एक स्थायी आर्थिक आपातकाल: स्लावोज ज़िज़ेक

By स्लावोज  ज़िज़ेक 

“आज पूंजीवाद  विरोधियों की कमी नहीं है. यहाँ तक कि हम पूंजीवाद की वीभत्सता के बारे में अत्यधिक आलोचनाएं सुन सुन थक गए हैं. जहाँ अखबार, टीवी की जांच रिपोर्टें और खूब बिकने वाली किताबें वातावरण को प्रदूषित करने वाली कंपनियों, भ्रष्ट बैंक मालिकों जो कि जनता की कीमत पर मोटी तनख्वाहें उठा रहे हैं और फैक्टरियों में बाल मजदूरों की ख़बरों से अटी पड़ी हैं. हालांकि, इस तरह की आलोचना में एक पेंच है भले ही यह कितना ही निष्ठुर प्रतीत हो : यह आलोचना एक नियम के रूप में कभी भी इस उदार लोकतांत्रिक ढांचे पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाती है. उद्देश्य खुले या ढंके रूप में यही है कि कैसे पूंजीवाद को मीडिया दबाव, संसदीय जांच, कड़े कानूनों और ईमानदार पुलिसिया जांच से नियमित किया जाए. बुर्जुआ राज्य के कानून की उदार लोकतांत्रिक मशीनरी पर कभी प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जाता. यह मशीनरी एक पवित्र गाय है जिसे यहाँ तक कि सबसे ज्यादा नैतिकतावादी पूंजीवाद विरोधी – वर्ल्ड सोशल फोरम, सिएटल आन्दोलन – छूने की भी हिम्मत नहीं करते”

(न्यू लेफ्ट रिव्यू में छपे स्लावोज  ज़िज़ेक के  लेख का एक अंश…..जिसका अनुवाद देश के चर्चित युवा-छात्र  नेता, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ  के पूर्व अध्यक्ष  और छात्र-संगठन आइसा के अध्यक्ष  संदीप सिंह ने किया है। जिनसे sandeep.aisa@gmail.com पर संपर्क संभव है )

यूरोपीय महासंघ के देशों द्वारा कमखर्ची प्रस्तावों (कटौती प्रस्तावों) के खिलाफ इस साल होने वाले विरोध प्रदर्शनों – ग्रीस में और थोडा मध्यम स्तर पर आयरलैंड, इटली और स्पेन – में दो ख़बरों ने काफी जगह बनाई. सरकारी, वर्चस्वशाली खबर, जो इस संकट का एक गैर राजनीतिक स्वाभाविकीकरण पेश करती है, के हिसाब से प्रस्तावित कटौती प्रस्ताव किसी राजनीतिक इच्छा से प्रेरित न होकर तटस्थ वित्तीय तर्कशास्त्र की अनिवार्यता हैं. मतलब अगर हमें अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर रखना है तो सुधारों की कड़वी दवा तो निगलनी पड़ेगी. दूसरी खबर विरोध कर रहे मजदूरों, छात्रों और पेंशनयाफ्ताओं की है, जो कटौती प्रस्तावों को वैश्विक वित्तीय पूंजी द्वारा कल्याणकारी राज्य के बचे खुचे शेष को ख़त्म करने के एक हमले के रूप में देख रही है. अंततः एक परिप्रेक्ष्य से IMF अनुशासन और व्यवस्था के एक तटस्थ एजेंट के रूप में सामने आता है तो दूसरे परिप्रेक्ष्य से वैश्विक पूंजी के अत्याचारी एजेंट के रूप में.

दोनों ही दृष्टिकोणों में सच का एक अंश है. जिस तरह IMF अपने सदस्य देशों से व्यवहार करता है, उसके सुपरईगो आयाम को भुलाया नहीं जा सकता है. जहाँ एक तरफ वह बकाया क़र्ज़ के लिए उन्हें डांटता-फटकारता है वहीँ दूसरी ओर नए कर्जों का प्रस्ताव भी रखता है, जिन्हें सब जानते हैं कि वे उसे चुका नहीं पायेंगे. इस तरह वे उस दुष्चक्र में और गहरे फंसते चले जाते हैं जहाँ पुराना क़र्ज़ और नए कर्जों को न्योता देता है. IMF  की यह सुपरईगो रणनीति इसलिए भी कारगर होती है क्योंकि कर्ज़दार देश, ये जानते हुए कि वे पूरा क़र्ज़ लौटा नहीं पायेंगे, इसमें भी फायदे की आशा रखते हैं.

