श्रीनगर उर्फ काहे का स्वर्ग: उस्मान ख़ान

विश्वविद्यालय की दीवार के किनारे-किनारे मैं चलता रहा। रुमी गेट के थोड़ा ही आगे दीवार पर किसीने मोटे मोटे हरुफ़ में ‘वेलकम तालीबान’ लिखा हुआ था। पढ़कर पहले तो अजीब लगा, फिर उतना भी अजीब नहीं रहा। नौजवान लड़के-लड़कियाँ विश्वविद्यालय की तरफ जा रहे थे। मैं एक झील के किनारे बने बागीचे में जाकर बैठ गया। देखता रहा चीनार, औरतें, आदमी, बच्चे, पहाड़ी।

……यहाँ और भी खराब

BY उस्मान ख़ान

“What is “there” becomes “here” when you reach it; likewise your today disguises itself in the form of tomorrow”. – Bedil[1]

A snap shot from a film by Majid Majidi

A snap shot from a film by Majid Majidi

दिल्ली

पसीने से तरबतर हम दोनों ऑटो  में ही बैठे रहे। लम्पट लड़कों का एक दल मुमताज़ भाई का अभिवादन कर मैदान की ओर चला गया। मुमताज़ भाई ने सिगरेट एक लड़के की ओर बढ़ाई, जो उस दल से कटकर रुक गया था। ‘सादिक कहाँ हैं?’ मुमताज़ भाई ने उस लड़के से पुछा। लड़के ने इतना लम्बा कश खींचा कि एक चैथाई सिगरेट फर से राख हो गई, उसने मैदान की तरफ जाते लड़कों की तरफ देखा। ‘स्टेशन पर ‘काम’ करने गया है।’ उसने जवाब दिया। ‘ये क्या हुआ?’ उसके चोंट खाए दाएं हाथ की तरफ देखते हुए एक मुस्कान उसी के चेहरे पर उभर आई। ‘साले ने खिड़की से कुचल दिया।’ ‘कैसे?’ मुमताज़ भाई ने हैरत और चुटकी लेने के अन्दाज़ में पुछा। ‘चैन खींच रहा था। इतने में पास वाले हरामी ने खिड़की नीचे कर दी। दो-तीन बार ज़ोर-ज़ोर से पटक दी। बहिनचैद!’ मुमताज़ भाई ने धीरे से मुसकुराते हुए, अपने मुँह में जीभ फेरी और आखरी कश के लिए सिगरेट उसकी तरफ बढ़ा दी। ‘वो लोग क्या दारु पीने गए हैं?’ लड़के ने हामी में सिर हिलाया। ‘सादिक भी उनके साथ ही है क्या?’ मुझे लगा मुमताज़ भाई को उसकी बात पर यकीन नहीं हुआ था। ‘पता नहीं।’ कहते हुए लड़के ने सिगरेट का सुलगता ठूँठ नाली में फेंक दिया और मुमताज़ भाई का अभिवादन करता हुआ, मैदान की ओर चल पड़ा। शायद उसे भी कोई फर्क नहीं पड़ा कि पहले उसने क्या कहा था।

हम दोनों गर्मी के मौसम को गाली देते हुए बैठे रहे। लोगों के दल के दल स्टेशन की ओर बढ़े जा रहे थे। कोई किसीको नहीं जानता और सब एक जैसे थे। मुमताज़ भाई के लिए सब सवारी, मेरे लिए सब चरित्र। शहरी, कस्बाई, ग्रामीण। तमील, बंगाली, पंजाबी, बिहारी। धोती, पाजामा, जिंस, फ्रॉक, साड़ी, सलवार। सब अलग और सब एक जैसे। यात्री! मैं भी इसी रेले में उतरने वाला था।

मैं सोचने लगा, उस लड़के के दाएं हाथ के पहुँचे की हड्डी टूट गई थी। कितना भयानक दृष्य रहा होगा। एक लड़का किसी रेल में बैठी औरत के गले से चैन खींच रहा है, उसका हाथ अचानक खिड़की से दबता है, और फिर लगातार खिड़की के प्रहार सहता है। लेकिन अपनी बात कहते वक़्त लड़के के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। रिस्क में ही बरकत है, बिना रिस्क लिए बिहार से दिल्ली पहुँचे ये लड़के, जो दिन-रात नशा और चोरी करते हैं, अपना जीवन नहीं बिता सकते। सच, रिस्क में ही बरकत है। ये लड़के हर रोज़ नए रोमांचों से दो-चार होते हैं। मैंने सोचा कि मुमताज़ भाई से पुछूँ, क्या वो लड़का स्कूल जाता है? और फिर अपने ही बेमानी सवाल से लज्जित होकर चुप मार गया। स्कूल! थू!

