जातीय गठन का प्रश्न और रामविलास शर्मा: प्रणयकृष्ण

(2012-2013 रामविलास शर्मा का जन्म-शताब्दी वर्ष है। रामविलास शर्मा के ऊपर अपना व्याख्यान देते हुये वीर भारत तलवार ने कहा है कि रामविलास शर्मा की मृत्यु ने हिन्दी मीडिया को झकझोर कर के रख दिया था। वे बोलते हैं-“रामविलास जी की मृत्यु के बाद जो हिन्दी अखबार प्रकाशित हुए, उन सबों ने मुख्य पृष्ठ पर उनकी मृत्यु के समाचार को प्रमुखता से जगह दी।…बड़ी-बड़ी सुर्खियां लगाईं। ऐसा कि 11 सितंबर को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर जो हमला हुआ था, उसकी भी सुर्खियां ऐसी न थी। हिन्दी के किसी अन्य साहित्यकार को यह यह सम्मान प्राप्त नहीं है। ।…मुझे  नहीं लगता कि पूरे हिन्दी साहित्य में भारतेन्दु की मृत्यु के बाद किसी और की मृत्यु के समाचार को इतनी प्रमुखता मिली होगी जितनी रामविलास जी की। ” इससे हम रामविलास शर्मा की लोकप्रियता और उनके जाने से हुए क्षति दोनों का अंदाजा लगा सकते हैं।  तेज-तर्रार युवा आलोचक प्रणय कृष्ण इस इस जन्म-शताब्दी वर्ष के बहाने लगातार रामविलास शर्मा पर लिख-बोल रहे हैं। उनके दो लेख हम पहले भी प्रकाशित कर चुके हैं(पूर्व प्रकाशित दोनों लेख इस प्रकार हैं-अपने अपने रामविलास- प्रणय कृष्ण और उपनिवेशवाद / साम्राज्यवाद कभी प्रगतिशील नहीं होता (रामविलास शर्मा की याद )। प्रस्तुत है उनका यह तीसरा लेख।)

निराला और रामविलास शर्मा

निराला और रामविलास शर्मा

By  प्रणयकृष्ण 

‘भाषा और समाज’ नामक पुस्तक में ‘जातीय निर्माण के उपकरण’ शीर्षक अध्याय में रामविलास जी ने लिखा, ” आधुनिक जातियों के निर्माण के लिए सामान्य भाषा, सामान्य प्रदेश, सामान्य आर्थिक जीवन और सामान्य संस्कृति आवश्यक तत्व माने गए हैं”, यही स्टालिन की प्रस्थापना है. रामविलास जी इसकी व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण बात यह कहते हैं कि जिन तत्वों से जन का निर्माण होता है, उन्हीं से सामंतयुगीन लघु जाति का और पूंजीवादी महाजाति का निर्माण होता है. पार्थ चटर्जी ने १९७५ में प्रकाशित ‘बंगाल: एक जातीयता का उदय और विकास’ (सोशल साइंटिस्ट, खंड चार, अंक १), शीर्षक अपने एक लेख की पाद टिप्पणी में लिखा है कि उपरोक्त विशेषताएं जिन्हें स्टालिन ने दुर्भाग्य से आधुनिक राष्ट्र अथवा जाति (रामविलास जी  के शब्दों में ‘महाजाति’ की विशेषताएं बताया है, वे सही अर्थों में ‘जातीयताओं’ (लघुजातियों) पर ही लागू होतीं हैं. इसके चलते खुद स्टालिन के विवेचन में तमाम तरह की अवधारणात्मक दिक्कतें पैदा हुई हैं. रामविलास जी काफी पहले यानी ‘भाषा और समाज’ नामक पुस्तक में १९६१ में प्रकारांतर से यही  कह रहे हैं, अंतर यह है कि वे  यह मानते हैं कि  सामान्य भाषा, प्रदेश, आर्थिक जीवन और संस्कृति जातीय निर्माण की हर अवस्था में पाए जाने वाले उपकरण हैं लेकिन हर अवस्था में इनके गुण और परिमाण में अंतर होता है.  