हालांकि प्रत्येक कहानी में सच्चाई का एक अंश है लेकिन वस्तुतः दोनों गलत हैं. यूरोपीय सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा प्रचारित कहानी इस तथ्य पर पर्दा डालती है कि यह भयंकर घाटा वित्तीय क्षेत्र को बड़े पैमाने पर बेलआउट देने और मंदी के दौरान सरकारी करों में गिरावट के कारण हुआ है. एथेंस को दिया जाने वाला भारी लोन फ्रांसीसी और जर्मन बैंकों से यूनान द्वारा लिए गए क़र्ज़ को वापस कराने में इस्तेमाल होगा. यूरोपीय महासंघ के आश्वासन का असली उद्देश्य प्राइवेट बैंकों को मदद करना है क्योंकि यूरो जोन का कोई भी देश अगर दिवालिया होता है तो पूरे यूरोपीय महासंघ को भीषण छति होगी. दूसरी तरफ विरोध कर रहे लोगों की कहानी मौजूदा वामपंथ की विपन्नता की गवाह है. इनकी मांगों में मौजूदा कल्याणकारी राज्य के साथ किसी भी तरह के समझौते के खिलाफ एक आम नकार के अलावा कोई सकारात्मक कार्यक्रममूलक दृष्टि नहीं है. यहाँ पर यूटोपिया व्यवस्था में कोई आमूलचूल बदलाव नहीं है बल्कि ये है कि इसी व्यवस्था के भीतर कल्याणकारी राज्य को टिकाया जा सकता है. दूसरी तरफ हमें इसके विरोधी तर्क में निहित सत्य के अंश को नहीं भूलना चाहिए कि अगर हम वैश्विक पूंजीवाद के दायरे में ही रहते हैं तब हमारे लिए मजदूरों, छात्रों और पेंशनरों को मिलने वाली सुविधा में कटौती करना बेहद आवश्यक है.

Courtesy-  AP Photo

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अक्सर सुनने में आता है कि यूरोपीय महासंघ के संकट का असली सन्देश यह है कि सिर्फ यूरो मुद्रा नहीं बल्कि एकीकृत यूरोप का विचार ही मर चुका है. इससे पहले कि हम यह वक्तव्य मान लें इसको एक लेनिनवादी मोड़ देना चाहिए. यूरोप मर चूका है – ठीक है. लेकिन कौन सा यूरोप? उत्तर है – वैश्विक बाजार में समाहित उत्तर राजनीतिक यूरोप, वैसा यूरोप जो लगातार जनमत संग्रहों में ख़ारिज किया जा चुका है, ब्रुसेल्स का तकनीकपरस्त यूरोप. वह यूरोप जो अपने आप को यूनानी उत्साह, आवेग, करुणा के विरुद्ध ठन्डे यूरोपीय तर्क और गणित के पक्ष में प्रस्तुत करता है. वैसे यह कितना भी यूटोपियन लगे पर एक नए यूरोप के लिए संभावनाएं खुली हैं: एक साझे मुक्तिकामी कार्यक्रम पर आधारित एक पुनर्राजनीतिकृत यूरोप. वह यूरोप जिसने प्राचीन यूनानी लोकतंत्र, फ्रांसीसी और अक्टूबर क्रान्ति को जन्म दिया. इसलिए इस मौजूदा वित्तीय संकट पर बोलते समय हमें सम्पूर्ण संप्रभु राष्ट्र-राज्यों की पुनर्वापसी के लोभ से बचना चाहिए; जो कि मुक्त विचरण करने वाली अंतर्राष्ट्रीय पूंजी (जो एक राज्य को दूसरे राज्य के खिलाफ इस्तेमाल करती है) के लिए आसान चारा होते हैं. पहले के किसी भी दौर से ज्यादा आज के संकट को हमारा जवाब वित्तीय पूंजी की सार्वभौमिकता से ज्यादा सार्वभौमिक और अंतर्राष्ट्रीय होना पड़ेगा.

