कथन यह था कि  ”संसार के लिये परिश्रम करो ।”

      मजदूर-वर्ग की विपदाओं से उन्हें हार्दिक सहानुभूति थी । किन्तु केवल भावुक कारणों से नहीं बल्कि इतिहास तथा अर्थशास्त्र के अध्ययन से उनका दृष्टिकोण समाजवादी (कम्युनिस्ट) बना था । उनका यह कहना था कि जिस आदमी पर निजी स्वार्थों का प्रभाव न हो और जो वर्ग-पक्षपात से अंधा न हो, वह अवश्य इसी निष्कर्ष पर पहुँचेगा । मार्क्स ने निष्पक्ष भाव से मानव समाज के राजनीतिक और आर्थिक विकास का अध्ययन किया, किन्तु उन्होंने अपने अध्ययन के फल को लिखा केवल प्रचार के पक्के इरादे से, और अपने समय तक र्आदशवादी कुहरे में खोये हुये साम्यवादी आन्दोलन के लिये वैज्ञानिक नींव जमाने के दृढ़ निश्चय से । जहाँ तक सार्वजनिक कार्यों का सम्बन्ध है, उन्होंने उसमें केवल मजूदर वर्ग की विजय के लिये काम करने के विचार से भाग लिया। उस वर्ग का यह ऐतिहासिक कर्तव्य है कि समाज का राजनीतिक और आर्थिक नेतृत्व प्राप्त करने के बाद कम्युनिम की स्थापना करे । इसी तरह से शक्तिशाली होते ही पूंजीपति वर्ग का यह कर्तव्य था कि वह उन सामन्ती बंधनों को तोड़ दे जो खेती तथा उद्योग धन्धों के विकास में बाधा डाल रहे थे, मनुष्य और माल के लिये बेरोकटोक व्यापार और मालिकों और मजूदरों के बीच स्वतन्त्र सम्बन्ध आरम्भ कर दे, उत्पादन और विनिमय के साधनों क ो केन्द्रीभूत करे और कम्युनिस्ट समाज के लिये बौद्धिक और भौतिक सामग्री तैयार कर दे ।

      मार्क्स ने अपनी कार्यशीलता को अपनी जन्मभूमि तक ही सीमित नहीं रखा। वह कहते थे कि, ”मैं संसार का नागरिक हूँ और जहाँ कहीं होता हूँ वहीं काम करता हूँ ।” वास्तव में जिन देशों में (फ्रांस, बेल्ज़ियम, इंग्लैण्ड) उन्हें घटनावश या राजनीतिक दमन के कारण जाना पड़ा वहाँ के विकसित होते हुए क्रांतिकारी आन्दोलन में उन्होंने प्रमुख रूप से भाग लिया ।

      परन्तु अपनी पहली भेंट में जब मैं उनसे मेटलैण्ड पार्क रोड वाले घर के पढ़ने के कमरे  में मिला तो वह मुझे साम्यवादी आंदोलन के अथक और अद्वितीय योद्धा नहीं, बल्कि एक अध्ययनशील पुरुष जान पड़े । सभ्य संसार के प्रत्येक कोने से पार्टी के साथी कमरे में साम्यवादी दर्शन के उस पंडित की सलाह लेने के लिये इक्ट्ठे होते थे । वह कमरा ऐतिहासिक हो गया है । यदि कोई मार्क्स के बौद्धिक जीवन को घनिष्ठता से समझना चाहता है, तो उसे इस कमरे के बारे में जरूर जानना चाहिये । वह दुमंजिले पर था और पार्क की तरफ की चौड़ी खिड़की से उसमें खूब रोशनी आती थी । अंगीठी के दोनों तरफ  और खिड़की के सामने किताबों से लदी हुई अलमारियाँ थीं  जिनके उपर छत तक अखबारों की गड्डियाँ और हाथ की लिखी किताबें रखी हुई थीं। खिड़की की एक तरफ दो मेजें थीं जो उसी तरह विविध अखबारों, कागजों तथा किताबों से भरी हुई थीं । कमरे के बीचों-बीच जहाँ रोशनी सबसे अच्छी थी, एक छोटी-सी लिखने की मेज थी – तीन फिट लम्बी और दो फिट चौड़ी और एक लकड़ी की आराम कुर्सी थी । इस कुर्सी और एक अलमारी के बीच में, खिड़की की तरंफ मुँह किये हुए, एक चमड़े से ढंका हुआ सोफा था जिस पर मार्क्स कभी-कभी आराम करने के लिये लेटा करते थे । ताक पर कुछ और किताबें थीं, उनके बीच में सिगार, दियासलाई की डिबिया, तम्बाकू का डब्बा, और उनकी लड़कियों, स्त्री, एंगेल्स और विलहेम वूल्फ  की तसवीरें थीं । मार्क्स को तम्बाकू का बड़ा शौक था । उन्होंने  मुझसे कहा कि ‘कैपीटल’ से मुझे इतना रुपया भी नहीं मिलेगा कि उसे लिखते समय मैंने जो सिगार पिये हैं उनका दाम भी निकल आये ।  दियासलाई के इस्तेमाल में तो वह और भी यादा फिजूल खर्च थे। वह इतनी बार अपने पाइप या सिगार को भूल जाते थे कि उन्हें उसे बार-बार जलाना पड़ता था और वह दियासलाई की डिबिया बहुत ही जल्दी खत्म कर देते थे ।

      वह कभी भी किसी को अपनी किताबें और कागज ठीक तरह से लगाने (वास्तव में बिगाड़ने) नहीं देते थे । उनके कमरे की बेतरतीबी सिर्फ देखने भर की थी । वास्तव में हर एक चीज अपने उचित स्थान पर थी और वह जिस किताब या हस्तलेख को चाहते उसे बिना ढूंढ़े निकाल सकते थे । बातचीत करते-करते भी वह बहुधा रुक जाते और किसी अंश या आंकड़े को पुस्तक में से दिखाते । वह अपने कमरे की आत्मा को जैसे पहचानते थे और उनके कागज और किताबें उसी तरह उनकी इच्छा के पालक थे जिस तरह उनके अंग ।

      अपनी किताबों को सजाते वक्त वह उनकी छोटाई-बड़ाई का ख्याल नहीं करते थे, बड़ी-बड़ी किताबें तथा छोटी-सी पुस्तिकायें बराबर-बराबर रखी रहती थीं । वह अपनी पुस्तकों को आकार के अनुसार नहीं बल्कि विषय के अनुसार लगाते थे। उनके लिये पुस्तकें सुख का साधन नहीं, बौद्धिक यन्त्र थीं । वह कहते थे कि, ”ये मेरी गुलाम है और उनको मेरी इच्छा पूरी करनी पड़ती है ” उन्हें किताब के रूप-रंग, जिल्द, कागज की सुन्दरता या छपाई की परवाह नहीं थी । वह पन्नों के कोने मोड़ देते थे, कुछ हिस्सों के नीचे पेन्सिल  से लाइन खींच देते थे और दोनों तरफ की खाली जगह को पेन्सिल के निशानों से भर देते थे । वह किताबों में लिखते नहीं थे, पर जब लेखक उल्टी-सीधी हाँकने लगता था तो प्रश्न या आश्चर्य का चिन्ह लगाये बिना नहीं रह सकते थे । पेन्सिल से लाइन खींचने का उनका ऐसा तरीका था कि वह बड़ी आसानी से किसी भी हिस्से को ढूँढ लेते थे । उन्हें यह आदत थी कि कुछ साल बाद अपनी कापियों और किताबों में निशान लगाये हुए भागों को फिर पढ़ते थे ताकि उनकी स्मृति फिर ताजी हो जाय । उनकी स्मरणशक्ति असाधारण रूप से प्रबल थी । अपरिचित भाषा के पद्य याद करने की हेगल की सलाह के अनुसार बचपन से ही उन्होंने अपनी स्मरण-शक्ति का विकास किया था ।

      उन्हें हाइने और गेटे कंठस्थ थे और बातचीत में बहुधा उन्हें वह उध्दृत किया करते थे। योरप की सब भाषाओं के प्रमुख कवियों की कविताएँ वह बराबर पढ़ा करते थे । प्रत्येक वर्ष वह  ग्रीक भाषा में  एसकाइलस के नाटकों को पढ़ते थे और उसको तथा शेक्सपियर को दुनिया के सर्वोत्कृष्ट नाटयकार मानते थे । उन्होंने शेक्सपियर का पूरा अध्ययन किया था । उसके लिये उनके मन में अगाध श्रद्धा थी और उसके सबसे साधारण पात्रों को भी वे जानते थे । मार्क्स का परिवार शेक्सपियर का भक्त था और उनकी तीनों लड़कियों को भी शेक्सपियर का बहुत सा अंश जबानी याद था । सन् 1848 के कुछ दिन बाद जब मार्क्स अपने अंग्रेजी के ज्ञान को पूरा करना चाहते थे (उस समय भी वह अंग्रेजी अच्छी तरह पढ़ सकते थे) उन्होंने शेक्सपियर के सब खास-खास मुहावरों को ढूंढा और उनका वर्गीकरण किया । यही उन्होंने विलियम कौबेट के वाद-विवादपूर्ण लेखों के साथ किया । कौबेट का वह बड़ा सम्मान करते थे । दान्ते तथा बर्न्स उनके प्रिय कवि थे और अपनी लड़कियों को बर्न्स की व्यंगात्मक कविता या बर्न्स के प्रेम के गीत गाते सुनकर उन्हें हमेशा आनन्द आता था ।