रेल आने में अभी भी आधा घंटा बाकी था। मैंने सोचा एक सिगरेट और पी जाए। मैं सिगरेट लेने के लिए ऑटो  से निकला। ‘किधर।’ मुमताज़ भाई की आवाज़ थी। ‘सिगरेट ले आता हूँ!’ ‘आँहाँ, रुकिए!’ और खुद आॅटो से निकलकर वह सिगरेट वाले के पास गया और बोला, ‘ओरिजिनल देना हो भाई!’ और उस लड़के ने मुस्कुराकर नीचे रखे एक डिब्बे से सिगरेट निकालकर उसे दी। हम दोनों ने सिगरेट खतम की और मैं, अपना बेग जिसमें मेरे एम.फिल., पीएच.डी. के पोथे रखे थे, लेकर स्टेशन की तरफ चल दिया।

रेल प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। उत्तर संपर्क क्रांति। वही अनजाने चेहरे, जो बाहर हड़बड़ाहट और आष्चर्य का भाव लिए चले जा रहे थे, प्लेटफॉर्म पर भी चले जा रहे हैं। रेल के आगे वाले जनरल डिब्बे में मैं घुस गया। वही हमेशा का हाल, पैर रखने की भी जगह नहीं थी। मैं प्लेटफॉर्म के दूसरी तरफ वाले दरवाजे़ पर जाकर खड़ा हो गया। देखा एक आदमी पास वाले ट्रैक पर बैठा पेप्सी में व्हिस्की मिला रहा है। उसने मेरी ओर देखा। ‘लोगे।’ मैंने मुस्कुराते हुए उसे टाल दिया। ‘कहाँ तक जाना है?’ ‘जम्मू-तवी!’ मैंने कहा। ‘अच्छा जम्मू।’ ‘और आप?’ मैंने पूछा। ‘जहाँ तक ट्रेन जाएगी।’ उसने कहा। ‘उधमपुर।’ मैंने उसकी ओर देखा। उसने सशंकित नज़रों से मेरी ओर देखा। मैंने भी उसकी उपेक्षा की।

मैं रात-भर दरवाज़े के पास सिकुड़कर बैठा रहा और आस-पास वालों के लिए तकिए का काम करता रहा। सुबह होते-होते सिट का एक कोना बैठने के लिए मिल गया। एक स्टेशन पर रेल रुकी और धड़-धड़ करती हुई बुढ़ी औरतों की एक टोली उस डिब्बे में घुस गई। सभी यात्री, जो पहले से आराम की भंगिमा को प्राप्त कर रहे थे। हड़बड़ाने लगे। ये औरतें उड़ीसा की थीं। तीर्थ के लिए जा रही थीं। दो तो इतनी बुढ़ी कि लौटेंगी यह भी कहना मुश्किल लग रहा था। खैर!

जम्मू

रेल ने ठीक समय पर जम्मू उतार दिया। स्टेशन के बाहर जाते ही लगा मैं किसी आर्मी कैम्प में आ गया हूँ, स्टेशन के बाहर बने बागीचे के पास आर्मी के जवान बन्दूक लिए बैठे थे। उनमें से दो चाय पी रहे थे, एक अधेड़ और एक 25-26 साल का जवान। उनके आगे कँटीले तार की फेंस थी। जैसे ही उधर से कुछ हो, इधर से गोली चलाने को मुस्तैद सैनिक।

मैंने स्टेशन के इस आशंका भरे माहौल को पार किया और स्टेशन के बाहर नाले पर लगी चाय की दुकान पर चाय पीने लगा। 7 रुपये की चाय। जैसे-तैसे अपनी भूख दबाते हुए, मैं श्रीनगर जाने वाली गाड़ी के बारे में पुछने लगा। पुछते-पाछते एक गाड़ी मिली – 800 रुपये, इससे कम में भी गाड़ी मिल सकती थी, ये मुझे बाद में पता चला। तो, मैं श्रीनगर की ओर चल दिया। गाड़ी में दो आर्मी कैम्प में काम करने वाले जवान बैठे थे। सादे कपड़े, पहचानना भी मुश्किल कि ये उन्हीं बन्दूकधारियों के हमजोली हैं, जिन्हें देखकर आशंका होती है – अब क्या होगा!

