सहमतिया संप्रदाय: हिन्दी पब्लिक स्फीयर वाया फेसबूक

By उदय शंकर 

‘हिन्दी पब्लिक स्फीयर’ के बारे में शोध करने वालों का तांता लगा हुआ है। वे उस समय के बारे में ज्यादा उन्मुख हैं, जब हिन्दी साहित्य और संवाद की भाषा बन रही थी। किसी भी देश-काल-भाषा के पब्लिक स्फीयर को परिभाषित करने में सबसे बड़ी बाधा या चुनौती उन्हें साहित्य से मिलती है। क्योंकि लेखक अपनी कहानियों/कविताओं/आलोचनाओं के जरिये प्रत्यक्षतः कोई संकेत नहीं छोड़ता है या साफ शब्दों में कहें तो वह कोई उपदेशक या रिपोर्टर नहीं होता है, न रात का और न दिन का। वह समाज के या मम के मर्म का द्रष्टा होता है इसीलिए उसके सहारे समाज की परिधि में नहीं बल्कि हृदय में पहुंचा जाता है। लेकिन, इसे पाने के लिए शोधार्थी की योग्यता में सब्र, सहिष्णुता, तीक्ष्णता और संवेदनशीलता जैसे गुणों का रहना लगभग अपरिहार्य है। यह अकारण नहीं है कि उस हिन्दी पब्लिक स्फीयर को अगर किसी एक मात्र आलोचक ने पकड़ने की कोशिश की है तो वह हैं श्री रामविलास शर्मा। लेकिन इतना श्रमसाध्य (मानस के साथ) अभ्यास कोई काहे को करेगा। इसलिए चालू शोधार्थी  अक्सर कुछ उत्तेजक/विवादोन्मुख चिट्ठी-पत्री के जुगाड़ में लगा रहता है। जैसे ही वह उसके हाथ में आती है, उसकी कलम यूरेका-यूरेका बहने लगती है। हिन्दी पब्लिक स्फीयर की चर्चित-अनूदित पुस्तकें इसी यूरेका-यूरेका की गूँज से गुंजयमान हैं।

धन्यवाद गूगल जी

धन्यवाद गूगल जी

यह तो एक भूमिका थी। मैं सोच रहा था कि आज से 100 साल बाद यदि कोई शोधार्थी इस समय के हिन्दी पब्लिक स्फीयर पर बात करेगा तो, वो सबसे पहले क्या ढूंढेगा (उम्मीद है कि उस समय भी रामविलास शर्मा जैसे एक-दो ही होंगें, इसलिए ऐसे लोगों की साहित्योन्मुख अभिरुचियों को छोड़ ही दिया जाय)! मुझे लगता है जो अनूदित-चर्चित किताबें होंगी उनमें हिन्दी लेखकों के फेसबूक स्टेटस की बहुत चर्चा होगी(क्योंकि यह सीआईए के आर्काइव में सुरक्षित होगा)। फेसबूक प्रोफ़ाइलस को हासिल करने के लिए शोधार्थी सीआईए में जुगाड़ बैठाएगा, घंटों एक-एक प्रोफ़ाइल को गंभीरता से सालों तक पढ़ता रहेगा और फिर कुछ निष्कर्षों या समस्या-समाधानों के साथ अपना शोध सम्पन्न करेगा। किताब पहले अङ्ग्रेज़ी में छपेगी जिसे सबसे पहले कोई बाबू मुशाय अमेरिका या इंग्लैंड में पढ़ लेगा। फिर वह अनूदित होकर हिन्दी में आएगी। उसमें मुख्य बातें क्या होंगी, वे बिन्दुवार निम्न हैं:

  • हिन्दी में पाँच से दस हजार की संख्या में जागरूक लोग थे।
  • प्रत्येक हिन्दी लेखक के पास एक बंधुआ फोटोग्राफर होता था क्योंकि वे अक्सर फोटो खिंचवाते थे। वे अपनी विदेश यात्राओं की तस्वीरों को शब्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण समझते थे, क्योंकि उनके हिसाब से इनमें शब्दों से ज्यादा गूढ रहस्य होते थे। वे विदेश-यात्राओं की तस्वीरों को ही यात्रा संस्मरण समझते थे।
  • हिन्दी लेखक घरेलू किस्म के लोग होते थे, क्योंकि वे फेसबूक पर अक्सर अपनी बीबी, बच्चों और रिशतेदारों की चर्चा करते थे। उनकी लिखी कविताओं, विचारों को प्रमुखता से शेयर करते थे, बात-बात में उन्हें टैग करते थे। वे चाहते थे कि उन्हें जो लोकप्रियता और सामर्थ्य हासिल हुआ है वे उनके परिवार को भी हो।
  • हिन्दी लेखक अंग्रेजी भी जानते थे क्योंकि वे अपने लिखे को या अपने पर लिखे को छोड़कर बाकी सबकुछ  अंग्रेजी में शेयर करते थे। वे साहित्य की भी बातें करते थे इससे पता चलता है कि वे कभी साहित्य भी लिखा करते थे। लेकिन फेसबूक साक्ष्य बताता है कि वे सिर्फ विदेशियों के लिखे साहित्य, जो या तो मूल अँग्रेजी में होता था या अँग्रेजी में अनूदित होता था, को ही पढ़ने लायक और शेयर करने लायक समझते थे। उनके फेसबूक से यह भी पता चलता है कि हिन्दी साहित्य-समाज के बारे में लेखक के अलावा जो आधिकारिक ज्ञाता था वो कोई अमेरीकन/ब्रिटिश या हिंदीतर अंगेजीदां था।
  • किसी एक लेखक के सहारे पता नहीं चलता है कि कोई दूसरा भी लेखक हुआ था, क्योंकि एक लेखक के पास कोई दूसरा लेखक नहीं दिखता है, 4099 या इससे अधिक की संख्या में सिर्फ इनके फ़ालोवर होते थे जो सिर्फ ‘सहमत-सहमत’ नामक एक पारिभाषिक टर्म  का इस्तेमाल करते थे जिसका शाब्दिक अर्थ ‘साथ हूँ’ होता है। इसीलिए कई-एक लेखकों के फ़ेसबूक के तुलनात्मक अध्ययन का सहारा लेना पड़ता है। तीन-चार लेखकों की बानगी लेने के बाद पता चलता है उस समय  ‘सहमतिया’ संप्रदाय बहुत ही लोकप्रिय था क्योंकि 3000 या इससे अधिक सहमतिया लोग हर लेखक के फ़ालोवर थे। इका-दुका लोगों की प्रोफ़ाइल ऐसी दिखी जिनके सहमत कहने का अर्थ ‘सहमतिया’ संप्रदाय के अर्थ से मेल नहीं खाता है।
  • हिन्दी लेखक दुनिया के अन्य भाषाओं के लेखकों की अपेक्षा ज्यादा यौन-संवेदिक हुआ करता था क्योंकि जितनी गंभीरता और संवेदनशीलता से साथ वह महिला फ़ालोवर्स की पोस्ट लाइक करता था या उन पर कमेंट करता था उस संवेदनशीलता को हासिल करने के लिए पुरुष फ़ालोवर अक्सर लीला रूप धारण करते थे ऐसा द्रष्टव्य होता है।
  • प्रत्येक हिंदी लेखक के पास प्रशंसकों की पूँजी होती थी. प्रथमतया वे प्रशंसक कम दलाल ज्यादा दीखते हैं क्योंकि ‘गरीब लेखकों’ के प्रशंसक न के बराबर दीखते हैं. ये सारे दलाल से दिखने वाले प्रशंसक अपने अध्ययन-कार्य क्षेत्र के असफल लोग लगते हैं, क्योंकि इनमें से अधिकांश का स्वाभाविक कर्म-क्षेत्र या अध्ययन-क्षेत्र हिंदी साहित्य नहीं दिखता है. लेकिन इन्हें दलाल कहना इसलिए पुष्ट नहीं होता है क्योंकि लेखक गण इन्हें बहुत ही आदर-सत्कार से स्मरण करते थे. अमेरीकी अनुभव के आधार पर यह भी अनुमान लगाया जा सकता है ये लोग वेतनभोगी प्रचारकर्ता थे. लेकिन यह हिंदी साहित्य की बात है इसीलिए लेखक का वक्तव्य सर्वोपरि माना जाना चाहिये. इससे यह अनुमित होता है कि हिंदी साहित्य का प्रचार साहित्येत्तर और गैर हिंदी जमातों तक सुनिश्चित हो रहा था.

जारी….

 उदय शंकर

उदय शंकर

 

जेएनयू से पीएचडी के लिए शोधरत। तीन खंडों में आलोचक सुरेंद्र चौधरी के रचना संचयन का संपादन। सांस्‍कृतिक आंदोलनों से जुड़ाव। उनसे udayshankar151@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

 

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