      विज्ञान का प्रसिद्ध ज्ञाता, अथक परिश्रमी कूविये, जब पेरिस के म्यूजियम का संरक्षक था तो उसने अपने बरतने के लिये कई कमरे अलग तैयार करा लिये थे । इनमें से प्रत्येक कमरा अध्ययन की एक शाखा विशेष के लिये नियुक्त था  और उस विषय के लिये आवश्यक पुस्तकों, यन्त्रों आदि से सुसाित था । जब कूविये एक काम से थक जाता तो वह दूसरे कमरे में चला जाता था और बौद्धिक काम के बदल देने को आराम करने के बराबर मानता था । मार्क्स भी कूविये के समान अथक परिश्रमी थे परन्तु उसकी तरह कई कमरे रखने की उनकी सामर्थ्य नहीं थी । वह कमरे में इधर से उधर टहलकर आराम करते थे और दरवाजे और खिड़की के बीच में दरी पर घिसते-घिसते मैदान की पगडंडी की तरह एक साफ रास्ता बन गया था । कभी-कभी वह सोफे पर लेट कर उपन्यास पढ़ते थे । बहुधा वह एक साथ कई  उपन्यास शुरू कर देते थे जिन्हें वह बारी-बारी से पढ़ते थे क्योंकि डार्विन की तरह वह भी बड़े उपन्यास-प्रेमी थे । उन्हें 18 वीं सदी के उपन्यास पसन्द थे । फील्डिंग का लिखा हुआ ”टॉम जोन्स” उन्हें बहुत अच्छा लगता था । आधुनिक उपन्यासकारों में उनके सर्वप्रिय थे पौल डि कौक, चार्ल्स लीवर, डयूमा और सर वाल्टर स्कॉट । स्कॉट के ‘ओल्ड मॉटर्लिटी ‘ नामक उपन्यास को वह उत्कृष्ट रचना मानते थे । उन्हें साहस के कामोंवाली और मजाकिया कहानियाँ पसन्द थीं । उनके लिए श्रृंगार रस के सर्वोत्कृष्ठ लेखक सरवेंटीज  और बाल्ज़ाक थे । उनके विचार से ‘डॉन क्विक्सोट’ ठाकुरशाही के विनाशकाल का एक महान ग्रंथ था जबकि नये विकसित होने वाले पूँजीवादी संसार में उस युग के गुणों को केवल मूर्खता और बौड़पन समझा जाने लगा था । बाल्जाक के लिये उनकी श्रद्धा बहुत गहरी थी। उन्होंने निश्चय किया था कि अर्थशास्त्र का अध्ययन समाप्त करने के बाद बाल्ज़ाक की ‘ह्यूमैन ंकॉमेडी’ की आलोचना लिखेंगे । मार्क्स बाल्ज़ाक को समकालीन सामाजिक जीवन का इतिहासकार ही नहीं बल्कि ऐसे पात्रों का भविष्यदर्शी रचयिता समझते थे जो लुई फिलिप के राय में केवल अधूरे रूप में थे और बाल्ज़ाक की मृत्यु के बाद तीसरे नेपोलियन के समय में पूर्ण रूप से विकसित हुए ।

      मार्क्स यूरोप की सब प्रमुख भाषाओं को पढ़ सकते थे और तीन भाषाओं में (जर्मन, अंग्रेज़ी तथा फ्रेंच में) ऐसा लिख सकते थे कि उस भाषा को अच्छी तरह जाननेवाले भी उसकी तारीफ  करते थे । वह बहुधा कहा करते थे कि ‘जीवन के संग्राम’ में विदेशी भाषा एक हथियार होती है । उनमें भाषाएं सीखने की बड़ी योग्यता थी और इसको उनकी लड़कियों ने भी उनसे प्राप्त किया था । जब उन्होंने रूसी भाषा सीखनी शुरू की तो वह पचास बरस के हो चुके  थे । यद्यपि जो मृत तथा जीवित भाषाएं वह जानते थे उनका रूसी से कोई भी निकट का सम्बन्ध नहीं था, तब भी छ: महीने में उन्होंने इतनी प्रगति कर ली थी कि जो लेखक और कवि उन्हें पसन्द थे (अर्थात् पुश्किन, गोगोल और श्चेडरिन)  उनकी रचनाएँ वह मूल में पढ़ सकते थे । रूसी सीखने का कारण यह था कि वह कुछ  छानबीनों का सरकारी ब्यौरा पढ़ना चाहते थे । उन छानबीनों के निष्कर्ष इतने भयानक थे कि सरकार ने उन्हें दबा दिया था । मार्क्स के कुछ भक्तों ने मार्क्स के लिये उनकी प्रतियाँ मँगा दी थी और पश्चिमी योरप में केवल मार्क्स ही ऐसे अर्थशास्त्री थे जिन्हें उनका ज्ञान था ।

      कविता तथा उपन्यास पढ़ने के अलावा मानसिक विश्राम के लिए मार्क्स का एक और अद्भुत तरीका था । गणित के वह बड़े प्रेमी थे । बीजगणित से उनको नैतिक सान्त्वना तक मिलती थी और अपने तूफानी जीवन की सबसे दु:खपूर्ण घड़ियों में वे उसका आसरा लिया करते थे । अपनी पत्नी की अन्तिम बीमारी में अपने वैज्ञानिक काम को हमेशा की तरह चलाना उनके लिये मुश्किल हो गया था और उसकी बीमारी और कष्ट के बारे में सोचने से बचने का उपाय केवल यही था कि अपने को गणित में डुबो दें । मानसिक कष्ट के इस समय में उन्होंने गणित पर एक निबन्ध लिखा । जो गणितशास्त्री इसे जानते हैं उनका कहना है कि यह रचना बड़ी महत्वपूर्ण है और मार्क्स की गंथ्रावली में छपेगी । उच्च गणित में वह द्वंद्वात्मक गति का सबसे सादा और तर्कपूर्ण रूप निकाल सकते थे। उनकी विचारधारा के अनुसार विज्ञान की कोई शाखा तभी सचमुच विकसित कही जा सकती है जब उसका रूप ऐसा हो जाये कि वह गणित का प्रयोग  कर सके ।

      मार्क्स का पुस्तकालय, जिसमें जीवन भर की खोज के परिश्रम से एक हजार से यादा कि ताबें जमा थीं, उनकी आवश्यकताओं के लिये काफी नहीं था । इसलिये वह ब्रिटिश म्यूज़ियम के वाचनालय में नियम से जाते थे और वहाँ की सूची को बहुत मूल्यवान समझते थे । उनके विपक्षियों को भी यह स्वीकार करना पड़ता था कि वह प्रकाण्ड विद्वान थे और  केवल अपने प्रिय विषय अर्थशास्त्र में ही नहीं बल्कि सब देशों के इतिहास, दर्शन और साहित्य में भी उनका ज्ञान अगाध था ।

      यद्यपि वह हमेशा देर से सोते थे, एक प्याला पीकर और अखबारों को पढ़कर बीच में उठ जाते थे । वह अपने पढ़ने के कमरे में चले जाते, और दूसरे दिन सबेरे के दो-तीन बजे तक काम करते रहते थे । बीच में वह सिर्फ  खाने के लिये और अच्छे मौसम में हैम्पस्टेड के मैदान में टहलने के लिये उठते थे । दिन में वह एक या दो घंटे सोफे पर सो लेते थे । युवावस्था में उन्हें सारी रात काम करते हुए बिताने की आदत थी । मार्क्स के लिये काम करना तो एक व्यसन हो गया था और वह भी ऐसा तल्लीन  करने वाला कि वह खाना तक भूल जाते थे । बहुधा उन्हें कई बार बुलाना पड़ता था तब वह खाने के कमरे में आते थे और अंतिम कौर मुश्किल से खत्म होता था कि वह उठकर वापिस अपनी मेज पर जा बैठते थे । वह खाते कम थे और उन्हें भूख न लगने की शिकायत तक रहा करती थी । सुअर का गोश्त, धुएं पर पकी मछली और आचार जैसे चटपटे खानों से वह इस कमी को पूरा करने की कोशिश करते थे । उनके मस्तिष्क की अपूर्व कार्यशीलता का दण्ड उनके पेट को भरना पड़ता था, दिमाग के लिये वास्तव में उन्होंने अपने पूरे शरीर को बलिदान कर दिया था । विचार करना उनके लिये सबसे बड़ा सुख था । मैंने बहुधा उनको अपनी युवावस्था के गुरु हेगेल का यह कथन उध्दृत करते हुए सुना है कि, ”किसी धूर्त का एक पापपूर्ण विचार भी किसी देवी चमत्कार से उच्च और पवित्र है।”

      उनका शरीर निश्चय ही बड़ा बलवान रहा होगा, नहीं तो वह कभी इतने असाधारण जीवन और ऐसी थकाने वाली दिमागी मेहनत को नहीं सह सकते । औसत से कुछ यादा लम्बे, चौड़े, चौड़ी छाती – कुल मिलाकर उनके अंग सुडौल थे,  यद्यपि उनके शरीर की तुलना में छोटे थे (जैसा कि यहूदी जाति में अकसर होता है) । अगर अपनी जवानी में वह व्यायाम का अभ्यास करते तो अत्यन्त बलवान आदमी बन जाते । उनका एकमात्र शारीरिक व्यायाम था हवाखोरी । लगातार सिगार पीते और बातचीत करते हुए और थकान की कोई भी निशानी दिखाये बिना वह घन्टों चल सकते थे और पहाड़ों पर चढ़ सकते थे । यह कहा जा सकता है कि वह अपना काम कमरे में टहलते हुए करते थे । केवल थोड़ी देर के लिये वह डेस्क के सामने बैठ जाते ताकि फर्श पर टहलते हुए उन्होंने जो सोचा है उसे लिख डालें । इस तरह टहलते-टहलते बातचीत करने का भी उन्हें शौक था । हाँ, जब तर्क-वितर्क गरमागरम होता या बात विशेष महत्वपूर्ण होती तो वे बीच-बीच में जरा रुक जाते थे ।

      बहुत साल तक हैम्पस्टेड के मैदानों में उनके साथ शाम को हवाखोरी करने मैं भी जाया करता था  और मैदानों के बीच इन्हीं हवाखोरियों में मैने उनसे अर्थशास्त्र की शिक्षा पायी । मेरे साथ इस बातचीत में उन्होंने ”कैपीटल ” के पहले भाग को, जिसे वे उस समय लिख रहे थे, मेरे सामने विकसित किया । जैसे ही मैं घर पहुँचता वैसे ही अपनी योग्यतानुसार जो कुछ मैंने सुना था उसका सार लिख लेता था। परन्तु शुरू में मार्क्स की तीक्ष्ण और जटिल विचारधारा को समझने में बड़ी मुश्किल हुई । दुर्भाग्यवश मेरे ये अमूल्य कागज खो गये हैं क्योंकि कम्यून के बाद पैरिस और बोरदो में पुलिस ने मेरे  कागज हथिया लिये और जला डाले । एक दिन मार्क्स ने अपने स्वभावानुसार बहुत से प्रमाणों और विचारों के साथ मानव समाज के विकास के अपने अद्भुत सिद्धान्त का बखान किया  था । वह मैने लिख लिया था , पर अन्य कागजों के साथ वे भी पुलिस के हाथों पड़ गये । मुझे उन कागजों के खो जाने का विशेष दु:ख है । मुझे ऐसा मालूम हुआ जैसे मेरी ऑंखों के सामने से पर्दा हट गया हो। पहली बार मैंने विश्व-इतिहास के तर्क को समझा और समाज और विचारों के विकास के भौतिक कारणों को ढूँढ निकालने लायक हो गया – वह विकास जो बाहर से देखने से इतना तर्कहीन जान पड़ता है । इस सिद्धान्त से मैं चकित हो गया और यह प्रभाव बरसों तक रहा । अपनी मामूली योग्यता से जब मैंने यह सिद्धान्त मैड्रिड के साम्यवादियों को समझाया तो उन पर भी यही प्रभाव हुआ । मार्क्स के सिद्धान्तों में यह सबसे महान है और निस्सन्देह आदमी के दिमाग से निकला हुआ सर्वोत्कृष्ट सिद्धान्त है ।

