रेणु: एक अंतर्कथा: सुरेन्द्र चौधरी

By सुरेन्द्र चौधरीphanishwar-nath-renu-2
रेणु की विचारधारा उनकी भावधारा से बनी थी। उन्हें विचारों से अपने भावजगत की संरचना करने की विवशता नहीं थी। यही कारण था कि वे अमूर्त से सैद्धान्तिक सवालों पर बहस नहीं करते थे। उनके विचारों का स्रोत कहीं बाहर-पुस्तकीय ज्ञान में न था…..राजनीतिक हस्तक्षेप में उनका विश्वास बढ़ रहा था। उनके मन में एक आशा पनप रही थी। और जब ऐसा कुछ हुआ, तो रेणु अचानक सक्रिय हो गए……मानसिक क्षमताओं के प्रशिक्षण की बात पर वे मुस्कुराते। वे विश्वास करते थे कि प्रशिक्षण के लिए ज़िंदगी स्वयं एक पाठशाला है। उनका विश्वास था कि राजनीतिक पृष्ठभूमि के कलात्मक उपयोग के लिए कार्यकर्त्ता की दृष्टि का विसर्जन जरूरी है। इससे राजनीतिक पृष्ठभूमि स्वयं अपनी गतियों को अधिक क्षमता से और अधिक स्पष्टता धारण करती है। लेखकीय प्रतिबद्धता इससे आहत नहीं होती।…रेणु जी प्रतिबद्धता को इतनी नाजुक चीज न समझते थे कि उसके लिए गुहार की जरूरत पड़ती रहे। वे उसे लेखक और आदमी की अविभाज्य नैतिकता मानते थे। पर साथ ही मैंने यह भी पाया था कि कतिपय राजनीतिक गतिविधियों से वे बेहद निराशा का अनुभव करते थे।…उनका विचार था कि भारत में किसी शाब्दिक ढंग की वामपंथी एकता के बदले हमें जनता के बीच की एकता के आधारों को पहचानना चाहिए….पर उन्हें अपने विश्वासों ने भी कम निराश नहीं किया। इसे मोहभंग न कहा जाय तो क्या कहा जाय? जिस उत्साह और सक्रियता के साथ वे सन ‘ 74  के आंदोलन में शरीक हुये थेऔर जिस प्रकार वे उससे प्रेरित हो रहे थे, उसे बाद की स्थितियों ने जिस हद तक झुठलाया, उससे गहरी मानसिक निराशा उत्पन्न होना स्वाभाविक था। रेणु का मोहभंग हुआ। भारतीय राजनीति में नेतापंथी तत्त्व की वास्तविकता क्रांति से बड़ी हो जाये, यह एक दुर्घटना थी। यह रेणु के जीवन का सकरुण इतिहास बन गया।

रेणु जानते थे कि एशियाई देशों में, कृषि-उत्पादन में बृद्धि और सामाजिक न्याय, दोनों को एक-दूसरे की प्रगति में योगदान करना है। पूरा ढांचा इस योग में बाधक है। इस ढांचे को बदले बगैर कोई प्रगति नहीं होगी। मगर जब तक ढांचा बादल नहीं जाता, तब तक गाँव सोया रहे इससे हास्यास्पद बात और क्या हो सकती है?…. लोकतन्त्र और सम्पूर्ण क्रांति के अनिवार्य और ऐतिहासिक सम्बन्धों को लेकर उनकी समझ स्पष्ट थी। यह समझ व्यावहारिक अधिक थी, सैद्धान्तिक कम।… वे इस तंत्र की मानसिक बनावट को ज्यादा अच्छी तरह समझते थी। लोकतन्त्र के बिना सामाजिक न्याय संभव नहीं है। मगर हुम जिस लोकतन्त्र में हैं वह एक प्रकार का राज्यतंत्र है। फिर भी वह पुराने तंत्र की अपेक्षा अधिक गतिशील है। इस तंत्र के दोनों पक्षों पर उनकी सावधान दृष्टि थी। यही कारण है कि इस तंत्र की निरंकुशता के विरुद्ध जब संघर्ष प्रारम्भ हुआ तो वे उसकी अगली कतार में आ गये-नेता की तरह नहीं, कार्यकर्त्ता की तरह।

वे जनता की शक्ति में विश्वास करते थे। नेतृत्व के संबंध में वे अवश्य इतने आश्वस्त न थे। यही कारण है कि सम्पूर्ण क्रान्ति के संदर्भ में वे तमाम तथाकथित क्रांतिकारी शक्तियों की एकता को लेकर कभी आश्वस्त न हो सके थे। मगर अपनी इस भावना को उनहोंने रणनीति के ऊपर कभी नहीं थोपा। वे जानते थे कि इससे आंदोलन में बाधाएँ आयेंगी और उसकी  भावनात्मक शक्ति क्षीण होगी। श्री जयप्रकाश के क्रांतिकारी व्यक्तित्व और  कर्तव्य में उनकी आस्था लगभग ध्रुव थी।….’परती-परिकथा ‘ में विस्तार से प्रस्तुत कुबेर सिंह और जितेंद्र के संबंध में वामपंथी एकता को लेकर उनकी टकराहटों की चर्चा कई दृष्टियों से महत्व की हो जाती है। कांग्रेस के राजनीतिक प्रभुत्व को तोड़े बिना यह संभव न होता। पर क्या इस एकाधिकार को केवल अकेली पार्टी-शक्ति पराजित कर सकती है? वामपंथी शक्तियों की एकता के पीछे यही समझ कार्य करती दिखाई पड़ती है। रेणु कमयुनिस्ट न थे, पर उनका समाजवाद इस अर्थ से ज्यादा नीति-निपुण और उदार था। फ़्रांस और इटली के अनुभवों से वामपंथी एकता की समझ पुष्ट होती थी। ।
उपर्युक्त उद्धृत अंश सुरेन्द्र चौधरी की पुस्तक’ फणीश्वर नाथ रेणु ‘ के अध्याय ‘ एक अंतर्कथा’ से 

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One thought on “रेणु: एक अंतर्कथा: सुरेन्द्र चौधरी

  1. sudhir suman on said:

    ek dilchasp kahani hai renu kee- tabe ekla chalo re. use padhiey to renu ka samajvad aur vampanth samajh men aa sakta hai.

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