स्टालिन के यहाँ तो जातीय निर्माण की अनेक काल-क्रमिक अवस्थाएं हैं ही नहीं. जन, लघुजाति और महाजाति, ये तीनों ही संज्ञाएँ मेरी समझ में आधुनिक राष्ट्र-राज्य से अलग हैं. राष्ट्र राज्यों का गठन पश्चिमी योरप में पूंजी के युग की परिघटना है. उदीयमान पूंजीपति वर्ग के नेतृत्व में  राष्ट्रीय आन्दोलन के ज़रिए संपन्न की गई पूंजीवादी क्रांतियों ने सामंतवाद को समाप्त कर राष्ट्र राज्यों की स्थापना की. यह राष्ट्रीय आन्दोलन पूंजीपति वर्ग द्वारा क्षेत्रीय स्तर पर सुपरिभाषित घरेलू बाज़ार और राजसत्ता पर कब्ज़े की मांग से पैदा हुआ था.  मुश्किल यह हुई  है कि स्टालिन ने इस आधुनिक पूंजीवादी राष्ट्र की विशेषताएं वे बताई जो उसके अस्तित्व में आने से पहले ही दुनिया भर की तमाम जातीयताओं में विद्यमान थीं. आधुनिक राष्ट्र और जातीयताओं के बीच जो अंतर स्टालिन से पहले के मार्क्सवादी चिंतन में (एंगेल्स, मार्क्स, लेनिन के यहाँ) कमोबेश स्पष्ट था, भले ही अंग्रेज़ी शब्द  ‘नेशन’ कई बार जातीयता (नेशनैलटी) के अर्थ में प्रयुक्त होता हो, स्टालिन के विवेचन में गड्ड- मड्ड हो जाता है. जातीयताओं और राष्ट्र में अंतर यह नहीं है कि जातीयताएं सिर्फ  प्राक-पूंजीवादी, प्राक-आधुनिक सामाजिक गठन का रूप हैं और राष्ट्र आधुनिक.
राष्ट्र-राज्य  निश्चय ही आधुनिक और पूंजीवादी परिघटना है, लेकिन जातीयताएं आधुनिक और पूंजीवादी दौर में भी परिवर्तित रूप में बनी रहती हैं. कुछ जातियां अपने पूंजीपति वर्ग के नेतृत्व में आधुनिक राष्ट्र राज्यों में तब्दील हो जाती हैं . दूसरी ओर, बहुजातीय राष्ट्र राज्य, चाहे वे बुर्जुआ क्रान्ति के ज़रिए योरपीय देशों (पूर्वी ही नहीं, पश्चिमी भी) में अस्तित्व में आए हों  अथवा तीसरी दुनिया के भारत जैसे देश जहां साम्राज्यवाद-विरोधी लड़ाई के ज़रिए वे अस्तित्व में आए हों, सभी जगह उनके भीतर राष्ट्रीय स्तर के पूंजीपति वर्ग के उदय हो जाने के बाद भी जातीयताएं आधुनिक रूप ग्रहण करके बनी रही हैं. बावजूद इसके कि उनमें से हरेक का स्वतन्त्र, संप्रभु राज्य नहीं होता. पिछले कई दशकों का दुनिया का इतिहास यह दिखाता है कि जब ऐसे बहुजातीय राष्ट्र-राज्य विघटित होते हैं, तो उनमें निहित अलग अलग जातीयताएं जिनमें किसी भी हद तक आधुनिक पूंजीवादी विकास हो चुका होता है, वे अलग अलग स्वतन्त्र संप्रभु राष्ट्र-राज्यों के रूप में तब्दील हो जाती हैं. बुर्जुआ राष्ट्र-राज्यों के ही साथ ऐसा होता हो सिर्फ ऐसा नहीं,  बल्कि सोवियत संघ जैसे समाजवादी गणराज्य के विघटन के बाद भी ऐसा ही हुआ है.
रामविलास जी के  हिन्दी जाति के निर्माण संबंधी चिंतन का सैद्धांतिक महत्त्व भारत के बहुजातीय संप्रभु राष्ट्र राज्य बनने तक जातीय विकास की प्रक्रियाओं को समझने से ताल्लुक  रखता है. लेकिन उसके बाद के दौर की जो जटिलताएं हैं, उन्हें समझने और हल करने के लिए रामविलास जी के काम को आगे बढाने की ज़रुरत है, सिर्फ उनकी स्थापनाओं के मूल्यांकन या पुनर्मूल्यांकन से बात बनेगी नहीं. जब कोई काम आगे बढ़ता है तो पीछे हुए कामों में खुद -ब-खुद कई तरह की तरमीम होती चलती है.
