आत्मकथ्य- मेरे आलोचक का जन्म: सुरेन्द्र चौधरी

राजेन्द्र यादव जी ने इतिहास को बिका हुआ गवाह कहा है। क्या भावी इतिहास को भी हम खरीदा गया गवाह ही छोड़ देंगे? क्या, हम इतिहास को, प्रभुवर्ग को,प्रभुसत्ता को फिर से समर्पित करने जा रहे हैं? घटनाक्रम ने निराशा पैदा की है,पर इस सीमा तक नहीं। दूसरी परम्परा की खोज का खतरा यह है कि खोज के पहले हम उसे प्रभुवर्ग को समर्पित कर देंगे। क्या हिंदी साहित्य की परम्परा प्रभुवर्ग को समर्पित रही है? अगर नहीं, तो उस परम्परा में ही स्वीकृति और स्वतंत्रता की धाराओं की पहचान की जा सकती है? हाँ, शास्त्र और लोक का भेद संस्कृति के ऐतिह्य रूप के निर्धारण के लिए महत्त्वपूर्ण है।

Surendra Choudhary 13 जून 1933- 09 मई 2001

Surendra Choudhary
13 जून 1933- 09 मई 2001

मेरे आलोचक का जन्म

BY सुरेन्द्र चौधरी

 

किसी विचार-व्यवस्था के लिए मैंने लेखन आरम्भ किया हो ऐसा दावा किए बगैर भी कहना चाहूँगा कि मेरी लड़ाई एक व्यवस्था के लिए थी। याद आता है कि सन् 1951में अपने पहले ही लेख में इस प्रश्न से मैं टकराया था। जैनेन्द्र जी की एक लेखमाला ‘आदर्श क्या : संघर्ष कि समन्वय साहित्य सन्देश में प्रकाशित हो रही थी जो उस समय की सबसे बड़ी प्रतिष्ठित आलोचनात्मक पत्रिका थी। मेरा लेख संघर्ष के पक्ष में और समन्वय के विरोध में लिखा गया था। तब मैं इन्टरमीडिएट का विद्यार्थी था। कॉलेज और नगर में इसकी नोटिस ली गई। हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. वासुदेवनन्दन जी ने जानना चाहा था कि क्या यह लेख मेरा ही लिखा है।

उत्साह में व्यवस्था की परवाह नहीं होती। अगर वह किसी का विरोध करता है तो किसी को चुनता भी है। मैंने संघर्ष चुना था। संघर्ष आज भी जारी है। यह संघर्ष अपने आप से भी चलता है। साहित्य और विशेषत: आधुनिक साहित्य की मेरी समझ वस्तुत: मानव-मुक्ति और राष्ट्रीय-मुक्ति की उस पृष्ठभूमि में बनी जिसमें एक नई संस्कृति का जन्म हुआ था। उसमें संघर्ष की अंतर्ध्वनियाँ मेरे युवा मन ने सुनी थीं और मेरी चेतना ने उसे अपना आदर्श बनाया था। अपने पहले लेख में यह प्रस्तावना आकस्मिक नहीं थी।

ये वर्ष मेरी बहु-उन्मुखता के वर्ष थे। पढ़ाई, छात्र-संगठन, फुटबॉल और राजनीति में एक साथ रुचि रखने के कारण लेखन नहीं कर पा रहा था। पढऩा जारी था। यूरो-इंडियन चिन्तन से स्वतंत्र होकर हमारे लिए कला-रूप, सामाजिक संगठन, विश्व-दृष्टि, और क्रान्तिकारी नैतिकता संबंधी प्रश्न नया दबाव पैदा कर रहे थे। यह सब बहुत सचेत रूप से हो रहा था, चाहे बहुत व्यवस्थित न भी रहा हो। प्रगतिशील लेखक संघ 1953 में नए दौर में प्रवेश कर रहा था। मैं उसके जलसों में पहुँच जाता था। अगले दो वर्ष मेरे आलोचक के निर्माण में अहम भूमिका पूरी करते हैं।

आधुनिकता और आधुनिकीकरण के पूरे दौर में अपनी पीढ़ी को समकालीन मानने का सौभाग्य हमें प्राप्त है। साहित्य के अलावा मेरी रुचि दर्शन और अर्थशास्त्र में थी। साहित्य का प्रश्न सांस्कृतिक प्रश्न बन गया था। गोष्ठियों में स्व. राहुल जी के मुँह से यह मैं कई बार सुन चुका था। वे इसे भाषा से भी जोड़ रहे थे। स्वतंत्र भारत के सन्दर्भ में यह सहज ही अनुमेय है।

एम.ए. में मैं स्व. नलिन विलोचन शर्मा जी के सम्पर्क में आ गया था। वे घोषित रूप से मार्क्सवाद-विरोधी आलोचक थे। मेरी अभिरुचि और साहित्यिक रुझान का उन्हें पता था। उन्होंने मुझे नए मार्क्सवादी आलोचकों का साहित्य पढऩे को दिया। यही नहीं यूरोप-अमेरिका के क्लासिक कथाकारों की रचनाएँ पढऩे को दीं। जैनेन्द्र उनके प्रिय लेखक थे। समकालीन कहानीकारों पर कई उत्तेजक रायें देते रहते थे। उनकी कृपा से मुझे लुकाच, हाउजर, काडवेल, वाल्टर-बेंजामिन आदि का प्राय: अनुपलब्ध साहित्य पढऩे को मिला। निश्चित रूप में तब मैं इनकी पारस्परिक असंगतियों को समझ नहीं पा रहा था। मार्क्सवादियों के बीच ढेर-सारी सांस्कृतिक समस्याओं पर विचार आरम्भ हो चुका था। स्व. नलिन जी की कृपा से मुझे वल्गर सोशियालॉजी पर सोवियत यूनियन में चल रही बहस की एक पूरी पुस्तक उपलब्ध हो गई थी।

