प्रो. आशीष नंदी: एक ‘नकारात्मक शिक्षक’ के विचार या बकवास- प्रणय कृष्ण

BY  प्रणय कृष्ण

आशीष नंदी के बयान के कुछ सबक

 जयपुर साहित्य मेले में प्रो. आशीष नंदी के बयान और उस पर उठे विवाद के अनेक निहितार्थ हैं. अनेक बुद्धिजीवियों ने उनके समर्थन में कहा कि उनके बयान को सतही ढंग से नहीं समझना चाहिए, बल्कि उसमें निहित ‘व्यंग्यार्थ’ और ‘विडम्बना’ को समझना चाहिए ताकि उनके जैसे ‘अंतर्दृष्टि’ से संपन्न समाज-विज्ञानी के साथ अन्याय न हो. मुश्किल यह है कि सामाजिक परिघटनाओं के आकलन में अकेले ‘अंतर्दृष्टि’ से काम नहीं चलता. सामाजिक परिघटनाओं का अध्ययन वस्तुगत-तथ्यगत  आधार की मांग करता है. नंदी साहब पहले भी अन्य सन्दर्भों में इसकी अवहेलना करते आए हैं और तथ्यहीन ‘अंतर्दृष्टि’ का परिचय देते रहे हैं. देवराला सती कांड के समय नंदी साहब ने फरमाया था कि सती होना महान भारतीय परंपरा से प्रेरित एक अत्यंत साहसिक कृत्य है और रूप कुंवर की हिंसक मृत्यु आधुनिकता की ताकतों के खिलाफ परंपरा के दावे का सशक्त ‘प्रतीक’ है. एक अन्य लेख में उन्होंने  सेकुलरवाद को पश्चिमी दुनिया में आम प्रयोग में आनेवाला ऐसा शब्द बताया जिसे भारत में एक विचार की तरह आयात कर लिया गया. इतिहासकार संजय सुब्रह्मण्यम ने इसकी खिंचाई करते हुए दिखलाया कि न तो ‘सेकुलरवाद’ पश्चिम में कोई आम प्रचलन का शब्द है और न भारत में उसका वही अर्थ लिया जाता है जो योरप में. बहरहाल, नंदी साहब महज अपने वक्तव्यों में ही विडंबनात्मक शैली का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि उनका बौद्धिक व्यक्तित्व ही विडम्बनामय है. वे हिन्दू न होते हुए भी भारत के प्राचीन हिंदू अतीत के प्रति रूमानी मोह रखते हैं और अंग्रेज़ी ज़बान में लिखते-पढते-बोलते हुए भी देशज ‘शुद्धता’ की वकालत करते हैं. उनकी इन तमाम धारणाओं पर बहस की इस लेख में गुंजायश नहीं है.

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जयपुर में उनका बयान कितना दलित-पिछडा विरोधी या समर्थक है, कितना सपाट है, कितना व्यंग्यात्मक , इसकी जगह देखना यह होगा कि सामजिक जीवन के पहलुओं पर वे विचार कैसे करते हैं. कहा गया कि उन्होंने भ्रष्टाचार को दलित-पिछडों के सामाजिक उत्थान का एक रूप बताते हुए प्रस्तावित किया  कि जबतक भ्रष्टाचार में सवर्णों और दलित-पिछडों के बीच समानता बची हुई है, तब तक वे भारतीय लोकतंत्र को लेकर आश्वस्त हैं. मुश्किल यह है कि विद्वान नंदी साहब ने यह बताना गवारा नहीं किया कि सामाजिक उत्थान का उनका बताया रास्ता कितने दलित-पिछडों-आदिवासियों को वास्तव में उपलब्ध  है. भ्रष्टाचार करने के लिए भी सत्ता का इस्तेमाल और भ्रष्टाचार करने लायक न्यूनतम पूंजी की ज़रूरत होती है. आदिवासियों में तो लगभग ६०% गरीबी रेखा के नीचे हैं. वहीं, केन्द्रीय सामाजिक न्याय  मंत्रालय के २००४-२००५ के आंकड़ों के मुताबिक़ दलितों की शहरी आबादी का ३९.९% हिस्सा और ग्रामीण आबादी का ३६.८% हिस्सा गरीबी की रेखा से नीचे था. पिछडों की शहरी आबादी का ३१.४% हिस्सा और ग्रामीण आबादी का २६.७% हिस्सा गरीबी की रेखा से नीचे था. तब ग्रामीण आबादी के लिए गरीबी की रेखा का मतलब था ११ रूपए ८७ पैसा प्रति व्यक्ति प्रति दिन की आय जबकि शहर के लिए यह सीमा १७ रूपए ९५पैसे  की थी. मिलता जुलता आंकड़ा अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी  रिपोर्ट का था जिसमें १९९३-९४ से लेकर २००४-२००५ के बीच के सरकारी आंकड़ों के आधार पर बताया गया था कि ८३ करोड ६० लाख हिन्दुस्तानी २० रूपए रोज पर गुजारा करते हैं. इन करोड़ों लोगों की न सत्ता में दखल है और न इनके पास भ्रष्टाचार में निवेश लायक पूंजी है.  अब नंदी जी ही ये बताएं कि भ्रष्टाचार से सामाजिक तरक्की का नुस्खा इन पर कैसे लागू हो जिनकी गरीबी के मुख्य कारणों में एक भ्रष्टाचार खुद है. फिर भ्रष्टाचार के फायदे भी छन कर नीचे तक नहीं पहुँचते, जैसा कि ‘विकास’ के बारे में कहा जाता है. बल्कि यों कहें कि ‘विकास’ के फायदे भी भ्रष्टाचार  के चलते ही छन कर नीचे नहीं पहुँच पाते. जो बीमारी है, नंदी जैसे चमत्कारी बौद्धिक वैद्य उसे ही इलाज बता रहे हैं.