गाड़ी का चालक एक सिक्ख था। मैंने अपनी सिगरेट पीने की इच्छा को गाड़ी रुकने तक दबा देना ही उचित समझा। रास्ते में एक जगह उसने गाड़ी खड़ी की, बाकी लोग खाने लगे, लेकिन अपनी जेब तो हल्की थी। सो, मैंने एक चाय ली और सिगरेट पीने लगा। गाड़ी चालक मुझे घुर कर देखने लगा। ‘जल्दी करलो।’ उसने कहा। जैसे मेरी ही वजह से गाड़ी रुकी हुई थी। ‘दूसरे लोगों को भी आ जाने दीजिए।’ मैंने कहा। वह दुकान के अंदर बैठी सवारियों की ओर बढ़ गया।

जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जा रहे थे, पंजाबी बोलने वालों से दूर होते जा रहे थे और एक मिश्रित भाषा, जिसमें पंजाबी के शब्द बीच-बीच में उछल आते थे, मेरे कानों में पड़ रही थी। कुछ शब्दश् समझ आते थे, बाकि भाव से काम चलाना पड़ रहा था।

गाड़ी में मेरे दोनों ओर आर्मी के जवान थे। उनमें से एक से बात होने लगी। यह व्यक्ति बंगाल का था, उसे जैसे ही पता चला मैं, प्राध्यापक के साक्षात्कार के लिए जा रहा हूँ। उसने अपने दोस्त का किस्सा सुनाना षुरू कर दिया, कैसे दोनों साथ खेलते थे, साथ पढ़ते थे, फिर उसे रुपया कमाने का शौक हो गया और वह आर्मी में आ गया, उसका दोस्त पढ़ता रहा और आज प्राध्यापक है। उसकी बातों से साफ था कि वह रीतिकालिन कवियों से भी अधिक अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करने में माहिर था। उसने खुब रुपया कमाया और उड़ाया है, उसका कहना था। हालाँकि मैं देख चुका था, कि वह गाड़ी-चालक से 50 रुपये को लेकर हुज्जत कर रहा था। वह कहने लगा कि उसने वायुयान में भी यात्रा की है, और वो तो आज इस जीप में जा रहा है, जबकि वह चाहता तो आज भी वायुयान में जा सकता था। लेकिन इच्छा ही नहीं हुई। खैर, उसे संतुष्टि थी, कि उसका प्राध्यापक दोस्त आज भी उसकी गालियाँ हँसकर सुनता है।

फिर वही जवाहर टनल, घुप्प अँधेरी टनल, जिसमें घुसते ही कुरोसावा के ड्रिम्स की टनल याद आने लगी। पता नहीं कब वह सैनिक टनल पार कर निकलेगा और फिर पिछे मुड़कर देखेगा – टनल का घुप्प अँधेरा और सुनेगा – फौजी बुटों की टाप। पता नहीं जब इस टनल से आखरी सैनिक बाहर होगा तो वह क्या सोचेगा! इस टनल के उस पार वह क्या कर रहा था?

सड़क गाडि़यों से भरी हुई थी, लग रहा था, लोगों का एक रेला श्रीनगर की ओर जा रहा है। हमारी गाड़ी में पीछे चार लड़के बैठे हुए थे। उम्र – 14-15 साल। उनमें से एक को उलटी हो गई। ये चारों लड़के मध्यप्रदेश से कश्मीर मज़दूरी करने के लिए जा रहे थे। दो पहले से वहाँ काम कर रहे थे और दो पहली बार जा रहे थे। अपने बारे में कुछ भी बोलते हुए वे हिचक रहे थे, जैसे कुछ अनहोनी होने वाली हो। उन लड़कों को देख मेरा मन एक बार और आशंका से भर गया। उलटी करने वाला लड़का सीट पर लेटे-लेटे सो गया था।

