घोंघा: संजीव कुमार (कहानी बहस के लिए)

इस कहानी के इर्द-गिर्द एक बहस कहानीकारों, आलोचकों और सुधि पाठकों के बीच चल पड़ी है युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने अपने फेसबुक वाल पर अभी हाल में ही लिखा है- “संजीव कुमार की कहानी ‘घोंघा’ पर मित्रों में बहस जारी है हिंदी आलोचना के एक नए विमर्श के मुताबिक़ इसके ‘पोर्नोग्राफिक’घोषित हो जाने का खतरा भी है। इस कहानी को जल्दबाजी में न पढ़ियेगा। हमारे सामाजिक मन की बहुत भीतरी तहों में उतर कर उसे विचलित करने का माद्दा इस कहानी में है। लैंगिक, वर्गीय, समाज-आर्थिक प्रतिसंधों (faultiness)  के टकराव का यौन दमित समाज में युवा हो रही पीढ़ी के भावबोध पर कितना विनाशकारी असर हो सकता है,इसे समझना हो तो कहानी पढ़ लीजिये।” सवाल उठाये जा रहें हैं कि इस कहानी में कहन का जो खिलंदड़ा अंदाज़ लिया गया है ,वह  त्रासदी की भीषणता को घटा कर एक मनोरंजक गप्प में बदल देने की समसामयिक  हिकमत का नमूना तो नहीं हो  गया है? कथावाचन की क्लासिकी परम्परा को एक अमानवीय वृत्तांत की रचना के उपकरण के रूप में चित्रित करना क्या कहानी कहने- सुनने के कौतूहल मात्र को संदिग्ध नहीं बना देता ? स्त्री के प्रति सहानुभूति का दावा करती हुयी कहानी स्त्री की असहाय दशा का ग्राफिक चित्रण  कर ती कहीं पाठकों की दमित यौन भावनाओं को उत्प्रेरित करने का बहाना तो नहीं बन रही?

‘घोंघा’ कहानी जिस चुहलबाजी या ‘मनोरंजक’ उठान के साथ शुरू होती है, कहानी उसका निर्वाह नहीं कर पाती क्योंकि कहानी एक ट्रैजिक ‘अंत’ के साथ पाठकों के बीच खुलती है। कहानी अपनी शुरुआत के साथ ही जैसे पाठकों को अपने बीच साधारणीकृत कर लेती है. लेकिन यही शुरुआत कहानी के संपूर्ण प्रभाव में एक विस्मृत पार्श्व बन जाती है. क्लासिकल कहानियों की जो भी स्मृति हमारे कथा-संसार में विद्यमान हैं, उसका बहुलांश कहानी के ऐसे फॉर्म को सहजता प्रदान नहीं करता है. लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि यह कहानी अपने कथात्मक-स्वाद में भले दो स्तरों पर चलती हो लेकिन इन दोनों स्तरों का उत्स कहीं न कहीं एक ही सामाजिक-सच्चाई है. एक सवाल यहाँ वाजिब हो सकता है कि जिस सामाजिक सच्चाई को व्यक्त करने के लिए कहानीकार ने एक लोक-स्वीकृत फॉर्म, जो पाठकों को सहज ही कथा का आनंद देता है, को त्याज्य समझा, वह क्या इतना अनिवार्य था?

सवाल यह भी हो सकता है कि कथावाचकों का संसार क्या सचमुच इतना निष्करुण भी है? यह बात सिर्फ इसलिए नहीं कही जा रही  है कि कथाकार ने कथावाचन के लोकप्रिय अंदाज को विस्मृति के हवाले कर दिया बल्कि इसलिए भी कि चौपालों का कथानायक-कथावाचक ‘जितुआ’ कैसे निष्करुण और स्त्रीविरोधी समाज का प्रतिनिधि कारक के बतौर सामने आता है. 

इस कहानी का महत्व इसलिए भी सुरक्षित होना चाहिए कि यह कहानी एक ऐसे दौर में लिखी गयी है जब कहानीकारों के एक अतिप्रचारित तबके ने भाषा की ‘चुहलता’ के सामने मानों आत्मसमर्पण कर दिया हो. ऐसा नहीं है कि संजीव कुमार में उस ‘चुहलता’ की प्रतिभा नहीं है बल्कि उनके इस प्रतिभा की व्युत्पति एक सामाजिक-वैचारिक अभ्यास की कमानी पर कस कर होती है।
कोई सत्ता-प्रतिष्ठान रचनात्मक-संसार को कैसे गैर रचनात्मक बहसों में उलझाकर व्यक्तिगत लानत-मलानत में खींसे निपोरता है इसका सबसे बड़ा उदाहरण अभी हिन्दी के बौद्धिक समाज में देखने को मिल रहा है। ऊपर से तुर्रा यह कि बहस इस बहाने शुरू हुई कि रचना को देखना चाहिए न कि रचनाकार में पुष्ट उसके वैचारिक व्यक्तित्व को। 
तो इस प्रस्ताव के साथ हम इस कहानी को बहस के लिए प्रस्तावित करते हैं। हमें उम्मीद है कि कहानी विचारोत्तेजक लगेगी और आप भी कुछ टिप्पणीनुमा जोड़ना चाहेंगे। 

आप अपनी टिप्पणी-लेख-समीक्षा को इन पतों पर मेल कर सकते हैं- ashuvandana@gmail.com और  udayshankar151@gmail.com। धन्यवाद। 

Massacre in Korea By Picasso

Massacre in Korea By Picasso

घोंघा

BY संजीव कुमार

उम्र की दूसरी-तीसरी दहाई में अनगिनत बार मैंने वह सपना देखा होगा…

पर मुश्किल यह है कि अभी जब उस सपने से कहानी शुरू करना चाहता हूं, कुछ भी क़ायदे से याद नहीं आ रहा।

ये भी हो सकता है कि हर बार मैं उसे वही सपना समझता होऊं, पर वह वही न होता हो। कुछ अजीबो-ग़रीब चीज़ें हर सपने में एक-सी होती हों, जिनके चलते लगता हो कि सपना वही है। जैसे यह, कि शहर के अपने छात्रावास से निकलते ही मैं गांव की बूढ़ी गंडक नदी के घाट पर पहुंच जाता हूं! जैसे यह, कि गंडक-तट की रेतीली मिट्टी पर पड़े असंख्य घोंघों के बीच मैं बचता-बचाता चलता हूं और साथ में सोचता हूं कि मैं किसे बचा रहा हूं, ख़ुद को या घोंघों को? जैसे यह, कि नदी की सतह समतल न होकर उन्नतोदर है, बीच से उठी हुई! जैसे यह, कि बांध की ढलान पर सलवार-कुर्ते की एक जोड़ी पड़ी है, अपने होने में किसी के न होने को अनायास दर्ज करती। जैसे यह, कि अचानक मुझे पता चलता है, यह बूढ़ी गंडक नदी नहीं, बूढ़ा गंडक समुद्र है!! जैसे यह, कि मैं धरती से आसमान तक फैले डरावने जबड़े जैसी एक लहर से बचने के लिए भागता हूं और घोंघों के कठोर खोल के टूटने-चुभने से मेरे तलवे लहूलुहान होते जाते हैं और रफ़्तार ऐसी कि घोंघों से बस थोड़ी ही तेज़!

तो मुझे यह नहीं कहना चाहिए कि अनगिनत बार मैंने यह सपना देखा होगा। कहना चाहिए कि अनगिनत बार ये चीज़ें मेरे सपनों में आयी होंगी, जोड़-घटाव के अलग-अलग समीकरणों में उलझी।

इनके पीछे भी एक कहानी है। यों तो एक नहीं, अनेकों कहानियां होंगी, पर एक को मैं अपने पूरे होशोहवास में जानता हूं। उस एक कहानी के पीछे भी अनेकों कहानियां होंगी जिन्हें मैं बिल्कुल नहीं जानता।

हमारा कॉलेज गंगा के किनारे था। अंग्रेज़ों का बनवाया हुआ वह परिसर इतना विराट और जटिल था कि मैं विष्वास के साथ नहीं कह सकता कि स्कूल से निकलने के बाद के जो पांच साल मैंने वहां गुज़ारे, उनमें कॉलेज की इमारत के हर कोने को देख पाया होऊंगा। शहर की मुख्य सड़क पर–उसे ‘मेन रोड’ कहा भी जाता था–कॉलेज का प्रवेश-द्वार था, जिससे घुसने के बाद पेड़ों की क़तारों के बीच एक लंबा फ़ासला तय करके ही हम इमारत के भीतर के किसी ठिकाने तक पहुंच पाते थे। हमारा छात्रावास, कई और छात्रावासों के साथ, इसी परिसर में एक तरफ़ था, गंगा के ज़्यादा क़रीब। लेकिन एक ही परिसर के भीतर हमारे गौरवशाली कॉलेज और दयनीय छात्रावास की इमारत के बीच कोई तुलना न थी। दरअसल, उसे इमारत कहना ही अजीब लगता है। वह अंग्रेज़ों के ज़माने की एक फ़ौजी बैरक थी, करकट यानी ऐस्बेस्टाॅस की छत वाली, जिसे छात्रावास में तब्दील करने के बाद बेहतर तो क्या, ज्यों-का-त्यों बनाये रखने की भी कोई कोशिश नहीं की गयी थी। लिखित इतिहास पर भरोसा न करने वाले मेरे ज़्यादातर सहपाठियों का तो मानना था, और इसके लिए मौखिक स्रोतों के अनगिनत साक्ष्य उनके पास थे, कि वह फ़ौजियों की बैरक नहीं, उनका अस्तबल था जिसे छात्रावास में तब्दील करते वक़्त सिर्फ़ इतना किया गया कि हर कमरे के सामने की लोहे वाली बैरियर हटा कर वहां दीवार चुनवा दी गयी और एक दरवाज़ा निकाल दिया गया। इसके अलावा सब कुछ घोड़ों के हिसाब से ही बना रहने दिया गया। करकट की छत के नीचे लगी प्लाई की फॉल्स सीलिंग के बारे में उनका कहना था कि वह तो अंग्रेज़ों के घोड़ों के लिए भी ‘आवश्यक आवश्यकता’ की श्रेणी में आता होगा। वह न होती तो मई-जून के महीनों में, जब करकट की वजह से इन कमरों में अदृश्य आग जल रही होती, घोड़े शर्तिया बग़ावत कर बैठते और अंग्रेज़ों को यह साबित करने में अपने कई इतिहासकारों को झोंकना पड़ता कि चूंकि घोड़ों का सामंतवाद के साथ क़रीबी रिश्ता रहा है, इसलिए इस बग़ावत का मूल चरित्र प्रतिगामी है।

बहरहाल, निहायत घोड़ोपयोगी होते हुए भी हमारा छात्रावास बाहर कहीं किराये का कमरा लेकर रहने की बनिस्पत बहुत आरामदेह था। उसके आसपास खुला-खुला वातावरण था, उत्तर की तरफ़ कुछ क़दम के फ़ासले पर गंगा थी, चारों ओर काफ़ी बड़ी संख्या में पेड़-पौधे थे, और सबसे बड़ी बात कि एक ‘बबजिया’ की देख-रेख में चलने वाला किफ़ायती मेस था जहां 110 रुपये में महीने भर सुबह-शाम का खाना मिल जाता था। जिस मैथिल युवक को ‘बाबा’ के साथ सम्मानसूचक ‘जी’ और अपमानसूचक ‘आ/वा’ लगा कर ‘बबजिया’ कहा जाता था, वही मेस का कर्ताधर्ता और सर्वेसर्वा था। मेस में खाने के हक़दार तो हॉस्टलर्स ही थे, लेकिन आठ-दस बाहर के ग्राहक भी वह बनाये रखता था जिनसे वह उसी खाने के 140 रुपये वसूलता था।

बाहर के ग्राहकों में सिर्फ़ जीतेंद्र था जिससे बबजिया 110 रुपये ही लेता था, या कहिए कि ले पाता था। जीतेंद्र हमारे ही कॉलेज का विद्यार्थी था और हमारे छात्रावास के साथ उसका ऐसा रिश्ता था कि बहुत-से लोग उसे यहीं का अंतेवासी समझते थे। रहता भी पास ही था, उपप्राचार्य की कोठी के आउटहाउस में। प्राचार्य और उपप्राचार्य को कॉलेज के परिसर में ही अंग्रेज़ों के ज़माने की बनी कोठियां मिली हुई थीं। दोनों कोठियां गंगा के ठीक किनारे पर बनी थीं जिनमें पेड़ों और झाड़-झंखाड़ से भरा बड़ा-सा अहाता था। अहाते और गंगा की तरफ़ जाती ढलान के बीच कम्पाउंड वॉल थी जिसे अहाते की तरफ़ से देखो तो खेत की मेड़ से बस थोड़ी ही ऊंची नज़र आती, पर गंगा की तरफ़ से देखने पर उसकी ऊंचाई आठ फीट से कम न थी। प्राचार्य ने तो नहीं, पर उपप्राचार्य ने अपना आउटहाउस किराये पर एक मामा-भांजे को दे रखा था। जीतेंद्र वही भांजा था। उससे उम्र में तीन-चार साल बड़ा उसका मामा शायद ठेकेदारी के धंधे में हाथ-पैर मार रहा था। वह अक्सर सुबह जल्दी निकल कर देर रात लौटता था। इसीलिए हमारे मेस में खाना सिर्फ़ जीतेंद्र खाता था।

लंच और डिनर के समय के अलावा भी जित्तू का काफ़ी वक़्त हमारे छात्रावास में बीतता। बी.ए. अंतिम वर्श के सारे लड़के उसके मित्र थे और वह प्रायः किसी-न-किसी के कमरे में बैठा पाया जाता। ग़रज़ कि हमारा छात्रावास उसकी अड्डेबाज़ी का पसंदीदा ठिकाना था।

इस ठिकाने पर दो चीज़ों को उसकी विशिष्ट पहचान का दर्जा हासिल था। पहली चीज़ थी उसकी हंसी, जो किसी भी तरह की मासूमियत से कोसों दूर थी। हंसते हुए अक्सर उसकी आंखों में एक शैतानी चमक होती जो ऐसे सभी लोगों की आंखों में होती है जिनके भीतर दूसरों को नुकसान पहुंचा कर, या किसी भी तरीक़े से उन्हें मायूसी, हताशा या कुंठा में धकेल कर लुत्फ़ लेने की प्रवृत्ति होती है। लेकिन उसकी पहचान के रूप में स्थापित विशेषता यह नहीं थी। पहचान वाली विशेषता यह थी कि उस हंसी में घोड़ों की हिनहिनाहट और परिंदों के परों की फड़फड़ाहट का विचित्र संयोग था। हिनहिनाहट का संबंध गले से रहा होगा और फड़फड़ाहट का जीभ और होठों से। बल्कि यह कहना ज़्यादा सही होगा कि हिनहिनाहट उसकी हंसी का मूल स्वर था और फड़फड़ाहट उस लार की वल्गा को खींचे रखने का शोर जो हर हंसी के साथ जीतेंद्र के मुंह से बरबस बाहर की ओर चल पड़ती थी। ऐसी हंसी पूरे हॉस्टल  में किसी की नहीं थी। वह कॉरीडोर के कोने वाले कमरे में भी हंस रहा हो तो दूसरे कोने में बैठा बंदा समझ जाता कि जितुआ हंस रहा है। और जितुआ हंस रहा है, मतलब पूरी संभावना है कि उसके आसपास कोई-न-कोई परेशान या चिड़चिड़ा या बग़लें झांकता या मायूस या आहत है।

कॉरीडोर के एक कोने वाले कमरे से दूसरे कोने वाले कमरे तक आवाज़ों के पहुंच जाने का रहस्य यह था कि कमरों में लगी फ़ाॅल्स सीलिंग जगह-जगह से उजड़ चुकी थी और उसके तथा करकट की छत के बीच सभी कमरों को जोड़ता हुआ एक सुरंगनुमा ख़ालीपन था, क्योंकि कमरों के बीच की पार्टीशन वाली दीवार फॉल्स सीलिंग की ऊंचाई तक ही थी। लिहाज़ा किसी एक कमरे से उठती आवाज़ उस सुरंग में घुसने के बाद सभी कमरों में यथायोग्य बंट जाती। बिल्कुल पास के कमरों में उसकी गुणवत्ता उत्तम, थोड़े बाद वाले कमरों में मध्यम और ख़ासे दूर के कमरों में अधम होती।

और इस सुरंग से होकर आती आवाज़ों में से जीतेंद्र की हंसी ही नहीं, उसके गपास्टक की आवाज़ भी एकदम अलग से पहचानी जाती थी। जी हां, यह गपास्टक या कि़स्साग़ोई उसकी दूसरी पहचान थी। वह जहां भी बैठता, वहां धीरे-धीरे पांच-सात लड़के इकट्ठा हो ही जाते, क्योंकि वह एक-के-बाद-एक दिलचस्प कि़स्से इंतहाई सहज और ग़ैरबनावटी अंदाज़ में सुनाता जाता। महमूद और दानिश भी, जो इन दिनों दास्तानगोई की कला को दुबारा ज़िंदा कर रहे हैं, उससे कुछ-न-कुछ सीख सकते थे। वह जो कुछ सुनाता, उसमें आपबीती कितनी होती थी और कितना मनगढ़ंत, कहना मुष्किल है, लेकिन उसका दावा सच का होता और बातें सच्ची लगती भी थीं। यानी वह पत्रकारीय अर्थों में ‘स्टोरी’ सुनाता था जहां झूठ को भी सच के दावे और ढब के साथ पेश किया जाता है, साहित्यिक अर्थों में नहीं जहां हम सच को भी झूठ कह कर परोसते हैं। उसके पास दुनिया का विशाल अनुभव था जो कभी भी निःशेष न होने वाले खज़ाने की तरह उसके साथ चलता था और उसकी बातें सुन कर हम ख़ुद को कुंए का मेढ़क समझने पर मजबूर होते थे। हमारे पास दरी वाले सिनेमाघरों से लेकर पलंग और मसनद वाले सिनेमाघरों तक का तज़ुर्बा नहीं था। हमने कोठों और चकलाघरों का स्वाद नहीं चखा था। हमने ट्रकों में सफ़र करके लाइन-होटलों में रातें नहीं गुज़ारी थीं। हम कभी डब्ल्यू.टी. यात्रा करने के ज़ुर्म में जेल नहीं गये थे। हमने टिकटें ब्लैक में बेच कर उम्दा रेस्तरांओं में मुगऱ्मुसल्लम नहीं उड़ाया था। रहरी यानी अरहर के खेत देखने में कैसे होते हैं, यह हममें से ज़्यादातर को पता नहीं था, फिर भला हम कैसे जानते कि वह कामातुर जोड़ों के लिए अभयारण्य क्यों साबित होता है! निचोड़ यह कि जीतेंद्र के कि़स्से हमारे लिए अवैध और निषिद्ध ज्ञान का भंडार थे।

इस भंडार में यों तो लगभग हर चीज़ हमारे काम की थी, पर सबसे ज़्यादा काम की चीज़ थी उसका कामशास्त्र। उसे हम श्लेष में ‘काम’ की चीज़ कहते, क्योंकि वही हमारी अभावग्रस्तता (या शायद अकालग्रस्तता) और ग़र्ज़मंदी का सबसे अहम संदर्भ था। कहने को हम एक सहशिक्षा महाविद्यालय में पढ़ रहे थे, पर लड़कियां हमारे लिए उतनी ही दुर्लभ थीं जितनी पास वाले ब्वायज़ कॉलेज यानी ‘बंडाश्रम’ के लड़कों के लिए। हिक़ारत में दिये गये इस ‘बंडाश्रम’ नाम के बदले ब्वायज़ कॉलेज के लड़के हमारे बारे में कहने लगे थे कि साले, बात तो ऐसे करते हैं जैसे सहशिक्षा महाविद्यालय में नहीं, सहवास महाविद्यालय में पढ़ते हों। ये करमघट्टू, ताखे पर रखी हुई मिठाई देख-देख के रोज़ इतनी लार टपकाते हैं कि एक दिन जब मिठाई मिलेगी तब पूरी लार ख़त्म हो चुकी होगी, मिठाई घोंटी नहीं जाएगी।

बंडाश्रम वालों की इस बात का उत्तरार्द्ध भले ही शु द्ध खिसियाहट का नमूना हो, ताखे पर रखी हुई मिठाई वाला उपमान ग़लत नहीं था। लड़कियों के साथ हमारा संबंध वैसा ही था जैसा दिन और रात, सूरज और चांद के बीच होता है। कभी क़ायदे से मिल न पाना हमारी कि़स्मत में बदा था। बस, कक्षाएं थीं जो सुबह और शाम की भांति आधे-अधूरे ढंग से हमें पास आने का मौक़ा देती थीं। पता नहीं, कॉलेज के स्थपति ने कितना विराट गल्र्स कॉमन-रूम बनावाया था कि कक्षाओं में बैठी लड़कियों के अलावा बची हुई सारी लड़कियां उस कॉमन-रूम के पेट में समा जाती थीं। क्लास शु रू होने से दो मिनट पहले वे कॉमन-रूम से निकल कर क्लास-रूम के बाहर झंुड में खड़ी हो जातीं। उनके झुंड का रंग-ढंग देख कर मुझे रोयाल चिकेन सेंटर की वे मुर्गियां याद आतीं जो आसिफ़ मियां का हाथ पिंजरे के अंदर जाते ही मुंह दूसरी ओर घुमाये परले कोने में अंड़सने लगती थीं (ज़ाहिर है, उसमें मुर्गे भी होते होंगे, लेकिन मेरी याद में सब मुर्गियां बन कर ही आते)।… टीचर के आने पर उसके पीछे-पीछे वे क्लासरूम में प्रवेश करतीं और आगे की दो ख़ाली क़तारों में जाकर बैठ जातीं। इन क़तारों को उन्हीं के लिए ख़ाली छोड़ा जाता था। फिर क्लास ख़त्म होने पर वे टीचर के पीछे-पीछे क्लास-रूम से निकलती हुई सीधा गल्र्स कॉमन-रूम या किसी और क्लास-रूम की तरफ़ झुंड में बढ़ जातीं। ज़्यादातर लड़कियों को हम उनके राॅल नंबर से जानते थे, क्योंकि हाजि़री लगाने के लिए नाम नहीं, राॅल नंबर पुकारा जाता था। थक-हार कर उसे ही हमने उनके नाम का दर्जा दे दिया था। मिसाल के लिए, हमारे क्लास की तीन निहायत खूबसूरत लड़कियों के नाम थे, 84, 310 और 320। कॉलेज के 99 फ़ीसदी लड़कों को सालों-साल किसी लड़की से दो शब्द बात करने का मौक़ा न मिलता था और यही हाल 99 फ़ीसदी लड़कियों का था। बचे 1 फ़ीसदी लड़के और लड़कियां। तो उनकी बात ही अलग थी! वे हमें अपने शहर तो क्या, इस मत्र्यलोक के ही प्राणी नहीं लगते। उन्हें हम देवलोक का प्रतिनिधि मानते थे। हां, कभी-कभी जब कोई देवता हमारी दुनिया के किसी असुर से इस बात पर पिट जाता कि उसने उस लड़की से बात क्यों की जिसके पिता को असुर विशेष ने अपना ससुर मान लिया है, तब उसका देवत्व हमारे लिए संदेह के घेरे में आ जाता था।

ख़ैर, अकाल की इस चर्चा को यहीं विराम दें, क्योंकि वह हरिकथा की तरह अनंता है और आपके सामने मैं अपने अभावों का रोना रोने नहीं बैठा हूं। मैं तो…

या पता नहीं…

अच्छा, छोडि़ए! मैं क्या करने बैठा हूं, यह ख़ासा बहसतलब हो सकता है, पर फि़लहाल मैं जो कर रहा था, वह चर्चा थी जीतेंद्र की हंसी और कि़स्साग़ोई की। तो उसके कि़स्सों का जादू ही था जो हमें उसके आसपास मंडराने के लिए मजबूर करता था, वर्ना उसकी शैतानी हंसी का निशाना हम सब कभी-न-कभी बन चुके थे। और जब भी कोई उसका निशाना बनता, अविलंब यह क़सम खाता कि इस साले से अब कोई दोस्ती-यारी नहीं रखनी है… लेकिन बमुष्किल चैबीस घंटे बाद वह जितुआ के आसपास मंडराता पाया जाता।

ऐसे ही एक दिन, जब शैतानी हंसी का शिकार बनने के बाद खायी गयी क़सम का स्वाद मेरे मन की जिह्वा से उतरा भी न था, जित्तू ने रात के खाने के बाद और दोस्तों से अलग मुझे पकड़ा।

‘का रे चिकेन! गुस्सा हो?’ कहते हुए उसने मेरे कंधे के पास की गोलाई को बड़े मानीख़ेज़ अंदाज़ में दबाया। यह उसका प्यार जताने का ख़ास तरीक़ा था। उसके ‘चिकेन’ में चिकना होने और सुस्वादु खाद्य पदार्थ होने का अर्थ मिला हुआ था और यह संबोधन उसने ख़ास मेरे लिए सुरक्षित कर रखा था। यह शब्द मुझे सचेत रूप से कभी आपत्तिजनक नहीं लगा, पर शायद मेरे मन में इसने अनजाने ही कोई गांठ डाल दी थी जिसका कहीं-न-कहीं मेरी मोटी मूंछों के साथ संबंध है जिन्हें मैंने उन्हीं दिनों तराशना बंद कर फलने-फूलने के लिए छोड़ दिया था।

बहरहाल, कंधे की गोलाई को उसकी हथेली की पकड़ से आज़ाद कराते हुए मैंने उसे ‘बड़गाहीभाई’ की पदवी से नवाज़ा और कहा कि बताये, बात क्या है। वह पहले तो हिनहिनाती हंसी हंसता रहा, फिर मेरे और पास आकर धीमे से, लगभग बुदबुदाते हुए बोला, ‘आज केतनो गरिया लो भइवा, सब माफ है। हम त अंदर तक सिलाबोर (सराबोर) हैं… पूरा, जबर्दस्त!’

कह कर वह मुस्कुराती आंखें से इस बयान के असर को टटोलने लगा। उसे पता था कि वह गपास्टक का पहला टुकड़ा मेरी ओर उछाल चुका है और अब मेरा उपेक्षापूर्वक वहां से चलते बनना असंभव हो गया है।

असर तो सचमुच हुआ था, पर मैंने कोशिश की कि वह दिखे नहीं। बात को हल्के में लेने वाले अंदाज़ में कहा, ‘बेसी पेल मत। बताओ, का बात है?’

वह फिर हिनहिनाया, जैसे कहना चाहता हो कि लाख छुपाओ, छुप न सकेगा… वग़ैरा। फिर बोला, ‘आजकल धकाधक चल रहलउ हे, भइवा। रात दिन।’ कह कर उसने एक गंदा इशारा किया जिसका मतलब था कि रात-दिन चलने वाली चीज़, और कुछ नहीं, संभोग है।

सुन कर मैं चैंधिया गया होउंगा, क्योंकि वह मेरे चेहरे को देखते हुए, उस चेहरे की ओर तर्जनी से निशाना साधे हुए, इतनी ज़ोर से हिनहिनाया कि दूर खड़े सारे लड़के हमारी ओर देखने लगे। कुछ पलों बाद जब उसका हिनहिनाना रुका, तो हंसी के दबाव में उसकी आंखों से पानी बहने लगा था। ‘ओह, मजा आ गेलउ, भइवा,’ कहते हुए उसने मुझे कंधे से पकड़ा और जो लड़के इस हंसी के चलते समुत्सुक होकर हमारी ओर क़दम बढ़ा चुके थे, उनसे अलग ले चला।

अलग जाते हुए जो बात उसने लगभग फुसफुसाते हुए बतायी, वह इस प्रकार थी।

पिछली रात जब वह अपने मामू के साथ नाइट शो देख कर स्टेशन के पास के सिनेमा हाॅल से कैम्पस की ओर लौट रहा था, एक लड़की सड़क पर अकेली दिखी। मामा-भांजे ने सोचा, शायद पैसे पर चलने वाली है। थोड़ी ठिठोली करने की इच्छा हुई। टोका। लड़की बहुत घबरायी हुई थी। बात करने पर पता चला कि रात के दस बजे स्टेशन पर उतरी थी। सदर अस्पताल जाना है, जहां उसकी मां भर्ती है। पास में पैसे नहीं हैं और पैदल किस रास्ते जाये, उसे समझ नहीं आ रहा।… मामा-भांजे ने एक-दूसरे को देखा, आंखों ही आंखों में बातें हुईं। उपप्राचार्य, जिनकी कोठी के आउटहाउस में वे रहते थे, हफ़्ते भर के लिए सपरिवार बाहर गये हुए थे। इससे अच्छा समय और क्या हो सकता था! तुरंत एक रिक्षा रुकवाया। लड़की से कहा कि वे जहां रहते हैं, वह जगह अस्पताल के पास ही है, साथ आ जाये। लड़की उनके साथ रिक्षे पर बैठ गयी। मामा-भांजा उसे लिये हुए अपने कमरे पर आ गये। कॉलेज के विशाल परिसर में घुसने के बाद से लड़की यही समझती रही कि अस्पताल आ गया है। कमरे में लाने के बाद लड़की को धमका कर दोनों ने अपनी प्यास बुझायी। साथ में एक काम और किया। प्यास बुझाते समय उसके जो कपड़े उतारे थे, उन्हें एक बक्से में बंद कर ताला लगा दिया। लड़की अब बिल्कुल नंगी थी, इसलिए उसके भाग खड़े होने का सवाल ही नहीं था। तब से लगभग चैबीस घंटे गुज़र चुके थे। लड़की इस बीच सोई नहीं थी। उनके बिस्तर के एक कोने में घुटने मोड़े, अपनी देह से ही देह को ढंके बैठी थी, गठरी की तरह। मामू ने सुबह काम पर जाने से पहले इस गठरी को खोला था और उसके बाद से भांजा तीन बार खोल चुका था। हर बार वह लाचार-सी खुल जाती और गिड़गिड़ाती कि उसे एक बार अस्पताल पहुंचा दिया जाए, वह रात को फिर आ जाएगी। हर बार जितुआ उसे आष्वस्त करता कि एक दिन अच्छे-से भोग लेने दे, अगले दिन पहंुचा दिया जाएगा।

सच कहूं तो अब बिल्कुल याद नहीं कि इस बात को सुन कर मुझे कैसा लगा था। अंदर कहीं गुस्से का ज्वार उठा हो और मैंने जितुआ के मुंह पर थूक दिया हो, या दूर-दूर से हमें बातें करते देख रहे दोस्तों को बुला कर जितुआ की हैवानियत के लिए उसे सार्वजनिक रूप से ज़लील किया हो, या चुप रह कर मन-ही-मन संकल्प किया हो कि कल पुलिस को सूचना देकर उसके कमरे पर छापा डलवा दूंगा, या चेहरे पर याचक भाव लाकर उससे कहा हो कि हमरो दिलबा दे न, यार–ऐसा कुछ नहीं हुआ था। शायद जितुआ की हैवानियत के प्रति एक गहरी वितृश्णा और निर्वस्त्र स्त्री-देह की दुर्निवार रूप से सम्मोहक कल्पना के बीच मैं ठिठक गया था। शायद ये सी-साॅ के दो बाज़ुओं की तरह थीं, जिनकी बीच वाली टेक के दोनों ओर अपने पैर जमाये मैं सीधा खड़े रहने की कोशिश कर रहा था। इतना याद है कि छूटते ही कोई प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ क्षण ठहर कर मैंने कहा था, ‘साला, एकदम्मे जंगली है का रे? भाक्!’ और अपने कमरे की ओर चल पड़ा था। पीछे से हंसी के फ़व्वारे के साथ झरते उसके ये शब्द सुनाई पड़े थे, ‘जंगलवा में ई सब कहां मिलता है, भइवा!’

कमरे में लौट कर मैं अपनी मेज़-कुर्सी ठीक से जमा ही रहा था कि वह पीछे से फिर आ पहुंचा। ‘जंगली बनना है, शिशिर?’ इस बार उसका अंदाज़ गंभीर था, ‘सोच ले, भइवा! एक नंबर समान है। बाद में मत बोलना कि साला दोस्त काम नहीं आया। हम त अपना भर कोसिस करते ही हैं कि तू लोग को दुनिया का सब स्वाद चखवा दें।’

बेशक! अभी दो दिन पहले ही उसने हमें सामूहिक रूप से एक स्वाद चखवाया था। ब्लू-फि़ल्म का। उपप्राचार्य उसी दिन सपरिवार बाहर गये थे। उनके निकलते ही जितुआ ने ‘चंदा’ करके रात को अपने कमरे पर ब्लू-फि़ल्म का प्रोग्राम रखा (इससे पहले तक ‘चंदा’ हमारे लिए सरस्वती पूजा से जुड़ी शब्दावली का हिस्सा था)। डेढ़ सौ रुपये में टी.वी. सेट, वी.सी.पी. और कैसेट्स–रात भर के लिए। हम लपक कर और ललक कर इस आयोजन में शरीक हुए थे, एक अभूतपूर्व स्वाद की उम्मीद में खुदबुदाते। जित्तू के कमरे की ओर जाते हुए रास्ते में एक तज़ुर्बेकार साथी ने बताया था कि बेट्टा, जब सीन देखोगे न, त अइसा सांस फुलने लगेगा जइसे आॅक्सीजन कम पड़ गया हो। फस्ट टाइम वाला सब लोग का यही हाल होता है।

और सचमुच, हमारा यही हाल हुआ था।

लेकिन यह मेरे लिए थोड़ा परेशान करने वाली बात थी कि जित्तू ने जब जंगली बनने का न्यौता दिया, तब भी एकाएक मैंने उसी तरह सांसों का फूलना महसूस किया। फेफड़ों में एकाएक जैसे कुछ ज़्यादा जगह बन आयी थी और हवा जाने का रास्ता नाकाफ़ी लगने लगा था। एक मिनट तक मैं उसकी ओर पीठ किये अपनी मेज़ पर किताबें जमाता रहा, फिर एक शब्द में मैंने जवाब दिया, ‘कल।’ मेरी इस असहमत-सी सहमति पर वह फिर हिनहिनाया और कुछ ‘घाघ’ या ‘घुन्ना’ या ‘घोंघा’ जैसा कमेंट मारते हुए रुख़्सत हो गया।

‘हां रे साला, घाघ तो हम हैं,’ मैंने सोचा, ‘कल पता लगेगा। ई जान रहा है कि हम स्वाद के चक्कर में आ रहे हैं? जब लड़की को आजाद करा देंगे, तब समझ में आएगा, केतना घाघ हैं।’ मैंने ख़ुद को विष्वास दिलाया कि कमरे पर चलने का न्यौता पाकर मेरी सांसों का फूल आना, दरअसल, एक मज़लूम को आज़ाद कराने के दुस्साहसिक विचार से उपजे भय और रोमांच का नतीजा था।

वह एक बेचैन रात थी। जितुआ की हैवानियत के बारे में सोच-सोच कर मैं सो नहीं पा रहा था। साले ने पिछले चैबीस घंटे से किसी को क़ैद कर रखा है और वह भी इस हालत में! कल रात से वह अपने लाचार जिस्म पर सात-आठ दफ़े इन दरिंदों की ठोकरें झेल चुकी है।…और यह सिलसिला ऐन उस घड़ी शुरू हुआ है जब वह ऊपर वाले का शुक्र मना रही थी कि उसने आखि़रकार अपने दूत भेज कर उसे मां के पास पहुंचवा ही दिया। कॉलेज के विशाल परिसर में पेड़ों की क़तारों के बीच से गुज़रते हुए और दूर-दूर गलियारों और छात्रावासों के कमरों में जलती लाइटों को देखते हुए उसे तसल्ली हुई होगी कि इतने शांत और शानदार अस्पताल में मौत उसकी मां के आस-पास भी फटकने का साहस नहीं करेगी। शहर का सारा इंतज़ाम कितना ‘निम्मन’ है और लोग कितने ‘सुपातर’, उसने सोचा होगा। और इसके तुरंत बाद वह जैसे पहाड़ की चोटी से अंधेरे खड्ड में गिरी होगी। फिर मन और देह की भयावह पीड़ा से कराहती एक गठरी बन कर बिस्तर के कोने में धंस गयी होगी।

यह सब कुछ मैं शायद इन्हीं शब्दों में नहीं सोच रहा था, पर इतना तो याद है कि शब्दों में ही सोच रहा था। ध्यान जब भी भटक कर किसी और दिशा में जाता, मैं शब्दों और सुचिंतित वाक्यों से हांक कर उसे ग़ुस्से और हमदर्दी की उसी राह पर ले आता। अंततः मैंने तय किया कि कल कंचन’दी के घर से–वह उसी शहर में रहने वाली मेरी मौसेरी बहन थीं–एक जोड़ी कपड़े लेकर आना है, ताकि जितुआ के कमरे पर जाते ही उस लड़की को कपड़े दूं और उसके सदर अस्पताल जाने का इंतज़ाम करूं।

अगले दिन क्लास ख़त्म होते ही मैं कंचन’दी के यहां गया। उन्हें बताया कि नाटक खेलने के लिए सलवार-कुर्ते की एक जोड़ी चाहिए। वे इस शर्त पर कपड़े देने को राज़ी हुईं कि मैं रात का खाना वहीं खाऊं। रात का खाना खाकर अपने झोले में एक सलवार सूट रखे मैं नौ बजे छात्रावास पहुंचा।

जितुआ गेट पर ही मिल गया। वह डिनर के बाद अपने कमरे की ओर जा रहा था। मुझे देखते ही बोला, ‘का भइवा, कहां गायब हो जाते हो? साला दिन भर खोज खोज के तबाह हो गये।’ फिर पास आकर फुसफुसाया, ‘अबहीं चलबे?’

‘चल।’ मैंने कहा और उसके साथ हो लिया।

पिछली बार फूलती हुई सांसों के बीच मैं सिर्फ़ ‘कल’ कह पाया था, इस बार सिर्फ़ ‘चल’। चलते हुए मैंने एक बार अच्छी तरह कंधे से लटके झोले को टटोला। यह अपनी सांसों के फूलने को झुठलाने की कोशिश रही होगी।

कोठी पर पहुंच कर मेरी चाल ख़ुद-ब-ख़ुद धीमी पड़ गयी। जितुआ को मैंने दो क़दम आगे निकल जाने दिया। वह पैंट की जेब में चाभी टटोलता कमरे के दरवाज़े की ओर बढ़ा… पर यह क्या! वहां तो कोई ताला था ही नहीं। हाथ लगाते ही दरवाज़ा खुल गया। ‘अरे! खुलल कैसे है यार? मामू आ गये का?’ कह कर उसने हड़बड़ी में लाइट जलायी।

लाइट ने बताया कि मामू तो नहीं ही आये हैं, लड़की भी नदारद है।

जितुआ सन्न! ‘अरे, कहां गेलउ भइवा?’ वह ऐसे तड़फड़ाने लगा जैसे बिर्हनी के छत्ते में हाथ पड़ गया हो। झटाझट उसने कमरे के सारे कोने-अंतरे तलाश लिये।

मैंने ग़ौर किया, तीन दिन पहले के मुक़ाबले कमरे की रंगत थोड़ी बदली हुई थी। सामान तो अपनी पुरानी जगह पर ही थे–दरवाज़े के ठीक सामने की दीवार के साथ एक स्टोव और दो-चार बर्तन, बांयीं तरफ़ एक चैड़ी-सी चैकी और उस पर बिछा तोशक, फ़ोल्डिंग मेज़ पर कूड़े के ढेर की तरह रखी किताबें, पास ही जस्ते का एक बड़ा-सा बक्सा–पर तोशक को छोड़ कपास का कोई नामोनिशान नहीं था। बिस्तर पर चादर तक न थी और कमरे में आर-पार बंधी रस्सी, जिस पर ढेरों कपड़े टंगे होते थे, ख़ाली पड़ी थी। शायद मामा-भांजे ने सारा कुछ, एहतियातन, बक्से में बंद कर दिया था। उस बक्से पर अभी ताला लटक रहा था।

इन सारे सामानों के बीच वह ‘समान’ कहीं नहीं था। दरवाज़े की आड़ में एक देह भर का जो छोटा-सा गुप्त ठिकाना था, वहां भी नहीं। जितुआ दौड़ कर ग़ुसलख़ाने में झांक आया। वह भी ख़ाली था।

‘ले लोट्टा। लगता है, कमरवा बंद करके जाना भूल गये थे।… लेकिन कपड़ा त सब ताला में बंद है। साली लंगटे भाग गई का?’ कहता हुआ वह बाहर की ओर दौड़ा और फाटक से निकल कर हड़बड़ाया हुआ दोनों तरफ़ देखने लगा, इस दुविधा में कि किधर जाए।

                मैं कमरे के बारामदे पर खड़ा रहा। मुझे संदेह होने लगा था कि कहीं सब कुछ इस साले की कि़स्साग़ोई तो नहीं है! सोचता होगा, ऐसा कोई कि़स्सा बनाने से इसकी मर्दानगी का रुआब जमेगा।… वाह, क्या मर्दानगी है!… अब ये हरामी फाटक के पास से अपने कंधे झुलाये हुए लौटेगा और कहेगा, ‘भाग गेलउ रंडिया। साइद चद्दर-उद्दर कुछ बाहर छूट गेलई होत। ओही लपेट-उपेट के भाग गेलउ।’

उसकी ऐक्टिंग की ओर से मुंह फेर लेने की ग़रज़ से, या शायद किसी अंतःप्रज्ञा के चलते, या शायद यों ही, मैं फाटक से ठीक उल्टी दिशा में देखने लगा जहां पेड़ों और झाड़-झंखाड़ से भरा कोठी का विशाल अहाता था। अहाते के छोर पर खेत की मेड़ से बस थोड़ी ही ऊंची दीवार और आगे गंगा की ढलान। चांदनी रात में यह पूरा विस्तार बहुत रहस्यमय लग रहा था, क्योंकि कोठी की सारी बत्तियां बुझी हुई थीं। सिर्फ़ एक बल्ब था, जितुआ के कमरे का, जो मेरी पीठ के ठीक पीछे था। पर चांदनी में सब कुछ साफ़-साफ़ नज़र आ रहा था, गाछ-वृक्षों की हरीतिमा को छोड़ कर। सांवलापन ओढ़े ये गाछ-वृक्ष ऐसे लग रहे थे जैसे त्रिआयामी परछाईंयों में बदल गये हों। हवा थमी हुई थी। बाउंडरी वाल के आगे तेज़ी से धुंधली पड़ती चांदनी गंगा के विस्तार पर जाकर लगभग लुप्त हो गयी थी। वहां अंधेरा पसरा था और पानी की सरसराहट में सुनायी पड़ता सन्नाटा भी।

आधे मिनट मैं इस रहस्यलोक के किनारे पर खड़ा उसकी चैहद्दियां टटोलने की कोशिश करता रहा। वे जितनी पास थीं, उतनी ही दूर भी।… या शायद वे कहीं थीं ही नहीं। उनके एक साथ पास और दूर होने की अतार्किकता का यही निदान था।

पर उस रहस्यलोक के भीतर कुछ और था जिसने एकाएक मेरा ध्यान खींच कर मुझे हतप्रभ कर दिया और अगले एक-डेढ़ मिनट में वह सब हो गया जिसे बताने के लिए मैं इतने ब्यौरे पार करता यहां तक पहुंचा हूं।

मैंने देखा, दूर किसी मोटे तने की आड़ से झांकती एक गोरी बांह और कमर के कटाव से नीचे का सफ़ेद झक्क अर्द्धचंद्र! वह अपने नंगे जिस्म को एक उम्रदराज़ पेड़ की आड़ में छिपाने की नाकाम कोशिश कर रही थी। जिस्म का जो क़तरा तने से बाहर निकला था, उससे टकरा कर चांदनी जैसे बिखर-बिखर जाती थी। पेड़ कुछ बेतरतीब और विरल झाडि़यों के पीछे था। इसलिए कमर से नीचे की अधगोलाई किसी ढीले-ढाले जाल में उलझी-सी दिख रही थी।

मैं सांसों को संभालता कुछ क्षण रहस्यलोक में छिपे इस सबसे गहरे, किंतु अंशतः अनावृत, रहस्य को देखता रहा। इस बीच उसने तने के पीछे से अपना आधा चेहरा बाहर निकाला और एक आंख से इसी दिशा में देखने लगी जिधर आउटहाउस था, फाटक था और मैं भी। मेरे पीछे बल्ब से रौशन कमरे का दरवाज़ा था, शायद इसीलिए वह समझ न पाई हो कि मैं उसे ही देख रहा हूं। समझ पाती तो तुरंत अपने को छुपा लेने का कोई और जतन करती।

उतनी देर में मैंने अपनी सांसों पर थोड़ा काबू पा लिया था और मुझे याद आ गया था कि मैं इसे देखने नहीं, कपड़े देने आया हूं। मैं बारामदे से उतर कर उस ओर बढ़ गया।

और यही सारी गड़बड़ी की शुरुआत थी। मुझे आगे आता देख वह एकाएक सचेत हुई और वहां से भाग कर पीछे एक केले के पेड़ की आड़ में खड़ी हो गयी। एक कौंध की तरह उसका पूरा नंगा जिस्म दृश्य से होकर गुज़रा। किसी ग्लानि या घबराहट या महज़ एक अपरिचित-सी झेंप के चलते मेरे पैर बारामदे से चार क़दम आगे ही ठिठक गये और मैं कठपुलती की तरह पीछे मुड़ गया, जैसे यह साबित करना हो कि मैंने कुछ नहीं देखा। जितुआ उस समय फाटक के बाहर दाहिनी तरफ़ से लौट कर बाईं तरफ़ जा रहा था। उस पर नज़र पड़ते ही मैं वापस झुरमुट की ओर मुड़ गया।

भाग कर केले की आड़ में उसका जाना, बेशक, ख़ुद को बचाने की कोशिश में एक बेमतलब-सा क़दम था, पर कोई उपाय न देख कर वह लुका-छिपी के खेल में ही बचाव और प्रतिरोध का छद्म संतोश ढूंढ़ रही होगी। यह भी हो सकता है कि केले के नाटे क़द और नीचे को लटके हुए दुकूल-नुमा पत्तों से उसे कुछ ज़्यादा ही उम्मीद रही हो। वहां जाकर शायद उसे महसूस हुआ कि उसकी उम्मीद कितनी ग़लत थी; वह जितना छुप रही थी, उससे ज़्यादा दिख रही थी। मुझे अपनी ओर देखता देख वह स्तनों पर अपने हाथ बांधे पीछे खिसकने लगी। अब वह आड़ से बिल्कुल बाहर थी, पीछे को जाती हुई। उसके बाल बंधे थे। चेहरे से लेकर गर्दन तक का रंग गेहुंआं रहा होगा, तभी वह बहुत साफ़ नज़र नहीं रहा था, पर पूरी देह चांदनी में चमक रही थी।… दो-चार क़दम पीछे जाने के बाद ज़मीन पर गिरी हुई एक सूखी डाल से उसके पैर उलझे। जैसे आत्मरक्षा की कोई युक्ति अचानक सूझ गयी हो, उसने वह मोटी-सी डाल हाथों में उठा ली और उसे ध्यान नहीं रहा… या रहा भी हो… कि ऐसा करने से उसके स्तन पूरी तरह बेबाक हो गये हैं–डुबकी मार कर ऊपर को उठते गोताखोरों की तरह दो भारावनत स्तन…

बचपन के भूगर्भ की किन्हीं परतों में दबा परितृप्त स्पर्ष का एक अहसास मेरी हथेलियों, गालों और होंठों पर बिछलता चला गया।

क्या इसे ही जादुई यथार्थ कहते हैं?

मैं मंत्रविद्ध-सा जड़ हो गया। फिर से यह बात सांसों की धौंकनी में कहीं खो गयी कि मेरे कंधे पर लटकते झोेले में एक जोड़ी कपड़े इसी जादू और रहस्य को ढंकने के लिए हैं। शायद चांदनी का नीम अंधेरा न होता और उसकी देह की चमक ही नहीं, आंखों के डर को भी मैं देख पाता तो यह भूल न होती।… या कौन जाने, यह सिर्फ़ एक लाचारी भरी सफ़ाई हो! कैसे कह सकता हूं कि दिन के उजाले में भी उन आंखों को मैं देख ही पाता! क्या इस वक़्त मैं उसकी देह के अलावा और कुछ भी देख पा रहा था? उमस भरी रात में निस्तब्ध खड़े पेड़, अहाते की ठिगनी चारदीवारी, उसके पार धुंधली पड़ती हुई अंधेरे में गुम जाने वाली ढलान, गंगा के प्रवाह पर कहीं-कहीं रोशनी के कांपते प्रतिबिंब–ये सब मेरी निगाह के दायरे में रह कर भी अदृश्य थे। दृश्य सिर्फ़ एक जिस्म था।

पर यह सब, कुछ गिने-चुने लम्हों की ही बात थी। जब पीछे की ओर चलते हुए अहाते की छोटी-सी दीवार से उसके पैर अटके तो मुझे जैसे होश आया। मैं अपने ठिठके हुए क़दमों को झटक कर आगे लपका और चिल्लाया, ‘अरे, रुको! हम ई कपड़ा…।’ वाक्य बीच में ही छूट गया, क्योंकि मेरे लपकने और चिल्लाने को एक निर्णायक हमला मान कर उसने हाथ में पकड़ी हुई डाल मुझ पर फेंक कर मारी। वह सीधा मेरे चेहरे पर लगी होती अगर हाथों पर रोकते और नीचे झुकते हुए मैं ज़मीन पर न आ गिरा होता। उधर लड़की, शायद जवाबी हमला कर चुकने के बाद की घबराहट में, या मेरी आवाज़ सुन कर पीछे से दौड़े आते हुए जितुआ को देख कर, तेज़ी से पीछे मुड़ी और दो-ढाई फिट ऊंची उस दीवार पर खड़ी हो गयी जिसके बाद गंगा की ढलान शुरू होती थी।

तुरंत उस पार कूद जाने के बजाय वह अगले कुछ सेकेंड वहीं खड़ी रही। शायद पसोपेश में थी कि दूसरी तरफ़ का संसार न जाने कैसा हो। पर यह पसोपेश, निस्संदेह, उसे बेमानी लगा होगा, क्योंकि दुःस्वप्न जैसे इन दो दिनों से ज़्यादा बुरे दिनों की कल्पना भी नामुमकिन थी।

या शायद उन क्षणों में उसकी निगाह दाहिनी ओर के घाट पर, छात्रावास का डिनर निपटाने के बाद तफ़री करते दो-तीन युवकों की ओर चली गयी हो और एक बार को उसने सोचा हो कि उनसे कोई मदद मिल सकती है या नहीं। पर वे उसे, निस्संदेह, एक नग्न स्त्री-देह की मौजूदगी से अनजान, इसीलिए फि़लहाल निश्क्रिय, दरिंदों की तरह नज़र आये होंगे।

या शायद उन क्षणों में उसने सामने, सीधी ढलान के छोर पर, क्रमशः विरल होते दूधिया घोल-जैसी चांदनी में ऊंघती गंगा मैया को एक बार आंख भर कर देखा हो और यह जानते हुए भी, कि इस बात का कोई मतलब नहीं है, ‘रच्छा’ की ‘बिनती’ की हो।

जो भी हो, उठ कर खड़े होते-होते उन क्षणों में मैंने जो देखा, वह मेरी सांसों और शब्दों पर बहुत भारी पड़ रहा था। उसकी पीठ मेरी तरफ़ थी और दीवार के ऊपर जहां वह खड़ी थी, नीम उजाला उसकी देह के आकार में धवल प्रकाश बन गया था।… उघड़ी हुई पीठ से लेकर कमर के कटाव से नीचे के उन्नतोदर विस्तार तक, लगभग स्तब्ध-अवाक् कर देने वाले सौंदर्य का यह भीषण सामना था।… मैंने उखड़ती हुई सांसों के बीच झोले में रखे कपड़े बाहर निकाल लिये और उन्हें हाथों में थामे एक पूरा वाक्य कह डालने की कोशिश की, लेकिन हकलाहट में कुछ बेमेल शब्द ही निकल पाये।…

या शायद वह भी नहीं… बस, कुछ निरर्थक ध्वनियां।

ऐन जिस वक़्त पीछे से भाग कर आता जितुआ मेरे पास तक पहुंचा, लड़की दूसरी तरफ़ कूद गयी और तीर की तरह दौड़ती हुई, मेरी दुःकल्पना की हदों से भी आगे, ढलान पार कर गंगा में समा गयी। शांत लहरों में एक तेज़ हड़कंप हुआ, जैसे दो-तीन बड़े पत्थर एक के बाद एक फेंके गये हों। पर इतना ही। लहरें फिर शांत हो गयीं। दाहिनी ओर के घाट पर बैठे युवक चैंक कर खड़े हो गये और कौतुक से उधर देखने लगे। उन्हें अपनी बांयीं आंख के कोने से जो कुछ दिखा होगा, वह एक पहेली की तरह लग रहा होगा, जिसे वे समझने की कोशिश कर रहे थे।

मैं अब तक दौड़ कर अहाते की दीवार के पास आ गया था। तभी पीछे से जितुआ ने कॉलर पकड़ कर मुझे पेड़ों की आड़ में खींच लिया।

‘भोंसड़ीवाले, सबके नजर में आने का सौख है का?’ वह ग़ुस्से में था।

‘अउ ई का है?’ मेरे हाथ से कंचन’दी का सलवार-सूट खींचते हुए उसने पूछा।

बात समझते उसे देर नहीं लगी।

‘भोंसड़ी के, हम विलेन बनके माल को लें और तू हीरो बनके? एही सोचे थे?… साला, घोंघा!’

शायद मुझे दुबारा कहना चाहिए–बात समझते उसे देर नहीं लगी।

कपड़े मेरे मुंह पर मारते हुए वह अपने कमरे की ओर बढ़ गया। जाते-जाते कहता गया कि तुरंत दफ़ा हो जाऊं, क्योंकि नीचे जिन लड़कों को कुछ गड़बड़ का अंदेशा हुआ है, वे आते ही होंगे।

घाट की ओर से पहेली को हल करने की हलचल लगातार कानों तक आ रही थी। अलबत्ता पानी की हलचल शांत हो गयी थी। गंगा की छाती पर कोई शोर नहीं था।…

क्या उसने इस डर से हाथ-पैर भी नहीं मारे कि कहीं कोई बचाने न आ जाये और कहीं उसकी निर्वस्त्र देह उसके चैतन्य रहते बाहर न निकाल ली जाये?…या क्या पानी की चादर ओढ़ कर उसे इतना सुकून मिला कि पिछले अड़तालीस घंटों से जगी हुई आंखें गहरी नींद में मुंद गयीं?…

भगवान जाने, उसे तैरना आता भी था या नहीं?…

मैं काठ बना कुछ देर पेड़ों के झुरमुट से गंगा को देखता रहा…

पर मेरे पास ज़्यादा समय नहीं था। मुझे दूसरे रास्ते से भाग कर घाट पर खड़े लड़कों में शामिल होना था ताकि इस घटना का कोई सूत्र मुझ तक पहुंचता न लगे।

तेज-तेज़ चलते हुए मैंने सलवार-कुर्ते की जोड़ी को अंदर डाला… और शायद ख़ुद को भी… साला, घोंघा!

संजीव कुमार

संजीव कुमार

संजीव कुमार। युवा आलोचक और कहानीकार। ‘जैनेन्द्र और अज्ञेयः सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ पुस्तक के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान। दिल्ली विश्विद्यालय के देशबंधु कॉलेज में  प्राध्यापक। इनसे sanjusanjeev67@gmail.com पर संपर्क सम्भव है।

कहानी ‘बनास’ से साभार प्रस्तुत है। 

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5 thoughts on “घोंघा: संजीव कुमार (कहानी बहस के लिए)

  1. “कहानी को भीषण त्रासदी को हटाकर गप्प ” , “क्लासिक परंपरा को हटा कर एक अमानवीय वृतान्त ” , “यौन भावनाओं को उत्प्रेरित” , “चुहलबाजी “??????…क्या आपलोगों ने अमरकांत की कहानियां नहीं पढ़ीं ? इस कहानी में बिम्ब को पकडे बिना , उस सपने, घोंघा , उन्नतोदर , नदी जैसे शब्दों से उलझे बिना जल्दबाजी में की गई ये टिप्पणिया हैं …. कहानी के अंत में जो त्रासदी है क्या वो बहुत यथार्थपरक और बेचैन कर देने वाला नहीं है …अंतिम वाक्य में ” साला … घोंघा ” चुहल है ?

  2. एक रौ में पढ़ गया और पढ़ने के बाद लगा कि कहानी की शुरुआत में जो परिचय दिया है वो तर्कसंगत नहीं है. सबसे अच्छी बात लगी कि कहानी का मुख्य चरित्र या कहें तो स्वयं आपने अपने को इस रुप में रखा है कि पाठक की बारीकी आपके प्रति कहीं से भी श्रद्धाभाव नहीं जुड़ेंगे और जितुआ से बहुत अलग करार नहीं देंगे क्योंकि जितुआ और इस मुख्य चरित्र की आदिमवृत्ति के स्तर पर कोई फर्क नहीं है. फर्क है तो सिर्फ उसके थोड़ा फाइन हो जाने के और इस फाइन हो जाने में बुद्धिजीवी होने की प्रक्रिया का कच्चापन लिए एक ऐसा व्यक्तित्व है जिसके परिपक्व होने की स्थिति में भी कहानी की दिशा या वो लड़की उसी धार में समाहित होती, कहना मुश्किल है..

    स्कूल और कॉलेज के दिनों में ऐसे हमने कई चरित्र देखें हैं,खासकर बाकी की अपेक्षा अधिक-पढ़ने लिखनेवाले जो सेक्स,ब्लू फिल्म,लाइनबाजी वो सब करना चाहते हैं लेकिन पढ़ने में बेहतर होना उसके भीतर इतनी सारी सामाजिक नैतिकता के निर्वहन का दवाब पैदा कर देते हैं कि वो जितुआ नहीं हो सकता,वो घोंघा और चुप्पा बनकर ही उससे गुजरेगा.

    ये कहानी मध्यवर्ग के बीच से पैदा होनेवाले बुद्धिजीवी की कच्ची फसल का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें एक गुंजाईश ये भी है कि इससे गुजरकर पाठक अंदाजा लगा सकें कि उसका परिपक्व रुप क्या होगा ? बाकी मानवीयता या सरोकार के कई रंग हो सकते हैं. मसलन जितुआ मुख्यचरित्र की जगह दूसरे किसी ऐसे लड़के को भोग लेने की नियत से ले जाता तो हो सकता है वो मुख्यचरित्र की तरह उसकी क्रिस्टल ब्यूटी( नग्न सौन्दर्य कहना सही नहीं होगा), उसकी बेचैनी और विवशता के बीच अपनी दमित इच्छा के बीच आंखमिचौनी खेलने के बजाय खुलकर बचाव में आता. तब लड़की के कूदने के बजाय जितुआ के शरीर का चार टुकड़ा उस गंगाजी में तैर रहे होते और उस तथाकथित चरित्रहीन, हॉस्टल में बदनाम उस पात्र का विरेचन हो जाता.आखिर समाज में व्यक्तित्व का एक रेशा ऐसा भी तो रहा है न कि वो चाहे जितना भी बड़ा बदमाश,गुंडा,मवाली रहा हो लेकिन स्त्री की इज्जत को लेकर वही राय रखता है जैसा कि कहानी के मुख्य चरित्र में दिखाई दिया. लेकिन हां, इससे कहानी फिर निर्धारित सत्य की तरफ बढ़कर कमजोरी हो जाती और यर्थाथ की पकड़ से ढीली होकर काफी लिजलिजी भी. https://tirchhispelling.wordpress.com/2013/06/06/घोंघा-संजीव-कुमार-कहानी-ब/

  3. Rakesh BIhari on said:

    यह कहानी हमारे भीतर कई स्तरों पर घटित होती है. इसकी पहली परत जहां हमें नॉस्टैल्जिक करती है, गुदगुदाती है, वहीं जब हम इसके शुरुआती आवरण को हटाकर कथानक की घटनाओं और पात्रों के व्यवहारों के भीतर धंसते हैं, आरंभ में गुदुगुदानेवाली यह कहानी कहीं हमें विचलित करती है तो कहीं स्तब्ध. तथाकथित सहशिक्षावाले कॉलेज में लड़कों और लड़कियों की अलग-अलग जमात के दृश्य सिर्फ कथानक को आगे बढ़ाने के साजो-सामान नहीं हैं, बल्कि हमारे समाज के लैंगिक आचार-व्यवहार के बहाने एक बड़े सामाजिक विमर्श की तरफ भी इशारा करते हैं.
    कहानी का नैरेटर- मैं, जीतेन्द्र उर्फ जितुआ और लड़की कहानी को त्रिकोणीय विस्तार तो देते हैं, लेकिन कहानी के मूल में मैं का चरित्र है- आदर्श की छौंक और लंपट लालसाओं के मिश्रित रसायन से बना एक ऐसा संतवेषधारी लंपट जो जितना बाहर से दिखता या दिखाता है उससे ज्यादा कहीं अपने भीतर छुपा कर रखता है. ‘मैं’ के व्यक्तिव की यही जटिलता इस कहानी का मर्म है जिसे समझने का सबसे कारगर सूत्र जितुआ के कथन में ही छिपा है – ‘भोंसड़ी के, हम विलेन बन के माल को लें और तू हीरो बनके? एही सोचे थे? साला, घोंघा!’
    एक तरफ मनुष्यता का ढोंग और दूसरी तरफ हिस्सेदारी की लालसा और तिसपर परिस्थिति की प्रतिकूलताओं को देखते ही अपनी खोल में दुबक जाने का ‘घोंघोचित’ व्यवहार… ‘मैं’ के बहाने टीपिकल मध्यवर्गीय मानसिकता के कई-कई पहलुओं को बारीकी से रेखांकित कर जाती है यह कहानी. कहानी और प्रभावशाली हो सकती थी यदि ‘मैं’ के आदर्श और उसकी लोलुपता के अन्तर्द्वन्द्व को कुछ और कलात्मक सघनता से उकेरा गया होता… बलात्कर की शिकार लड़की का गंगा में कूदकर प्राण दे देना भी खटकता है. आखिर बलात्कार को कब तक हम स्त्री-जीवन के अंत के रूप में देखते रहेंगे? काश! उस लड़की का गंगा में कूदना उन दरिंदों से बचकर निकलने के लिये होता न कि अनावृत्त कर दी गई देह को छुपाने और जीवन से भागने के लिये… भविष्य के लिये खुद को बचाये रखने का उपक्रम करती वह लड़की मृत्यु को प्राप्त भी हो जाती तो शायद यह मलाल न होता! दरसल यह स्त्री के प्रति सहनुभूति रखकर सोचनेवाली पुरुष दृष्टि की सीमा है जो स्त्री अस्मिता के पक्ष में खड़ा तो होना चाहती है लेकिन परंपरा और अतीत से अर्जित समझ और संहिताओं का अतिक्रमण उसके लिये बहुत मुश्किल होता है…वरना यकीन मानिये यदि आज की कोई स्त्री कथाकार इस कहानी को लिखती तो यह लड़की इस आसानी से गंगा में कूदकर जान न दे देती. लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि कथाकार इस कहानी में स्त्री देह के अनावरण का उत्सव मनाना चाहता है… स्त्री-देह को उघाड़ने के बेतुके तर्क की आड़ में इस कहानी की आलोचना करनेवाले लोग काश यह समझ पाते कि स्त्री देह को ढंक कर रखने के आग्रहियों ने स्त्री तन-मन पर कहीं ज्यादा अत्याचार किये हैं…

  4. कहानी में घोंघे से बचता हुआ आदमी दरअसल आज का आदमी है , मध्यवर्ग- फ़र्ग भांड में जाये … मामला यौन कुंठा तक सीमित हो जाये तो कहानी की हत्या हो जाएगी … मै इस कहानी को क्लासिक कहने नहीं जा रहा हूँ … निःसंदेह बेजोड़ कहानी कहूँगा … मन पर नैतिकता का मुलम्मा अगर ईमानदारी से उतारकर इस कहनी पर सोचे तो बहुत कुछ स्पष्ट हो जायेगा . कहानी के टूल्स पर बात करें तो इसकी जान इसकी सघन भावात्मक अभिव्यक्ति और बेजोड़ भाषा है . अंतिम बात , कहानी के अंतिम पन्ने तक अंदाजा नहीं लगता की क्या होने जा रहा है ? जिसे पूर्वनिर्धारित कहा गया है उससे मै बिलकुल सहमत नहीं , लेखक तो यहाँ तक कि एक जगह संदेह पैदा कर देता है कि जितुआ जो बात कह रहा है वो कहीं झूठ न हो जाये .यह एक ऐसे विश्यविद्यालय के परिसर को इशारा करती कथा है जहाँ कुछ भी असंभव नहीं …

  5. जबसे कहानी ‘घोंघा’ पढ़ी तब से सन्न हूँ। सुन्न भी कह सकते हैं, पर अब थोड़ा थोड़ा अपने में हूँ। तब तो एक बारगी जैसे उस अवस्था में पहुँच गया के काटो तो खून नहीं। अंदर खून बह भी क्यो रहा है, सोचने लगा। उसकी जकड़ इतनी मज़बूत जान पड़ी कि लिखने को जानबूझ कर टालता रहा, ऐसा नहीं है। ऐसा खूबसूरत बहाना बना सकता तो ठीक रहता। कुछ सोचने से जादा उसके अंदर खुद को महसूस करने लगा। अब थोड़ा बराय दूरी उसे देखने ही आया हूँ। अभी भी कुछ खास नहीं है। बस बैठ गया हूँ। देखते हैं कहाँ तक पहुँचते हैं।

    गठरी। थोड़ा भदेस सा है। थोड़ा बेतरतीब भी। पर इसे कहूँ क्या? रूपक-बिंब-प्रतीक या कुछ और। शायद मेरी भाषा में इसे इनमे से कुछ न कहने का आग्रह तो है, पर शब्द नहीं। यह पूरी-पूरी मेरी कमजोरी है। जिसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ मुझ पर आती है और शायद यही उस कहानी की सबसे बड़ी जीत। वैसे यह कोई हार जीत वाल खेल नहीं है। पर अभी कहा न, थोड़ा कमज़ोर हूँ। उदय प्रकाश ‘मोहनदास’ में कई-कई मर्तबा कह चुके हैं कि हम कैसे समय में जी रहे हैं। पता नहीं वहाँ यह भी लिखा है के नहीं कि यह समय सिर्फ़ ‘हम पुरुषों का, पुरुषों के लिए सदैव’ रह गया है।

    इधर बढ़ने से पहले मैं बात शुरू कर रहा था ‘गठरी’ की। मम्मी की कोई पुरानी साड़ी होती है जो गुदड़ी बनने से पहले गठरी बन जाती है। उसमे कपड़ों, गैर ज़रूरी चीजों को समेट उसे गद्दों के कोने में छिपा देते। कि अगले मौसम में निकालेंगे। या तब जब उसकी ज़रूरत पड़े तब। उसे बांधने उसे खोलने का तरीका अगर किसी स्त्री पर आरोपित कर दिया जाए तब क्या होगा। ऐसा क्या है जिसे उसने उन गांठों में समेट लिया है। उसके बाजू वह गाँठ हैं। सबसे मजबूत गाँठ।

    पता नहीं लिखते हुए कैसा-कैसा सा होता जा रहा हूँ। खुद इसको लिख लेना उस गठरी बन गयी स्त्री के अंदर उठते सवालों की तरह आस पास घूम रहे हैं। शायद क्योंकि मैं खुद एक लड़के के रूप में इस समाज में बड़ा किया गया हूँ इसलिए भी उन अंदर तक धँस गए नुकीले सवालों की जद से काफी दूर हूँ। कितना आसान है न समाजशास्त्र की आँड़ में छिप जाना। कि हम नहीं चाहते किसी जितुआ और उसके मामा की तरह हो जाना। हम उसे सदर अस्पताल ही पहुँचाते। अपने साथ कमरे पर नहीं लाते। ले भी आते तो उसे गठरी न बनाते और न उस गठरी बन गयी नंगी देह को बराबर मामा भांजे की तरह खोलते बंद करते।

    यह जो जीतू हो जाना है यह बराबर उस देह के प्रति निर्मम हो जाना है, अमानवीय होते जाना है। ‘घोंघे’ की रूपक कथा लगता है, यहाँ चुक जाती है। क्योंकि मन नहीं मानता कि यह समाज घोंघो से बना है। यह तो रेत में मुँह बाए बगुले की तरह हो जाना है। यह कोई ऐसा मोर नहीं है कि जंगल में मोर नाचा और किसी ने न देखा हो। उसके नाच पर उसका कॉपीराइट भी नहीं रहा अब तो। कॉपी‘लेफ़्ट’ हो चुका है।

    इस अरण्य में आपका स्वागत है। यहाँ के नीति नियंता हम ही हैं। हम ही इसके स्थपति हैं। बस इस कहानी में उसका नाम जितेंद्र है। जितुआ है बड़ा शातिर। वह हर कमरे में अपनी हंसी और किस्सों के साथ कथित ईश्वर की सार्वभौमिकता को टक्कर देता मौजूद रहता है। जिसकी सैद्धांतकी वहाँ के लड़के उसकी किस्सागोई और उसमे समाये ‘काम’शास्त्र के बूते अपने पाये मज़बूत करते रहे हैं। जो लड़कियों से बात न करने से उपजी कुंठा है, उसमे स्त्री सिर्फ़ भोग्या के रूप में ही उनके सामने आती है।

    इसी रस्ते डेढ़ सौ रुपये जुटाकर टीवी सेट वीसीआर और कैसट का जुगाड़ किया गया था। साँस फूलने औक्सीजन कम पड़ने वाले दृश्यों को देख लेने के न्योतों के बाद कहानी उस हॉस्टल से बाहर एक रात मामा भाँजे के चंगुल में पड़ गयी घबराई सी लड़की पर आकार ठहरती है। लड़की रात दस बजे स्टेशन पर उतरी है और उसकी किस्मत में ‘जब वी मेट’ की करीना कपूर की तरह किसी शाहिद कपूर से मिलने वाली स्क्रिप्ट इस राईटर ने लिखी नही है। भटकते भटकते काफी देर हो जाने पर भी वह सदर अस्पताल नहीं पहुँच पायी है। रात इतनी हो चुकी है के नाइट शो भी ख़तम हो चुका है।

    पता है अभी भी सवालों से सीधे टकराने से बच रहा हूँ। शायद हिम्मत भी नहीं है। इसलिए पहले से ही आड़ लेकर चलता रहा। जितनी आसानी से लिख दिया कि सब इसी में छिपा हुआ है, क्या हम पुरुष उसे ऐसा ही नहीं रहने देना चाहते? अगर ऐसा न हो तब इस तरह की पुरुष ठेकेदारी खत्म नहीं हो जाएगी? मैं खुद कभी नहीं कहना चाहता कि उन मामा भांजे ने उस लड़की की क्या दशा कर दी।

    क्योंकि मुझे पता है जैसे ही कोई कहता है कि ‘हमारे’ ‘समाज’ में स्त्रियॉं की दशा ऐसी है/वैसी है। तभी इस वाक्य की पड़ताल शुरू कर देनी चाहिए कि यह ‘हमारा’ किन्हे उसके भीतर का मान उन्हे ‘अंदर’ समाहित कर रहा है। और किन्हे ‘बाहर’ का मान उसके अधिकारों की रक्षा उसके हितों के लिए लामबंद होना चाह रहा है। शर्तिया यह वही कह सकेगा जिसका वह समाज बनाया होगा। वही उसके ‘हमारा’ होने के सबसे जायदा दावे करेगा। उसकी गतिकी में उसकी निर्णायक भूमिका होगी। और किसी भी तरह से वह इसमे विचलन को स्वीकार नहीं करेगा।

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