एक नया दौर

एक चीज स्पष्ट है: कल्याणकारी राज्य के दशकों में जब कटौतियां अपेक्षाकृत कम थीं और होती भी थीं तो इस वायदे के साथ होती थीं कि जल्दी ही सबकुछ सामान्य हो जाएगा, अब हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं जिसमें आर्थिक आपातकाल की स्थिति स्थायी होती जा रही है. यह लगातार बनी रहने वाली स्थिति है, जीवन के अंग जैसी. अपने साथ यह ज्यादा दूरगामी और गंभीर, कमखर्ची के उपाय, सुविधाओं में कटौती, कमजोर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं तथा रोज़गार के बड़े संकट को लेकर आयेंगी. वामपंथ इस कठिन कार्यभार को रेखांकित करने का सामना कर रहा है कि हम राजनीतिक अर्थशास्त्र से जूझ रहे हैं. इसका मतलब है कि कुछ भी ‘नेचुरल’ नहीं है – वर्तमान वैश्विक अर्थतंत्र राजनीतिक निर्णयों की एक कड़ी पर निर्भर करता है. साथ-साथ इस बात को जानते हुए भी कि जब तक हम पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर रहेंगे इसके नियमों का उल्लंघन निष्कर्षतः आर्थिक विद्ध्वंस्ता लाएगा क्योंकि ये व्यवस्था एक छद्म नेचुरल तर्कशास्त्र का पालन करती है. यद्यपि यह स्पष्ट है कि हम बढ़े हुए शोषण के एक नए चरण में प्रवेश कर रहे हैं जिसे वैश्विक बाजार (आउटसोर्सिंग इत्यादि) ने आसान बना दिया है, हमें अपने दिमाग में यह स्पष्ट रखना चाहिए कि यह इसी व्यवस्था के द्वारा थोपा गया है जो हमेशा आर्थिक रूप से ढहने के कगार पर रहती है.

इसलिए यह उम्मीद करना निरर्थक होगा कि मौजूदा संकट सीमित होगा और यूरोपीय पूंजीवाद बढ़ती जनसँख्या के लिए जीवन के अपेक्षाकृत ऊँचे स्तर की गारंटी करता रहेगा. यह शायद एक विचित्र क्रांतिकारी राजनीति होगी जो उम्मीद करती है कि स्थितियां जारी रहेंगी तथा पूंजीवाद को निष्प्रभावी तथा हाशिये का बना देंगी. इस तरह की तर्कप्रणाली के खिलाफ हमें बोदिऊ (Bodieu) की यह बात जरूर पढ़नी चाहिए कि कुछ नहीं होने से विपदा अच्छी है. हमें क्रांति के प्रति अपने आग्रह के लिए खतरा उठाना होगा भले ही क्रांति अस्पष्ट विपदा बनकर रह जाए. वामपंथ के अविश्वास का सबसे अच्छा सूचक संकट के प्रति उसका भय है. सच्चा वामपंथ संकट को बिना किसी भ्रम के गंभीरतापूर्वक लेता है. इसकी बुनियादी अंतर्दृष्टि यह है कि यद्यपि सारे संकट दुखदायी और खतरनाक हैं पर वे अवश्यसंभावी हैं. और यह वे धरातल हैं जिस पर लडाइयां छेड़ी और जीती जाती हैं. इसीलिये आज पहले से कहीं ज्यादा माओ-त्से-तुंग का पुराना नारा महत्वपूर्ण हो गया है – “स्वर्ग के नीचे हर चीज में घोर उलट-पुलट है और परिस्थितियां बेहतरीन हैं.”

आज पूंजीवाद के विरोधियों की कमी नहीं है. यहाँ तक कि हम पूंजीवाद की वीभत्सता के बारे में अत्यधिक आलोचनाएं सुन-सुन कर थक गए हैं. जहाँ अखबार, टीवी की जांच रिपोर्टें और खूब बिकने वाली किताबें वातावरण को प्रदूषित करने वाली कंपनियों, भ्रष्ट बैंक-मालिकों जो कि जनता की कीमत पर मोटी तनख्वाहें उठा रहे हैं और फैक्टरियों में बाल मजदूरों की ख़बरों से अटी पड़ी हैं. हालांकि, इस तरह की आलोचना में एक पेंच है, भले ही यह कितना ही निष्ठुर प्रतीत हो : यह आलोचना एक नियम के रूप में कभी भी इस उदार लोकतांत्रिक ढांचे पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाती है. उद्देश्य खुले या ढंके रूप में यही है कि कैसे पूंजीवाद को मीडिया दबाव, संसदीय जांच, कड़े कानूनों और ईमानदार पुलिसिया जांच से नियमित किया जाए. बुर्जुआ राज्य के कानून की उदार लोकतांत्रिक मशीनरी पर कभी प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जाता. यह मशीनरी एक पवित्र गाय है जिसे यहाँ तक कि सबसे ज्यादा नैतिकतावादी पूंजीवाद विरोधी – वर्ल्ड सोशल फोरम, सिएटल आन्दोलन – छूने की भी हिम्मत नहीं करते.