      मार्क्स का दिमाग ऐतिहासिक और वैज्ञानिक तथ्यों तथा दार्शनिक सिद्धान्तों से अकल्पनीय मात्रा में सुसाित था और कड़े बौद्धिक परिश्रम से इक्ट्ठे कि ये हुए अपने ज्ञान और अनुभव का प्रयोग करने में उन्हें आश्चर्यजनक निपुणता प्राप्त थी । चाहे जिस समय और चाहे जिस विषय पर वह किसी भी प्रश्न का ऐसा जवाब दे सकते थे जो हर एक के लिये पूरी तरह संतोषजनक होता था। उनके उत्तर के पीछे हमेशा महत्त्वपूर्ण दार्शनिक विचार भी होते थे । उनका दिमाग उस लड़ाई के जहाज के समान था जो पूरी तैयारी से बन्दरगाह में खड़ा रहता है और इस बात के लिये तैयार रहता है कि किसी भी क्षण विचार के किसी भी सागर में चले पड़े । निस्सन्देह ”कैपीटल” ऐसे दिमाग क ी देन है जिसकी शक्ति अद्भुत और ज्ञान अगाध है । परन्तु मेरे लिये और उन सबके लिये जो मार्क्स को अच्छी तरह जान चुके हैं, न तो ”कैपीटल” और न उनकी अन्य कोई रचना उनके ज्ञान की पूरी मात्रा को, या उनकी योग्यता और अध्ययन की महानता को पूरी तरह प्रदर्शित करती है । वह स्वयं अपनी रचनाओं से कहीं महान थे ।

      मैंने मार्क्स के साथ काम किया है । यद्यपि मैं मार्क्स का केवल मुंशी था तो भी उनके लिखाते समय मुझे यह देखने का अवसर मिला कि वह सोचते और लिखते किस प्रकार थे । उनके लिये उनका काम मुश्किल और साथ ही साथ आसान भी था । आसान इसलिये कि चाहे जो विषय हो, उसके सम्बन्ध में तथ्य और विचार प्रथम प्रयास में ही बहुतायत से उनके दिमाग में उठ खड़े होते थे । परन्तु इसी बाहुल्य से उनके विचारों की पूर्ण अभिव्यक्ति कठिन हो जाती थी और उन्हें परिश्रम अधिक करना पड़ता था । .

      वीको ने लिखा है, ”केवल सर्वज्ञ ईश्वर ही वस्तु की वास्तविकता को जान सकता है। मनुष्य वस्तु के बाहरी रूप से अधिक कुछ नहीं जानता ।” मार्क्स वीको के ईश्वर क ी भाँति वस्तुओं को देखते थे । वह केवल ऊपरी सतह को नहीं देखते थे बल्कि गहराई में जाकर प्रत्येक भाग के परस्पर सम्बन्धों का निरीक्षण करते, प्रत्येक भाग को अलग-अलग करते और उसके विकास के इतिहास का अनुसंधान करते । फिर वस्तु के बाद वह उसके वातावरण को लेते और एक दूसरे पर दोनों के असर को देखते । अपने अध्ययन के विषय का पहले वह उद्गम देखते, उसमें जो परिवर्तन, विकास और क्रांति हुई है उस पर विचार करते । वह किसी वस्तु को अपने ही अस्तित्व में पूर्ण, अपने वातावरण से अलग नहीं समझते थे, बल्कि संसार को अत्यन्त जटिल और सदैव गतिशील मानते थे । उसकी विभिन्न तथा निरन्तर परिवर्तनशील क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं के साथ संसार के पूर्ण जीवन की व्याख्या करना उनका ध्येय था । फ्लाबेअर और डी गॉन्कवा के मत के लेखक यह शिकायत करते हैं कि जो कुछ हम देखते हैं उसका सच्चा वर्णन करना मुश्किल है । परन्तु वे जिसका वर्णन करना चाहते थे वह तो वीको का बताया हुआ बाहरी रूप मात्र है, उस वस्तु द्वारा उनके अपने मन पर पड़ी हुई छाप से अधिक किसी बात का वर्णन वे लोग नहीं करना चाहते थे । जिस काम का बीड़ा मार्क्स ने उठाया उसके मुकाबले में उनका साहित्यिक काम तो बच्चों का खेल था । वास्तविक सत्य को जानने के लिये, और उसकी इस भाँति व्याख्या करने के लिये कि दूसरे उसे समझ सकें, असाधारण विचार शक्ति और योग्यता की आवश्यकता है। मार्क्स अपनी रचनाओं में बराबर परिवर्तन करते रहते और सदा यही समझते थे कि व्याख्या विचार के अनुकुल नहीं हुई । बाल्ज़ाक की एक मनोवैज्ञानिक रचना, ”अज्ञात महान रचना ” का, जिसमें से जोला ने बहुत कुछ चुरा लिया था, उन पर बड़ा प्रभाव पड़ा क्योंकि कुछ हद तक उसमें उनके भावों का वर्णन था । योग्य चित्रकार अपने दिमाग में बने हुए चित्र को ठीक वैसा ही बनाने की इच्छा से इतना पागल बना रहता है कि वह तूलिका से बार-बार कपड़े पर रंग लगाता है । यहाँ तक कि अन्त में वह चित्र केवल रंगों का एक रूपहीन मिश्रण बन जाता है , परन्तु तब भी चित्रकार की पक्षपातपूर्ण ऑंखों को वह वास्तविकता का निर्दोष चित्र जान पड़ता है ।

      कुशल विचारक (दार्शनिक ) होने के दोनों आवश्यक गुण मार्क्स में थे । उनमें किसी वस्तु को उसके विभिन्न अंगों में विभाजित करने की अनुपम शक्ति थी, और वह वस्तु को उसके सब अवयवों और विकास के रूपान्तरों के साथ पुननिर्माण करने में और उसके आन्तरिक सम्बन्धों को खोज निकालने में भी निपुण थे । कुछ अर्थशास्त्रियों ने, जो विचार करने में असमर्थ हैं, उन पर आरोप लगाया है कि किसी बात को समझाते समय मार्क्स अमूर्त सिद्धान्तों से उलझते रहते हैं, ठोस वस्तुओं की बात नहीं करते । किन्तु यह आरोप सही नहीं है । मार्क्स रेखागणित के विद्वानों की विधि का व्यवहार नहीं करते, जो अपनी परिभाषा को चारों ओर के संसार से अलग-अलग करके असलियत से दूर किसी जगत में अपने निष्कर्ष निकालने बैठते हैं । ”कैपीटल ” की विशेषता इस बात में नहीं है कि उसमें विलक्षण परिभाषाएँ अथवा चीजों को समझाने के विलक्षण गुर दिये हुए हैं। ये चीजें हम उस ग्रंथ में नहीं पाते । किन्तु उसमें अत्यन्त सूक्ष्म विश्लेषणों की लड़ी-सी मिलती है । इन विश्लेषणों के द्वारा मार्क्स वस्तु के क्षणिक से क्षणिक रूप, और मात्रा में होने वाले छोटे से छोटे अन्तर अथवा हेरफेर को भी सूक्ष्मता से प्रगट कर देते हैं । वह शुरू में इस बात को देखते हैं कि जिन समाजों में उत्पादन की प्रणाली पूंजीवादी है उनकी संपत्ति माल के विशाल संग्रह के रूप में होती है । माल, यानी स्थूल वस्तुएँ ही वे अवयव हैं जिनसे पूंजीवादी संपत्ति बनती है, गणित के निर्जीव तथ्य नहीं । मार्क्स फिर माल की अच्छी तरह जाँच-पड़ताल करते हैं । उसे प्रत्येक दिशा में घुमाते फिराते हैं, उलटते पलटते है और उसमें से एक के बाद दूसरा भेद निकालते हैं  – वे भेद जिनका सरकारी अर्थशास्त्रियों को कभी पता भी नहीं लगा और जो कैथोलिक धर्म के रहस्यों से संख्या में यादा और अधिक गूढ़ हैं । माल का हर ओर से अध्ययन करने के बाद वह उसके अन्य मालों के साथ सम्बन्ध, यानी विनिमय को देखते हैं, फिर उसके उत्पादन और उत्पादन के लिये आवश्यक ऐतिहासिक परिस्थिति को देखते हैं । वह माल के विभिन्न रूपों का निरीक्षण करते हैं और यह दिखाते हैं कि एक रूप कैसे दूसरे में बदल जाता है और किस प्रकार एक रूप अवश्यमेव दूसरे रूप का जन्मदाता होता है । इस क्रिया के विकास का तर्कपूर्ण चित्र इस अपूर्व क्षमता के  द्वारा दिखाया गया है कि हम शायद यह समझें कि मार्क्स ने उसे गढ़ लिया है । परन्तु वह वास्तव है और माल की असली गति की ही अभिव्यक्ति है।

      मार्क्स हमेशा बड़ी ईमानदारी से काम करते थे । वह कोई  ऐसी बात नहीं लिखते थे जिसे वह प्रमाणित न कर सकें । इस मामले में उन्हें उद्धृत कथन से संतोष नहीं होता था । वह सदैव मौलिक स्त्रोत खोज निकालते थे, उसके लिये चाहे जितना कष्ट उठाना पड़े । किसी साधारण-सी चीज की सच्चाई की खोज में वह बहुधा ब्रिटिश म्यूजियम जाते थे । इसीलिये उनके आलोचक कोई ऐसी त्रुटि नहीं निकाल सके जो लापरवाही के कारण हुई हो, न वे यह दिखा सके कि मार्क्स के कुछ निष्कर्ष ऐसे तथ्यों पर आधारित हैं जो जाँच करने से सही न निकलें । मौलिक लेख को पढ़ने की उनकी आदत के कारण उन्होंने बहुत से ऐसे लेखकों को पढ़ा जो लगभग अज्ञात थे और जिनको केवल मार्क्स ने ही उध्दृत किया है । ”कैपीटल ” में अज्ञात लेखकों के इतने उद्धरण हैं कि यह समझा जा सकता है कि उन्हें ज्ञान का दिखावा करने के लिये रक्खा गया है । परन्तु मार्क्स को बिल्कुल दूसरी भावना प्रेरित कर रही थी । वह कहते थे कि ”मैं ऐतिहासिक न्याय करता हूँ और प्रत्येक मनुष्य को जो उचित होता है, देता हूँ। ” जिसने सबसे पहले एक विचार की अभिव्यक्ति की थी अथवा औरों से अधिक सच्चाई से अभिव्यंजना की थी, उस लेखक का नाम लिखना वह अपनार् कत्तव्य समझते थे, चाहे वह कितना ही साधारण और अज्ञात क्यों न हो ।

