New Harvest, A Film By Pallavi Paul: Uday Shankar


 

By  Uday Shankar

Craft is a divine and natural art. A craftsman is not artistic in himself; artistic feat which has been accumulated through talent and practice. To be human is not necessarily to be a craftsman. A sparrow building its nest, creation of bobby by ants and a spider weaving its web are examples of craft. We can become ‘Spiderman’, but not spider itself. This is what is- ‘being human’. We can imitate the action of spider, we can rather think about the process of weaving. This thinking constitutes our art. The knowledge of generations is inherent in us. For whatever art has been accumulated throughout generations, one doesn’t have any sense of greed or personal attachment towards it. Until today, anyone has hardly ever heard a smith proclaiming that a vessel is not saleable; or same for the weaver about a cloth, a goldsmith about ornaments. For them, these constitute their daily bread.

Today, whosoever is not even a tiller of land, he proclaims to have sown seeds in the sky. But even if there can be no fruits in sky or God on land, a poem can come alive and reinforce itself. This poem has the power to bear fruits in sky and God on land. It is like the hope of a technician who breathes to see a night convert to a day. Do modern dreams have creativity? We know to live in the natural rhythm of night and day; we want the moon in night and the sun in day. Why do we let our sight vanish in the shimmering nylon lights of night which dance in an artificial carnal climax and the clear bright lights of the day ?! The absence of creativity in dreams has extended itself in our material lives. We want to fill the rampant absence of creativity with trickery of sorcerers and incorrigible patters of the demented. Some season creates the feeling of conviviality and is universal. But thanks to the prevailing impotent technicians, we have lost that ability of experiencing it. May it be winter or summer, we are beyond guillotining ourselves in tepid waters. We are alive only through our recollections in which we have no formative contribution. Far from adding to them, we are unable to appreciate them. We are engrossed in vile masturbations. That part of life prone to disappearance is craft which has been bequeathed. To define this craft is the study of our art life for which we are absolutely incapable. What will be left of us if what is bequeathed in the form of craft of life is sundered? Will the craft sustain the essence of art and poetry? Can we rescue that indomitable bird that can’t help but be fraught with creativeness?

          The End

Film- Nayi Kheti(New Harwest)
Dirctor- Pallavi Paul
Text- Uday Shankar
English Translation-  Nivedita Yashvant Fadnis 

FromFilm, courtesy-Pallavi Paul

FromFilm, courtesy-Pallavi Paul

नयी खेती (फिल्म)- पल्लवी पॉल

क्राफ्ट दैवीय होता है, नैसर्गिक होता है। क्राफ्ट्समैन कोई ‘हुनरमंद’ आदमी नहीं होता है, ‘हुनर’ जिसे प्रतिभा और अभ्यास से अर्जित किया जाता है। मनुष्य होने की खासियत क्राफ्ट्समैन होना नहीं है। चिड़िया का अपना घोंसला बनाना, चींटियों द्वारा बाँबियों का निर्माण करना या फिर मकड़ी का जाला बुनना, यह सब क्राफ्ट्स के उदहारण हैं। हम स्पाइडर मैन ही बन सकते हैं, स्पाइडर नहीं और यही मनुष्य होना है। हम स्पाइडर की नक़ल उतार सकते हैं, उसके बारे में सोच सकते हैं और यह हमारी कला है, आर्ट है। पीढ़ियों का अभ्यास आपमें अनायास शामिल है। पीढ़ियों के अभ्यास से जो हुनुर आपने ‘अर्जित’  किया है, उसके लिए आपके भीतर कोई लोभ, व्यक्तिगत लगाव नहीं होता है। आज तक शायद ही किसी कुम्हार से यह कहते सुना गया कि यह घड़ा बिकाऊ नहीं है, किसी बुनकर से चादर, सोनार से गहने। यह उनलोगों की रोजी-रोटी का स्वाभाविक धंधा है।

आज की तारीख में जो कहीं से किसान नहीं है कह रहा है कि वह आसमान में धान बो रहा है। लेकिन आसमान में धान या जमीन पर भगवान्  भले नहीं जमें, कविता जरुर उग और जम सकती है और इसी कविता में यह शक्ति भी है कि आसमान में धान और जमीन में भगवान्  दोनों उगवा सकती है। यह उसी तरह है जैसे किसी तकनीशियन का एक पुराना सपना था कि रात दिन हो जाए! क्या आधुनिक सपने रचनात्मकता से रहित हैं!! हम रात और दिन की स्वाभाविक लय में जीना चाहते हैं, हमें रात में चाँद ही चाहिए और दिन में सूर्य। रातों को जगमगाती और कृत्रिम कामोन्माद में थिरकतीं नाइलोन की लाइटों और दिन के  ‘सफ्फाक उजाले’ की समानता को हम अपनी समझदार आँखों से क्यों ओझल हो जाने देते हैं! सपनों में रचनात्मकता का अभाव व्यावहारिक जिंदगियों तक में फ़ैल गया है। खुद की व्यावहारिक जिंदगियों में व्याप्त रचनात्मक अभावों  को हम जादूगरी करामातों और पागलों की बड़बड़ाहट से भरना चाहते हैं। कभी कोई ऋतू एक खुशनुमा अहसास जगाती होगी और जो सार्वभौम भी होती होगी। लेकिन रचनात्मकता से हीन तकनीशियनों की बदौलत यह अहसास भी हमारी हथेलियों से फिसल गया है। अब सर्द क्या गर्म क्या, गुनगुने पानी में गिलोटिन निगलने के हम आदि हो चुके हैं। हम सिर्फ स्मृतियों के सहारे जिन्दा हैं, जिसमें हमारा कुछ भी साझा नहीं है। उसमें कुछ जोड़ना तो दूर,उसे  हम सराह भी नहीं पा रहे हैं क्योंकि हमारी हथेलियों पर सरसों उग आयीं हैं और हम अपने तैलीय हाथों से सिर्फ हस्तमैथुन करना जानते हैं। हमारी जिन्दगी का जो भी हिस्सा जीने लायक है वह एक क्राफ्ट है और वह भी पुरखों का दाय है। इसी क्राफ्ट को व्याख्यायित करना हमारे कला-संसार का अभ्यास है और हम इस मामले में भी खुद को अक्षम पाते हैं। जब पुरखों का दिया यह जीवन-शिल्प भी हमसे छीन जाएगा, क्या बचेगा? क्या क्राफ्ट की व्याख्या में रत हमारी कला, कविता बच पाएगी? क्या हम हारिल पक्षी की उस जीवटता को बचा ले जाएंगे, जो ग्रहण-अर्जन(और सर्जन भी ) की वृति से कभी बाज नहीं आता !!
इत्यलम !!!
फिल्म- नयी खेती (New Harvest) 
नीदेशक- पल्लवी पॉल 
पाठ (Text)- उदय शंकर 