जब वे कहते हैं कि  महाजाति का  निर्माण एक सुदीर्घ  प्रक्रिया है, तो ज़ाहिर है कि वे सामंती युग में ही लघुजातियों से महाजातियों की तरफ लम्बे संक्रमण की बात कर रहे हैं जो सामंती युग समाप्त होने के पहले ही शुरू होता है और बाद भी जारी रहता है. रामविलास शर्मा के सामने यहीं वह समस्या खड़ी होती है जो स्टालिन के विवेचन ने पैदा की है और वह है; ‘नेशनैलिटी’ और ‘नेशन’ में भेद को धूमिल करने की समस्या. चूँकि स्टालिन के लिए जाति और राष्ट्र प्रायः एक हैं, अतः वे जातीय गठन को पूंजीवाद और आधुनिकता से अनिवार्यतः जोड़ देते हैं. जबकि  सामान्य भाषा, आर्थिक जीवन, प्रदेश और संस्कृति की विशेषता जो भारत के अनेक समुदायों में पंद्रहवीं शताब्दी में ही दिखाई देती हैं, उन्हें जाति न मानने का कोई कारण नहीं दिखता, लेकिन समस्या यह उत्पन्न होती है कि इसे पूंजी के युग की घटना या आधुनिक परिघटना कैसे माना जाए. रामविलास जी हिन्दी जाति के निर्माण को सौदागरी पूंजी के विकास से उचित ही जोड़ते हैं, लेकिन उनका आग्रह यह हो जाता है कि सौदागरी पूंजी को पूंजीवाद की ही एक अवस्था माना जाए. इससे हिन्दी या अन्य भारतीय जातियों के उदय की यह शर्त पूरी हो जाती है जो स्टालिन के विवेचन में विद्यमान है .
रामविलास जी महाजाति शब्द  को ‘नेशन’ के अर्थ में प्रयुक्त करते हैं, उन्हीं विशेषताओं को ध्यान में रखकर जिन्हें स्टालिन ने गिनाया है, लेकिन अपने भारतीय अनुभव से जानते हैं कि इसके गठन का आरम्भ भारत के सामंत काल में शुरू हो गया था.  इस अंतर्विरोध को हल करने के क्रम में वे  हिन्दी और अन्य भारतीय महाजातियों  के निर्माण को आधुनिक काल कहते हैं. दरअसल ‘आरंभिक आधुनिकता’ को आजकल उत्तर सामंत काल और व्यापारिक पूंजी से जोड़ कर देखने का खासा अकादमिक रिवाज़ है. इस मामले में यदि रामविलास जी हिन्दी जाति के निर्माण काल को आधुनिक बताते हैं, तो एक तरह से वे बाद के ‘आरंभिक आधुनिकता’ के शास्त्रकारों को पूर्वाषित करते हैं. आधुनिकता और पूंजीवाद को सहवर्ती मानने की धारणा चलती रही है. लेकिन आधुनिकता ठीक-ठीक एक मूल्य और उन मूल्यों को उत्पन्न करने वाली भौतिक परिस्थितियों के रूप में कई जगह औद्योगिक  पूंजीवाद से पहले ही  अस्तित्व में आ गई हो, तो यह कोई अनहोनी बात नहीं है. आज के ‘आरंभिक आधुनिकता’ के व्याख्याता मोटे तौर पर सन १५०० से लेकर सन १८०० तक के काल को आरंभिक आधुनिकता का काल बताते हुए लगभग उन सारे ही तर्कों का सहारा लेते हैं जिन्हें रामविलास शर्मा उनसे दशकों पहले प्रस्तुत करते हैं. ये अध्येता भारत के सम्बन्ध में मुग़ल काल को आरंभिक आधुनिकता का काल  बताते हैं जो रामविलास जी के विवेचन का स्वाभाविक निष्कर्ष है. यह रामविलास जी की  जातीय गठन को समझने के लिहाज से एक महत्वपूर्ण मौलिक सैद्धांतिक स्थापना है जिसे विश्व अकादमी ने अन्यान्य स्रोतों से पाया और बहुत बाद में अपने विमर्शों में शामिल किया.