      उनका साहित्यिक अन्त:करण उनके वैज्ञानिक अन्त:करण से कम न्यायप्रिय नहीं था। जिस तथ्य की सत्यता का उन्हें पूरा भरोसा नहीं होता था उसका वह कभी विश्वास नहीं करते थे, बल्कि जब तक किसी विषय का पूरा अध्ययन न कर लें तब तक वह उसके बारे में बोलते ही न थे । जब तक वह अपना लेख बार-बार पढ़ नहीं लेते थे और जब तक उसका रूप संतोषजनक नहीं हो जाता था, तक वह कुछ भी नहीं छपवाते थे । पाठकों के सामने अपने अधूरे विचार रखना उनके लिये असह्य था । पूरी तरह दुहराये बिना अपनी पुस्तक दिखाने में उनको अत्यन्त कष्ट होता । उनकी यह भावना इतनी प्रबल थी कि उन्होंने मुझसे कहा कि अधूरा छोड़ने की अपेक्षा मैं अपनी पुस्तकों को जला देना पसन्द करूँगा । उनके काम करने के तरीके की वजह से उन्हें बहुत बार ऐसी मेहनत करनी पड़ती जिसका अनुभव उनकी पुस्तकों के पाठकों को मुश्किल से ही सकता है । जैसे इंग्लैण्ड के कारखानों के सम्बनंध में पार्लियामेंट के बनाये हुए नियमों के बारे में  ” कैपीटल” में लगभग बीस पन्ने लिखने के लिये उन्होंने जाँच की विशेष समितियों तथा अंग्रेज़ी और स्कॉटलैंड की मिलों के इन्सपैक्टरों की लिखी हुई सरकारी रिपोर्टों का एक पूरा पुस्तकालय पढ़ डाला । पेन्सिल के निशानों से मालूम होता है कि उन्होंने इन्हें एक सिरे से दूसरे सिरे तक पढ़ा था । उनका विचार था कि ये पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के विषयों में सबसे महत्वपूर्ण और उपयोगी कागजों में से थे । जिन आदमियों ने इन्हें तैयार किया था उनके बारे में मार्क्स की बहुत अच्छी राय थी । मार्क्स कहते थे कि अन्य देशों में ऐसे आदमी शायद ही मिल सकेंगे जो, ”इतने योग्य, इतने पक्षपात रहित और बड़े आदमियों के डर से इतने मुक्त हों, जितने कारखानों के अंग्रेज़ इन्सपेक्टर होते हैं।” ”कैपीटल”  के पहले भाग की भूमिका  में यह असाधारण प्रशंसा लिखी मिलेगी ।

      मार्क्स ने इन सरकारी पुस्तिकाओं में से अनेक तथ्य निकाले । ये पुस्तिकाएं ‘हाउस ऑफ  कामन्स’ और ‘हाउस ऑफ लॉर्डस’ के सदस्यों को बांटी जाती थीं । वे लोग इनको निशाना बना कर इस बात से अपने हथियारों की शक्ति का अनुमान किया करते थे कि गोली ने कितने पन्नों को पार किया । कुछ लोग तोल के हिसाब से इन्हें रद्दी कागजों में बेच देते थे । यह उपयोग सबसे अच्छा था क्योंकि इसके कारण मार्क्स को अपने लिए लौंग एकर के एक रद्दी बेचने वाले कबाड़ी से ये पुस्तिकाएं सस्ते दामों में मिल गयीं । प्रोफेसर बीज़ले का कहना है कि मार्क्स ही एक ऐसा आदमी था जो इन सरकारी छानबीनों की यादा कदर करता था और उसी ने दुनिया में इनकी जानकारी फैलायी । परन्तु बीज़ले को यह नहीं मालूम था कि सन 1845 में एंगेल्स ने इन अंग्रेजी सरकारी पुस्तिकाओं में से अपने लेख ”सन्  1844 में इंग्लैड में मजदूर-वर्ग की दशा” के लिये बहुत से अंश लिये थे ।

पॉल लाफ़ार्ज

पॉल लाफ़ार्ज

2

      जो मार्क्स के मानव हृदय को जानता चाहते हैं, उस हृदय को जो विद्वत्ता के बाहरी आवरण के भीतर भी इतना स्निग्ध था, उन्हें मार्क्स को उस समय देखना चाहिये जब उनकी पुस्तकें और लेख अलग रख दिये जाते थे, जब वह अपने परिवार के साथ होते थे और जब वह रविवार की शाम को अपनी मित्र-मंडली में रहते थे । ऐसे समय में वह बड़े अच्छे साथी साबित होते थे । हँसी-मजाक तो जैसे उमड़ा पड़ता था । उनकी हँसी दिखावटी नहीं होती थी । कोई मौके का जवाब या चुटीला वाक्य सुनकर  घनी भौहों वाली उनकी काली ऑंखें खुशी से चमकने   लगती थीं ।

      वह बड़े स्नेहपूर्ण, दयालु और उदार पिता थे । वह बहुधा कहते थे कि ”माँ -बाप को अपने बच्चों से शिक्षा लेनी चाहिये ”।  उनकी लड़कियाँ उनसे बड़ा स्नेह करती थीं और उनके आपस के सम्बन्ध में पैतृक शासन लेशमात्र भी नहीं था । वह उन्हें कभी कुछ करने की आज्ञा नहीं देते थे । केवल उनसे अपने लिये कोई काम करने का अनुरोध करते या जो उन्हें नापसन्द होता वह न करने की उनसे प्रार्थना करते । परन्तु फिर भी शायद ही कभी किसी पिता की सलाह उनसे अधिक मानी गयी होगी । उनकी लड़िकयाँ उन्हें अपना मित्र समझती थीं और उनके साथ अपने साथी के समान बर्ताव करती थीं । वह उन्हें पिताजी नहीं बल्कि ‘मूर’ कहती थीं । उनके साँवले रंग, काले बाल और काली दाढ़ी के कारण उन्हें यह उपनाम दिया गया था । परन्तु इसके विपरीत  सन् 1848 तक में, जब वह तीस बरस के भी नहीं थे, कम्युनिस्ट लीग के अपने साथी सदस्यों के लिये वह ‘बाबा मार्क्स’ थे ।

      अपने बच्चों के साथ खेलते हुए वह घण्टों बिता देते थे । बच्चों की अभी तक वह समुद्री लड़ाईयाँ, और कागजी नावों के उस पूरे बेड़े का जलाना याद है जिसे मार्क्स बच्चों के लिये बनाते थे और पानी की बाल्टी में छोड़ककर उसमें आग लगा देते थे । इतवार को लड़कियाँ उन्हें काम नहीं करने देती थीं । उस रोज वह दिन भर के लिये बच्चों के  हो जाते थे । जब मौसम अच्छा होता था तो पूरा कुटुम्ब देहात की ओर घूमने जाता था । रास्ते के किसी होटल में रुककर पनीर, रोटी और जिंजर बीअर का साधारण भोजन होता । जब बच्चे बहुत छोटे थे तो वह रास्ते भर उन्हें कहानियाँ सुनाते रहते जिससे वे थकें नहीं । वह उन्हें कभी न खत्म होने वाली कल्पनापूर्ण परियों की कहानियाँ सुनाते थे जिन्हें वह चलते-चलते गढ़ते जाते थे और रास्ते की लम्बाई के अनुसार उन्हें घटाते-बढ़ाते रहते थे ताकि सुनने वाले अपनी थकान भूल जायें । मार्क्स की कल्पना शक्ति बड़ी समृद्ध और काव्यपूर्ण थी और अपने प्रथम साहित्यिक प्रयास में उन्होंने कविताएँ लिखी थीं। उनकी पत्नी इन युवावस्था की कविताओं का बड़ा आदर करती थीं परन्तु किसी को देखने नहीं देती थीं । मार्क्स के माँ-बाप अपने लड़के को साहित्यिक या विश्वविद्यालय का अध्यापक बनाना चाहते थे । उनके विचार से अपने को साम्यवादी आन्दोलन में लगाकर और अर्थशास्त्र के अध्ययन में लगकर (इस विषय का उस समय जर्मनी में बहुत कम आदर किया जाता था ) मार्क्स अपने को नीचा कर रहे थे ।

      मार्क्स ने एक बार अपनी लड़कियों से ग्राची के बारे में  नाटक लिखने का वादा किया था । दुर्भाग्यवश यह इरादा कभी पूरा  नहीं हुआ । यह देखना बड़ा मनोरंजक होता कि  ‘वर्ग-संघर्ष का योद्धा’ (मार्क्स को यही कहा जाता था) प्राचीन संसार के वर्ग-संघर्षोँ की इस भयानक और उावल घटना को कैसे दिखाता । यह अनेक योजनाओं मे से केवल एक थी जो कभी पूरी नहीं हो सकी । उदाहरणार्थ वह तर्क शास्त्र पर एक पुस्तक लिखना चाहते थे और एक दर्शनशास्त्र के  इतिहास पर । दर्शन युवाकाल में उनके अध्ययन का प्रिय विषय था । अपनी योजना की हुई सब किताबों को लिखने का अवसर पाने और संसार को अपने दिमाग में भरे हुए खजाने का एक अंश दिखाने के लिये उन्हें कम से कम सौ बरस तक जीने की जरूरत होती ।

      उनके जीवन भर उनकी पत्नी उनकी सच्ची और वास्तविक साथी रही । वे एक दूसरे  को बचपन से जानते थे और साथ-साथ बड़े हुए थे । जब उनकी सगाई हुई तो मार्क्स केवल सत्रह बरस के थे ।  सन 1843 में उनकी शादी हुई । किन्तु उसके पहले उन्हें नौ बरस तक इन्तजार करना पड़ा था । पर उसके बाद श्रीमती मार्क्स के देहान्त तक – जो उनके पति से कुछ ही समय पहले हुआ – वे कभी अलग नहीं हुए । यद्यपि उनका जन्म और पालन-पोषण एक अमीर जर्मन घराने में हुआ था, तो भी उनकी जैसी समता की प्रबल भावना होना काठिन है । उनके लिये सामाजिक अन्तर और विभाजन थे ही नहीं । उनके घर में खाने के लिये अपने काम के कपड़े पहने हुए एक मजदूर का उतनी ही नम्रता और आदर से स्वागत होता था जितना किसी राजकुमार या नवाब का होता । अनेक देश के  मजदूरों ने उनके आतिथ्य का सुख पाया । मुझे विश्वास है कि जिनका उन्होंने इतनी सादगी और सच्ची उदारता से सत्कार किया, उनमें से किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनका सत्कार करने वाली की ननिहाल आरगाइल के डयूकों के वंश में थी और उसका भाई प्रशा के राजा का रायमंत्री रह चुका था । किन्तु इन सब  चीजों का श्रीमती मार्क्स के लिये कोई महत्त्व भी नहीं था । अपने कार्ल का अनुसरण करने के लिये उन्होंने इन सब चीजों को छोड़ दिया था और उन्होंने अपने किये पर कभी पछतावा नहीं किया, अपनी दरिद्रता के सबसे बुरे दिनों में भी नहीं ।