राज्य और वर्ग

ठीक यहीं पर मार्क्स की अंतर्दृष्टि पहले से कहीं ज्यादा तर्कसंगत ठहरती है. मार्क्स के अनुसार स्वतंत्रता का सवाल सिर्फ राजनीतिक सवाल नहीं है॰ जैसा की वैश्विक वित्तीय संस्थान, किसी देश के ऊपर निर्णय सुनाने के लिए करते हैं – क्या वहां मुक्त चुनाव होते हैं? क्या न्यायाधीश स्वतंत्र हैं? क्या प्रेस दबाव से मुक्त है? क्या मानवाधिकारों का सम्मान किया जाता है? असल में वास्तविक स्वतंत्रता की कुंजी सामाजिक संबंधों के ‘गैर राजनीतिक’ तंत्र में निहित होती है, बाजार से परिवार तक. जहाँ कारगर सुधार के लिए राजनीतिक सुधार  की आवश्यकता से ज्यादा उत्पादन के सामाजिक संबंधों में परिवर्तन की जरूरत होती है. हमलोग इस पर वोट नहीं करते कि कौन किस चीज पर कब्ज़ा जमाये है या फैक्ट्री में मजदूर-प्रबंधक सम्बन्ध कैसे होने चाहिए; इन सभी को राजनीति की परिधि से बाहर की प्रक्रिया में गिना जाता है. ऐसी आशा करना भ्रमपूर्ण है कि इन क्षेत्रों में लोकतंत्र की मात्रा बढ़ाकर कारगर बदलाव लाया जा सकता है. इन क्षेत्रों में कारगर बदलाव, कानूनी अधिकारों की परिधि के बाहर निहित है. निश्चित तौर पर इस तरह की लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएं एक सकारात्मक भूमिका अदा करती हैं लेकिन वे उसी बुर्जुआ राज्य मशीनरी का हिस्सा बनी रहती हैं जिसका उद्देश्य बिना किसी बाधा के पूंजीवादी पुनरुत्पादन की कार्यप्रणाली को बनाये रखना है. इन अर्थों में बोदिऊ (Bodieu) के तर्क बिलकुल सही थे कि आज हमारा अंतिम शत्रु पूंजीवाद, साम्राज्य या शोषण नहीं बल्कि लोकतंत्र है. अंतिम व्यवस्था के रूप में ‘लोकतान्त्रिक प्रक्रिया’ की सर्वस्वीकृति पूंजीवादी संबंधों के क्रांतिकारी बदलाव में बड़ी बाधा है.