जहां तक जातीय गठन के पूंजीवाद के साथ सम्बन्ध का सवाल है, रामविलास शर्मा इस ‘आरंभिक आधुनिक काल’ को एक साथ सामंती और पूंजीवादी, दोनों मानते प्रतीत होते हैं. सामंती खोल में व्यापारिक और सूदखोर पूंजी का विकास मार्क्स के विवेचन में औद्योगिक पूंजीवाद की पूर्वपीठिका है या उसके लिए आवश्यक परिस्थितियों में से एक है. लेकिन मार्क्स इस व्यापारिक पूंजी के दौर को पूंजीवाद की अवस्था नहीं मानते, क्योंकि यह सामंती दौर में अंतर्भूत है. रामविलास शर्मा व्यापारिक पूंजी के दौर को पूंजीवाद की ही अवस्था मानते है और उनकी योजना के अनुसार इस दौर में सामंतवाद और पूंजीवाद एक तरह से ओवरलैप करते हैं. फिर भी नाम ही देना हो, तो रामविलास जी इस दौर को पूंजीवादी दौर कहना तय करते हैं. मार्क्स यदि इसे सामंतवाद  का दौर  (औद्योगिक पूंजीवाद से पहले सौदागरी पूंजी के संचय का दौर) ही मानते हैं, तो इसलिए कि वे उत्पादन-पद्धति को किसी ऐतिहासिक चरण की पहचान का केन्द्रीय तत्व मानते हैं, जबकि रामविलास जी इस प्रसंग में विनिमय पर अधिक जोर देते हैं. मैं उनकी इस स्थापना के सैद्धांतिक मूल्य पर कोई टिप्पणी कर सकने में सक्षम नहीं हूँ.
अगर महाजातियों के निर्माण की रामविलास जी की धारणा को हम गंभीरता से पढ़ें तो उनके लिए महाजाति के निर्माण का एक चरण सामंती काल में व्यापारिक पूंजी के माध्यम से आकार ग्रहण करता है, जबकि दूसरा चरण औद्योगिक पूंजी के दौर में पूंजीपति वर्ग की मुख्य भूमिका के साथ आकार ग्रहण करता है. इस दौर में आकर वह राष्ट्र या नेशन का रूप अख्तियार करती है. मेरे पढने के मुताबिक़, उनकी महाजाति की धारणा में ‘नेशनैलिटी’ और ‘नेशन’ एक continuum की तरह आते हैं जबकि स्टालिन के यहाँ ये पद लगभग समानार्थी लगते हैं.  रामविलास जी स्टालिन से  अलग इस बात में भी हैं कि  वे जातीय विकास को सिर्फ औद्योगिक पूंजीवाद की परिघटना नहीं मानते, बल्कि उसकी दीर्घ प्रक्रिया को रेखांकित करते हैं जो उनकी धारणा के अनुसार सामंती और व्यापारिक पूंजीवाद के ओवरलैप के दौर से लेकर औद्योगिक और महाजनी पूंजी के दौर तक चलती रहती है और  समाजवादी दौर तक भी. वे स्टालिन से इस मामले में भी अलग हैं कि वे मानते हैं कि जातीय गठन की प्रक्रिया में, सभी परिस्थितियों में आर्थिक जीवन की नियामक भूमिका रहे, यह ज़रूरी नहीं.
बंगाली जातीयता के निर्माण के सन्दर्भ में पार्थ चटर्जी लक्ष्य करते हैं कि आठवीं सदी से पूर्वी सागरों पर अरब व्यापारियों का कब्ज़ा हो गया और बंगाल का भारत के  समुद्री व्यापार में हिस्सा गिरता गया. राजसत्ता और समाज पर जो दबदबा व्यापारियों और बैंकरों का पांचवीं-छठी शताब्दी में था, वह अब न रह गया. लेकिन  कई शताब्दियों तक व्यापारियों की भूमिका काफी घट जाने के बावजूद, सामंतों की  विघटनकारी खींचतान आदि के होते हुए भी स्वतन्त्र राजवंशों के अधीन बंगाली राष्ट्रीयता का निर्माण जारी रहा. बंगाली सांस्कृतिक समुदाय का राजनीतिक एकीकरण पाल और सेन वंशों से लेकर स्वतंत्र सुल्तानों  के अधीन जारी रहा. ज़ाहिर है कि बंगाली राष्ट्रीयता के गठन की इन परिस्थितियों में आर्थिक जीवन नियामक नहीं रहा.  यह उदाहरण रामविलास जी की उस धारणा की भी तस्दीक करता  है जो उनके जातीयता संबंधी चिंतन को स्टालिन से सर्वाधिक अलग करता है, वह यह कि जाति/महाजाति के गठन में सामंती राजसत्ता भी सहायता करती है. यह अलग बात है कि पार्थ चटर्जी जहां महज ‘जातीयता’  या ‘नैशनैलिटी’ के सन्दर्भ में विचार करते हैं, वहीं रामविलास शर्मा महाजाति के गठन में Nationality- Nation Continuum का सन्दर्भ लेते हैं. इसीलिए पार्थ चटर्जी के विवेचन में बांग्ला जाति या लघुजाति के गठन में सौदागरी पूंजी के अभाव में भी सामंती राजवंश प्रमुख भूमिका निभाते हैं, जबकि रामविलास जी के विवेचन में सामंती राजसत्ता महाजातीय निर्माण में सहायता करती है, ख़ासकर एक सुकेंद्रित और निरंकुश राजसत्ता व्यापार के प्रसार से महाजाति के गठन और फलतः जातीय भाषा के गठन और प्रसार में सहायता करती है. रामविलास जी के सामने तुर्क, पठान और खासकर मुग़ल राजसत्ता का उदाहरण है. ‘भाषा और समाज’ लिखे जाने तक और उसके काफी बाद तक स्टालिन के प्रभाव में बहुतेरे भारतीय मार्क्सवादी चिन्तक यह मानते रहे कि औपनिवेशिक युग से पहले भारत में राष्ट्रीयताओं के अस्तित्व की बात करना ठीक नहीं है. हालांकि ऐसा नहीं है कि सभी मार्क्सवादी चिंतकों की धारणा यही रही हो. उदाहरण के लिए ई. एम. एस नम्बूदिरीपाद ने १९५२ में ही ‘केरल’ जाति का निर्माण काल चौदहवीं सदी से बताया था.