पास बैठा जवान भारत के विभिन्न इलाकों में अपनी पोस्टिंग और अनुभव बताता चल रहा था। मैं भी हाँ-हूँ कर रहा था, ताकि मेरा ध्यान बँटा रहे। रास्ते में एक जगह ट्राफिक जाम था। आर्मी के जवान चारों और घुम रहे थे। पहले मुझे लगा कुछ दुर्घटना हो गई है। फिर पता चला, सड़क बनाने के लिए रास्ता साफ किया जा रहा है, जिसके लिए एक बड़ा पेड़ काटा जा रहा था। आर्मी के जवान सड़क साफ करने में मदद कर रहे थे। ज़्यादातर इतने काले कि वहाँ की स्थानीय आबादी से फूल कांट्रास्ट में।

सड़क साफ हुई तो हमारी गाड़ी भी धीरे-धीरे खिसकने लगी। हमारा गाड़ी-चालक वैसे भी बहुत धीरे गाड़ी चला रहा था। पंजाबी पॉप संगीत चलाकर वह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। क़ाज़ीगुंड में एक जगह गाड़ी खड़ी कर चालक मेवों की एक दूकान पर चला गया और चाय पीने लगा। पहले ही इतना धीरे-धीरे वह हमें ले जा रहा था, कि लग रहा था ये सफर खतम ही नहीं होगा। किसी अनजाने रास्ते पर चलते हुए यह अक्सर ही लगता है, कि सफर बहुत लम्बा है। हर शहरनुमा जगह पर मुझे लगता था, अब आ गया श्रीनगर, लेकिन नहीं। बाहर रुई के फाहों की तरह की कोई चीज़ उड़ रही थी। बंगाली हमसफर ने कहा, ये अगर नाक में चली गई तो चार घंटे छिंकते रहोगे। मैंने अपनी दूसरी ओर बैठे सैनिक से खिड़की के शीशे ऊपर कर लेने को कहा। उसने शीशा चढ़ा लिया। तब भी एक दो फाहे अंदर आ चुके थे और गाड़ी में बेमुरव्वती से गष्त लगा रहे थे।

एक गाँव में उसने गाड़ी फिर रोक दी। इस बार उसने बिना उतरे ही पिछे मुड़कर दोनों सैनिकों को सलाह दी। यही आखरी गाँव है। इस गाँव में भी चारों तरफ सैनिक खड़े और घुमते दिखाई दे रहे थे। मुझे समझ नहीं आया, वह क्या कहना चाह रहा था। मेरे दाईं तरफ वाला सैनिक नीचे उतर गया और थोड़ी देर में हँसता हुआ अपनी जेब पर हाथ रखे लौट आया। इसके आगे शराब नहीं मिलती है। बंगाली सैनिक ने कहा। मुझे लगा वह मज़ाक कर रहा है। अब तक मुझे गुजरात के बारे में ही यह पता था, कि वहाँ शराब नहीं मिलती है। दूसरा सैनिक कहने लगा, पहले मिलती थी, अभी सब दूकाने तोड़-ताड़ दी है। मुझे बस्ती का वह दृष्य याद आ गया, जब पाकिस्तान में शराब की दूकाने तोड़कर गैलनों शराब नालियों में बहा दी गई थी। बेचारे मण्टो का पाकिस्तान!

धीरे-धीरे गाड़ी फिर खिसकने लगी। देखा एक और टनल लगभग बनकर तैयार हो चुकी है, ये नई टनलें 90 कि.मी. का फासला कम कर देंगी। और सुना रेल के लिए भी एक नया ट्रैक बिछाया जा रहा है, जो सफर को आसान और ट्राफिक को कम कर देगा। और टूरिस्ट और सैनिक।

अपने बंगाली हमसफ़र की बातें सुनते-सुनते, जिसमें पंजाबी पाॅप खुद-ब-खुद घुलता जा रहा था। चालक महोदय को अचानक जाने क्या सुझी, वो कहने लगा, ‘ये झेलम है।’ मुझे उस पर पुरा शक हुआ। और उसके पॉप संगीत को सुनते-सुनते मैं मन ही मन झल्ला चुका था, मुझे लगा कि कहूँ, तो मैं क्या करूँ, कुद जाऊँ, झेलम है! हँह!! मैंने देखा एक नदी है, झेलम ही होगी।