      उनका स्वभाव धैर्यवान और हंसमुख था । मित्रों को लिखे हुए उनके पत्र उनकी सरल लेखनी के अकृत्रिम उद्गारों से भरे होते थे और उनमें एक मौलिक और सजीव व्यक्तित्व की झाँकी मिलती है । जिस दिन उनका पत्र आता था उस दिन उनके मित्र खुशी मनाते थे । जोहान फिलिप बेकर ने उनमें से बहुतों को छापा है । निष्ठुर व्यंग लेखक हाइने , मार्क्स की खिल्ली उड़ाने की आदत से डरता था, परन्तु श्रीमती मार्क्स की पैनी बुद्धि की वह बड़ी तारीफ करता था । जब मार्क्स दम्पति पैरिस में ठहरे तो वह बहुत बार उनके यहाँ आता । मार्क्स अपनी स्त्री की बुद्धि व आलोचना-शक्ति का इतना आदर करते थे कि (जैसा उन्होंने मुझे सन 1866 में बताया) अपने सब लेखों को वह उन्हें दिखाते थे और उनके विचारों को बहुमूल्य समझते थे। छापेखाने जाने से पहले वही उनके लेखों की नकल कर दिया करती थीं ।

      श्रीमती मार्क्स के बहुत से बच्चे हुए । उनके तीन बच्चे उनकी दरिद्रता के उस जमाने में बचपन में ही मर गये जिसका उनके कुटुम्ब को सन् 1848 की क्रांति के बाद सामना करना पड़ा । उस समय वे भागकर लन्दन में सोहो स्क्वेअर की डीन स्ट्रीट पर दो कमरों में रहते थे । मेरी उनकी केवल तीन लड़कियों से जान-पहचान हुई । सन् 1865 में जब मार्क्स से मेरा परिचय हुआ तो उनमें से सबसे छोटी, जो अब श्रीमती एवलिंग हैं, बड़ी प्यारी बच्ची थी और लड़की से यादा लड़का मालूम होती थी । मार्क्स बहुधा हँसी में कहा करते थे कि इलीनोर को दुनिया को भेंट करते समय उनकी स्त्री ने उसके लिंग के बारे मे गलती कर दी है । बाकी दोनों लड़कियाँ एक दूसरे से भिन्न होते हुए भी बड़ी सुन्दर और आकर्षक थीं । उनमें बड़ी, जो अब श्रीमती लौगुए हैं, अपने बाप की तरह पक्के रंग की थीं और उसकी ऑंखे और बाल काले थे । छोटी, जो अब श्रीमती लांफार्ज हैं, अपनी माँ के ऊपर थी। उसका रंग गोरा और गाल गुलाबी थे और सिर पर घुंघराले बालों की घनी लट थी जिनकी सुनहरी चमक से मालूम होता था कि उसमें  डूबता सूरज छिपा हो ।

      इसके अलावा मार्क्स-परिवार में एक और महत्तवपूर्ण प्राणी था जिसका नाम हेलेन डेमुथ था । वह किसान परिवार में जन्मी थी और काफी छोटी उम्र में ही, जेनी फौन वेस्टफेलन की कार्ल मार्क्स के साथ शादी होने के बहुत पहले ही, वह वेस्टफेलन परिवार में नौकर हो गयी थी । जब जेनी की शादी हुई तो हेलेन उससे अलग होना नहीं चाहती थी और उसने बड़े आत्म-त्याग से भक्ति के  साथ मार्क्स परिवार के भाग्य का अनुसरण किया । योरप-भर में यात्राओं में वह मार्क्स और उनकी स्त्री के साथ गयी और उनके सब देशनिकालों में उनके साथ रही । वह घर की कार्यशीलता की मूर्तिमान भावना थी और यह जानती थी कि मुश्किल से मुश्किल हालत में भी किस तरह काम चलाना चाहिये । उसकी किफायत, सफाई और चतुराई के कारण ही परिवार को दरिद्रता की सबसे बुरी दशा नहीं भोगनी पड़ी। वह घरेलू कामों में निपुण थी । वह रसोई बनाने वाली और नौकरानी का काम करती थी, बच्चों को कपड़े पहनाती थी, बच्चों के लिये कपड़े काटती थी और श्रीमती मार्क्स की मदद से उन्हें सीती भी थी । वह घर चलाती थी और साथ ही साथ मुख्य नौकरानी भी थी । बच्चे उसे अपनी माँ के समान प्यार करते थे । वह भी उसी तरह उन्हें प्यार करती थी और उन पर उसका माँ जैसा ही असर था । मार्क्स तथा उनकी स्त्री दोनों उसे एक प्रिय मित्र मानते थे । मार्क्स उसके साथ शतरंज खेला करते थे और बहुत बार हार जाते थे । मार्क्स-परिवार के लिये हेलेन का प्रेम आलोचनात्मक नहीं था । जो कोई मार्क्स की बुराई करता उसकी हेलेन के हाथों खैर न थी । जिसका भी कुटुम्ब से घना सम्बन्ध हो जाता था उसकी वह माँ की तरह देखभाल करने लगती थी । यह कहना चाहिये कि उसने पूरे परिवार को गोद ले लिया था । मार्क्स और उनकी स्त्री के बाद जीवित रहकर अब उसने अपना ध्यान और देखभाल एंगेल्स के ऊपर लगा दी है । उसका युवावस्था में एंगेल्स से परिचय हुआ था और उनसे भी वह उतना ही स्नेह करती थी जितना मार्क्स परिवार से ।

      इसके अलावा यह कहना चाहिये कि एंगेल्स भी मार्क्स के कुनबे का ही एक आदमी  था । मार्क्स की लड़कियाँ उन्हें अपना  दूसरा पिता कहती थीं । वह और मार्क्स एक प्राण दो काया  के समान थे । जर्मनी में बरसों तक उनका नाम साथ-साथ लिया जाता था और इतिहास के पन्नों में उनका नाम सदा साथ-साथ लिखा जायगा । मार्क्स और एंगेल्स ने प्राचीन काल के लेखकों द्वारा चित्रित मित्रता के आदर्श को आधुनिक युग में पूरा कर दिखाया । उनकी युवावस्था में भेंट हुई, उनका साथ ही साथ विकास हुआ, उनके विचारों और भावों में सदैव बड़ी घनिष्ठता रही, दोनों ने एक ही क्रांतिकारी आन्दोलन में भाग लिया और जब तक वे साथ रह सके,  दोनों साथ-साथ काम करते रहे। यदि परिस्थिति ने उन्हें अलग न कर दिया होता तो संभवत: वे जीवन भर साथ रहते ।

      सन 1848 की क्रांति के दमन के बाद एंगेल्स को मेन्चेस्टर जाना पड़ा और मार्क्स को लंदन में रहना पड़ा । फिर भी चिट्ठी-पत्री द्वारा अपने बौद्धिक जीवन की घनिष्ठता उन्होंने बनाये रक्खी । लगभग हर रोज वे एक दूसरे को राजनीतिक और वैज्ञानिक घटनाओं, और जिस काम में वे लगे थे उसके बारे में लिखते रहते थे । जैसे ही एंगेल्स को मैन्चेस्टर से अपने काम से फुरसत मिली उन्होंने लंदन में अपने प्रिय मार्क्स से केवल दस मिनिट के रास्ते की दूरी पर अपना घर बनाया । सन 1870 से सन् 1883 में मार्क्स की मृत्यु तक मुश्किल से कोई दिन ऐसा बीतता होगा जब वे दोनों घरों में से एक घर में आपस में न मिलते हों ।

      जब कभी एंगेल्स मेन्चेस्टर से आने का इरादा प्रकट करते थे, तो मार्क्स के परिवार में बड़ी खुशी मनायी जाती थी । बहुत दिन पहले ही उनके आने के बारे में बातचीत होने लगती थी । और आने के दिन तो मार्क्स इतने अधीर हो जाते थे कि वह काम नहीं कर सकते थे । अंत में भेंट का समय आता था और दोनों मित्र सिगरेट और शराब पीते और पिछली भेंट के बाद जो कुछ हुआ उसकी बातें करते हुए सारी रात बिता देते थे ।

      एंगेल्स की राय को मार्क्स और सबकी सम्मति से यादा मानते थे। एंगेल्स को वह अपने सहयोगी होने के योग्य समझते थे । सच तो यह है कि एंगेल्स उनके लिये पूरी पाठक-मंडली के बराबर थे । एंगेल्स की  समझाने के लिये या किसी विषय पर उनकी राय बदलने के लिये मार्क्स किसी भी परिश्रम को अधिक नहीं समझते थे । उदाहरणार्थ, मुझे मालूम है कि एल्बिजेन्सिज़ की राजनीतिक और धार्मिक लड़ाई के बारे में किसी साधारण बात पर (मुझे अब याद नहीं आता कि वह क्या बात थी ) एंगेल्स का विचार बदलने के उद्देश्य से तथ्य ढूंढने के लिये उन्होंने कई बार पूरी पुस्तकें  पढ़ीं । एंगेल्स का मत परिवर्तन कर लेना उनके लिये एक बड़ी विजय होती थी ।

      मार्क्स को एंगेल्स पर गर्व था । उन्होंने बड़ी खुशी के साथ मुझे अपने मित्र के नैतिक व बौद्धिक गुण गिनाये और, केवल उनसे मेरी भेंट कराने के लिये, उन्होंने मैन्चेस्टर तक यात्रा की । वह एंगेल्स के ज्ञान की बहुमुखता की बड़ी तारींफ  करते थे और उन्हें इसकी चिन्ता रहती थी कहीं उनके साथ कोई दुर्घटना न हो जाय । मुझसे मार्क्स ने कहा कि मुझे हमेशा डर लगता रहता है कि खेतों में पागलों की तरह तेज घोड़ा दौड़ाने में वह कहीं गिर न जाये ।

      मार्क्स जैसे स्नेही पति व पिता थे वैसे ही अच्छे मित्र भी थे । उनकी स्त्री, उनकी लड़कियाँ, हेलेन डेमुथ और फ्रेडरिक एंगेल्स उन जैसे आदमी के स्नेह योग्य थे ।