हम देखते हैं कि गुप्त साम्राज्य के पराभव के बाद अनेक ऐसे राजवंशों की स्थापना होती है जिनका राजनीतिक और सैनिक सत्ता संबंधी दृष्टिकोण शायद ही कभी उनकी  सीमित क्षेत्रीय सरहदों से परे जा पाता हो. आठवीं शती से भारतीय कला की स्थानीय या क्षेत्रीय शाखाएँ विकसित होने लगती हैं. बारहवीं सदी से नागरी, बांग्ला, गुजराती आदि  एक दूसरे से अलग पहचानी जा सकने वाली  लिपियों के आरंभिक रूप मिलने लगते हैं. पद्रहवीं शती तक उत्तर और पश्चिम भारत की सभी आधुनिक भाषाओं की लिपियों का पूर्ण विकास हो जाता है. चौदहवीं  सदी तक सारी ही आधुनिक भारतीय भाषाएँ पूरी तरह बन चुकी हैं और सभी में रचनात्मक  साहित्य का निर्माण शुरू हो जाता है. इस समय तक अलग अलग क्षेत्रों के साहित्य और कलाओं की  विशिष्ट सौन्दर्यशास्त्रीय परम्पराएं मिलने लगती हैं. चौदहवीं सदी से ही भारत में सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ प्रमुखतः क्षेत्रीय भाषाओं और साहित्यों के इर्द-गिर्द होती हैं न कि संस्कृत या फारसी के इर्द-गिर्द, कुछ अपवादों को छोड़कर.  मोटे तौर पर आठवीं से लेकर चौदहवीं शती के बीच भारत में सामंती युग के दौरान लघुजातियों का निर्माण होता है और चौदहवीं तथा पंद्रहवीं शताब्दी से महाजातियों  के निर्माण की और संक्रमण का दौर  शुरू  हो जाता है.
यदि रामविलास जी की भारत में जाति गठन संबंधी धारणाओं की योजना में थोड़ी तबदीली की जुर्रत की जाए तो, यह योजना इस प्रकार बन सकती है-
१. आठवीं से चौदहवीं सदी तक मूलतः सामंती युग में लघु जातियों का निर्माण.
२. चौदहवीं-पद्रहवीं सदी से अठारहवीं सदी तक महाजातियों के बनने का लंबा संक्रमण काल जिसमें मुख्यतः सौदागरी पूंजी, कारीगरों की भूमिका और सहायक रूप में सुगठित केन्द्रीय सामंती सत्ता की भूमिका भी रहती है. इसे  आरंभिक आधुनिकता का काल कहा जा सकता है. इसमें जातीयता की विशेषताएं भी रहती हैं और आधुनिक राष्ट्र के बीज भी होते हैं. हिन्दी जाति के सन्दर्भ में इसे रामविलास जी के ही शब्दों में जनजागरण का काल कह सकते हैं. यहाँ हम इस बहस में नहीं उलझते की इसे भी पूंजीवाद का या सामंती और पूंजीवादी दौर के ओवरलैप का काल कहें या न कहें.