 खै़र, आखिरकार गाड़ी ने मुझे एक चैराहे पर छोड़ा। मैंने एटीएम तलाश किया और कुछ रुपया निकाला, ताकि आगे का काम आराम से चल सके। और एक मिनी बस में बैठ गया, जो मुझे डल गेट उतारने वाली थी।

श्रीनगर

गोधूली बेला का समय था। मैं मिनी बस से एक चैराहे पर उतरकर खड़ा था। एक सिगरेट वाले की दूकान पर पहुँचा, सिगरेट ली और उससे पुछा, ‘यहाँ रात भर रुकने के लिए सस्ता कमरा कहाँ मिलेगा।’ उसने कहा, ‘रुकिए, अभी दिखा देते हैं।’ मैं रुका रहा, 5-7 मिनट में ही एक अधेड़ मोटा-सा आदमी आया, और मुझसे कहने लगा, ‘कितने दिन के लिए चाहिए?’ मैंने कहा, ‘बस रात भर के लिए, इंटरव्यू देने आया हूँ, देकर कल ही चला जाऊँगा।’ उसने एक लड़के को बुलाया, और मेरी तरफ देखकर कष्मीरी में कुछ कहा, पता नहीं वह कश्मीरी भी थी या नहीं।

                रात पुलिया पर उतर आई थी और मैं उस लड़के के साथ पुलिया पर चले जा रहा था। मैंने उससे कहा, ‘सिगरेट पिते हो!’ उसने कहा ‘नहीं, मैं कोई भी नशा नहीं करता।’ ‘ठीक है।’ मैंने कहा। उसका नाम गुलज़ार था। वह एक शिकारे पर मुझे लेकर गया, जो उसी पुलिया के नीचे लगा हुआ था। मैंने देखा शिकारा ठीक है, कमरा भी रहने लायक। फिर वही किराये को लेकर हुज्जत। आखिरकार 300 रुपये में रात भर रहना तय पाया गया।

गुलज़ार को जब पता चला कि मैं विश्वविद्यालय में पढ़ाने के लिए इंटरव्यू देने आया हूँ, तो पहले तो उसे विश्वास नहीं हुआ। वह हैरत से मेरा मुँह देखने लगा। फिर बोला, ‘तुमको तो लड़के पीट देंगे।’ मैंने कहा ‘क्यों?’ बोला, ‘यूनिवर्सिटि के लड़के खराब हैं।’ मैंने कहा, ‘अच्छा!’ फिर उसने बताया कि वह भी 8वें दर्जे में अपने मास्टर को पीट चुका है। और उसके बाद से उसने पढ़ाई भी छोड़ दी अब शिकारा चलाता है और मज़दूरी करता है। उसकी छोटी बहन और भाई पढ़ रहे हैं, लेकिन उसे विश्वास था कि उसका भाई भी किसी मास्टर को पीटकर एक दिन उसके साथ ही काम करने लगेगा। कहने लगा, ‘हमारा भाई हमसे भी ज़्यादा गुस्से वाला है।’

गुलज़ार को चाय पीने का बहुत शौक था। उसने ग्लास भर के चाय बनाई और पीने लगा। मैं लम्बे सफ़र की थकान से चुर था, साबुन, तैल ढुँढ़ने बाज़ार की तरफ जाना चाहता था, लेकिन देखा कि गुलज़ार मुझे जाने नहीं देना चाहता, पहले तो मुझे शक हुआ, पुरा वातावरण ही आशंकापूर्ण था, फिर वह बोला, ‘यहाँ बाज़ार जल्दी बंद हो जाता है, यहाँ का माहौल नहीं पता है तुमको।’ मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी और यह कहते हुए कि मैं थोड़ी ही देर में आ जाऊँगा, मैं बाज़ार की तरफ चल दिया। पुलिया पार कर मैं एक चैराहे पर पहुँचा, जहाँ कुछ दूकाने थी। लेकिन तैल का पाउच कहीं नहीं मिला। मैं साबुन लेकर लौट आया। नहाया तो कुछ ताज़गी महसूस हुई। मैंने कहा, ‘खाने के लिए कहाँ जाना चाहिए।’ वह बोला, ‘यहीं रुको, खाना हम लेकर आएगा। क्या खाएगा तुम?’ मैंने कहा, ‘कुछ भी, सादा-सा, चावल-दाल।’ उसने कहा, ‘चटनी भी लेगा।’ मैंने कहा, ‘हाँ, मिल जाए तो।’ बोला, ‘अस्सी रुपये दे दो।’ मैंने उसे सौ रुपये दिये और कहा, ‘अगर तैल का पाउच मिले तो लेते आना।’ वह रुपये लेकर मुझे शिकारे पर ही रहने की हिदायत देता हुआ चला गया। मैं शिकारे के एक कोने में लेटकर, जो बाहर की तरफ खुलता था, सिगरेट जलाकर झील में जलती हुई बत्तियों का प्रतिबिंब देखता रहा। थोड़ी देर में तीन आदमी एक नाव लिए जाल बटोरते हुए पास से गुज़रे। तीनों ही हड्डी के ढाँचे।

