पटना कलम- विलुप्त शैली की कुछ कवितायें: कृष्ण कल्पित

By कृष्ण कल्पित 

1

जेपी लोकतन्त्र की आँख से ;

ढुलका हुआ आँसू था,

जो अब सुख चला है, पार्थ!

‘कि जनता आती है’ वाले;

विशाल गांधी मैदान में,

अब बाजीगर और रंडियाँ घूमते हैं!

दरअसल;

सम्पूर्ण क्रांति

अब एक रेलगाड़ी का नाम है, सार्त्र!

Image by Uday Shankar

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2.

(आज नालंदा-राजगीर से लौटा हूँ, पार्थ!)

उड़ रही  ख़ाक बची है, भंते!

बुद्ध की राख़ बची है, भंते!

गिड़गिड़ाने से कुछ नहीं हासिल,

बात-बेबाक बची है, भंते!

बाँट दी सबको चिट्ठियाँ दुःख की,

अब कहाँ डाक बची है, भंते!

परखचे उड़ चुके हैं कल्पित के,

इक फकत साख बची है, भंते!

मेरे हिस्से की पी गए शमशेर,

अब महज़ ताख बची है, भंते!

3.

(विश्वनाथ त्रिपाठी के लिए)

काहे नाराज़  हो निउनिया तुम।

दिल में जूँ राज़ हो निउनिया तुम।

बज रहा साज़ हो निउनिया तुम।

मेरी आवाज़ हो निउनिया तुम।

मुझको अंज़ाम-ए-मुहब्बत समझो,

और आगाज़ हो निउनिया तुम।

कल कहाँ थी मुझे नहीं मालूम,

अब-अभी-आज हो निउनिया तुम।

बंड था बाण भूल जा उसको,

अब तो हल्लाज हो निउनिया तुम।

एक पनवाँ खिलाय दो हमको,

काहे नाराज़ हो निउनिया तुम।

Image by Uday Shankar

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4.

आज क्या लिखके भेज दूँ तुमको।

तुम तो जानो हो क्या कहूँ तुमको।

रंग फबता है नीलगूँ तुमको।

तुम जो बोलो तो कल मिलूँ तुमको।

हममें कुछ फ़र्क़ ही नहीं जानम,

मैं भी पागल हूँ और जुनूँ तुमको।

आज कुछ इस तरह से हो जाए,

बोलता मैं रहूँ सुनूँ तुमको।

इक उचटती निगाह ले जाओ,

कुछ तो तोहफ़ा नज़र करूँ तुमको।

बेख़याली में काश हो जाए,

डगमगा कर के थाम लूँ तुमको!

5.

मैं भी कब तक यहाँ रह लूँगा,

मैं भी एक दिन मर जाऊँगा।

मेरा घर है चाँद के पीछे,

मैं भी अपने घर जाऊँगा।

सरहप्पा से गोरख आई,

ऐसी थी मजबूत बुनाई,

ओढ़ रहा हूँ बड़े जतन से,

मैं भी चादर धर जाऊँगा।

आज मेरे कल दिवस दूसरा,

आएगा फिर नया सिरफिरा,

थोड़े दिन की बात है जानम,

मैं भी तुम्हें बिसर जाऊँगा!

6.

कौन मक्कार कहता है कि

ठुमरी का अवसान हो जाएगा, पार्थ!

ख़माज ख़त्म हो जाएगा,

दादरा नष्ट हो जाएगा और चैती बिसरा दी जाएगी!

तब उस स्त्री का क्या होगा

जिसने अपना जीवन

करुण-किरवानी को अर्पित कर दिया है, सार्त्र!…

‘चैत मास बोले रे कोयलिया, हे रामा! मोरे अंगनवा!’

और वह अंधा हारमोनियम वादक!

कृष्ण कल्पित

कृष्ण कल्पित

अपने तरह का अकेला-बेबाक और विवादित कवि । कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावटी में हुआ। अब तक कविता की तीन किताबें और मीडिया पर समीक्षा की एक किताब छप चुकी है। एक शराबी की सूक्तियां  के लिए खासे चर्चित। ऋत्विक घटक के जीवन पर एक पेड की कहानी नाम से एक वृत्तचित्र भी बना चुके हैं। 

आलोचना -सहस्त्राब्दी अंक सैंतालीस से साभार 

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2 thoughts on “पटना कलम- विलुप्त शैली की कुछ कवितायें: कृष्ण कल्पित

  1. शानदार ! और हिन्दी कविता को थोड़ा और आदमीयत बख्सने का शुक्रिया।

  2. मोहन श्रोत्रिय on said:

    ताज़गी ! सही में विलुप्त शैली को पुनर्जीवित करने वाली कविताएं.

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