३. उन्नीसवीं सदी से आरम्भ होने वाला महाजाति के निर्माण का अगला चरण जिसमें मुख्य भूमिका भारत के सन्दर्भ में अखिल भारतीय पूंजीपति वर्ग की है, जो सामंती अवशेषों और विदेशी पूंजी पर निर्भरता के बावजूद औपनिवेशिक शासन के विरोध और मोल-तोल की जटिल प्रक्रिया से गुज़रते हुए  अनेक जातियों को एक आधुनिक बुर्जुआ राष्ट्र राज्य में एकीकृत करता है. यहाँ यह भी ध्यान देने की ज़रुरत है कि जहां एक भौगोलिक संस्कृति इकाई के बतौर भारतवर्ष की कल्पना समाज के ऊपरी वर्गों में उस दौर से मिलती है जब संस्कृत संपर्क भाषा थी, या आगे चलकर खुसरो आदि ने ‘हिन्दुस्तान’ की महिमा के गीत गाए, वहीं यह उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में ही संभव हुआ कि भारतेंदु और द्विवेदी युग के तमाम लेखकों ने बड़े पैमाने पर भारत या हिन्दुस्तान के लिए कौम, वतन, राष्ट्र, जाति, नेशन आदि शब्दों का इस्तेमाल किया. यह महाजाति के आधुनिक पूंजीवादी राष्ट्र-राज्य का स्वरूप अख्तियार करने की संभावना का का सूचक  है. अजीमुल्ला खान ने १८५७ में जो राष्ट्र-गीत लिखा था, उसमें भी यही बात है-
हम हैं मालिक इसके हिन्दोस्तां हमारा
पाक वतन है कौम का, जन्नत से भी न्यारा’

इकबाल जब लिखते हैं कि- ‘हिन्दी हैं हम वतन हैं हिन्दोस्तां हमारा’ तो इन पंक्तियों में महाजातियों के आधुनिक राष्ट्र-राज्य बनने की ऐतिहासिक आकांक्षा व्यक्त होती है जो कालिदास या खुसरो के भारत वर्णन से बिलकुल अलग चीज़ है.लेकिन इस औपनिवेशिक दौर में  पूंजीपति वर्ग के नेतृत्व में चले राष्ट्रीय आन्दोलन की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि वह संप्रदाय के आधार पर बंट गया और विभिन्न जातियों का जो एकीकरण जनता के स्तर पर स्वाधीनता के लिए जन-आन्दोलनों के ज़रिए हो रहा था, उन जातियों में भी सम्प्रदाय के आधार पर बंटवारा हो गया और अंततः एक नहीं, बल्कि दो बहुजातीय राष्ट्र-राज्य बन गए. यह कमोबेश वयस्क किन्तु बाद को विकलांग  आधुनिकता का काल कहा जा सकता है. रामविलास जी के शब्दों में जिसे नवजागरण कहा जाता है , वह उपरोक्त कमजोरियों के चलते जातीय जीवन की विशेषता बना नहीं रह सका. असल में यह जो तीसरा दौर है, जातीय गठन के लिहाज से सबसे जटिल दौर है.


इस दौर की जटिलता पर आने से पहले हम रामविलास शर्मा के दो व्यावहारिक  प्रस्तावों पर चंद बातें कहना चाहते हैं. पहली बात यह है कि उनकी ये बातें प्रस्ताव मात्र हैं, सैद्धांतिक प्रस्थापनाएँ नहीं हैं. एक बात यह है कि उन्होंने लिखा है कि यदि हिन्दी-उर्दू दो भाषाएँ नहीं हैं, तो क्या ही  अच्छा होता कि दोनों की एक ही लिपि यानी देवनागरी ही होती. आज जितने बड़े पैमाने पर उर्दू साहित्य की कृतियाँ देवनागरी में लिप्यन्तरित की जा रही हैं, उतने बड़े पैमाने पर किसी अन्य भाषा से अनुवाद नहीं हो रहे हैं. कारण साफ़ है. लिप्यान्तरण सहज है, भाषांतरण मुश्किल. अपने समय में रामविलास शर्मा को प्रगतिशील आन्दोलन में इस बात के लिए चाहे जितना लड़ना पड़ा  हो कि हिन्दी-उर्दू दो नहीं एक ही भाषा हैं, लेकिन बाद को  शम्सुर्रहमान  फारुकी से लेकर क्रिस्टोफर किंग तक सब यह मानते हैं कि औपनिवेशिक हस्तक्षेप से पहले ये दो भाषाएँ नहीं थीं, कि यह एक ही भाषा है और औपनिवेशिक दौर से पहले उर्दू  नाम की कोई भाषा नहीं थी. ‘ज़बान-ए-उर्दू-ए-मोअल्ला’ के कुपाठ से उर्दू संभवतः एक अलग भाषा मान