लोरा मार्क्स

लोरा मार्क्स

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      मार्क्स ने अपना जीवन उग्र पूंजीवादी दल के नेता के रूप में शुरू किया था परन्तु जब उनके विचार बहुत साफ हो गये तो उन्होंने देखा कि उनके पुराने साथियों ने उनको छोड़ दिया और उनके समाजवादी होते ही उनके साथ  दुश्मन जैसा बर्ताव करने लगे । उनके विरूद्ध बड़ा शोर मचाया गया, उनकी बुराई की गयी और उनपर अनेक आक्षेप किये गये, और फिर उन्हें जर्मनी  से निकाल दिया गया । इसके बाद उनके और उनकी रचनाओं के विरूद्ध मौन रहने का षड़यंत्र रचा गया । उनकी पुस्तक ”लुई नैपोलियन की 18 वीं ब्रूमेअर ” का पूरा बाहिष्कार कर दिया गया । उस पुस्तक ने यह सिद्ध कर दिया कि सन् 1848 के सब इतिहासकारों और लेखकों में एक मार्क्स ही थे जिन्होंने दूसरी दिसम्बर सन 1851 की राजनीतिक क्रांति के कारणों और परिणामों क ी असलियत को समझा और उसका वर्णन किया था। उसकी सच्चाई के बावजूद एक भी पूंजीवादी पत्रिका ने इस रचना का उल्लेख तक नहीं किया । ”दर्शनशास्त्र की दरिद्रता ” (जो प्रूधों की पुस्तक ” दरिद्रता का दर्शनशास्त्र ” का उत्तर थी) और ”अर्थशास्त्र की अलोचना ” का भी बहिष्कार किया गया । विश्व मजदूर-संघ की (पहले इंटरनेशनल की)स्थापना और ‘कैपीटल ‘ के पहले भाग के छपने ने पद्रंह बरस से चलने वाले इस षड़यंत्र को तोड़ दिया था । मार्क्स  की अब अवहेलना नहीं की जा सकती थी । विश्व संघ बढ़ा और अपने क ामों की बड़ाई से उसने दुनिया को भर दिया । यद्यपि अपने को पीछे रखकर मार्क्स ने दूसरों को प्रमुख कार्र्यकत्ता होने दिया पर संचालक का पता जल्दी ही लग गया । जर्मनी में सामाजिक-जनवादी दल की स्थापना हुई और वह जल्दी ही इतना बलवान हो गया कि उस पर हमला करने के पहले बिस्मार्क ने उसकी खुशामद की । लास्साल के एक चेले श्वीट्जर ने एक लेखमाला लिखी (जिसे मार्क्स ने भी उल्लेखनीय समझा ) जिसने मजदूर वर्ग के  नेताओं को ‘कैपीटल’ का ज्ञान कराया ।  इंटरनेशनल की कांग्रेस ने जोहान फिलिप बेकर का प्रस्ताव पास किया कि इस किताब को अंतरराष्ट्रीय सोशलिस्टों के मजदूर वर्ग का धर्म-ग्रन्थ समझना चाहिये ।

      18 मार्च सन् 1871 के विद्रोह  के बाद, जिसने विश्व संघ के आदेशानुसार चलने की कोशिश की थी और कम्यून की पराजय के बाद, (जिसको विश्व संघ की सार्वजनिक सभा ने सब देशों के पूँजीवाद अखबारों  के आक्षेपों से बचाया ) मार्क्स का नाम दुनिया भर  में विख्यात हो गया  । अब सारे संसार में उनको वैज्ञानिक समाजवाद का अजेय सिद्धान्तवेत्ता और प्रथम अंतरराष्ट्रीय मजदूर-आन्दोलन का नेता मान लिया गया । हर देश में ”कैपीटल ” समाजवादियों की मुख्य पुस्तक हो गयी । सब समाजवादी और मजदूर-पत्रिकाओं ने उनके सिद्धान्तों को फैलाया और न्यूयार्क की एक बड़ी हड़ताल में मजदूरों को दृढ़ रहने की प्रेरणा देने के लिये और उनको अपनी माँगों की न्यायपूर्णता दिखाने के लिये मार्क्स के लेखों के उद्धरण इश्तिहारों के रूप में छापे गये । ”कैपीटल” का जर्मन से और प्रमुख यूरोपीय भाषाओं (रूसी,  फ्रेंच व अंग्रेज़ी में ) में अनुवाद किया गया । किताब के उद्धरण जर्मन, इटालियन, फ्रेंच, स्पैनिश और डच भाषा में छपे । जब कभी भी योरप या अमरीका में विरोधियों ने मार्क्स के सिद्धान्तों का खंडन करने की कोशिश क ी है, तो समाजवादी अर्थशास्त्री उसका उपयुक्त उत्तर दे सके हैं । आज तो वास्तव में जैसा विश्व संघ के उपरोक्त अधिवेशन ने कहा था, ”कैपीटल ”सर्वहारा वर्ग का धर्म-ग्रंथ हो गया है।

      परन्तु अंतरराष्ट्रीय समाजवादी आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने से मार्क्स को अपने वैज्ञानिक अध्ययन के लिये बहुत कम समय बचता था । और उनकी स्त्री तथा बड़ी लड़की, श्रीमती लौगुएँ की मृत्यु ने इस काम में और भी घातक विघ्न डाला ।

      मार्क्स तथा उनकी स्त्री का सम्बन्ध अत्यन्त धनिष्ठ और परस्पर निर्भरता का था। उसकी सुन्दरता पर मार्क्स को खुशी और अभिमान था और उसकी भक्ति ने उनके लिये उस गरीबी को सहना आसान कर दिया था  जो उनके क्रान्तिकारी, समाजवादी, जीवन का आवश्यक अंग थी । जिस बीमारी ने श्रीमती मार्क्स को कब्र तक पहुंचाया उसने उनके पति के जीवन को भी कम कर दिया । उनकी लम्बी और दुखदायी बीमारी में मार्क्स थक गये – दुख से मानसिक रूप में, और न सोने से और हवा और कसरत की कमी से शारीरिक रूप में । इन्हीं कारणों से उनके फेफड़ों में आसानी से वह सूजन हो गयी जो कि उनकी भी मृत्यु का कारण हुई ।

      श्रीमती मार्क्स का दूसरी दिसम्बर सन 1881 को देहान्त हुआ । मरते दम तक वह कम्युनिस्ट और भौतिकवादी रहीं । उन्हें मृत्यु से कोई डर नहीं लगता था । जब उन्हें अंत समय निकट जान पड़ा तो उन्होंने कहा, ”कार्ल, मेरी ताकत खत्म हो गयी ” । यही उनके अंतिम शब्द थे जो सुने जा सके । पाँचवी दिसम्बर को हाईगेट के कब्रिस्तान की अधार्मिक भूमि में उनको दफनाया गया । जीवन भर के उनके विचारों और उनके पति की सम्मति के अनुसार जनाज् ाे को सार्वजनिक नहीं बनाया गया और शव के अंतिम निवास-स्थान तक केवल थोड़े से घनिष्ठ मित्र साथ गये । कब्र के पास फ्रेडरिक एंगेल्स ने कहा :”मित्रों, जिस ऊँचे विचारवाली स्त्री को हम यहाँ दफना रहे हैं वह सन 1814 में साल्जवीडल में पैदा हुई थी । कुछ ही दिन बाद इनके पिता बैरन फौन वेस्टफेलन राय के मंत्री नियुक्त हुए और उनकी ट्रेव्सको बदली हो गयी और वहाँ वे मार्क्स के परिवार के गाढ़े दोस्त हो गये । बच्चे साथ-साथ बड़े हुए । दोनों प्रतिभाशाली स्वभावों ने एक दूसरे को पाया। जब मार्क्स विश्वविद्यालय में गये तब इन दोनों ने अपने जीवन को एक सूत्र में बांधने का निश्चय कर लिया था ।

      ”पहले राइनिश जाइटुंग के दमन के बाद, जिसके कुछ समय तक मार्क्स सम्पादक थे, सन 1843 में उनका विवाह हो गया। तब से जेनी मार्क्स ने अपने पति के भाग्य, परिश्रम और संघर्ष में हिस्सा ही नहीं लिया बल्कि अच्छी तरह समझकर और बड़े जोश में उनमें हाथ बँटाया।

      ”तरुण दम्पति पैरिस गये क्योंकि उनको देश निकाला, जो पहले उनकी अपनी इच्छा के कारण था, अब वास्तव में मिल गया । प्रशा की सरकार ने मार्क्स का वहाँ भी पीछा न छोड़ा । मुझे दुख के साथ कहना पड़ता है कि अलैक्जेंडर फौन हमबोल्ड्ट जैसे आदमी ने भी मार्क्स के निर्वासन की आज्ञा जारी करने में सक्रिय भाग लिया । मार्क्स के कुटुम्ब को ब्रूसेल्स भागना पड़ा। इसके बाद फरवरी की क्रान्ति हुई । उसके बाद जो गड़बड़ फैली उससे ब्रूसेल्स भी अछूता न बचा और बेल्जियम की सरकार सिर्फ मार्क्स को कैद करने से संतुष्ट नहीं हुई बल्कि उसने उनकी

पत्नी को भी बिना कारण जेल में डालना उचित समझा ।

      ”जो क्रांतिकारी प्रगति सन 1848 के आरम्भ में शुरू हुई थी वह अगले साल ही खत्म हो गयी । निर्वासन फिर शुरू हुआ – पहले तो पैरिस में और फिर फ्र ांस की सरकार  की दुबारा कोशिश से लन्दन में । इस बार तो जेनी मार्क्स के लिये यह सचमुच का निर्वासन था और उन्हें निर्वासन के सब दुख झेलने पड़े । फिर भी उन्होंने भौतिक कठिनाईयों को शांति से सहा यद्यपि इसके कारण उनके  अपने दो लड़कों व एक लड़की को मौत के मुँह में जाते हुए देखना पड़ा । उनको इससे घोर दुख इस बात का हुआ कि सरकार और पूँजीवादी विरोधी दल, झूठे उदारपंथियों से लेकर जनवादियों तक, सब उनके पति के विरूद्ध एक बड़े भारी षड़यंत्र में मिल गये थे । उन लोगों ने मार्क्स पर अत्यन्त घृणित और नीच दोष लगाये थे । सब अखबारों ने उनका बहिष्कार कर दिया जिससे कुछ समय तक वह ऐसे दुश्मन के सामने निहत्थे  खड़े रहे जिसे वह और उनकी स्त्री केवल घृणित ही मान सकते थे । और यह दशा बहुत समय तक रही ।