लोकतान्त्रिक संस्थाओं के बारे में फ़ैली मोहग्रस्तता को दूर करने का कार्यभार इन संस्थाओं के नकारात्मक प्रतिपक्ष ‘हिंसा’ के बारे में फैले भ्रम को दूर करने से नजदीकी से जुड़ा हुआ है. उदाहरण के लिए, बोदिऊ ने हाल में राज्य की सत्ता के खिलाफ मुक्त क्षेत्र बनाकर आत्मरक्षात्मक हिंसा को प्रस्तावित किया. इस फार्मूला के साथ समस्या यह है कि यह राज्य की सामान्य कार्यप्रणाली और राज्य के असमान्य रूप से कार्य करने के बीच अंतर खोजने की एक गलत धारणा पर आश्रित रहता है. लेकिन वर्ग-संघर्ष का मार्क्सवादी ककहरा है कि शांतिपूर्ण सामाजिक जीवन स्वतः ही एक वर्ग (पूंजीपति) की अस्थाई जीत की अभिव्यक्ति है. अधीनस्थ और सताए हुए लोगों के दृष्टिकोण से वर्गीय वर्चस्व बनाये रखने वाले तंत्र के रूप में राज्य की उपस्थिति-मात्र ही हिंसक सच्चाई है. इसी प्रकार फ्रांसीसी क्रांति का एक नायक राबसपियरे ने कहा था कि राजा की हत्या इसलिए नहीं उचित है कि उसने कोई अपराध किया था बल्कि राजा की उपस्थिति ही अपने आप में एक अपराध है जो लोगों की स्वतंत्रता के खिलाफ खडी रहती है. इस ख़ास अर्थ में शोषितों द्वारा शासक वर्ग और उसके राज्य के खिलाफ ताकत का इस्तेमाल अंतिम निष्कर्ष के रूप में हमेशा आत्मरक्षात्मक होता है. यदि हम इस बिंदु को नहीं समझते हैं तो राज्य को ‘नार्मलाइज’ करते हैं और उसकी हिंसा को राज्य से जुड़ी हुई ज्यादतियों का एक विषय मान लेते हैं. स्थापित उदारवादी मान्यता है कि कई बार हिंसा का इस्तेमाल जरूरी हो जाता है लेकिन वह कभी भी वैध नहीं है – पर्याप्त नहीं है. क्रांतिकारी मुक्तिकामी परिप्रेक्ष्य के हिसाब से हमें इसे घुमाकर देखना चाहिए: शोषितों के लिए हिंसा हमेशा वैध है (क्योंकि उनका अस्तित्व ही हिंसा का परिणाम है) लेकिन हिंसा हमेशा जरूरी नहीं; यह हमेशा रणनीतिक विचार-विमर्श का मामला है कि शत्रु के खिलाफ ताकत का इस्तेमाल करना है कि नहीं.

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संक्षेप में हिंसा पर जमी हुई धुंध को साफ़ (डिमिस्टीफाई) करना होगा. बीसवीं सदी के कम्युनिज्म के साथ जो गलत था वह यह नहीं था कि उसने हिंसा का इस्तेमाल किया- राज्य की ताकत पर कब्जा करने और उसे बरकरार रखने के लिए गृहयुद्ध छेड़ा – बल्कि उनकी कार्यप्रणाली में था जिसमें पार्टी को ऐतिहासिक औजार के रूप में देखा गया जिसने हिंसा को अनिवार्य बनाया और वैधता प्रदान की. चिली की अलेंदे सरकार को कैसे कमजोर किया जाये इसके बारे में सुझाव देते हुए हेनरी किसिंजर एक नोट में लिखता है “अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दो”. आज पुराने अमेरिकी अधिकारी इस बात को खुले तौर पर स्वीकार कर रहे हैं कि यही नीति वेनुजुएला के खिलाफ लागू की गयी थी: भूतपूर्व अमेरिकी सेक्रेटरी आफ स्टेट लारेंस ईगल बर्गर ने वेनुजुएला की अर्थव्यवस्था के बारे में ‘फाक्स’ न्यूज पर कहा “शावेज के खिलाफ अभियान शुरू करने के लिए हमारे पास यह एक हथियार है जिसका हमें इस्तेमाल करना चाहिए. अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने के लिए मुख्यतः आर्थिक हथियार जिससे कि देश और उस क्षेत्र में उसकी स्वीकार्यता कम हो जाये”.  मौजूदा आर्थिक आपातकाल में भी हम स्पष्टया तटस्थ बाजार की प्रक्रियाओं से नहीं बल्कि राज्यों और वित्तीय संस्थाओं के अत्यधिक संगठित, रणनीतिक हस्तक्षेपों का सामना कर रहे हैं जो इस संकट को अपनी शर्तों पर हल करना चाहते हैं- इस स्थिति में क्या उनके ये कदम आत्मरक्षात्मक नहीं हैं?

ये विचार उन क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों की आरामदायक आत्मगत स्थितियों को हिलाकर रख देंगे जो अभी भी अपने बौद्धिक क्रियाकलापों को जारी रखे हुए हैं जिसका मजा उन्होंने पूरे बीसवीं शताब्दी में लिया: एक तूफानी राजनीतिक स्थिति पैदा करने की चाहत. एडोर्नों और होर्खाईमर ने इस महाविपत्ति को प्रशासित विश्व में ‘नवजागरण के द्वंद्व’ की परिणति में देखा. जार्जियो अगाम्बेन ने बीसवीं शताब्दी के यातना शिविरों को पूरे पश्चिमी राजनीतिक प्रोजेक्ट की सच्चाई के रूप में परिभाषित किया. लेकिन 1950 के पश्चिमी जर्मनी में होर्खाइमर के व्यक्तिव को अगर हम याद करते हैं तो वे जहाँ एक तरफ आधुनिक उपभोक्तावादी पश्चिमी समाज में ‘तर्क की समाप्ति’ की आलोचना करते हैं वहीँ दूसरी ओर सर्वाधिकारवाद और भ्रष्ट तानाशाही के समुद्र में स्वतंत्रता के एकमात्र द्वीप के रूप उसी समाज का वे समर्थन भी करते हैं.