नंदी जी की दिक्कत यह है कि वे किसी भी सामाजिक समूह के चंद नुमाइंदों की भ्रष्टाचार से हासिल सम्पन्नता को सारे तबके की तरक्की  मान बैठे हैं. उनका सामाजिक सिद्धांत भ्रष्टाचार करनेवालों को ध्यान में रख कर चलता है, भ्रष्टाचार के पीड़ितों को नहीं. उनके लिए यह जानना ज़रूरी था कि कौन से सामाजिक तबके भ्रष्टाचार से सर्वाधिक पीड़ित हैं. कुछ उदाहरण देखें. पैंतीस हज़ार करोड के उत्तर प्रदेश अनाज घोटाले (२००२ से २०१०) में वह अनाज जो जन वितरण प्रणाली की मार्फ़त अन्त्योदय अन्न योजना, जवाहर रोज़गार योजना और मिड-डे मील के तहत गरीबी-रेखा  के नीचे रहनेवालों में बंटना था, उसे खुले बाज़ार के हवाले कर दिया गया. अरुणांचल में १००० करोड रूपए का जन वितरण प्रणाली का घोटाला हुआ.  महाराष्ट्र में १९९५ से २००९ के बीच ४२ लाख फर्जी राशन कार्ड बना कर गरीबों के पेट पर लात मारी गई. उड़ीसा में मिड-डे मील तथा  पूरक आहार योजना में घटिया दाल सप्लाई का ७०० करोड रूपए  का घोटाला हुआ. हिमाचल प्रदेश में भी कई करोड का दाल-घोटाला हुआ. उड़ीसा, उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश और झारखण्ड में महात्मा गाँधी ग्रामीण रोज़गार योजना में घोटाले हुए. किन सामाजिक तबकों के लोग हैं जिन के पेट पर लात पड़ी?  वे किस  तबके के लोग हैं जिन्हें देश के तमाम आदिवासी इलाकों में अवैध खनन करनेवाले विस्थापित करते जा रहे हैं? वे कौन लोग हैं जिन्हें कोई वेदांता, कोई पास्को, कोई एस्सार वन्य संरक्षण कानून या पर्यावरण सुरक्षा क़ानून के प्रावधानों के खिलाफ सरकारी मंजूरी प्राप्त कर के उजाड़ता है, उनकी हवा, पानी में ज़हर घोलता है? कोई बे-पढ़ा लिखा इंसान भी ये समझता है कि भ्रष्टाचार के ऐसे  सभी मामलों के शिकार वही निम्न कही जाने वाली जातियों और जनजातियों के लोग हैं, जिन्हें भ्रष्टाचार के रास्ते तरक्की का प्रस्ताव नंदी जैसे विद्वान दे रहे हैं. यदि देश के अस्सी फीसदी लोग दलित, पिछड़े और आदिवासी श्रेणी में आते हैं, तो सिद्धांततः यह मानना होगा कि कोयला घोटाला, टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला अथवा भ्रष्टाचार का कोई भी रूप हो , उस  के चलते सरकारी कोष को होनेवाला नुक्सान सर्वाधिक इन्हीं तबकों का नुकसान है.