      ”परन्तु इस परिस्थति का भी अंत हुआ । योरप के सर्वहारा वर्ग को थोड़ी बहुत स्वतंत्रता मिली और इन्टरेशनल (विश्व संघ) की स्थापना की गयी । मजदूरों का वर्ग-संघर्ष एक देश से दूसरे देश में फैला और कार्ल मार्क्स, अगुओं के भी अगुआ होकर लड़े। मार्क्स पर किये गये आरोपों को श्रीमती मार्क्स ने हवा के सामने भूसे की तरह उड़ते देखा । सामन्तवादियों से लेकर जनवादियों तक, सब विभिन्न प्रतिगामियों ने जिस सिद्धान्त का दमन करने के लिए इतनी मेहनत की थी, उनको उन्होंने सारे सभ्य संसार की भाषाओं में खुले आम प्रतिपादित होते देखा । मजदूर-आंदोलन उनके प्राणों का प्राण था, उसे उन्होंने रूस से अमरीका तक पुरानी दुनिया की नींव को हिलाते हुए देखा और प्रबल विरोध के होते हुए भी विजय के अधिकाधिक विश्वास के साथ आगे बढ़ते देखा । राइशटाग के (जर्मन पार्लियामेण्ट के) पिछले चुनाव में जर्मन मजदूरों ने अपनी अपार शक्ति का जो प्रबल प्रमाण दिया उसे देखकर उन्होंने अपार संतोष का अनुभव किया ।

      ”जिस स्त्री की बुद्धि इतनी तीक्ष्ण और आलोचनात्मक थी, जिसे इतनी राजनीतिक समझ थी, जिसमें इतना उत्साह और शक्ति थी, मजदूर आंदोलन के अपने साथी योद्धाओं के लिये जिसके मन में इतना स्नेह था, ऐसी स्त्री ने पिछले चालीस बरसों में क्या-क्या किया, यह जनता को मालूम नहीं है । यह सम-सामयिक अखबारों के पन्नों में अंकित नहीं है । यह सिर्फ उन्हें मालूम है जिन्होंने इस सबका अनुभव किया है । परन्तु इसका मुझे भरोसा है कि कम्यून के दमन के बाद भागे हुए आदमियों की स्त्रियाँ बहुत बार उन्हें याद करेंगी और हममें से बहुत से उनकी चतुर और साहसपूर्ण सलाह की कमी को दुख से याद करेंगे, जो साहसपूर्ण होती थीं परन्तु गर्वपूर्ण नहीं, चतुर होती थी परन्तु असम्मानजन नहीं ।

      ”मुझे उनके निजी गुणों के बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है । उनके मित्र जानते हैं और उन्हें सदा याद रखेंगे । यदि कभी कोई ऐसी स्त्री थी जिसे दूसरों को सुखी बनाने में ही चरम सुख मिलता था तो वह श्रीमती मार्क्स थीं ।”

      अपनी स्त्री की मौत के बाद मार्क्स का जीवन शारीरिक और नैतिक दुख से भारी हो उठा किन्तु वह उसे धैर्य से सहते रहे। पर जब साल भर बाद उनकी बड़ी लड़की श्रीमती लौंगुए भी चल बसीं तो यह दुख बहुत बढ़ गया । उनका दिल टूट गया और वे इस शोक को न भूल सके । 14 मार्च सन् 1883 को 67 वें वर्ष में वह अपने काम करने की मेज के सामने बैठे हुए सदा के लिये सो गये ।

एलिएना, लीबनेख्त  के साथ

एलिएना, लीबनेख्त के साथ

एलिएना का पत्र है लीबनेख्त  के लिए

By एलिएना मार्क्स 

मुस्तंफा (एलजीअर्स) में मूर के (मार्क्स) ठहरने के बारे में मैं इससे कुछ यादा नहीं कह सकती कि मौसम बहुत बुरा था । मूर को वहाँ एक बड़ा होशियार और दोस्ताना बर्ताव का डॉक्टर मिला और होटल में हर एक आदमी उनका ख्याल करता था और उनसे दोस्त की तरह मिलता था ।

      सन् 1881-82 की शरद ऋतु तथा जाड़ों में मूर पहले तो जेनी के पास पैरिस के निकट आरज़ेनतियूल में रहे । वहाँ हम लोग मिले और कुछ हफ्तों तक साथ रहे । फिर वह दक्खिनी फ्रांस और एलज़ीरिया गये परन्तु बहुत बीमार होकर लौटे । वाइट के टापू पर वेन्टनोर में उन्होंने सन 1882-83 की शरद ऋतु और जाड़े बिताये और वहाँ से वह 8 जनवरी को जेनी की मृ्त्यु के बाद सन 1883 में लौटे ।

      अच्छा अब कार्ल्सबाद के बारे में । हम सबसे पहले वहाँ सन 1874 में गये थे। नींद न आने और तिल्ली की शिकायत के कारण मूर को वहां भेजा गया था । पहली बार जाने से उन्हें बहुत फायदा हुआ इसलिये अगले साल सन 1875 में वहाँ अकेले गये । उसके अगले साल उन्होंने मुझे बहुत याद किया था । कार्ल्सबाद में बड़ी ईमानदारी से उन्होंने अपना इलाज किया और जो कु छ डॉक्टरों ने बताया बिल्कुल वही किया । वहाँ हमारे बहुत से दोस्त बन गये । यात्रा के लिये मूर बड़े अच्छे साथी थे । वह हमेशा खुश रहते थे और हर चीज को पसन्द करते थे, चाहे वह सुन्दर दृश्य हो या  शराब का गिलास । इतिहास के अपने विस्तृत ज्ञान से वह हर जगह को भूतकाल में वर्तमान से भी यादा सजीव बनाकर दिखा सकते थे।

      मैं समझती हूँ कि मार्क्स के कार्ल्सबाद में रहने के बारे में बहुत सी बातें कही गयीं  हैं।और बातों के साथ-साथ मैंने एक लम्बे लेख के बारे में सुना था । मुझे अब याद नहीं कि वह किस पत्रिका में छपा था । शायद डी. में रहने वाला एम.ओ. इसके बारे में कुछ और बता सकेगा। उसने मुझसे एक बड़े अच्छे लेखक के बारे में कहा था ।

      सन 1874-75 में हम दोनों लीपज़िग में मिले । फिर घर लौटते हुए हम लोग बिन्गेन गये जो मार्क्स मुझे दिखाना चाहते थे क्योंकि मेरी माँ के साथ वे वहाँ ‘हनीमून’ के लिये गये थे । इसके अलावा इन दो यात्राओं में हम ड्रेस्डेज, बर्लिन, हैंमबर्ग और न्यूरमबर्ग भी गये ।

      सन 1877 में मूर को फिर कार्ल्सबाद जाना चाहिये था । परन्तु हमें यह खबर मिली कि जर्मनी तथा ऑस्ट्रिया की सरकार का उन्हें निकाल देने का इरादा है । यात्रा इतनी लम्बी और खर्चीली थी कि देश निकाले के खतरे की अवहेलना नहीं की जा सकती थी । इसलिये मूर फिर कार्ल्सबाद नहीं गये । इससे उन्हें हानि हुई क्योंकि वहाँ अपना इलाज करने के बाद उन्हें ऐसा लगता था कि उनका कायाकल्प हो गया है ।

      मेरे पिता के वफादर दोस्त और मेरे प्रिय मामा एडगर फौन वेस्टफेलन से मिलने के लिए ही हम बर्लिन गये थे । वहाँ हम थोड़े कम दिन ही रहे । मूर को यह सुनकर बड़ी खुशी हुई कि तीसरे दिन, हमारे चले जाने के ठीक एक घण्टे बाद, पुलिस उनके लिये होटल में आयी थी ।

      सन 1880 के शरदकाल में जबकि हमारी प्यारी माँ, इतनी बीमार थीं कि वह मुश्किल से पलंग पर से उठ सकती थी, मूर को प्लूरसी का दौरा हुआ । वे हमेशा अपनी बीमारी के बारे में लापरवाही करते रहे थे इसलिये वह इतनी ख़तरनाक हो गयी । हमारा श्रेष्ठ मित्र डौकिन, जो डॉक्टर था, बीमारी को निराशाजनक समझता था । बड़ी विपदा का समय था । सामने के बड़े कमरे में मां लेटी रहती थीं, पीछे वाले में मूर । और वे दोनों जो परस्पर इतने निकट थे और एक दूसरे के साथ रहने के इतने आदी हो गये थे, वे एक ही कमरे में नहीं रह सकते थे ।

      मुझे और हमारी बुढ़िया लेन्चेन को (तुम जानते हो वह हमारे लिये क्या थी ) उन दोनों की देखभाल करनी पड़ी । डॉक्टर ने यह कहा कि हमारी देखभाल ने ही मूर की जान बचा ली । खैर, जो कुछ भी हो, मैं तो सिर्फ यह जानती हूँ कि तीन हफ्ते तक मैं और लेन्चेन बिल्कुल नहीं सोये । हम दोनों दिन और रात इधर से उधर फि रते थे और हममें से कोई बिल्कुल थक जाता था तो हम बारी-बारी से एक घंटा आराम कर लेते थे । एक बार मूर ने अपनी बीमारी को परास्त कर दिया। मैं वह दिन कभी नहीं भूलूँगी जब उन्होंने माँ के कमरे में जाने लायक शक्ति का अनुभव किया । साथ-साथ वे दोनों जवान बन गये, वह एक प्रेमिका युवती और वह एक प्रेमी युवक जो साथ-साथ जीवन में पदार्पण कर रहे थे । बीमार से क्षीण बूढ़े और मरती हुई बुढ़िया की सी जो जीवनभर के लिये बिदा हो रहे हैं, उनकी अवस्था न रही।

      मूर कुछ सुधर गये और यद्यपि उनमें अभी तक ताकत नहीं थी तो भी वह ताकतवर मालूम होने लगे ।

      फिर माँ की मृत्यु हो गयी, दूसरी दिसम्बर सन 1881 को । उनके अन्तिम शब्द मार्क्स के प्रति थे और यह अचरज की बात है कि वे अंग्रेज़ी में थे । जब हमारे प्रिय जनरल (एंगेल्स) आये तो इस मृत्यु का समाचार सुनकर उन्होंने कहा कि मूर भी मर गया । इस बात को सुनकर उस समय तो मुझे बहुत क्रोध आया था ।

      किन्तु सचमुच था ऐसा ही ।

      माँ के प्राणों के साथ मूर के प्राण भी चले गये । उन्होंने काम चलाते रहने की बड़ी कोशिश की क्योंकि वह अन्त समय तक योद्धा बने रहे । पर उनका दिल टूट चुका था । उनकी सेहत बिगड़ती ही चली गयी । अगर वह यादा स्वार्थी होते तो होनी को होने देते परन्तु उनके लिये एक चीज सबसे पहले थी और वह थी साम्यवादी क्रांति के लिये उनकी भक्ति। उन्होंने अपनी महान रचना को पूरा करने की कोशिश की और इसलिये वह अपने स्वास्थ्य के लिये एक और यात्रा करने को राजी हो गये ।