बुद्धिजीवी मूलतः सुरक्षित और आरामदायक जीवन जीते हैं और अपनी इस जीवनशैली को सही ठहराने के लिए अगर वो आमूलचूल महाविपत्ति का परिदृश्य खड़ा करें, तो क्या होगा? बहुतों के लिए, बेशक, यदि क्रांति होती है तो इसे सुरक्षित दूरी पर होना चाहिए – क्यूबा, निकारागुआ, वेनेजुएला इत्यादि जिससे कि इन दूरदराज क्षेत्रों में होने वाली क्रांतियों से उनके ह्रदय भी गदगद रहें और उनका कैरियर भी आगे बढ़ता रहे परन्तु उन्नत औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में बढ़िया से काम कर रहे कल्याणकारी राज्यों के मौजूदा विध्वंस की स्थिति में, क्रांतिकारी बुद्धिजीवी सत्य के एक पल का सामने करने जा रहे हैं जहाँ उन्हें यह तय करना है कि वे वास्तविक परिवर्तन चाहते हैं या नहीं – क्योंकि वे अब इसे प्राप्त कर सकते हैं.

………… सामाजिक आर्थिक संबंधों के क्षेत्र में हमारा युग अपने आप को परिपक्व दौर में पाता है, जिसमें मानवता ने पुराने यूटोपियन सपनों को नष्ट कर दिया है और यथार्थ की सीमाओं को इसकी सारी असाध्यताओं के साथ स्वीकार कर लिया है – पढ़ें पूंजीवादी सामाजिक आर्थिक यथार्थ. इस पूंजीवादी यथार्थ का धर्मादेश है कि “आप कुछ नहीं कर सकते हैं”. आप व्यापक सामूहिक कार्यकलापों में शामिल नहीं कर सकते क्योंकि यह सर्वसत्तावादी आतंक में तब्दील होगा, आप पुराने कल्याणकारी राज्यों की तरफ वापस नहीं जा सकते क्योंकि यह आपको दौड़ से बाहरकर आर्थिक संकट में फंसा देगा, आप अपने आप को वैश्विक बाजार से अलग नहीं कर सकते. अपने वैचारिक रूप में इकोलॉजी भी विशेषज्ञों की राय पर आधारित बाह्य कारकों की असम्भवता की सूची जोड़ती है उदाहरण के लिए ग्लोबल वार्मिंग दो डिग्री से ज्यादा नहीं.

यहाँ पर दो तरह की असम्भवता (Impossibility) के बीच अंतर करना जरूरी है. पहली, सामाजिक टकराहट की यथार्थ असम्भवता और दूसरी ‘असम्भवता’ जिस पर वर्चस्वशाली वैचारिक चिंतन फोकस करता है. शासक वर्ग की वैचारिकी द्वारा प्रचारित असम्भवता यहाँ पर अपने आप को द्विगुणित कर अपने आप के लिए मुखौटे का काम करती है. इस असंभवता का वैचारिक काम पहली असम्भवता (सामाजिक टकराहट) के सच पर पर्दा डालना है. आज शासक वर्ग की विचारधारा क्रांतिकारी बदलाव, पूंजीवाद के उन्मूलन और एक सच्चे लोकतंत्र (जो भ्रष्ट संसदीय खेलों में सीमित नहीं हो गया है) की ‘असम्भवता’ को मनवा लेने का प्रयास करती है जिससे कि हम पूंजीवादी समाजों में व्याप्त सामाजिक टकराव की वास्तविक ‘असम्भवता’ को भूल जाएँ.