नंदी की दूसरी दिक्कत यह है कि वे भ्रष्टाचार के स्वरूप और कार्य-प्रणाली को नज़र-अंदाज़ करते हैं. भारत में अपराध और भ्रष्टाचार ऐसे पेशे हैं जो धर्म और जाति का बंधन नहीं मानते. याद कीजिए बहुचर्चित चारा घोटाला जिसमें जगन्नाथ मिश्र से लेकर लालू प्रसाद तक तमाम दलों और जातियों के लोग आरोपी हैं. अपेक्षाकृत नए घोटालों को भी लें , तो सभी का यही स्वरूप है भले ही वह किसी भी  व्यक्ति के नाम से चर्चित हुआ हो. क्या नंदी जैसे विद्वानों को यह बताने की ज़रूरत है कि भ्रष्टाचार का संबंध राजनीतिक अर्थशास्त्र से ज़्यादा है, सामाजिक मनोविज्ञान या नीतिशास्त्र से कम ? यह बात व्यक्तिगत स्तर पर किए जानेवाले भ्रष्टाचार पर भी लागू होती है. यदि शासन-तंत्र और अर्थ-तंत्र में गुंजायश नहीं होगी, तो अनैतिक आदमी भी भ्रष्टाचार नहीं कर सकता.

नंदी का विवादास्पद बयान जिस चर्चा का हिस्सा था, उस चर्चा को उनसे पहले ही तहलका के संपादक तरुण तेजपाल उत्तेजक, किन्तु गलत दिशा पकड़ा चुके थे. पिछले साल के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के वे खिलाफ थे. बहुत से लोग वाजिब कारणों से भी उसके खिलाफ हो ही सकते हैं. लेकिन तेजपाल ने अपना तर्क बनाया भ्रष्टाचार और उसके विरोध के जातिगत गणित को. जाति सामाजिक सच्चाई भी है और विश्लेषण का औजार भी. इसका अर्थ यह नहीं कि वह कोई जादू की छड़ी है जिसे घुमाते ही आसमान के नीचे सारा जगत-व्यापार हस्तामलकवत हो जाता हो. दुर्भाग्य से कुछ विद्वानों ने ऐसा ही समझ रखा है. पिछले साल चले भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के नेतृत्व या कार्य-नीति की कई वाजिब आलोचनाएं हो सकती हैं , लेकिन  कुछ बुद्धिजीवियों  ने जोर-शोर से जब यह कहना शुरू किया कि इस आंदोलन में दलित-पिछडों की कोई भागीदारी नहीं थी, तो आश्चर्य होना लाजिमी था. यदि विभिन्न दैनिक अखबारों के उन दिनों के तमाम स्थानीय संस्करण ही पढ़ लिए जाएँ, तो यह धारणा ध्वस्त हो जाए. कुछ लोग हर शहरी आंदोलन को महज सवर्ण आंदोलन समझ बैठते हैं, दूसरी ओर कुछ बौद्धिक हर शहरी आंदोलन को महज मध्यवर्गीय बताते नहीं थकते. सच यह है कि पिछले दो दशकों में शहरों की सामाजिक संरचना में बहुत से बदलाव आए हैं. शहरी मध्य-वर्ग में भले ही अक्सरियत अभी भी सवर्ण हो, लेकिन अच्छी खासी तादाद में दलित-पिछड़े समुदाय के लोग भी अब शहरी मध्य-वर्ग का हिस्सा हैं. यह भी समझना होगा कि शहरी आन्दोलनों में शहर में रहनेवाले गरीब और मेहनतकश भी हिस्सा लेते हैं जिनमें ज़्यादा तादाद दलित-पिछड़े समुदाय के लोगों की है. पिछले दिनों दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड विरोधी आंदोलन को फेसबुक पर सक्रिय  कई नामी-गिरामी बौद्धिकों ने प्रथम-दृष्टया शहरी-मध्यवर्गीय , अतः सवर्ण करार दिया. बाद को अनेक तथ्यों के आलोक में वे अपनी राय बदलने को विवश हुए.  कहा नहीं जा सकता कि नए सामाजिक आन्दोलनों को वे अब भी कितना समझते हैं, या कि उनके नज़रिए में कितना बदलाव आया है. प्रो. आशीष नंदी अपने बयान के ज़रिए एक नकारात्मक शिक्षक के बतौर हमारे सामने हैं. सीख यह है कि सामाजिक समूहों की वास्तविकता को अकादमिक प्रतीक-व्यवस्था में नहीं ढाला जा सकता. नंदी साहब के वकील ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा, ‘क्या विचारों के लिए सज़ा दी जा सकती है?’ हमारी तुच्छ समझ से ‘विचार’ और ‘बकवास’ में फर्क स्पष्ट कर देना ही काफी है. लोकतंत्र में ‘बकवास’ के प्रति भी थोड़ी सहिष्णुता रहे, तो बुरा नहीं.

Pranay Krishna, Photo By Vijay Kumarप्रणय कृष्ण,  हिंदी आलोचक। असोसिएट प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग , इलाहाबाद विश्विद्यालय। प्रखर हिंदी आलोचक। जन संस्‍कृति मंच के महासचिव।  देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान  से सम्मानित ।

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One thought on “प्रो. आशीष नंदी: एक ‘नकारात्मक शिक्षक’ के विचार या बकवास- प्रणय कृष्ण

  1. sanjay on said:

    nice one . thanx Uday.

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