ली गई. वैसे भी भाषा की पहचान क्रियापदों से होती है, जिनके क्रियापद एक हैं, वे एक ही भाषा हैं. लेकिन उनकी दो और बातों पर गौर करना चाहिए- एक यह कि हिन्दी, हिन्दवी या रेखता नाम से जो भाषा थी, उसकी लिपियाँ दो थीं. दरअसल दो लिपियाँ होते हुए भी जातीय विकास में कोई कठिनाई नहीं आई. मुल्ला दाउद, खुसरो या जायसी की प्राचीन पांडुलिपियाँ चाहे अरबी-फारसी लिपि में मिलें या देवनागरी में, उनकी भाषा जातीय भाषा ही है, लिहाजा लिपि से कोई फर्क नहीं पड़ता. रामविलास जी खुद भी यही कहते हैं. इसलिए लिपि बदलना कोई अनिवार्य चीज़ नहीं है, जातीय एकता के लिए. रामविलास जी खुद लिखते हैं, “लिपि भी संस्कृति का अंग है.” ऐसे में उनके प्रस्ताव को अरबी-फारसी लिपि को छोड़ देने के अर्थ में नहीं ग्रहण करना चाहिए, बल्कि बेहतर तो ये हो कि नागरी जाननेवालों, ख़ास कर बौद्धिकों  को प्रयास कर के अरबी-फारसी लिपि को सीख लेना चाहिए. यह जातीय एकता के लिए शुभ ही होगा. इसके अलावा यदि औपनिवेशिक हस्तक्षेप से ही सही हिन्दी- उर्दू दो भाषाएँ बन गई हैं, उनकी अलग साहित्यिक परम्पराएं दो सौ सालों में निर्मित हो गईं हैं, तो बगैर एक को दूसरे के मातहत बनाए साहित्य-संस्कृति के स्तर पर दोनों को नज़दीक लाने के  शैक्षणिक, प्रशासनिक और वैदुषिक प्रयास बढाने की दिशा में हमें काम करना चाहिए. आखीर सोवियत संघ में तो ऐसी लिपियों को भी पुनर्जीवित किया गया, जो मृतप्राय थी.


रामविलास जी का एक सुझाव यह भी था कि हिन्दीभाषी सभी प्रदेशों का एक प्रदेश बनना चाहिए. यह भी सुझाव या प्रस्ताव ही है, कोई सैद्धांतिक प्रस्थापना नहीं. वास्तव में आज के दौर में जातीय निर्माण के लिए आर्थिक जीवन ही निर्णायक तत्व बना हुआ है. उपनिवेश रहे देश आज़ाद तो हुए लेकिन विश्व-पूंजीवाद के साथ उनके शासक तबकों का निर्भरता का सम्बन्ध बढ़ता ही चला गया है. उपनिवेशवादी और साम्राज्यवाद के पुराने रूप में  एक विकसित राष्ट्र  दूसरे को प्रत्यक्षतः और राजनीतिक तौर पर गुलाम बना लेता था. तब अनेक उत्पीडित जातियां ऐसी साम्राज्यवादी शक्तियों  के खिलाफ संघर्ष में एकताबद्ध होती थीं. आज नव-साम्राज्यवाद के दौर में राष्ट्रीय स्तर का पूंजीपति वर्ग खुद दलाल के रूप में उनका हित-पोषण करता है. ऐसे में किसी बाहरी शक्ति द्वारा एक ही भौगोलिक-सांस्कृतिक क्षेत्र की तमाम जातियों का एक समान प्रत्यक्ष  शोषण नहीं होता, बल्कि इसके रूप बहुत अलग हो गए हैं. राष्ट्रीय स्तर के पूंजीपति वर्ग अपने-अपने देशों में साम्राज्यवादी देशों की प्राथमिकता के अनुकूल पूंजीवादी विकास करते हैं जो बहुजातीय राष्ट्र में कभी एक जाति की कीमत पर दूसरी जाति का विकास करने के रूप में प्रकट होता है, कभी आतंरिक उपनिवेशन के रूप में. कभी एक ही भाषिक प्रदेश के भीतर असमतल विकास के कारण विकासहीनता के शिकार लोगों का अलगाव अपना अलग प्रदेश माँगने के आन्दोलनों में प्रकट होता है, भले ही जातीय दृष्टि  से वे एक हों. यह सब कुछ विश्व पूंजी द्वारा सतत निर्मित केन्द्रों और परिधियों के बीच संघर्ष के राष्ट्र राज्य के दायरे में प्रतिफलित रूप हैं. ये केंद्र और परिधियाँ विकसित और अविकसित या विकासशील देशों के बीच, किसी भी राष्ट्र  के भीतर एक जाति  और दूसरी जाति  के बीच, किसी भी जाति  के एक क्षेत्र और दूसरे क्षेत्र के बीच, गाँव और शहर के बीच- यानी अनेक स्तरों पर दिखाई देती हैं.