गुलज़ार लौटा तो मैंने खाना खाया। और फिर वह भी खाना खाकर जाने लगा। मैंने पुछा ‘कहाँ?’ तो कहने लगा, ‘मज़दूरी।’ मैंने कहा, ‘रात को।’ उसने कहा, ‘हाँ रात भर सवारियाँ आती रहती है, हम काम करता है, नहीं तो घर नहीं चलेगा।’ मुझे लगा, वह मुझ पर ही व्यंग्य कर रहा है।

सुब्ह हुई, सब कुछ रौशन हुआ, तो देखा झील बहुत दूर तक खींची हुई है। मैंने कहा, ‘मैं 2 बजे तक लौट आऊँगा।’ गुलज़ार कहने लगा, ‘रजिस्टर में साइन कर दो, और हमको 4 सौ रुपये और दे दो।’ मैंने ज़्यादा हुज्जत न करते हुए, उससे कहा कि मैं अपना सामान लेकर ही चला जा रहा हूँ, अगर आज ही नहीं लौटा, तो फिर तुम्हारे पास आ जाऊँगा। लेकिन वह लड़का बड़ा हुज्जती था। मैंने उसे टालते हुए अपना बैग उठाया और शिकारा छोड़ दिया।

मैं फिर उसी चैराहे पर पहुँच गया, जहाँ कल मुझे मिनी बस ने उतारा था। पुछने पर पता चला, यहीं से बस मिलेगी, जो सीधे कश्मीर विश्वविद्यालय उतार देगी। मैं बस का इंतज़ार करने लगा। कुछ नौजवान लड़के बस-स्टॉप पर बैठे सिगरेट पी रहे थे। वहीं पास में खड़ा होकर मैं भी सिगरेट पीने लगा। बस आई और मैं उसमें बैठ गया। बस श्रीनगर में घुमती हुई चलने लगी। झील और बागीचों के बीच होटलें, रेस्टोरेंट, घर, दफ़्तर और सैनिक। बस ने मुझे रुमी गेट पर उतार दिया। यह यूनिवर्सिटी का मुख्य द्वार नहीं था। मैंने अंदर जाकर पुछा, तो पहरेदार ने बताया, ‘अभी तो 9 बजा है, 10 बजे तक इंटरव्यू षुरू होगा।’

तब तक मैंने इधर-उधर घुमने की योजना बनाई और निकल पड़ा। विश्वविद्यालय की दीवार के किनारे-किनारे मैं चलता रहा। रुमी गेट के थोड़ा ही आगे दीवार पर किसीने मोटे मोटे हरुफ़ में ‘वेलकम तालीबान’ लिखा हुआ था। पढ़कर पहले तो अजीब लगा, फिर उतना भी अजीब नहीं रहा। नौजवान लड़के-लड़कियाँ विश्वविद्यालय की तरफ जा रहे थे। मैं एक झील के किनारे बने बागीचे में जाकर बैठ गया। देखता रहा चीनार, औरतें, आदमी, बच्चे, पहाड़ी।