निश्चित ही अत्यन्त सम्वेदनशील मार्गों से मेरा प्रशिक्षण हो रहा था। सन् 1955-56 में मैं नामवर जी के व्यक्तिगत सम्पर्क में आया। मेरे वर्तमान का निर्माण उनके हाथों हुआ है। वैसे कई व्यावहारिक मुद्दों पर मैं उनकी कार्य-प्रणाली से अलग भी रहा हूँ। मैंने उन दिनों गया को वैचारिक हलचलों का केन्द्र बना रखा था। अपने कॉलेज की हिंदी परिषद के अधिवेशन राष्ट्रीय स्तर पर मैंने किए। श्री अज्ञेय और डॉ. रामविलास जी को छोडक़र प्राय: सभी इस मंच पर आए। श्री यशपाल, जैनेन्द्र, महादेवी वर्मा, डॉ. भगवत शरण उपाध्याय, भैरव प्रसाद गुप्त, डॉ. प्रकाश चंद्र गुप्त, त्रिलोचन के साथ-साथ राजा राधिकारमण, नलिन विलोचन शर्मा, केसरी कुमार, डॉ. जगदीश गुप्त, नामवर सिंह, मार्कण्डेय आदि तमाम लोगों का सहयोग मुझे प्राप्त हुआ।

1955-60 के बीच हिंदी आलोचना एक नए दौर में प्रवेश कर रही थी। मैंने छिटपुट निबन्ध इस दौर में खूब लिखे। ‘लहर’, ‘कल्पना’, ‘ज्योत्स्ना’ और साठ के बाद ‘जनयुग’ और ‘आलोचना’ में ‘लहर’, ‘आधार’ आदि पत्रों के साथ लिख रहा था। ‘लहर’ से सम्पर्क में स्व. मित्र राजकमल के माध्यम से आया था। स्व. प्रकाश जैन और मनमोहिनी ने और ‘आलोचना’ में डॉ. नामवर सिंह ने मुझे काफी छापा। आज भी इनका ऋण मुझ पर है। नामवर जी के कारण मेरी आलोचना दृष्टि का विस्तार हुआ। उन्हीं दिनों मैं विदेशी पत्रिकाओं के सम्पर्क में आया। ये पत्रिकाएँ विश्व-स्तर पर जानी जाती थीं और साहित्य-संस्कृति-विचार के सभी अंगों की ताज़ातर समस्याओं को हल करने में लगी थीं।

मार्क्सवाद के साथ इनके अंतर्विरोध साफ थे। पर ये अंतर्विरोध, सारे के सारे कैटेस्ट्राफिक न थे। कुछ हद तक उनका हल निकाला जा सकता था। नववामपंथी चिन्तन भी सुसंगत हो चुका था। क्लासिकल और सोवियत मार्क्सवाद से यूरोपीय मार्क्सवादियों की कुछ दूरियाँ भी मेरे ध्यान में आने लगी थीं। रोज़र गैरोदी तब तक फ्रेंच पार्टी से निकाले न गए थे। वे तेज़ी से लिख रहे थे। ग्रामशी को खूब पढ़ा जा रहा था। उनके ‘हेगेमनी’ के सिद्धान्त की चर्चा हमारे बीच भी होने लगी थी।

हिंदी में डॉ. रामविलास शर्मा के निबन्ध-संग्रह लगातार आ रहे थे। पुस्तकें भी आई थीं। ‘भाषा और समाज’ एक गम्भीर पुस्तक थी। वे भारतीय सन्दर्भ में हमारे सबसे प्रासंगिक लेखक हो गए थे। कुछ वर्ष पहले की स्थिति उलट गई थी। वे ब्रिटिश आलोचकों की तरह जटिल से जटिल विषय पर अपनी प्रवहमान सरल गद्य-शैली में लिखते थे। उनका प्रभाव गैर-मार्क्सवादियों पर भी पड़ रहा था। शैक्षणिक दुनिया में किसी मार्क्सवादी की बात मानी जाने लगी थी। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा, पर मेरा मार्ग नामवर जी वाला ही था।

सन् 1963 में मैंने कहानी पर एक पुस्तक लिखी—’हिंदी कहानी : प्रक्रिया और पाठ’। मैं आज भी उसे एक प्रासंगिक पुस्तक मानता हूँ। कथा-संबंधी यह पुस्तक अद्यतन सैद्धान्तिक-व्यावहारिक प्रश्नों से टकराती थी। कहानी की प्रक्रिया पर, विशेष रूप से हिंदी कहानी की प्रक्रिया पर मैंने विस्तार से विचार किया था। तब भी मेरी धारणा थी कि गाथा को कथा में बदलकर कहानी का मार्ग निकाला गया है। यह हिंदीतर भाषाओं (आधुनिक) के लिए भी सच है। ‘पाठ’ को मैं उत्तरआधुनिकता की चर्चा से पहले महत्त्व दे रहा था। वाचिक परम्परा के समानान्तर मैं पाठ के महत्त्व को सिद्ध करना चाह रहा था। आज इस मुद्दे पर खासी बहस देश-विदेश के कथा-साहित्य में चल रही है। थाने की रपट लिखने वाले कुछ लोग कहानी की रपट भी लिख रहे हैं। उनकी शिकायत है कि मैं नैरेटर और नैरेशन की अपनी रट भूल नहीं रहा। वे राबर्ट शोल्ज की ‘फैब्रुलेटर्स’ और फेडरमैन द्वारा सम्पादित ‘सरफिक्शन’ उलट लें। जेराल्ड ग्रैफ का लम्बा लेख ‘द मिथ ऑफ पोस्टमाडर्निस्ट ब्रेक थ्रू’ (‘ट्राइ क्वाटर्ली’ 1973) भी उन्हें इस वापसी के महत्त्व तक ले जाएगा।

‘अस्तित्ववाद और समकालीन हिंदी साहित्य’ विषय पर अपना शोध-प्रबन्ध लिखा और ‘सामयिक’ में डॉ. नामवर सिंह की पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ की लम्बी समीक्षा लिखी। काव्य-भाषा और कविता की संरचना की ओर मेरा ध्यान इसी क्रम में गया। कथा-प्रक्रिया की तरह काव्य-प्रक्रिया को भी मैंने अलग से समझने की चेष्टा की। वैसे कविता पर लिखने का मेरा कोई विचार न था। इस दिशा में मैंने कोई विशेष चेष्टा भी नहीं की।