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5 thoughts on “New Harvest, A Film By Pallavi Paul: Uday Shankar

  1. sudhir suman on said:

    पूरी फिल्म देखी. बढ़िया. रचनात्मक.

  2. Shiv kumar sharma on said:

    Good presentation……

  3. अकवित्त समय को चबाती एक दूधिया किरकिराहट है. कहीं से एक सीटी (व्हिसल) बजती है और पल्टन मार्च करती है. अवधी अभंग में एक परछाई कलजुगहे मजूर की चाहत गाती है और कविता का नाम देती है. डर है कि पल्टन जा कहाँ रही है?
    मुझे लगता है कि सबसे आसान कहानियां बयाँ कर पाना सबसे मुश्किल होता है. तो मुश्किल कहानियां कैसे बयाँ होगी, खैर.. क्या स्पष्टता नियति है? या ‘होनी या अनहोनी की उदास रंगीनियाँ फकत’? या ‘जो हो सकता था उसकी परछाई बस’?
    मुझे लगता है कि हर क्राफ्ट नैसर्गिक होता है. चिड़िया एक घोसला दुबारा नहीं बना पाती न कुम्हार बर्तन. पुनरावृत्ति कला और रचनात्मकता की शत्रु है. वह मनुष्य से नहीं सिर्फ मशीन से संभव है. लेकिन पुनरावृत्ति जीवन की गति है. पर यह जानना जरूरी है कि हर बार उसका ‘ऐंगेल’ बदल जाता है. हर बार वह नया हो जाता है. स्वतंत्र हो जाता है.
    और इसीलिये उससे बहुत मोह होता है, विकट चाहना होती है. बाकी बातें जीवन के गणित का जोड़-घटाव है..
    फिर कविता की जमीन पर खेती भी होती है, युद्ध भी होता है और खून भी बहता है इसलिए वह बात बकवास है, समझा.
    मैं ऐसे कहना चाहता हूँ कि व्यवहारिक जिंदगी में रचनात्मकता का अभाव सपनों तक में घुस गया है. और फिर हम ‘करामाती’ और मशीनों के गुलाम हो जाते हैं. फिर हम चमक पैदा करते हैं, सन्नाटा खींच कर ले आते हैं, चुप्पी को गुंजा देते हैं..
    बाकि यह सब तेरी बकवास है कि जो भी जीने लायक है सब किसी का ‘दाय’ है. भाई स्मृतियों के बगैर कोई ‘क्राफ्ट’ संभव नहीं, जीवन में न कला में.
    ऐसा कभी नहीं हुआ और खुदा करे कि हो भी नहीं कि ‘एक ही कहानी बार-बार नए तरीके से लिखी जा रही है’..

    • Aditya Tripathi on said:

      The seeming disagreement between the principal piece and its critique can be reduced to the disagreement over arranging of the causal chain in the statement ” व्यवहारिक जिंदगी में रचनात्मकता का अभाव सपनों तक में घुस गया है” and vice versa. This settled, there is a unanimous agreement over the fact that creativity is lacking in the mundane existence . To my understanding creativity is not separated from mundane existence at all, what might be the case is lack of acknowledgement of this fact by the individual and this is what I suppose is meant above. Further, dream logic is derived from the quotidian itself but it runs the other way too. Something like the way it is at the quantum mechanical level… if one tries to figure out accurately what way the causality runs this exercise itself affects the running of causality …so one cannot say with certainty that lack of creativity in mundane existence has permeated into dreams or the other way round. It is both ways, either and neither. One derives few of its elements from the other …symbiotic in nature. …..

  4. Aditya Tripathi on said:

    Further, if we don’t go into philosophy of language (because if we attempt that, we will at some point agree that it is undecidable) the piece written by Uday bove is beautiful, relevant to the film which has stirred this attention …what, If I can say would be a blotch over the whole project that if some one gives her/ his attention to the persona of Vidrohi bhai in the film…

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