      सन् 1882 के बसन्तकाल में वह पैरिस और आरजेनतियूल गये जहाँ मैं उनसे मिली और हमने जेनी तथा उसके बच्चों के साथ सचमुच बड़ी खुशी से कुछ दिन बिताये। फिर मूर पश्चिमी फ्रांस गये और उसके बाद एलज़िअर्स ।

      एलजिअर्स, नीस तथा कैन्स में सब  जगह जब तक वे रहे तब तक उन्हें मौसम खराब मिला । उन्होंने एलजिअर्स से मुझे लम्बे-लम्बे पत्र लिखे । उसमें से बहुत से मेरे पास से खो गये हैं, क्योंकि मूर के कहने से मैं उन्हें जेनी को भेज देती थी और उसने उनमें से बहुत कम वापिस किये ।

      जब आखिरकार मूर घर लौटे तो वह बहुत बीमार थे और हमें अब अनिष्ट की आंशका होने लगी । डॉक्टर की सलाह से उन्होंने शरद ऋतु और जाड़े के दिन वाइट के टापू पर वेन्टनोर में बिताये । मुझे यहाँ कह देना चाहिये कि उस समय मूर की इच्छा के अनुसार मैंने जेनी के सबसे छोटे लड़के जौनी के साथ इटली में तीन महीने बिताये । सन 1883 के बसन्तकाल में मैं मूर के पास वापिस चली गयी और अपने साथ जौनी को ले गयी जो नाती-नातनियों में उनका विशेष लाड़ला था । मुझे वापस जाना पड़ा क्योंकि मुझे पढ़ाना था ।

      और अब अन्तिम भयंकर धक्का लगा, जेनी की मृत्यु की खबर आयी । जेनी मूर की सबसे बड़ी और सबसे लाड़ली बेटी थी । वह अचानक 8 जनवरी को चल बसी । हमारे पास मूर के पत्र आये थे – और वे इस समय भी मेरे सामने रखे हैं – जिनमें उन्होंने लिखा है कि जेनी की सेहत बेहतर है और हमें (हेलेन को और मुझे) फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है । जिस पत्र में मूर ने यह लिखा था उसके मिलने के एक घंटे बाद ही हमें जेनी की मृत्यु का तार मिला । मैं तुरन्त वेन्टनोर गयी ।

      मेरे जीवन में बहुत सी दुख की घड़ियाँ बीती हैं परन्तु इतनी करुण कोई भी नहीं। मुझे ऐसा मालूम पड़ा जैसे मैं अपने बाप को उनकी मौत की सज़ा की खबर देने जा रही हूँ । लम्बी और फि क्र भरी यात्रा में मैं यह सोचकर अपने दिमाग को यातना देती रही कि मैं उन्हें यह खबर कैसे दूँ । मुझे कहने की ज़रूरत नहीं हुई । उन्हें तो मेरे चेहरे से सब मालूम हो गया । मूर ने कहा ”हमारी जेनी मर गयी” और फिर मुझसे पैरिस जाने और बच्चों की देखभाल में मदद करने को कहा । मैं तो उनके साथ रहना चाहती थी पर उन्होंने एक न सुनी। मुझे वेन्टनोर पहुँचे मुश्किल से आधा घंटा हुआ होगा कि मैं फौरन पैरिस को रवाना होने के लिये उदासी से लन्दन जा रही थी । मूर ने जो कहा वह मैंने बच्चों के ख्याल से किया ।

      मैं अपनी यात्रा की बात नहीं करूँगी, उसे याद करके मैं कांप जाती हूँ । वह यातना, वह मानसिक कष्ट – पर उसे जाने दो । यह कहना काफी है कि मैं लौट आयी और मूर वापस घर चले गये – मरने के लिये ।

      अब अपनी माँ के बारे में एक बात । वह महीने भर मृत्यु शैया पर पड़ी रहीं और उन्होंने उन सब दारुण कष्टों को सहा जो कैन्सर के साथ आते हैं । परन्तु फिर भी उनका अच्छा स्वभाव, उनका उन्मुक्त हास्य, जिसे तुम खूब जानते हो, एक पल भर के लिये भी नहीं गया । उन दिनों (सन 1881 में) जर्मनी में जो चुनाव हो रहे थे उनके नतीजे के बारे में वह उत्सुकता से पूछती थीं और हमारी जीत पर उन्हें बड़ी खुशी हुई । मरते समय तक वह हँसमुख रहीं और मजाक करके हमारी फिक्र को मिटाने की कोशिश करती रहीं । हाँ, इतने घोर दुख में भी वह मजाक करती थीं, हँसती थीं । वह डॉक्टर के और हम सब के ऊपर हँसती थीं, क्योंकि हम इतने गंभीर थे । लगभग अंतिम क्षण तक उन्हें पूरा होश रहा और जब वह और नहीं बोल सकीं – उनके अंतिम शब्द ‘कार्ल’ के प्रति थे – तो उन्होंने हमारा हाथ दबाया और मुस्कराने क ी कोशिश की ।

      जहाँ तक मूर का सवाल है, तुम जानते हो कि मैटलैण्ड पार्क में वह अपने सोने के कमरे से पढ़ने के कमरे में गये, आराम कुर्सी पर बैठे और शांति से सो गये ।

      ”जनरल ” ने इस आरामकुर्सी को अपनी मृत्यु तक रखा और अब वह मेरे पास है

      अगर तुम मूर के बारे में लिखो तो लेन्चेन को मत भूल जाना । मैं जानती हूँ, तुम माँ को नहीं भूलोगे । कुछ हद तक लेन्चेन वह धुरी थी जिसके चारों ओर सारा घर चलता था । वह सच्ची और सबसे अच्छी दोस्त थी । इसीलिये अगर तुम मूर के बारे में लिखो तो लेन्चेन को मत भूल जाना।

      जब तुम्हारी इच्छा है तो अब मार्क्स के दक्ख़िन में रहने के बारे में थोड़ा और कहती हूँ। हमने यानी मैंने और मूर ने सन 1882 के शुरु में आर्जेनतियूल में जेनी के साथ कुछ हफ्ते बिताये। मार्च और अप्रैल में मूर एलज़िअर्स में रहे और मई में मौन्टिकार्लों, नीस व कैन्स में । जून के अंतिम दिनों में और जुलाई  भर वह फिर जेनी के साथ रहे और उस समय

लेन्चेन भी आजर्ेनतियूल में थी । आर्ज़ेनतियूल से मूर लारा के साथ, स्विटज़रलैण्ड, बेवी वगैरह गये । सितम्बर के अन्त या अक्टूबर के शूरू में वह इंग्लैण्ड लौटे और फौरन वेन्टनोर गये जहाँ मैं और जौनी उनसे मिले थे ।

      एडगर मुश का जन्म 1847 में हुआ था – मुझे ठीक नहीं मालूम – सन् 1855 में वह मर गया । छोटा फौक्स (फोक्सचेन) हाइनरिख पाँचवी नवम्बर सन् 1849 को पैदा हुआ था और दो बरस का ही मर गया था । मेरी छोटी बहिन, फ्रैसिस्का जो सन 1851 में हुई थी लगभग ग्यारह महीने की उम्र में ही मर गयी थी ।

      और अब मैं अपनी प्रिय हेलेन के बारे में तुम्हारे सवाल को लेती हूँ । हम लोग उसे ‘निमी ‘ कहते थे । क्योंकि न मालूम क्यों बचपने से ही जौनी लौंगुए उसे यही कहकर पुकारता था। आठ या नौ बरस के बच्चे की तरह लेन्चेन वेस्ट-फेलिया से मेरी नानी के पास आई थी और वह मूर, माँ और एडगर फौन वेस्टफेलन के साथ बड़ी हुई । हेलेन को पुराने वेस्टफेलन से हमेशा बड़ा प्रेम रहा – और मूर को भी । बूढ़े बैरन फौन  वेस्टफेलन के बारे में, उनके शेक्सपियर और होमर के ज्ञान के बारे में बतलाते हुए मूर कभी नहीं थकते थे । वे शुरू से आखीर तक होमर की पूरी कविताऐं सुना सकते थे । शेक्सपियर के अधिकांश नाटक अंग्रेजी और जर्मन दोनों में उन्हें जबानी याद थे । इसके विपरीत मूर के पिता ,और मूर अपने पिता का बड़ा सम्मान करते थे, – 18 वीं सदी के असली फ्रांसवादी थे । जिस तरह वेस्टफेलन को शेक्सपियर और होमर याद था, उसी तरह उन्हें वोल्तेअर और रूसो पूरे ज़बानी याद थे । और निस्संदेह बहुत हद तक मार्क्स की बहुमुखी प्रतिभा उनके माँ-बाप के प्रभाव का परिणाम थी ।

      किन्तु अब हेलने के विषय पर वापिस आना चाहिये । मैं नहीं कह सकती कि हेलेन मेरे माँ-बाप के पास कब आयी – उनके पैरिस जाने के पहले या बाद (जहाँ वे शादी के बाद जल्दी ही गये थे) । मैं सिर्फ यह जानती हूँ कि नानी ने माँ के पास उस लड़की को यह कहकर भेजा था कि प्रिय और वफादार लेन्चेन के रूप में वह सबसे अच्छी वस्तु भेज रहीं हैं । और वफादार लेन्चेन बराबर मेरे माँ-बाप के साथ रही और बाद में उसकी छोटी बहिन मैरियान भी आ गयी । मैरियान की तुम्हें शायद ही याद होगी, क्योंकि वह तुम्हारे समय के बाद आयी थी ।

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5 thoughts on “कार्ल मार्क्स और उनका आदर्श कम्युनिस्ट परिवार

  1. Dhiraj on said:

    A really nice collage of information of and narrative to put them together: something that we must go through.

  2. मार्क्स के परिवार व् उनके परिवेश के वारे में नई जानकारी की लिए तहेदिल से शुक्रिया.
    बहुत अच्छी श्रखला .

    • Dhiraj said:
      A really nice collage of information of and narrative to put them together: something that we must go through.
      दमन विरोधी मोर्चा बरेली said:
      मार्क्स के परिवार व् उनके परिवेश के वारे में नई जानकारी की लिए तहेदिल से शुक्रिया.
      बहुत अच्छी श्रखला .
      the same here…

  3. जया सजल on said:

    अत्यंत रोचक और ज्ञानवर्धक…….किसी की जीवनी से भी बढ़कर……मार्क्स को इतने नजदीक से जानना बेहद रोमांचक अनुभव रहा…….आपके प्रयास के लिए बधाई

  4. शुक्रिया !

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