इसीलिये वैचारिक ‘असम्भवता’ को पार करने का लाकान (Lacan) का फार्मूला यह नहीं है कि “सब कुछ सम्भव है” परन्तु यह है कि “असंभव संभव है”. लाकान का ‘असम्भवता’ का यथार्थ पहले से तय एक सीमा नहीं है जिसका हमें हिसाब रखना पड़ेगा, बल्कि व्यवहार का एक क्षेत्र है. हमारा व्यवहार संभावनाओं के क्षेत्र में मात्र एक हस्तक्षेप नहीं है – यह संभावनाओं के संयोजन को ही बदल देता है और अंततः संभावनाओं की अपनी शर्तें पैदा करता है. यही कारण है कि कम्युनिज्म यथार्थ से रिश्ता रखता है – कम्युनिस्ट व्यवहार का मतलब है कि उस वास्तविक बुनियादी टकराहट में हस्तक्षेप करना जो आज के वैश्विक पूंजीवाद को चिन्हित करता है.

स्वतंत्रताएं

फिर भी यह प्रश्न बना रहता है कि इस असम्भाव्यता को संभव करने के लिए इस तरह के कार्यक्रममूलक बयान के क्या मायने है जबकि हम अनुभवमूलक असम्भाव्यता से घिरे हुए हैं: एक विचार के रूप में विशाल जनमानस को गोलबंद करने में कम्युनिज्म की विफलता? अपनी मौत से दो साल पहले जब यह स्पष्ट हो गया था कि अखिल यूरोपीय क्रांति संभव नहीं है और यह जानते हुए भी कि एक देश में समाजवाद की स्थापना निरर्थक है, लेनिन ने लिखा – “मजदूरों और किसानों की क्षमता को दस गुना तेज़ करने के बाद भी पूर्ण निराशाजनक परिस्थिति में अगर हमें पश्चिमी यूरोपीय देशों से अलग एक नई सभ्यता की बुनियादी जरूरतों को पैदा करने का एक मौक़ा दिया तो यह कम बड़ी बात नहीं है”. (लेनिन, ‘हमारी क्रांति’,1923, संकलित रचनाएँ, Vol. 33, मास्को, 1966, पेज 479)

क्या बोलीविया की मोरालेस सरकार, वेनेजुएला की शावेज सरकार और नेपाल की माओवादी सरकार के सामने ये दिक्कतें नहीं रही हैं? ये सत्ता में ‘साफ़ सुथरे’ लोकतान्त्रिक चुनावों से आये न कि तख्तापलट से. लेकिन जैसे ही वे सत्ता में आये राज्य और पार्टी नेटवर्क के अपने समर्थकों को सीधे गोलबंद करने लगे. उनकी परिस्थिति वस्तुतः निराशाजनक है: इतिहास की पूरी गति बुनियादी तौर पर उनके खिलाफ है. वे अपने पक्ष में किसी ‘स्वाभाविक’ प्रवृत्ति की उम्मीद नहीं कर सकते, कुल मिलाकर वे एक आपाधापी की स्थिति में थोड़ा बेहतर करने की उम्मीद कर सकते हैं. लेकिन क्या यह उन्हें एक अनूठी स्वतंत्रता नहीं देती है? और हम – आज का वामपंथ – क्या इसी परिस्थिति में नहीं है?

अंततः हमारी परिस्थिति क्लासिकल बीसवीं शताब्दी की परिस्थिति से एकदम विपरीत है जिसमें वामपंथ को पता था कि उसे क्या करना है (सर्वहारा की तानाशाही स्थापित करनी थी) उसे सिर्फ लागू करने के लिए सही समय की धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी थी. आज हमें यह पता नहीं है कि हमें क्या करना है, लेकिन हमें व्यवहार में उतरना है क्योंकि कुछ नहीं करने का परिणाम भयानक होगा. हमें ऐसे जीने के लिए बाध्य किया जाएगा जैसे कि ‘हम स्वतंत्र हैं’. हमें एकदम विपरीत परिस्थितियों में, गहराइयों में कदम रखने का ख़तरा उठाना पड़ेगा. हमें नयेपन के आयामों को फिर से खोजना पड़ेगा, बजाय इसके कि किसी तरह से मशीनरी चलती रहे और पुराने में जो कुछ अच्छा था – शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी सामाजिक सेवाएं- को बचा लिया जाए. संक्षेप में हमारी स्थिति वैसी है जैसा कि स्टालिन ने परमाणु बम के बारे में कहा था कि ये कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है. या फिर जैसा कि ग्राम्शी ने पहले विश्वयुद्ध से शुरू हुए दौर को चित्रित करते हुए कहा “पुरानी दुनिया मर रही है और नयी दुनिया पैदा होने के लिए संघर्ष कर रही है, यह समय पिशाचों का है”.

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