ऐसे में जातीय समस्या और विकट हुई है. अलग राज्य के कई आन्दोलनों में वास्तविक वंचना के कारण ही आम लोग वहां के छोटे  पूंजीपति, स्थानीय व्यापारी  और मध्य वर्ग के पीछे गोलबंद होते हैं जैसे कि उत्तराखंड और झारखंड आन्दोलनों में हुआ. (झारखंड आन्दोलन न सिर्फ सबसे पुराना है, बल्कि उसका जातीय पक्ष भी मज़बूत था. यह आन्दोलन मूलतः आदिवासियों का था जिनकी अस्मिता जातीय गठन के सभी तत्वों को ध्यान में रखते हुए हिन्दी, बाँग्ला और उड़िया जातियों से निश्चय ही अलग है. आज का झारखंड प्रदेश सिर्फ बिहार से अलग हुए क्षेत्र से निर्मित है, जबकि झारखंडी जन के निवास-क्षेत्र का अच्छा-खासा हिस्सा अभी भी बंगाल, उड़ीसा आदि  प्रदेशों  में पड़ता है.) ऐसे आन्दोलनों को लेकर मार्क्सवादियों का दृष्टिकोण सकारात्मक होना चाहिए.  लेकिन जहां ऐसा नहीं है और शासक जमात के कुछ हिस्से सिर्फ किसी उप-राष्ट्रीयता को आधार बनाकर सत्ता में अधिक हिस्से के लिए अलग प्रांत की मांग करते हैं, वहां अक्सर ही उन्हें जन समर्थन  नहीं मिलता जैसे कि हरित प्रदेश या पूर्वांचल या भोजपुरी प्रदेश की मांग. इन फर्जी आन्दोलनों के प्रति दृष्टिकोण अलग होना चाहिए.  इस दौर  में जिस हद तक वर्ग संघर्ष तेज़ होगा, जिस हद तक साम्राज्यवाद-प्रेरित विकास के माडल के खिलाफ जन-गोलबंदी होगी, उसी हद तक जातीय समस्या  का भी निदान होता चलेगा. एक जाति का एक राज्य एक आदर्श है, यूटोपिया है, स्वप्न है जो रामविलास जी ने देखा था. लेकिन किसी भी स्वप्न को वास्तविकता में तब्दील करने के लिए वास्तविकता से ही शुरू करना होगा.
आज यह बात स्पष्ट है कि समाजवादी क्रान्ति के प्रथम प्रयोग में आरम्भ में सोवियत संघ में जातीय समस्या को जिस उदात्त, जनवादी स्तर पर हल करने की कोशिश की गई, जहां सभी जातियों को आत्मनिर्णय का अधिकार संविधान-प्रदत्त था, वहां भी आर्थिक विकास की असमानता और किसी हद तक स्टालिन के बाद रूसी जाति के राजनीतिक वर्चस्व के कारण जातीय असंतोष अच्छे-खासे स्तर तक पहुंचा हुआ था और सोवियत विघटन के अनेक कारकों  में से एक कारक  वह भी अवश्य बना. आज पड़ोसी देश नेपाल में जातीय आधार पर प्रान्तों के गठन  के वहां के माओवादियों के प्रस्ताव पर राजनीतिक सहमति न बन पाने के चलते संविधान-निर्माण का काम बाधित पड़ा  हुआ है. मुश्किल यह भी है कि इस सवाल पर नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) भी माओवादियों से सहमत नहीं है. भारत में भी अलग राज्य के लिए या उप-जाति के आधार पर किसी प्रांत के भीतर  स्वायत्तशासी क्षेत्र बनाने के आन्दोलनों पर सभी कम्युनिस्ट दल एकमत नहीं होते. इन कुछ उदाहरणों से यह समझा जा सकता है कि अभी भी जातीय गठन का मुद्दा  खुद कम्युनिस्ट आन्दोलन में सैद्धान्तिक और व्यावहारिक स्तर पर समृद्ध किए जाने की मांग करता है.

 Pranay Krishna, Photo By Vijay Kumarप्रणय कृष्‍ण। इलाहाबाद युनिवर्सिटी और जेएनयू से अध्‍ययन। प्रखर हिंदी आलोचक। जन संस्‍कृति मंच के महासचिव।  देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित ।

साभार- कथा-17 

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