कथा की ओर मेरी उन्मुखता ने मुझे फिर कहानी-उपन्यासों की दुनिया में ला खड़ा किया। मैंने एक लम्बे अरसे तक लिखना बंद भी कर दिया। हिंदी में कई नए आन्दोलनों की हवा थी। आधुनिकता और समकालीनता का प्रभाव कहीं मिला-जुला था और कहीं विरोधी था। कथा-साहित्य में समकालीनता की कई समस्याएँ थीं। एक विचित्र सहवर्तिता के भीतर समकालीनता अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही थी। स्वाभाविक था कि इसमें मेरी दिलचस्पी होती। रेणु पर लिखकर जैसे मैं अपनी ही दृष्टि की सफाई करता रहा। भारतीय साहित्य के निर्माताओं में रेणु की जगह ढूँढ पाने की मेरी चेष्टा ने मुझसे उन पर एक मोनोग्राफ लिखवाया (1988)। इसमें मैंने आधुनिकता और समकालीनता की सरहद पर रेणु के साहित्य का मूल्यांकन किया।

भारत के राजनीतिक संक्रमण को यशपाल, भगवती चरण वर्मा, भीष्म साहनी और रेणु ने अपने-अपने नज़रिए से, गहरी संलग्नता से देखा-परखा था। नागर जी के कई उपन्यासों में शहरी जीवन की संक्रमणशीलता लक्षित हो रही थी। ‘मैला आँचल’ और ‘परती-परिकथा’ में रेणु ने ग्रामीण समाज और जीवन की हलचलों को व्यापक ढंग से चित्रित किया था। उनके राजनीतिक समीकरण बिहार के गाँवों में आज भी थोड़े अंतर के साथ मिल जाएँगे। रेणु ने अपनी राजनीतिक पहचान से ज़्यादा उस नई आर्थिक-सामाजिक प्रक्रिया को पहचाना था जिसका अंतर्विरोध वर्तमान इतिहास की धुरी बन जाता है। गाँव में एक साथ शासन का आधुनिक तंत्र पहुँचता है और सामन्तवाद की वापसी होती है। गाँवों के आधुनिकीकरण की यह बाधा लगभग स्थायी हो गई है।

यह विशेषता रेणु को अधिकांश लेखकों से अलग करती है। मैंने अपने मोनोग्राफ में इसे रेखांकित किया। भूमि समस्या का खूनी आभास उनकी रचनाओं में मिलने लगता है। बहुत-सी पूर्व स्थितियाँ यहाँ आकर खत्म हो जाती हैं, मेरा ध्यान मुख्य रूप से इन खत्म होती स्थितियों की ओर था, क्योंकि उनकी जगह ही नहीं स्थितियाँ भर पातीं। सामन्तवाद की वापसी एक विलक्षण तत्व थी। परिघटनाएँ इसे स्पष्ट कर रही थीं। अपनी पुस्तक में भरसक मैं इन परिघटनाओं के रचनात्मक संयोग पर विचार करना चाह रहा था।

समकालीन कहानियों पर एक पुस्तक लिख रहा हूँ। मेरे मन में एक ही विचार कुण्डली मारकर बैठा है—क्या समकालीन कहानियाँ समकालीनता की सभी ध्वनियाँ प्रकट कर रही हैं? क्या उनमें समकालीन परिस्थिति और प्रसंगों के अलावा कुछ नहीं है? क्या उसमें ‘अन्य’ का विचार केवल लोगों को प्रभावित-आतंकित करने के लिए है। ये नए लेखक क्या अपनी विषय-वस्तु से सचमुच दूर हैं! मुझे ऐसा कभी नहीं लगा। अपनी विषय-वस्तु पर इनकी पकड़ है, चाहे इनकी रचना दृष्टि बहुत व्यापक न भी हो। रचना के शिल्प पर इनकी पकड़ को लेकर अवश्य बहस की जा सकती है।

इतिहास और वर्तमान में एक साथ निबद्ध हमारी कथा का यथार्थ वस्तुत: आधुनिकता के लिए चुनौती है। आधुनिकता ऊपर से नीचे आएगी या वह समानान्तर आगे बढ़ेगी? आधुनिकीकरण की मिली-जुली प्रक्रिया साधक है या बाधक? वह किसके लिए साधक है और किसके लिए बाधक है? आज इस आखिरी प्रश्न का उत्तर देना बहुत कठिन नहीं है। कर्ज़ की व्यवस्था हमेशा-हमेशा उपभोक्ता समाज को जन्म देती है। कर्ज़ की पीने और फाकामस्ती करने की कला हर समाज को नहीं आती!

हमारी रचनाशीलता और रचना के लिए अनुकूल परिस्थिति पर बाज़ार का और बाज़ारू माध्यमों का प्रभाव बड़ा भयानक सिद्ध होगा। पुस्तकें पहुँच से बाहर हो रही हैं। कला-संस्कृति के नाम पर जितने फुटकल आइटम्स परोसे जा रहे हैं वे सूचना से अधिक क्या हैं? क्या सचमुच इनके फुटकल प्रसार से किसी कला-संस्कृति का विस्तार सम्भव है? क्या अभी जो चित्रों की नीलामी हो रही है, वह एक प्रकार के पूँजीनिवेश से भिन्न अहमियत रखती है? ‘जनसत्ता’ में अभी कल इस संबंध में एक रपट छपी है। उसमें कुछ चौंकाने वाली सूचनाएँ हैं। नटराज की मूर्ति का कोई खरीदार न था। पता नहीं, इनमें जो महँगे दामों पर नीलामी हुई, कितनी मूलकृतियाँ हैं। वस्तुओं का दूसरा पक्ष भी है, यह कहकर वस्तु की बजाय संरचना की विशेषता को वास्तविक सिद्ध करने की चेष्टा ने अतियथार्थवाद के सारे प्रकारान्तरों को ध्वस्त किया है, यह हम देख चुके हैं। मैं यह नहीं कहता कि यथार्थ एकात्मक है, मगर क्या रचना में वह केवल अपनी संरचना का विषय मात्र नहीं है, यह हमारे जीवन से उत्प्रेरित वास्तविक गोचर विषय भी है। चरित्र और उसकी स्थितियों में यह यथार्थ अपनी पूरी जटिलता से व्यक्त होता है। हमारी कथात्मक पद्धतियों में शब्द और प्रतीक, वस्तु और विचार, दृश्य और संकेत इस प्रकार अंतर्लयित हैं कि उन्हें अलगाने की स्थिति में यह मौलिकता नष्ट हो जाती है।