फिर देखा 10 बज गई है। तो रुमी गेट से ही फिर विश्वविद्यालय में दाखिल हुआ। साक्षात्कार वाइस चांसलर के दफ़्तर के पास प्रशासन भवन में होना था। वहाँ पहुँचा, तो देखा साक्षात्कार देने के लिए मेरे अलावा और 11 लोग बैठे थे। अलीगढ़ विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, ग़रज़ कि देश भर से इस विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाना चाहने वाले नौजवान और अधेड़। कुछ के पास किताबों और लेखों का ऐसा ज़खीरा कि देखते ही लगे कि इन्होंने अपनी उमर इसी काम में झोंक दी है। मैं समझ गया, बेटा तेरी दाल यहाँ नहीं गलनी है। अलीगढ़ से पढ़े एक साहब ने मेरे करीब बैठते हुए मुझसे बड़ी ही शाइस्तगी से हाथ मिलाया और धीरे से पुछा, ‘कहाँ के रहने वाले हैं खान साहब!’ मैंने कहा, ‘मध्यप्रदेश!’ ‘हम जे.एन.यू. गए थे एक बार, लेकिन अपना वाला कोई मिला नहीं।’ मेरे कान में धीरे-धीरे ज़हर घुलने लगा। ‘अब आप से मिलेंगे अगर कभी आए तो!’ मैंने कहा, ‘ठीक है!’ और वहाँ से उठने लगा। उन्होंने फिर अपने नरम हाथों से मेरा हाथ पकड़कर रोका, ‘अपना कांटैक्ट नंबर दीजिए।’ मैंने उन्हें एक फर्जी नंबर थमाया और उठकर दूसरी जगह बैठ गया। देखा मेरे सामने एक सज्जन बैठे हुए थे। साफ़ सफ़ेद कुर्ता-पाजामा, जिस पर भूरे रंग की बंडी। चुटियाधारी ये सज्जन अपने सामने अपनी प्रकाशित सामग्री का ढेर लिए बैठे थे। और ख़ालिस हिंदी में बात कर रहे थे। हजारीप्रसाद द्विवेदी पर उनका शोध-प्रबंध था। मेरे पास बैठे एक व्यक्ति ने बताया कि वह उनके साथ पहले भी एक साक्षात्कार दे चुका है। कहने लगा, ‘उस इंटरव्यू में तो ये धोती-कुर्ता पहनकर आए थे। तब उनसे बात कर एक्सटर्नल ने कहा था, लगता है साक्षात् द्विवेदीजी से ही बात कर रहे हैं।’ सच में, लगता भी होगा। अंतर्वस्तु का पता नहीं, रूप तो वही था।

इंटरव्यू खत्म होते-होते पता चला कि कल श्रीनगर बंद रहेगा। किसने ‘कॉल’ दिया है, पुछने पर कोई कुछ बोला नहीं। तो उसी शाम गाड़ी से जम्मू के लिए निकलना था। इस बीच मैंने खाना खाया और एक बागीचे में जाकर बैठ गया। देखा कुछ लड़कियाँ फूटबॉल खेल रही थीं। दूर से उन्हें देखता मैं सिगरेट पीने लगा। अब जाकर मुझे लग रहा था मैं श्रीनगर में हूँ। सोचने लगा इस जगह के बारे में क्या-क्या सुनता आया था और ये जगह कुछ अलग तो नहीं है। वही परेशानियाँ यहाँ के नौजवानों की आँखों में भी घुम रही हैं, जो दिल्ली के नौजवानों की आँखों में तैरती रहती हैं। फिर ये काहे का अलग से स्वर्ग! दिमाग़ में लगातार एक शेर का मिसरा ए सानी घुमता रहा – ‘चारों तरफ खराब यहाँ और भी खराब।’ ‘चारों तरफ खराब यहाँ और भी खराब।’ लेकिन दिमाग़ पर बहुत ज़ोर देने के बाद भी मिसरा ए उला याद नहीं आ रहा था। शायद मैदान में फूटबॉल खेलती हुई किसी कमसीन को याद था! पर मैं पुछ नहीं पाया…


[1]  डॉ. इक़बाल का अनुवाद

उस्मान ख़ान

उस्मान ख़ान

उस्मान ख़ान समकालीन हिंदी कविता के अलहदा कवि हैं. चर्चाओं और पुरस्कारों की भीड़ से अलहदा…छपाऊ मानसिकता से भी अलहदा..जे.एन.यू. के हिंदी विभाग से मालवा के लोक-साहित्य पर शोधरत हैं. इनसे usmanjnu@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

Single Post Navigation

One thought on “श्रीनगर उर्फ काहे का स्वर्ग: उस्मान ख़ान

  1. nivedita on said:

    बहुत सुन्दर लिखा हैं आपने . आपकी रचना संजीदा और धारदार है .यूं ही लिखते रहें . मेरी शुभ कामनाये . निवेदिता

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: