फिल्मी दुनिया की सीख: इब्राहीम जलीस

By इब्राहीम जलीस

पाकिस्तान और भारत में जहां गरीबी और मुफ़लिसी, दुनिया के सारे देशों से कई गुना अधिक है, वहां साधारण आदमियों के लिए सब से अधिक सस्ते प्रकार का मनोरंजन, सिनेमा है। दिन-भर के कामकाज और मेहनत मशक्कत के बाद लोग-बाग जब थके हारे अपने घर वापस लौटते हैं तो घर में एक बीमार और कुरूप बीबी और रोनी सूरत के कुछ बच्चे उनकी दिन-भर की कोफ्त और थकान में और अधिक वृद्धि कर देते हैं। इसी वजह से आम लोग यह चाहते हैं कि वे अपनी बीमार और मरियल बीवी से दूर और मधुबाला के अधिक समीप रहें। ठंडे चूल्हे वाले घर के बजाय आरमदायक फर्नीचर वाले एअरकंडीशन्ड सिनेमाघर में अपना समय किल करें। यदि आप दोपहर से लेकर आधी रात तक पाकिस्तान और भारत के सिनेमाघर पर विहंगम दृष्टि डालें, तो आपको यह महसूस होगा कि सिनेमा घर किसी मुर्दा चूहे की लाश है जिस पर असंख्य चीटियां चिपटी हुई हैं।mughal-e-azam-800

    मैंने न केवल फिल्म बनाने वाले आदमियों-फिल्म निर्माताओं को बहुत समीप से देखा है अपितु फिल्म देखनेवालों का भी बड़ा गहरा मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया है और मुझे विश्वास है कि कई अवसरों पर फिल्म देखने वाले फिल्म बनाने वालों से अधिक दिलचस्प और आश्चर्यजनक सिद्ध हुए हैं। मैंने एक बार बड़ी गम्भीरता से विचार किया कि हमारे साधारण गरीब नागरिक सिनेमा के इतने ज्यादा शौकिन क्यों है? वे जब अपने छोटे वेतनों और सीमित आय में अपने दैनिक जीवन के खर्चे पूरे नहीं कर सकते, तो सिनेमा क्यों देखते हैं और सिनेमा देखना उनके लिए क्यों इतना आवश्यक है? क्या यह खेदपूर्ण नहीं है? इन प्रश्नों पर बड़ी देर तक विचार करने के पश्चात में इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि दिनभर कठोर परिश्रम करने के बाद आदमी आराम और मनोरंजन चाहता है। हमारे इन दोनों देशों में साधारण आदमियों के लिए न तो फ्री क्लब हैं और न मुफ्त खेलों के स्टेडियम हैं। ले-दे के पब्लिक गार्डन हैं जहां जाते हुए साधारण आदमी इसलिए डरते हैं कि पुलिस के सिपाही उन्हें जेबकतरे या औरतों का पीछा करने वाले बदमाश घोषित करके पकड़ लेते हैं! रही सड़कें, तो उन पर घूमना-फिरना इसलिए भी मुसीबत बन जाता है कि पुलिस उनका धारा 106 के अंतर्गत आवारगर्दी में चालान कर देती है। क्योंकि उनके कपड़े मैले होते हैं और शक्ल सूरत से वे साफ गरीब आदमी मालूम होते हैं और पुलिस की दृष्टि में हर गरीब आदमी आवारा होता है! अब रहा जाता है घर। घर भला क्या मनोरंजन-स्थल बन सकता है? जबकि घर में और काल कोठरी में यूं भी तनिक सा अन्तर होता है। घर में बीवी का बिस्तर एकमात्र मनोरंजक स्थल है किन्तु इसके भावी परिणाम बड़े भयंकर होते हैं अर्थात हर साल एक बच्चा!

फिर दूसरी बात यह है कि साधारण आदमियों की बीवियां अधिकतया सुन्दर नहीं होतीं। वे अधिकतया काली या सांवली, चेचक-ग्रस्त, गन्दी और कुरूप होती हैं। और इन औरतों की खातिर उन्हें हर महीने कम से कम पचास रूपयों से लेकर अधिकाधिक ढाई सौ रूपयो तक कमाने और उनके इलाज व रख-रखाव पर व्यय करने पड़ते हैं। इसके विपरीत हर रोज केवल नौ आने खर्च करके वह ढाई घन्टे तक हसीन से हसीन एक्ट्रेस को खरीद लेते हैं। कामिनी कौशल केवल नौ आने में अपना सारा सौन्दर्य और कान्ति उनकी सेवा में प्रस्तुत कर देती हैं। नर्गिस अपनी सारी प्रेम कहानी उन के हवाले कर देती है। निम्मी अपने संगीत से उन्हें आनन्दित कर देती है। गीतावाली और कुक्कू उन को प्रसन्न करने के लिए ठुमुक ठुमुक कर और थिरक थिरक कर पर्दे पर नाचती हैं। महमूद,  जानीवाकर उन्हें हँसा-हँसा कर अधमुआ कर देते हैं।

         यह सब केवल ढाई घन्टों के लिए होता है मगर होता है केवल नौ आने में!

    लेकिन दिन भर के सख्त कामकाज और कठोर परिश्रम के बाद ढाई घन्टे का यह हुस्न व इश्क, नाच-रंग और हंसी, दिल्लगी से भरपूर मनोरंजन, उनकी थकी हुई तबियतों और उदास मन को नये सिरे से तर-ओ-ताजा कर देता है। और वह अपने बीवी बच्चों के लिए तो नहीं, कम से कम गीताबाली की खातिर जिन्दा रहने के लिए आत्महत्या करने के उस विचार को त्याग देता है। जो सूदखोर पठान या खानदानी सेठ के कर्जे के लगातार तकादों से तंग आकर सुबह उनके मन में उत्पन्न हुआ था। सिनेमा घर से बाहर निकलते हुए वे मन ही मन में पठान और सेठ को दुत्कारते हैं-

    ‘इन साले की ऐसी की तैसी। आत्महत्या करके क्यों हराम मौत मरें। कर्जा कभी न कभी अदा कर ही देंगे। अगर इस जलील कर्जे की वजह से बेमौत मर गये तो कामिनी कौशल और नर्गिस का हुस्न वहां कहां नजर आएगा। निम्मी और गीतावाली के प्रभावशाली एवं कामोत्तेजक शरीर के मोड़-तोड़ वहां कहां हम देख सकेंगे। लता मंगेशकर किसके लिए नगमों का जादू जगाएगी और रीहाना किसके लिए थिरक-थिरककर नाचा करेगी?’

    हमारी जनता को नित्य कि मुसीबतों और दुखों से भरपूर जिन्दगी को सहारा देने में हमारी फिल्में बड़े आश्चर्यजनक कारनामे अंजाम देती है। मुझे याद है कि मेरा दोस्त रशीद खां ‘गमे-जानां और गमे-दौरां’ दोनो से तंग आकर एक दिन अपने जीवन को खत्म कर देने का पक्का इरादा कर चुका था, किन्तु जब मुझे इस का ज्ञान हुआ तो मैं उस का ‘गम गलत’ करने के लिए उसे एक फिल्म दिखाने को ले गया और उस फिल्म ने उस बेचारे की जान बचा ली। वह फिल्म संयोगवश उसकी जिन्दगी के उतार चढ़ाव से बड़ी मिलती जुलती थी। विषेशतयः इस फिल्म में एक गीत था। जिसके बोल थे-

         इन्सान क्या जो ठोकरें नसीब की न सह सके।

    यह गीत सुनते ही मेरा दोस्त आंखों में आंसू छलकाकर बोला-यार। मैंने मरने का इरादा अब बदल दिया है। अब जिन्दा रहूँगा और जिन्दगी की कठोरताओं के साथ अनवरत रूप से लड़ता रहूंगा। इसके बाद से वह नित्य नसीब की ठोकरे खाता चला जा रहा है, परन्तु चेहरे से बड़ा संतुष्ट प्रतीत होता है और हरदम गुनगुनाता रहता है-

         इन्सान क्या जो ठोकरें नसीब की सह न सके।

    इसके इलावा जब वह अपने आसपास अपने जैसे शोषित-पीड़ित लोगों को रोता और सिसकता हुआ देखता है तो उनकी पीठ पर हाथ मारकर गाते हुए उन्हें परामर्श देता है-

         गाये चला जा, गाये चला जा,

         एक दिन तेरा भी जमाना आएगा।

    मैं अपने यहां के सिनेमाघरों को एक ऐसा स्कूल समझता हूं जहां इन्सान को बड़ी से बडी मुसीबतें बर्दाश्त करने के ओर उसके साथ ही साथ किसी औरत का चुनाव करके उससे मुहब्बत करते रहने, मालदार प्रतिद्वन्द्वि को नीचा दिखाने और अन्त में अपनी प्रेमिका से शादी करने के लाभदायक और रामबाण सबक पढ़ाये और सिखाए जाते हैं!

    किसी की यह आपत्ति बिलकुल ठीक है कि हमारे सिनमा घर, हमारी जनता को एक प्रकार के ‘गुनाह बेलज्जत’ की ओर आकृष्ट कर रहे हैं। लेकिन मेरे ख्याल में यह गुनाह बेलज्जत उस गुनाह बालज्जत के मुकाबले में अधिक बेहतर गुनाह है! यदि हमारे सिनेमाघर न होते, मो मुझे विश्वास है कि हमारी गरीब जनता में शराबखोरी, बलात्कार और शीलहरण जैसी गंदी बीमारियां अधिकता से फैल जातीं। इसका स्पष्ट प्रमाण है कि पिछले दिनों कराची के सिनमा मालिकों ने हड़ताल कर दी थी और सारे सिनेमाघर बन्द हो गये थे, तो उस समय कराची के सारे शराबखाने, ताड़ीघरों और रंडियों के कोठों पर तिल धरने के लिए भी जगह नहीं मिलती थी। उन दिनों शराब-फरोश होटलवालों, ताड़ी विक्रेता और रंडियां दिन-रात अल्लाह मियां से दुआएं मांग रही थीं कि खुदा करे कि सिनेमाघर हमेशा के लिए बंद हो जाएं और हमारे मदिरालय और कोठे इसी तरह दिन होली रात दिवाली मनाते रहे। उन्हीं दिनों की एक घटना मैं आपको बता दूं कि उन दिनों शराबखानों में यह कथन बड़े-बड़े बोड़ों पर लिखकर लगवाये गये थे कि-

         सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते।

और कोठेवालियां इस तरह की गजल और गीत गा रही थीं-

         वह आयें घर में हमारे खुदा की कुदरत है।

         कभी हम उन को, कभी अपने घर को देखते हैं।

         घर आया मोरा परदेसी,

प्यास मिटी मोरी अंखियन की।

इसके बाद अचानक यह हड़ताल खत्म हो गई। सिनेमा खुल गये तो शराबखाने भी खाली हो गये और रंडियों के कोठे भी विरान हो गये। रंडिया बड़ा चीख चीखकर गाती रहीं-

         रात है तारों भरी छिटकी हुई चांदनी

         ऐसे में आ बालमा प्यार की बातें करें…

         हो प्यार की बातें करें।

लेकिन निम्मी, बीनाराय, सबीहा, नूरजहां, शम्मी, गुलशन आरा, यहां तक की बूढ़ी लीला चिटनिस तक ने लोगों का दामन न छोड़ा और उन्हें बुरी राह पर न जाने दिया, पथ-भ्रष्ट न होने दिया। लोग बाग ‘गुनाह बालज्जत‘  से फिर ‘बाल-बेलज्जत’ की ओर लोट आये। इस प्रकार उनका चरित्र और नैतिकता बुराई की ओर जाते जाते फिर अच्छाई की ओर लौट आई। यह सही है कि सिनेमा देखना साधारण आदमी के लिए और विषेशतया गरीब आदमी के लिए एक फिजूलखर्ची ही है। लेकिन यह उस फिजूलखर्ची से लाख गुना बेहतर है, जो शराब बनकर बह जाती है या फिर ‘बाजार ए हुस्न’ से खरीदी हुई बीमारियों का इंजेक्शन बन जाती है। साधारणतया यदि हम फिल्म देखने के परिणामों को देखे तो ज्ञात होता है कि सिनेमा देखने के इस रोग ने हमारी जनता को एक हल्की सी फिजूलखर्ची में फंसाकर दूसरी कई बड़ी महंगी और तबाह कर देनेवाली बुराइयों से बचा लिया है। कराची के सिनमा-मालिकों ने कुछ दिनों के लिए सिनेमाघरों पर ताले लगाकर हमारी आपकी आंखे खोल दीं और बता दिया कि सिनेमाघरों का अस्तित्व जनता के चरित्र को खराब होने से बचाने के लिए कितना आवश्यक है। यूं तो सिनेमाघर भी जनता के लिए एक झक मारने का स्थान है, किन्तु सिनेमाघरों की हड़ताल के समाप्त होते ही जनता ने ‘शाम ढले खिड़की तले सीटी बजाना छोड़ दिया।’ और उस मार्ग पर आ गई जो रीगल, इरोज, नाज, ताजमहल, प्लाजा, रैक्स, पैराडाइज, निशांत, यहां तक कि बाजार ए हुस्न में से गुजरता हुआ सुपर, राक्सी और नूरमहल सिनेमा तक चला जाता है। लेकिन कोई महबूब-नौरोजी रास्ता नहीं भटकता और सारे महबूब-नौरोजी श्यामा को देख-देख कर केवल आँखें सेंकने पर ही संतोष किए लेते हैं।

हमारे सिनेमाघर दूसरा जो लाभदायक सबक इन्सानों को सिखाते हैं, वह है ‘मुहब्बत का सबक’ या प्रेम का पाठ! हमारे सिनेमाघर इन्सानों को कभी नफरत का सबक या घृणा का पाठ नहीं सिखाते। वर्तमान यूग में जबकि एक इंसान को दूसरे इंसान की मुहब्बत की नितांत आवश्यकता है, हमारे सिनेमाघर बहुत बड़े इंसानी कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। यह और बात है कि वहाँ मर्द को सिर्फ औरत से और औरत को सिर्फ मर्द से मुहब्बत करने का सबक सिखाया जाता है। लेकिन यह भी तो खालिस इंसानी मुहब्बत ही हुई। इसके अलावा अगर मर्द औरत से नहीं तो क्या गाय-बकरी से, और औरत मर्द से नहीं तो क्या हाथी-घोड़े से मुहब्बत करेगी!Hum Dono Rangeen - Front

हमारे सिनेमाघरों में मुहब्बत का कोई लंबा, पेचीदा और सब्र की आजमाइश करने वाला सबक नहीं सिखाया जाता बल्कि बहुत संक्षिप्त और बहुत आसान अर्थात ‘चट मुहब्बत पट ब्याह!’ परिणामस्वरूप इन सिनेमाघरों से निकलने के बाद एक मुहल्ले के आमने-सामने घरों में रहने वाली लड़की और लड़का जब बाहर की ओर खुलने वाली खिड़कियाँ खोलती या खोलता है तो दोनों एक-दूसरे को दिलीप कुमार और मधुबाला की तरह बस देखते ही फिदा हो जाते हैं, या एक-दूसरे पर आसक्त हो जाते हैं। इसके एक-दो महीने बाद दोनों में शादी हो जाती है। और यदि शादी नहीं भी हो सकती तो वे दोनों रात्रि के अंधकार में गीतबाली और देवानंद की तरह घर से भाग खड़े होते हैं और लाहौर या दिल्ली में पकड़े जाते हैं और फिर फिल्म ‘दिल की बात’ या ‘हम दोनों’ की तरह दोनों का विवाह हो जाता है। हमारे सिनेमाघरों में चट मुहब्बत और पट ब्याह की सीख इसलिए दी जाती है कि कहीं लोग-बाग क्रोध में आकार सिनेमाघर का फर्नीचर ही न तोड़ दें कि क्यों तुमने संतोष कुमार की शादी सबीहा से नहीं कराई। हमारी जनता न्यायप्रिय होती है। और हर मामले में न्याय चाहती है। इसके अलावा शुरू का एक इस्लामी पहलू यह भी निकलता है कि कुँवारे मर्द और कुँवारी औरत को जन्नत में जगह नहीं मिल सकती। इसलिए हमारे सिनेमाघर जो साधारण गरीब आदमियों को उनकी नित्य की ज़िंदगियों के जहन्नुमों से निकालकर ढाई घंटे के लिए सिनेसंसार के स्वर्ग में ले जाते हैं। वे यह चाहते हैं कि उनके सारे दर्शकगण फिल्मी तर्ज की मुहब्बत और शादियाँ करके दुनिया से सीधे जन्नत चले जाएँ! इस सिलसिले की अंतिम बात यह है कि यदि फिल्म के अंत में शादी न हो तो फिर ‘मजा’ नहीं आता और लोग ‘मजे’ के लिए ही फिल्म देखते हैं! अब भला यह भी क्या बात हुई कि दिलीप कुमार छः बजे शाम से सवा आठ बजे रात तक श्यामा से मुहब्बत करता रहा और आठ बज कर बीस मिनट पर उसको छोड़कर हिमालय पर्वत पर जाकर साधु बन गया–? भला क्या मजा आया! मजा तो तब जब ही है कि नूरजहां और संतोष कुमार रिट्ज़ सिनेमा में शादी करें और हम और आप अपने घर जाकर दाल-रोटी का ‘वलीमा’ खाएँ!Aankhen-7

हमारे सिनेमाघर हमारी जनता को सबसे अधिक महत्वपूर्ण जो सबक पढ़ाते हैं वह है वर्ग-घृणा का सबक अर्थात गरीब का गरीब की मदद करना और अंत में दौलतमंद आदमी को नीचा दिखाने का सबक। आपने हर फिल्म में देखा होगा कि एक गरीब किन्तु स्वस्थ और सुंदर नवयुवक होता है, उस पर एक अमीर और दौलतमंद आदमी की नौजवान लड़की फिदा हो जाती है। इस अमीर लड़की का बाप गरीबों पर बड़ा जुल्म ढाता है तो गरीब नवयुवक उस लड़की से, छेड़खानियाँ कर करके खूब बदला चुकता है और अंत में जब अमीर लड़की मालदार बाप की दौलत को ठोकर मार्कर गरीब नवयुवक की तंग, अंधेरी और गंदी ‘चाल’ में बैठी चूल्हा फूंकते-फूंकते रोने-बिसुरने लगती है तो सिनेमाघर में बैठे हुये सारे दर्शक प्रसन्न होकर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाते हैं, सीटियाँ बजाते हैं और चीखने लगते हैं:-

“वह पट्ठे प्रेमनाथ! खूब बदला लिया है। और मजा चखा साली को।”

और जब अमीर लड़की का बाप अपनी भागी हुई लड़की को ढूँढता-ढूँढता गरीब नौजवान की चाल पर पहुंचता है तो उस चाल के गरीब लौंडे उसकी कार पर पथराव आरंभ कर देते हैं और सिनेमा में सीखिए हुई गालियों की बौछार करते हैं। और जब अमीर बाप अपनी नाज-व-नखरों में पली हुई लड़की को गरीब नौजवान का गंदा अंडर-वेयर और लूँगी ढोते देखता है तो उस पर बरस पड़ता है। लेकिन अमीर लड़की साफ-साफ कह देती है—

‘‘पिता जी! मुझे प्रेम हो गया है। (अर्थात प्रेमनाथ हो गया है।) प्रेम आलीशान कोठियों में अनहीन रहता। प्रेम गरीबों की कुटियाओं में रहता है।”

इस डायलाग पर सिनेमा देखने वाले ‘माजे-गामे’ चीख पड़ते हैं-

“वाह पट्ठी जीवन्द रह।”

इसके बाद जब उसका अमीर बाप सिर झुकाए वापिस जाने लगता है तो सिनेमा के दर्शक लोग घृणा से पुकारते हैं-

“धत्त- हात तेरी पापड़ वाले!”

“नस जा ऐथूँ कमीनियाँ।”

“ढर्रर्र….!”

दरवाजे से बाहर निकलते हुये उसकी भिड़ंत हीरो- गरीब नौजवान से होती है तो अमीर आदमी उसे दस हजार रूपये के नोट देता है। दस हजार रुपया ले ले और लड़की वापिस दे दे! किन्तु स्वाभिमानी गरीब नौजवान (जो केवल दस हजार के बदले में फिल्म के हीरो की भांति काम कर रहा है।) दस हजार रूपये अमीर आदमी के मुँह पर दे मारता है। इस पर गरीब दर्शकों के हर्ष का ठिकाना नहीं रहता। बस उनका कुर्सियाँ तोड़ना शेष रह जाता है।

अब इस सिलसिले में एक रहस्य की बात यह है कि अमीरों के विरुद्ध गरीबों के मन में फिल्मों द्वारा घृणा उत्पन्न करना भी स्वयं अमीरों और सेठों का एक लाभदायक व्यवसाय है। फिल्में केवल अमीर लोग बनाते हैं और एक-एक फिल्म पर लाखों रूपये खर्च करते हैं। ये फिल्मों में अमीर और गरीब की टक्कर और अमीर को गालियाँ और गरीब को विजय इसलिए दिलवाते हैं कि ऐसा करने से लोग अधिक-से-अधिक संख्या में फिल्म देखते हैं और इन्हें खूब मुनाफा होता है। अब इस मुनाफे की खातिर यदि अमीरों को नित्य ढाई घंटे के तीन शो के हिसाब से साढ़े साथ घंटे टक्क गालियाँ पड़ती रहें तो क्या हर्ज है! दौलतमंद आदमी यूँ भी दौलत के मामले में बड़े बेगैरत होते हैं!!

यह आंतरिक रहस्य चाहे कुछ भी क्यों न हो, यह तो एक तथ्य और वास्तविकता है कि हमारे सिनेमाघर शनैः शनैः हमारी जनता में वर्ग-चेतना उत्पन्न करते जा रहे हैं और गरीब इन्सानों को उत्साहित कर रहे हैं कि घबराने की कोई बात नहीं है। एक दिन तुम्हारा भी जमाना आएगा इसलिए गाये चला जा, गाये चला जा! टैक्सी ड्राइवर है तो क्या हुआ, सेठ जी की लड़की को भगा ले आ और अपना मैला-कुचैला लंगोट उससे धुलवा। उससे अपना वर्षों का ठंडा चूल्हा गर्माया करो और फिर खटिया पर लेट कर बड़े आराम से अपनी दौलतमंद महबूबा से कहो-

“मान मेरा एहसान अरी नादान कि मैंने तुझसे किया है प्यार!”

और सिनेमाघर को धन्यवाद दो जिसने तुम्हें जीवन का इतना महत्वपूर्ण सबक सिखाया है, पाठ पढ़ाया है।

मुहब्बत ज़िंदाबाद!

सिनेमा ज़िंदाबाद!

सेठ की लड़की ज़िंदाबाद!

हमारा इश्क़ ज़िंदाबाद!

हम दोनों—ज़िंदाबाद

हमारी  गरीबी….ज़िंदा…नहीं यह गलत हो गया!

Ibrahim Jaleesइब्राहीम जलीस उर्दू के बड़े तरक्कीपसंद अफसानानिगार और व्यंग्यकार रहे हैं। उर्दू में इनका स्थान वही है जो हिन्दी में हरिशंकर परसाई जी का है। इब्राहीम जलीस मूलतः हैदराबाद के रहने वाले थे। लेकिन आज़ादी-विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए। पाकिस्तान में उनका ज़्यादातर समय लाहौर और कराची में बीता। वहाँ भी वे तरक्कीपसंद जमात के ही हिस्सेदार रहे । उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- उल्टी कब्र, नेकी कर थाने में जा, ऊपर शेरवानी अंदर परेशानी, हँसे और फंसे, शगुफ्ता शगुफ्ता और काला चोर आदि। 

अनुवादक- अख्तर वागेश्वरी

नई कहानियाँ , मई 1967 से  साभार 

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