यथार्थवाद इस मौलिकता को नष्ट कर रचनात्मक मार्ग नहीं निकाल सकता। परम्परा का यह उपयोग हमें वर्तमान के साक्षात्कार में भी मदद करता है। जीवन की पद्धति पर, भोग-पद्धति पर तकनीकी प्रभाव दुहरे ढंग से प्रतिक्रिया कर रहे हैं। वे हमारे बाहरी जीवन को प्रभावित करते हुए भी हमारी दृष्टि और संस्कार को उस तरह प्रभावित नहीं कर रहे जिस तरह पश्चिमी मनुष्य को कर रहे हैं। परिवार और समाज में आज भी हमारी जड़ें शेष हैं।

यथार्थ गतिशील है। किन्तु यह गति एक समाज से होकर है। इस समाज से होकर ही गति इतिहास बनती है। काल की स्थिति और गति के इस विश्वगत भेद को भुलाकर मानवीय वास्तविकता नष्ट हो जाती है। परकीयता (एलियनेशन) क्या एक सामाजिक अवबोध नहीं है? क्या व्यक्ति एक आकस्मिक घटना भर है? प्रभु और सम्राट के अतिरिक्त क्या और कोई धुरी नहीं है? फिर ऐसे समाजों में कालक्रम में ऐसा भयानक अलगाव कैसे प्रकट हुआ? मानवीय यथार्थ के साथ ये प्रश्न सामाजिक इतिहास और संस्कृति की तमाम पूर्व कल्पनाओं से जुड़े हैं।

परकीयता का कारण वर्तमान यथार्थ में ढूँढना इसलिए भी गलत नहीं है। इसे अस्तित्ववाद की आध्यात्मिक परकीयता से भिन्न करके देखा जाना चाहिए। ये प्रश्न यथार्थवाद के जीवन प्रश्न हैं और तकनीकी समाज में इनके और भी भयानक परिणाम निकलने की सम्भावना बढ़ जाती है। इस दार्शनिक प्रश्न पर ज़्यादा बल देना इस छोटे से आत्मकथ्य में सम्भव नहीं होगा।

इतिहास, साहित्य और संस्कृति के प्रश्न हमारे वर्तमान के लिए सबसे प्रासंगिक हैं। एक स्वतंत्र राष्ट्र का इतिहास और संस्कृति से संबंध स्थापित करने में साहित्य की क्या भूमिका हो सकती है? भारत के भावी इतिहास, संस्कृति में वर्ग, राज्य और जन में किसकी प्रमुख भूमिका होगी? क्या हम इस भूमिका को निर्धारित करने में साहित्य का कोई भविष्य देख रहे हैं? यह ठीक है कि साहित्य परिवर्तन का औज़ार नहीं है, पर वह एक निर्भर रहने योग्य माध्यम है। साहित्य की क्रान्तिकारी भूमिका इसी अर्थ में ग्रहण की जाती है।

राजेन्द्र यादव जी ने इतिहास को बिका हुआ गवाह कहा है। क्या भावी इतिहास को भी हम खरीदा गया गवाह ही छोड़ देंगे? क्या, हम इतिहास को, प्रभुवर्ग को, प्रभुसत्ता को फिर से समर्पित करने जा रहे हैं? घटनाक्रम ने निराशा पैदा की है, पर इस सीमा तक नहीं। दूसरी परम्परा की खोज का खतरा यह है कि खोज के पहले हम उसे प्रभुवर्ग को समर्पित कर देंगे। क्या हिंदी साहित्य की परम्परा प्रभुवर्ग को समर्पित रही है? अगर नहीं, तो उस परम्परा में ही स्वीकृति और स्वतंत्रता की धाराओं की पहचान की जा सकती है? हाँ, शास्त्र और लोक का भेद संस्कृति के ऐतिह्य रूप के निर्धारण के लिए महत्त्वपूर्ण है।

ब्राह्मणवादी विचारधारा और व्यवस्था के सांस्कृतिक स्वरूप को समझने के लिए यह भेद एक मौलिक आयाम भी प्रस्तुत करता है। जनता से इसके अंतर्विरोध कई स्तरों पर प्रकट हुए। साहित्य में उसकी खोज की जानी चाहिए। पर उसे उस तरह नहीं खोजा जा सकता जिस तरह दलित साहित्य की खोज की जा रही है। सामाजिक परिवर्तन के प्रश्न को आर्थिक होड़ में डालकर हम क्या स्वयं उसकी सम्भावनाओं पर प्रश्नचिह्न नहीं लगा रहे। गांधी की नामलेवा व्यवस्था में भी अन्त्यज अपने हाशिए पर ही हैं। सामाजिक न्याय माँगने वाली शक्तियाँ क्या सामाजिक न्याय देंगी भी!

राष्ट्रवाद का जो भी स्वरूप निर्धारित हो, राष्ट्रीयता हमारी वही रहेगी जो इतिहास द्वारा प्रदत्त है। कौमियतों से स्वतंत्र राष्ट्रवाद की उदग्र परिकल्पना ठीक उसी तरह की होगी जिस तरह वर्णों से स्वतंत्र हिन्दू समाज की परिकल्पना। दोनों में एक ही तरह के खतरे निहित होंगे। ऐसे राष्ट्र में भी वर्ण विरोध बढ़ेंगे ही। मुख्यधारा की अवधारणा और परिकल्पना (जनता के राष्ट्र की) क्या पूरी तरह आयत्त है? अगर नहीं तो उसे जनवादी राष्ट्र की धारणा कैसे प्राप्त होगी? इसका आधार भारतीय जीवन और जन में है, पर उसे विकसित करने और मुख्य धारा के रूप में प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता दिनोंदिन बढ़ रही है। हम साम्प्रदायिकता के एक भयानक दौर से गुज़र रहे हैं। इस आन्तरिक विरोध से जनवादी और क्रान्तिकारी प्रक्रिया बाधित होती है। मनुष्य की सचेत भूमिकाएँ हर दौर में महत्त्व रखती हैं, आज के दौर में उन्हें भुलाया नहीं जा सकता। उसकी आवश्यकता और बढ़ ही गई है। विश्व केन्द्रीकरण की शक्तियों को नाकाम कर ही जनवादी प्रक्रिया सफल होगी। जैसा कि डॉ. रामविलास शर्मा जी ने लिखा भी है—इजारेदार पूँजी सैन्य केन्द्रीय राज्यसत्ता, केन्द्रीय प्रजातंत्र आदि से हमारी दूरी बढ़ रही है। अंतर्विरोध तीखे हो रहे हैं। (‘क्रान्तिकारी जनवाद का दर्शन और भारत’, साम्य पुस्तिका-9)।

विकासशील देशों के गैर-पूँजीवादी मार्ग पर बढऩे की आर्थिक-राजनीतिक सम्भावनाएँ कम होती जा रही हैं। कुछ तो बाहरी दबावों के कारण और कुछ सोवियत व्यवस्था के नष्ट होने से इस मार्ग की बाधाएँ बहुत बड़ी हो गई हैं। राष्ट्रीय सरकारों पर जनता का जैसा दबाव होना चाहिए, वह नहीं है। उन पर विश्व-बैंक और मुद्राकोष का दबाव ज़्यादा है। आन्तरिक अव्यवस्था से ऐसी सरकारें दिन-ब-दिन ग्रस्त होती जा रही हैं, हमें इसे भूलना नहीं चाहिए। प्रतिरोध सफल न हुआ तो हम एक अधिक जटिल और आतंककारी गुलामी की गोद में गिर सकते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में हमें जनता के बीच के अंतर्विरोधों से भी निबटना पड़ेगा।

संस्कृतियों की स्वायत्तता को नष्ट कर एक भावी सभ्यता के सर्वग्रासी रूप की परिकल्पना कैसी लगेगी? वर्तमान पूँजीवादी सभ्यता क्या इसी ओर बढ़ रही है? इतिहास-दर्शन के अनेक प्रश्नकर्ताओं ने सदी के दूसरे दशक में ही इसकी सम्भावना व्यक्त की थी। दो विश्वयुद्धों के बाद पश्चिमी पतनशीलता क्या नव-उपनिवेशवाद से थमी है। मगर यह साझा उपनिवेशवाद कहाँ तक चलेगा? फिलहाल इन नव-उपनिवेशवादी हमलों से विकासशील देश ही त्रस्त नहीं है, कुछ उन्नत पूँजीवादी देश भी परेशान हैं। फ्रांस इसका ताज़ा उदाहरण हैं।

जनवादी क्रान्ति में क्या विकासशील राष्ट्रों की मुक्ति निहित है? यह प्रश्न तमाम पिछड़े हुए किन्तु परिवर्तनकामी राष्ट्रों की समस्या है। भारतीय वामपंथी-जनवादी इस संबंध में क्या सोच रहे हैं यह भी हमसे छिपा नहीं है। पर जनता क्या उनसे स्वतंत्र भी कुछ सोचने के लिए राजनीतिक रूप से तैयार है? ये प्रश्न हमारे लिए निर्णायक प्रश्न हैं।

इन बृहत्तर प्रश्नों के सन्दर्भ में रचना और आलोचना की स्थिति पर विचार करना एक बार फिर ज़रूरी हो गया है। भारतीय नवजागरण के भावी परिणामों पर विचार करने के पहले उसके वर्तमान स्वरूप पर विचार करना ज़रूरी है। क्या यह नवजागरण राष्ट्रीय परिदृश्य में बिखराव—धार्मिक अस्मिता और शोषित राष्ट्रीयता जैसे नारों में—ला रहा है? क्या उसका कोई भी सकारात्मक भविष्य नहीं है? नवजागरण में तो राष्ट्र को जनता की शक्ति मिलनी चाहिए और जनता को राष्ट्र की ऐक्यबद्धता। उपनिवेशवाद के पहले दौर में हमारे नवजागरण को पीछे ठेल दिया गया। क्या नव-उपनिवेशवाद का सांस्कृतिक हमला उसे पीछे ठेलने में समर्थ हो जाएगा? हमारे सामने ये चुनौतियाँ हैं। हर वामपंथी मंच पर यह खुली बहस का विषय है। स्थितियों के साथ संवाद बनाए रखना ज़रूरी है। नवजागरण के तमाम मुद्दे नए सिरे से तय करने की कोशिशें भी चल रही हैं।

लोकजागरण जनता के जनवाद के पक्ष में जाए इसकी संभावनाओं और बाधाओं पर दृष्टि केंद्रित किए बिना बहुत सारी सांस्कृतिक समस्याओं का हल नहीं निकलेगा। इसके लिए साहित्य के नवगठन और पुनर्गठन का महत्त्व क्या है?

आज़ादी हमारे निकटतम इतिहास की सबसे बड़ी घटना है। इसके साथ एक विशाल जनगण का भविष्य जुड़ गया था। उपनिवेशवाद से मुक्ति के इस दौर में अनेक छोटे-बड़े राष्ट्र इस भविष्य से जुड़ गए थे। परिवर्तन की एक अमूर्त भावना जनगण में थी। विकासशीलता को एक नया सन्दर्भ और अर्थ मिल गया था। पर साथ ही यह भी एक तथ्य है कि इस लोकतंत्र की शक्ति को पहचानकर भी उसके व्यावहारिक तर्क अलग-अलग पडऩे लगे थे। समाजवाद की अंतर्ध्वनियाँ सुनाई ज़रूर पड़ती थीं पर उन्हें समर्थित आधार देने वाला कोई बड़ा संगठित वर्ग न था। जनता ने अपना जनतंत्र नेतृत्व को प्राय: समर्पित कर अपनी भूमिका को विराम दिया। राष्ट्रीय पुनर्गठन का समाजवादी लक्ष्य फिर भी तय न हुआ। व्यावहारिक तर्क एकता और संघर्ष की वामपंथी असमंजस्यता का शिकार हुआ। गैर-काँग्रेसवादी कार्यनीति गैर-राजनीतिक गठबन्धन से अधिक कुछ न रही।

जनता के पुनर्गठन का सवाल तय न हो तो कला और संस्कृति के पुनर्गठन का प्रश्न स्वत: कुछ मध्यवर्गीय समूहों तक सीमित हो जाता है। ये मध्यवर्गीय समूह अपने को पिछड़े हुए समाज से अलग-थलग समझते हैं। यही नहीं ये क्रान्ति की क्रान्तिकारी व्याख्या करते हुए यह कार्यभार दूसरों को सौंप देते हैं। परिणाम स्पष्ट है, बहुत-सी ऊँची लहरें समय के साथ गुज़र जाती हैं। एकत्वहीन मध्यवर्गीय समूह हलचल को अपनी स्वतंत्रता मानकर जनवाद और क्रान्ति को किस कदर बदनाम करता है, इसकी मिसालें हमारे यहाँ के अलावा अन्य समाजों में भी मिल जाएँगी।

जनवाद के सन्दर्भ में एक विशेष स्थिति इसलिए भी देखी जा सकती है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की वर्तमान काँग्रेस ने समाजवाद को एक चीनी तत्व बनाकर छोड़ दिया है।

डॉ. रामविलास शर्मा जी ने साहित्य, परम्परा, जातीयता, इतिहास और विश्व-दृष्टि को लेकर इधर कुछ नए और बड़े सवाल उठाए हैं। अभी इनमें से अधिकांश सवाल बहस के बीच हैं। मगर इन प्रश्नों ने हमें बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य से जोड़ दिया है। भारतीय साहित्य के इतिहास-दर्शन से ये तमाम प्रश्न जुड़ते हैं। कोई भी मार्क्सवादी विचारक इन प्रश्नों से बचाव नहीं कर सकता। उनका भारतीय मानसिकता की ओर लौटना उस अर्थ में नहीं लिया जा सकता जिस अर्थ में हम ‘हारे को हरिनाम’ कहते हैं। वे सम्पूर्ण मानसिकता को एक रचनात्मक और सृजनात्मक जीवनधारा से द्वन्द्वात्मक रूप में परखने के लिए यह यात्रा करते हैं। संस्कृतियों के अध्ययन की एक नई दृष्टि विकसित करने का श्रेय शर्मा जी के लेखन को जाता है। भारतीय सन्दर्भ में वे अकेले मार्क्सवादी हैं जिन्होंने दो पीढिय़ों का प्रशिक्षण बड़े पैमाने पर किया है। उन्हें कई मुद्दों पर अस्वीकार करने के लिए भी हमें नया कुछ सोचने पर विवश होना पड़ता है।

मेरे दिमाग में भारतीय कृषितंत्र और ग्राम समुदायों के संघटन का एक ऐसा ही मसला फँसा हुआ है। ग्राम-समुदायों को लेकर इधर मार्क्सवादियों के बीच काफी बहस चली है। सन्दर्भ एशियाई उत्पादन-पद्धति का रहा है। क्या भारतीय ग्राम-समुदायों की परिकल्पना महज़ एक उपनिवेशवादी तंत्र की आवश्यकता थी? क्या पितृ-सत्तात्मक-समाज निरंकुश साम्राज्य और निरीह ग्राम-समुदाय स्वयं मार्क्स के लिए समस्या नहीं बने थे? अगर ये ग्राम-समुदाय ही निरंकुश साम्राज्यों का उत्सर्जन करते हैं और स्वयं जड़ रह जाते हैं तो इस जड़ता का रहस्य बहुत अबूझ नहीं रह जाता। इसका यह अर्थ नहीं लिया जाना चाहिए कि इस प्रकार का कृषितंत्र स्वयं गतिहीन था। सामुदायिक सम्पत्ति और बड़े कुटुम्ब-परिवारों की व्यक्तिगत सम्पत्ति को लेकर अभी काफी उलझनें बनी हुई हैं। बहरहाल, कृषितंत्र और कृषि पर आधारित समुदायों के जीवन पर पुरातत्व का भी प्रयत्न अब तक निर्णायक नहीं है।

हिंदी भाषी जाति, लोक जागरण (मध्ययुग) और हिंदी नवजागरण को लेकर शर्मा जी ने बहुत कुछ लिखा है। हिन्दू पुनरुत्थानवादियों के लिए वे एकमात्र चुनौती हैं। चुनौतियाँ निरस्त प्रतिमानों की नहीं होतीं।

समकालीन साहित्य पर मैंने फुटकल बहुत लिखा है, पर लगता है फुटकल लेखन कभी बंद किया जाना चाहिए ताकि थोक लिखने का अवसर बने। अभी तक जो पहचान बनी है वह इस फुटकल लेखन की ही है। कोशिश कर रहा हूँ कि इससे उबरूँ। कुछ पारिवारिक परिस्थितियाँ,  कुछ छोटे शहर की सीमा, चाहकर भी नया लिखने की परिस्थिति कम बनती है और जब बनती है तो बाहर दौडऩा पड़ता है। विश्वविद्यालय का पुस्तकालय अभी अव्यवस्थित ही चल रहा है। इधर अनुदान की राशि में भारी कटौती ने कई समस्याएँ पैदा कर दी हैं। स्तरीय पत्रिकाएँ भी खरीदी नहीं जातीं।

जितनी तैयारी है उतने को भी संयोजित करना चाहूँ तो कुछ वर्ष लग ही जाएँगे। दिमाग में कई छोटी-बड़ी योजनाएँ हैं। अभी कहानी की समकालीनता पर एक छोटी पुस्तक लिखने में लगा हूँ। कुछ मित्र सवाल करते हैं कि क्या कहानी की समकालीनता कोई ऐसा परिदृश्य तैयार करती है कि उस पर गम्भीरता से विचार किया जा सके। मेरे लिए समृद्धि और दरिद्रता दोनों चिन्ता के कारण हो सकते हैं। मेरे लिए इतना आश्वासन पर्याप्त है कि कहानी की समकालीनता हिंदी कहानी की समकालीनता के पक्ष में है। बाहरी बोझ उस पर कम हुआ है। अपनी विषय-वस्तु पर कहानी की पकड़ मज़बूत हुई है। समय की जटिलता के नाम पर अमूर्त कहानियाँ कम लिखी जा रही हैं। हाँ, आरक्षण के सवाल पर कहानीकारों में आपसी अलगाव थोड़ा लक्षित हुआ है। यह पूरे देश की वास्तविकता है और केवल इसे कहानीकारों के बीच के विभाजन के रूप में नहीं देखा जा सकता।

चेखव को जुमलों से मारने वालों पर आज टिप्पणी करने की ज़रूरत नहीं। ज़रूरत है समकालीन कहानी को अपनी आधुनिक पहचान देने की जो हमारे लिए एक निर्णायक प्रश्न है। कला और कहानी के संबंध को उस तरह नहीं देखा जा सकता जिस तरह कला और कविता के संबंध को देखा जा सकता है। अपने विवेचन में भरसक मैं इस विवादास्पद प्रश्न से जूझा हूँ। वैसे अपनी शक्ति को बढ़ा-चढ़ाकर देखने की कोशिश मैंने अब तक नहीं ही की है।

एक छोटी योजना भारतीय मिथक-चक्र पर लिखने की है। किसी जाति या जातियों के समुदाय का विचार-विश्वास मिथकों के अध्ययन से जाना जाता है। इतिहास पूर्व का सांस्कृतिक स्रोत होने के कारण इनका विश्वव्यापी अध्ययन किया गया है और आज भी किया जा रहा है। हमारे देश में मिथकों के कई चक्र हैं जिनसे हमारे उपमहाद्वीप की जीवनविधि में आए परिवर्तनों को समझा जा सकता है। ये विश्वास परलोक संबंधी ही नहीं, इहलोक संबंधी भी हैं। वैदिक-पौराणिक मिथक-चक्रों के साथ उनके लौकिक चक्र भी हैं जो लिखित से अधिक वाचिक परम्पराओं में जीवित हैं। तुलनात्मक रूप से इनका अध्ययन अनेक समानताओं और विरोधों को उजागर करता है।

ब्राह्मणवाद एक व्यवस्था भी है और विचारधारा भी। इन दोनों रूपों में उसके ऐतिहासिक अध्ययन की योजना है। थोड़ा काम किया भी है। वर्तमान सन्दर्भ में तो यह विचारधारा एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। इतिहास के भीतर से वर्तमान तक आकर क्या भावी समाज के लिए यह संकटपूर्ण व्यवस्था साबित होने जा रही है? इन तमाम प्रश्नों से टकराना आज ज़रूरी है। ब्राह्मïणवाद क्या कोई ऐतिह्य उत्तर देने की स्थिति में है? कौन-सी व्यवस्था इसका उत्तर है? क्या भारतीय समाज इस विकल्प के लिए तैयार है? जनवादी व्यवस्था में क्या ये बद्धमूल अंतर्विरोध नष्ट होंगे? ऐसे कुछ मुद्दे क्या विकल्प की व्यवस्था के लिए तय हैं? आलोचनाकर्म की जटिलताओं से खूब परिचित हूँ। मेरे लिए आलोचना एक प्रकार का रचनात्मक विवेक है। सम्वेदना उसकी बुनियादी शर्त है। इस समीकरण के बावजूद आलोचना कठिन होती है। आलोचना का व्यावहारिक पक्ष मज़बूत हो तो सिद्धान्त की व्यवस्था अदृश्य भी छोड़ी जा सकती है। इसे हमारे कुछ मित्र विसर्जनवाद मानते हैं। सिद्धान्त के प्रति अतिरिक्त मोह का कारण क्या झूठी आत्मसजगता से कुछ अधिक है? मेरे कुछ जनवादी मित्र, जो अरसे पहले अपनी सिद्धान्त-प्रियता के लिए प्रसिद्ध थे, आज सबसे उपराम दिखाई पड़ते हैं।

किसी ने ठीक लिखा है कि आलोचक अपने अनुभव के साथ-साथ एक समृद्ध रचनात्मक अनुभव से भी बहुत कुछ सीखता है। बृहत्तर अनुभव-संसार से उसका यह सब कुछ सीखना, जो अपने एकान्त अनुभव से वह नहीं सीख सकता, उसकी दृष्टि को अधिक व्यापक भोग (भाव) के क्षेत्र में उछाल देता है। उसके कर्तव्य में इस दुहरे अनुभव की जटिलताएँ प्रकट होती हैं। ये अनुभव पूरक भी हो सकते हैं और परस्पर विरोधी भी। इन स्थितियों में उसका हल भी उसे ढूँढना पड़ता है। जीवन में, और विशेष रूप से समकालीन जीवन में, जो कुछ आंतरिक और स्फूर्तिदायक है उसकी पकड़ और पहचान सरल क्रिया नहीं होती। हम अनुभव की इन संजटिल चुनौतियों से जूझते हुए उनका कलात्मक और रचनात्मक अर्थ प्राप्त करते हैं।

हमारे अनुभव-संसार में बहुत से मूलगामी महत्त्व के परिवर्तन हुए हैं। पिछले चालीस वर्षों के इन अनुभवों का समकालीन संसार भारत के यथार्थ को समझने के लिए बहुत ही प्रासंगिक है। भारतीय सन्दर्भ में अन्य देशीय यथार्थ को समझने की चुनौतियाँ भी इसी में शामिल हैं। आधुनिकता और समकालीनता की बहुत-सी असंगतियाँ अगर हल की गई हैं तो बहुत-सी नई पैदा भी हो गई हैं। एक सचेत आलोचक के लिए इनकी रचनात्मक पहचान इसलिए भी बहुत ज़रूरी है।

आलोचनात्मक प्रेरणा का रहस्य इस काल की दुहरी बनावट में आज झाँकने से खुलता है। देश बाद में बदलता है काल में इसकी प्राथमिकताएँ पहले ही झाँकने लगती हैं। यह काल के अनुभव को बार-बार पुनर्गठित करने की प्रक्रिया में व्यक्त होती हैं। आज के समाज में यह प्रक्रिया कुछ ज़्यादा ही तेज़ हुई है। और भविष्य में यह कुछ अप्रत्याशित ढंग से प्रकट होती है, इसकी सम्भावनाएँ बढ़ गई हैं। तकनीकी क्रान्ति का यथार्थ पर यह प्रभाव अनिवार्य है। आलोचना कर्म के लिए प्रसंग प्राप्त स्थिति सुखद न हो, पर अनिवार्य है। कलात्मक अनुभव के संबर्द्धन के लिए यह और भी ज़रूरी है। कलात्मक अनुभव का यह योगपद आलोचक को सच्ची परिपक्वता देता है। यह आलोचना का ‘डायलेक्टिक’ गढऩे में उसकी मदद करता है। संकीर्ण द्वन्द्व से उसे उबारता भी है। एक प्रकार के सँकरे डायलेक्टिक की गिरफ्त में आकर यह कलात्मक अनुभव भी व्यर्थ हो सकता है। आवेश सम्वेदना का पर्याय नहीं हो सकता, वैसे जीवन के साधारण अनुक्रम में वही पहले प्रत्यक्ष होता है।

हिंदी आलोचना की कुछ व्यावहारिक समस्याएँ भी हैं। वह एक लम्बे अरसे से परिवर्तन और परम्परा के संक्रमण की पीड़ा झेल रही है। एक पारम्परिक समाज में ऐसी समस्याएँ आकस्मिक नहीं होतीं। परम्परा को जड़ता मानने की आदत से आलोचना को परहेज़ करना चाहिए। परम्परा से गति को शक्ति मिलती है। परम्परा सम्वर्धन है। परिपाटी अलग चीज़ है। वह कुछ तोड़ती नहीं, इसलिए कुछ नया जोड़ती भी नहीं। एक यांत्रिक और निर्धारित मार्ग का अनुगमन-भर करती है। परम्परा नवीनता को लयबद्ध गति की स्वच्छंदता के रूप में आत्मसात करती है। वह केवल लयहीन गति का विरोध करती है। दूसरी परम्परा की खोज करने के बदले यदि हम इस लयबद्ध गति की स्वच्छंदता की खोज करें तो परम्परा के नवीकरण के लिए वह उपयोगी होगा।

मूल्यवान को निरर्थक से अलग करने की यह एक विधि-सम्मत प्रणाली भी है।

रचनाकारों को आलोचक से हमेशा शिकायत रही है। आज यह कोई नई बात नहीं है। अगर कुछ नया है तो वह यह कि आलोचना की मंचबद्धता ने प्रतिबद्धता का एकाधिकार प्राप्त कर लिया है। समस्त क्रान्ति का स्रोत अपने को सिद्ध करने वाले मंच आज अपने अंतर्विरोधों से ही परेशान हैं। रचनाकार इसके लिए कम दोषी नहीं है। मंच लेखक का होता है, कुर्सियाँ आलोचक सँभालता है। प्रतिबद्धता इतनी विवश, इतनी सँकरी नहीं हो सकती। जो हमारे मंच से बाहर के लेखक हैं वे तो लगभग तय मानते हैं कि हमारे रुख में कोई सकारात्मक परिवर्तन होने से रहा। हमारी उदारता भी उन्हें अभिप्राय-मुक्त नहीं मालूम पड़ती।

आलोचक की अविश्वसनीयता एक खतरनाक स्थिति है। वह निर्णायक प्रश्नों को भी संदेहास्पद बना देती है। यही नहीं, रचना की पहचान के लिए भी वह एक द्विविधाजनक मानसिकता तैयार करती है। आलोचना की एक अच्छी पुस्तक पढऩे का अवसर वर्षों बाद आता है। समीक्षाएँ, रचनात्मक पहचान नहीं बना पातीं। लगता है इस मोर्चे पर भयानक सन्नाटा तिर रहा है। रामविलास जी इस सन्नाटे को तोड़ रहे हैं, क्या यही हिंदी आलोचना की एकमात्र गतिविधि है? सुनता हूँ कि हिंदी नवजागरण पर नामवर जी की एक पुस्तक आ रही है। उससे शायद जड़ता थोड़ी टूटे। सन्तोष करने के और भी बहाने ढूँढे जा सकते हैं।

अपने स्वर में उभरती हुई निराशा स्वयं मुझे चौंकाने वाली लगती है। रचना और आलोचना के लिए आज कोई स्थिति निरापद नहीं हो सकती। पर निराशा एक भिन्न स्थिति है। वह समय के आवर्त्त में हमें और अकेला करती है। इसके विपरीत रचना और संघर्ष के व्यावहारिक रिश्ते लेखक की ऊर्जा के स्रोत होते हैं। कुछ ही लेखक यदि उस रिश्ते को जीवित रखते हैं तो उत्सर्जन की सम्भावनाएँ बनी रहती हैं। आलोचना इनका आधार दृढ़ कर सकती है—रचना और संघर्ष को व्यावहारिक बनाने में उसका सर्जनात्मक योगदान हो सकता है।

जीवन-मूल्यों के बीच कहीं गहरी और निर्णयात्मक टकराहट है। पूरे समकालीन भारतीय जीवन और विचारों-विश्वासों में उसकी व्याप्ति देखी जा सकती है। ऐसी स्थिति में अपने ही लिखे पर विश्वास जमाना चाहता हूँ। मैं अपने लिखे पर अमल करता रहा हूँ। इसलिए भी आत्मविश्वास बढ़ा है। वैसे अभी ऐसा कुछ मैंने नहीं लिखा जो मेरी पहचान को एक सार्वजनिक चेहरा दे सके। साठ की उम्र तक पहुँचकर भी ऐसा न हुआ, इसके लिए खुद भी जि़म्मेदार हूँ। पढऩे की मेरी जि़द ने लिखने में बाधा पैदा की है। आज भी जब कुछ पढऩे को मिल जाता है तो लिखना हफ्तों स्थगित रहता है। नोट्स लेने के अलावा कुछ भी लिख नहीं पाता। लिखना सचमुच साधना है।

भारतीय लेखन के सन्दर्भ में हिंदी लेखन पर विचार किया जाए यह एक शुभ स्थिति होगी। अब तक हमने केवल अंतरराष्ट्रीय साहित्य में ही अपनी जड़ों और शाखों की पहचान की है, अब ऐसा भी समय आ गया है कि हम अपनी जड़ों पर भी ध्यान केन्द्रित करें। हमारे साहित्य में जो जनवादी तत्व हैं और प्रगतिशील भविष्य के लिए आवश्यक तत्व हैं—उनको सहेजकर रचनात्मक चित्र का पोषण करें। समकालीन वैचारिक संघर्ष में उनसे हमें असीम मदद मिलेगी।

संबंधों को विजातीय बना देने वाले जिस समय में हम जी रहे हैं और आततायी परकीयता झेल रहे हैं उससे जनता और साहित्य-संस्कृति की मुक्ति के लिए हमें लम्बा रास्ता तय करना है—यह रास्ता संघर्ष का रास्ता है, हमारे उदग्र अभियान का अंग है।

षष्ठिपूर्ति पर पठित, ‘परिवेश’, नवंबर, 1992-अप्रैल, 1993 से साभार

 

Published Books Of Surendra Chaudhary:

  •  Hindi Kahani : Prakriya Aur Path (Hindi), Radhakrishna Prakashan
  •  Phanishwar Nath Renu, Sahitya Academy
  • Itihas : Sanyaog Aur Sarthakata, Antika Prakashan
  • Hindi Kahani : Rachana Aur Paristhiti, Antika Prakashan
  • Sadharan Ki Pratigya : Andhere Se Sakshatkar, Antika Prakashan

 

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